मंगलवार, फ़रवरी 04, 2014

वासंती वसंत


समय समय की बात है
अब वसंत स्वयं नहीं
कान में गुनगुना जाता
अपने आने का संगीत,
न ही पिताजी बैठ
अपनी पूजा में, रंगते
हमारे रुमाल वासंती,
न ही कोई कैलेंडर देता
इसके आने की सूचना।
अब तो यह सूचना भी
नेट ही दे देता है
वसंत आभासी हो गया।
आओ आभासी वसंत,
आओ.
कुछ पल बैठो
कुछ बतियाओ
अपना हाल बताओ
मेरा सुन जाओ
अपने होने का
आभास कराओ
आभासी मन ही
वासंती कर जाओ।
घुघूती बासूती

गुरुवार, दिसंबर 12, 2013

समलैंगिकता को कानूनी मान्यता



एक पढ़ी लिखी नौकरी करती बेहद निपुण स्त्री ने जो पारम्परिक अरैन्ज्ड विवाह में विश्वास करती थी, जिसने एक से एक अच्छे अन्तर्जातीय रिश्ते ठुकराकर अपने माता पिता के द्वारा चुने सुन्दर, सुशील, अच्छे घर के सजातीय पुरुष से विवाह किया।

वह पहले ही दिन पति के मित्र ( प्रेमी) का अपने ससुराल में पूरा दखल, घर में महत्व, पति पर उसका इतना प्रभाव कि वह जो कहे वह पति मान ले देख दंग रह गई। पति उसके साथ मायके जाने को मना कर दे, किसी रस्म को निभाने से मना कर दे, उसके साथ कमरे में रहने को ही मना कर दे तो हर मर्ज का एक इलाज वह मित्र था। सास ससुर उस मित्र को गुहार लगाते और वह कहे तो पति सर के बल खड़े होने को भी तैयार हो जाता।

खैर बाद में पता चला कि जिसकी वह पत्नी है उसका भी पति है, और पति का पति वह मित्र है। उसका पति तो खैर नाम का ही था। इस असम्भव से रिश्ते को भी पति में बदलाव का अवसर दे निभाने की कोशिश जब पूरी तरह से असफल हो गई तो स्त्री ने तलाक दे दिया। किन्तु वह स्त्री उस पूर्व पति को कभी कोसती नहीं थी। उसका कहना था कि वह भी समाज का शिकार एक पीड़ित था। उसे क्या दोष देना। उससे तो सहानुभूति होनी चाहिए।

यदि वह स्त्री उस समलैंगिक के साथ सहानुभूति रख सकती थी तो हम क्यों नहीं? यदि हम स्वयं को उनके स्थान पर रखकर देखें तो शायद हम इतने कठोर नहीं होंगे। शेष समाज से अलग होना, अचानक अपने बारे में यह जानना कि अन्य मित्रों की तरह वह विपरीत लिंगियों की बजाए अपने ही लिंग वालों की तरफ आकर्षित है। बार बार कोशिश करना कि अन्य मित्रों या सहेलियों की तरह व्यवहार करें, विपरीत लिंगियों से दोस्ती व लगाव रखने की असफल कोशिश करना, किन्तु उनमें कोई आकर्षण न पाना। जिनसे आकर्षित हो उनसे कह नहीं सकना, अपराध भाव, हीन भावना से किशोरावस्था से ही ग्रसित होना। यह सब कितना कठिन होता होगा। अपने आकर्षण, अपने सत्य को परिवार से छिपाकर रखना, झूठ ही विपरीत लिंगियों में नकली रुचि दिखाना यह सब क्या कम सजा है उनके लिए जो समाज और हम उन्हें और सजा देना चाहें?

 हममें कुछ तो मानवीय संवेदनाएँ होनी ही चाहिएँ।


घिनौने बलात्कार के लिए कम सजा और सहमति से बने समलैंगिक सम्बन्धों के लिए उम्र कैद क्या कहीं से भी उचित है?

यदि उस पति का परिवार अपने बेटे का सत्य सामने होने पर भी उसको देखने से इनकार न करता, उसे विवाह के लिए बाध्य न करता तो उस स्त्री के जीवन में इतनी उथल पुथुल, इतना दुख, एक नकली विवाह को करने में और फिर तोड़ने में शक्ति, धन, समय की बरबादी न होती, विवाह के लिए जो मन में रोमान्टिक कल्पनाएँ होती हैं वे चूर चूर न होतीं।

मुझे तो माता पिता, व समाज उस स्त्री के कष्ट के लिए उस कमजोर पुरुष से अधिक उत्तरदायी लगते हैं।
यदि आपको समलैंगिकों से सहानुभूति नहीं है तो भी उनसे धोखे, अज्ञान में विवाह करने वाले अभागों को इस दुर्भाग्य से बचाने के लिए ही सही हमें, आपको, समाज को समलैंगिकों को अपनी तरह, अपने जैसों के साथ जीने का अधिकार देना होगा।

घुघूती बासूती

शनिवार, जुलाई 13, 2013

कैसे भुलाऊं

तुम्हें भुला ही देती

दो जोड़ी पैरों के

निशान छोड़े होते

जो हमने रेत पर .



पानी पर चले होते

जो हाथ पकड़ कर
मिल गुजरे होते

फूलों की घाटी से .


नापी होती परछाइयाँ

व परछाइयों की नाक

खिलखिलाते हुए किसी

सुबह या ढलती शाम.


मिल खड़े हुए होते

किसी ठोस धरातल

स्वप्न बुने होते दो सर
की चांदी के तारों से.


कैसे भुलाऊं सागर की लहरों

को गिनना अभी शेष है ,

नदिया में सूरज की लाली
को तकना अभी शेष है.


खिलखिलाना शेष है

गुदगुदाना, गुनगुनाना,

चहकना, महकना व
फुसफुसाना अभी शेष है.



शेष है कुछ निकम्मे

पलों की मिल आवारगी

शेष है तेरे मेरे प्रेम
की कोई नई बानगी.



मिलना, बिछड़ना,

रूठना, मनाना शेष है

कैसे भुलाऊं रिश्तों का
आरम्भ अंत अभी शेष है.



घुघूती बासूती