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Monday, October 24, 2011

नाकुशा नाकुशा ना रही, नकोशी नकोशी ना रही

वैसे इसका शीर्षक 'आओ डूब मरें' भी हो सकता था।

खबर है(मुम्बई मिरर,२३.१०.२०११, व ई सकाळ) कि सतारा व उसके आसपास की १५० नाकुशा व नकोशी नाम की लड़कियाँ अपना नाम बदलकर अस्मिता, एश्वर्या, कोमल, शिवानी, पूजा आदि बन गई हैं। यह 'नाम बदलो कार्यक्रम' सतारा जिले में २२.१०.२०११ को सम्पन्न हुआ।

सुनने में तो नाकुशा(नकुशा तो नहीं?)या नकोशी बुरे नहीं लगते फिर इतनी लड़कियाँ अपने नामों से क्यों नाराज थीं? क्यों उन्होंने स्वयं अपने नाम चुने और सुबह सुबह नाम बदलवाने को अपने दूर दराज के गाँवों से सतारा पहुँची?

तो सुनिए, हमारे इस स्त्रियों का आदर करने वाले देश में, देवियों की पूजा करने वाले देश में, बच्चियों को देवी का रूप मान नवरात्रियों में उनके पैर धोकर उनकी पूजा करने वालों के देश में, उनको जन्मने से रोकने के भाँति भाँति के अन्धविश्वास से लेकर व्यावहारिक से लेकर वैज्ञानिक उपाय जैसे टोटके, झाड़फूँक, तावीज,विशेष भोजन, भ्रूण हत्या,नर भ्रूण की गर्भ में स्थापना करना व न जाने कितने और तरीके अपनाए जाते हैं। ये सब तो हमने सुने हुए थे। आज एक नया उपाय पता चला। बच्ची को ऐसा नाम दे दो कि उसके बाद उस परिवार में कोई बच्ची जन्म लेने का दुस्साहस ही न करे।

जब किसी गर्भवती स्त्री ने पुत्र की आशा की हो और पुत्री हो जाए तो 'नको होती' जैसा कुछ मराठी में कहा जाता है जिसका अर्थ है, नहीं चाहिए थी। और यह लड़की नकोशी बन जाती है। नाकुशा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है जो अजित वडनेरकर जी समझा सकते हैं। ये सब बच्चियाँ जानती हैं कि वे अनचाही संतान हैं।

वैसे एक बात तो माननी होगी कि ये माता पिता खुल्लमखुल्ला बता देते हैं कि तुम नहीं चाहिए थी। कितने माता पिता तो यह नहीं कह पाते और पुत्र की चाह में पुत्री जन्मने के बाद उसे अच्छा सा नाम दे जीवन पुत्र की चाहत में गुजार देते हैं। स्पष्टवादिता भी एक गुण है और बच्ची जन्म से ही कोई भ्रम नहीं पालती।

खैर,अब पन्द्रह साल की नकोशी अस्मिता बन सकती है। नाकुशा कोमल और एक अन्य उज्जवला। यह बात और है कि नए नामों के प्रमाण पत्र बनाने वाले भी उनके माता पिता से बहुत भिन्न नहीं हैं सो नकोशी अस्मिता बनते बनते स्वाति बन गई है और उसे बताया गया है चिन्ता मत करो, तुम्हारा नाम ठीक कर अस्मिता कर दिया जाएगा। अस्मिता बनना चाहने वाली नकोशी को स्कूल पसन्द है व पढ़लिखकर अध्यापिका बनना चाहती है। वह दुखी है कि नाम बदलवाने के चक्कर में स्कूल में परीक्षा भी छूटी और नाम भी अपनी पसन्द का नहीं मिला।

प्रश्नः
१.जब इन नकोशियाँ, नाकुशाओं का माँ बनने का समय आएगा तो क्या ये बेटियाँ जन्मना चाहेंगी?
२.क्या इन्हें भ्रूण का लिंग पताकर अवान्छित भ्रूण को गिराने से रोकने का समाज का कोई नैतिक अधिकार बनता है?
३. क्या कल बुढ़ापे में इनके माता पिता को इनसे भरण पोषण माँगने का अधिकार होना चाहिए?

घुघूती बासूती

Friday, June 03, 2011

आते आते आती है अक्ल आहिस्ता आहिस्ता.................................घुघूती बासूती

यही समझ आया मुझे कायदे कानूनों से। किन्तु अफ़सोस, मैं तो अभी तक बैठी हूँ पलकें बिछाए, अब आएगी, तब आएगी, किन्तु अक्ल है कि आने का नाम नहीं लेती। शायद मेरी अक्ल भी मेरी तरह है। रास्तों की उसे कोई समझ नहीं है। मेरी तरह ही वह मेरे द्वार का रास्ता भूल गई है। या शायद मेरी ही गलती है। जब तीस पार कर जाने के बाद अक्ल दाढ़ ने अन्ततः आने का मन बनाया तो डेन्टिस्ट महाशय बोले कि मुँह में उसके लिए जगह ही नहीं हैं। एक के लिए ही नहीं, चारों की चारों के लिए जगह नहीं थी। सो जैसे जैसे वे आने को तैयार हुईं मैंने वे, मसूड़े कटवा, फिर सिलवाकर, उखाड़ फिंकवाईं। अब, जब अक्ल से बचे रहने को इतना कुछ किया तो उसके ना आने की शिकायत क्या करनी?

खैर कायदे कानून तो यही बताते हैं कि जैसे ही आप किसी निश्चित उम्र पर पहुँचते हैं और फूँक मार, मोमबत्तियाँ बुझा, केक काटते हैं तो बस अक्ल अपने आप सीधे आपकी कठोर, मोटी खोपड़ी में छेदकर आपके मस्तिष्क में पहुँच जाती है। इस अक्ल को पाने को मैं इतनी उतावली रहती हूँ कि हमने परिवार में परम्परा बना ली है कि जैसे ही रात के बारह बजते हैं, तिथि बदलती है, हम केक काट डालते हैं। किन्तु अक्ल को न आना था सो न आई।

मैं यह सब क्यों कह रही हूँ? भाई, आज के समाचार पत्रों में पढ़ा कि महाराष्ट्र सरकार ने बालक बालिकाओं, ना, ना, युवाओं की दारू पीने के कानूनी अधिकार की उम्र २१ से बढ़ा कर २५ कर दी है। जिन लोगों को दारू पीकर कार, बाइक चलाने वाले युवाओं ने ठोककर स्वर्ग/नर्क पहुँचाया होगा उनकी आत्मा को इस खबर से काफी शान्ति मिलेगी। किन्तु मैं काफी कन्फ्युजियाई हुई हूँ। मैं समझ नहीं पा रही कि किस उम्र में अचानक से मनुष्य के मस्तिष्क में अक्ल का प्रवेश होता है।

हमारे जमाने में २१ की उम्र में स्त्री पुरुष यह निर्णय करने योग्य होते थे कि किसकी सरकार बनवाई जाए। स्त्रियाँ १८ की उम्र में विवाह करने की समझ प्राप्त करती थीं व पुरुष २१ की उम्र में। फिर अचानक सब १८ की उम्र में सरकार चुनने की समझ रखने लगे किन्तु दारू पीने की नहीं। सो क्या किसकी सरकार बनाई जाए का निर्णय किस ब्रान्ड की कितनी दारू पी जाए से अधिक सरल है? अर्थात दारू के निर्णय के लिए आपको अधिक परिपक्व होना होता है? सरकार चुनना बच्चों का खेल है? पता नहीं।

उससे भी अधिक कन्फ्युजियाने वाली जो बात है वह यह है कि एक स्त्री १८ वर्ष की होते ही विवाह कर बच्चों को जन्म देने का कार्यक्रम आरम्भ कर सकती है। २५ की होते होते चार पाँच बच्चों की माँ बन उनकी भाग्य विधाता बन सकती है। वे क्या खाएँ, क्या करें ना करें, किस स्कूल जाएँ या जाएँ ही नहीं का निर्णय ले सकती है, किन्तु वह यह निर्णय नहीं ले सकती कि दारू पिए या नहीं, या कहाँ कितनी व किस ब्रान्ड की पिए। सो दारू पीने ना पीने का निर्णय सरकार बनाने के निर्णय व बच्चे पैदा कर उनका भविष्य निर्धारित करने के निर्णय से अधिक कठिन है?

हम जब कॉलेज के समय हॉस्टेल में रहते थे तो हमसे इतनी समझ की अपेक्षा नहीं की जाती थी कि हम कब कहाँ कितना घूमें के निर्णय ले सकें। लगभग कैद में रहते थे। १८ के तो कबके हो चुके थे। बी एस सी करके विवाह कर लिया और अचानक अपने निर्णय लेने की बुद्धि आ गई। बच्चे होने पर उनके लिए भी निर्णय लेने की समझ आ गई। वहीं एम एस सी करती हमारी सहपाठियों को अपना ध्यान रखने तक की बुद्धि नहीं आ पाई थी। जबकि वे हमसे भी अधिक पढ़ चुकीं थीं।

दीदी ने एम ए किया तब भी, पी एच डी करते हुए भी वे एक निश्चित समय के बाद हॉस्टेल नहीं लौट सकती थीं, चाहे उनके रिसर्च के काम में बाधा ही क्यों न आए, लाइब्रेरी में और काम क्यों न बचा हो। वहीं उनकी वे सहपाठिनें जो बी एस सी, या एम ए करके पढ़ाने लगीं थीं वे अपने साथ साथ अपनी छात्राओं का भी उत्तरदायित्व सम्भाल पाती थीं। १८ की उम्र में ब्याही सहेलियाँ तो दो तीन बच्चों की माँ बन सारे परिवार के निर्णय लेने में सक्षम हो गईं थीं।

शायद पढ़ते रहने से मनुष्य, विशेषकर स्त्री की बुद्धि, समझ, सही गलत का अन्तर कर निर्णय लेने की क्षमता के विकास में बाधा होती है। वहीं यदि वह बालिका वधु भी बन जाए तो शायद इस क्षमता का विकास चरम पर पहुँच जाता है।

शराब पीने पर रोक लगाने से युवा पीकर गाड़ी नहीं चला पाएँगे। दुर्घटनाएँ कम होंगी। वैसे दुर्घटनाएँ अधिकतर इसलिए होती हैं कि हम नियम तोड़ते हैं। नियम तोड़ने के लिए गाड़ी चलाना आवश्यक नहीं है। न ही उम्र का इससे कुछ लेना देना है। यह तो केवल दो बातों पर निर्भर करता है, एक आपके जीवन मूल्य क्या हैं और दो नियम तोड़ने पर प्रायः सजा मिलती है या नहीं। मैं जब सैर को जाती हूँ तो अस्सी साल के बूढ़ों को भी ज़ीब्रा क्रॉसिंग पर पैदल लोगों के लिए लाल बत्ती होने पर भी सड़क पार करते देखती हूँ। सोचिए यदि दुर्घटना घट जाए तो दोष गाड़ी वाले का ही माना जाएगा। सबसे सरल तो यह है कि हर नियम तोड़ने वाले, नशे में गाड़ी चलाने वाले का लाइसेंस जब्त कर लिया जाए, जुर्माना लगाया जाए, सौ में से एक पर नहीं कमसे कम ५०प्रतिशत दोषी पकड़े जाएँ तो बात बने।

सो कानून तोड़ने, अपने व अन्य के जीवन को दाँव पर लगाने की आदत उम्र पर निर्भर न होकर हमारे सामाजिक व राष्ट्रीय चरित्र पर निर्भर होती है। यह चरित्र बनता है हमारी 'सब चलता है' के मूल मन्त्र के कारण। सरकार कानून तो बना सकती है किन्तु सही उम्र पर हमें कानून पर चलने की अक्ल आ ही जाएगी इस बात की गारन्टी तो नहीं दे सकती।

उम्र के सभी मील के पत्थर पार करने पर भी मैं बुद्धि की राह ही तक सकती हूँ। अब तो यही आशा है कि शायद साठवाँ जन्मदिन ज्ञान चक्षु खोल मस्तिष्क में ज्ञान का प्रकाश प्रदीप्त कर ही जाए। शायद महाराष्ट्र सरकार को भी साठ पार करने पर ही नागरिकों को परमिट उपहार में देना चाहिए। वैसे कोई गारन्टी नहीं कि ६० की उम्र समझदारी साथ लेकर आए।

घुघूती बासूती

Friday, April 16, 2010

जब सूजी नाक भी खबर बन गई!.........................घुघूती बासूती

मैं पत्रकारिता के विषय में कुछ नहीं जानती़। मैं संसार के अधिकतर विषयों के बारे में बहुत कम या कुछ नहीं जानती। किन्तु फिर भी मनुष्य को सहज ही किसी बात को देखकर यह लगता है कि कुछ गड़बड़ है, या किसी के साथ अन्याय हो रहा है, या यह कुछ अच्छा होता लग रहा है।
सुबह सैर करके आते से ही जिस चीज़ की सबसे अधिक आवश्यकता लगती है वह समाचार पत्र होता है। हमारे घर में उसका भी बंटवारा हो जाता है। सुबह दो पत्र आते हैं टाइम्स औफ़ इन्डिआ व मुम्बई मिरर। एक पति के साथ रास्ते में पढ़ने को जाता है एक मेरे पास रह जाता है। आजकल मुम्बई मिरर मेरे पास रह जाता है। रात को मैं टाइम्स औफ़ इन्डिआ पढ़ती हूँ। हाँ, तो हमारी सुबह सुखद या दुखद बहुत कुछ इस पर निर्भर करती है कि कैसे समाचारों पर नजर पड़ती है। दुखद घटनाएं तो दुख देती ही हैं किन्तु उसके अतिरिक्त भी कुछ बिना बात की खबरें होती हैं जो क्यों छापी गईं ही नहीं समझ आता। ये बस क्रोध दिलाती हैं, असहज करती हैं, असमंजस में डालती हैं, लगता है कि किसी के साथ अन्याय हुआ है और किसी की निजता पर डाका डला है। इनके छपने से किसका क्या लाभ होगा यह मेरी समझ से बाहर है।
आज सुबह भी यही हुआ। मुम्बई मिरर के चौथे पृष्ठ पर जो खबर व चित्र थे उनका क्या औचित्य है मैं समझ नहीं पाई। वे किसी स्त्री के बेहद निजी एलबम के फोटो हो सकते थे या फिर अपनी बेटी या बहू या किसी बहुत अपने को सुनाए किस्से कहानी हो सकते थे या शायद वह भी नहीं। क्योंकि कोई भी व्यक्ति और स्त्री होने के कारण कह सकती हूँ कि शायद ही कोई स्त्री, इस तरह की बातें व फोटो सारे संसार के सामने लाना चाहेगी। यदि कोई फोटो या बात लज्जाजनक न भी हो तो भी कुछ बातें बस अपने व अपने डॉक्टर तक ही सीमित रखना सही लगता है। किन्तु हाय रे मेरे देश व मेरे देश के मेडिकल ऐथिक्स (आचारनीति), यहां मरीजों के किस्से व फोटो भी सबके सामने आ जाते हैं।
समाचार का शीर्षक था, Who Nose The Real ......? उसके बाद आइ पी एल,कोची फ्रैन्चाइज़, व एक मंत्री आदि के साथ खबर बनी स्त्री की या कहिए उनकी नाक की तीन फोटो, जिनमें से एक औपरेशन से पहले का, एक बाद का और एक तब का जब सर्जरी के बाद उनकी नाक सूजी हुई थी(जी हाँ, यही शब्द हैं, औपरेशन के पाँच दिन बाद का सूजन!) व उनकी नाक की प्लास्टिक सर्जरी का समाचार था। किस सर्जन से करवाया किस सन में करवाया, विधवा होने के बाद करवाया आदि सब बताया गया था। यह भी समझ नहीं आया कि नाक की सर्जरी व वैधव्य का क्या रिश्ता बनता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि विधवा होने के बाद सौन्दर्य वर्धक सर्जरी कुछ गलत सी........। पता नहीं। शायद मैं हर बात को घुमा फिरा कर वहीं स्त्री व उसके प्रति लोगों के रवैये पर ले जाती हूँ। किन्तु कभी किसी ने किसी समाचार पत्र में पढ़ा है कि अमुक का विधुर होने के बाद का फोटो या अमुक ने विधुर होने के बाद यह काम किया, करवाया आदि या अमुक की विधुर होने के बाद शेव की हुई या बढ़ाई हुई दाढ़ी ? नहीं ना?
और हाँ, हमारे लिए यह जानना भी आवश्यक है कि इसके पहले उनके दो मोटापा कम करने के औपरेशन भी हुए थे। मैं असमंजस में हूँ। यदि कोई समझा सके कि यह खबर किसके लिए है, क्यों है, क्या इससे आइ पी एल वाले मुद्दे को सुलझाने या समझने में कुछ सहायता मिलेगी तो आभारी होऊँगी।
कोई है?
यह समाचार दिनांक १६.०४.२०१० के www.mumbaimirror.com में पढ़ा जा सकता है।
वैसे इससे एक दिन पहले के पत्र में यह भी पढ़ा जा सकता है कि मंत्री जी ने कहा था कि हमारी मीडिया एक आकर्षक स्त्री के कुशल व्यवसाई होने की धारणा को स्वीकार नहीं कर सकती। लीजिए, सबूत भी मिल गया। मीडिया तो उसके आकर्षक होने को भी कृत्रिम सिद्ध कर रही है।

नोटः यदि आपकी भी कोई नाक सिनकते, छींक मारते, कान खुजाते, उबासी लेते, गाल में फोड़ा निकले या पिम्पल्स वाले फोटो हों तो छिपा लीजिए। क्या पता कब आप भी प्रसिद्ध हो जाएँ और ये फोटो समाचार पत्रों की शोभा बढ़ाएँ?
घुघूती बासूती

Thursday, April 15, 2010

ब्लॉग लेखक की गिरफ्तारी। .........................................घुघूती बासूती

किसी भी सुविधा का उपयोग मनुष्य अपने मूलभूत स्वभाव के अनुसार करता है। जब भी कोई नई खोज या आविष्कार होता है तो लोग अपनी प्रकृति के अनुसार उसके उपयोग ढूँढ लेते हैं। जेबकतरा शेविंग ब्लैड जेब काटने के लिए, आत्महत्या का प्रयास करने वाला कलाई कि नसें काटने, हत्यारा गला काटने के लिए व विद्यार्थी पैंसिल छीलने के लिए कर लेते हैं। नशेड़ी खाँसी की दवा में नशा ढूँढ लेता है। वस्तु कितनी भी अच्छी क्यों न हो उसका उपयोग वैसा ही होता है जैसा व्यक्ति स्वयं होता है।

यही हाल नेट का भी है। नेट का उपयोग कोई जानकारी पाने के लिए करता है, मेल भेजने, गप्प मारने, ब्लॉग लिखने, नेट बैंकिंग, शेयर खरीदने बेचने आदि आदि के लिए करता है। किन्तु धोखाधड़ी करने वाला धोखे के लिए करता है, लोगों को चूना लगाने के लिए करता है। ब्लॉग लेखन कोई अपने मन की बात लोगों तक पहुँचाने को करता है तो कोई किसी व्यक्ति, संस्था, धर्म या किसी अन्य के विरुद्ध लिखने, उसकी छवि धूमिल करने के लिए करता है।

१५.‍०४.‍२०१० के मुम्बई मिरर के मुख्य पृष्ठ पर ऐसे ही एक व्यक्ति की गिरफ्तारी का समाचार छपा है जिसपर अभियोग लगाया गया है कि वह अपने ब्लॉग का प्रयोग ग्लोबल इन्डियन फाउन्डेशन नामक संस्था की बदनामी के लिए करता था। ग्लोबल इन्डियन फाउन्डेशन ग्लोबल इन्डियन इन्टरनेशनल स्कूल चलाती है। इसके सिंगापुर स्कूल में अभियुक्त काम करता था। वहाँ से कुछ गड़बड़ियों के कारण उसे निकाल दिया गया था अतः वह ग्लोबल इन्डियन इन्टरनेशनल स्कूल पेरेन्ट्स फोरम फोर ए बैटर GIIS नामक ब्लॉग चला रहा था जिसमें संस्था के बोर्ड के सदस्यों के बारे में अपमानजनक बातें कही जाती थीं। इस ब्लॉग के सिंगापुर निवासी को मॉडरेटर को पहले पकड़ा गया। फिर उसके द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर अब भारत में रहकर काम करने वाले अभियुक्त को पकड़ा गया।

आगे जाँच व मुकदमे में क्या होगा कहा नहीं जा सकता किन्तु इतना तो सिद्ध हो जाता है कि ब्लॉग का दुरुपयोग हम अपनी व्यक्तिगत खुन्दक निकालने के लिए किसी की मानहानि करने के लिए करेंगे तो अदालत के चक्कर भी लगाने पड़ सकते हैं। को मॉडरेटर होना भी हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है, विशेषकर तब जब हम मॉडरेटर व उसके इरादों को जानते न हों।

यह समाचार १५.‍०४.‍२०१० के www.mumbaimirror.com पर पढ़ा जा सकता है।

घुघूती बासूती

Thursday, February 11, 2010

कुछ बातें सही गलत की सब मर्यादाओं से बाहर की होती हैं !................घुघूती बासूती


जीवन में हम अधिकतर बातों को सही या गलत, काले या सफेद, अच्छे या बुरे के साँचे में डालने के यत्न में लगे रहते हैं। यह हमारे लिए सुविधाजनक होता है। इससे मस्तिष्क को कम से कम कष्ट होता है। सबसे बड़ा लाभ तो यह होता है कि हमें अधिक चिन्तन भी नहीं करना पड़ता । किसी अन्य के बनाए मूल्यों को हम जीवन भर अपना कहकर जीते चले जाते हैं, उनपर न विचार करते हैं, न प्रश्न करते हैं, न यह सोचते हैं कि क्या ये मूल्य हर समय, काल, स्थान व परिस्थिति में खरे ही उतरेंगे, या ये किसी विशेष स्थिति में गलत सिद्ध तो नहीं हो जाएँगे। यह लाभ भी होता है कि चिन्तन न करके हम अपनी उर्जा बचा लेते हैं और यह बची हुई उर्जा हम किसी अन्य द्वारा निर्धारित शत्रुओं* से शत्रुता निभाने में सदुपयोग कर सकते हैं। जो व्यक्ति या बात हमारे द्वारा बनाए या माने गए सही या गलत, काले या सफेद, अच्छे या बुरे के साँचे में न बैठे या तो हम उसके होने को ही नहीं मानते या उसे हम खारिज कर देते हैं या उसे हम जाति, समुदाय आदि से बाहर कर देते हैं।

आज के टाइम्स औफ़ इन्डिया के अनुसार १९ वर्षीय ब्रॉन्सन स्टीवर्ट नामक न्यूज़ीलैंड के एक व्यक्ति पर अपने ही पिल्ले की चोरी करने के लिए कानूनी कार्यवाही हो सकती थी। जब उनके पाँच महीने के पिल्ले बक का पैर एक कार दुर्घटना में घायल हो गया तो उसे जानवरों के डॉक्टर को दिखाया गया। वह और उसका परिवार उसके इलाज के लिए १७३० न्यूज़ीलैंडी डॉलर या उसका पैर कटवाने के लिए ५५५ न्यूज़ीलैंडी डॉलर देने में असमर्थ थे। वे स्वयं सरकारी सहायता पर आश्रित हैं। उन्होंने क्लिनिक को हर सप्ताह ३.५ न्यूज़ीलैंडी डॉलर देने की पेशकश की जो क्लिनिक ने अस्वीकार कर दी। डॉक्टर ने उनका पिल्ला यह कहकर रख लिया कि ऐसे में उन्हें उसके कष्ट से बचाने के लिए यूथेनेशिया /सुखमृत्यु देनी होगी सो पिल्ला उन्हें वापिस नहीं मिलेगा।

ब्रॉन्सन पिल्ले से मिलने के बहाने क्लिनिक गया और पिल्ले को उठाकर भाग गया। उसे कुत्ता चुराने के अपराध, कुत्ते को कष्ट में रखने के अपराध में सजा हो सकती थी। New Zealand's Society for the Prevention of Cruelty to Animals (SPCA) ने उस पर कानूनी कार्यवाही करने की धमकी भी दी। किन्तु ब्रॉन्सन ने कहा कि वह बक को मरता नहीं देख सकता है चाहे उसे सजा होती है तो होए।

सौभाग्य से यह समाचार जब लोगों ने पढ़ा तो सहायता के लिए बहुत से लोग आगे आए और लगता है कि अब बक का इलाज भी हो जाएगा और ब्रॉन्सन को सजा भी नहीं होगी।

इस घटना के बारे में पढ़कर जो प्रश्न खड़े होते हैं वे हैं....
क्या चोरी सही है?
क्या अपने ही पिल्ले की चोरी सही है?
क्या किसी विशेष स्थिति में चोरी भी सही हो जाती है?
क्या किसी के पिल्ले को यूथेनेशिया के लिए छीन लेना सही है?
क्या यूथेनेशिया सही है?
क्या मूक प्राणी की यूथेनेशिया सही है?
क्या मूक प्राणी की यूथेनेशिया तब सही है जब उसके मालिक(?) सहमति दें?
क्या मूक प्राणी की यूथेनेशिया तब सही है जब उसके मालिक उसके इलाज के लिए धन न दे सकें?
क्या धन मिल जाने से अपराध क्षम्य हो जाते हैं?

और भी ऐसे बहुत से प्रश्न मन में उठेंगे व उठते रहते हैं। काले या सफेद में विश्वास करने वाले ग्रे की सम्भावना को नकारते हैं। वे भगवान** पर तो विश्वास कर सकते हैं किन्तु मानवता को नकारते हैं। वे ब्रॉन्सन को कड़ी से कड़ी सजा देना चाहेंगे। उनके अनुसार बक नामक पिल्ले का जीवन महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपर्ण है तो केवल सजा। (जैसे सजा के उद्देश्य से ही मनुष्य को धरती पर लाया गया था और मजा यह कि उसी साँस में जिसके नाम पर सजा देते हें उसे दयालु भी कहेंगे!)

वे कह सकते हैं कि गिल्ली डंडा खेलना गलत है। कारण कुछ भी हो सकते हैं वर्ग, धर्म, देश, संस्कृति, जाति आदि के विरुद्ध होना। वे हमें गिल्ली डंडा खेलने से रोकेंगे, या उसे देखने से रोकेंगे और हम रुक भी जाएँगे क्योंकि हम ब्रॉन्सन स्टीवर्ट नहीं हैं, १९ वर्षीय नहीं हैं, सरकारी सहायता पर आश्रित नहीं हैं। हमारे पास खोने को बहुत कुछ है सो हम डर जाएँगें और ग्रे की सम्भावना से इन्कार कर देंगे। हम मान लेंगे कि संसार में केवल और केवल काला और सफेद है, ग्रे तो कभी देखा या सुना ही नहीं है। हम तो बस ऐसे में एक पोस्ट लिख देते हैं ब्रॉन्सन स्टीवर्ट के बारे में।

*
शत्रुओं*
जैसे वर्ग शत्रु, धर्म शत्रु, देश शत्रु, भाषा शत्रु, संस्कृति शत्रु, जाति शत्रु, नगर शत्रु, समुदाय शत्रु आदि आदि।

**
भगवान** या वर्ग, धर्म, देश, भाषा, संस्कृति, जाति, नगर, समुदाय आदि।

नोटः चित्र गूगल से साभार।

घुघूती बासूती

Friday, January 08, 2010

सेल फोन कान से चिपकाने के कितने लाभ! आम के आम गुठलियों के दाम!.........घुघूती बासूती

हममें से बहुत से लोग सेल फोन कान से चिपकाए पति, पत्नी, बच्चों, मित्रों से प्रायः परेशान हो जाते हैं। सेल फोन कान पर लगाकर वे जैसे समाधिस्थ हो जाते हैं। फिर आप कुछ बोलने के लिए इर्द गिर्द मंडराते रहिए। बच्चे को स्कूल की फीस माँगनी होती है, बस चाहे छूट जाए, मोबाइल का छूटना कठिन है। स्त्रियाँ तो घर के काम एक हाथ से या मोबाइल को कंधे व कान के बीच संतुलित कर करने में माहिर हो गईं हैं। (जब से मेरी एक बाँह टूटी है मैं मोबाइल का उपयोग न करने की अपनी आदत पर बहुत पछताती हूँ। अन्यथा मैं भी एक हाथ से जीने की कला में पारंगत होती!) दफ्तरों में लोग मोबाइल टंगाए जैसे 'विघ्न मत डालो' की तख्ती लगाए बैठते हैं। उनसे जिनका काम हो उनकी पंक्ति चाहे जितनी भी लम्बी हो जाए।

किन्तु इन मोबाइलधारकों के लिए एक खुशखबरी है। नया शोध कहता है कि मोबाइलधारकों को एलज़ाइमर्स होने की सम्भावना बहुत कम है। यही नहीं यदि पहले से है तो मोबाइल का अधिक उपयोग करने से रोग में लाभ भी होगा। अब यह बात और है कि इस रोग के रोगी को मोबाइल क्या है याद रहेगा? यदि याद भी रहा तो वह कहाँ रखा है याद रहेगा? यदि वह भी मिल गया तो किसको फोन करना है यह क्या याद रहेगा? एलज़ाइमर्स वृद्धावस्था का रोग है और इसमें स्मृति कम होती जाती है।

यह शोध अभी तो चूहों पर ही हुआ है किन्तु आशा है मनुष्य पर प्रयोग भी इस बात की पुष्टि करेंगे। यदि यह सच निकला तो हम सब अपने अपने नानी नाना, दादी दादा को मोबाइल ही उपहार देना चाहेंगे। यदि सारा दिन मोबाइल चिपकाए रहने पर कोई टोकेगा तो कह देंगे कि हमें अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखने दो।

वैसे भी भारतीय निश्चिन्त रहें, उन्हें और चाहे जितने रोग हों एलज़ाइमर्स होने की सम्भावना बहुत कम है। कारण एक तो हमारा मोबाइल प्रेम दूसरा हमारा हल्दी प्रेम! हम अपने भोजन में हल्दी का बहुत प्रयोग करते हैं, चोट लगने, जुकाम खाँसी होने या ठंड में हल्दी डालकर दूध पीते हैं। हल्दी भी एलज़ाइमर्स होने की संभावना को कम करती है।

तो देखिए हम भारतीयों के पास एक रोग से बचने की दो युक्तियाँ हैं।

घुघूती बासूती

Thursday, December 24, 2009

और आप सोचते थे कि मनुष्य और पक्षी ही गृह निर्माण करते हैं!.......घुघूती बासूती



हमारे सोचने से क्या होता है? इन्डोनेशिया की एक औक्टॉपस की प्रजाति तो ऐसा बिल्कुल नहीं सोचती। वे नारियल के कटोरीनुमा खोल इकट्ठा करते हैं। अब अष्टभुज हैं तो अपनी भुजाओं का प्रयोग भी खूब करते हैं। वे समुद्र के तल से मनुष्यों द्वारा फेंके गए नारियल के खोल उठाते हैं। उनमें से रेत आदि खाली करते हैं और फिर उन्हे अपने निवास स्थान पर ले जाते हैं। वहाँ जाकर दो खोलों को तरीके से एक के ऊपर एक रखकर अपना मकान बना लेते हैं।

काश हमारे नाप के खोल भी मिलते। फिर हम भी अपनी मनपसंद जगह पर अपना मकान बना लेते। जब ऊब जाते तो मकान उठाकर कहीं और ले जाते।

अपृष्ठवंशी प्राणी द्वारा औजार के उपयोग का यह पहला उदाहरण है।

नोटः चित्र नैशनल ज्योग्राफिक से साभार लिए गए हैं।

घुघूती बासूती

Thursday, December 17, 2009

एलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है?..........घुघूती बासूती

क्या पता क्यों आता था? मैंने तो यह फिल्म देखी नहीं । परन्तु जब जब किसी के गुस्से के बारे में देखती, सुनती, पढ़ती हूँ तो इस फिल्म का नाम याद अवश्य आ जाता है। गुस्सा आना भी समझा जा सकता है किन्तु गुस्से में पगलाना और किसी को जान से मार देना मेरी समझ से परे है। वह भी तब जब बात इतनी छोटी हो कि आम व्यक्ति उस पर ध्यान भी न दे। पता नहीं उनके मस्तिष्क की वायरिंग ही गड़बड़ होती है कि जल्दी ही गरम हो जाता है उनका मस्तिष्क। काश मस्तिष्क में भी कोई फ्यूज़ लगा होता जो ऐसे समय में उड़ जाता और मस्तिष्क ठंडा होने पर जुड़ जाता। न भी जुड़ता तो स्वयं ही भुगतते, किसी अन्य को जान से हाथ तो न धोना पड़ता।

अब यह सड़क पर वाहन चालकों के क्रोध को ही देख लीजिए। रोड रेज़ शब्द है इसके लिए। अपना स्वयं का वाहन है फिर भी इतना क्रोध तो यदि धूप में पैदल चल रहे होते तो पता नहीं हाथ में कुल्हाड़ी या गंडासा या दोनों ही लिए चलते क्या?
मुम्बई हवाई अड्डे के पास के पुल पर १५ दिसम्बर की सुबह एक सैन्ट्रो कार ने एक हौन्डा सिटी कार से आगे निकलने का दुस्साहस किया। हौन्डा सिटी के चालक को यह असह्य लगा। वह तेज गति से सैन्ट्रो के सामने कार ले आया और रास्ता रोक दिया। सैन्ट्रो कार का चालक उतर कर कारण पूछने लगा तो पीछे बैठे व्यक्ति ने उसका कॉलर पकड़ लिया और चालक तेजी से कार चलाने लगा जिससे कुछ मीटर तक वह घिसटता गया कॉलर जब छोड़ा गया तो वह कार के पिछले पहिए के नीचे कुचला गया। हस्पताल में उसकी मृत्यु हो गई।

आप कहेंगे कि जमाना खराब आ गया है, या ये आजकल के युवक बहुत बिगड़ गए हैं। किन्तु यह बात जमाने या युवकों की नहीं है।

कुछ दिन पहले पढ़े एक समाचार ने मुझे यह सोचने को बाध्य किया कि शायद मनुष्य है ही ऐसा। पहले शायद संचार माध्यम कम थे और समाचार लोगों तक पहुँचते नहीं थे किन्तु होता सदा से शायद ऐसा ही रहा है। अब किसी ९८ वर्षीया स्त्री को हम या यह जमाना क्या बिगाड़ेगा?

हुआ यूँ कि अमेरिका के एक वृद्धों के नर्सिंग होम में दो वृद्धाएँ क्रमशः ९८ व १०० वर्ष की, एक ही कमरे में रहती थीं। ९८ वर्षीया को लगता था कि १०० वर्षीया कमरे को हड़पे हुए है, कि उससे बहुत लोग मिलने आते हैं आदि आदि। अब यदि हम किसी से नाराज होना चाहें तो हजार कारण ढूँढ सकते हैं। सो उसने भी ढूँढ लिए होंगे। एक शाम उसने १०० वर्षिया के पलंग के सामने मेज रख दिया ताकि वह शौचालय न जा सके। नर्स ने वह हटाया। अगली सुबह जब नर्स कमरे में आई तो उसने देखा कि १०० वर्षीया के सिर के चारों तरफ एक पॉलीथीन की थैली है और वह मर चुकी है। पहले उसने सोचा कि वृद्धा ने आत्म हत्या कर ली। किन्तु बाद में देखा कि उसके गले पर गला घोंटने के निशान हैं। रात को जब १०० वर्षीया वृद्धा सो गई तो ९८ वर्षीया वृद्धा ने उसके चेहरे पर पॉलीथीन की थैली चढ़ा दी और उसका गला भी दबा दिया था।

अब इस हत्या को क्या कहा जाएगा? यह भी कहा जा सकता है कि उनके बच्चों को उनका ध्यान रखना चाहिए था, उन्हें अपने साथ रखना चाहिए था। किन्तु कैसे बच्चे? उनक संतानें तो अब तक स्वयं ७० वर्ष के आस पास की उम्र की होंगी व उन्हें स्वयं कोई ध्यान रखने वाले की आवश्यकता होगी। मैं तो यही कहूँगी कि मनुष्य शायद एक हिंसक प्राणी ही है और समाज व कानून का भय ही उसे भद्र बनाता है। यह भय खत्म हुआ या उस भय को वह भुला बैठा तो अपने वास्तविक हिंसक स्वरूप में आ जाता है।

घुघूती बासूती

Sunday, December 13, 2009

मित्र की कीमत एक सीताफल!.........घुघूती बासूती

जी हाँ, वही सीताफल जो शरीफ़ा भी कहलाता है। इस शरीफ़े ने चार लड़कों की शराफ़त ही हर ली और एक की तो लगभग जान ही ले ली।

हुआ यूँ कि वनगाँव आश्रमशाला के १२ से १४ साल उम्र के पाँच लड़के जंगल में घूमने गए। वहाँ उन्हें एक सीताफल मिला जिसे तोड़कर वे अपने साथ ले आए। क्योंकि वह कच्चा था सो उसे पकाने के लिए डबका के सन्दूक में रख दिया गया। अगले दिन जब सन्दूक खोला गया तो फल गायब था। डबका पर फल खाने का सन्देह हुआ। सो अन्य चारों ने मिलकर उसकी जमकर पिटाई की। कमर में बाँधे जाने वाले काले धागे से उसका गला भी घोंटने का प्रयास किया। फिर वे अपने बेहोश दोस्त को घसीटकर एक नाले के पास फेंक आए।

दो दिन तक जब डबका अनुपस्थित रहा तो शाला के अधिकारियों ने उसके घर जाकर पता लगाया कि कहीं वह घर तो नहीं पहुँचा। वहाँ न मिलने पर उन्होंने उसे जंगल में ढूँढना शुरू किया। दो दिन से बेहोश पड़ा डबका उन्हें मिल गया। उसकी जान बचा ली गई।

किन्तु क्या हममें इतना क्रोध भर गया है कि एक सीताफल के लिए हम किसी की जान ले सकते हैं? इतना क्रोध आया कहाँ से? क्या इतने छोटे बच्चे भी इतने निर्मम हो सकते हैं? या क्या हम जन्म से ही निर्मम होते हैं और हमारा समाज व परिवार हमें दया और मोह सिखाता है?

क्या हमें बच्चों को अपने क्रोध पर काबू पाना नहीं सिखाना चाहिए? माता पिता से यह अपेक्षा करना वैसा ही है जैसे गूँगे से गाना गाने की। तो स्कूल में अध्यापकों को पहले दो एक साल क्या बच्चों को शिष्टता, व्यवहार, सहयोग, नैतिक मूल्य, क्रोध पर काबू करना, क्रोध को सही दिशा देना, अपनी भावनाओं को दिखाने का सही तरीका आदि ही नहीं सिखाना चाहिए? पढ़ना लिखना दो एक साल बाद भी हो सकता है किन्तु अच्छा मनुष्य बनाने में देर नहीं होनी चाहिए।

किन्तु प्रश्न यह उठता है कि अध्यापकों को क्रोध पर काबू पाना कौन सिखाएगा? सबसे पहले तो उन्हें ही यह सिखाना पड़ेगा। जब मैंने अध्यापन शुरू किया था तो अपने आपसे यह प्रतिज्ञा की थी कि जिस दिन भी मेरा मन हाथ उठाने का होगा उसी दिन मैं पढ़ाना बंद कर दूँगी। मेरे अध्यापन के दिनों में एक अध्यापिका अपने क्रोध के लिए जानी जाती थीं। उन्हें गुस्सा बहुत सरलता से आ जाता था और फिर उनके हाथ में होता था डंडा और विद्यार्थियों का सुकोमल शरीर धुन देती थीं। क्योंकि उनकी उम्र बहुत कम थी सो मैं उन्हें रोक पाती थी। मैंने उनसे निवेदन किया कि जब भी क्रोध आए तो दस तक गिनें। चाहें तो बोलकर ही गिनें। इससे विद्यार्थियों को भी पता चल जाएगा कि उन्हें जोर का गुस्सा आया है। और डंडा तो कभी भी अपने साथ न रखें। यह तरकीब सफल रही।

परन्तु मुझसे भी उम्र में बड़ी एक अध्यापिका थीं जो आराम से अपनी कलाई की सारी चूड़ियाँ उतारती थीं और फिर आराम से बच्चों की ठुकाई करती थीं। जिसका अर्थ तो यह हुआ कि वे सोच समझकर पीटती थीं। एक अन्य अध्यापक तो पिटाई करते समय अपने होशोहवास ही खो बैठते थे।

जब अध्यापक विद्यार्थियों को मारते हैं तो क्या वे उन्हें यह पाठ नहीं पढ़ाते कि गुस्सा आए तो मारो? किसी से कोई गलती हो जाए तो मारो। याने समस्या का समाधान यही है। यही पाठ घर में अभिभावक भी सिखाते हैं। फिर क्या आश्चर्य जो एक शरीफ़े के लिए बच्चे अपनी सारी शराफ़त, सारी दोस्ती ताक पर धर दें और जान लेने पर उतारू हो जाएँ?

घुघूती बासूती

Friday, December 11, 2009

एक बल्ब जलाना चाहते हैं तो दो लाख रुपए का जुगाड़ कर लें ! ....घुघूती बासूती

सन्तोष अहीरे जी ने आठ साल की बड़ी लम्बी मेहनत मशक्कत के बाद किसी तरह एक छुटके से स्टॉल का जुगाड़ किया और लग गए जूतों चप्पलों की मरम्मत कर अपना व अपने परिवार का पेट पालने। परन्तु वे क्या जानते थे कि इस एश्वर्य के लिए बहुत बड़ा बिल भी चुकाना पड़ता है। पहले महीने उनका बिजली का बिल ३० रुपए का था, दूसरे महीने ३७० रुपए और तीसरे महीने! तीसरे महीने बिल था २.०१५ लाख रुपए! मीटर भी स्टॉल के अन्दर है और उसके साथ कोई छेड़छाड़ भी नहीं हुई है।

जब वे बिजली विभाग में गए तो उन्हें बताया गया कि बिल सही है और वे आधा अभी भर दें अन्यथा बिजली काट दी जाएगी। ( टाइम्स औफ इन्डिया ११.१२.२००९)

अब यदि वे इतना बिल भर सकते तो मोची की दुकान लगाने के बदले जूतों का शोरूम न खोल लेते?
मुझे १९९८ में हमारे आन्ध्र प्रदेश के कड़पा जिले में बिताए दिनों की एक घटना याद गई। वहाँ हमारी कामवाली भी एक कमरे के मकान में रहती थी जहाँ उसने समझदारी कर बल्ब नहीं ट्यूबलाइट लगा रखी थी। एक बार उसका बिल भी चार हजार कुछ सौ रुपयों का आया। उसने बिजली विभाग में शिकायत की कि यह गलत है। वह केवल एक ट्यूबलाइट जलाती है। किन्तु उसकी सुनवाई नहीं हुई। बिल न भरने के कारण उसके घर की बिजली काट दी गई।

उन दिनों पिताजी भी हमारे साथ थे व वे मुख्यमंत्री चन्द्र बाबू नायडू के बारे में समाचार पत्रों में पढ़ते रहते थे कि कैसे वे हर शिकायत पर ध्यान देते हैं। सो उन्होंने कामवाली को सलाह दी कि वह एक पत्र उन्हें लिखे। उसने वही किया। और कुछ ही दिनों में बिजली विभाग वाले उसके घर आकर उसके घर की बिजली वापिस चालू कर गए और सही बिल भी दे गए।

कामवाली तो नायडू जी की बहुत बड़ी प्रंशसक बन गई। किन्तु वे अगला चुनाव हार गए। शायद जिन लोगों को उन्होंने सही रास्ते पर आने के लिए खींचा हो, जैसे बिजली विभाग वाले आदि ने उन्हें अपना मत नहीं दिया।

तो यह जादू किया नायडू को लिखे एक पत्र ने। परन्तु क्या कुछ और मुख्यमंत्री भी उनके जैसे तुरन्त कार्यवाही करने वाले हैं? शायद सन्तोष अहीरे जी भी पत्र लिखकर पता लगा सकते हैं। पता नहीं कि साधारण जनता के कष्ट दूर करने का खतरा सब मुख्यमंत्री भी उठाएँगे या नहीं।

घुघूती बासूती

Wednesday, December 09, 2009

प्रिये, सोने से पहले जरा मेरे नकली दाँत संभाल देना!

यह संवाद किसी वृद्ध दंपत्ति के बीच हो तो चलेगा तो क्या दौड़ेगा। किन्तु जब ऐसी स्थिति सुहागरात को आई तो संवाद का चाहे जो हुआ दुल्हन तो भाग ली।

जी हाँ, देखभाल कर चुने गए इस वर से कई बार मिलने पर भी दुल्हन या उसके परिवार वालों को जरा भी शक नहीं हुआ कि दूल्हे मियाँ नकली चीजें फिट करवाकर ही इतने टिप टॉप नजर आ रहे हैं।

सुहागरात को सबसे पहले दूल्हे ने अपना विग उतारकर रखा। दुल्हन ने सब्र कर लिया। सोचा होगा देर सबेर लगभग सभी पति गंजे तो हो ही जाते हैं तो चलो आज ही सही। किन्तु जब उन्होंने अपने नकली दाँत भी निकाल डाले तो उसने वहाँ से भाग निकलने में ही अपनी भलाई समझी।

दुल्हन ने जिस युवा से सगाई की थी वह कुछ क्षणों में ही दंत व बालविहीन प्रौढ़ में परिवर्तित हो जाएगा इसकी तो उसने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी। उसने अपने घर जाकर माँ को पति के इस मैटामोर्फिसिस के बारे में बताया और फिर पुलिस में धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज करा दी।

वैसे दूल्हे की उम्र २७ साल बताई गई थी और जब दूल्हे के पिता की उम्र ५३ साल है तो फिर समझ में नहीं आता कि बेचारा किस विपत्ति का मारा है जो नौबत विग व नकली दाँतों तक आ पहुँची। अब दूल्हा व उसका पिता गिरफ्तार कर लिए गए हैं। शायद ऐसी ही किसी हृदयविदारक स्थिति को देककर कहा गया होगा,'आए थे हरि भजन को ओटन लगे कपास'जैसा कुछ।

सोचने की बात यह भी है कि क्या स्त्रियों को भी भावी पति को बताना होगा कि वे वैक्सिंग करती हैं, भवें ठीक करवाती हैं, ऊपरी होंठ के ऊपर के बाल हटवाती हैं आदि आदि? या फिर क्या अधेड़ उम्र लोग जब विवाह करें तो बताएँ कि उनके गाल, ठोड़ी या ललाट बोटोक्स के इंजेक्शन के दम पर झुर्री विहीन हैं, या बाल डाई किए हुए हैं। आज यह कहना कठिन है कि शरीर का कौन सा हिस्सा स्वाभाविक है और कौन सा सर्जन या ब्यूटी पार्लर ने निखारा है।

एक युवती जो बचपन से कुछ अधिक ही स्वस्थ थी, विवाह से एक साल पहले डायटिंग करने लगी। पति ने छरहरी युवती को देखा और छरहरी युवती से विवाह रचाया। विवाह के बाद छरहरेपन से अधिक स्वाभाविक रूप से भोजन खाना श्रेयस्कर समझ युवती वापिस ८० किलो की हो गई। मुझे तब भी लगता था कि शायद यह धोखा है। बहुत से पुरुष भी कुछ महीनों के लिए जिम जाकर सिक्स पैक वाले बन जाते हैं और विवाह के बाद वापिस तौंदू बन जाते हैं।

मुझे तो लगता है कि जैसे लोग दहेज की सूची बनाकर देते हैं वैसे ही दूल्हा दुल्हन को असली नकली की सूची भी बनाकर एक दूसरे को दे देनी चाहिए और हाँ, साथ में अपने पिछले कुछ सालों का वजन भी लगे हाथ लिखकर दे देना चाहिए।

घुघूती बासूती

Wednesday, November 25, 2009

और वह फिर जी उठा

हम कभी भी यह मानकर नहीं चल सकते कि हम अन्तिम सच जानते हैं। यहाँ तक कि विज्ञान भी यह दावा नहीं कर सकता। जिसे हम आज सच मानते हैं वह कल झूठ साबित हो सकता है। फिर पूर्वाग्रहों की तो बिसात ही क्या!

कल के टाइम्स औफ इन्डिया में जो समाचार पढ़ा उससे मेरा सदा यह कहना कि हम कोई भी बात शत प्रतिशत दावे के साथ कम ही कह सकते हैं, काफी हद तक सही सिद्ध हुआ।

समाचार दिल दहला देने वाला है। २३ वर्ष पहले एक बेल्जियम निवासी कार दुर्घटना का शिकार हुआ। उसे २३ वर्ष तक कोमाग्रस्त माना जाता रहा। डॉक्टर लगातार अन्तर्राष्ट्रीय मान्य मापदण्डों से २० वर्ष तक उसका परीक्षण करते रहे और उसे कोमा की वेजीटेटिव स्थिति में ही समझते रहे। उसकी आँखों की, मौखिक या मोटर प्रतिक्रियाओं की अनुपस्थिति के कारण उसे चेतनाशून्य समझते रहे। परन्तु जब ३ वर्ष पहले नए उपकरणों से उसका परीक्षण किया तो पाया कि उसका मस्तिष्क लगभग सामान्य काम कर रहा था। मरीज का केवल शरीर ही पूर्ण रूपेण लकवाग्रस्त था। उसके आसपास क्या हो रहा है इसकी चेतना उसे थी। वह सबकुछ सुन भी सकता था।

वह अब कम्प्यूटर की सहायता से संदेश लिख सकता है। वह एक विशेष उपकरण की सहायता से पुस्तकें पढ़ सकता है। उसने कहा कि इतने वर्ष तक वह अपने को स्वप्न ही दिखाकर समय बिताता रहा। वह चिल्लाता था किन्तु कोई आवाज नहीं होती थी। जिस दिन चिकित्सकों को उसकी स्थिति का पता चला उस दिन उसका पुनर्जन्म हुआ। अब जब सब जानते हैं कि वह मृत नहीं है तो वह चाहता है कि वह पढ़े, बात करे और जीवन का आनन्द ले। वह कहता है कि जिस स्थिति को उसने जिया उसके लिए कुण्ठा शब्द बहुत ही छोटा है।

अब उसके चिकित्सक सोच रहे हैं कि हो सकता है कि उसके जैसे ही अन्य रोगी भी हों जिन्हें चेतनाशून्य माना जा रहा हो।
उस व्यक्ति की स्थिति की कल्पना ही कितनी भयावह है। उसके सामने ही सब उसकी स्थिति का विष्लेषण करते होंगे। हो सकता हो कि कोई यह भी कहता हो कि कुछ भी नहीं किया जा सकता, कि उसे यन्त्रों से जीवित रखना गलत है। अभी दो एक वर्ष पहले ही एक वेजीटेटिव स्थिति वाली स्त्री का आहार बन्द कर उसे मुक्ति दी गई थी। तब यह नीति शास्त्र का मुद्दा बना था। स्त्री के माता पिता ने विरोध किया था और पति ने उसकी स्थिति देखते हुए आहार बन्द करने की न्यायिक अनुमति प्राप्त कर ली थी।

कोई भी परिवार उतनी लम्बी अवधि तक ऐसे रोगी की सेवा करने में अक्षम ही होगा। यह दायित्व समाज व सरकार ही उठा सकते हैं।

और एक अन्य बात जो इससे सिद्ध हो जाती है वह यह कि संसार में सबकुछ संभव है सिवाय हमारे ज्ञान के कभी भी परिपूर्ण होने के।

घुघूती बासूती