वैसे इसका शीर्षक 'आओ डूब मरें' भी हो सकता था।
खबर है(मुम्बई मिरर,२३.१०.२०११, व ई सकाळ) कि सतारा व उसके आसपास की १५० नाकुशा व नकोशी नाम की लड़कियाँ अपना नाम बदलकर अस्मिता, एश्वर्या, कोमल, शिवानी, पूजा आदि बन गई हैं। यह 'नाम बदलो कार्यक्रम' सतारा जिले में २२.१०.२०११ को सम्पन्न हुआ।
सुनने में तो नाकुशा(नकुशा तो नहीं?)या नकोशी बुरे नहीं लगते फिर इतनी लड़कियाँ अपने नामों से क्यों नाराज थीं? क्यों उन्होंने स्वयं अपने नाम चुने और सुबह सुबह नाम बदलवाने को अपने दूर दराज के गाँवों से सतारा पहुँची?
तो सुनिए, हमारे इस स्त्रियों का आदर करने वाले देश में, देवियों की पूजा करने वाले देश में, बच्चियों को देवी का रूप मान नवरात्रियों में उनके पैर धोकर उनकी पूजा करने वालों के देश में, उनको जन्मने से रोकने के भाँति भाँति के अन्धविश्वास से लेकर व्यावहारिक से लेकर वैज्ञानिक उपाय जैसे टोटके, झाड़फूँक, तावीज,विशेष भोजन, भ्रूण हत्या,नर भ्रूण की गर्भ में स्थापना करना व न जाने कितने और तरीके अपनाए जाते हैं। ये सब तो हमने सुने हुए थे। आज एक नया उपाय पता चला। बच्ची को ऐसा नाम दे दो कि उसके बाद उस परिवार में कोई बच्ची जन्म लेने का दुस्साहस ही न करे।
जब किसी गर्भवती स्त्री ने पुत्र की आशा की हो और पुत्री हो जाए तो 'नको होती' जैसा कुछ मराठी में कहा जाता है जिसका अर्थ है, नहीं चाहिए थी। और यह लड़की नकोशी बन जाती है। नाकुशा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है जो अजित वडनेरकर जी समझा सकते हैं। ये सब बच्चियाँ जानती हैं कि वे अनचाही संतान हैं।
वैसे एक बात तो माननी होगी कि ये माता पिता खुल्लमखुल्ला बता देते हैं कि तुम नहीं चाहिए थी। कितने माता पिता तो यह नहीं कह पाते और पुत्र की चाह में पुत्री जन्मने के बाद उसे अच्छा सा नाम दे जीवन पुत्र की चाहत में गुजार देते हैं। स्पष्टवादिता भी एक गुण है और बच्ची जन्म से ही कोई भ्रम नहीं पालती।
खैर,अब पन्द्रह साल की नकोशी अस्मिता बन सकती है। नाकुशा कोमल और एक अन्य उज्जवला। यह बात और है कि नए नामों के प्रमाण पत्र बनाने वाले भी उनके माता पिता से बहुत भिन्न नहीं हैं सो नकोशी अस्मिता बनते बनते स्वाति बन गई है और उसे बताया गया है चिन्ता मत करो, तुम्हारा नाम ठीक कर अस्मिता कर दिया जाएगा। अस्मिता बनना चाहने वाली नकोशी को स्कूल पसन्द है व पढ़लिखकर अध्यापिका बनना चाहती है। वह दुखी है कि नाम बदलवाने के चक्कर में स्कूल में परीक्षा भी छूटी और नाम भी अपनी पसन्द का नहीं मिला।
प्रश्नः
१.जब इन नकोशियाँ, नाकुशाओं का माँ बनने का समय आएगा तो क्या ये बेटियाँ जन्मना चाहेंगी?
२.क्या इन्हें भ्रूण का लिंग पताकर अवान्छित भ्रूण को गिराने से रोकने का समाज का कोई नैतिक अधिकार बनता है?
३. क्या कल बुढ़ापे में इनके माता पिता को इनसे भरण पोषण माँगने का अधिकार होना चाहिए?
घुघूती बासूती

