Saturday, February 14, 2009

हम कहाँ जा रहे हैं ?

हम कहाँ जा रहे हैं ?
जिंद में एक लड़की को बाल पकड़कर गोल गोल घुमाया गया। चौकी इनचार्ज केवल संस्पेंड। मुझे अपनी बेटी से कहना पड़ता था कि बेटा जब ट्रेन यात्रा करती हो तो साथ में शादी का प्रमाणपत्र लेकर जाया करो। यह है मेरा भारत महान! सन ७७ में जब मैं ऐसा कोई सबूत लेकर नहीं चलती थी तो आज अपनी बेटी को यह सलाह देती हूँ। क्यों, क्योंकि हम बढ़ रहे हैं तेजी से १४वीं शताब्दी की ओर! संसार, देखते जाओ! भारत बढ़ रहा है तेजी से सबको पीछे छोड़ता हुआ।

मुझे याद है कि हमारे समय में भी हम लड़कियाँ अपने सहपाठियों के घर जाती थीं। दरवाजा खुला होता था। शायद तब संस्कृति के ठेकेदार पड़ोसी नहीं थे। अतः कोई बाहर से दरवाजा बन्द नहीं करता था। अन्यथा यह हम में से किसी के साथ भी हो सकता था।

मैं नहीं जानती कि वह लड़की अपने सहपाठी के साथ क्या आपराधिक कृत्य कर रही थी। परन्तु हत्यारे को भी, जब वह हमारे जीवन पर खतरा ना हो, हम पीट नहीं सकते, केवल कानून के हवाले कर सकते हैं और आशा कर सकते हैं कि वह उसे सजा दे तो क्या उस लड़की का अपराध हत्या से भी बड़ा था? हो सकता है कि बहुत से लोगों को लड़के लड़कियाँ का आपस में बात करना भी गलत लगता हो। ऐसे में उन लोगों के पास पूरा अधिकार है कि वे स्वयं को विपरीत लिंग से बचाकर रखें। यदि कोई उनपर दबाव डालेगा कि वे बातचीत करें, दोस्ती करें तो वह भी गलत होगा।

आजतक हम स्कूली बच्चों को नैतिक ज्ञान , मोरल साइंस पढ़ाते थे, सेक्स एजुकेशन की बात करते थे। अब समय आ गया है कि बच्चों को संविधान द्वारा दिए गए अन्य लोगों के अधिकारों के बारे में पढ़ाएँ। जैसे एम बी ए आदि में केस स्टडीज़ पढ़ाई जाती हैं, उनपर लेख लिखने को कहा जाता है उसी तरह से अन्य लोगों के व्यक्तिगत अधिकारों का हनन करने वाले लोगों को क्या सजा दी जाती है, पढ़ाया जाए, उन्हें काल्पनिक या सत्य मामलों पर क्या किया जाना चाहिए, कैसे और क्या न्याय दिया जाना चाहिए आदि पर विचार करने को प्रेरित किया जाना चाहिए।

मानवाधिकार हनन, किसी की निजी स्वतन्त्रता का हनन हत्या से भी बड़ा अपराध है। हत्यारा किसी एक या दो का जीवन समाप्त करता है परन्तु निजी स्वतन्त्रता का हनन करने वाले तो जीवन को जीने योग्य ही नहीं रहने देते। जब निजी अधिकार ही नहीं रहेंगे तो जीवन का हम करेंगे भी क्या सिवाय एक बोझ की तरह ढोने के ? जी तो तिलचच्टे भी लेते हैं। पशुओं में ही शक्तिशाली का पूरे समूह पर शासन होता है। क्या यही स्थिति हम मनुष्यों में लाना चाहते हैं? स्त्रियों के नौकरी करने, बिन ब्याही माँ बनने से तो अपने परिवारों, समाज के नष्ट होने का भय हमें हो रहा है, परन्तु हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि यदि निजी अधिकार रहे तो हम अपने बच्चों को बचपन में अपने जीवन मूल्य सिखा सकते हैं और यदि सफल रहे तो इन मूल्यों को बचाने की आशा कर सकते हैं परन्तु यदि समाज में ऐसा कट्टरपन आ गया तो वह समय दूर नहीं जब अपने मूल्य सिखाने का कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा क्योंकि हमें, हमारे बच्चों को इन कट्टरपंथियों के मूल्यों के अनुसार खाना, पीना, रहना, पढ़ना या न पढ़ना, जीना होगा। मुझे नहीं लगता की ऐसे समाज में नई पीढ़ी को लाना एक खुशी मनाने का अवसर रह जाएगा। वह केवल और केवल एक अन्य मानव को पशु से भी बदतर जीवन जीने को मजबूर करना ही होगा। हमारे बच्चे दुखी होंगे कि वे पैदा ही क्यों हुए, वह भी तब जब उनमें कुछ सोचने की शक्ति रह जाएगी। हो सकता है वे भी कट्टरपंथियों की तरह हमारे ही सिर पर डंडा लेकर खड़े हो जाएँ, हमारी शिकायत हमारे उन आकाओं से करें कि हम घर में उनके आदेशानुसार नहीं जी रहे। जरा कल्पना कीजिए। कल्पना करने में कोई हानि नहीं है। यदि मैं आज से छह वर्ष पहले ही आने वाले समय की कल्पना कर बेटी से विवाह का प्रमाण पत्र लेकर चलने को कहती थी, इसलिए नहीं कि मुझे उसके किसी पुरुष के साथ चलने पर आपत्ति थी अपितु इसलिए कि मैं आने वाले खतरे के कदमों की आहट सुन पा रही थी। बेहतर होगा कि हम अपने पिता, भाई, चाचा, मामा आदि से अपने खून के रिश्ते का प्रमाणपत्र भी फोटो सहित लेकर घूमें। हो सके तो डी एन ए टेस्टिंग की रिपोर्ट व माता पिता के विवाह का प्रमाणपत्र भी साथ लेकर चलें। अन्यथा ऐसा ना हो कि उज्जैन या किसी भी अन्य शहर की तरह हमारे शहर के लोग भी हमें भाई के साथ कहीं जाने पर पीट डालें, चोटी से पकड़कर घुमा डालें। इससे पहले कि हममें से किसी को अश्विनी बनकर अपने साथ हुए घोर अन्याय की पीड़ा से छुटकारा पाने को गले में फाँसी का फंदा डालना पड़े या तो ऐसे अन्यायों के विरुद्ध हमें बोलना होगा या फिर प्रमाणपत्र आदि से लैस होकर सड़कों पर चलना होगा या किसी के घर जाना होगा। बेहतर व अधिक सुरक्षित तो यह होगा कि घर से बाहर ही ना जाएँ, पुत्रियों को जन्म ही न दें, यदि दुर्भाग्य से दे दें तो उन्हें घर में ही रखें।

जिन्हें यह चिन्ता हो रही है कि आँकड़े बताते हैं कि स्त्रियों को स्वतन्त्रता मिलने के बाद अमेरिका में विवाह के बाहर बच्चों के जन्म में वृद्धि हुई है वे साऊदी अरब या ऐसे ही किसी देश के आँकड़ों पर भी नजर डालें। वहाँ यह संख्या शून्य है। फिर हम वहाँ के कानून यहाँ लागू क्यों नहीं कर देते? वहाँ अपराध भी बहुत कम है। वहाँ यह नहीं होता कि कोई स्त्री तो राष्ट्रपति बन जाती है, कोई प्रधानमंत्री, कोई मुख्यमंत्री तो कोई किसी अन्य धर्म के पुरुष के साथ बात करने, यात्रा करने या प्रेम करने के अपराध में बस से घसीटी जाती हो, कोई किसी लड़के मित्र के घर में बाहर से बन्द कर दी जाती हो, फिर पुलिस द्वारा चोटी से पकड़कर चकरघन्नी की तरह घुमाई जाती हो। वहाँ राजकुमारी को भी उन अपराधों के लिए मृत्युदंड दिया जाता है जिनके लिए एक आम स्त्री को। वहाँ कोई लड़की राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री , मुख्यमंत्री बनने के सवप्न सजाने का दुस्साहस नहीं करती होगी। यहाँ हम पहले अपनी बेटियों को समानता, आकाश छूने के स्वप्न दिखाते हैं और यदि वह हमारे या समाज के अपेक्षित नहीं चलती तो या तो उनकी हत्या हम स्वयं अपने कथित सम्मान की रक्षा के लिए कर देते हें या हमारे संस्कृति के रक्षक उन्हें प्रताड़ित कर मृत्यु को गले लगाने को बाध्य कर देते हैं। ये घटनाएं अपने आप में अपवाद हो सकती हैं, परन्तु यदि नहीं रोकी गईं तो ये आम हो जाएँगी और तब हमें अपनी बेटियों की भ्रूण हत्या करना एक बेहतर और दयालु समाधान लगेगा।

तब तक,
चलिए हम पिंक चड्ढी वालों के विरोध के तरीके का विरोध करें। क्योंकि उनका तरीका संस्कृति के रक्षकों से अधिक खतरनाक है। हम यह ना देखें कि वे अपने वस्त्र उतारकर देने को नहीं कह रहीं, बाजार से नई या फिर अपनी अलमारी से पुरानी भेजने को कह रही हैं।(अब यदि उस ही ब्लॉग में कोई कुछ अधिक कह रहा है तो क्या किया जा सकता है? यदि वे ऐसी टिप्पणियों को नहीं छापती तो कहा जाएगा कि विरोध के स्वर वे सह नहीं सकतीं।) हमें बाध्य भी नहीं कर रहीं ऐसा करने को। वे जो कर रही हैं उसका अर्थ हम नहीं समझेंगे। वे इसे क्यों कर रही हैं यह समझने में सोचना पड़ता है, उन्हें समझना पड़ता है, उनके स्थान पर स्वयं को रखकर देखना पड़ता है। यह सोचना पड़ता है कि यदि मैं युवा होती, स्त्री होती तो ये सब परिस्थितियाँ मुझे कैसी लगतीं। वे केवल और केवल एक काम कर रही हैं, इस हास्यास्पद तरीके से कट्टरपंथियों को हास्यास्पद बना रही हैं। हाँ, शायद उन्होंने जानबूझकर इसे ऐसा बनाया ताकि लोगों का ध्यान आकर्शित कर सकें। (बहुत से लोगों ने कट्टरता के विरोध में लिखा, शायद शालीनता से ही लिखा था, मैंने भी लिखा था, परन्तु उसका कितना प्रभाव पड़ा। यह तरीका जैसा भी था ना हिंसक था ना जबर्दस्ती थी। हमें सही लगे तो ठीक न लगे तो ठीक। ) परन्तु नहीं, वे अधिक खतरनाक हैं। आओ, अपनी बेटियों की उनसे रक्षा करें, न कि उनसे जो उन्हें किसी भी क्षण पकड़कर पीट सकते हैं, चोटी से पकड़कर घुमा सकते हैं। वह तो एक बहुत ही मामूली सा अपराध होगा। पब में जाना आवश्यक तो नहीं है, किसी विशेषकर अन्य जाति धर्म के पुरुष से प्रेम करना आवश्यक तो नहीं है, किसी सहपाठी से पुस्तक लेने (या हो सकता है कि वह बतियाने गई हो या प्रेम की पींग चढ़ाने)आवश्यक तो नहीं है। शराब पीने को कोई भी बहुत अच्छा तो नहीं कहेगा, बहुत सी अन्य वस्तुएँ, काम, व्यवहार, यहाँ तक कि परम्पराएँ भी गलत होती हैं। हमें ना भी लगें तो किसी अन्य को लग सकती हैं। हमें जो गलत लगता है वह अपने बच्चों को बाल्यावस्था में ठीक से समझा सकते हैं। अपने मूल्य उन्हें सिखा सकते हैं। जब वे वयस्क हो जाएँगे तो वे इतने समझदार हो चुके होंगे कि अपने निर्णय स्वयं ले सकेंगे। या हम यह मानकर चल रहे हैं कि भारतीय युवा कभी वयस्क माने जाने लायक बुद्धि विकसित नहीं कर पाते? देखते जाइए कल कोई बहुत से अन्य कामों को गलत करार कर देगा। किसी को लड़कियों का लड़कों के साथ चाय पीना भी गलत लग सकता है किसी को लड़कियों का लड़कियों के साथ या अकेले भी चाय पीना गलत लग सकता है। शायद बोतल बंद पानी पीना गलत लग सकता है। शायद उनका पैदा होना ही गलत लग सकता है। हम कहाँ सीमा रेखा खींचेंगे और हम होते कौन हैं किसी का जीवन नियन्त्रित करने वाले? देखते जाइए कल आपको अपने टखने भी दिखाने होंगे जबर्दस्ती दिखाने होंगे।

कोई कह रहा है प्रेम का प्रदर्शन ना करो। घर के अंदर करो। सही है परन्तु घर के अंदर किससे प्रेम करोगे? घर में तो आपके परिवार के लोग रहते हैं,अन्य परिवार, गोत्र (स्त्री पुरुष का प्रेम और विवाह अपने परिवार,गोत्र वाले से तो नहीं हो सकता हमारे समाज व कानून के अनुसार!) के लोग नहीं और यदि किसी अन्य के घर पुस्तक लेने भी जाओगी तो बाहर से दरवाजा बन्द कर दिया जाता है। पार्क में साथ बैठो तो मजनूँ पीटो पुलिस या कोई भी दल पीट देगा, रैस्टॉरैन्ट या पब में बैठने पर भी पिट सकते हो। तब साफ यह क्यों नहीं कहा जाता कि प्रेम मत करो, करो परन्तु उससे जिससे आपके अभिवावक आपका विवाह करें। तो सीधे सीधे यह कहा जा सकता है कि भारत में व्यक्ति को अपनी पसन्द से विवाह करने की अनुमति भले ही हो परन्तु विपरीत लिंग के लोगों के साथ घूमने बात करने की नहीं है। विवाह करने का निर्णय कोई एक दिन में तो लेगा नहीं परन्तु यदि कोई युगल साथ दिखा तो भले मानुष पकड़कर उनका विवाह करवा देंगे। माँग में सिन्दूर भरवा देंगे। तब क्या होगा जब स्त्री सिन्दूर या मंगलसूत्र में विश्वास न करती हो? या उसको विश्वास करने या न करने का अधिकार ही नहीं है? या फिर युवा यदि मिलें तो विक्टोरियन यूरोप की तरह किसी chaparone की तरह घर की किसी वृद्धा को साथ लेकर चलें?

क्या इन युवतियों को इस बात से कोई अन्तर पड़ा होगा कि उन्हें आतंकित करने वाला उनके धर्म के हैं, उनके देशवासी हैं,उनकी संस्कृति के रक्षक हैं? यदि कोई विदेशी या विदेशी संस्कृति वाला यह करता तो क्या अधिक कष्ट होता? शायद कम होता। यदि एक धर्म इतना कट्टरवादी होता जा रहा है तो दूसरा धर्म क्यों पीछे रहे? होड़ लगेगी क्या कि कौन कितना कट्टरवादी हो सकता है, कितना अन्य के जीवन में हस्तक्षेप कर सकता है? जिस संस्कृति की रक्षा की बात हम करते हैं, उस संस्कृति की विशेषता ही उनका उदार होना रहा था। या हम उस संस्कृति को अपना कहना चाह रहे हैं जो विदेशी आक्रमणों के बाद किन्हीं मजबूरियों में अपनाई गईं? हमारी संस्कृति में तो जिस मर्जी भगवान को पूजो, या ना पूजो, भगवान के अस्तित्व को न मानने वाले भी थे। शास्त्रार्थ होते थे। परन्तु वह काम कठिन है जोर जबर्दस्ती सरल व टिकाऊ व सस्ता उपाय है।

यह तर्क दिया जा रहा है कि आज तक तो तुम नहीं बोलीं,जब स्त्रियों को जलाया जाता है, जब कश्मीर में लड़कियों को बुरका पहनने को कहा जाता है,जब दहेज की माँग होती है, जब फतवे दिए जाते हैं, तो आज क्यों बोल रही हो? कल नहीं बोले तो क्या आज अपना बोलने का अधिकार खो दिया? वैसे सही आगाह कर रहे हैं, क्योंकि यदि आज भी नहीं बोले तो भविष्य में बोलने का अधिकार ही छीना जा चुका होगा। इस तर्क के अनुसार तो जब हमने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली तो फिर अंग्रेजों की क्यों नहीं? अग्रेजों को भगाना भी गलत रहा होगा, उनके हमें गुलाम बनाने के अधिकार का हनन था। भगाना था तो पहले मुगलों को भगाते, भूतकाल में जाकर भगाते। सोचने की बात है कि संसार में बहुत कुछ गलत होता है, हम सहमत नहीं होते,हम प्रत्येक गलत को गलत मानते हैं परन्तु जब हमारे अपने अधिकारों का हनन होता है या हमारे जीने के तरीके पर आक्रमण होता है तो हम अधिक खुल कर बोलते हैं। कोई किसी अन्य के ब्लॉग पर जाकर गाली देता है, हम उसे गलत मानते हैं, हो सकता है लिख भी दें कि यह गलत है परन्तु जब कोई हमारे ब्लॉग पर आकर गाली देता है तो हम उसका अधिक मुखर होकर विरोध करते हूँ,अधिक आहत होते हैं। यह स्वाभाविक है। क्या जब अध्यापक अपनी माँगों के लिए जलूस निकालते हैं,धरना देते हैं तो बैंक कर्मचारी भी धरने पर आ बैठते हैं? तो क्या जब वे अपनी किसी माँग के लिए धरना दें तो हम कहेंगे कि जब अध्यापकों के अधिकारों की लड़ाई हो रही थी तब आप चुप थे सो अब भी चुप बैठिए। अब क्यों नारे लगा रहे हो?

हम सहमत होएँ असहमत होएँ यह हमारा अपना अधिकार है। सब नया सही नहीं, सब पुराना भी सही नहीं। हमें अपने मूल्य स्वयं बनाने होंगे। सबका दृष्टिकोण अलग होता है। यही तो मानव व मानव में अन्तर है। प्रत्येक बरगद के पेड़ की आवश्यकता एक होती है,प्रत्येक हिरण की आवश्यकता एक होती है। उनमें दृष्टिकोण नामक वस्तु शायद ही पाई जाती है। परन्तु मानव के पास अपना दृष्टिकोण होता है। हमें एक दूसरे के दृष्टिकोण का आदर करना व उन्हें उन्हें मानने के अधिकार का आदर करना होगा ही। अन्यथा हम तो रहेंगे परन्तु हमारा दृष्टिकोण रखने का अधिकार नहीं। और वह दिन ऐसा होगा कि हम उसकी यदि कल्पना करें तो हमारा हृदय दहल जाएगा। हमारी अपनी वंश बेल को बनाए रखने की प्रकृति प्रदत्त इच्छा भी सिहर जाएगी। अपनी संतानों को ऐसा जीवन देने से पहले हम बार बार सोचेंगे। मुझसे असहमत होइए, आपका स्वागत है, परन्तु जरा उस भयंकर संसार की कल्पना भी कीजिए। बस एक बार फिर अपने पिछले लेख की तरह यहाँ भी लिखूँगी कि जब कट्टरवाद आएगा तो केवल लड़कियों को, स्त्रियों को, युवाओं को ही अपने चंगुल में नहीं लेगा एक दिन अच्छे बड़े बुजुर्गों को भी अपनी चपेट में ले लेगा। सोचिए हम कहाँ जा रहे हैं? हाँ लगे हाथ अपने बच्चों को कुछ जीवन मूल्य भी सिखा दें।

घुघूती बासती

34 comments:

  1. सच कहूं तो आज श्रीमती इंदिरा गांधी की याद आती है। उनके होते कैसे छुपते-फिरते the ये तथाकथित राष्ट्रवादी।

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  2. कट्टरवाद समाज के लिए घातक रहेगा. आपके विस्तृत आलेख के लिए आभार.

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  3. देखा नही आज सब अपनी मांद से निकल आये है ओर आज सब आपकी हाँ में हाँ मिलायेगे ओर कुछ दुःख भरी बात कहकर निकल जायेगे ..चूँकि कल जो भी खेल हुआ सब चर्चा पाने के लिए हुआ था (ऐसा उन महिला ब्लोगर का कहना है जो अपने ब्लॉग पे किसी अखबार में उनके द्वारा की गई चर्चा का विज्ञापन लगा देते है .)
    वैसे अगर चड्डी के बदले वे किसी भी तरीके से virodh करती तो कही शोर नही मचता .मै तो इसे भी अच्छा मानता हूँ की कम से कम इस बहाने लोग भी मांद में घुसे .

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  4. आप के चरण छूने का मन कर रहा है आज, आप ने जो लिखा है। लंबा होने के कारण लोग भले ही इसे न पढ़ें। पर यह पिछले सप्ताह भर से चल रही बकवास का तार्किक उत्तर है। कई सुधी लोग भी इस हवा में बह गए थे। कुछ को टोकने पर उन्हों ने अपने को रोका भी। मैं उन का आभारी हूँ। मैं भी इस पर तार्किक और कड़ुआ लिख सकता था। लिखना चाहता भी था। पर चाहता था। कोई तार्किक आलेख किसी महिला का ही आए।
    मेरी आशा पूरी हुई। आप का यह आलेख बहुत दिनों तक स्मरण रहेगा। आप को शत शत बधाइयाँ।

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  5. बहुत बढ़िया सामयिक लेख !

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  6. हर कोई हर बात अपनी समय से कहता हैं आपने अपना समय लिया और कही . अच्छा किया चुप रह कर खून जलाने से बेहतर हैं की खुल कर कह दे क्युकी अगर अब भी हमारी और आप की पीढी की नारियों ने चुप्पी साधे रखी तो आगे आने वाली लडकियां शायद हमे ना माफ़ करे .
    तर्क उनकी समझ मे आता हैं जो तर्क करना चाहते हैं यहाँ तो सर और सिर्फ़ विद्रोह की बात होती हैं . नयी पीढी को विद्रोही कहते हैं जबकि ज्यादा विद्रोह पुरानी पीढी का होता हैं . अरे विद्रोह करे पर ये तो फैसला करे आप विद्रोह कर किस चीज़ का रहे हैं

    प्यार का ? वैलेंटाइन दे पर प्यार के इजहार का ?

    आई पिल का ? फ्री सेक्स का ? अबोर्शन का ? या नारी के पास उपलब्ध इन सुविधाओ का जिन से वो अपने को तकलीफ से बच्चा सकती हैं ?

    लड़के लड़की की मित्रता का ? लड़की की जुरर्त की लड़के से मित्रता की ??

    इंग्लिश का ? या विदेशी भाषा का ?? या विदेशी कपड़ो का ? या सिर्फ़ लड़की के विदेशी कपडे पहने का ??

    क्या हैं मुद्दा विद्रोह का जो भारतीये संस्कृति रसातल मे जाती हुई लगती हैं ??

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  7. bahut hi accha likha hai....sahi main dinesh jee ki tarah muje bhi aapke charan choone ka man kar raha hai..

    ek ek baat ko aapne bilkul sahi andaaz main aur bilkul sahi nazariye se likha hai....

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  8. bahut hi achha likha hai.....agar ho sake to is lekh ko published karaane ke liye awashya den....

    ma sraswati ka ashriwaad aapke saath ho

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  9. घुघूतीजी,
    सच में आपकी पोस्ट की अनुपस्थिति महसूस हो रही थी। इस विषय पर मैं भी बहुत कुछ लिखना चाहता था लेकिन आपने मेरे मन की बात कह दी।

    एक किस्सा याद आ रहा है। जब मैं कक्षा ८ में था मेरी बडी बहन १०वी कक्षा में थी। वो सुबह ६ बजे एक ट्यूशन पढने जाती थीं, कुछ दिन के बाद हमारी पडौसनों ने हमारी माताजी से कहा कि इतनी सुबह लडकी अकेले जाती है। अच्छा हो कि अगर पिताजी अथवा छोटा भाई ही साथ ट्यूशन सेटर तक छोडने चला जाये। लेकिन माताजी के कान पर जूँ न रेंगी और बहन अकेले ही ट्यूशन पढने जाती रही। कुछ महीनों बाद सर्दियाँ आने लगी और सुबह छ: बजे बहुत अंधेरा रहने लगा। एक दिन बहन ने खुद कहा कि मम्मी सुबह बहुत सूनसान होता है और कभी कभी डर लगता है। माताजी ने अगले दिन से हमारी ड्यूटी लगा दी कि दीदी के साथ साथ सुबह साईकिल चलाकर साथ जाना। मैने कहा कि इतने दिन तो अकेली जाती रही है अब मेरा नम्बर क्यों तो माताजी ने जो कहा वो आजतक याद है। उन्होने कहा कि ये मत सोचना कि पडौसनों की वजह से तुम्हे भेज रहे हैं, बल्कि इसलिये कि दीदी को कभी कभी सूनसान में डर लगता है इसलिये तुम साथ में जा रहे हो। उसके बाद मैं दीदी के साथ जाता और जैसे ही हल्का उजाला होने लगता दीदी से कहता अब तुम खुद संभालो और साईकिल पलटकर वापिस भाग आता।

    सम्भवत: पडौसन खुश भी हो गयी हों लेकिन माताजी का मेरी बहन और मेरे सामने कारण स्पष्ट करने का मेरे मन पर बहुत गहरा असर हुआ।

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  10. एक अति आवश्यक एवं विचारणीय आलेख. पिछले कुछ दिनों की घटनाऐं देखते हुए इस तरह के विस्तृत आलेख की दरकार थी. आपका बहुत आभार.

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  11. Apaka dhanyvaad,

    bahut zaroori lekh,

    par kya kuch aur bhee kar payenge ham?

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  12. चिट्ठाजगत की सौम्य ,सन्तुलित और तार्किक आवाज ।

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  13. सराहनीय लेख!

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  14. dineshrai dwivediji ne sahi aaklan kiya hai aapke lekh ka. Marg-darshak lekh hai.

    my feelings on valentine day:-
    Saturday, 14 February, 2009
    वेलेंटाइन डे
    तितलियों के मौसम में चद्दियां उड़ाई है,
    कौन आज गर्वित है,किसको शर्म आयी है?

    घात इतनी 'अन्दर'तक किसने ये लगायी है?
    संस्कारो की अपने धज्जियां उड़ाई है।

    रस्म ये नही अपनी,फ़िर भी दिल तो जुड़ते है,
    रिश्ता तौड़ने वालों कैसी ये लड़ाई है!

    दिल-जलो की बातों पर किस से दुशमनी कर ली!
    ये बहुएं कुल की है, कल के ये जमाई है।

    चद्दियां जो आई है,ये संदेश है उसमे,
    लाज रखना बहना की, आप उनके भाई है।

    प्यार के हो दिन सारे, ये मैरी तमन्ना है,
    वर्ष के हर एक दिन की आपको बधाई है।

    -मन्सूर अली हाशमी
    http://mansooralihashmi.blogspot.com





    प्रस्तुतकर्ता Mansoor Ali पर 9:31 AM इस संदेश के लिए लिंक
    7 टिप्पणियाँ
    Friday, 13 February, 2009
    आश्वासन [दिलासा]
    'बात झूठी है'; ये सच्चाई तो है,
    बोल पाना 'यहीं' अच्छाई तो है।

    क़द न बढ़ पाया; कि अवसर न मिले,
    मुझसे लम्बी मैरी परछाई तो है।

    दौरे मन्दी में थमी है रफ़्तार,
    एक बढ़ती हुई महंगाई तो है।

    कौन है;क्या है? कुछ पता न चला!
    हम किसी चीज़ की परछाई तो है।

    ख़ुद-फ़रेबों* की नही भीड़ तो क्या,
    'मौसमे प्यार'* में तन्हाई तो है।

    *ख़ुद फ़रेब = स्वय को धोका देने वाला, * मौसमे-प्यार = valentine day

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  15. दो टुकड़ों में लिखा गया आपका आलेख एक ही बार में पूरा पढ़ गया। एक ही सांस में पढ़ने की तरह। पिछले कुछ दिनों से इसी विषय या इन्हीं विषयों पर लिखी जा रही बातों को पढ़ रहा था और खीज भी रहा था। एक-दो बातों को छोड़ दें तो आपकी हर बात इतने तकॆपूणॆ ढंग से कही गई है कि सहमति व्यक्त करने पर मजबूर करती है। इसे कहते हैं..सिफॆ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं..।

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  16. Anonymous12:28 pm

    nihayat hi afsos ki baat hai ki drivedi jaise blogar jo umr me varisht hai ,niji sambandho ke karan kisi bahs ka thek aor galat hone kapaimana rakhte hai .ve shastri jaise blogar ki han me han milate hai aor doosre bloggar jaise ki p.d (prshant )ko us bahs me padne se rokte hai ya kisi dosre blogar ko.ajeb bat hai inhi drivedi ji ko mahila samarthak kaha jata hai.aor ve vahan sirf aise aadmi ka paksh lete hai jo is bahs me anavashyak jabardosti fuhad prchar pane ke liye kooda hai .
    aor uske pas kisi bhi pooche gaye prshan ka uttar nahi hai.unhe vo bhas kyu bekar lagi nahi samjh paya .
    ek purane blogar ka farj banta hai aise samay me is bahs me kood kar un logo ka sahas badhaye jo dar -hichak ya tippaniyo ke bhay se nahi koodna chahte hai.
    jaise apne apni bat kahi hai vaise hi tark sangat aor shishtachar vali bhasha any blogar ne istemaal ki hai .vo shayad drivedi ji ko dikhi nahi.aor shastri jaise log jo gandi bhasha ka istemaal karte hai unke khiaf ye mahaz niji sambandho ke karan kuch nahi bolte hai.
    P.D.ka stend badalta dekh dukh hua ,use kahi achha laga unke dost amit ka rukh ,jiske pas shayad likhne ki ptibha nahi hai .par sach bolne ki himmat to hai.
    suresh ,rachna ,sujata ,sanjya baigani chahe jaise bhi ho unka ek apna stend to hai.ve jaise hai vaise hi hai ,rang to nahi badalte bhale hi ap unse agree kare ya na kare.

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  17. सामयिक व सन्तुलित. शुभकामनाएँ.

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  18. बस अभी-अभी मैंने यह पोस्ट पूरे कमेंट के साथ पढ़ा(नारी ब्लौग की बदौलत).. बेनामी का भी कमेंट..
    यह बेनामी जो भी हैं, वो हिंदी ब्लौग जगत और मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत अच्छे से जानते हैं जो ब्लौग जगत में कम ही हैं(शायद कोई नहीं).. मैं अनुमान लगा सकता हूं की वो कौन हैं..

    उनकी कुछ बातों से सहमती है और कुछ से असहमती.. अगर वह मुझसे संपर्क करें तो कई बातें हो सकती है..

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  19. प्रशान्त, लेख कैसा लगा यह भी बताते जाते। और कभी कभार सीधे भी आ जाया करिए ना ! :)
    घुघूती बासूती

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  20. घुघुती जी,
    इतना विस्तार से लिखने के लिये साधुवाद ! मैं आपके अनेक विचारों से सहमत हूँ किन्तु कुछ से असहमत भी हूँ या उन्हें परिवर्तित रूप में ही स्वीकार्य समझता हूँ-

    १) आपकी बात आंशिक रूप से सही है कि कल विरोध नहीं किया तो आज विरोध करने का अधिकार नहीं खो दिया। किन्तु यह बातेक दो बार के लिये माफ की जा सकती है किन्तु बार-बार होने पर दोगलापन एवं बौद्धिक-अनैतिकता का परिचायक है। यह आपके तर्कों को अविश्वसनीय बनाती है।

    २) क्या यह सिद्ध हो चुका है कि पुराना समय वर्तमान-समय से खराब था ? चौदहवीं शताब्दी और उन्नीसवीं शताब्दी में कौन बेहतर है।

    ३) क्या स्वतन्त्रता के नाम पर सब कुछ जायज है? पश्चिमी समाज में सौ-दो सौ वर्षों से स्वतन्त्रता है। क्या वे समाज अधिक 'सुखी' हैं? क्या वहाँ की स्त्री अधिक सुखी है?

    ४) कई विकसित देशों में वैज्ञानिक एव्ं तकनीकी क्षेत्र में महिलाओं का प्रतिशत् १० से भी कम है? कौन सी चीज इस संख्या को पचास तक आने से रोक रही है?

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  21. हमारे देश में प्रत्येक नागरिक अपने-अपने ढंग से उत्सव मनाने के लिए पूर्ण स्वतंत्र हैं। सांस्कृतिक-क्षरण या धार्मिक कट्टरता की आड़ में संविधान प्रदत्त "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" का हनन नहीं होना चाहिए। "वैलेंटाइन-डे" का विरोध करने के नाम पर सरे आम अराजकता फैलाने और 'ला-आर्डर' अपने हाथ में लेने वालों पर रासुका (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) के अंतर्गत कठोर कार्यवाही की जानी चाहिए जिससे अहसास हो कि भारत में अभी भी संविधान का राज है, गुंडों का नहीं !

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  22. एक संतुलित और विचारोत्तेजक पोस्ट के लिए आपको धन्यवाद।

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  23. "जिन्हें यह चिन्ता हो रही है कि आँकड़े बताते हैं कि स्त्रियों को स्वतन्त्रता मिलने के बाद अमेरिका में विवाह के बाहर बच्चों के जन्म में वृद्धि हुई है वे साऊदी अरब या ऐसे ही किसी देश के आँकड़ों पर भी नजर डालें। वहाँ यह संख्या शून्य है। फिर हम वहाँ के कानून यहाँ लागू क्यों नहीं कर देते?"

    आप साऊदी अरब के कानून भारत में लागू इसलिये नहीं कर सकते की आपके नेता ऐसा करने से पहले ही ग्लोबलाईजेशन के नाम पर भारत को उसकी लंगोटी[अस्मिता] समेत अमरीका के हाथों बेच खा चुके हैं. कहां जी रही हैं आप घुघुती जी? सन १९६० में? ठीक वैसे ही जैसे लडकियों के बाल नोचते पुरुष और पुलीसवाले और उनको रोकने के बजाय उसकी रिकॉर्डिंग कर के दिखाने वाले पुरुष अपना डे-जॉब कर रहे हैं - दिमागी रूप से १४ सदी में जीते हुए!!

    आप और हम कब तक बहुत अच्छा लिखा बहुत संतुलित लिखा पढ कर खुश होते रहेंगे? कब तक??

    सच तो ये है की नई पीढी के हॉर्नी लोग प्रेम की अभिव्यक्ति के लिये थोपे गए दिन गुलाब के साथ कंडोम खरीद रहे हैं. गुजरती पीढी के फ़्रस्टु संस्कृति बचाने के नाम पर लडकियों के बाल नोच रहे हैं. और बडी चतुराई से उनके बीच की वैचारिक खाईयां आर्किटेक्ट की जा रही हैं - ताकी संवाद ही ना बचे. ताकी वे अपने विचार अपने अपने टीवी चैनलों से सीख/चुन लें! देवदास, देव डी हो चुका है. आज भारतीय संस्कृति की बात करने का मतलब पुरुष-प्रधानतावादी, स्त्री-विरोधी होना हो गया है - करोडों डालर लगे हैं ये स्थितियां बनाने में. वाना-बीज़ [नकलची] तो आधुनिक हो चुकने के लिये कुछ भी कर जाएंगे - और जो उन्हें संस्कारित कर सकते थे वे तो कचरे के डब्बे में फ़ेंके जा चुके हैं.

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  24. ek achha aur sarhniy lekh....

    waise aapka wala sawal hi mera bhi hai ki - hum kaha ja rahe hai

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  25. बहुत सही लिखा है, और जरूरत ऐसे ही लिखने की है क्योंकि ये धर्म और संस्कृति के ठेकेदार अब हमें जो कि संस्कृति और मूल्यों कि व्याख्या उनसे अधिक बेहतर कर सकते हैं और आने वाली पीढ़ी को दे रहे हैं, किस दिशा में जाने कि बात कर रहे हैं. फिर से वही पुरातन पंथी युग कि ओर जाने कि बात हो रही है. अब शायद देश के लिए और समाज के लिए कुछ और सोचने के लिए बचा नहीं है.

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  26. मुझसे पहले ब्‍लाग जगत के कई दिग्‍गज अपनी प्रतिक्रिया दे चुके हैं। मुद्दा भी है और घूघती बासूती जी का तार्किक लेख भी। सचमुच अच्‍छा लिखा है बासुती जी ने। पिछले दिनों महिलाओं के साथ जो घटनाएं हुईं हैं उन्‍हें देख-पढ़ कर यही लगता है कि महिलाएं आज भी किसी गुलाम देश में रहती हैं। हो सकता है कि प्रतिक्रिया में महिलाओं ने कुछ ऐसा किया हो जिससे समाज और संस्‍कृति के तथाकथित ठेकेदार आहत हों। उन्‍हें ऐसा लगा हो कि स्‍त्री ने अशोभनीय उपहार उनके मुंह पर फेंका हो। ये उन्‍हें थप्‍पड़ से भी ज्‍यादा मारक लगा हो लेकिन ये स्थिति क्‍यों आई, इस पर भी विचार करना चाहिए। पुरुष की नजर में स्‍त्री जो है, स्‍त्री ने उसी को हथियार बनाकर शालीनता के साथ प्रहार किया है। हो सकता है कि विरोध का ये तरीका मुझे भी अच्‍छा न लगे लेकिन अगर ऐसा है तो मेरे अंदर का वह सामंतवादी पुरुष है जो मुझे झकझोर रहा है। हमें सोचना चाहिए कि हम एक प्रजातंत्र में रहते हैं जहां सभी को अपने फैंसले लेने की स्‍वतंत्रता है। बशर्ते वह संविधान के अनुरूप हैं। लेकिन चुटिया पकड़कर घमाने और पब में जाने पर सड़क पर लिटा-लिटाकर पीटने को कोई भी सभ्‍य समाज शोभनीय नहीं कह सकता।

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  27. दुःख होता है जब तर्क भी देह को भाषा बनाकर इस्तेमाल करते है....ऐसा प्रतीत होता है मर्यादित का केवल एक अर्थ है यहाँ "स्त्री "

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  28. मैं साधारणतः चीज़ों को महिला और पुरूष नजरिये के हिसाब से बाँट कर नहीं देखती...पर जाने क्यों कई बार मुझे लगा है की कुछ ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें पुरूष समझ ही नहीं सकते. जैसे कि मंगलौर me हुए पब घटना पर उपजा विरोध का तरीका...वो नहीं समझ सकते कि किस कदर क्षुब्ध और आहत हुआ होगा नारी मन और किस तरह बेबसी महसूस की होगी...वो नहिंस अमझ सकते कि किस मानसिक स्थिति में ऐसा कोई कदम उठाने का ख्याल आया होगा...और न ये जान सकेंगे कि बाकी उनके सपोर्ट में क्यों खड़ी हैं. ये वो पुरूष हैं जो नहीं जानते कि किसी लड़की को कैसा महसूस होता होगा जब कोई राह चलते उसपर फिकरा कस देता है और वो सोचती रह जाती है कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ, वो ये नहीं सोचती कि लड़के की मानसिकता ओछी है, उसे लगता है कि उसके कपडों में, या शायद उसके अकेले जाने में...उसने कुछ तो किया होगा जिससे उसको बल मिला. मैंने आज तक जिस लड़के से बात कि है, उसने इग्नोर मारने को कहा है. क्या ऐसे ही लड़कों को नज़रअंदाज करते करते ऐसी स्थिति नहीं आ जाती कि ये किसी लड़की का दुपट्टा खींच लेते हैं, पब में जा कर मार पीट करते हैं. क्योंकि इन्हें लगता है कि वो लड़की कुछ नहीं कर सकती.
    ऐसी ही कोई लड़की जब विरोध करती है तो उन्हें बर्दाश्त नहीं होता...और वो इस तरह के अनर्गल प्रलाप करने लगते हैं.
    माफ़ कीजियेगा घुघूती जी...मैंने काफ़ी लम्बी टिपण्णी दे दी और कई बातें अपनी तरफ़ से भी कह दी. पर आपका पोस्ट पढ़ कर बहुत अच्छा लगा. कुछ कुछ मेरे कॉलेज की याद आ गई...आपका बहुत धयवाद. इस विषय पर एक ऐसी पोस्ट कि बहुत जरूरत थी.

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  29. The problem is that you are talking and expecting "common sense." Alas! that's the the most scarce resources today.

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  30. मै देर से आई और शायद पहली बार आपके ब्लॉग पर कमेन्ट लिख रही हूँ
    मंगलोर में जो हुआ वो कुछ उदंड लोगों का कारनामा था जिनके जाने समझने के बार एमें हम कुछ नही जानते पर उसके बाद से राष्ट्रीय परिदृश्य पर, ब्लॉग जगत में इस तरह से प्रतिक्रियाने आ रही हैं मानो ये मामला स्त्रियों के पब जाने और उनके शराब पीने पर केंद्रित है
    लोग कहते हैं विरोध ही करना था महिलाओं को तो ऐसे नही वैसे करना था.
    ये दोनों बातें बताती है की कैसे देख रहे हैं लोग हमारे घर से निकलने को हमारे ख़ुद से रास्ते चुनने को
    पूजा की तरह मै भी स्त्री पुरूष रख कर नही सोचती . लेकिन यहाँ पर बात भटकाई ही जा रही है हर जगह मानो हम लड़कियों पबों में जाने को बेताब रही हों, मानो हम शराब के पीछे मरी जा रही हैं.
    मै तो नही देखती किसी पुरूष को कहा जाता है की पहनो भारतीय पोशाक, मै तो नही देखती की किसी हाल के इस मामलें में किसी ने असरदार तरीका सुझाया हो विरोध का . वो जो अपने ब्लॉग पर लिख दे रहे थे की राम सेना का समर्थन नही करते वो अगली ही पोस्ट डालते हैं राम सेना के पक्ष की भले ही वो अलग तरीके से सामने आए
    ये कोई छुपी हुई बात नही है की कट्टरवादियों को हमेशा बुरा लगा है हमारा बहार निकलना , हमारा पाने तरीके से सोचना
    आज ये जो कुछ दिख रहा है ये उसी सोच का विस्तार भर है

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  31. आपका सोचना हमेशा मन की गहराई से निकलता है -जैसे यहाँ - समाज सुधर जाये यही आशा है -
    - लावण्या

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  32. मैडम excellent write up and very much needed. Thanks for it , I am saving it.

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  33. मैडम excellent write up and very much needed. Thanks for it , I am saving it.

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  34. कुछ निजी व्यस्तता वश नेट और इस पोस्ट पर देर से आ सका। ...इस मुद्दे पर शायद यह सबसे विस्तृत और सभी पक्षों को समेटने वाली सन्तुलित पोस्ट है। बधाई।

    मैने किसी भी ब्लॉगर को प्रमोद मु्थालिक के मंगलौर में किए दुष्कृत्य का समर्थन करते नहीं देखा और न ही किसी नारीवादी को पब जाकर मदिरापान करने और यौनाचार में लिप्त रहने वालों को महिमा मण्डित करते हुए पाया।

    इस आश्वस्त करती स्थिति के बावजूद इस विषय को लेकर जितनी कटुता फैली उसे देखकर क्षोभ होता है कि हम ऐसी भाषा का प्रयोग क्यों कर रहे हैं जो हमारे बीच की आम सहमति को नेपथ्य में धकेलकर अनर्गल प्रपंच को दावत दे रहा है।

    आपने सच पूछा है कि- हम कहाँ जा रहे हैं?

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