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मंगलवार, जून 03, 2008

नन्नी कली सोने चली

कल आगाज़ पर सुरा बेसुरा में कुछ बेहद मधुर गीतों को सुन रही थी। कुछ गीत यादों में एक बहुत विशेष स्थान बना लेते हैं। इनमें से एक है ' नन्ही कली सोने चली। मेरी आवाज सदा से बहस, भाषण, वादविवाद के लिए सही रही है, गाने के लिए कभी नहीं। आवाज कितनी ही बुलन्द क्यों ना हो, कितनी ही बेसुरी क्यों न हो, शायद ही कोई माता पिता, विशेषकर माँ हो जिसने अपने बच्चे को लोरी न सुनाई हो। सो मैं भी अपनी दोनों बेटियों को लोरी सुनाती थी। बस वे ही यादें ताजा हो गईं।


बड़ी बेटी ने अपने जीवन के पहले २५ दिन केवल दिन में सोना उचित समझा और रात में जागना। रात को ठीक ९ बजे जाग जाती थी व सुबह ६ बजे सो जाती थी। २६वें दिन से उसने अपना दिन का सोने का कार्यक्रम भी रद्द कर दिया। अब केवल एक आध घंटे को दिन में दो तीन बार सो लेती थी। यह कार्यक्रम उसने तीन वर्ष की आयु तक चालू रखा। मेरे पड़ोस में ही हमारी फैक्ट्री के डॉक्टर रहते थे जो मेरी बिटिया की इस आदत का विश्वास नहीं करते थे। दिन भर तो उनकी पत्नी , हमारी व उनकी कामवाली उसे जागते देखती थीं व कई बार वे स्वयं भी। एक रात उन्होंने कहा कि आज रात मैं भी आपके घर आकर देखूँगा कि वह कैसे नहीं सोती है। जब उन्होंने देखा कि रात के बजे तक भी वह नहीं सोई तो उन्होंने उसे फिनारगन या ऐसी ही कोई दवा पिलाई उन्होंने एक उपन्यास उठाया और बेटी पर नजर रखना आरम्भ कर दिया। रात को तीन कॉफी पीकर उन्होंने स्वयं को जगाए रखा। जब सुबह के ५ बजे तक भी वह नहीं सोई तो बोले, 'भाभी अब मैं मान गया आपकी बात' और घुघूताजी, मुझे व सवा महीने की मेरी बिटिया से विदा लेकर अपने घर चले गए।

बिटिया सारी रात गोदी में रहना व चलते हुए हिलाए जाना पसन्द करती थी। डॉक्टर स्पॉक की बच्चों को पालने की पुस्तक उन दिनों बहुत प्रसिद्ध थी। परन्तु मैं कभी भी उनके तरीकों, याने बच्ची को रोते हुए तब तक के लिए छोड़ देना जब तक कि वह सो न जाए, का उपयोग नहीं कर पाई। मैं उसे सुलाने के लिए कन्धे पर उसका सिर रखकर चलते चलते थपथपाती थी और वह मुझे पीठ पर थपथपाती थी। यदि मैं गति तेज करती थी तो वह और तेज कर देती थी। मैं उसे लोरी सुनाती थी तो वह भी आआआआआ करके मुझे सुनाती थी। मेरे स्वर के साथ सदा स्वर मिलाकर ! साल सवा साल की हुई तो लोरी सुनाने को कहती और स्वयं खिलौनों से खेलती रहती। यदि सोने को कहो तो रोने लगती।

जब बड़ी बिटिया साढ़े तीन वर्ष की हुई तो छोटी बिटिया का आगमन हुआ। सोने में बहुत अधिक परेशान तो नहीं किया । उसकी सदा माँग होती ' नन्नी कली ' सुनाओ। मैं सुनाती तो वह सोने की बजाय टुकुर टुकुर मुझे देखती रहती और पूरा ध्यान रखती कि मैं कोई पंक्ति उल्टी सीधी या आगे पीछे तो नहीं गा रही, या जो पंक्ति दो बार गानी है वह एक बार में ही तो नहीं निपटा रही। एक गल्ती होने पर'नईं ऐसे नहीं'कहती। गल्ती का अर्थ होता था, एक बार फिर से शुरू से शुरू करना और ध्यान रखना कि इस बार कोई गल्ती हो।


आज भी जब उन दृष्यों को याद करती हूँ तो बरबस हँस पड़ती हूँ। बिटिया को आश्चर्य होता है कि मैं दो थप्पड़ क्यों नहीं लगा देती थी। परन्तु गोद में छोटी सी, कोमल सी टुकुर टुकुर ध्यान से देखती सुनती उस बच्ची पर कोई कैसे हा्थ उठा सकता था!

आज बार बार 'नन्नी कली' सुनते सुनते मैं एक बार फिर वे पल जी उठी।


घुघूती बासूती

सोमवार, जून 02, 2008

मैं टिपिया नहीं सकती

मन तो बहुत होता है कि टिप्पणी दूँ, बहुत बार लिख भी देती हूँ, परन्तु पोस्ट नहीं कर पाती। जैसे ही 'टिप्पणी दो' पर क्लिक करती हूँ , 'यह पेज दिखाया नहीं जा सकता' आ जाता है। समस्या यह है कि यदि टिप्पणी लिख ली होती है तो जब तक वह अपने सही ठिकाने पर नहीं पहुँचती तब तक चैन नहीं आता। अब पता नहीं कि मेरा कम्प्यूटर नाराज है या मेरा नेट कनैक्शन। वैसे कभी कभार दस बीस बार कोशिश करने पर सफल भी हो जाती हूँ। वैसे जैसे स्थान पर मैं रहती हूँ वहाँ बैठकर नेट पर जा पाती हूँ यही संसार का आँठवा आश्चर्य है व भारत की प्रगति का सबसे बड़ा सबूत !

कुछ दिन पहले अनाम बन्धुओं ने कई ब्लॉग्स पर न जाने कैसी कैसी टिप्पणियाँ देना आरम्भ किया कि कई मित्र एक दूसरे को सलाह देने लगे कि टिप्पणी मॉडरेटर लगा दो। मैंने भी चुपचाप लगाने में ही भलाई समझी। मैं सदा से इसके विरुद्ध रही थी, सो बड़े बेमन से मॉडरेटर लगा तो दिया परन्तु जब अनुमति देने का समय आया तो अनुमति देना असम्भव हो गया। अनुमति पर क्लिक करते ही 'यह पेज दिखाया नहीं जा सकता' आ जाता। ब्लॉगर.कॉम पर जाने का यत्न भी लगभग व्यर्थ ही जाता है। आज तक मनुष्यों को एक्सपायर करते देखा सुना था परन्तु मेरा कम्प्यूटर तो जिस तिस पेज को भी 'एक्सपायर हो गया' कहता रहता है। मैं भी कुछ दिन अफसोस मनाती रही परन्तु अब आदत हो गई है सो कोई पेज या कोई ब्लॉग या टिप्पणी का पृष्ठ एक्सपायर हो जाए या स्वयं को दिखाने से मना कर दे, मैं सहज भाव से( 'आया है सो जाएगा,राजा,रंक फकीर' गुनगुनाते हुए ) सह लेती हूँ। वैसे याहू मैसेंजर भी नहीं खुलता व शायद वहाँ के मित्र सोचते हों कि मैं ही एक्सपायर कर गई !

अब तो यह हालत है कि यदि कभी बिटिया, उसका पति या मेरा कोई मित्र नेट पर मिल जाता है तो उससे ही कह देती हूँ कि जरा ये टिप्पणियाँ तो मॉडरेट कर देना। या फिर यदि जिसके ब्लॉग पर टिप्पणी करनी हो वह मिल जाए तो उस ही से कह देती हूँ कि भाई/बहन( बेटा/बिटिया) यह रही तुम्हारे हिस्से की टिप्पणी ! कई भले मानस तो जाकर अपने ब्लॉग पर चिपका आते हैं, कई नहीं। जब ब्लॉग नहीं खुलते तब भी यही होता है। मैं बता देती हूँ कि भलेमानस, तुम्हारा ब्लॉग खोलने की चेष्टा में हूँ। अच्छे व सहायक प्रवृत्ति के बच्चे अपना लेख ही गूगल टॉल्क पर चिपका कर पढ़वा देते हैं। शेष तो 'हम क्या करें' जैसा शायद मन ही मन बुदबुदा कर निकल जाते हैं।

वैसे कुछ दिनों में यह समस्या सुलझ जाएगी या फिर मैं स्वयं ही सुलझ जाऊँगी और ब्लॉगजगत को नमस्कार कर नेट से विदा ले लूँगी। देखिये कौन सुलझता है। फिलहाल तो मैं ब्लॉगर.कॉम को मनाने जा रही हूँ। शायद मान जाए और मेरी यह दुख भरी चिट्ठी/आप तक ले जाए।
रूठे रूठे ब्लॉगर.कॉम मनाऊँ कैसे..... गुनगुनाते हुए बाय ।

घुघूती बासूती

पुनश्चः इसका अर्थ यह नहीं कि आप टिप्पणी ना करें। सोचिये,मैं लोगों से टिप्पणी मॉडरेट करने को कहूँ और वे कहें,'कैसी टिप्पणी? यहाँ तो एक भी नहीं है।'बड़ी बेइज्जती खराब हो जाएगी। :(

घुघूती बासूती

शनिवार, मई 31, 2008

113/100 ?

११३/१०० ? हाँ भई, यही अंक दिए हैं दसवीं के एक छात्र ने अपने आप को ! हुआ यूँ कि वे अपना गुजराती का पर्चा समाप्त कर चुके थे। शायद दोबारा भी पढ़ चुके थे। अभी भी आधा घंटा बचा हुआ था। अब इस समय का क्या उपयोग करें, सोच रहे थे। अचानक उनके मस्तिष्क में यह विचार कौंधा कि अध्यापकों को प्रश्नपत्र जाँचने में कैसा लगता होगा। सो उन्होंने सोचा क्यों ना स्वयं जाँचकर इसे महसूस किया जाए। सो वे जुट गए अपना ही पर्चा जाँचने में। समय का यह सदुपयोग कर वे अपना पर्चा जमा करवाकर चले गए।


परीक्षकों ने भी पर्चे जाँचे। परन्तु इस पहले से जाँचे हुए पर्चे पर ध्यान नहीं गया। जब सुपरवाइज़र की बारी अंक जोड़ने की आई तो हमारे मेहनती बालक के अंक ११३ बन रहे थे। दोबारा जोड़ा गया फिर भी वही मुर्गे की तीन टाँग ! अब पाँच परीक्षकों को बुलाया गया। सबने कहा ऐसे अंक तो उन्होंने नहीं दिए। तब जाकर उनके मस्तिष्क में बल्ब जला कि शायद यह बालक का स्वयं का काम हो। उन्हें बुलाया गया। उन्होंने स्वयं का पर्चा जाँचना स्वीकार किया और बताया कि उन्होंने तो ऊब से निपटने के लिए ऐसा किया था।


खैर, कारण जो भी रहा हो, फिलहाल तो वे २०११ तक परीक्षा में नहीं बैठ सकते। वैसे बहुत से छात्र शायद चाहेंगे कि ऐसे बालक को पर्चे जाँचने के काम में ही लगा दिए जाए।


घुघूती बासूती

शुक्रवार, मई 30, 2008

सट्टे ने क्या दिन दिखाया !

आज के समाचार पत्र में एक समाचार पढ़ा कि राजकोट का एक ३० वर्षीय व्यापारी चेन छीनकर भागते हुए पकड़ा गया। साथ में उस रोते हुए व्यक्ति की फोटो भी थी। एक नौजवान व्यक्ति जिसका स्वयं का कारोबार था, जिससे वह प्रति माह ५०,००० रूपये कमाता था, जिसका भविष्य साधारण परिस्थितियों में उज्जवल ही माना जाता, वह हथकड़ियों में रोता हुआ क्या कर रहा था ? वह ऐसी दयनीय स्थिति में कैसे पहुँचा ? दिन में कितनी ही बार उसका चेहरा मेरी आँखों के सामने आ जा रहा है। जीवन के एक दो गलत निर्णयों ने उसे कैसी जगह ला खड़ा किया ?

यह उसकी पहली चोरी थी। उसने सट्टे में बहुत रूपया लगाया था जो वह हार गया था। हाल ही में चाँदी में उसे हानि हुई थी। कुल मिलाकर लगभग १२ लाख रूपये उसने गंवाए थे। गुजरात में यह कोई नई बात तो नहीं है। यहाँ लोग लाखों बनाते हैं और लाखों गंवाते भी हैं। बाज़ार में थोड़ा क्या, बहुत रिस्क भी लेना पड़ता है। कभी हानि कभी लाभ, चंचलता तो लक्ष्मी का स्वभाव ही है। यदि उसे लाभ हुआ होता तो उसके अपने ही परिवार वाले व नाते रिश्तेदार उसकी वाहवाही कर रहे होते। मित्र उससे किसमें पैसा लगाएँ की टिप्स ले रहे होते। परन्तु यहाँ वह लुट पिट गया तो हम सब उसकी मूर्खता पर उसे दोष देंगे। हम कहेंगे कि सभी हानि उठाने वाले चोरी तो नहीं करने लगते। सही है, कुछ आत्महत्या कर लेते हैं, कुछ पूरे परिवार के साथ मिलकर आत्महत्या करते हैं।

यह चोरी व आत्महत्या वाली स्थिति तब आती है जब व्यक्ति उधार के पैसे को इस बाज़ार में लगाता है। यह उधार भी शायद कोई साधारण नहीं होता होगा। यह शायद प्रति दिन, सप्ताह या मासिक ब्याज वाला होता होगा। यह कोई बैंक से लिया उधार भी नहीं होगा। लेनदार डंडा लेकर पीछे पड़े होते हैं। उन्हीं को शान्त करने के लिए इस व्यापारी ने चोरी व लूट का रास्ता अपनाया। उसका कहना था कि रोज वह चेन छीनने के समाचार पढ़ता था और कभी किसी को पकड़े जाते व सजा पाते उसने नहीं देखा था । सो उसने भी उधार का कम से कम कुछ भाग चुकाने का यह आसान रास्ता अपनाने की ठानी। अपने ही एक कर्मचारी की मोटरसाइकिल माँगकर वह इस काम के लिए निकला। चेन भी झपट ली परन्तु भागते समय मोटरसाइकिल फिसल गई और लोगों ने पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया।

एक तरह से देखा जाए तो पहली गलती करने पर पकड़े जाने से शायद वह एक बड़ा अपराधी बनने से बच गया। परन्तु क्या अपने किए की सजा पाने के बाद वह पहले जैसा या पहले से भी बेहतर मनुष्य बन सकेगा ? बन सकता है, यदि जेल सुधारघर का काम करें। यदि पहली बार अपराध किए अपराधी पक्के व ढीठ अपराधियों के साथ ना रखे जाएँ। यदि समाज यह मानकर चले कि सजा काटकर अपराधी ने समाज का ॠण चुका दिया।

क्या वह और उसका परिवार ऐसी स्थिति से उभरने के लिए एक और राह नहीं निकाल सकता था ? यदि उनका अपना मकान है तो उसे बेचकर एक कमरे के किराये के मकान में जा सकते थे। घर का सामान व गहने बेचे जा सकते थे। कुछ ही वर्षों में वे फिर से आराम का जीवन बिता सकते थे। अब उसके परिवार वालों की स्थिति तो और भी अधिक बुरी होगी।

लोगों को सट्टा बाज़ार या शेयर खरीदने के लिए केवल अपनी बचत का उपयोग करना चाहिए और वह भी बचत के उस हिस्से का जिसकी उन्हें तत्काल आवश्यकता न हो। यह मानकर चलना चाहिए कि हानि या लाभ दोनों हो सकते हैं। यदि ऐसा हो तो ना तो बाज़ार में इतनी उथल पुथल होगी और ना ही किसी को अपनी इज्जत या जान से हाथ धोना पड़ेगा। जो भी लोग निवेष के बारे में लिखते हैं उन्हें लोगों को यह भी बताना चाहिए कि आमदनी के किस भाग का निवेष करें। पैसा बनाना बुरा नहीं है परन्तु अति लालची भी होना हानिकारक होता है।

आखिर में यह भी कहना होगा कि क्या ही अच्छा होता कि अपराध करने पर आमतौर पर अपराधी पकड़े जाते और सजा भी पाते ताकि अन्य लोग अपराध की राह पर जाने की नहीं सोचते। सजा भयंकर और लंबी होना आवश्यक नहीं है। आवश्यकता है लोगों में इस विश्वास की कि लगभग प्रत्येक अपराध की सजा अवश्य मिलेगी।

घुघूती बासूती

रविवार, मई 18, 2008

हमारे देश में कानून बन जाना चाहिये कि केवल परिवार द्वारा तय किये विवाहों को ही मान्यता दी जाएगी

कहने को तो कानून है कि कोई भी १८ वर्षीय स्त्री या २१ वर्षीय पुरुष अपने मन से विवाह कर सकता है। परन्तु यह कानून बदल दिया जाना चाहिये। कुछ अरब देशों की तरह स्त्री पुरुष को अलग रखा जाना चाहिए। अलग अलग विद्यालय, कॉलेज, रैस्टॉरैंट, सिनेमा इत्यादि का प्रबन्ध होना चाहिए। अब आप सोचेंगे कि यह क्या बात हुई। हम तो देश में स्वतंत्रता की बात करते हैं परन्तु यह स्वतंत्रता खत्म करने की बात कर रही है। जी हाँ, बिल्कुल कर रही हूँ। और यह हमारे युवा बच्चों की भलाई के लिए ही कर रही हूँ। क्या लाभ ऐसे कानूनों का जिनके भरोसे बच्चे एक दूसरे से मित्रता करें, मिलें, घूमें फिरें, साथ चाय पीयें, आइसक्रीम खाएँ, पार्क में बैठें, मिलकर जीवन बिताने के स्वप्न देखें, परन्तु अचानक अपने आप को पुलिस की गिरफ्त में पाएँ ? जितना लज्जित किया जा सकता है किये जाएँ, माता पिता को बुलाने की धमकी दी जाए, सरे आम शहर भर में ऐसे घुमाए जाएँ जैसे ये कोई अपराधी हों। ये युवा देश की सरकार बना सकते हैं, मजदूरी कर सकते हैं, बाल विवाह कराकर माता पिता बन सकते हैं परन्तु अपने मित्र या जीवनसाथी का चुनाव नहीं कर सकते। जी हाँ, देश के भाग्य का निर्णय तो ये ले सकते हैं परन्तु अपने भाग्य का नहीं।

यह वही देश है जिसे अपनी संस्कृति पर गर्व है। कौन सी संस्कृति ? विदेशियों के गुलाम बनने से पहले की या बाद की ? इसी देश में कई तरह के विवाहों को मान्यता दी गई थी। यहाँ पर ही स्वयंवर रचाए जाते थे। क्या वे स्वांग थे ?

क्यों हमारे युवा इस गलतफहमी में रहें कि उन्हें किसी से भी बात करने, मित्रता करने, प्रेम करने और फिर शायद विवाह करने की स्वतंत्रता है ? ये कानून शायद उच्चतम न्यायालय में मान्य हों। हमारे बच्चों का पाला तो हमारी पुलिस से पड़ सकता है। फिर उन्हें क्यों अन्धेरे में रखा जाए ? आज बरेली में हमारे युवाओं की धर पकड़ हुई, कल मेरठ में हुई थी और कल कहीं और होगी। उनकी दुर्गति देखकर कौन यह कह सकता है कि यह एक स्वतंत्र देश है , कि यहाँ कानून के रखवाले कानून को जानते हैं ? क्या बिना एक दूसरे से मिले, साथ समय बिताए, एक दूसरे को जाने कोई प्रेम कर सकता है ? क्या बिना प्रेम विवाहों के कभी हमारे समाज में से जाति, धर्म, प्रान्त, दहेज, पुत्री को बोझ समझना जैसी कुरीतियाँ खत्म हो सकती हैं ? नहीं, कभी नहीं। क्या हम माता पिता द्वारा ठहराए विवाहों को रोक रहे हैं ? नहीं ना, तो फिर आप प्रेमियों को प्रेम करने से भी मत रोकिए। वे ही आपको लाखों के विवाह समारोहों, खर्चे, पुत्री के विवाह की चिन्ता से बचा सकते हैं। वे ही हमारे इस टूटते देश को जोड़ सकते हैं।

यह औपरेशन मजनूँ क्या है ? क्यों इसकी आवश्यकता होती है ? सड़क पर, बस में, या कहीं भी छेड़ी जाती युवतियों को तो हम गुण्डों से बचा नहीं सकते। परन्तु उन्हीं के द्वारा चुने गए उनके मित्रों से बचाना क्यों हमारा कर्त्तव्य बन जाता है ? बलात्कार होता है तो युवती के वस्त्रों का दोष है, छेड़ा जाता है, सताया जाता है तब भी उसके वस्त्र गलत हैं। क्यों नहीं हम यह मानते कि हम स्वयं ही गलत हैं ? कि हमने अपने बच्चों को दूसरे के अधिकारों, या उनके ना कहने के अधिकार के प्रति सजग नहीं किया ? कि हमने उन्हें अच्छा आचार व्यवहार करना नहीं सिखाया ? कि यदि किसी औपरेशन की आवश्यकता है तो वह है अपने गली मोहल्लों, बसों, सड़कों को सबके लिए, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष या बच्चा, सुरक्षित बनाने की ? क्यों हम अपने बच्चों को बिना किसी अपराध के इतना असहाय, लज्जित व गुनहगार महसूस करवा रहे हैं ? कैसे सोएँगे आज रात वे युवक युवतियाँ या उनके माता पिता ?

एक भारत तो संसार में सबसे आगे भागा जा रहा है सबसे पहले अगली सदी में पहुँचने को। दूसरा भारत पता नहीं किस प्रागेतिहासिक युग की ओर सरपट दौड़ रहा है ? कोई इसे पीछे जाने से रोक दे, इसका मुँह भूतकाल से भविष्य की ओर मोड़ दे।

नोटः १६ मई की रात समाचार सुनने लगी तो एक चैनल पर बरेली में औपरेशन मजनूँ के नाम पर युवक युवतियों की धरपकड़ व उनके साथ हुए दुरव्यवहार से बहुत विचलित हुई। उसी समय लेख लिख डाला। बहुत बार स्वयं को इसे पोस्ट करने से रोका। परन्तु जब तक इसे पोस्ट नहीं करती मुझसे पहले का लिखा हुआ कुछ और भी पोस्ट नहीं हो पा रहा। आशा है पाठक भी इस विषय पर अपनी राय यहाँ देंगे। कहीं लेखन में अति हुई है तो इसके पीछे की भावना समझ क्षमा करेंगे।

घुघूती बासूती

सोमवार, अप्रैल 21, 2008

आह, दिल्ली का वसन्त ! दिल्ली में दूसरा दिन ।










जन्म उत्तर भारत में हुआ व अधिक बचपन व विद्यार्थी जीवन भी वहाँ ही बीता । वहाँ के फूलों, पौधों व पेड़ों का जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रहा है । जबसे आँखें खोलीं स्वयं को प्रकृति के बीच ही पाया । वे फूल जीवन का एक हिस्सा बन गए । हर मौसम के साथ नए फूल अपने नए रूप रंग लेकर आ जाते थे । कभी सोचा ही नहीं था कि कभी ये नहीं होंगे । विवाह के बाद उत्तर भारत से नाता टूट ही गया । कभी कभार दिल्ली आना भी हुआ तो शायद गलत मौसम में, व घर से बाहर निकल फूलों की बहार देखने का अवसर नहीं मिला ।


इस बार जब दिल्ली की सड़कों पर जाना हुआ या फिर अपनी ही सोसायटी के बगीचे में तो अपने बचपन के फूलों को देख ऐसा लगा जैसे बचपन के बिछुड़े साथी फिर से मिल गए । मैं मोहित सी कार की खिड़की से नजरें बाहर टिकाए उन्हें देखते ना थकती थी । हुआ भी कुछ ऐसा कि लगभग हर दिन घर से बाहर जाना हुआ और रास्ते में कुछ ऐसे स्थान आते थे जहाँ फुटपाथ खत्म होते से ही क्यारियों में फूल बिखरे हुए थे । मन तो बस यही करता था कि वहीं रूक जाऊँ और एक एक फूल को सहलाऊँ । पूछूँ कि इतने बरस कहाँ थे । जैसे कोई बिछुड़े दोस्तों के नाम याद करता है वैसे ही मैं भी एक एक को देखकर उसका नाम याद कर रही थी । यदि कोई नाम याद ना आए तो स्वयं से नाराजगी होती थी कि कैसे भूल गई ।


रविवार को लोटस मंदिर जाना हुआ । बिटिया व उसके पति, मेरे पुत्रीवर ने कार्यक्रम बनाया कि मिम्मा (माँ )बाबा ( पिता ) को दिल्ली घुमाई जाए । सो सबसे पहले लोटस मंदिर की ओर चल पड़े । हमारे दिल्ली पहुँचने के साथ ही आँधी आ गई थी । बादल घिर आए थे व मौसम बेहद सुहावना हो गया था । सो धूप की कोई चिन्ता नहीं थी ।
मंदिर पहुँचते से ही मुझे यूँ लगा कि मैं अपने बचपन में आ गई हुँ । अब ना मुझे मंदिर की इमारत दिख रही थी ना साथ चलता परिवार ! मुझे बस और बस फूल ही दिख रहे थे । मस्तिष्क में बस यही खयाल था कि कैसे इन फूलों के बीज प्राप्त करूँ । यहाँ से वहाँ तक सब जगह क्यारियाँ ही क्यारियाँ थीं । उन पर फूल तो बस बिछे हुए थे । मुझे तो यही लग रहा था कि वे मेरे लिए ही खिले थे । मुझे हाथ पकड़कर खींचा भी जा रहा था , कि मंदिर बंद होने का समय हो रहा है । परन्तु मुझे उससे क्या ? होता है तो हो जाए , बस फूल खुले रहें । संसार का कौन सा मंदिर उनसे प्यारा हो सकता है ? बेटी बोली कि मंदिर के लिए सीढ़ियाँ हैं, तुम शायद ना चढ़ सको । मैंने खुशी खुशी हाँ में सिर हिलाया और वापिस फूलों में खो गई । घुघूता जी भी मेरे साथ एक क्यारी से दूसरी क्यारी की ओर भटकते रहे । उस समय यदि कोई मुझे तितली बना देता तो मैं हर फूल को छू पाती ।


प्रकृति ने अपनी खोई बेटी के स्वागत के लिए जैसे रंगों को उडेल उससे होली खेलनी चाही थी । बेटी तब कैसे ना उन रंगों में खोती , रंगती ? हर फूल पौधे में मुझे अपने पिताजी के कोमल परन्तु शक्तिशाली हाथों का छुअन महसूस हो रहा था । मुझे याद आ रहा था , उनका पौधे उगाना, उन्हें बड़ा करना , सूखे फूलों को हटाना व बीज बनाने के लिए संजोना । इस काम में हमारा उनकी सहायता कर बीजों के पैकेट बना उन पर नाम लिखना व सहेजना । इस बसंत पूजा के बाद उन्होंने मेरा रूमाल तो बसन्ती नहीं रंगा था परन्तु मेरा हृदय बसन्ती हो गया था ।


कॉर्नफ्लावर अपने विविध सफेद , गुलाबी व नीले रंगों में अजब छटा बिखार रहे थे । इन्हें देखे तो ३१ बरस बीत गए थे । पैंज़ी बहुत कम नजर आ रहे थे । शायद मेरी राह देखते देखते थककर व रूठकर चले गए थे। या फिर अभी उनके आने का समय ही नहीं हुआ था । बस कुछ हड़बड़ी वाले सिपाही आकर बगीचे का निरीक्षण कर रहे थे । बचपन में हम इनके चेहरे जैसे रूप के कारण इन्हें डाइन भी कहते थे । फ्लॉक्स अपने रंग बिरंगे गुच्छों में झूम रहे थे । पिटूनिया हिल हिल कर अपनी निःशब्द घंटियाँ बजाने में व्यस्त थे । मुझे लगा मैं उनमें अपने बचपन की आवाजें सुन सकती हूँ । हर क्यारी में अलग फूल थे और मुझे वे यूँ रिझा रहे थे कि मैं तय नहीं कर पा रही थी कि किस पर नजरें टिकाऊँ । मेरे अति प्रिय कार्नेशन्स व डायन्थस तो मुझे मंत्र मुग्ध कर दे रहे थे ।


दूर प्रहरी की तरह हॉलीहॉक्स के पौधे खड़े थे व अपने फूलों को अपने शरीर पर तमगों की तरह लगाए तनकर खड़े थे । फूलों की पंखुड़ियों को छोड़ इनका सारा शरीर हल्के काँटों जैसे रोयों से भरा होता है । ये दूर से ही पंगा ना लेने की चेतावनी दे रहे थे । नारंगी गार्डन नैस्टरशियम्स तो सबको लुभाने के लिए धरती पर ही बिछे जा रहे थे । उनके कमल से गोल पत्ते व अजीब सा घंटी सा आकार ना जाने कितनी यादें ताजा कर जा रहा था । लार्कस्पर भी पीछे रहने वाले नहीं थे । चाहे मुझे उनका नाम याद करने मे् काफी समय लगा परन्तु एक बार जब नाम मेरे मन की जबान पर आया तो वे मुझपर मुस्कुरा दिये। कॉक्सकूम्ब अपने मुर्गे सी कलगी पर गर्व से इतरा रहे थे । लगा जैसे कह रहे हों देखो , 'हमें वहाँ दूर उगा तो लेती हो पर जरा यहाँ हमारे अपने देश में हमारी शान तो देखो । क्या कभी वहाँ हमारी ऐसी बड़ी बड़ी कलगी देखी है ? ' वे सायद रैनेन्क्युलस ही थे जो बार बार मुझसे पूछ रहे थे कि पहचाना । परन्तु मैं मूर्ख उन्हें पहचान ही नहीं पा रही थी । शायद लोग आमतौर पर उन्हें पहचान नहीं पाते , इसीलिए रूठे व दुखी ये सकुचाए से रहते हैं व अपनी पंखुड़ियाँ पूरी नहीं खोलते हैं ।


मुझे दिल्ली पहुँचने में देर हुई थी परन्तु कुछ आखिरी गुलदाउदी (क्राइसेन्थेमम)मेरी प्रतीक्षा में जैसे रुके हुए थे । कुछ डहलिया भी अधखिले से मुझे ललचा रहे थे । एस्टर तो मुझे बचपन से ही बेहद प्यारे लगते हैं, विशेषकर सफेद एस्टर !अपने गुलाबी व नीले बैंगनी भाई बहनों के साथ ये भी खिले हुए थे । एक सड़क से गुजरते हुए कैना भी देखे । मैं तो इन्हें भूल ही गई थी । कोरल फाउन्टेन भी देखे जो हमारे गुजरात में भी लगे हुए हैं । ये फूल कुछ ही दिन के जीवन में इस तरह से इतनी खुशी कैसे लुटा सकते हैं ? साल्विया शान्त से खड़े थे जानते थे कि इतने रंगीन फूलों में वे लाल रंग के होते हुए भी प्लेन जेन ही नजर आ रहे थे । सड़क से ही मैंने किसी बाग बगीचे में नहीं, यूँ ही सड़क के किनारे के अनाम पेड़ों पर चढ़ती हुईं मॉर्निंग ग्लोरी मेरे मनभावन हल्के जामुनी रंग में अपनी पूरी ग्लोरी में खिलते और और से और ऊपर चढ़ते देखी । लगता था कि जैसे वह पर्वतारोही हो । आवारा से बोगनविलिया की बेलों में जो बहार देखी वह रोपे हुए बोगनविलिया में भी कभी नहीं देखी । वह शायद इसलिए कि यह बेल बिना पानी के ही अधिक फूलती है ।


मुझे अपने बचपन की वह आदत याद आ रही थी जब मैं पौधों को उनकी गन्ध से पहचानने का यत्न करती थी । आँख बन्द करके भी यदि किसी पत्ते को तोड़ा जाए तो उसकी गन्ध उसके नाम की चुगली कर देती थी । अब दूर से भी देखकर मेरी नाक में सब फूलों व उनके पत्तों की विशेष महक महसूस हो रही थी । अब तो बस यह पागलपन सवार था कि कहीं से सारे के सारे बीज खरीद लूँ व जाकर अपने छोटे से बगीचे में लगा दूँ । परन्तु क्या उत्तर भारत की शरद, शिशीर व वसन्त ॠतु भी किसी दुकान से पैकेट में खरीदकर ले जा पाऊँगी ?


मैंने कुछ फूलों के चित्र नेट से ढूँढकर यहाँ लगाने की चेष्टा की है । ये सब चित्र <http://www.flowerpictures.net/> के सौजन्य से हैं ।

http://www.flowerpictures.net/flower_database/h_flowers/holyhock.html

http://www.flowerpictures.net/flower_database/h_flowers/horned_violet.html

http://www.flowerpictures.net/flower_database/mn_flowers/morning_glory.html

http://www.flowerpictures.net/flower_database/mn_flowers/morning_glory_shrub.html

http://www.flowerpictures.net/flower_database/p_flowers/pansy.html

http://www.flowerpictures.net/flower_database/p_flowers/petunia.html

http://www.flowerpictures.net/flower_database/p_flowers/phlox_creeping.html

http://www.flowerpictures.net/flower_database/p_flowers/phlox_garden.html

http://www.flowerpictures.net/flower_database/rq_flowers/ranunculus.html

घुघूती बासूती

बुधवार, अप्रैल 16, 2008

डॉक्टरों को क्षमा प्रार्थना सहित मेरा उत्तर

मेरे पिछले चिट्ठे 'दिल्ली में पहला दिन' http://ghughutibasuti.blogspot.com/2008/04/blog-post_15.htmlपर बहुत सी टिप्पणियाँ आईं । दो डॉक्टरों की भी थीं । यहाँ मैं उन्हें उत्तर दे रही हूँ । शीघ्र ही ऐसे डॉक्टरों का जिक्र भी करूँगी जिन्होंने मेरा मन जीता है । यदि कोई उद्दडंतता हुई है तो डॉक्टर वर्ग से क्षमाप्रार्थी हूँ ।

अजित जी व महक जी,

यह लेख डॉक्टरों के विरुद्ध नहीं लिखा गया है । प्रवीर कुछ ऐसा बना कि चाहकर भी डॉक्टरों से मेरा नाता छूटता ही नहीं । डॉक्टर मनुष्य है, यह तो हम सब जानते हैं,वैसे ना होता तो शायद बेहतर होता । तब जब उनका व मरीजों का अनुपात गड़बड़ाता दिखता तो कुछ और मॉडेल बना लिए जाते ! खैर यह तो मजाक है परन्तु ऐसी भी क्या कठिनाई है कि स्वतंत्रता के ६० वर्ष बाद भी हम अधिक मेडिकल कॉलेज नहीं बना पा रहे ? क्यों जीवन से पिटे हुए लोगों को अधिक सुविधाएँ नहीं दिला पा रहे ? क्यों दवाइयों पर कर लगाते हैं ? कैसा होता होगा उस मरीज का दुख जो जानता है कि उसके इलाज में उसका घरबार गिरवी रख दिया गया है ? कैसी वितृष्णा स्वयं के जीवन से होती होगी जब जानते हैं कि उनके इलाज ने उनकी आने वाली पीढ़ियों से उनकी कमाई का एकमात्र साधन उनकी जमीन छीन ली है ? क्यों मेडिकल बीमा हमें हमारी बीमारी के समय बिना हेराफैरी के सहायता नहीं दे सकता? क्यों २४ घंटे हस्पताल में रहना आवश्यक है ?

जहाँ तक डॉक्टर की थकान की बात हे तो फिर वही प्रश्न उठता है कि एक व्यक्ति जिसके हाथ में किसी का जीवन है, उसकी मुस्कान है, उससे इतने लम्बे घंटे काम ही क्यों करवाया जाता है ? क्या कभी कोई एयरलाइन एक थके पायलट को विमान थमा देती है ? फिर एक थके डॉक्टर को मरीज क्यों थमाए जाते हैं ? क्या भारत में छात्रों का ऐसा अकाल पड़ गय