हममें से बहुत से लोग सेल फोन कान से चिपकाए पति, पत्नी, बच्चों, मित्रों से प्रायः परेशान हो जाते हैं। सेल फोन कान पर लगाकर वे जैसे समाधिस्थ हो जाते हैं। फिर आप कुछ बोलने के लिए इर्द गिर्द मंडराते रहिए। बच्चे को स्कूल की फीस माँगनी होती है, बस चाहे छूट जाए, मोबाइल का छूटना कठिन है। स्त्रियाँ तो घर के काम एक हाथ से या मोबाइल को कंधे व कान के बीच संतुलित कर करने में माहिर हो गईं हैं। (जब से मेरी एक बाँह टूटी है मैं मोबाइल का उपयोग न करने की अपनी आदत पर बहुत पछताती हूँ। अन्यथा मैं भी एक हाथ से जीने की कला में पारंगत होती!) दफ्तरों में लोग मोबाइल टंगाए जैसे 'विघ्न मत डालो' की तख्ती लगाए बैठते हैं। उनसे जिनका काम हो उनकी पंक्ति चाहे जितनी भी लम्बी हो जाए।
किन्तु इन मोबाइलधारकों के लिए एक खुशखबरी है। नया शोध कहता है कि मोबाइलधारकों को एलज़ाइमर्स होने की सम्भावना बहुत कम है। यही नहीं यदि पहले से है तो मोबाइल का अधिक उपयोग करने से रोग में लाभ भी होगा। अब यह बात और है कि इस रोग के रोगी को मोबाइल क्या है याद रहेगा? यदि याद भी रहा तो वह कहाँ रखा है याद रहेगा? यदि वह भी मिल गया तो किसको फोन करना है यह क्या याद रहेगा? एलज़ाइमर्स वृद्धावस्था का रोग है और इसमें स्मृति कम होती जाती है।
यह शोध अभी तो चूहों पर ही हुआ है किन्तु आशा है मनुष्य पर प्रयोग भी इस बात की पुष्टि करेंगे। यदि यह सच निकला तो हम सब अपने अपने नानी नाना, दादी दादा को मोबाइल ही उपहार देना चाहेंगे। यदि सारा दिन मोबाइल चिपकाए रहने पर कोई टोकेगा तो कह देंगे कि हमें अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखने दो।
वैसे भी भारतीय निश्चिन्त रहें, उन्हें और चाहे जितने रोग हों एलज़ाइमर्स होने की सम्भावना बहुत कम है। कारण एक तो हमारा मोबाइल प्रेम दूसरा हमारा हल्दी प्रेम! हम अपने भोजन में हल्दी का बहुत प्रयोग करते हैं, चोट लगने, जुकाम खाँसी होने या ठंड में हल्दी डालकर दूध पीते हैं। हल्दी भी एलज़ाइमर्स होने की संभावना को कम करती है।
तो देखिए हम भारतीयों के पास एक रोग से बचने की दो युक्तियाँ हैं।
घुघूती बासूती
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Friday, January 08, 2010
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