शुक्रवार, जुलाई 30, 2010

ये चाहती क्या हैं?

ये चाहती क्या हैं?

ये चिड़ियाँ
चाहती क्या हैं?
जो चाहती हैं वह
ये चाहती क्यों हैं?
मिल मंत्रणा कर
कहते बहेलिए, व्याध
उत्क्रोश और बाज
क्या यूँ कुछ चाहना
भली चिड़ियों को शोभा देता है?

कहते छछूंदर
ये चिड़ियाँ
चाहती क्या हैं?
जो चाहती हैं वह
ये चाहती क्यों हैं?
क्या बिन चाहे, यूँ ही
धरती के अँधेरों में
हमारी तरह बिल बना
उसमें बच्चों को समेटे
नहीं रह सकतीं?

कहते विमान
ये चिड़ियाँ
चाहती क्या हैं?
जो चाहती हैं वह
ये चाहती क्यों हैं?
क्या बिन आकाश में उड़े
बिन हमसे उलझे
शुतुर्मुर्ग की तरह
एक घेरे में रह, पल, बढ़
भूमि पर नहीं दौड़ सकतीं?

कहते देव, बनकर थोड़े उदार
ये चिड़ियाँ
चाहती क्या हैं?
जो चाहती हैं वह
ये चाहती क्यों हैं?
क्या बिन ऊँची उड़ान भरे
बिन हमसे स्पर्धा करे
किसी दड़बे में रह, कभी कभार
उड़ना ही है तो क्या
मुर्गी की तरह नहीं उड़ सकतीं?

घुघूती बासूती

सोमवार, जुलाई 26, 2010

जब तुम होगे साठ साल के............. घुघूती बासूती






७० के दशक का एक गीत होता था... 'जब हम होंगे साठ साल के और तुम होगी पचपन की!' उस ही गीत की कुछ आगे की पंक्तियाँ थीं.. 'जब तुम होगे साठ साल के और मैं होंगी पचपन की।' कल का सारा दिन यह गीत गुनगुनाते बीता। कल मैं पचपन की हो गई। घुघूत तो कुछ महीने पहले ही साठ के हो चुके हैं। ३७ साल पहले मैंने अपना अठारहवाँ जन्मदिन उनके साथ मनाया था। कल पचपनवाँ मनाया। इस बीच ३७ जन्मदिन बहुधा साथ तो कभी कभार अकेले मनाए। बचपन से तो नहीं, हाँ, मेरी किशोरावस्था से हमारा साथ है।

कल का दिन बहुत बढ़िया था। मौसम तो गजब का था ही। परसों रात बारह बजे से ही बेटियाँ जन्मदिन की शुभकामनाएँ दे रहीं थीं। कल दिन भर बीच बीच में उनसे बात होती रही। बड़ी बिटिया कुछ दिन के लिए विदेश में है फिर भी बहुत लम्बी नहीं तो भी बातें तो हुईं ही। छोटी बेटी और मैं तो बार बार बातें कर ही रहे थे। जँवाइयों ने भी बात की।
कल कितने ही मित्रों व सहेलियों ने याद किया। भान्जी व भतीजी ने फोन किया। भाई भाभी ने याद किया। माँ से बात करवाई। माँ को अब याद नहीं रहता। भाई को उन्हें बताना पड़ा कि जन्मदिन है। मैं भी तो अभी से भूलने लगी हूँ। क्या कभी मैं भी अपनी जन्मी बेटियों का जन्मदिन भूल जाऊँगी?

बेटियों ने सरप्राइज की योजना बनाई थी। जब मेरे हाथ में तरह तरह के ऑर्किड्स के दो गुलदस्ते आए तो लगा जैसे दोनों बेटियाँ ही मेरे गले लग रही होएँ। छोटी बिटिया ने कहा कि उसे पता है कि मुझे ऑर्किड्स कितने पसन्द हैं। साथ में मेरी पसन्द का डार्क चॉकलेट केक व मेवों का डब्बा था।

मैं गुलदस्तों से दूर नहीं हो पाती हूँ। तरह तरह से उनके फोटो लेती हूँ। यह काम मेरे लिए बहुत कठिन है क्योंकि हाथ हिल जाता है। अभी जब कम्प्यूटर वाले कमरे में हूँ तो इन्हें भी अपने साथ ले आई हूँ।

लगता है कि वे दोनों मेरे आस पास हैं। याद आता है अपना पैंतिसवाँ जन्मदिन, जब निश्चय किया कि कुछ नहीं बनाऊँगी। बेटियों ने कहा कि नहीं, वे केक बनाएँगी। नन्हें हाथों ने मुझसे पूछ पूछकर बहुत बड़ा सा केक बनाया। परन्तु शाम को जब पूरी की पूरी मित्र मंडली परिवार सहित अपने उस वनवास वाली बस्ती में जहाँ झट से कुछ भी खरीदा नहीं जा सकता था, जन्मदिन की बधाई देने पहुँची तो केक खिलाते हुए मन बेटियों की सूझबूझ, समझदारी व जिद के आगे नतमस्तक हो गया।

सोचती हूँ कि बिटिया को मेरी पसन्द का कितना ध्यान रहता है। कब बेटी 'दी' हो जाती है, कब माँ! सहेली व सलाहकार तो वह सदा ही होती है।

दोनों गुलदस्ते बहुत सुन्दर हैं। एक में तीन तरह के ऑर्किड्स हैं व एक में एक ही किस्म के। तीन तरह वाले में एक प्रकार का तो लाल रंग का एन्थुरियम है। तीन बत्तख की चोंच जैसे हैं, हाँ उनके कलगी और लगी हुई है।

मन विह्वल हो रहा है। कभी 'दी' यूँ ही मेरी पसन्द का ध्यान रखती थी। ३७ साल पहले वाले अठारहवें जन्मदिन पर भी तो उसने अपनी रिसर्च के लिए किए लखनऊ प्रवास से मेरे लिए लाई साड़ी पर फॉल लगाया था, ब्लाउज, पेटीकोट सिला था ! उसे भी सदा मेरे लिए चॉकलेट व मेवों की याद रहती थी। 'दी' होती तो वह भी तो एक सप्ताह पहले ही साठ की हुई होती। २५ साल बीत गए हैं 'दी' किन्तु हर सुख व दुख में तुम साथ रहती हो। साथ तो ४२ साल पहले साथ छोड़ने वाली 'बड़ी दी' भी रहती हैं। परन्तु मेरी प्रेम कथा में 'दी' तुम भी तो किस तरह से गुँथी हुई हो!

ये तीनों बत्तख जैसे(हैलिकोनिया का कोई प्रकार? नहीं, नहीं, ये तो बर्ड्स औफ़ पैरेडाइज़ हैं! परन्तु हैं शायद हैलिकोनिया परिवार के ही! ) ऑर्किड्स जो हैं न वे हम तीनों हैं। जो पहले मुरझा जाएगा वह 'बड़ी दी' जो उसके बाद वह 'दी' तुम और जो सबसे अन्त में वह मैं!

प्रेम के कितने ही तो रूप हैं। सब सुन्दर हैं। प्रेमियों का प्रणय, पति पत्नी का उससे भी कुछ आगे निकला हुआ प्रेम जिसमें प्रणय भी है, मित्रों का स्नेह भी, माँ की ममता भी, वात्सल्य भी, करुणा भी है, पिता का वरद हस्त भी। माता पिता का अपने बच्चों के लिए प्रेम, वात्सल्य, ममता तो हर माता पिता जानता है। बच्चा जन्मा नहीं कि औसीटॉसिन इस भावना की बाढ़ भी अपने साथ ले आता है। माता पिता के लिए प्रेम किन्हीं हॉर्मोन्स के कारण नहीं अपने बचपन की मधुर यादों के कारण होता है। बहनों का स्नेह तो बेजोड़ होता ही है, एकदम अलग, अद्वितीय। भाई बहन का एक अलग किस्म का अदृष्य पतली डोरियों से खींचता स्नेह। भाभी में बहन ढूँढता स्नेह। सहेलियों का स्नेह तो कोई सहेली ही समझ सकती हैं। मित्र से अपनत्व की बँधी वह डोर जिसका कौनसा सिरा कब किसके हाथ में होता हैं समझ ही नहीं आता। डोर है यह भी तभी महसूस होता है जब जरा सा दूर जाएँ और डोर खिंचने लगती है। वह ऑल्टर ईगो वाला आभास!

यह प्रेम है तो जीवन है, जन्म है, ऐसी मृत्यु है जिसे कोई बार बार फिर से जीता है। अन्यथा क्या जिए और क्या मरे? यह न हो तो क्या है? (यह सब तब हैं जब प्रेम के बीच कोई लालच, स्वार्थ ना आ जाएँ।)

ऐसे में जब भी प्रेमी शब्द सुन कोई अभागा भड़क उठता है तो सोचती हूँ कि उन्होंने प्रेम का ऐसा कौन सा विभत्स रूप देख लिया होगा कि किसी के भी ब्लॉग में प्रेम विवाह, प्रेमी शब्द सुन उन जैसा प्रायः नरम दिल मनुष्य यूँ क्यों भड़कता है कि हर प्रेमी के गाल पर उनके थप्पड़ का अहसास ही नहीं होता अपितु लगता है कि प्रेम शब्द ही गाली हो। हृदय में कुछ चटख जाता है। एक बार विषाक्त भोजन खाने पर हम भोजन करना नहीं छोड़ देते, हाथ जलने पर पका खाना नहीं खाना छोड़ देते तो प्रेम जैसे भाव को उससे लुटने पिटने पर भी क्या यूँ ही छोड़ा जा सकता है? यदि हमने किसी हत्यारे प्रेमी को भी देखा हो तो प्रेम करना क्यों छोड़ेंगे या प्रेमियों से घृणा क्यों करेंगे? क्या किसी हत्यारे डॉक्टर, वकील, चित्रकार, ड्राइवर, अध्यापक को देखने के बाद इलाज, वकालत, कार, अध्ययन से तौबा कर लेते हैं? फिर प्रेम से ऐसी घृणा क्यों?

यह सब तो पचपन वर्ष का सार है। जीवन के अन्तिम जन्मदिन पर क्या सोच रही होऊँगी पता नहीं। बस, प्रेम से घृणा न कर रही होऊँ तो भी धन्य हो जाऊँगी। अभी तो प्रेम, तुझे सलाम।

घुघूती बासूती

पुनश्चः सभी ऑर्किड्स के नाम कोई बता पाए तो आभारी रहूँगी।
घुघूती बासूती

गुरुवार, जुलाई 22, 2010

चाहें तो कई युग लग सकते हैं चाहें तो कुछ पल भर ही!

रश्मि रविजा का लेख ' कितने युग और लगेंगे इस मानसिकता को बदलने में??' पढ़ा। उन्होंने लेख में बेटी के विवाह के समय वर पक्ष द्वारा उसके माता पिता का घोर अनादर किए जाने की घटना बताई है। यह होता रहता है। समाज में ऐसे व्यवहार को बहुत सही न भी कहा जाए तो भी उसे सहा जाता है। वह व्यवहार वर पक्ष से कुछ कुछ अपेक्षित भी होता है। ठीक वैसे ही जैसे कुछ समय पहले तक पति द्वारा पत्नी को डाँटा जाना, पत्नी का पति से कुछ भी ( खाना खाने पकाने, कपड़े धोने, घर की सफाई आदि से कुछ बड़ा काम ) करने से पहले अनुमति लेना, पति का घर के काम में हाथ न बँटाना आदि सब अपेक्षित व्यवहार होते थे। यदि कोई इससे हटकर काम करता था तो उस सामान्य व्यवहार को महान की श्रेणी में डाल दिया जाता था। यदि कोई पति पत्नी को डाँटता नहीं था, उसे अपने मन का करने देता था,( तो विचित्र क्या हुआ? क्यों भाई, प्रकृति ने मन और दिया ही क्यों था उसे?) घर के काम कर देता था, बच्चे की नैपी बदल देता था, रोते बच्चे को चुप करा देता था तो स्त्री को ऐसा लगता था जैसे पिछले जन्म में उसने ना जाने क्या पु्ण्य किए थे कि उसे ऐसा पति मिला। वह यह नहीं सोचती थी कि ऐसा ही पति मिलना उसका अधिकार है। जिसका पति यह सब नहीं करता वह दुर्भाग्यवान है, उसे पति के व्यवहार में बदलाव की माँग व कोशिश करनी चाहिए।

हाँ, तो अब आते हैं रश्मि द्वारा बताई घटना पर। वे बता रही थीं को २५० की बजाए बरात में ५०० लोग आ गए थे सो खाना कम पड़ गया। अब एक दिन यदि ना खाएँ, कम खाएँ, देर से खा लें तो वर पक्ष की नाक न कट जाएगी? अब कुछ लोगों की नाक कटती भी क्या है, टपक पड़ती है। कटी तो पहले से होती है वह तो वे गोंद से चिपकाए घूम रहे होते हैं, सो कभी भी गिर सकती है। ऐसे ही पहले से कटी नाक वाले लोगों को अपनी नाक का अधिक ही ध्यान रहता है। अब आपके शरीर का जो अंग ठीक ठाक काम कर रहा होता है आपको उसके होने का अहसास ही कहाँ होता है? जो अंग दर्द कर रहा हो, बीमार हो उस ही का आभास हर पल रहता है। सो उनकी नाक की समस्या तो समझ आ सकती है।

२५० की जगह ५०० लोग इसलिए आए होंगे क्योंकि कन्या पक्ष वर पक्ष के शहर में आकर विवाह करने को मान गए होंगे। अब जब पैसा किसी और की जेब से जा रहा हो तो सगे सम्बन्धी ही क्या, दोस्त के दोस्त, दोस्त के दोस्त का चाचा, जीजा, भतीजा सबको सपरिवार खुला निमन्त्रण रहा होगा। शायद वर पक्ष के घर के माली, धोबी, महरी से लेकर उनका पान वाला ,रद्दी वाला सभी जीमने पहुँचे हों। अपनी दरियादिली और पौरुष भी दिखाने का ऐसा सुअवसर फिर कब आने वाला था? लड़की वालों को जो मजा उन्होंने छकाया उसके जितने अधिक दर्शक हों उतना ही बेहतर। यह क्या कि आप कुश्ती लड़ें और दूसरे को धूल भी चटवा दें और कोई ताली बजाने वाला भी न हो? यदि यही अपने पैसे से बारात लेकर दूसरे शहर जाना होता तो शायद एक बस भर लोग ही जाते। (हाँ जानती हूँ कि शायद बस का पैसा भी लड़की वालों को देना होता होगा! क्यों नहीं? लड़के के जन्म के समय के हस्पताल के बिल भी सुरक्षित रखने चाहिए तो वे भी लड़की वालों को पकड़ाए जा सकते हैं!) किन्तु फिर भी जाने में मेहनत लगती, एक छुट्टी तो लेनी ही पड़ती, अपना काम छोड़कर आना पड़ता तो मनुष्य जरा सोचकर ही आता।

अब आते हैं इस बात पर कि इतना अपमान सहकर भी कन्या पक्ष चुप क्यों रह जाता है। इसके कई कारण हैं। कुछ तो सामाजिक हैं।

शुरू से हमें यह सिखाया जाता है कि वर पक्ष महान है व कन्या पक्ष याचक जबकि कन्यादान भी वही लेते हैं। सो याचक कौन है यह समझना कोई कठिन नहीं है।

इसके अतिरिक्त यह भी कारण है कि बेटी को इसी विपक्ष के बीच जाकर रहना है वह भी बिना तलवार या ढाल! सो उनसे पंगा लेकर उन्हीं के घर असहाय बिटिया को कैसे भेजा जा सकता है? सो बेहतर है कि मक्खन लगाए जाओ और मनाए जाओ कि बिटिया सुरक्षित रहेगी।

तीसरा और महत्वपूर्ण कारण है इज्जत! यदि बारात लौट गई तो इज्जत भी चली जाएगी।

चौथा और बहुत ही बुनियादी कारण है इतने बड़े खर्चे की बरबादी। सालों से बचाया पैसा, कभी कभी उधार लिया पैसा, कभी भविष्य निधि से निकाला पैसा इस विवाह के यज्ञ में भेंट चढ़ा होता है। अब यह सब बरबाद कैसे होने दिया जाए? सो जैसे भी हो खुशामद कर बिटिया का विवाह सम्पन्न करा उसे विदा किया जाए। यह सोचे बिना कि जो लोग विवाह मंडप पर ऐसे नाटक कर रहे हैं वे लोग कैसा परिवार सिद्ध होंगे। क्योंकि इतना पैसा जुए में लग चुका होता है सो और भी फेंका जाता है। बाज़ार के इस मूलमंत्र को भूलकर कि कभी कभी हमें अपनी कम से कम हानि करवाकर जो हाथ में आए उसे लेकर बाज़ार से निकल लेना चाहिए। जब जब निवेशक पूरा पैसा वापिस पाने को छटपटाता है तो दलदल में और भी डूबता जाता है। अब जो विवाह हुआ ही पैसे के बल पर है उसमें कन्या पक्ष निवेशक समान तो हुआ ही!दुल्हे के लिए जो पैसा माँगा गया वह लागत तो हुई ही। यह भी एक वित्तीय व्यवहार है, जिसमें पैसे का आदान प्रदान हुआ।

ये ही वे कारण हैं जो ऐसे निर्लज्ज बारातियों को दो लात जमाने से कन्यापक्ष को रोकते हैं। यदि ये कारण दूर कर दिए जाएँ तो कन्या पक्ष भी मानव की तरह आत्मसम्मान वाला व्यवहार करेगा व उसकी अपेक्षा भी करेगा और ऐसा ही व्यवहार पाएगा भी।

विवाह यदि लड़की के ही शहर में हो, यदि वह कम खर्च में सादा हो, यदि पूरे मौहल्ले, कस्बे, शहर को ना बुलाया जाए तो यदि स्थिति बिगड़े, यदि वरपक्ष का व्यवहार बुरा हो जाए तो आराम से उनसे कहा जा सकता है कि नमस्ते आप चलिए। ना तो आपका बहुत बड़ा तमाशा बनेगा, न ही बहुत बड़ी आर्थिक हानि ही होगी।

मैंने भी ऐसे ही एक विवाह के बारे में सुन रखा है। प्रकृति ने एक बड़ा समुद्री तूफान लाकर मुझे उस विवाह को देखने व कन्या पक्ष की तरफ से वहाँ जाकर उस लड़की का,उसके माता पिता का, उनके सगे सम्बन्धियों का अनादर देखने से व अपना भी अनादर होने से बचा दिया। उस तूफान के कारण हम विवाह में नहीं जा पाए। जब उस विवाह के बारे में सोचती हूँ तो यही समझ पाती हूँ कि वे लोग असहाय केवल इसलिए हुए क्योंकि..

१ वे अपने शहर में नहीं लड़के के शहर में थे।

२ उन्होंने इतने लोगों को बुला रखा था कि ऐसे में अपनी इज्जत बचाकर इतने बेशर्म परिवार में भी बेटी का विवाह कर दिया।

३ इतना जबर्दस्त प्रबन्ध किया था कि उसे बर्बाद होने से बचाना ही उचित समझा।

४ वरपक्ष की संख्या भी इतनी अधिक थी वही ५०० जैसी कि उस भीड़ में मनुष्य शायद उचित अनुचित के बारे में सोच भी नहीं सका।

५ जिस विवाह(wedding) की इतनी हाइप हुई हो उसे फ्लॉप शो कैसे होने दिया जाए। यह और बात है कि wedding सफल रही विवाह (marriage)नहीं।

यही यदि रेजिस्टर्ड विवाह हो रहा होता तो शायद कन्या पक्ष को बिल्कुल भी झुकना न पड़ता। संसार का नियम है जो झुके उसे झुकाओ। सो वह लड़की झुकती गई तब तक जब तक विवाह बन्धन का इलास्टिक खिंचते खिंचते टूट नहीं गया। अब न बन्धन है न झुकना केवल कड़वाहट बची है।

प्रायः हम यह सोचते हैं कि प्रेम विवाह व स्त्री का स्वावलम्बी होना हमें इस स्थिति से बचा सकते हैं। वे बचाते भी हैं परन्तु सदा नहीं। क्योंकि ७०० या ८०० की उस भीड़ में स्वावलम्बी स्त्री व उसका प्रेमी भी भीड़ का ही हिस्सा बन भीड़ सा सोचने लगते हैं। और फिर एक बुरी शुरुआत एक बुरे अन्त की ओर उन्हें बहाए ले जाती है। वर के माता पिता एक बार चखी जीत को बार बार आजमाते हैं चाहे ऐसा करने में उनके ही पुत्र का विवाह ही क्यों न टूट जाए। पुत्र ने भी देखा होता है कि जोर जबर्दस्ती के आगे पत्नी व उसका परिवार झुके थे सो उसे उस शक्ति में मजा आने लगा। विवाह के दिन की कड़ुवाहट तो थी ही फिर यह भी पता था कि उसके माता पिता गलत थे और उन्हें सही सिद्ध करने की जिद भी थी। सो अपने माता पिता की हर अनुचित माँग को मनवाना उसके जीवन का उद्देश्य बन गया। सो एक और विवाह टूट गया दिल जो टूटे वे तो टूटे ही।

सादे विवाह इस सबसे हमें बचा सकते हैं। यदि न भी बचाएँ तो कमसे कम नई शुरुआत करना सरल तो कर ही सकते हैं। यह नहीं कि एक विवाह ही परिवार को उजाड़ चुका हो।

घुघूती बासूती