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Friday, June 26, 2009

एन्ग्लो वैदिकः लड़के एन्ग्लो, लड़कियाँ वैदिक ! एक परिवार में दो संस्कृतियों का मिलन।

वस्त्र कैसे हों? यह एक बहुत ही कठिन व निजी प्रश्न है और इसमें स्थान, जलवायु, आर्थिक स्थिति और उम्र भी बहुत बड़ी निर्णायक भूमिका निभाती है। इसे व्यक्ति विशेष पर छोड़ देना ही सबसे बेहतर होता है। किन्तु जब लोग किसी संस्था से जुड़ते हैं तो संस्था को लगता है कि वे लोग संस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं और संस्था चाहने लगती है कि उसके प्रतिनिधि उसके मूल्यों को अपने व्यवहार, व्यक्तित्व व पहनावे में संसार के सामने रखें। व्यवहार अधिक महत्वपूर्ण है परन्तु उसे नियन्त्रित करना अधिक कठिन है सो संस्थाएँ पहनावे को ही नियन्त्रित करने में लग जाती हैं। सच तो यह है कि हमारा उथलापन पहनावे को ही व्यक्तित्व मान लेता है।


संस्थाएँ यदि पहनावे में क्या अपेक्षित है यह भर दिशा निर्देश या गाइडलाइन्स में बता दें तो समस्या काफी सीमा तक सुलझ सकती है। वे कौन से वस्त्र पहनें भारतीय या विदेशी यह निर्णय न ही करें तो बेहतर है। वैसे भी जिस देश का काम काज अंग्रेजी में होता है वहाँ परिधान के भारतीय होने पर जोर देना गलत होगा। फिर यह देश इतना बड़ा और इतनी विविधता लिए है कि किसी एक या दो परिधानों पर भारतीयता का ठप्पा लगाना मूर्खता ही होगी। अस्सी के दशक में जब दक्षिण भारत में सलवार कुर्ते का चलन बढ़ा तब वहाँ के परम्परावादी लोग लड़कियों के लहंगे व आधी साड़ी या पावदा (यह वहाँ का अविवाहित किन्तु बड़ी लड़कियों का पाराम्परिक परिधान है, था कहना अधिक उचित होगा। अब यह केवल विवाह व त्यौहारों तक सीमित हो गया है। लहंगे के ऊपर साड़ी का ब्लाउज और आधी साड़ी लहंगे पर चुनरी की तरह बाँई तरफ से खोंसी जाती है और फिर साड़ी के पल्लू की तरह ही ली जाती है। देखने में बहुत सुन्दर लगती है। ) न पहनने से परेशान थे। आज सलवार कुर्ता लगभग पूर्णतया दक्षिण भारत में स्वीकार कर लिया गया है। मुझे याद है एक दक्षिणी विद्यार्थी का यह कथन कि उत्तर भारत के प्रॉफेशनल कॉलेजों में सलवार कुर्ता अधिकतर दक्षिणी लड़कियाँ ही पहनती हैं जबकि उत्तर भारतीय लड़कियाँ जीन्स पहनती हैं। यह बात नब्बे के दशक की है। आज की स्थिति मैं नहीं जानती।


पूर्वोत्तर में भी आसाम में मेखला चादर है तो शेष जगह एक लुँगी की तरह का wrap around और ब्लाउज है। बंगाल में साड़ी पहनने का अलग ही तरीका है। परन्तु सब जगह समय के साथ बदलाव आया है। और सबसे अधिक बदलाव तो पुरुषों के पहनावे में आया है। गूगल में जाकर यदि पुरुषों के पारम्परिक भारतीय परिधान देखें तो लगेगा कि ये गायब हो गए हैं। अधिकतर पुरुषों को तो वे पहनने भी नहीं आएँगे! क्या कोई पुरुषों के पारम्परिक परिधानों के लुप्त होने के कारण बता सकेगा? या फिर मेरी बिटिया के स्कूल द्वारा मजाक में दिए हास्यास्पद तर्क से ही काम चलाना होगा? वहाँ बताया गया था कि एन्ग्लो वैदिक का एन्ग्लो लड़कों के लिए है और वैदिक लड़कियों के लिए ! अतः लड़के पैन्ट्स पहनेंगे और लड़कियाँ सलवार कुर्ता और दुपट्टा !


महाराष्ट्र में तब परकर पोल्का( लंहगा और लंहगे के ऊपरी भाग को ढकता हुआ ढीला ब्लाउज ) के स्थान पर स्कर्ट ब्लाउज को स्वीकारा गया। ९ गज की साड़ी के स्थान पर ६ गज की साड़ी चल निकली। साड़ी भी सारे भारत में अलग अलग तरह से पहनी जाती थी। माँ जब गाँव जातीं तो सीधे पल्ले की साड़ी पहनती। उल्टे पल्ले की साड़ी जो आज पूरे भारत में स्वीकार्य है तब गाँव में फैशन मानी जाती। शायद कोई हरियाणवी मित्र मेरी इस बात को भी मानेगा कि एक समय में हरियाणवी स्त्रियाँ घर से बाहर निकलते समय सलवार कुर्ता नहीं लंहगा पहनती थीं। साड़ी भी नहीं। तो कैसे लहंगे और जेब वाले लम्बे ब्लाउज(कुर्ती ) से सलवार कुर्ते, फिर साड़ी और फिर वापिस सलवार कुर्ते की यह स्वीकृति यात्रा हुई?


कैसे सलवार कुर्ते जैसे एक पूर्णतया पंजाबी परिधान को सम्पूर्ण भारत ने सुविधा के कारण अपना लिया ? जब स्त्रियाँ घर से बाहर बसों व ट्रेन से यात्रा करके जाने लगीं तो साड़ी को पार्टी परिधान मानने लगीं और सलवार कुर्ते को नित्य का परिधान! साड़ी में कितने ही गुण क्यों न हों कुछ असुविधा भी है। असुविधा को भी भूल जाएँ तो कुछ व्यवहारिक समस्याएँ हैं जिनके चलते यह भागने, दौड़ने, भीड़ में धक्कामुक्की करने व यात्रा में लेटने सोने के लिए सबसे सही नहीं है।


सलवार कुर्ता साड़ी की इन्हीं असुविधाओं के चलते व इसके 'पंजाबी किन्तु भारतीय तो है' की मान्यता व इससे लगभग सारा शरीर ढके जाने के कारण अधिक लोगों की स्वीकृति पा गया। परन्तु जैसे किसी समय दक्षिण भारत ने सलवार कुर्ते को मान्यता दी वैसे ही उत्तर भारत जीन्स व ट्राउजर्स को मान्यता देने की लड़ाई लड़ रहा है।


सत्तर के दशक में जब हम कॉलेज में थे तो आधी से अधिक छात्राएँ बेलबॉटम, ट्राउज़र्स, पेरेलल्स व जीन्स पहनती थीं। हो सकता है कि यह महानगरों में ही होता हो परन्तु मुझे प्रत्यक्ष में कोई विरोध नहीं दिखा। थोड़ा दबा सा विरोध फ्रॉक या स्कर्ट ब्लाउज का अवश्य होता था किन्तु रोक नहीं थी। मुझे आश्चर्य होता है कि आज लगभग पैंतीस या चालीस वर्ष के बाद इसका अधिक व मुखर विरोध हो रहा है। तब विरोध अधिकतर तब होता था जब ये ही परिधान विवाह के बाद पहने जाते थे।


क्या हम आज कम सहिष्णु हो गए हैं ? या संस्कृति के ठेकेदार अधिक मुखर हो गए हैं ? या फिर हमारे परिधान उस सीमा को पार कर गए हैं जहाँ तक समाज बदलाव को स्वीकार कर सकता है ? या फिर हमारे छात्र व छात्राएँ पार्टी व कॉलेज का अन्तर भूल गए हैं ? मुझे लगता है कि जीन्स या ट्राउज़र्स का विरोध करने की अपेक्षा कैज़ुअल, फ़ॉर्मल व पार्टी परिधानों का अन्तर समझना व समझाना अधिक उचित होगा। जीन्स(हिपस्टर कैज़ुअल नहीं हो सकती,कैज़ुअल वस्त्र शायद वे होते हैं जिन्हें हमें बारम्बार सम्भालना, ठीक करना नहीं पड़ता, यदि यह सब ध्यान रखना पड़े तो हम कैज़ुअल नहीं रह पाते! ) व टीशर्ट कैज़ुअल, ट्राउज़र्स व कॉलर व बाँह वाली कमीज, अमिनि स्कर्ट व स्कर्ट तक आता ब्लाउज फ़ॉर्मल, मिनि स्कर्ट या छोटी टॉप पार्टी परिधान मानी जाती हैं। प्रायः सभी दफ्तरों में यही नियम होता है। साड़ी व सलवार कुर्ते को सभी जगह मान्यता दी जाती है क्योंकि इन्हें पहनने से भारत में किसी को रोकना उतना ही गलत होगा जितना कई होटल व क्लब आदि में पुरुषों को धोती कुर्ते या कुर्ते पाजामे पहनने से रोकना गलत लगता है। पुरुषों के लिए पूरी बाँह की कमीज, टाई, व ट्राउजर्स, या सूट फॉर्मल होता है।


जैसे अपने सुविधाजनक होने के कारण सलवार कुर्ता पूरे भारत में मान्यता प्राप्त कर गया वैसे ही जीन्स भी अपनी सुविधाजनक व कम से कम मैन्टेनेन्स की लागत व टिकाऊ होने के कारण मान्यता प्राप्त कर ही लेंगी। जीन्स जेब व मेहनत के हिसाब से सबसे सस्ती पड़ती हैं। दो जीन्स में पूरा कॉलेज जीवन बिताया जा सकता है। एक में बिताने वाले भी बहुत मिल जाएँगे। ना इस्तरी का झँझट, ना आज कौन सा परिधान पहनें सोचने की झँझट, बस चार पाँच टी शर्ट्स में से कोई एक उठाई और जीन्स के साथ पहन ली। सलवार कुर्ते के साथ इस्तरी करने की समस्या रहती है। साड़ी तो खैर पहनना ही धोबी को हर बार इस्तरी के रुपए चढ़ाने वाला धोबीप्रिय परिधान है।


जो लोग वर्दी के पक्ष में हैं वे अमीर गरीब का तर्क देते हैं। मुझे लगता है कि मनुष्य में इस उम्र तक इतनी समझ तो आ ही जानी चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति की जेब अलग अलग होती है और दूसरों की बराबरी करना घाटे का सौदा है। वर्दी लागू करेंगे तो क्या सबके लिए बस में या साइकिल पर आना भी निर्धारित करेंगे ? जब कोई मंहगी नई मोटरसाइकिल या कार में आएगा तो क्या आप उसे रोक देंगे ? कभी न कभी तो इन नवयुवकों/ नवयुवतिओं को जीवन की सचाई का सामना करना ही होगा। हम उन्हें कहाँ तक बचा पाएँगे? कपड़ों के पीछे पागल न होना भी एक आत्मविश्वास की स्टेटमेंट होता है। मेरी बिटिया ने तो मेरी किसी युग की जीन्स में कॉलेज के तीन साल निकाल दिए। यह उसका फैशन या आत्मविश्वास का स्टेटमेंट था।


कुछ वर्ष पहले म्यानमार में छात्रों के लिए राष्ट्रीय पारम्परिक परिधान पहनना अनिवार्य कर दिया गया था। मेरे डॉक्टर मित्र को दुख था कि उसके बेटे जीन्स नहीं पहन सकेंगे क्योंकि लूँगी (longyi) पहनना अनिवार्य हो गया था।


हमारे अधिकार व स्वतंत्रता धीरे धीरे ही छीने जाते हैं, एक झटके में नहीं। छीनने वाले यह देखते रहते हैं कि हमारी सहनशक्ति कितनी है। यदि एक वार हम झेल जाएँ तो वह अन्तिम नहीं होगा। इसके बाद एक और फिर एक और होना निश्चित है। साड़ी जैसे परिधान जिसके लिए प्रत्येक भारतीय के मन में आदर है, शायद वैसा ही जैसा माँ के लिए होता है, उसे भी एक नई दृष्टि से देखा जा रहा है। बहुत से स्कूलों में एक तरफ तो जहाँ अध्यापिकाओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है वहीं साड़ी के ब्लाउज व उनमें से झलकती पीठ को छिपाने के लिए वर्दी के जैकेट पहनाए जा रहे हैं। अपने परिधान पर गर्व भी है और लज्जा भी!

यह तर्क भी दिया जा रहा है कि हमारी स्त्रियाँ ऐसे परिधान पहनती हैं कि यदि किसी अंग/भाग/ज़िस्म को लगातार देखते जाओ तो वे अपने वस्त्र ठीक करने लगती हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि उन्हें किसी ने यह नहीं सिखाया कि अपने से विपरीत लिंग के लोगों से बात करते समय दृष्टि उनके चेहरे पर केन्द्रित रखी जाती है न कि उनके शरीर के अन्य भागों पर। यदि आप किसी के बुर्के, या ढके सिर को भी घूरते जाएँगे तो वह उसे ठीक करने लगेगी या छूकर देखेगी कि कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं कि कहीं कौवे आदि ने सिर पर बीट तो नहीं कर दी। यदि यही किसी पुरुष के साथ किया जाए तो शायद वह भी सचेत हो जाएगा, मूँछ को घूरेंगे तो हाथ फिराकर देखेगा कि मूँछ पर खाना, दूध आदि तो नहीं लगा रह गया !

वैसे जहाँ तह उत्तरप्रदेश का प्रश्न है कम से कम अभी के लिए तो मायावती जी ने इस मुद्दे को सुलझा दिया है। परन्तु यह मुद्दा सरलता से मरता नहीं, रक्तबीज दानव की तरह बारम्बार उठ खड़ा होता है। स्त्रियों के लिए क्या उचित व अनुचित है या कहिए कि क्या स्त्रियोचित है हमारे समाज में अन्य महत्वपूर्ण समस्याओं के अभाव में, सबसे अधिक चिन्ता का विषय बनता जा रहा है।


यदि हम युवाओं को वयस्क मानने लगें तो जैसे वे देश के कर्णधारों का चुनाव कर सकते हैं शायद वैसे ही अपने वस्त्रों का भी कर लें।


घुघूती बासूती

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ड्रेस कोड:शुभ्र श्वेत सलवार कुर्ता!

Monday, June 22, 2009

ड्रेस कोड: शुभ्र श्वेत सलवार कुर्ता!

जब भी सुनती हूँ कि किसी कॉलेज में ड्रेस कोड लागू हुआ है तो अपने छात्र जीवन की याद आती है। सत्तर का दशक था। उस जमाने में लड़कियाँ इतनी आगे नहीं आईं थीं कि किसी को वे चुनौती लगतीं। सो प्रायः हमें हमारे हाल पर छोड़ दिया जाता था। अधिकतर किसी को(अध्यापक/अध्यापिका वर्ग को) हमारे पहनावे से कोई परेशानी नहीं थी। कभी कभार ही होता था कि कोई अध्यापक/अध्यापिका हमें घूरकर देख लेता।


अब यह मत सोचिए कि हम सलवार कुर्ते पहनते होंगे। विवाह पूर्व हमारे पास दो ही सलवार कुर्ते थे। एक तो हमने सिलाई सीखने के चक्कर में बनाया था और दूसरा जबर्दस्ती बनवाया गया था। जबर्दस्ती! हाँ बिल्कुल हास्यास्पद जबर्दस्ती होती थी छात्राओं के साथ! यह था शुभ्र श्वेत सलवार कुर्ता! आज भी उसकी याद आती है तो उससे चिढ़ ही उठती है।


किसी बावले से क्षण में, शिक्षा के क्षेत्र में किसी शक्तिशाली मानव ने यह निर्णय लिया था कि कॉलेज की लड़कियों की वर्दी होनी चाहिए। शायद सारे सप्ताह हमें वर्दी पहनाने में उन्हें स्वयं भी अटपटा लगा हो या लगा हो कि यह तो अति होगी सो केवल हर सोमवार पंजाब विश्वविद्यालय के कॉलेजों में पढ़ने वाली प्रत्येक छात्रा श्वेत वस्त्रधारी हो जाती थी। यह बात और है कि यदि सहशिक्षा वाला कॉलेज हो तो छात्र रंग बिरंगे परिधानों में ही होते थे। केवल छात्राएँ वर्दीधारी होती थीं। पता नहीं सहशिक्षा वाले हमारे कॉलेज के प्रिन्सिपल को यह अटपटा लगता था या केवल हमें ही लगता था। वर्दी का नियम केवल सफेद तक ही सीमित था,आप सफेद साड़ी,फ्रॉक,स्कर्ट ब्लाउज,ट्राउजर्स कुछ भी पहन सकती थीं। अधिकतर के पास सलवार कुर्ता इसलिए था कि रैगिंग के दिनों में सलवार कुर्ता ही वर्दी होती थी।


थोड़ा बहुत मनोविज्ञान जब पढ़ा तो इस शक्तिशाली मानव,जिसे हमारे लिए नियम बनाने का अधिकार था, की थोड़ी मानसिक चीरफाड़ कर कारण खोजना चाहा परन्तु असफलता ही हाथ आई। कारण आज भी समझ नहीं आता। वर्दी का विचार तो जो था सो था किन्तु केवल छात्राओं के लिए क्यों यह तर्क समझ नहीं आता था। सोचिए कॉलेज में खेलदिवस है या वार्षिकोत्सव है। छात्र होते थे रंगबिरंगे और छात्राएँ सफेद वर्दी में!यही हाल स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस के दिन होता था। हमारे साथ ही हमारे स्कूल में पढ़े छात्र बिना वर्दी के और हम वर्दी में रानी बेटियाँ बनी होती थीं।


बहुत वर्षों बाद एक बार जब मैं अपने एक सहपाठी के साथ कॉलेज के दिन याद कर रही थी तो उसे इस वर्दी वाली बात की याद दिलाई और पूछा कि केवल हमें क्यों पहनाई जाती थी तुम्हें क्यों नहीं। तब वह ठहाका लगाकर हँसा और बोला कि लड़कों से पंगा लेने को किसका दिमाग खराब हुआ था। लड़कों पर नियम कायदे लगाकर तो देखते कौन लड़का इस नियम को मानता? हड़ताल हो जाती। 'जो दबता है उसे ही दबाया जाता है।' हमें तुम्हारी वर्दी देखकर तुम पर बहुत हँसी आती थी।


हाँ, तो मुझे मेरा उत्तर उसके इस ब्रह्म वाक्य में मिल गया,'जो दबता है उसे ही दबाया जाता है।' शायद इसे सही करके ऐसे कहा जा सकता है कि स्त्री दबती है इसलिए दबाई जाती है। शायद दबती के पुल्लिंग की आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि यह केवल एक स्त्रियोचित गुण है।


आज 'ड्रेस कोड लागू करना गुनाह तो नहीं' लेख पढ़ा। मैं लेखक से पूर्णतया सहमत हूँ किन्तु केवल यह चाहती हूँ कि ऐसे ड्रेस कोड पुरुषों पर भी लागू किए जाएँ। कुर्ते पाजामों, धोती कुर्तों में घूमते विशुद्ध भारतीय बालक क्या सुन्दर दृष्य उत्पन्न करेंगे! अहा, तब ही तो हम सच्चे भारतीय कहलाएँगे, अपनी संस्कृति के सच्चे रक्षक! देखिए वातावरण कितना शुद्ध, सात्विक हो जाएगा। वस्त्र बदलते ही उनके मनोभाव भी स्वच्छ हो जाएँगे। लड़कियों पर तब वे बुरी नजर नहीं डालेंगे। सारी कलुषित भावनाएँ धुल जाएँगी।


मैं जानती हूँ कि ऐसा ही होगा क्योंकि वस्त्र ही छेड़छाड़ व बलात्कार का मुख्य कारण हैं। हम वर्दी पहनती थीं तब भी छेड़ी जाती थीं। हमारे वस्त्र तो ठीक होते थे केवल छेड़ने वालों के गलत होते थे। सो वस्त्र दोनों तरफ से ही भारतीय होने चाहिए। तभी मन शुद्ध होगा। आपकी क्या राय है?


मेरी राय अगले लेख में!


घुघूती बासूती

Thursday, May 14, 2009

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी के प्रश्न और उत्तर देने का मेरा प्रयास

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी के प्रश्नों के उत्तर तो मैं बहुत पहले ही दे चुकी हूँ। आज फिर प्रस्तुत कर रही हूँ। वैसे हो सकता है कि सभी प्रश्नों के उत्तर उन्हें न मिलें या संतुष्ट न कर पाएँ।


यह भी मानती हूँ कि जितने प्रश्न मैं करती हूँ उन सबके उत्तर मेरे पास नहीं हैं, तभी तो प्रश्न करती हूँ। कुछ ऐसे भी विषय उठाए जाते हैं जिनके उत्तर मिलने में समय लगेगा किन्तु यदि यथास्थिति को स्वीकार कर लिया जाएगा तो बेहतर की खोज कैसे होगी ?


पुरुष को कोसने की जहाँ तक बात है तो अधिकतर पितृसत्ता को कोसा जाता है न कि पुरुष को। सोचने की बात यह है कि पुरुष भी पितृसत्ता के कारण कुछ हानियाँ भी झेल रहा है, जैसे...
१ पितृसत्ता के चलते स्त्रियों का उतना समुचित विकास नहीं हो पाता जितना अन्यथा होता। उसे भी ऐसी ही पत्नी, सहयोगी, सहेली मिलती है जो अपनी क्षमता का पूरा लाभ नहीं उठा पाईं।
२ स्त्री भ्रूण हत्या के चलते उसके लिए जीवन संगिनी पाना भी कठिन होता जा रहा है।
३ सदियों से होते आए अन्याय के कारण उस पुरुष को भी शक की नजर से देखा जाता है, जो समता में विश्वास करता हो।
४ अन्यायी समाज कभी भी उतना सुखद नहीं हो सकता जितना न्यायपूर्ण समाज हो सकता है। न ही ऐसा समाज उतना आर्थिक व सामाजिक विकास कर सकता है। जिस समाज में आधी आबादी दबाई व कुचली हुई हो वह कैसे पूर्ण विकसित हो सकता है ? उसी समाज में स्त्री के साथ पुरुष को भी रहना पड़ता है।
ऐसी ही और भी बहुत सी हानियाँ गिनवाई जा सकती हैं।


जिस दिन पुरुष यह समझ लेगा कि एक बेहतर व समता में विश्वास करने वाला समाज उसके लिए भी लाभदायक होगा तो वह भी पितृसत्ता के विरुद्ध आवाज उठाएगा।


उन्होंने अन्त में पूछा है......

इस बात पर सवाल कि यदि आपके घर के लड़के की शादी जिस लड़की से होने वाली है और मालूम हो जाये कि उसके साथ बलात्कार हुआ था तो क्या उसको घर की बहू बना लिया जायेगा? (यह सवाल विशेष रूप से उन महिलाओं से जो नारी सशक्तिकरण के नाम पर झंडा बुलन्द करतीं हैं और पुरुषों को गाली देकर इतिश्री कर लेतीं हैं)

मेरा उत्तरः यदि मेरा बेटा होता तो वह अपनी पसन्द से ही शादी करता। यदि उसकी पसन्द वह लड़की होती जिसका बलात्कार हुआ है तो भी वह उसकी पत्नी बनती। हाँ, शायद बलात्कारी से जितनी शत्रुता उस लड़की को होती उतनी ही मुझे भी हो जाती।

यदि मेरी बेटी बलात्कारी से विवाह करना चाहती तो मैं उसको मनःचिकित्सक से मिलने की सलाह अवश्य देती।
शायद समझ आया हो कि मुझे बलात्कारी विभत्स व अग्रहणीय लगता है न की बलत्कृत।


अन्त के तीनों प्रश्नों के उत्तर उन्हें मेरी इस पुनः पोस्ट किए लेख में मिल जाएँगे। मैं लेख के साथ उसपर आईं टिप्पणियाँ भी यहाँ दे रही हूँ क्योंकि उस लेख पर कुछ बहुमूल्य टिप्पणियाँ आईं थीं। देखिए.........


स्त्रियों के मुद्दे पर : कुछ उत्तर, कुछ और प्रश्न

यह मेरा काफी समय पहले लिखा लेख है । शायद काफी लोगों को स्त्री के स्त्री का शत्रु होने का रहस्य या कहें कारण , यहाँ मिल जाएँगे । ]

हमने व हमारे समाज ने क्या गलतियाँ की हैं और क्या गलतियाँ अभी भी करे जा रहे हैं इसका कुछ कुछ परिणाम तो हमें वर्तमान में देखने को मिल रहा है, किन्तु भविष्य इन परिणामों को बहुत विकराल रूप में हमारे सामने प्रस्तुत करेगा । जब तक यह परिणाम हमारे इस मूल रूप से अन्धे समाज को भी दिखने लगेगें, तब तक बहुत नहीं तो काफी देर हो चुकी होगी । समस्याएँ बहुत हैं व अधिकतर हमारी अपनी बनाई हुई ही हैं ।

इस समय मैं भारतीय समाज में स्त्रियों के स्थान , भ्रान्तियों व उनसे उत्पन्न होने वाली हानियों कि चर्चा कर रही हूँ । आज तक इन सबसे मुख्य व प्रत्यक्ष रूप से केवल स्त्रियों को हानि होती थी । अतः हमारा समाज , जो कि मुख्य रूप से पुरुषों के लिए ही बना है, जहाँ का धर्म, संस्कृति , कायदे कानून, सब कुछ पुरुषों के हितों को ही ध्यान में रखकर बनाए गए हैं , चैन की नींद सो सकता था व अपने घर का कचरा कालीन के नीचे दबा सकता था । यहाँ यह भी कह दूँ कि केवल भारत या एक धर्म या समाज ही नहीं सब धर्म, संस्कृति, कायदे कानून, पुरुष के हितों को देखकर बने हैं । किन्तु आज हानि व हमला पुरुष के हितों , सुख चैन, सुविधाओं पर है । उसका व उसके समाज का अस्तित्व ही खतरे में है । स्त्रियों का तो खतरे में है ही , किन्तु वह बहुत ही सूक्ष्म बात है, पुरुष व पुरुष के अस्तित्व के सामने । सो हो सकता है, पुरुषों के साथ साथ वे अन्धी स्त्रियाँ भी , जो स्त्री के अस्तित्व, उसके आदर व उसके जीवन के महत्व को नहीं मानती, वे भी जाग जाएँ क्योंकि आखिर उनके लाड़ले बेटों का भविष्य दाँव पर लग गया है ।

हमारा इतिहास गवाह है कि स्त्री पर जब भी , जैसे भी हो सकता था, अत्याचार किया गया । कुछ पुरुषों ने किया, कुछ स्वयं शक्ति चखने के लिए एक स्त्री ने दूसरी पर किया । यह शक्ति परीक्षण वह पुरुष पर तो कर नहीं सकती हैं ,अतः जैसे ही परिवार में उसकी स्थिति कुछ सुदृढ़ होती थी, तो वह परिवार में नई आई सदस्याओं पर कुछ रैगिंग की तर्ज पर यह शक्ति परीक्षण करती हैं । बार बार पुरुष यह कह कर कि स्त्री ही स्त्री की सबसे बड़ी शत्रु है , अपना पल्ला झाड़ लेता है । किन्तु जब आपके बच्चे की रैगिंग में टाँग टूट जाए या जान चली जाए, तो आप महाविद्यालय प्रशासन को यह कह कर कि विद्यार्थी ही विद्यार्थी का सबसे बड़ा शत्रु है बरी तो नहीं कर देते । तो फिर परिवार में हुए अत्याचार से स्वयं को परिवार का मुखिया होने के नाते कैसे बरी कर लेते हो ?

स्त्री को घर से निकाला गया , जलाया गया, मारा गया, मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया । उसे वश में रखने के लिए कभी उसे कुछ लालच दिया गया तो कभी उससे कुछ सुविधाएँ छीन ली गईं । लालच के रूप में सुन्दर रंग बिरंगे वस्त्र , आभूषण , रंगीन सौभाग्य चिन्ह व सब प्रकार का भोजन ग्रहण करने का अधिकार । दंडित करने व लाइन में रखने के लिए यही सब सुवधाएँ उससे छीन ली जाती थीं । उसे बताया जाता था कि ये सब सुख उसे तभी तक प्राप्य हैं जब तक वह अपने जीवन के आधार, अपने स्वामी, अपने पति को जीवित व प्रसन्न रख पाएगी । ये सब निर्जला व्रत उपवास इसी भय की देन हैं । वह पति व अपनी सुविधाओं व बहुत बार अपने जीने के अधिकार को बचाने के लिए भौतिक रूप से जो बन पड़ता था करती थी । किन्तु अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखने के लिए पति का जीवन कैसे भी बचाना अनिवार्य था । सो भौतिक रूप से सब कुछ करने के बाद वह अन्ध श्रद्धा की शरण लेती थी ।

विश्वास न हो ऐसी स्थिति की कल्पना करिये जहाँ आपका जीवन एक पतली डोर से लटका हुआ हो, जीवित जलाए जाने की तलवार आपके सिर पर लटक रही हो । उदाहरण के लिए यदि आपका जीवन किसी ऐसी शक्ति के हाथ में हो जो बहुत शक्तिशाली, क्रूर , अविवेकी व तर्कविहीन हो, लकीर की फकीर हो , जिस पर किसी न्याय की गुहार का कोई प्रभाव न पड़ता हो । वह शक्ति या व्यक्ति आप से कहे कि जब तक आप के सिर पर बाल हैं आप जीवित रहेंगे और जिस दिन ये बाल झड़े, आपको जीवित चिता के हवाले कर दिया जाएगा । अब आपके लिए ये बाल प्राणों से भी अधिक प्रिय होंगे । आप एक बार खाना भूल जाएँगे किन्तु बालों की साज संवार , सफाई, व स्वास्थ्य के विषय में कभी नहीं भूलेंगे । वे बाल आपकी जान हैं, धर्म हैं , या ये कहें कि वे ही आपका जीवन हैं । अब आप जब सब तरह से उनकी रक्षा करते नहीं थकते और फिर भी देखते हैं कि समय असमय आपके मित्रों , भाइयों, चाचा , ताऊओं के बाल झड़ ही जाते हैं और ऐसा होने पर उन्हें घसीट कर चिता पर रख दिया जाता है । उनकी चीखें आपके कानों के परदों को फाड़कर आपके अन्तर्मन तक को दहला जाती हैं । सोते जागते, खाते पीते ये चीखें आपका साथ नहीं छोड़ती । तब आप आध्यात्म, अलौकिक , दैवीय, अतिमानवीय शक्तियों का भी सहारा लेने लगते हैं । आपने देखा था कि दो मित्रो के बाल तब झड़ गए जब उन्होंने खाली पेट चाय पी थी या दो और के तब जब उन्होंने अपने बालों से तंग आकर उन्हें गाली दी थी । सो अब आप खाली पेट चाय पीना छोड़ देते हैं, बालों को कभी भूले से भी गाली नहीं देते हैं । यदि कोई सुझा दे कि गले में यह हरे मोती का धागा डाल लो तो बाल अधिक समय तक टिकते हैं, सो आप वह भी कर लेते हैं । यदि कहें कि बुधवार को दाढ़ी न बनाने से बाल सुरक्षित रहते हैं तो क्या आप केवल दाढ़ी बनाने के सुख के लिए जीते जी चिता में डाले जाने का खतरा , भय, आशंका मोल लेंगे ? सो अब आप चाहेंगे कि आशीर्वाद में भी यदि कोई आपको बालवान या बालवता कहे तो बेहतर है क्योंकि आपका चिरंजीवी होना तो उनके होने पर निर्भर है । आप प्राण जाएँ पर बाल न जाएँ में पूर्ण विश्वास करेंगे । सो इसको कहते हैं कंडिशनिंग ! अब न केवल आपके चेतन मन को बालों से मोह है अपितु आपका अवचेतन मन भी बालों के प्रति मोहित है । सो अब समाज कहता है कि बालों को इतना प्रेम करना, उनका ध्यान रखना, उन्हें जान से अधिक चाहना आपका स्वभाव है । यही आपके संस्कार हैं, यही आपका धर्म है, यही आपके देश की संस्कृति है । बिल्कुल सही है । जिन बालों के रहते आप पलंग पर सो सकते हैं , भांति भांति के व्यंजन खा सकते हैं, रंग बिरंगे कपड़े पहन सकते हैं , सबसे बड़ी बात कि जी सकते हैं, उन बालों पर आप क्यों न बलिहारी जाएँगे । यह तो है इस जन्म की बात !

घुघूती बासूती

चर्चा चालू है । अभी नया लिखने की स्थिति में नहीं हूँ । शीघ्र ही इस विषय पर और लिखूँगी ।

17 टिप्पणियाँ:

अजित ने कहा…

समर्थ सार्थक लेखन। चर्चा चालू रखिये। अगली पोस्ट की प्रतीक्षा में।
4:54 अपराह्न
Rachna ने कहा…

हे नर , क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम


क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम
कि नारी को हथियार बना कर
अपने आपसी द्वेषो को निपटाते हो
क्यों आज भी इतने निर्बल हो तुम
कि नारी शरीर कि
संरचना को बखाने बिना
साहित्यकार नहीं समझे जाते हो तुम
तुम लिखो तो जागरूक हो तुम
वह लिखे तो बेशर्म औरत कहते हो
तुम सड़को को सार्वजनिक शौचालये
बनाओ तो जरुरत तुम्हारी है
वह फैशन वीक मे काम करे
तो नंगी नाच रही है
तुम्हारी तारीफ हो तो
तुम तारीफ के काबिल हो
उसकी तारीफ हो तो
वह "औरत" की तारीफ है
तुम करो तो बलात्कार भी "काम" है
वह वेश्या बने तो बदनाम है

हे नर
क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम
5:10 अपराह्न
ललित ने कहा…

सर्वप्रथम "या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता, नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं सुरेश्वरी" फिर "गतिस्वं गतिस्वं त्वमेकां भवानि" तक ऋषि, मुनि, देवों, सभी ने नारी की पूजा की है। हिन्दू शास्त्र कहते हैं "यत्र नार्येस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता", शंकराचार्य ने भी देवी की स्तुति में अनेकानेक काव्य लिखे हैं।

हिन्दू लोग नारी की रक्षा, सम्मान को बचाने के लिए अपनी जान देते आए हैं, देते रहेंगे।

इस्लाम में नारी को कुछ निम्न स्थान दिया गया है। एक पुरुष को चार-चार विवाह की अनुमति होती है। भारत में विदेशी आक्रमणों के बाद विशेषकर मुगल शासनकाल में नारी की ऐसी दयनीय स्थिति शुरू हुई थी। किन्तु अब धीरे धीरे समाज परिवर्तन हो रहा है आशा है शीघ्र ही नर-नारी दोनों बराबर होकर कदम से कदम मिलाकर विश्व को प्रगति पथ पर ले जाएँगे।

आपके लेखों में पुरुष वर्ग के प्रति जितनी निराशा, विरोधाभास और वैचारिक जहरीलापन प्रकट हो रहा है उससे लगता है कि शायद आपको किसी इस्लाम अनुयायी पुरुष से धोखा, दर्द मिला हो। पिता, पुत्र, भाई, पति-प्रेमी का सच्चा स्नेह-प्रेम न मिल पाया हो। निवेदन है कि निष्पक्ष, निरपेक्ष होकर शान्त मन से सोचें...

अनेक पुरुषों ने नारी की वन्दना मे, प्रशंसा में, काव्य से लेकर महाकाव्य तक लिखे हैं। लेकिन महिलाओं द्वारा पुरुष की प्रशंसा में कितने काव्य लिखें हैं? 'देवियाँ' में भी ऐसी कृतघ्नता क्यों?
6:10 अपराह्न
अभय तिवारी ने कहा…

बहुत ज़बरदस्त तरीके से अपनी बात रखी है आपने घुघूती जी..

श्रीमान ललित, आप लेख समझने की कोशिश करें.. लेखक के विषय में अपने अनुचित अनुमान न निकालें.. और उस ऊर्जा का इस्तेमाल स्वयं अपने दिमाग की ग्रंथियों को सुलझाने में करें, वह बेहतर होगा..
आप यहाँ जिस मानसिकता का प्रदर्शन कर रहे हैं न सिर्फ़ वह साम्प्रदायिक है बल्कि ठीक वही पुरुष-वर्चस्ववादी है जिसका घुघुती जी ने उल्लेख किया है..

आप को अधिकार किसने दिया कि आप किसी स्त्री से इस तरह के सवाल करें? ये निहायत अशिष्टता, मूर्खता और अहंमन्यता है..

क्या किसी "देवी" से बात करने का यही तरीका जानते हैं आप?
7:38 अपराह्न
Rachna ने कहा…

@abhay tiwari
you have said what i wanted to say
so not repeating . Mam is a senior lady and an icon and one has to meet her to understand what she is
8:44 अपराह्न
masijeevi ने कहा…

इस अच्‍छी खासी चर्चा में हिंदू-मुसलमान के आने की जगह कैसे निकाली गई भई ?

घुघुतीजी फिलहाल ऐसी टिप्‍पणियों को इग्‍नोर मारें और जारी रहें।
10:15 अपराह्न
anitakumar ने कहा…

घुघुती जी
आपने बड़े सरल ढगं से उस शक्ति खीचतान को समझाया है जिसकी मैं ने अपने कमेंट में चर्चा की थी। रचना जी ने बहुत सुन्दर कविता के सहारे अपनी बात कही है। ललित जी बेवजह सांप्रदायिक प्रवति दिखा रहे हैं, और देवियों ने पुरुषों की तारिफ़ में अगर लिखना शुरु कर दिया तो क्या समाज उनके चरित्र पर लाछन न लगाएगा। पुरुष स्त्री की तारिफ़ करे तू श्रंगार रस और अगर स्त्री करे तो कुल्टा॥
चर्चा जारी रखिए पलीज
10:55 अपराह्न
Mired Mirage ने कहा…

मसीजीवी जी निश्चिन्त रहिये । मेरे पास हिन्दु मुस्लिम वाली बात के लिये भी उत्तर हैं । यह अच्छा ही है कि लोग ऐसे प्रश्न पूछें । शीघ्र ही उत्तर दूँगी थोड़ा सा स्वास्थ्य के कारण देर हो सकती है ,किन्तु उत्तर अवश्य दूँगी ।
घुघूती बासूती
10:57 अपराह्न
Lavanyam -Antarman ने कहा…

घुघूती जी,
स्त्री का सँघर्ष सदीयोँ को पार करता हुआ आज २१ वीँ सदी के प्रथम चरण तक आ पहुँचा है --
आप ने अपने विचार साफ तरीके से लिखे हैँ ..
आगे भी पढने की उत्सुक्ता बनी रहेगी ..
आशा है आप के स्वास्थ्य मेँ सुधार है
..ध्यान रखियेगा,
स स्नेह,
-- लावण्या
11:58 अपराह्न
Sanjeet Tripathi ने कहा…

आपकी कविताएं जितनी स्पर्शी होती है उतने ही ज्वलंत आपके लेख, चिंतन के लिए मजबूर करने वाले!!


बंधु ललित, इतनी आसानी से किसी के प्रति अनुमान लगा लेने की कला आपने कहां से सीखी। या यूं कहें कि किसी भी प्रसंग मे हिन्दु-मुस्लिम वाला संदर्भ जोड़ने की कला आपने कहां से सीखी बंधु। अगर ऐसी कोई संस्था हो जो यह सब सीखाती हो तो काश वह बंद की जा सके!!
12:04 पूर्वाह्न
रंजू ने कहा…

बहुत ही ज्वलंत सवालो और जवाबो से रचा है आपका यह लेख पर यह वक्त अब बदल रहा है
और बदलेगा ...कुछ कभी इसी तरह का मैंने भी लिखा था

तुम पुरुष हो इसलिए तोड़ सके सारे बंधनो को
मैं चाहा के इस से मुक्त ना हो पाई
रोज़ नापती हूँ अपनी सूनी आँखो से आकाश को
चाहा के भी कभी में मुक्त गगन में उड़ नही पाई

ना जाने कितने सपने देखे,कितने ही रिश्ते निभाए
हक़ीकत की धरती पर बिखर गये वो सब
मैं चाहा के भी उन रिश्तो की जकड़न तोड़ नही पाई

बहुत मुश्किल है अपने इन बंधनो से मुक्त होना
तुम करोगे तो यह साहस कहलायेगा
मैं करूंगी तो नारी शब्द अपमानित हो जाएगा!!

रंजना
9:14 पूर्वाह्न
Ashutosh ने कहा…

बासूती जी,

मेरे ब्लाग पे पधारने का बहुत बहुत धन्यवाद ।

सही कहा आपने । कल चक्र की निरंतरता बनी रहती है । समय घाव तो भर देता है , परंतु दाग के चिन्ह रह ही जाते है ।

पीड़ा हमारा सहज स्वाभाव नही है , जीवन से मिली विषमता एवं कथोराघत से यह ही सीख पाया हू बस । यात्रा जरी है और साथ ही सीखने - समझने का प्रयास भी ।

- आशुतोष
12:01 अपराह्न
Pramod Singh ने कहा…

बहुत सही.. प्रेरणाजोत बनी रहिए..
1:14 अपराह्न
Shastri JC Philip ने कहा…

काफी चिंतनीय विषय. चर्चा को आगे बढाईये -- शास्त्री जे सी फिलिप

मेरा स्वप्न: सन 2010 तक 50,000 हिन्दी चिट्ठाकार एवं,
2020 में 50 लाख, एवं 2025 मे एक करोड हिन्दी चिट्ठाकार!!
9:26 अपराह्न
रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

"यत्र नार्येस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता",
हमेशा से हीं नारी हमारे समाज में श्रद्धा की दृष्टि से देखी जाती रही है, आपकी प्रस्तुति वेहद -वेहद प्रशंसनीय है. शब्द और बिंब में ग़ज़ब का तालमेल. बहुत -बहुत वधाईयाँ .
1:50 अपराह्न
महावीर ने कहा…

बहुत ही सशक्त लेख है, इस चर्चा को जारी रखिए।
यह सांप्रदायिक चर्चा यहीं रुक जाए तो उचित होगा। व्यर्थ में ही मूल लेख से दूर जा रहे हैं। इस्लामी संस्कृति पर कीचड़ फेंक कर ४ पत्नियों की बात करेंगे, वे लोग द्रौपदी को फिर पांच पतियों के बीच लाकर खड़ा कर देंगे, राजाओं की बहु-विवाह रीत के उदाहरण देकर व्यर्थ का एक नया बखेड़ा खड़ा हो जाएगा। जिन चिन्तनशील मुद्दों पर चर्चा चल रही है, वह खटाई में पड़ जाएगी।
6:40 अपराह्न
हरिराम ने कहा…

गम्भीर चिन्तन विषयक लेख है आपका! साथ ही इन समस्याओं को सुलझाने हेतु कुछ सुझाव भी दें, तो सबको मार्गदर्शन मिलेगा। ललित जी की टिप्पणी हमें भी अच्छी नहीं लगी। उन्हें सम्माननीय महिलाओं पर व्यक्तिगत अनुमान व प्रश्न नहीं करने चाहिए, भले ही दूसरे पैराग्राफ में ऐतिहासिक कटुसत्य लिखा है। पर सद्भावना और संहति की दृष्टि से यह भड़काऊ हो सकता है। कृपया उक्त टिप्पणी को delete कर दीजिए।
11:43 पूर्वाह्न

अन्त में अपने ही एक अन्य लेख की ये पंक्तियाँ पढ़वाती हूँ.......

मुझे किसी पुरुष से कोई शिकायत नहीं है । केवल एक सुन्दर बराबरी के समाज की कल्पना भर करना चाहती हूँ , जहाँ स्त्रियाँ ना पूजी जाएँ ना दुत्कारी जाएँ । न हमें देवी बनना है न प्रतिमा, केवल व्यक्ति बनकर रहना है । क्या यह बहुत बड़ी माँग है ?

घुघूती बासूती

Tuesday, May 12, 2009

इतना क्यों कुढ़ती हूँ ?

माँ पूछती हैं कि इतना क्यों कुढ़ती हूँ स्त्री मुद्दों पर !


हाँ, मैं कुढ़ती हूँ। गलत होता देखती हूँ तो उसे अपना भाग्य मान स्वीकार नहीं करना चाहती। बहुत कुछ स्वीकार किया है स्त्री ने, अब और नहीं। गलत को गलत ही मानना होगा, चाहे गलत करने वाला स्त्री हो या पुरुष। अधिक नहीं कर सकते तो गलत को गलत तो कह ही सकते हैं हम सब। जब हम गलत को गलत कहना शुरू करेंगे तब ही शायद किसी दिन गलत होना रुक पाएगा। जानती हूँ कि मैं नारे नहीं लगाऊँगी, जुलूस नहीं निकालूँगी किन्तु अपने आस पास होते गलत पर 'ये तो होता ही है,' या 'हाँ हमारे समाज की यही रीति है' कहकर उसपर सही की मुहर तो नहीं लगाऊँगी।


भाग १
स्त्री का मूल निवास बदल गया।

बहुत वर्ष पहले पढ़ी थी यह समस्या। एक स्त्री नौकरी करती थी। उसे उसके संस्थान की तरफ से वर्ष में एक बार छुट्टियों के लिए यात्रा भत्ता मिलता था। उसके माता पिता रहते थे गोआ में और वह नौकरी करती थी उत्तर भारत में अपनी ससुराल से २० कि मी दूर। संस्थान का नियम था कि यात्रा भत्ता केवल स्थाई आवास(जहाँ के मूल निवासी हो) तक जाने के लिए दिया जाएगा। उनके अनुसार उसका घर विवाह के बाद उसका ससुराल था न कि मायका अतः केवल २० कि मी का दिया जाएगा न कि गोआ तक का।


इसे कौन न्याय कहेगा ? क्या विवाह के बाद गोआ उसका मूल निवास नहीं रहा? क्या उससे उसकी संस्कृति भी जबर्दस्ती छीन ली जाएगी ? उसके मन प्राण में बसा समुद्र, समुद्र तट व गोआ और वहाँ की भाषा व संस्कृति क्या अब उसकी नहीं रह गईं ?


मुझे भी प्रायः यह कहा जाता है कि अब तुम कुँमाऊनी नहीं हो, पति के प्रदेश व जाति की हो। यदि ऐसा होता तो क्यों कुँमाऊ शब्द सुन मेरा मन चहक उठता है? क्यों आज भी वहाँ की सुगन्ध मेरे नथुनों में भरी पड़ी है? जिस दिन मेरे अन्दर के कुँमाऊ को निकाल सको उस दिन मुझे बताना कि मैं कहाँ की हूँ।


अब तो खैर शायद यात्रा भत्ता नियम बदल गए हैं किन्तु यह नियम बनाने वाले ने क्या सोचकर बनाया होगा ? यह नियम हमारे समाज की मानसिकता दर्शाता है।


घुघूती बासूती

Saturday, April 04, 2009

स्त्रियाँ, कपड़े, स्वात घाटी, स्त्रियों के प्रति यूज एन्ड थ्रो की मानसिकता

राजतन्त्र में राजकुमार ग्वालानी जी लिखते हैं 'कम होने लगे कपड़े बढ़ने लगे लफड़े !'
यदि कोई चोर चोरी करने का कारण अपनी चोरी की आदत, डाकू डाका डालने का कारण अपनी डाका डालने की आदत, अपहरणकर्ता अपहरण का कारण अपनी अपनी आपराधिक मानसिकता को न देकर लोगों की सुन्दर कारों, उनके अपार धन को दे तो आप दोष किसे देंगे? संसार की कौन सी अदालत उन्हें अपने अपराध से बरी कर देगी ? समाज किसे दोषी कहेगा? अपराधी को या अपराध का न्यौता देती कारों व धन को ? जब किसी की जेब कटी तो आपने कभी किसी को कहते सुना है कि भाई जेब क्यों लिए घूम रहा था ? या जेब में पैसे रखे ही क्यों थे ? फिर बलात्कार व स्त्री के यौन उत्पीड़न में उसे ही दोषी करार देने की यह प्रवृत्ति कब और कैसे विकसित हुई ?

यहाँ तो स्थिति यह है कि अपराधी तो बेचारा अपराध करने को बाध्य किया गया। स्त्री तो अपराध करवाने की ताक पर ही बैठी थी। कुछ ऐसे जैसे उसके प्रति अपराध करके अपराधी ने उसे व समाज को धन्य किया। समाज की अन्य स्त्रियों को सिखलाया कि स्त्री हो ढकी छिपी रहो अन्यथा.......!

आज वैसे ही टी वी के दो दृष्य मन को अस्थिर किए हुए थे। एक था स्वात घाटी पर कोड़ों से पिटती उस लड़की का और दूसरा था दहेज के लिए पीटी गई कानपुर की उस युवती का। 'इन दोनों मामलों में भी कसूर अवश्य इन स्त्रियों का रहा होगा।' कसूर सदा कमजोर का होता है। मुझे बचपन की पढ़ी वह मेमने व भेड़िए की कहानी याद आती है। भेड़िया कुछ भली किस्म का भेड़िया रहा होगा। उसे मेमने को खाने के लिए कोई कारण मेमने को देना पड़ा। कारण कुछ यूँ था कि तुमने नदी से पानी पिया सो नदी के पानी को जूठा कर दिया। मेमना कहता है कि नहीं, नदी का बहाव तो मेरी तरफ है सो आपका पानी जूठा कैसे हो सकता है। भेड़िया कहता है कि फिर तुम्हारे पिता ने मेरा पानी जूठा किया था उसलिए मैं तुम्हें खाऊँगा। अब भेड़िया शक्तिशाली था फिर भी मेमने को खाने का कोई कारण तो दे रहा था, हमें उसकी इस महानता पर उसपर मुग्ध हो जाना चाहिए। इसी तरह पुरुष शक्तिशाली है फिर भी स्त्री के बलात्कार के कारण तो देता है, हमें भी उसकी महानता पर मुग्ध होना चाहिए। रायपुर की लड़कियों के साथ कुछ घटा तो हम जानते हैं कि दोषी कौन होगा या यह कहिए कौन होगी। दोषी होगी वह बिना बाँह की टी शर्ट जैसा कि हमारे मित्र अपने ब्लॉग में कह रहे हैं.....

'उन सभी लड़कों की नजरें उस कन्या को ऐसे देख रही थी मानो उसको कच्चा ही चबा जाएंगे। उन लड़कों की यह हरकत थी तो गलत पर इसका क्या किया जाए कि उन लड़कों को ऐसी हरकत करने के लिए उस कन्या के कपड़े ही उकसा रहे थे। हमारे कहने का मतलब यह है कि उस कन्या ने जींस के ऊपर जो सफेद टी-शर्ट पहन रखी थी, वह टी-शर्ट एक तो बिना अस्तीन के थी ऊपर से तुरा यह कि वह इतनी ज्यादा झीनी थी कि कन्या ने टी-शर्ट ने अंदर क्या पहना है, वह सब साफ-साफ नजर आ रहा था। अब ऐसे में वो लड़के भी क्या करते।'

भाई, हमें तो आपके बनियान रोज ही दिखते हैं, कभी कभी तो केवल बनियान में घूमते पुरुष भी दिखते हैं, कई बार तो बिना बनियान के भी। जो हम करते हैं वही वे लड़के भी कर सकते थे। हम या तो अनदेखा कर देते हैं या नजरें दूसरी तरफ कर लेते हैं। अब इतनी भी मजबूरी क्या कि लड़की के अन्तः वस्त्र दिखे नहीं कि आप फिसले और लड़की का पीछा करना आपकी मजबूरी हो गई !

आज वैसे ही मन में समाचार देखकर इतना अवसाद भर गया था कि जो लिखा वह यह था.......

'स्त्रियों को तो स्त्री भ्रूण हत्या करने वालों को धन्यवाद कहना चाहिए।

जब आप स्वात घाटी पर पिटती किसी लड़की का विडीओ देखती हैं, उसका बुर्का उठाकर , कुर्ता उठाकर (ताकि कोड़ों की मार अधिक पड़े) उसे पीटते धार्मिक लोगों को देखती हैं, जब कानपुर की किसी बहू का ससुराल वालों द्वारा बिगाड़ा चेहरा देखती हैं, उसका सूजा नीला पड़ा चेहरा, न खुलती आँखें देखती हैं और ऐसे ही न जाने कितने हृदय विदारक समाचार देखती सुनती हैं तब क्या आपको नहीं लगता कि स्त्री भ्रूण हत्या करने वाले अधिक कोमल हृदय हैं ? मेरा सिर तो उनके सम्मान में झुक जाता है। मन से केवल यही शब्द निकलते हैं आभार, आभार, आभार ! न रहेगा बांस न बजेगा बाँसुरी की तर्ज पर जब स्त्रियाँ रहेंगी ही नहीं तो उनपर अत्याचार ही कैसे होगा ?

पुरुषों का क्या होगा यह सोचना पुरुषों को ही होगा। वैसे भी वे ही तो सदा से संसार के भाग्य नियंता, धर्म नियंता, वैज्ञानिक आदि आदि रहे हैं। शायद वे इसका भी इलाज ढूँढ ही लेंगे। जब वे धर्म बना सकते हैं, स्त्री का समाज में स्थान नियत कर सकते हैं, संसार को बनाने व मिटाने के साधन निर्माण कर सकते हैं तो वे स्त्रियों का विकल्प भी ढूँढ ही लेंगे। उन्हें विकल्प ढूँढने दीजिए। हमारी खैर तो इसी में है कि हम इस संसार से विदा ले लें।

युग बीत गए हैं कि हम उनकी व्यक्तिगत वैले(valet)सम्पत्ति,बनी रही हैं। उनकी, उनके धर्म,जाति,नस्ल का विस्तार करने का साधन बनी रही हैं। जिस व्यवस्था में हमारा कोई स्थान नहीं है, जिससे हमें कुछ लेना देना नहीं है, उस व्यवस्था में कभी कभार स्वामी की स्वामीभक्ति के रूप में मिले कुछ अधिकारों का अपनी ही स्त्री जाति पर दुरुपयोग करके हमें क्या मिलेगा?'

वैसे भी जब स्त्रियाँ नहीं रहेंगी तो किन्हीं लड़कों को किसी सफेद टी शर्ट के अन्दर से क्या दिख रहा है परेशान कर उन्हें उस लड़की का पीछा करने को मजबूर भी नहीं होना पड़ेगा।

अब जरा देखते हैं कि स्त्रियों के कपड़े बलात्कार के लिए कहाँ तक दोषी होते हैं।

मेरे सामने एक खबर है १२ फरवरी के टाइम्स औफ इन्डिया की। संगीता नामक एक लड़की का शव उसके बापूनगर, अहमदाबाद के स्कूल के बाथरूम से बरामद किया गया। इस लड़की का बलात्कार हुआ था। ‘कारण कपड़े ही रहे होंगे। ये सात साल की लड़कियाँ बेहद भड़काऊ कपड़े पहनकर स्कूल जाने लगी हैं। अब पुरुष क्या करे !’

दूसरी खबर १३ मार्च के टाइम्स औफ इन्डिया की है। इस खबर के अनुसार एक चचेरे चाचा ने अपनी भतीजी का बलात्कार कर उसका सिर पत्थरों से फोड़कर उसकी हत्या कर दी। हत्या से पहले व बलात्कार के बाद उसने उसके गुप्तांगों को चाकू से काट भी डाला। फिर उसने उसके शरीर को गाढ़ भी दिया। यहाँ हो सकता है कि घटनाएँ इसी क्रम में न हुई हों।

‘कारण ? कारण तो वही सर्वविदित कपड़े ही रहा होगा। बानास्खांता जिले की ये गाँव की सात साल की लड़कियाँ बहुत ही भड़काऊ वस्त्र पहनने लगी हैं। इतने भड़काऊ कि चाचा तक का निष्कलंक चरित्र तक डगमगा गया ! इतना डगमगाया कि उसे भतीजी को एकांत में ले जाना पड़ा और जब उसने विरोध किया तो उसे यह सब करना पड़ा।‘ हाँ उसके इस कृत्य में छह और पुरुषों ने उसका साथ दिया था। मुझे तो आश्चर्य है कि उसके गाँव के अन्य पुरुषों में कितना संयम रहा होगा जो उसके इन कपड़ों के बावजूद उन्होंने अब तक उसका कुछ नहीं बिगाड़ा था।

कपड़ों वाली थ्योरी को सिद्ध करती एक और खबर मैंने कुछ दिन पहले पढ़ी थी। मुम्बई में सड़क के किनारे रहने वाली एक लड़की अपनी माँ की बगल में सोई हुई थी। रात को जब माँ की नींद टूटी तो वह गायब थी। माँ ने उसे ढूँढना शुरू किया। रात में तो वह नहीं मिली किन्तु सुबह की रौशनी में लोगों को एक नाली में फेंकी गई वह मिली। उसका भी बलात्कार हुआ था। ‘कारण कपड़े ही रहे होंगे। दो साल की वह लड़की ठीक कपड़े नहीं पहने होगी।‘ सो उसका उपयोग कर उसे फेंक दिया गया। यूज एन्ड थ्रो का इससे बढ़िया उदाहरण कहीं देखने को नहीं मिलेगा।

वैसे स्त्रियों के मामले में यूज एन्ड थ्रो की मानसिकता नई नहीं है। तभी तो पत्नियों के हत्यारों की भी शादी हो जाती है। माता पिता तो अपनी दूसरी बेटी का विवाह तक उसी के साथ कर देते हैं।

घुघूती बासूती

पुनश्चः

कल रात लिखा यह लेख नेट की समस्या के कारण आज पोस्ट कर पा रही हूँ।
नोटः
कृपया इसी विषय पर महेन जी द्वारा लिखित फैशन बलात्कार और कुंठा १ और फैशन बलात्कार और कुंठा २ लेख भी पढ़िए।

घुघूती बासूती

घुघूती बासूती

Saturday, February 14, 2009

हम कहाँ जा रहे हैं ?

हम कहाँ जा रहे हैं ?
जिंद में एक लड़की को बाल पकड़कर गोल गोल घुमाया गया। चौकी इनचार्ज केवल संस्पेंड। मुझे अपनी बेटी से कहना पड़ता था कि बेटा जब ट्रेन यात्रा करती हो तो साथ में शादी का प्रमाणपत्र लेकर जाया करो। यह है मेरा भारत महान! सन ७७ में जब मैं ऐसा कोई सबूत लेकर नहीं चलती थी तो आज अपनी बेटी को यह सलाह देती हूँ। क्यों, क्योंकि हम बढ़ रहे हैं तेजी से १४वीं शताब्दी की ओर! संसार, देखते जाओ! भारत बढ़ रहा है तेजी से सबको पीछे छोड़ता हुआ।

मुझे याद है कि हमारे समय में भी हम लड़कियाँ अपने सहपाठियों के घर जाती थीं। दरवाजा खुला होता था। शायद तब संस्कृति के ठेकेदार पड़ोसी नहीं थे। अतः कोई बाहर से दरवाजा बन्द नहीं करता था। अन्यथा यह हम में से किसी के साथ भी हो सकता था।

मैं नहीं जानती कि वह लड़की अपने सहपाठी के साथ क्या आपराधिक कृत्य कर रही थी। परन्तु हत्यारे को भी, जब वह हमारे जीवन पर खतरा ना हो, हम पीट नहीं सकते, केवल कानून के हवाले कर सकते हैं और आशा कर सकते हैं कि वह उसे सजा दे तो क्या उस लड़की का अपराध हत्या से भी बड़ा था? हो सकता है कि बहुत से लोगों को लड़के लड़कियाँ का आपस में बात करना भी गलत लगता हो। ऐसे में उन लोगों के पास पूरा अधिकार है कि वे स्वयं को विपरीत लिंग से बचाकर रखें। यदि कोई उनपर दबाव डालेगा कि वे बातचीत करें, दोस्ती करें तो वह भी गलत होगा।

आजतक हम स्कूली बच्चों को नैतिक ज्ञान , मोरल साइंस पढ़ाते थे, सेक्स एजुकेशन की बात करते थे। अब समय आ गया है कि बच्चों को संविधान द्वारा दिए गए अन्य लोगों के अधिकारों के बारे में पढ़ाएँ। जैसे एम बी ए आदि में केस स्टडीज़ पढ़ाई जाती हैं, उनपर लेख लिखने को कहा जाता है उसी तरह से अन्य लोगों के व्यक्तिगत अधिकारों का हनन करने वाले लोगों को क्या सजा दी जाती है, पढ़ाया जाए, उन्हें काल्पनिक या सत्य मामलों पर क्या किया जाना चाहिए, कैसे और क्या न्याय दिया जाना चाहिए आदि पर विचार करने को प्रेरित किया जाना चाहिए।

मानवाधिकार हनन, किसी की निजी स्वतन्त्रता का हनन हत्या से भी बड़ा अपराध है। हत्यारा किसी एक या दो का जीवन समाप्त करता है परन्तु निजी स्वतन्त्रता का हनन करने वाले तो जीवन को जीने योग्य ही नहीं रहने देते। जब निजी अधिकार ही नहीं रहेंगे तो जीवन का हम करेंगे भी क्या सिवाय एक बोझ की तरह ढोने के ? जी तो तिलचच्टे भी लेते हैं। पशुओं में ही शक्तिशाली का पूरे समूह पर शासन होता है। क्या यही स्थिति हम मनुष्यों में लाना चाहते हैं? स्त्रियों के नौकरी करने, बिन ब्याही माँ बनने से तो अपने परिवारों, समाज के नष्ट होने का भय हमें हो रहा है, परन्तु हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि यदि निजी अधिकार रहे तो हम अपने बच्चों को बचपन में अपने जीवन मूल्य सिखा सकते हैं और यदि सफल रहे तो इन मूल्यों को बचाने की आशा कर सकते हैं परन्तु यदि समाज में ऐसा कट्टरपन आ गया तो वह समय दूर नहीं जब अपने मूल्य सिखाने का कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा क्योंकि हमें, हमारे बच्चों को इन कट्टरपंथियों के मूल्यों के अनुसार खाना, पीना, रहना, पढ़ना या न पढ़ना, जीना होगा। मुझे नहीं लगता की ऐसे समाज में नई पीढ़ी को लाना एक खुशी मनाने का अवसर रह जाएगा। वह केवल और केवल एक अन्य मानव को पशु से भी बदतर जीवन जीने को मजबूर करना ही होगा। हमारे बच्चे दुखी होंगे कि वे पैदा ही क्यों हुए, वह भी तब जब उनमें कुछ सोचने की शक्ति रह जाएगी। हो सकता है वे भी कट्टरपंथियों की तरह हमारे ही सिर पर डंडा लेकर खड़े हो जाएँ, हमारी शिकायत हमारे उन आकाओं से करें कि हम घर में उनके आदेशानुसार नहीं जी रहे। जरा कल्पना कीजिए। कल्पना करने में कोई हानि नहीं है। यदि मैं आज से छह वर्ष पहले ही आने वाले समय की कल्पना कर बेटी से विवाह का प्रमाण पत्र लेकर चलने को कहती थी, इसलिए नहीं कि मुझे उसके किसी पुरुष के साथ चलने पर आपत्ति थी अपितु इसलिए कि मैं आने वाले खतरे के कदमों की आहट सुन पा रही थी। बेहतर होगा कि हम अपने पिता, भाई, चाचा, मामा आदि से अपने खून के रिश्ते का प्रमाणपत्र भी फोटो सहित लेकर घूमें। हो सके तो डी एन ए टेस्टिंग की रिपोर्ट व माता पिता के विवाह का प्रमाणपत्र भी साथ लेकर चलें। अन्यथा ऐसा ना हो कि उज्जैन या किसी भी अन्य शहर की तरह हमारे शहर के लोग भी हमें भाई के साथ कहीं जाने पर पीट डालें, चोटी से पकड़कर घुमा डालें। इससे पहले कि हममें से किसी को अश्विनी बनकर अपने साथ हुए घोर अन्याय की पीड़ा से छुटकारा पाने को गले में फाँसी का फंदा डालना पड़े या तो ऐसे अन्यायों के विरुद्ध हमें बोलना होगा या फिर प्रमाणपत्र आदि से लैस होकर सड़कों पर चलना होगा या किसी के घर जाना होगा। बेहतर व अधिक सुरक्षित तो यह होगा कि घर से बाहर ही ना जाएँ, पुत्रियों को जन्म ही न दें, यदि दुर्भाग्य से दे दें तो उन्हें घर में ही रखें।

जिन्हें यह चिन्ता हो रही है कि आँकड़े बताते हैं कि स्त्रियों को स्वतन्त्रता मिलने के बाद अमेरिका में विवाह के बाहर बच्चों के जन्म में वृद्धि हुई है वे साऊदी अरब या ऐसे ही किसी देश के आँकड़ों पर भी नजर डालें। वहाँ यह संख्या शून्य है। फिर हम वहाँ के कानून यहाँ लागू क्यों नहीं कर देते? वहाँ अपराध भी बहुत कम है। वहाँ यह नहीं होता कि कोई स्त्री तो राष्ट्रपति बन जाती है, कोई प्रधानमंत्री, कोई मुख्यमंत्री तो कोई किसी अन्य धर्म के पुरुष के साथ बात करने, यात्रा करने या प्रेम करने के अपराध में बस से घसीटी जाती हो, कोई किसी लड़के मित्र के घर में बाहर से बन्द कर दी जाती हो, फिर पुलिस द्वारा चोटी से पकड़कर चकरघन्नी की तरह घुमाई जाती हो। वहाँ राजकुमारी को भी उन अपराधों के लिए मृत्युदंड दिया जाता है जिनके लिए एक आम स्त्री को। वहाँ कोई लड़की राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री , मुख्यमंत्री बनने के सवप्न सजाने का दुस्साहस नहीं करती होगी। यहाँ हम पहले अपनी बेटियों को समानता, आकाश छूने के स्वप्न दिखाते हैं और यदि वह हमारे या समाज के अपेक्षित नहीं चलती तो या तो उनकी हत्या हम स्वयं अपने कथित सम्मान की रक्षा के लिए कर देते हें या हमारे संस्कृति के रक्षक उन्हें प्रताड़ित कर मृत्यु को गले लगाने को बाध्य कर देते हैं। ये घटनाएं अपने आप में अपवाद हो सकती हैं, परन्तु यदि नहीं रोकी गईं तो ये आम हो जाएँगी और तब हमें अपनी बेटियों की भ्रूण हत्या करना एक बेहतर और दयालु समाधान लगेगा।

तब तक,
चलिए हम पिंक चड्ढी वालों के विरोध के तरीके का विरोध करें। क्योंकि उनका तरीका संस्कृति के रक्षकों से अधिक खतरनाक है। हम यह ना देखें कि वे अपने वस्त्र उतारकर देने को नहीं कह रहीं, बाजार से नई या फिर अपनी अलमारी से पुरानी भेजने को कह रही हैं।(अब यदि उस ही ब्लॉग में कोई कुछ अधिक कह रहा है तो क्या किया जा सकता है? यदि वे ऐसी टिप्पणियों को नहीं छापती तो कहा जाएगा कि विरोध के स्वर वे सह नहीं सकतीं।) हमें बाध्य भी नहीं कर रहीं ऐसा करने को। वे जो कर रही हैं उसका अर्थ हम नहीं समझेंगे। वे इसे क्यों कर रही हैं यह समझने में सोचना पड़ता है, उन्हें समझना पड़ता है, उनके स्थान पर स्वयं को रखकर देखना पड़ता है। यह सोचना पड़ता है कि यदि मैं युवा होती, स्त्री होती तो ये सब परिस्थितियाँ मुझे कैसी लगतीं। वे केवल और केवल एक काम कर रही हैं, इस हास्यास्पद तरीके से कट्टरपंथियों को हास्यास्पद बना रही हैं। हाँ, शायद उन्होंने जानबूझकर इसे ऐसा बनाया ताकि लोगों का ध्यान आकर्शित कर सकें। (बहुत से लोगों ने कट्टरता के विरोध में लिखा, शायद शालीनता से ही लिखा था, मैंने भी लिखा था, परन्तु उसका कितना प्रभाव पड़ा। यह तरीका जैसा भी था ना हिंसक था ना जबर्दस्ती थी। हमें सही लगे तो ठीक न लगे तो ठीक। ) परन्तु नहीं, वे अधिक खतरनाक हैं। आओ, अपनी बेटियों की उनसे रक्षा करें, न कि उनसे जो उन्हें किसी भी क्षण पकड़कर पीट सकते हैं, चोटी से पकड़कर घुमा सकते हैं। वह तो एक बहुत ही मामूली सा अपराध होगा। पब में जाना आवश्यक तो नहीं है, किसी विशेषकर अन्य जाति धर्म के पुरुष से प्रेम करना आवश्यक तो नहीं है, किसी सहपाठी से पुस्तक लेने (या हो सकता है कि वह बतियाने गई हो या प्रेम की पींग चढ़ाने)आवश्यक तो नहीं है। शराब पीने को कोई भी बहुत अच्छा तो नहीं कहेगा, बहुत सी अन्य वस्तुएँ, काम, व्यवहार, यहाँ तक कि परम्पराएँ भी गलत होती हैं। हमें ना भी लगें तो किसी अन्य को लग सकती हैं। हमें जो गलत लगता है वह अपने बच्चों को बाल्यावस्था में ठीक से समझा सकते हैं। अपने मूल्य उन्हें सिखा सकते हैं। जब वे वयस्क हो जाएँगे तो वे इतने समझदार हो चुके होंगे कि अपने निर्णय स्वयं ले सकेंगे। या हम यह मानकर चल रहे हैं कि भारतीय युवा कभी वयस्क माने जाने लायक बुद्धि विकसित नहीं कर पाते? देखते जाइए कल कोई बहुत से अन्य कामों को गलत करार कर देगा। किसी को लड़कियों का लड़कों के साथ चाय पीना भी गलत लग सकता है किसी को लड़कियों का लड़कियों के साथ या अकेले भी चाय पीना गलत लग सकता है। शायद बोतल बंद पानी पीना गलत लग सकता है। शायद उनका पैदा होना ही गलत लग सकता है। हम कहाँ सीमा रेखा खींचेंगे और हम होते कौन हैं किसी का जीवन नियन्त्रित करने वाले? देखते जाइए कल आपको अपने टखने भी दिखाने होंगे जबर्दस्ती दिखाने होंगे।

कोई कह रहा है प्रेम का प्रदर्शन ना करो। घर के अंदर करो। सही है परन्तु घर के अंदर किससे प्रेम करोगे? घर में तो आपके परिवार के लोग रहते हैं,अन्य परिवार, गोत्र (स्त्री पुरुष का प्रेम और विवाह अपने परिवार,गोत्र वाले से तो नहीं हो सकता हमारे समाज व कानून के अनुसार!) के लोग नहीं और यदि किसी अन्य के घर पुस्तक लेने भी जाओगी तो बाहर से दरवाजा बन्द कर दिया जाता है। पार्क में साथ बैठो तो मजनूँ पीटो पुलिस या कोई भी दल पीट देगा, रैस्टॉरैन्ट या पब में बैठने पर भी पिट सकते हो। तब साफ यह क्यों नहीं कहा जाता कि प्रेम मत करो, करो परन्तु उससे जिससे आपके अभिवावक आपका विवाह करें। तो सीधे सीधे यह कहा जा सकता है कि भारत में व्यक्ति को अपनी पसन्द से विवाह करने की अनुमति भले ही हो परन्तु विपरीत लिंग के लोगों के साथ घूमने बात करने की नहीं है। विवाह करने का निर्णय कोई एक दिन में तो लेगा नहीं परन्तु यदि कोई युगल साथ दिखा तो भले मानुष पकड़कर उनका विवाह करवा देंगे। माँग में सिन्दूर भरवा देंगे। तब क्या होगा जब स्त्री सिन्दूर या मंगलसूत्र में विश्वास न करती हो? या उसको विश्वास करने या न करने का अधिकार ही नहीं है? या फिर युवा यदि मिलें तो विक्टोरियन यूरोप की तरह किसी chaparone की तरह घर की किसी वृद्धा को साथ लेकर चलें?

क्या इन युवतियों को इस बात से कोई अन्तर पड़ा होगा कि उन्हें आतंकित करने वाला उनके धर्म के हैं, उनके देशवासी हैं,उनकी संस्कृति के रक्षक हैं? यदि कोई विदेशी या विदेशी संस्कृति वाला यह करता तो क्या अधिक कष्ट होता? शायद कम होता। यदि एक धर्म इतना कट्टरवादी होता जा रहा है तो दूसरा धर्म क्यों पीछे रहे? होड़ लगेगी क्या कि कौन कितना कट्टरवादी हो सकता है, कितना अन्य के जीवन में हस्तक्षेप कर सकता है? जिस संस्कृति की रक्षा की बात हम करते हैं, उस संस्कृति की विशेषता ही उनका उदार होना रहा था। या हम उस संस्कृति को अपना कहना चाह रहे हैं जो विदेशी आक्रमणों के बाद किन्हीं मजबूरियों में अपनाई गईं? हमारी संस्कृति में तो जिस मर्जी भगवान को पूजो, या ना पूजो, भगवान के अस्तित्व को न मानने वाले भी थे। शास्त्रार्थ होते थे। परन्तु वह काम कठिन है जोर जबर्दस्ती सरल व टिकाऊ व सस्ता उपाय है।

यह तर्क दिया जा रहा है कि आज तक तो तुम नहीं बोलीं,जब स्त्रियों को जलाया जाता है, जब कश्मीर में लड़कियों को बुरका पहनने को कहा जाता है,जब दहेज की माँग होती है, जब फतवे दिए जाते हैं, तो आज क्यों बोल रही हो? कल नहीं बोले तो क्या आज अपना बोलने का अधिकार खो दिया? वैसे सही आगाह कर रहे हैं, क्योंकि यदि आज भी नहीं बोले तो भविष्य में बोलने का अधिकार ही छीना जा चुका होगा। इस तर्क के अनुसार तो जब हमने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली तो फिर अंग्रेजों की क्यों नहीं? अग्रेजों को भगाना भी गलत रहा होगा, उनके हमें गुलाम बनाने के अधिकार का हनन था। भगाना था तो पहले मुगलों को भगाते, भूतकाल में जाकर भगाते। सोचने की बात है कि संसार में बहुत कुछ गलत होता है, हम सहमत नहीं होते,हम प्रत्येक गलत को गलत मानते हैं परन्तु जब हमारे अपने अधिकारों का हनन होता है या हमारे जीने के तरीके पर आक्रमण होता है तो हम अधिक खुल कर बोलते हैं। कोई किसी अन्य के ब्लॉग पर जाकर गाली देता है, हम उसे गलत मानते हैं, हो सकता है लिख भी दें कि यह गलत है परन्तु जब कोई हमारे ब्लॉग पर आकर गाली देता है तो हम उसका अधिक मुखर होकर विरोध करते हूँ,अधिक आहत होते हैं। यह स्वाभाविक है। क्या जब अध्यापक अपनी माँगों के लिए जलूस निकालते हैं,धरना देते हैं तो बैंक कर्मचारी भी धरने पर आ बैठते हैं? तो क्या जब वे अपनी किसी माँग के लिए धरना दें तो हम कहेंगे कि जब अध्यापकों के अधिकारों की लड़ाई हो रही थी तब आप चुप थे सो अब भी चुप बैठिए। अब क्यों नारे लगा रहे हो?

हम सहमत होएँ असहमत होएँ यह हमारा अपना अधिकार है। सब नया सही नहीं, सब पुराना भी सही नहीं। हमें अपने मूल्य स्वयं बनाने होंगे। सबका दृष्टिकोण अलग होता है। यही तो मानव व मानव में अन्तर है। प्रत्येक बरगद के पेड़ की आवश्यकता एक होती है,प्रत्येक हिरण की आवश्यकता एक होती है। उनमें दृष्टिकोण नामक वस्तु शायद ही पाई जाती है। परन्तु मानव के पास अपना दृष्टिकोण होता है। हमें एक दूसरे के दृष्टिकोण का आदर करना व उन्हें उन्हें मानने के अधिकार का आदर करना होगा ही। अन्यथा हम तो रहेंगे परन्तु हमारा दृष्टिकोण रखने का अधिकार नहीं। और वह दिन ऐसा होगा कि हम उसकी यदि कल्पना करें तो हमारा हृदय दहल जाएगा। हमारी अपनी वंश बेल को बनाए रखने की प्रकृति प्रदत्त इच्छा भी सिहर जाएगी। अपनी संतानों को ऐसा जीवन देने से पहले हम बार बार सोचेंगे। मुझसे असहमत होइए, आपका स्वागत है, परन्तु जरा उस भयंकर संसार की कल्पना भी कीजिए। बस एक बार फिर अपने पिछले लेख की तरह यहाँ भी लिखूँगी कि जब कट्टरवाद आएगा तो केवल लड़कियों को, स्त्रियों को, युवाओं को ही अपने चंगुल में नहीं लेगा एक दिन अच्छे बड़े बुजुर्गों को भी अपनी चपेट में ले लेगा। सोचिए हम कहाँ जा रहे हैं? हाँ लगे हाथ अपने बच्चों को कुछ जीवन मूल्य भी सिखा दें।

घुघूती बासती

Monday, December 29, 2008

गाली विमर्श: कुछ यादगार बातें

गाली विमर्श से मुझे इस विषय से सम्बन्धित कुछ यादगार बातें याद आ रही हैं और कुछ प्रतिदिन की प्रतिक्रियाएँ।


पहले प्रतिदिन वालीः
पति किसी मनुष्य या वस्तु को साला कहता है। पत्नी कहती है , 'ओह, तो यह भी मेरा भाई है। क्या उसे साला कहने के पीछे भावना उसे मेरा भाई घोषित करने की है या उसकी बहन को अपनी पत्नी ?' स्वाभाविक है भावना दूसरी ही रहती है। इसके बाद वह अपने तरकश में से अगला तीर निकालता है जिसके अन्तर्गत वह जिसे गाली दे रहा है उसका सम्बन्ध उसकी बहन से स्थापित करता है। ठीक इससे पहले वह उसे अपनी पत्नी का भाई घोषित कर चुका होता है। अब पत्नी पूछती है कि 'क्या तुम मेरे और उसके बीच सम्बन्ध स्थापित कर रहे हो या सम्बन्ध हैं यह तुम्हारा आशय है?' पति पत्नी को घूरता है, उसकी मंद बुद्धि व गालियों के क्षेत्र में उसके अज्ञान पर मुस्कराता है। परन्तु वही पत्नी जब गालियाँ देकर अपने गालियों के क्षेत्र में ज्ञान की वृद्धि का सबूत देती है तो पति नाराज, दुखी, निराश हो जाता है।


वैसे सिवाय नपुंसक क्रोध या सही समय पर सही बेहतर शब्द न मिल पाने के या कल्पना के अभाव के गाली देने के और क्या कारण हो सकते हैं? मुझे नहीं लगता कि लोग उसका अर्थ सोचकर गाली देते हैं और यह तो और भी भयानक स्थिति है। इसका अर्थ है कि आप जो भी कह रहे हैं वह बिना सोचे समझे कह रहे हैं। तर्क से उसे तो समझाया जा सकता है या बहस की जा सकती है जो तार्किक बात कर रहा हो, किन्तु जो बिना सोचे, साँस लेने की क्रिया के समान, गाली दे रहा हो उससे क्या तर्क किया जाए?


अब यादगार बातें:
मुझे एक नवयुवती की कही बात याद आ रही है, ' चाची गाली देकर तो देखो । देखो , कैसी केथार्सिस की फीलिंग होती है।' केथार्सिस याने भाव-विरेचन (?) याने कुछ वैसी संतुष्टि जो मवाद भरे फोड़े के फूटने पर होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि वह सही कह रही थी। यह गाली भी गुस्से का केथार्सिस ही होता होगा। देखा जाए तो स्त्रियों से अधिक इसकी आवश्यकता किसे हो सकती है? सदियों से दबाई,छिपाई हमारी इच्छाएँ,भावनाएँ,हमारा गुस्सा सच में केथार्सिस माँगता ही माँगता है। फिर भी क्या हम इसके लिए कोई सकारात्मक रास्ता नहीं ढूँढ सकते या कम से कम क्रोध में वह तो कहें जो हम कहना चाह रहे हैं न कि किसी के किसी से शारिरिक सम्बन्ध स्थापित करें,जो हमारा उद्देश्य बिल्कुल भी नहीं है। क्या यह कहना अधिक सही नहीं होगा कि 'मैं तुम्हें पीटना चाहता/चाहती हूँ।' अधिक रसमय बनाना हो तो मार मार कर भुर्ता तो है ही। या 'मैं तुम्हारा सिर फोड़ देना चाहता/चाहती हूँ।' या 'मैं तुम्हारी हत्या कर देना चाहता/ चाहती हूँ।'


गालियाँ कुछ कुछ उच्चारण के लहजे सी होती हैं। जिस समाज के बीच आप रहते हैं उस समाज के उच्चारण की तरह इसका रंग भी आप पर चढ़ जाता है। मुझे याद है बचपन में हमारी बदली ऐसी जगह हुई जहाँ गालियों के बिना पुरुषों,लड़कों का बात करना लगभग निषेध सा दिखता था। मैंने..पान खाया। ..पान तो ... बेकार था। हैं बे ..., क्यों बे ..., कल तू... क्यों नहीं आया ? अब जैसा कि समाज में होता आया है,(रूप देखकर तो ‌‌ॠषियों का मन भी डोलने लगता है,ॠषि पत्नियों का नहीं, 'boys will be boys' की तर्ज पर ) यह सब सीखकर भाई ने भी गाली दी। माँ गाली सुनकर सन्न रह गईं। कुछ उपाय तो करना ही था। सो उन्होंने कहा कि उन्हें अपने बेटे को दिए ऐसे बेकार संस्कारों के लिए पश्चात्ताप करना होगा। उन्होंने जाकर सिर से स्नान किया। फिर सारा दिन भूखे रहकर रामायण का पाठ किया। वह दृष्य अविस्मरणीय है,माँ के लम्बे बाल जो खुले होने पर धरती पर भी फैले हुए थे,सामने रखी रामायण और पश्चात्ताप में जलता भाई! यह उपाय रामबाण साबित हुआ। शायद ही कोई पुत्र हो जो गालियों का आनन्द उठाने के लिए माँ को भूखा रामायण का पाठ करवाए। अभी तक यह स्पष्ट नहीं हुआ कि पिताजी की क्या भूमिका रही थी।


वैसे मैं उस माँ का अनुसरण करने को नहीं कह रही,परन्तु यदि हम चाहते हैं कि हमारी पुत्रियाँ ये शब्द ना उपयोग करें तो हमें स्वयं चाहे हम स्त्री हों या पुरुष इन शब्दों से परहेज करना होगा। अन्यथा हमें ये शब्द दिन रात सुनने ही होंगे,और न केवल पुरुष के मुँह से स्त्री के मुँह से भी। अब निर्णय आपका अपना है।


साबुन से मुँह धोना भी एक इलाज है। स्त्रियों को समझाने वाले कितने पुरुष अपनी बुरी आदत को छोड़ने के लिए इस उपाय का उपयोग करेंगे?


घुघूती बासूती

Tuesday, December 23, 2008

नामो के नाम एक स्त्री की चिट्ठी

आज ज्ञानसिंधु जी द्वारा लिखित 'छात्राओं के लिए प्रश्नपत्र' पढ़कर बहुत समय पहले लिखा अपना एक लेख याद आ गया । आज उसे यहाँ दे रही हूँ।


नामो, बधाई हो, सुना है, तुम्हारा विवाह हो रहा है ।


एक स्त्री होने के नाते मैं तुम्हें कुछ बातें बताना चाहती हूँ । पापा जो चुपके से तुम्हारे तकिये के नीचे चिट्ठी रख गए, वह मैंने भी पढ़ी । लगभग हर पिता मौखिक या लिखित में अपनी पुत्री को ये बातें बताता या बतवाता है । ठीक भी है़, नए घर जा रही बिटिया के लिए मन में डर तो रहता ही है । उस चिट्ठी को ध्यान से पढ़ना, बहुत सी काम की बातें उसमें हैं । परन्तु बहुत सी और भी काम की बातें छोड़ दी गईं हैं । तुम्हारे पापा अन्य पापाओं की तरह आशावादी हैं । सोचते हैं कि यदि तुम अच्छा व्यवहार करोगी तो सब अच्छा ही होगा । मैं भी यही चाहूँगी । परन्तु हर बार ऐसा होता नहीं। सो अच्छा व्यवहार तो करना ही ,परन्तु यदि तुम्हारे पापा किसी फैक्ट्री में या किसी महत्वपूर्ण पद पर काम करते हों तो उन्हें शायद यह भी पता हो कि कुछ भी काम करने से पहले जब योजना बनाई जाती है तो योजना १ के साथ योजना २ और यदि काम अधिक महत्वपूर्ण हो तो योजना ३ भी बनाई जातीं हैं। प्रचलित भाषा में उन्हें प्लैन बी और सी कहा जाता है ।


सो नामो, प्लैन ए तो वह है जो तुम्हारे पापा तुम्हें बता रहे हैं । अब यदि जैसा तुम, तुम्हारे पापा व हम सब चाह रहे हैं वैसा न हो पाए तो प्लैन बी भी तैयार रहना चाहिए । प्लैन ए के अन्तर्गत यह मानकर चला जा रहा है कि तुम हर काम करने से पहले आज्ञा माँगोगी । यदि नहीं मिली तो ? चलो घूमने जाने की आज्ञा माँगोगी और नहीं मिली तो चल जाएगा । यदि बुखार आया और डॉक्टर के पास जाने की आज्ञा नहीं मिली तो ? यदि अपने मित्र व सखी से मिलना हो और पति या सास ससुर ने आज्ञा नहीं दी तो ? एक बार, दो बार तो मिले बिन रह जाओगी, परन्तु अनन्त काल तक ? एक आध बुखार तो मायके से साथ लाई गोलियों के सहारे झेल जाओगी, परन्तु अनन्त काल तक ? तो नामो, ऐसे में ' मैं डॉक्टर के पास जा रही हूँ, या मित्रों को घर बुला रही हूँ या उनसे मिलने जा रही हूँ ' यह सूचना दे देना ।
आशा है, तुम्हें कोई कष्ट नहीं देगा़, पीड़ा नहीं देगा । परन्तु यदि दी तो ? ऐसे में नामो, पहले जानने का यत्न करना कि तुम्हारे साथ ऐसा क्यों हो रहा है । हो सके तो बातों से हल निकालना । यदि हल न निकले तो कोशिश करना कि तुममें इतना आत्मविश्वास हो कि वे तुम्हें सताने की हिम्मत न करें । परन्तु बहुत से लोग परपीड़ा में ही सुख पाते हैं, यदि वे ऐसे लोग हों तो वहाँ रहने में कोई तुक नहीं होगी । ऐसे में रोना, पिटना यानि स्वयं को शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित मत होने देना । पहले से ही माता पिता से बात करके रखना कि तुम्हें दहेज नहीं चाहिए बल्कि अपने घर यानी जिसे लोग मायका कहते हैं, वहाँ तब तक रहने का अधिकार चाहिए होगा, जब तक तुम अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जातीं । नामो, जिस शहर तुम ब्याहकर जा रही हो, उस शहर में किसी ऐसे व्यक्ति का पता अपने साथ जरूर रखना जिसे समय असमय सहायता के लिए बुला सको । चाहे कुछ भी हो जाए, न किसी को तुम्हें मानसिक या शारीरिक क्षति पहुँचाने देना न स्वयं अपने को क्षति पहुँचाना । विवाह जीवन का एक बहुत महत्वपूर्ण भाग है परन्तु केवल वह ही जीवन की परिभाषा नहीं है । विवाह असफल होने पर भी जिया जाता है और जीवन को प्यार करके आत्मसम्मान के साथ जिया जाता है ।


सबको प्यार देना, सबका सम्मान करना परन्तु उन सबसे पहले स्वयं को प्यार करना, स्वयं को सम्मान देना । आत्मसम्मान की कीमत पर पाया गया विवाहित जीवन कभी सुखी नहीं हो पाता । देर सबेर यह याद आ ही जाता है कि तुम भी मनुष्य हो और वह मनुष्य ही क्या जिसमें आत्मसम्मान न हो ?
मेरी सीख अपने नाम की तरह तुम्हें उल्टी तो अवश्य लगेगी, परन्तु नामो, जीवन में बहुत कुछ उलट पुलट होता रहता है, सो प्लैन बी और सी को कभी मत भूलना।


यदि तुम्हारे मना कहने पर भी माता पिता विवाह पर खर्चा करें और जब तुम्हें उनकी आवश्यकता पड़े तो तुम्हारे विवाह को ही अपने कर्त्तव्य की इतिश्री मानें तो नामो, प्लैन सी की आवश्यकता होगी। इसके अन्तर्गत नामो, विवाह तब तक मत करना जब तक आत्मनिर्भर न हो जाओ। नौकरी चाहे दूसरे ही शहर की क्यों न हो तब तक मत छोड़ना जब तक तुम यह सुनिश्चित नहीं कर लेती कि उस घर में तुम्हारा स्वागत है, तुम वहाँ भली भांति जी सकोगी। तुम लम्बी अवधि का बिना वेतन के अवकाश ले सकती हो। नौकरी होने से मित्र भी होते हैं जो मुसीबत के समय में साथ दे सकते हैं।


वैसे तो आशा है तुम्हारे मंगेतर की माँ भी उसे ऐसा ही एक पत्र लिख चुकी होगी और वह भी अपने उत्तरदायित्व अच्छे से समझ गया होगा। ऐसा हुआ होगा तो नामो, सबकुछ बढ़िया ही रहेगा ऐसी आशा की जा सकती है।


तुम्हारी हितचिन्तक,
तीघूघु तीसूबा

पुनश्चः यह लेख लिखने की प्रेरणा मुझे 'मोना के नाम पापा की अनमोल चिट्ठी' पढ़कर मिली थी।


घुघूती बासूती

Friday, December 12, 2008

इन्हें चाँद चाहिए !!!

हाँ, चाहिए ही चाहिए। चाँद ही क्या तारे भी चाहिए । बहुधा ऐसा होता है कि लगता है कि हमें चाँद या कुछ और इसलिए चाहिए क्योंकि तुम्हारे पास है या क्योंकि तुम्हें चाहिए तो हमें भी चाहिए । परन्तु मुझे तो चाहिए, तब भी जब तुम्हें इसकी चाहत हो या न हो, तुम्हारे पास हो या न हो । मुझे अपने लिए चाहिए, तुमसे बिल्कुल पृथक और स्वतंत्र । यदि मिल गया तो मेरा मन होगा तो तुमसे भी बाँटूगी या नहीं बाँटूगी । चाँद या किसी और की चाहत मेरा नितान्त निजी मामला है । इसमें किसी और की अनुमति या पसन्द नापसन्द का कोई प्रश्न ही नहीं उठता । मिल गया तो खुशी भी मेरी होगी, नहीं मिला तो दुख भी मेरा । इससे किसी अन्य को क्या लेना देना है ? हाँ यदि इसे पाने के लिए मैं कोई गैरकानूनी काम करूँ तो अवश्य शिकायत करना । और यदि मेरी इस चाहत का कोई अनुचित लाभ उठाने का प्रयास करे तो उसे रोकना भी होगा और यदि कोई मेरी इस चाहत का मूल्य परिश्रम से अधिक या इसके अतिरिक्त माँगे या जबरदस्ती ले तो उसे सजा भी मिलनी ही होगी ।

'एक बात तो तय है। किसी भी स्त्री से उसकी सहमति के बगैर संबंध नहीं बनाया जा सकता।' यह बात कही जा रही है 'इन्हें चांद चाहिए' में ! एक और बात भी तय है, एक ही क्या बहुत सी बातें तय हैं, किसी की सहमति के बिना उसकी हत्या नहीं हो सकती, चोरी या जेब कतरना नहीं हो सकता, डाका नहीं डल सकता, यहाँ तक कि कोई आतंकवादी उसे आतंकित नहीं कर सकता । यह तथ्य यदि पहले ही पता होते तो इतने सारे न्यायालय बनाकर क्यों पैसा डुबाया जाता ? वकीलों से कहो कोई और धंधा अपनाएँ । यह तथ्य जानने के बाद अब मैं पहले से काफी अधिक सुरक्षित अनुभव कर रही हूँ । मैं तो सोच रही हूँ कि 'मैं असहमत हूँ' की एक तख्ती लटकाकर निश्चिन्त हो कभी भी, कहीं भी घूमने निकल जाऊँ । पुरुष नामक जीव जब यह तख्ती पढ़ेगा तो मुझे कभी कोई हानि न पहुँचाकर एक अच्छे बच्चे सा अपने रास्ते या फिर सहमत स्त्रियों, पुरुषों की खोज में किसी अन्य रास्ते चला जाएगा। यह बात यदि पहले पता होती तो ताज, औबेरॉय आदि में भी बड़े बड़े अक्षरों में यह लिखकर टांग दिया जाता ।

कुछ अति तो मैं कर रही हूँ, लेख काफी अच्छा है, परन्तु सफलता यदि इन्हीं कारणों से मिलती तो हर सफल पुरुष या हर वह सफल पुरुष जो किसी पुरुष के अधीन काम कर रहा है, समलैंगिक होता । हर सफल स्त्री जो किसी स्त्री के अधीन काम कर रही है, भी समलैंगिक होती । एक मछली सारे तालाब के जल को गंदा तो करती ही है परन्तु इन अपवादों को इतना तूल देकर सफलता और सफल व्यक्ति पर ही प्रश्नचिन्ह लगाकर हम जल के नाम को ही गंदा कर रहे हैं । क्या यह असफल लोगों की 'खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे'वाली मानसिकता को इंगित नहीं करती ?

जहाँ भी शक्ति, विशेषकर अकूत शक्ति बिना किसी उत्तरदायित्व के केन्द्रित होगी उसका दुरुपयोग होने की संभावना भी होगी, विशेषकर तब जब शक्ति किसी कुपात्र के हाथ में होगी । यहाँ कुपात्र से भी अधिक दोष उसका है जिसने उस कुपात्र को ऐसी शक्ति पकड़ाई ।

शक्ति का दुरुपयोग होता है,मानवीय कमजोरियों का लाभ कुछ लोग अवश्य उठाते हैं, चाहे वे पुरुष हों या स्त्री ! इसमें चाँद की चाहत का दोष नहीं है, दोष है तो केवल गलत मार्ग का, यदि उसका उपयोग हुआ हो । बहुधा जब हम कुछ नहीं पा पाते तो हमारा अहम् हमें पाने वालों की योग्यता को स्वीकार नहीं करने देता । क्योंकि यदि हम यह स्वीकारेंगे तो हमें अपनी अयोग्यता भी स्वीकारनी होगी ।

घुघूती बासूती

Monday, August 11, 2008

माँ

ममतामयी माँ
लावण्यमयी माँ
त्यागमयी माँ
गरिमामयी माँ
सौम्या माँ
साड़ी में लिपटी माँ
बिन्दिया वाली माँ
लम्बे काले बालों वाली माँ।

आज की सफेद बालों वाली माँ
बिन बिन्दिया वाली माँ
बिन चरयो वाली माँ
बिन चूड़ी वाली माँ
बिन बिछिये वाली माँ
हल्के रंग पहनने वाली माँ
बैंगन, उरद ना खाने वाली माँ
हल्दी कुमकुम में ना जाने वाली माँ
दाँए हाथ में मौली बँधवाने वाली माँ।

दुर्भाग्यवती माँ
पिताजी की पत्नी माँ
पिताजी के नाम से जानी जाने वाली माँ
पिताजी की पूर्व सौभाग्यवती माँ
पिताजी की विधवा माँ
मेरे भाई की माँ
मेरे भतीजे की दादी माँ ।

हाँ, मेरी भी माँ
मेरी माँ के रूप में ना जानी जाने वाली माँ
मेरी बच्चियों की भी नानी माँ
उनकी नानी के नाम से ना जानी जाने वाली माँ
मेरे नाना की बेटी मेरी माँ
मेरे मामा की बहन मेरी माँ
मेरी मौसियों की भी बहन मेरी माँ
उनकी बहन के नाम से ना जानी जाने वाली माँ।

आज जब मंदिर जाती हो
या जब घर में पूजा होती है
तो क्या आशीर्वाद देते हैं
पंडितजी तुम्हें माँ ?
क्या अचानक सौभाग्यवती भवः
की जगह बुद्धिमती भवः कहते हैं ?
या फिर कहते हैं चिरंजीवी भवः ?
पूरे जीवन इस आशीर्वाद के बिन
तुम जीयी और खूब लम्बी उम्र जीयीं
पिताजी तो चिरंजीवी भवः सुनते सुनते चले गए
और तुम सौभाग्यवती सुनते सुनते
दुर्भाग्यवती बन गईं।
तुम्हें पुत्रवती भवः के आशीर्वाद भी खूब मिले होंगे
किन्तु फिर भी तुम्हारी गोद में
मैं आ ही गई
तब तुम क्या रोई थीं माँ
या केवल उदास हुईं थीं ?

माँ, तुम्हारा तो नाम ही खो गया
याद नहीं कभी किसीने तुम्हें
तुम्हारे नाम से पुकारा हो
माँ, तुम्हारा तो व्यक्तित्व ही
पिताजी से था
क्या किसीने कभी तुमसे पूछा कि
तुम क्या चाहती हो ?
पढ़ना है या बालिका वधू बनना है
नौकरी करनी है या गृहणी बनना है
कितने बच्चों की माँ बनना है
माँ बनना भी है या नहीं
मैंने भी नहीं पूछा कि क्या
मैं तुम्हारी कोख में आ जाऊँ ?
बस आ गई।

और अब तुम्हारे जीवन के
ये अनुत्तरित प्रश्न मुझे कचोटते हैं
क्या ये सब प्रश्न
तुम्हारे मन में भी उठते थे?
या तुमने उनको दबाना सीख लिया था
या फिर उन्हें सुनना
अपनी ही आवाज को सुनना
बन्द कर दिया था
कभी कभी सोचती हूँ माँ
कि इक दिन शायद मैं भी
तुम सी हो जाऊँ
प्रश्न करना छोड़ दूँ
क्या प्रश्न करना छोड़कर तुम संतुष्ट हो?

क्या मैं संतुष्ट हो जाऊँगी
जब आँखें मूँदकर चलूँगी
पति से दस कदम पीछे
जब अपनी खोज करना छोड़ दूँगी
जब अपनी पहचान को ढूँढना छोड़ दूँगी
कुछ विक्षिप्त सी स्थिति होगी
जब खोए हुए स्वयं को
ढूँढना भी छोड़ दूँगी
एक मेरी निजता ही तो मेरी है
नाम किसी का
घर किसी का
पता किसी का
एक मैं ही तो मेरी अपनी हूँ।

घुघूती बासूती

Wednesday, August 06, 2008

ज्वलनशील नारियाँ


नारियों के,
भारतीय नारियों के जलने पर
क्यों अफसोस है
वे तो सदा से ज्वलनशील रही हैं
उसमें न हमारा कोई दोष है,
नहीं तो कोई
उसके जीवित जलने की कल्पना
भी कैसे करता?
तब, जब हम चला रहे थे
अग्नि बाण
जब उत्कर्ष के चरम पर था
हमारा इतिहास
तब भी माद्री बन रही थी
जीवित मशाल।
तब जब हम थे भाग रहे
मुगलों से मुँह छिपा
जब पतन की गर्त में था
हमारा इतिहास
तब भी हम गौरान्वित थे,
क्या हुआ जो हम
न बचा सके अपनी
बेटियों की लाज,
ब्याह रहे थे उन्हें मुगलों से
पाने को कुछ स्वर्ण ग्रास
तब भी पत्नियाँ तो थीं हमारी
सीता, सती व सावित्री
कूद रहीं थीं पद्मिनियाँ
जलने को जौहर की आग में।
फिर जब बन रहे थे
पढ़ अंग्रेजी
जैन्टलमैन बाबू हम
तब भी इन ज्वलनशील नारियों
ने डुबाया था नाम देश का
आना पड़ा था इक
राजा राममोहन रॉय को,
जब भी कोई भद्र
मरणासन्न बूढ़ा खोलता था
करवा कन्यादान
किन्हीं नन्हीं बालाओं के
माता पिता के स्वर्गद्वार
तब उसके मरने पर
बैठ जातीं थीं चिता पर
ये नन्हीं बालाएँ
प्यार में उस वृद्ध के।
आज जब हम
दौड़ में बहुत आगे हैं
हमने आइ टी में रचा है
इक नया इतिहास
तब भी क्या करें
ये ज्वलनशील नारियाँ हमारी
कभी भी
इक माचिस की तीली की
छुअन से जल जाती हैं,
हम नहीं चाहते परन्तु ये
न जाने क्यों भस्म हो
जल मर जाती हैं?
हम भी तो हैं फूँकते
न जाने कितने अरब
सिगरेट और बीड़ियाँ
क्या जली है मूँछ भी
कभी गलती से हमारी आज तक?
फिर न जाने क्या गलत है
डी एन ए में
भारतीय ही नारी के
क्यों ज्वलनशील है वह
हम नहीं हैं जानते।
घुघूती बासूती

यह कविता बालकिशन जी की कविता 'मुझे मत जलाओ' को पढ़कर लिखी गई है।

Friday, July 18, 2008

पढ़ाई, बदलाव व लड़कियाँ

हाल ही में एक चिट्ठे 'औरत के हक में' में एक लेख 'लड़कियाँ फेल क्यों हो गईं' पढ़ रही थी। वहाँ एक टिप्पणी में लिखा था कि कोई भी पढ़ा लिखा पिता अपनी बेटी को पढ़ाई से वंचित नहीं रखता। आमतौर पर यह सही है परन्तु सदा नहीं। पढ़ाई मानसिकता बदलने में सहायता अवश्य करती है परन्तु मानसिकता बदलने की गारंटी कदापि नहीं है। यदि ऐसा होता तो समाज तेजी से बदल गया होता, कमसे कम पढ़े लिखे लोगों का समाज तो बदल ही गया होता।

मुझे अपने बचपन में देखे गए कुछ लोग याद आते हैं। एक तो थे हमारे पूर्व स्कूल के प्रधानाचार्य जी। अपने पद के कारण उन्हें हमारी प्रेरणा होना चाहिए था। परन्तु मैं तो यही जानती थी कि जैसे वे हैं वैसा न मुझे होना है ना ही वैसे किसी व्यक्ति से सम्बन्ध रखना है। वे नए नए हमारे पड़ोस में रहने आए थे। वह स्कूल आँठवीं तक का था और सौभाग्य से मैं तब नौंवी में पढ़ती थी। उनकी तीन बेटियाँ थीं व एक पुत्र। पुत्र इंजीनियरिंग पढ़ रहा था। बेटियाँ, विभिन्न आयु वर्ग की घर में रहती थीं। माँ के पूछने पर कि वे क्यों नहीं पढ़ रहीं, उनका उत्तर था कि उन्हें जितना पढ़ाना था (दसवीं तक ) पढ़ा लिया। अब उन्हें उनके घर भेजना है। घर में तीन जवान स्वस्थ बेटियाँ, एक स्वस्थ पत्नी और एक प्रधानाचार्य जी। अब घर का कितना काम वे चार स्त्रियाँ ढूँढ ढूँढ कर कर सकती थीं। बहुत सा समय खाली रहतीं। माँ को पढ़ने में रुचि थी। पास में ही एक चार भाषाओं की पुस्तकों वाला समृद्ध पुस्तकालय भी था। हमारे घर में लगातार पुस्तकें आती रहतीं। वैसे भी घर में बहुत सी पुस्तकें थीं। माँ ने सुझाया कि पुस्तकें ही पढ़ लिया करें तो उनके पिताजी को उनका पुस्तकें पढ़ना भी रुचिकर नहीं लगता था। हमारे घर में भांति भांति की पत्रिकाएँ भी आती थीं। साप्ताहिक हिन्दुस्तान, धर्मयुग,कादम्बिनी आदि और धार्मिक पत्रिका कल्याण भी। कोई भी वे पढ़ सकती थीं, परन्तु घर के स्वामी को यह पसन्द नहीं था। घर से बाहर निकलना भी मना था सो हरियाणा में रहते हुए भी पंजाबी, हरियाणवी महिलाओं, जो कढ़ाई, सिलाई में में प्रवीण होती थीं, से कढ़ाई सिलाई भी नहीं सीखतीं थीं।

मैं उन्हें देखती थी। मेरा जीवन पूरी तरह से भरा, व्यस्त था। स्कूल, पढ़ाई, शाम को रोज टेबल टैनिस खेलना, टेस्ट, टुर्नामेन्ट, समाचारपत्र, उपन्यास,पत्रिकाएँ, खाली समय ही नहीं था। तब सोचती कि ये बहनें जिनमें से सबसे छोटी मुझसे दो या तीन वर्ष ही बड़ी थी कैसे रहतीं होंगी। क्या केवल इसी आस में जीती होंगी कि कोई आए और उन्हें 'उनके' घर ले जाए।

एक और पड़ोसी थे। जब वे आए तो उनकी छोटी बेटी दसवीं पास कर चुकी है, बताया गया। मैं तब मात्र ५ या ६ वर्ष की रही होउँगी। दोनों बहनें साथ में कॉलेज नहीं जा सकती थीं क्योंकि घर में काम में हा्थ बटाना होता था। सो बारी बारी करके वे बी ए व एम ए भी कर गईं। उनसे छोटे बड़े सभी ४ भाई पढ़ाई में तेज थे व बारी बारी नहीं, सभी साथ साथ पढ़ने के लिए कॉलेज, छात्रावास गए। न इन लड़कियों ने कभी नौकरी करी न उनकी शादी हुई। लगभग २५ वर्ष बाद जब मैं अपनी बेटियों को लेकर वापिस उसी जगह रहने गई, तब तक भी वे घर के काम में हाथ बटा रही थीं। ये अनपढ़ लोग नहीं थे। पिता एक कारखाने में औफिसर थे।

सो पढ़ाई बदलाव के लिए एक उत्प्रेरक ( catalyst) हो सकती है परन्तु असली तत्व जो बदलाव ला सकते हैं वे तो हमें अपने भीतर या समाज में से ही लाने होंगे। असली तत्व हम स्वयं हैं, उससे जब हमारी मेहनत, लगन, इच्छाशक्ति मिल जाएँ तो पढ़ाई व हमारे आस पास की परिस्थितियाँ catalyst का काम करके बदलाव की प्रतिक्रिया को तेज कर देती हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि मनुष्य स्वार्थी होता है। जिस भी काम से उसे स्वयं संतुष्टि या कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लाभ या अपने जीवन मूल्यों की तुष्टि नहीं मिलेगी वह नहीं करेगा। जो माता पिता अपने बच्चों को मेहनत करके या स्वयं आधा पेट रहकर पढ़ाते हैं, वे भी केवल इसलिए ऐसा कर पाते हैं क्योंकि उनके कष्ट से बड़ा उनका बच्चों को आगे बढ़ाने का जीवन मूल्य होता है। सो वे इस जीवन मूल्य को पाने के लिए कुछ भी कर गुजरते हैं। जिनका जीवन मूल्य केवल सामाजिक परम्पराओं को जीवित रखना ही या अपना अंकुश परिवार में बनाए रखना होता है जैसा कि माननीय प्रधानाचार्य जी का था वे सारी सुविधाएँ होते हुए भी, पढ़ेलिखे होते हुए भी बदलाव के लिए कुछ नहीं करेंगे अपितु वह सब करेंगे जिससे बदलाव की बाढ़ को रोका जा सके। यह भी हो सकता है कि जिस बदलाव की बात हम कर रहे हैं वह उन्हें प्रगतिशील न लगकर पतनशील लगता हो। तो उनके अनुसार वे सही ही कर रहे थे। जिनका जीवन मूल्य केवल अपनी सुविधा हो, जैसा उन बारी बारी कॉलेज जाने वाली बेटियों के माता पिता का शायद था,वे अपनी सुविधा के लिए कुछ भी कर सकते हैं,समाज में निकृष्ट माने जाना भी उन्हें स्वीकार्य है।

ऐसी स्थिति में शायद मनुष्य के अंदर का जुझारूपन ही व्यक्ति की नैया पार लगा सकता है जैसे मेरे एक चिट्ठे 'कैसे कैसे लोग' की 'जाई' ने कर दिखाया। मेरी कई अन्य महरियों में भी मैंने यह देखा है। कई पड़ोसिनों में नहीं देखा है। प्रधानाचार्य जी की पत्नी दीनहीन थीं। उनसे जुझारू होने की अपेक्षा करना हाथी से उड़ने की अपेक्षा करने समान था। परन्तु मुझे दुख इस बात का है कि प्रकृति ने हर अन्य प्राणी में माता पिता उन्हीं को बनाने का प्रावधान रखा है जो इस योग्य हों। बहुत से प्राणियों में पिता का बच्चों के लालन पालन में कोई सहयोग नहीं होता। पक्षियों आदि में होता है। परन्तु मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है कि कितना भी निकृष्ट, नालायक क्यों न हो, माता पिता बन सकता है। मादा पशु अपने बच्चों की रक्षा में प्राणों की बाजी लगा देती है। कमजोर से कमजोर पशु माता भी जी जान से अपने बच्चों की रक्षा करती है। केवल मानव स्त्री ही गृहस्वामी के मन के अनुसार अपने बच्चों को बड़ा करती है। क्यों प्रधानाचार्य जी की पत्नी माँ बनने पर उनके गलत निर्णयों का विरोध करने का साहस नहीं जुटा पाईं? सो लगभग सब प्राणी माता पिता अच्छे माता पिता होते हैं सिवाय मनुष्य के,जो अच्छा या बुरा होने का चुनाव कर सकते हैं। शायद प्रकृति का सबसे बुद्धिमान प्राणी होने का यही मूल्य हम चुकाते हैं।

क्या मानव स्त्री का बच्चे अपने मन मुताबिक बड़े करने के अधिकार से वंचित रह जाने के पीछे मानव सभ्यता का हाथ है? बहुत कम प्राणी बच्चे अपने पिता के बच्चे कहलाते हैं। वे सदा ही अपनी माँ के बच्चे के रूप में जाने जाते हैं। मनुष्य में बच्चे माँ के नहीं कहलाते, न ही वे माँ की जीवन शैली, भाषा, धर्म, जाति या नाम से जाने जाते हैं। वे अपने पिता के बच्चे होते हैं। माँ भले ही बच्चे की माँ, जैसे 'रामू की माँ' के नाम से जानी जाए ! शायद इसी विडंबना के कारण माँ यह तय नहीं कर पाती कि उसके बच्चे के लिए क्या सही है। आज कानून शायद बदला हो परन्तु भारत में बच्चे का स्वाभाविक संरक्षक भी पिता ही माना जाता रहा है। इस स्थिति के लिए हमारी सभ्यता जिम्मेदार है। मनुष्यों में नर व स्त्री दोनों ही बच्चे की परवरिश में भाग लेते रहे हैं, चाहे वह खाना जुटाना रहा हो या सुरक्षा प्रदान करना या लालन पालन करना। शायद इसीलिए मानव बच्चे का विकास अन्य प्राणी बच्चों के विकास से अधिक होता है और अधिक समय लेता है। और यह विकास जीवन पर्यन्त चलता रहता है। ऐसी स्थिति में यदि माता पिता में से एक या दोनों ही अपने दायित्व को सही ढंग से नहीं निभाते तो बच्चों का सर्वांगीण विकास अवरुद्ध हो जाता है। तभी दुख होता है कि काश, प्रकृति केवल अपना दायित्व समझने वालों को बच्चों का वरदान देती।

बहुत से परिवारों में तो पुत्री की उपस्थिति को लगभग नकार ही दिया जाता है। किसी भी अच्छे स्कूल में लगभग सदा लड़कों की संख्या अधिक होती है। महंगे स्कूलों में पुत्रों को भेजा जाता है। जिस स्कूल से मैं जुड़ी हूँ वह शहर के नापदंडों से महंगा तो नहीं कहलाएगा परन्तु मुफ्त मिलती सरकारी शिक्षा से तो स्कूल फीस, बस का किराया आदि मिलाकर निश्चय ही महंगा है।

मेरी कक्षा में कन्हैया नाम का एक लड़का पढ़ता था। पढ़ाई करना तो दूर की बात वह मैले कपड़े पहने, बिना स्नान किये स्कूल आता था। कोई भी किताब निकालने को कहो तो कन्हैया बैठा रहता था। उसे अलग से कहना पड़ता। तब वह बस्ते मे ढूँढाई आरम्भ करता। यदि उसकी प्रतीक्षा करो तो न जाने कितना समय निकल जाता। इसलिए मैं ही बहुत बार बस्ता लेकर किताब ढूँढती। अधिकतर किताबें या तो खो गई होंती या फिर फटी होतीं। उसका बस्ता किताबों व कॉपियों के पन्नों से बनी नाव, गेंद, हवाईजहाज आदि से पटा पड़ा रहता। शायद ही कभी वह कोई गृहकार्य करके लाया हो। दूसरी कक्षा तक सभी बच्चे पास कर दिए जाने के कारण वह तीसरी में आकर अटक गया था।

तरह तरह से कन्हैया को पढ़ाने का यत्न किया जाता। अगली कक्षा के किसी बच्चे से माँगकर उसकी खोई किताबों की जगह नई दी जाती। प्यार, समझाने, क्या समस्या है पूछने से कोई विशेष अन्तर न पड़ता। उसे आगे बैठाया गया, अलग बैठाया गया, अपने पास बैठाया गया। उसके पिता को बुलाया गया। उनसे बात की तो पता चला कि आजकल उसकी माँ उसका ध्यान नहीं रख पाती है। कारण कि बहुत साल से कन्हैया घर में अकेला बच्चा था अब उसका भाई पैदा हो गया है तो माँ का ध्यान बंट जाता है। मैंने कहा अरे, बहुत सालों का अंतर हो गया। इतने सालों से अकेले रहकर भाई आने से सामंजस्य नहीं बैठा पा रहा होगा। उसकी माँ से कहो इसपर भी ध्यान दें। आप भी इसपर ध्यान दें, नहला धुलाकर भेंजे। रोज डायरी देखें कि क्या गृहकार्य दिया गया है। उसका पिता बोले, 'अंतर तो नहीं रखा था। बीच में दो बहनें आ गईं इसी से अंतर हो गया। अब छोटे को भी देखना होता है। और मैं तो नौकरी पर जाता हूँ, बच्चों को कैसे देखूँ ?' मैं दंग ! इसकी दो बहनें हैं ? स्कूल क्यों नहीं आतीं ? वे बोले, 'लड़कियाँ हैं सो सरकारी स्कूल में कभी चली जाती हैं बाकि तो 'बच्चों' की देखभाल में माँ का हाथ बटाती हैं! 'बच्चों' का भविष्य सुधारने को ही तो इसे अंग्रेजी स्कूल में डाला था।'

सो ये एक पिता आज के समय के हैं, उन दो माता पिता के किस्से से लगभग ४० या ४५ वर्ष बाद के पिता। जो बेटियों की उपस्थिति को ही लगभग नकार रहे थे। वे हैं तो केवल माँ का हाथ बटाने को। उन माँओं का क्या होता है जिनके केवल बेटे होते हैं? क्या उनके हाथ को बटवाने की आवश्यकता नहीं पड़ती?
उस बच्चे कन्हैया का भी भविष्य क्या होगा जिसे दो बहनों के होते हुए भी घर का इकलौता बच्चा जान बिगाड़ा जाता रहा है। कल कन्हैया की बहनों व स्त्रियों के प्रति क्या विचारधारा होगी? क्या हम आज से २० वर्ष बाद वाले कन्हैया से अपेक्षा कर सकेंगे कि वह अपनी पत्नी और बेटियों को अपने व बेटों के समान माने? सो एक और पीढ़ी यह पक्षपात व अन्याय चलाने को तैयार की जा रही है। कन्हैया कहने को शिक्षा पा रहा है, पा क्या रहा है बस स्कूल आ रहा है। शायद कभी स्कूल पासकर समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनेगा, ऐसा हिस्सा जिससे अधिक अपेक्षा नहीं की जा सकती। सो आज से २० या २५ वर्ष बाद की भी कुछ लड़कियों को 'पढ़े लिखे' पिता के दकियानूसी विचारों में जीना पड़ेगा।

घुघूती बासूती

Thursday, July 10, 2008

और अब मिला है एक अच्छा समाचार !

भारतीय समाज में स्त्रियों की घटती हुई संख्या कुछ वर्षों से न केवल स्त्रियों या स्त्रियों को सामाजिक न्याय दिलवाने में रुचि रखने वालों को ही, अपितु सारे समाज को परेशान किए हुई थी। पक्के पुरुषवादियों को भी यह चिन्ता खाए जा रही थी कि उनके बेटों का विवाह कैसे होगा। ऐसे समय में कोई भी समाचार जो यह बताए कि स्त्री पुरुष अनुपात थोड़ा भी बेहतर हुआ है एक आशा की किरण जगाता है।

आज के टाइम्स औफ इन्डिया द्वारा जारी किए गए इस समाचार के मुताबिक गुजरात में ० से ६ वर्ष तक की आयु में यह अनुपात २००५ में ८४६ था जो २००७ में बढ़कर ८८२ हो गया है। अभी भी स्थिति चिन्ताजनक बनी हुई है परन्तु कुछ सकारात्मक बदलाव दिख रहे हैं। सन् २००१ में यह अनुपात ८८३ था। यह अनुपात उसके बाद गिरता ही गया और लगता था कि स्त्री एक विलुप्त प्राणी बन जाएगी।

समाज के कई वर्गों ने इस स्थिति की गंभीरता को समझा व पुत्रियों को जन्म से पहले ही मारने के इस चलन के विरुद्ध अभियान चलाए। गुजरात में टाइम्स औफ इन्डिया ने 'जागो गुजरात' के अन्तर्गत 'सेव द गर्ल चाइल्ड' अभियान चलाया। बेटियों पर अभिमान करने वाले माता पिता से नित नए साक्षात्कार दिखाए जाते। अपनी बेटियों पर गर्व कर उन्हें कुछ बनाने वाले माता पिता को विशेष टी शर्ट्स, जिनपर 'सेव द गर्ल चाइल्ड'लिखा होता दिए जाते। 'बेटी बचाओ' आन्दोलन में सरकार व बहुत सी सामाजिक संस्थाओं की भागीदारी रही। कई जातियों व समुदायों ने अपनी अपनी जाति या समुदाय में इसे रोकने का बीड़ा उठाया। हाल में ही (शायद) पटेल लोगों ने निर्णय लिया कि जिस भी परिवार में दो से अधिक पुत्रियाँ होंगी तो तीसरी और उसके बाद की पुत्रियों की पढ़ाई लिखाई व विवाह का खर्चा समाज उठाएगा।

कई लोग पूछेंगे कि तीसरी बेटी या उससे बाद की का ही खर्चा क्यों उठाया जाएगा, सबका क्यों नहीं ? सोचने की बात यह है कि अधिकतर लोग दो बेटियाँ पैदा हो जाने पर ही भ्रूण परीक्षण कर स्त्री भ्रूण की हत्या करते हैं। सो इसको रोकने के लिए ही यह कदम उठाया गया होगा। कुछ सीमा तक परिवार नियोजन, जो भारत जैसी बड़ी जनसंख्या वाले देश के लिए, अपने आपमें एक बहुत आवश्यक व उपयोगी समाधान है, वह भी स्त्री की घटती जनसंख्या का एक कारण बन गया है। परिवार नियोजन के चलन में आने से पहले किसी परिवार में दो लड़के तीन लड़कियाँ होती थीं तो किसी में तीन लड़के और दो लड़कियाँ, कहीं पाँच छः लड़के और फिर एक लड़की तो कहीं पाँच छः लड़कियाँ और फिर एक लड़का। इस तरह से जनसंख्या तो चाहे बेहिसाब बढ़ रही थी परन्तु लड़के लड़कियों का जन्म के समय अनुपात बराबर सा ही रहता था। जन्म के बाद लड़कों के स्वास्थ्य, खानपान पर अधिक ध्यान दिया जाता था और उनकी छोटी सी बीमारी पर भी चिकित्सा करवाई जाती थी, जबकि लड़कियों के स्वास्थ्य, खानपान पर ध्यान कम दिया जाता था और उनकी चिकित्सा भी कम ही करवाई जाती थी अतः वयस्क होते होते यह अनुपात थोड़ा गड़बड़ा जाता था। स्थिति तब भी आज जैसी सोचनीय नहीं थी। परन्तु आज जब सबको एक या दो ही बच्चे चाहिए तो उन्हें एक पुत्र तो चाहिए ही। पहले जहाँ इस पुत्र लालसा में बच्चियों का जन्म होना सामान्य बात थी वहीं आज उन्हें जन्म ही नहीं दिया जा रहा है।

देखा जाए तो जो स्थिति आज है वह आने वाले समय का ट्रेलर भर भी नहीं है। जब ९० के दशक व उससे बाद में पैदा हुए बच्चे विवाह लायक होंगे तब समस्या बहुत विकराल रूप में सामने आएगी। आज भी हरियाणा, पंजाब व गुजरात में बहुत से लड़कों की शादी के लिए लड़कियाँ नहीं मिल रही हैं। बहुत से लोग आदिवासी या गरीब राज्यों से लड़कियाँ खरीदकर अपने बेटों का विवाह करवा रहे हैं। बहुपति प्रथा फिर से चलन में आ रही है। तो दस वर्ष बाद समस्या कितनी गंभीर हो जाएगी आप सोच सकते हैं। ऐसा न हो कि बेटों के माता पिता उन्हें कहेंगे कि 'पढ़ ले नहीं तो दुल्हन नहीं मिलेगी'। समस्या इतना विकराल रूप ले ले उससे पहले ही हमारे समाज को संभलना होगा। हम प्रत्येक वस्तु, सुख ,सुविधा के लिए सरकार का मुँह जोहते रहते हैं, परन्तु कोई भी सरकार पुरुषों को पत्नी नहीं दिलवा सकेगी।

स्त्रियाँ भी यह नहीं सोच सकतीं कि पुरुष प्रधान समाज ने जो किया उसकी सजा उस समाज के पुरुष भुगतें तो क्या बुराई है। क्योंकि जब यह अनुपात बिगड़ेगा तो स्त्रियों के प्रति अपराध और अधिक बढ़ेगा। स्त्रियाँ घर और बाहर आज से भी अधिक असुरक्षित हो जाएँगी। जो परिवारजन और अपराधी आज उनको खरीदने व बेचने से परहेज नहीं करते वे ऐसी स्थिति में कितने सक्रिय हो जाएँगे, यह अनुमान लगाना भी बहुत भयावह है।

दहेज विरोधी, घरेलू हिंसा विरोधी कानूनों से समाज में स्त्रियों की स्थिति में सुधार आया है। समय के साथ साथ समाज का स्त्रियों के प्रति दृष्टिकोण भी बदला है। अभी कल के ही समाचार पत्र में समाचार था कि अब बहुत से परिवार अपनी विधवा बेटियों ही क्या विधवा बहुओं के विवाह के लिए भी कदम उठा रहे हैं। शायद जैसा बदलाव हम गुजरात में देख रहे हैं वैसा ही बदलाव सारे भारत में आ जाए और किसी भी भ्रूण की हत्या इसलिए न हो कि वह स्त्री भ्रूण है। बहुत कुछ बदला है, बहुत कुछ सकारात्मक हो रहा है, परन्तु उससे भी बहुत अधिक करने की आवश्यकता है।

घुघूती बासूती

Tuesday, February 05, 2008

नोटपैड बहना ,क्यों डराती हो इतना ?

 

 

नोटपैड बहना ,
क्यों डराती हो इतना ?
चलो मिल बनाए गुझिया,
जिसे देख सीखे अपनी गुड़िया,
चलो लगाएँ उसे भी रसोई में
क्या धरा है उसकी पढ़ाई में ?
पढ़ना ही है तो कितना है पढ़ने को-
पढ़ो ‘गृहशोभा’, ‘गृहलक्ष्मी’, ‘मेरी सहेली’ ,
संपादिका हैं जिनकी कोई फिल्म स्टार
ये सिखाती हैं तरीके पति को रिझाने के,
बैंगन का नये तरीके का भर्ता बनाने के
मुन्ने को मालिश कर सुलाने के, ( मुन्नी को नहीं )
तरीके है पार्टी में मेकअप लगाने के,
बच्चों को बहलाने के,
रूठे पति को मनाने के,
छोड़ो ये पाब्लो- फाब्लो को ,
चलो पड़ोस हल्दी- कुमकुम को,
पर ना लाना विधवा सखी को
कर देगी वह अशुभ ,शुभ को ।
चलो मेरी बहना
काम है कितना !

- घुघूती बासूती

Friday, January 04, 2008

खुल्लमखुल्ला मोलेस्ट करेंगे हम इनको

स्त्री व हमारा समाज 3

मैंने बहुत पहले दो चिट्ठे स्त्रियों व हमारे समाज में उनके स्थान व उनकी समस्याओं आदि पर लिखे थे । मैं यह श्रृंखला चालू रखना चाहती थी परन्तु आलस्य जैसे किन्हीं कारणों से चालू नहीं रख पाई । कल जबसे मैंने मुम्बई वाली घटना के बारे में सुना है तब से उबल रही हूँ । किन्तु मैं जानती हूँ उबाल की स्थिति में कुछ लिखने पर बाद में पछताना भी पड़ सकता है अत: कल अपने लेखन को मैंने केवल टिप्पणियों तक सीमित रखा ।

खुल्लमखुल्ला मोलेस्ट करेंगे हम इनको
इस धरती पर नहीं जीने देंगे हम इनको
जमकर बेइज्जत रोज करेंगे हम इनको
जन्मने से पहले मार डालेंगे हम इनको
चैन से ना जीने देंगे कहीं भी हम इनको
जीवित जला डालेंगे जब चाहे हम इनको ।

भारत के एक बहुत बड़े पुरुष वर्ग का स्त्रियों के प्रति यह नारा बन गया है ।
मुझे लगता है कि हमारे समाज में स्त्रियों का अस्तित्व, उनकी अस्मिता, उनका जीने का अधिकार ही संकट में पड़ गया है । उनपर अत्याचार भ्रूण की अवस्था से लेकर मरने तक होता है । इस विषय पर पूरी चर्चा होनी चाहिये परन्तु आज का लेख मुम्बई की घटना से ही सम्बंधित रखने का यत्न करूँगी ।

भारत में जो हो रहा है वह अधिक निन्दनीय इसलिये भी है क्योंकि जो अपराध अन्य देशों में पुरुष अकेले में सबसे छिपकर करते हैं, वे अपराध भारत में ये संयुक्त रूप से एक भीड़, समूह या समाज का हिस्सा बनकर खुल्लमखुल्ला करते हैं । माना अपराध तो अपराध ही रहेगा चाहे वह एकान्त में हो या भीड़ में ! परन्तु जब वह अपराध खुल्लमखुल्ला होता है तो वह चोरी से डाके समान बन जाता है । चोरी से बचने के रास्ते निकाले जा सकते हैं परन्तु डाके से नहीं । चोर से मनुष्य इतना भयभीत नहीं रहता जितना डाके से । फिर जब वही अपराध सार्वजनिक स्थान पर एक समूह के रूप में किया जाता है तो पीड़ित व्यक्ति जान जाता है कि उसे समाज में से कोई भी बचाने नहीं आएगा, कि वह निरीह और अकेला है । उसे अपनी निरीहता पर या तो क्रोध आएगा और वह कोई फूलन देवी बन जाएगा या वह अवसाद में घिर जाएगा, या हीन भावना का शिकार हो जाएगा, या फिर स्वयं कठोर व निर्मम हो जाएगा और जिसपर
भी वश चले उसपर अन्याय करेगा ।
मुम्बई की घटना में सामूहिक शारीरिक शोषण, मानसिक व भावनात्मक शोषण हुआ । उन स्त्रियों व उनके साथ के पुरुषों के आत्म सम्मान को जबर्दस्त चोट पहुँचाई गई । कोई आश्चर्य ना होगा जब ऐसे भुक्त भोगी कन्या भ्रूण को जीना ना देना चाहें । मुझे तो तब भी आश्चर्य नहीं होगा जब वे स्त्रियाँ पुत्रों को भी जन्म देना ना चाहें । इतनी कम उम्र में संसार का इतना विकृत चेहरा देखना और उससे ऊपर उबरना कोई सरल काम न होगा ।

कुछ मित्रों व सखियों ने इन स्त्रियों के वस्त्रों पर आपत्ति उठाते हुए उन्हें अधनंगी होने के कारण अपने पर यह मुसीबत स्वयं बुलाने का जिम्मेदार ठहराया है । कुछ ने रात के उस समय घर या होटल से बाहर निकलने को गलत बताया है । कुछ ने आधुनिक, पाश्चात्य सभ्यता को इसका कारण माना है । ये सब मिथक हैं व इन्हें हम केवल अपने आप, अपने समाज, अपने देश, प्रदेश को निर्दोष ही नहीं निष्पाप साबित करने के लिए उपयोग करते हैं ।

जहाँ तक अनुचित वस्त्रों की बात है तो हमारी साड़ियाँ व छोटे से ब्लाउज भी इस लिहाज से कोई बहुत सही नहीं हैं । यदि वस्त्रों के कारण ऐसा होता तो शकुन्तला व उसकी सखियों को तो जब तब ऐसी घटनाओं से गुजरना पड़ता । क्या आज तक किसी साड़ी, सलवार कमीज या बुर्के वाली का बलात्कार नहीं हुआ ? गाँवों में जिन स्त्रियों को डाकिन, चुड़ेल, डायन आदि कहकर सारे गाँव में पीटते हुए नंगा घुमाया जाता है, जिनका सिर मुँडवा दिया जाता है, क्या वे पाश्चात्य कपड़े पहनती हैं । भारत के विभाजन के समय व अलग अलग दंगों में जिन स्त्रियों के साथ बलात्कार हुआ क्या वे अधनंगी घूम रही थीं ?

जहाँ तक समय की बात है तो बहुत से भारतीय त्यौहार, आदिवासी नृत्य आदि भी रात के समय ही मनाए जाते हैं । क्या किसी ने दिन में होते गर्बे की बात सुनी है ? तो क्या इन सब में भाग लेती स्त्रियों के साथ भी यही सब किया जाएगा ?

जो हर बुरी बात में पाश्चात्य सभ्यता का रोना लेकर बैठ जाते हैं उनसे अनुरोध है कि वे वहीं रुक जाएँ जहाँ वे विदेशियों के आगमन से पहले थे । ना पाश्चात्य दवाई खाएँ, ना पाश्चात्य वाहनों, जैसे बसों, कारों आदि में बैठें ।

क्या यह सब करने से क्या हमारा समाज आदर्श समाज बन जाएगा ? क्या भारतीय सभ्यता हर बुराई के लिए रामबाण है ? यह वही सभ्यता है जिसमें एक अन्य सभ्यता वाली स्त्री, शूर्पनखा के राम व लक्ष्मण से बारी बारी अपने से विवाह करने के प्रस्ताव भर से उसकी नाक काट दी गई थी । यहाँ दिन रात लड़के / पुरुष लड़कियों / स्त्रियों के सामने ना केवल विवाह जैसे आदरपूर्ण प्रस्ताव अपितु आती क्या खंडाला या फिर कई अन्य धृष्टतापूर्ण प्रस्ताव आए दिन रखते रहते हैं । क्या उन सबकी नाक काट दी जाती है या काट दी जानी चाहिये ? नहीं, आदर्श नारी को तो ऐसे प्रस्ताव पर शरमाकर वहाँ से भाग जाना चाहिये । फिर राम लक्ष्मण ने भी ऐसा ही क्यों नहीं किया ? क्यों ये दोहरे मापदंड बनाए गए हैं ? उस पर तुर्रा यह कि हमारा समाज विश्व में सबसे अच्छा , सबसे अधिक नैतिक , सबसे पुरातन और न जाने क्या क्या है । होगा , अवश्य होगा । परन्तु ऐसी भुक्त भोगी स्त्रियाँ भी क्या यह बात मानेंगी ? जब भी स्त्रियों के बराबरी के मुद्दे उठते हैं तो तोते की तरह आप लाख उन्हें बताएँ कि यह वह देश व संस्कृति है जहाँ "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता:" को मूल मंत्र मानकर चला जाता है, परन्तु क्या कोई इस बात को मानेगा ? शायद मानेगा, परन्तु मानेगी कोई भी नहीं !

सच तो यह है कि हमसे बड़े पाखंडी संसार में कहीं नहीं पाए जाते । स्त्रियों को पूजते हैं और फिर जब मन में आए उसे मूर्ति की तरह तोड़ देते हैं फिर खंडित मूर्ति की तरह उसे फेंक देते हैं । यह वह देश है जहाँ शायद हम अपने बेटों को सिखाते हैं कि नारी केवल एक माँस का टुकड़ा है, एक गुड़िया है, उससे खेलो, उसे नोचो या मुँह में ही डाल लो । या फिर जब मन चाहे उसे जला डालो । ऐसे ही पुरुष हमारे आज और कल हैं, हमारे भाग्य विधाता हैं । शायद हमारे नेता भी हों या बन जाएँ ।
वाह ! "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता:" क्या पूजा की हमने इन मेहमान स्त्रियों की !


इस विषय पर पुरानी पोस्ट्स....
१ ऐसा क्यों होता है http://ghughutibasuti.blogspot.com/2007/09/blog-post_06.html
२ स्त्रियों के मुद्दे पर .. कुछ प्रश्न कुछ उत्तर http://ghughutibasuti.blogspot.com/2007/09/blog-post_07.html


हर समाज की तरह हमारे समाज में भी गुण व अवगुण थे व हैं । समझदारी इसमें है कि गुणों को संभाल कर रखा जाए व अवगुणों को त्याग दिया जाए । यदि किसी और समाज से कुछ गुण मिलते हैं तो उन्हें ग्रहण किया जाए । और जो भी करें या ना करें किसी अन्य के जीवन के साथ खिलवाड़ को किसी भी मूल्य पर बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिये ।
http://१ ऐसा क्यों होता है http://ghughutibasuti.blogspot.com/2007/09/blog-post_06.html

http://२ स्त्रियों के मुद्दे पर .. कुछ प्रश्न कुछ उत्तर http://ghughutibasuti.blogspot.com/2007/09/blog-post_07.html


घुघूती बासूती

Tuesday, October 30, 2007

'हम तो फल हैं'

    क्या आप जानते हैं कि कुछ लोगों के अनुसार इस संसार की लगभग आधी आबादी फल है ? आश्चर्यचकित मत होइये । वैसे मैं हुई थी । सुनकर कुछ अजीब सा लगा । समझ नहीं आया कि ग्लानि हो, अपमानित महसूस     करूँ, गुस्सा होऊँ, उपेक्षा करूँ या हँसू । अब सोचती हूँ कि जब मुझे अपने निठल्लेपन पर गुस्सा आता था, सामने कुछ ठोस करने का कोई रास्ता न होता था तो मैं स्वयं को एक वनस्पति सा महसूस करती थी । ये व्यक्ति तो वनस्पति न कह कर उसका भी एक छोटा सा भाग कह रहे थे ।
    उनके हिसाब से स्त्री एक फल है जिसे कोई भी गपाक से खा सकता है । बस हमारी इतनी ही औकात थी उनकी नजरों में !
    हुआ यूँ कि मैं अचानक टी वी वाले कमरे में आई और ये महाशय दंगों के विषय में बोल रहे थे । मारकाट तो खैर हुई ही, उनसे पूछा गया कि क्या बलात्कार आदि भी हुए थे ? वे बोले अब यदि सामने फल पड़ा हो तो आदमी खा ही लेगा ! पूछा गया कि क्या तुमने भी खाया ? बोले हाँ, हमने भी एक खाया ।
    अब कहने को क्या बचता है सिवाय इसके ...
    जहाँ नारी को पूजा जाता है वहाँ भगवान बसते हैं । जहाँ इन भगवानों को खाने को नारी रूपी फल चढ़ाये जाते हों वहाँ कौन बसता है ?

घुघूती बासूती

 

 


पुनश्च
    ये प्रश्न केवल गुजरात के संदर्भ में नहीं पूछ रही, हर दंगाई चाहे वह दंगे धर्म, आस्था, राजनीतिक कारणों, समाज में परिवर्तन लाने, अलग राज्य या देश या स्वतंत्रता पाने के लिए हों, के संदर्भ में पूछ रही हूँ । मेरा सभी पाठकों से निवेदन है कि यदि इस नजरिये पर सार्थक चर्चा कर सकते हैं तो कृपया अवश्य कीजिये । यदि यह एक राज्य को गाली देने का मंच बनाना चाहते हैं तो ऐसा न कीजिये । सजा दोषियों को देनी चाहिये, भर्त्सना दोषियों की होनी चाहिये और न्याय की माँग होनी चाहिये चाहे अन्याय कहीं भी हुआ हो, किसी ने भी किया हो ।

घुघूती बासूती

Tuesday, September 11, 2007

थक गयी है सीता

 

 

थक गई हूँ
थक गई हूँ सीता बन अग्नि परीक्षा देते देते
थक गई हूँ मैं सती सावित्री बन जीते जीते ।
कितना भागी यम के पीछे
सत्यवान को छुड़ाने के लिए

कितना गिड़गिड़ाई सत्यवान
को वापिस लाने के लिए ।
थक गई हूँ कर हर पल राम का अनुसरण
कुछ पल डगर मुझे अपनी चुनने दीजिये ।
कितना तड़पी इक युग भर
शापित अहिल्या शिला बनकर

कितनी प्रतीक्षा की राम की
पत्थर बनी उसकी डगर पर ।
थक गई हूँ शापित शकुन्तला बनकर
अब कुछ पल श्राप मुझे देने दीजिये ।
थक गई हूँ मन्दिरों में मूर्ति बन

कुछ पल पूजा तुम मेरी छोड़िये
थक गई हूँ रिश्तों के बोझ ढोकर
कुछ पल बेलगाम मुझे छोड़िये ।
थक गई हूँ पूज्या बनकर जीते जीते
अब केवल व्यक्ति मुझे बनने दीजिये ।

माँ, बहन, बेटी ,पत्नी ,सखी और प्रेयसी
कितने रूप में जग में जानी गई हूँ मैं
किन्तु हर रूप में रह गई कुछ प्यास सी
पाया बहुत कुछ पर खो गई खुद ही मैं ।
थक गई हूँ हर समय जीकर

औरों के लिए
अब कुछ पल स्वयं के लिए भी जीने दीजिये ।

- घुघूती बासूती

Friday, September 07, 2007

स्त्रियों के मुद्दे पर : कुछ उत्तर, कुछ और प्रश्न !

 

 [ ललित जी को भी उत्तर दिये जाएँगे धीरे धीरे ! बात निकली है तो दूर तलक जायेगी। 

यह मेरा काफी समय पहले लिखा लेख है । शायद काफी लोगों को स्त्री के स्त्री का शत्रु होने का रहस्य या कहें कारण , यहाँ मिल जाएँगे । ]

       हमने व हमारे समाज ने क्या गलतियाँ की हैं और क्या गलतियाँ अभी भी करे जा रहे हैं इसका कुछ कुछ परिणाम तो हमें वर्तमान में देखने को मिल रहा है, किन्तु भविष्य इन परिणामों को बहुत विकराल रूप में हमारे सामने प्रस्तुत करेगा । जब तक यह परिणाम हमारे इस मूल रूप से अन्धे समाज को भी दिखने लगेगें, तब तक बहुत नहीं तो काफी देर हो चुकी होगी । समस्याएँ बहुत हैं व अधिकतर हमारी अपनी बनाई हुई ही हैं ।

     इस  समय मैं भारतीय समाज में स्त्रियों के स्थान , भ्रान्तियों व उनसे उत्पन्न होने वाली हानियों कि चर्चा कर रही हूँ । आज तक इन सबसे मुख्य व प्रत्यक्ष रूप से केवल स्त्रियों को हानि होती थी । अतः हमारा समाज , जो कि मुख्य रूप से पुरुषों के लिए ही बना है, जहाँ का धर्म, संस्कृति , कायदे कानून, सब कुछ पुरुषों के हितों को ही ध्यान में रखकर बनाए गए हैं , चैन की नींद सो सकता था व अपने घर का कचरा कालीन के नीचे दबा सकता था । यहाँ यह भी कह दूँ कि केवल भारत या एक धर्म या समाज ही नहीं सब धर्म, संस्कृति, कायदे कानून, पुरुष के हितों को देखकर बने हैं । किन्तु आज हानि व हमला पुरुष के हितों , सुख चैन, सुविधाओं पर है । उसका व उसके समाज का अस्तित्व ही खतरे में है । स्त्रियों का तो खतरे में है ही , किन्तु वह बहुत ही सूक्ष्म बात है, पुरुष व पुरुष के अस्तित्व के सामने । सो हो सकता है, पुरुषों के साथ साथ वे अन्धी स्त्रियाँ भी , जो स्त्री के अस्तित्व, उसके आदर व उसके जीवन के महत्व को नहीं मानती, वे भी जाग जाएँ क्योंकि आखिर उनके लाड़ले बेटों का भविष्य दाँव पर लग गया है ।

    हमारा इतिहास गवाह है कि स्त्री पर जब भी , जैसे भी हो सकता था, अत्याचार किया गया । कुछ पुरुषों ने किया, कुछ स्वयं शक्ति चखने के लिए एक स्त्री ने दूसरी पर किया । यह शक्ति परीक्षण वह पुरुष पर तो कर नहीं सकती हैं ,अतः जैसे ही परिवार में उसकी स्थिति कुछ सुदृढ़ होती थी, तो वह परिवार में नई आई सदस्याओं पर कुछ रैगिंग की तर्ज पर यह शक्ति परीक्षण करती हैं । बार बार पुरुष यह कह कर कि स्त्री ही स्त्री की सबसे बड़ी शत्रु है , अपना पल्ला झाड़ लेता है । किन्तु जब आपके बच्चे की रैगिंग में टाँग टूट जाए या जान चली जाए, तो आप महाविद्यालय प्रशासन को यह कह कर कि विद्यार्थी ही विद्यार्थी का सबसे बड़ा शत्रु है बरी तो नहीं कर देते । तो फिर परिवार में हुए अत्याचार से स्वयं को परिवार का मुखिया होने के नाते कैसे बरी कर लेते हो ?

    स्त्री को घर से निकाला गया , जलाया गया, मारा गया, मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया । उसे वश में रखने के लिए कभी उसे कुछ लालच दिया गया तो कभी उससे कुछ सुविधाएँ छीन ली गईं । लालच के रूप में सुन्दर रंग बिरंगे वस्त्र , आभूषण , रंगीन सौभाग्य चिन्ह व सब प्रकार का भोजन ग्रहण करने का अधिकार । दंडित करने व लाइन में रखने के लिए यही सब सुवधाएँ उससे छीन ली जाती थीं । उसे बताया जाता था कि ये सब सुख उसे तभी तक प्राप्य हैं जब तक वह अपने जीवन के आधार, अपने स्वामी, अपने पति को जीवित व प्रसन्न रख पाएगी । ये सब निर्जला व्रत उपवास इसी भय की देन हैं । वह पति व अपनी सुविधाओं व बहुत बार अपने जीने के अधिकार को बचाने के लिए भौतिक रूप से जो बन पड़ता था करती थी । किन्तु अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखने के लिए पति का जीवन कैसे भी बचाना अनिवार्य था । सो भौतिक रूप से सब कुछ करने के बाद वह अन्ध श्रद्धा की शरण लेती थी ।

      विश्वास न हो ऐसी स्थिति की कल्पना करिये जहाँ आपका जीवन एक पतली डोर से लटका हुआ हो, जीवित जलाए जाने की तलवार आपके सिर पर लटक रही हो । उदाहरण के लिए यदि आपका जीवन किसी ऐसी शक्ति के हाथ में हो जो बहुत शक्तिशाली, क्रूर , अविवेकी व तर्कविहीन हो, लकीर की फकीर हो , जिस पर किसी न्याय की गुहार का कोई प्रभाव न पड़ता हो । वह शक्ति या व्यक्ति आप से कहे कि जब तक आप के सिर पर बाल हैं आप जीवित रहेंगे और जिस दिन ये बाल झड़े, आपको जीवित चिता के हवाले कर दिया जाएगा । अब आपके लिए ये बाल प्राणों से भी अधिक प्रिय होंगे । आप एक बार खाना भूल जाएँगे किन्तु बालों की साज संवार , सफाई, व स्वास्थ्य के विषय में कभी नहीं भूलेंगे । वे बाल आपकी जान हैं, धर्म हैं , या ये कहें कि वे ही आपका जीवन हैं । अब आप जब सब तरह से उनकी रक्षा करते नहीं थकते और फिर भी देखते हैं कि समय असमय आपके मित्रों , भाइयों, चाचा , ताऊओं के बाल झड़ ही जाते हैं और ऐसा होने पर उन्हें घसीट कर चिता पर रख दिया जाता है । उनकी चीखें आपके कानों के परदों को फाड़कर आपके अन्तर्मन तक को दहला जाती हैं । सोते जागते, खाते पीते ये चीखें आपका साथ नहीं छोड़ती । तब आप आध्यात्म, अलौकिक , दैवीय, अतिमानवीय शक्तियों का भी सहारा लेने लगते हैं । आपने देखा था कि दो मित्रो के बाल तब झड़ गए जब उन्होंने खाली पेट चाय पी थी या दो और के तब जब उन्होंने अपने बालों से तंग आकर उन्हें गाली दी थी । सो अब आप खाली पेट चाय पीना छोड़ देते हैं, बालों को कभी भूले से भी गाली नहीं देते हैं । यदि कोई सुझा दे कि गले में यह हरे मोती का धागा डाल लो तो बाल अधिक समय तक टिकते हैं, सो आप वह भी कर लेते हैं । यदि कहें कि बुधवार को दाढ़ी न बनाने से बाल सुरक्षित रहते हैं तो क्या आप केवल दाढ़ी बनाने के सुख के लिए जीते जी चिता में डाले जाने का खतरा , भय, आशंका मोल लेंगे ? सो अब आप चाहेंगे कि आशीर्वाद में भी यदि कोई आपको बालवान या बालवता कहे तो बेहतर है क्योंकि आपका चिरंजीवी होना तो उनके होने पर निर्भर है । आप प्राण जाएँ पर बाल न जाएँ में पूर्ण विश्वास करेंगे । सो इसको कहते हैं कंडिशनिंग ! अब न केवल आपके चेतन मन को बालों से मोह है अपितु आपका अवचेतन मन भी बालों के प्रति मोहित है । सो अब समाज कहता है कि बालों को इतना प्रेम करना, उनका ध्यान रखना, उन्हें जान से अधिक चाहना आपका स्वभाव है । यही आपके संस्कार हैं, यही आपका धर्म है, यही आपके देश की संस्कृति है ।      बिल्कुल सही है । जिन बालों के रहते आप पलंग पर सो सकते हैं , भांति भांति के व्यंजन खा सकते हैं, रंग बिरंगे कपड़े पहन सकते हैं , सबसे बड़ी बात कि जी सकते हैं, उन बालों पर आप क्यों न बलिहारी जाएँगे । यह तो है इस जन्म की बात !

घुघूती बासूती

चर्चा चालू है । अभी नया लिखने की स्थिति में नहीं हूँ । शीघ्र ही इस विषय पर और लिखूँगी ।