शनिवार, अगस्त 02, 2014

कब तुम आओगे?


कुछ पल फिर से जी लूँगी
हाल तुम्हारा सुन लूँगी
अपने मन की सब कह दूँगी
पलकें नहीं,
हृदय बिछाए बैठी हूँ
कब तुम आओगे?

खो रहा है चेहरा मेरा
तेरी आँखों में फिर देखूँगी
खो गया है नाम ही मेरा
तेरे मुख से सुन लूँगी
जब तुम आओगे।

शून्य होती भावनाओं को
नया वेग देने को
शिथिल हुए शरीर में
नई संवेदना फूँकने को
मुझे मुझसे मिलवाने को
कब तुम आओगे?

आस लगाए बैठी हूँ
संवेदनी जड़ी ले आओगे
जड़ फिर से चेतन होगा
पंखहीन पक्षी को पंख मिलेंगे
अंधियारे होंगे फिर आलोकित
जब तुम आओगे।

मंद पड़ रही है जीवन ज्योति
साँसें लगतीं चढ़ान पहाड़ की
नयन ढूँढते हैं उस तारे को
जो दिखाता दिशा जीवन की
बाँह पकड़ राह दिखाने
कब तुम आओगे?

घुघूती बासूती

मंगलवार, जुलाई 15, 2014

त्याग या स्त्री के कैरियर की महत्वहीनता?


कुछ दिन पहले पति के कॉलेज के समय के साथियों ने एक पार्टी की जिसमें हम पत्नियों को भी बुलाया गया। एक दम्पत्ति से मैं लगभग तीस साल पहले मिल चुकी थी, शेष सबसे पहली बार मिल रही थी। लगभग सब पुरुष व कामकाजी स्त्रियाँ रिटायर हो चुके थे। तीन स्त्रियाँ थीं जो नौकरी नहीं करती थीं।

कुछ मेज जोड़ दिए गए थे और जैसी कि परम्परा है, एक तरफ आमने सामने पुरुष बैठे थे और दूसरी तरफ स्त्रियाँ। सो कॉलेज व हॉस्टेल के जमाने के पति के मित्र कैसे व कौन थे यह जानने व उनके उस समय के किस्से सुनने की मेरी हल्की सी जिज्ञासा जो थी वह ज्यों की त्यों धरी रह गई। एक बार फिर मैं पति के मित्र/ सहयोगी/ बिरादरी या किसी भी अन्य प्रकार से सम्बन्धित पुरुषों के समूह की बिल्कुल ही आपस में असम्बन्धित, अनजानी पत्नियों के बीच थी और मुझे उनके साथ समय बिताना था, जानपहचान करनी थी और उनके साथ पार्टी व अपना मनोरंजन करना था। मैं समाज की इस आशा से सदा ही स्तब्ध रह जाती हूँ कि वह स्त्री से सदा यह अपेक्षा करता है और उसके जरा से विरोध से स्तब्ध व आहत हो जाता है।

खैर, पिछले ३७ वर्ष से सदा स्वयं को ऐसे ही समूहों में पाती रही हूँ सो अनजानी स्त्रियों से बतियाने का गुर सीख चुकी हूँ। जिस स्त्री से ३० साल पहले मिली थी और जिसे मिलने की मुझे जरा भी याद न थी वह मेरे बगल में बैठी थीं। कुछ देर अतिथी धर्म निभाने को उसके पति भी मेरी दूसरी बगल में बैठे और मेरी बेटियों के बारे में पूछने लगे। मेरे बड़ी बिटिया के पोस्ट डॉक्टरल रिसर्च करने पर उन्होंने उसका विषय पूछा। उसका विषय बताते ही सामने बैठी स्त्री के कान खड़े हो गए। पति के मित्र तो पाँच मिनट खबर लेने को साथ बैठने के बाद उठकर पुरुषों के बीच जा बैठे। ये स्त्री जिन्हें मैं डॉ क कहूँगी मुझसे बोलीं,"एक्सक्यूज़ मी। मैंने आपकी थोड़ी बात सुनी। आपकी बेटी कहाँ रिसर्च कर रही है? कहाँ से एम एस सी की? कहाँ से पी एच डी की? यह मेरे क्षेत्र का विषय है।"

ऐसा कम ही होता है कि कोई मुझे बिटिया के विषय या उसके विषय से सम्बन्धित क्षेत्र का मिले। मेरी तो उसके विषय में स्वयं की जानकारी बहुत कम है। मुझे यह सोच बहुत खुशी हुई कि मेरी पीढ़ी की कोई स्त्री उस विषय से सम्बन्धित है। मैंने उनसे पूछा, "अरे वाह, आप तो क्षेत्र में बहुत सीनियर होंगी। आप कहाँ काम करती हैं?"

डॉ क ने बताया कि शादी के कुछ समय बाद ही उनपर परिवार का इतना उत्तरदायित्व आ गया कि उन्हें रिसर्च छोड़ घर पर ही रहना पड़ा। उनके गाइड या रिसर्च इन्चार्ज ने दो साल तक उनके लिए जगह बनाए रखी किन्तु दो साल बाद डॉ क ने कह दिया कि वे इतनी व्यस्त हो गई हैं कि कभी लौट नहीं पाएँगी अतः उनकी प्रतीक्षा न की जाए।

मेरे यह कहने पर कि बच्चे बड़े हो जाने पर वे फिर से काम शुरू कर सकती थीं वे बोलीं कि काम बच्चों के उत्तरदायित्व के कारण नहीं इन लॉ उत्तरदायित्व के कारण छोड़ा था। उनकी उम्र का ध्यान कर मैंने कहा कि क्या अभी सास ससुर हैं तो वे बोलीं नहीं। मैंने कहा कि अब तो आपको खालीपन सताता होगा। किन्तु इतनी देर से रिसर्च में तो नहीं लौट सकतीं ना। तो वे बोलीं कि नहीं मेरा उत्तरदायित्व तो अब भी चालू है।

मैं कुछ चकित हुई तो उन्होंने बताया कि उनकी दो ननदें हैं जिनका उन्हें ध्यान रखना होता है। वे अपना ध्यान नहीं रख पातीं। एक मानसिक रूप से काफी चैलेंज्ड हैं और दूसरी भी कुछ कम किन्तु वैसी ही हैं।

वे शाम भर कभी अपने अमेरिका में रिसर्च के समय के किस्से सुनाती रहीं तो कभी भारत के। कभी अपनी पी एच डी के जमाने के तो कभी अपने गाइड के।

आकर्षक व्यक्तित्व वाली उस सौम्य सी दिखने वाली स्त्री में मैं कुछ ऐसी उलझी कि अन्य किसी से कम ही बात हुई।
जब से उनसे मिली तब से यही सोच रही हूँ कि यदि विवाह बाद किसी दुर्घटना के कारण यह सब हुआ होता तो बात अलग थी। किन्तु यह कोई दुर्घटना नहीं थी। यह परिस्थिति तो पहले से ही थी। फिर बात वहीं आती है कि

१. उनका प्रेम विवाह तो था नहीं। तो उन्होंने इस विवाह के लिए सहमति क्यों दी? क्या उन्हें यथास्थिति का पता नहीं था?

२. उनके पति तो अपने विवाह से पहले से ही अपनी बहनों की स्थिति जानते थे। सो यह भी जानते थे कि उनकी पत्नी से क्या अपेक्षाएँ होंगी। सो उन्होंने किसी ऐसी स्त्री का चयन क्यों नहीं किया जो कामकाजी न थी। जो इतना अधिक पढ़ी लिखी न थी।

३. कैसे उनके सबसे अच्छे कॉलेज से ही पढ़े, चाहे खूब कमाते इन्जीनियर किन्तु ग्रेजुएट पति ने अपने लिए पी एच डी, विदेश में भी पोस्ट डॉक करी स्त्री का चुनाव किया, यह जानते हुए कि उसे काम छोड़ घर रहना होगा?

४. क्या ऐसा करने में उनकी अन्तर्आत्मा ने उन्हें कचोटा या नहीं? या उन्हें स्त्री का कैरियर महत्वहीन लगता था?

५. डॉ क के माता पिता ने उसके लिए ऐसा घर क्यों चुना?

६. क्या माता पिता को उनकी बहनों के बारे में पता नहीं था? पता था तो क्या उन्हें लगता था कि सास के बाद या सास के वृद्ध या बीमार होने के बाद उनका कुछ और प्रबन्ध हो जाएगा?

७.क्या उन्होंने इस बारे में जानने के बाद अपनी बेटी के काम करते रहने के बारे में कुछ भी सुनिश्चित नहीं किया था?

८. क्या बेटी के काम छोड़ने के बाद उन्हें अपने चयन पर अपराध बोध हुआ होगा?

क्या आप सबको यह पढ़कर सामान्य सा लग रहा है या एक प्रतिभा की समाप्ति पर दुख, क्षोभ या क्रोध आ रहा है?

या आपको यह त्याग महान और अनुकरणीय लग रहा है?

क्या वह स्त्री अपने त्याग और तपस्या के आलोक से ही प्रसन्न व सन्तुष्ट होंगी?

यदि हाँ तो उन्होंने लगातार मुझसे अपनी रिसर्च की बातें क्यों कीं?

मैं ऐसे पुरुषों को भी जानती हूँ जिन्होंने परिवार के लिए ऐसे त्याग किए किन्तु वे परिवार उनके जन्म के परिवार थे न कि विवाह के बाद के जहाँ मनुष्य के पास चुनाव का विकल्प होता है। मैंने ऐसा एक भी पुरुष नहीं देखा जो चुनाव करके ऐसी स्थिति को अपनाए जहाँ उसे अपनी पत्नी के लिए ही नहीं उसके परिवार के सदस्यों के लिए अपने प्रिय विषय व जाने पहचाने जीवन को छोड़ त्याग व सेवा का जीवन जीना पड़े।

कुछ उलझन में,

घुघूती बासूती

शुक्रवार, जून 13, 2014

सागर किनारे



कल लहरों से पास से मिलना नहीं हुआ तो आज सुबह साढ़े दस बजे से एक बजे तक की चिलचिलाती धूप में ही मिल आई।
घर में पेस्ट कन्ट्रोल वाला आकर छिड़काव करके गया था। घर के ठीक सामने सड़क पार एक बहुत सुन्दर पार्क है किन्तु उस समय वह बन्द रहता है। सो सड़क पार करके पाँच मिनट चलकर वर्ली सी फेस के सामने ख़ान अब्दुल गफ़ार ख़ान रोड पर पहुँच गई। सी फेस पर धूप थी, सो सड़क के इस पार ही एक और पार्क है उसके सामने प्याऊ है, टाइल्स लगीं हैं, ऊँचा प्लैटफॉर्म है, उस पर अपना झोला बिछा, बैठकर, लहरों का कभी धरती से मिलने तो कभी आकाश से मिलने का उतावलापन देखती रही। समुद्र का कुछ हिस्सा तो सारे बन्धन तोड़ उड़ उड़ कर सड़क पर ही आ रहा था। बान्द्रा वर्ली सी लिंक को छूने को मचलता और छूकर लौट जाता और फिर आकर उसे छू जाता।
कल पूर्णिमा थी। सो आज भी सागर का पागलपन अपने उफान पर था। वर्ली, दादर और मरीन ड्राइव पर वह जगह जगह अपनी सीमा तोड़ शहर की सड़कों पर घुस आया था। दो घंटा सड़क के इस पार बैठ जब यहाँ भी धूप आ गई तो समुद्र के पास ही चली गई। उसे देख समझ आया कि वह धरती से मिलने को उतावला नहीं हो रहा। वह तो हमारा फेंका कचरा हमें लौटाने आ रहा था। शहर के भीतर सड़कों पर घुस उन दुस्साहसियों को ढूँढ रहा था जिसने उसके जल को कचरे भरे दुर्गन्धित सूप में परिवर्तित कर दिया था।
मुझे सागर के लिए बहुत बुरा लगा। यदि नदी माँ हो सकती है तो सागर पिता क्यों नहीं? आखिर वह ही तो हमें और हमारी नदियों को जल, पहाड़ों को हिम देता है। वह तो शायद माँ और पिता दोनों ही है। किनारे आते पानी में हजारों रंग बिरंगे पॉलीथीन व कचरे के टुकड़े वैसे ही तैर रहे थे जैसे किसी बढ़िया सूप में रंग बिरंगी सब्जियों, चीज़ व क्रुटोन्स के टुकड़े। बस सुगन्ध की जगह वह दुर्गन्ध बिखेर रहा था। सही था, हम सूप में लहसुन डालेंगे तो वह उस सा महकेगा, माँस, मछली या मुर्गा तो उन सा। यदि उसमें सुगन्धित दालचीनी, लवंग और इलायची डालेंगे तो उन जैसा महकेगा।
काफी देर मैं अपने मोबाइल से ही फोटो खींचती रही। तेज धूप के चलते स्क्रीन केवल काला नजर आ रहा था। क्या खींचा पता नहीं। मैं बचने की कोशिश करती रही पर बीच बीच में वह मुझपर भी जलकण बरसाता रहा। खुशी की जगह बस यही खयाल आता रहा घर जाकर दोबारा स्नान करना होगा। किन्तु बेचारा समुद्र! वह कैसे हमसे व हमारी गंदगी से बच सकता है! इतना जल होने पर भी दोबारा स्नान कर स्वच्छ नहीं हो सकता। अपने व अपने समाज, मनुष्यों पर गुस्सा भी आता रहा। तीन नाले तो हम सबका मलमूत्र लेकर सीफेस पर ही खुलते हैं। यह तो समृद्ध, एम एल ए, एम पी, पूर्व मुख्यमंत्री के निवास वाले क्षेत्र का हाल है। साफ सुथरा चमचमाता सीफेस! किन्तु सारा कचरा समुद्र के हिस्से आता है।

कई बार जब ताजा हवा में घूमते हुए भी मुझे इन नालों के मिलन वाली जगहों पर नाक पर रुमाल रखना पड़ता है तो अपने आप व अपनी मनुष्य जाति पर खीझ उठती है। सोचती हूँ प्रकृति इतनी सहिष्णु न होकर यदि पहली गलती पर ही दो थप्पड़ जमा देती तो हम इतना ना बिगड़ते। चाहने से दस राह निकल आती हैं। हम भी समुद्र को कचरा समर्पित करने की बजाए कोई और राह ढूँढ ही लेते। अभी भी बहुत देर नहीं हुई है आओ सागर दो चार थप्पड़ हमारे गाल पर जमा जाओ। फिर भी न मानें तो दो लात जमा जाओ। इसके बिन तुम्हारा और हमारा उद्धार नहीं।
घुघूती बासूती

आज की तो नहीं लगभग तीन साल पहले की कुछ वर्ली सीफेस की फोटो यहाँ लगाईं हैं।
घुघूती बासूती