गुरुवार, जुलाई 02, 2009

गेहूँ और घुन दोनों ही बच गए।

भारतीय संविधान की धारा ३७७, समलैंगिककता और स्त्री /पुरुष कल्याण

आज दिल्ली उच्च न्यायालय ने संविधान की धारा ३७७ से समलैंगिकों को मुक्त करके न केवल समलैंगिक पुरुष व स्त्रियों पर उपकार किया है अपितु सामान्य जनता पर भी उपकार किया है। यह सच है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी तरह से जीवन जीने का अधिकार है, नहीं है तो होना चाहिए किन्तु यह उससे भी बड़ा सच है कि जब वह व्यक्ति छिपे दबे तरीके से अपनी तरह से जीवन जीने के लिए, समाज में स्वीकृति पाने के लिए, दूसरों का जीवन नारकीय बना दे तो यह दूसरे का अधिकार हनन है। शायद इतने समय तक न चाहते हुए भी बहुत से समलैंगिक मजबूरी(इस मजबूरी को बहाना या स्वार्थ भी कह सकते हैं या ढोंग भी या फिर कायरता भी, किन्तु सच यह है कि वे स्वयं पीड़ित हैं, परेशान हैं।) में विषमलैंगिक (इतरलिंगी) लोगों से विवाह कर बहुधा उनका जीवन नष्ट करते रहे हैं। हमारा समाज इन मासूमों, जिनसे समलैंगिक अपनी वस्तुस्थिति छिपाकर विवाह करते रहे हैं, की बलि का यह मूल्य चुकाकर भी अपने को समलैंगिक संस्कृति से मुक्त मान शुतुरमुर्ग की तरह अपना चेहरा रेत में छिपाए ही आत्ममुग्ध था।


कोई उस स्त्री की मनोदशा का अनुमान लगाए जो विवाह के बाद पाए कि उसका पति उसकी ओर से पूर्णतया उदास है। वह अपने में कमी ढूँढती है। (स्त्री है तो स्वाभाविक रूप से कमी उसमें ही होगी, पति में तो हो ही नहीं सकती!) वह पति को खुश रखने की हर संभव चेष्टा करती है। पति का परिवार उसके रूप, उसकी चाल ढाल, बातचीत में दोष ढूँढता है। जानना चाहता है कि क्या कारण है कि उनका राजा बेटा इस स्त्री से विरक्त है। राजा बेटा माता पिता को कभी नहीं बताता कि वह तो स्त्रियों में रुचि ही नहीं रखता, या कि जिस मित्र से कहकर उसे माता पिता ने विवाह के लिए उसे राजी करवाया था वही उनके बेटे का प्रेमी है। सो अब शुरु हो जाता है उस निर्दोष स्त्री का मानसिक, शारीरिक व भावनात्मक उत्पीड़न।


सास ससुर पोते(कभी कोई पोती का मुंह देखने को बेकरार देखा सुना है?)का मुँह दिखाने की बात करते हैं,समाज पूछता है कि कब गोद भरेगी। स्त्री किंकर्त्तव्यविमूढ़ सी रह जाती है। वह क्या बताए कि वे तो पति पत्नी ही नाम के हैं। पहले तो पति भी उसे ही हीनभावना देने पर तुला रहता है कि तुम मुझे आकर्षित नहीं कर पातीं। फिर देर सवेर सच सामने आता है तो यह समाज में प्रतिष्ठित पति अपनी दरियादिली बताते हुए समझाता है कि तुम साधन सम्पन्न हो, पढ़ी लिखी हो, नौकरीपेशा हो, जब चाहे तुम अलग हो सकती हो। मैंने तो तुमसे विवाह ही इसलिए किया कि तुम अत्मनिर्भर हो! किसी मुझपर आश्रित कन्या से विवाह करता तो वह अलग कैसे रह पाती? कैसे जीवन यापन करती?


सो नेकदिल मनुष्य किसी पढ़ीलिखी, कामकाजी स्त्री का हृदय छलनी कर देता है। क्यों? क्योंकि वह माता पिता को यह नहीं बता सका कि वह समलैंगिक है, क्योंकि विवाह करने से समाज उसे समलैंगिक मानने की गल्ती नहीं करेगा। तब वह चैन से अपने सम्बन्ध भी बना सकेगा और पत्नी के हाथ का पका खाना भी खा सकेगा।


सच तो यह है कि शायद वह बुरा नहीं था। वह स्वयं पीड़ित था बस अपनी लाचारी की आग में किसी अन्य का जीवन भी झुलसा गया, केवल अपनी कायरता के कारण। प्रत्येक व्यक्ति वीर नहीं होता, प्रत्येक व्यक्ति इतनी प्रताड़ना सहने का साहस नहीं जुटा सकता, न समाज के तीर झेलने के लिए सीना तानकर खड़ा हो सकता है। सो वह किसी अन्य का जीवन नष्ट कर उसका सभी रिश्तों से मोहभंग कर देता है।


मैं तो कहूँगी कि वे समलैंगिक जो अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे थे हम पर भी उपकार कर रहे थे। अब वे अपनी तरह का जीवन कम से कम कानून के भय से मुक्त होकर तो जी सकेंगे। साथ ही साथ अन्य समलैंगिक भी शायद खुले में आकर स्वीकार करें कि वे समलैंगिक हैं ताकि किसी स्त्री या पुरुष को इनसे विवाह के बाद इतनी हताशा हाथ न लगे।


सो समलैंगिक लोगों को भी अपनी तरह जीने का अधिकार दो। वे किसी के जीवन में हस्तक्षेप नहीं कर रहे, हम उनके में न करें।


माता पिता के लिए अपनी संतान का समलैंगिक होना स्वीकारना कठिन है। परन्तु सत्य को स्वीकारना ही सही है। उससे कब तक मुँह मोड़ सकते हो? जहाँ तक हो सके अपनी समलैंगिक संतान का विवाह किसी ऐसे व्यक्ति से न करो जिसे उसकी इस पसंद का पता न हो। अनेक माता पिता यह आशा करते हैं कि विवाह होने से संतान सामान्य हो जाएगी। हमारे समाज में तो असंतुलित मस्तिष्क वाली संतान का विवाह भी इसी आशा में कर दिया जाता है। संस्कृति की आड़ में अपने दिवास्वप्नों को पूरा करने के चक्कर में किसी अन्य व्यक्ति का जीवन नष्ट करने से हम जरा भी नहीं हिचकिचाते। हमारी आँखों पर एक ऐसा रंगीन चश्मा चढ़ा होता है कि हम सच को नहीं देखते।


दुख तो तब होता है जब समाज के प्रतिष्ठित व समझदार लोग ऐसी मूर्खता करते हैं। अब कमसे कम ऐसा कम होगा। मैं इस निर्णय से समलैंगिकों के लिए तो प्रसन्न हूँ ही परन्तु उनमें से कुछ जो समाज के दबाव में विवाह करने वाले थे और अब नहीं करेंगे और जो इतरलिंगी उनका जीवनसाथी बनने के क्रूर भाग्य से बच गए उनके लिए भी प्रसन्न हूँ। गेहूँ और घुन दोनों ही बच गए। यही न्याय है।


घुघूती बासूती

शुक्रवार, जून 26, 2009

एन्ग्लो वैदिकः लड़के एन्ग्लो, लड़कियाँ वैदिक ! एक परिवार में दो संस्कृतियों का मिलन।

वस्त्र कैसे हों? यह एक बहुत ही कठिन व निजी प्रश्न है और इसमें स्थान, जलवायु, आर्थिक स्थिति और उम्र भी बहुत बड़ी निर्णायक भूमिका निभाती है। इसे व्यक्ति विशेष पर छोड़ देना ही सबसे बेहतर होता है। किन्तु जब लोग किसी संस्था से जुड़ते हैं तो संस्था को लगता है कि वे लोग संस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं और संस्था चाहने लगती है कि उसके प्रतिनिधि उसके मूल्यों को अपने व्यवहार, व्यक्तित्व व पहनावे में संसार के सामने रखें। व्यवहार अधिक महत्वपूर्ण है परन्तु उसे नियन्त्रित करना अधिक कठिन है सो संस्थाएँ पहनावे को ही नियन्त्रित करने में लग जाती हैं। सच तो यह है कि हमारा उथलापन पहनावे को ही व्यक्तित्व मान लेता है।


संस्थाएँ यदि पहनावे में क्या अपेक्षित है यह भर दिशा निर्देश या गाइडलाइन्स में बता दें तो समस्या काफी सीमा तक सुलझ सकती है। वे कौन से वस्त्र पहनें भारतीय या विदेशी यह निर्णय न ही करें तो बेहतर है। वैसे भी जिस देश का काम काज अंग्रेजी में होता है वहाँ परिधान के भारतीय होने पर जोर देना गलत होगा। फिर यह देश इतना बड़ा और इतनी विविधता लिए है कि किसी एक या दो परिधानों पर भारतीयता का ठप्पा लगाना मूर्खता ही होगी। अस्सी के दशक में जब दक्षिण भारत में सलवार कुर्ते का चलन बढ़ा तब वहाँ के परम्परावादी लोग लड़कियों के लहंगे व आधी साड़ी या पावदा (यह वहाँ का अविवाहित किन्तु बड़ी लड़कियों का पाराम्परिक परिधान है, था कहना अधिक उचित होगा। अब यह केवल विवाह व त्यौहारों तक सीमित हो गया है। लहंगे के ऊपर साड़ी का ब्लाउज और आधी साड़ी लहंगे पर चुनरी की तरह बाँई तरफ से खोंसी जाती है और फिर साड़ी के पल्लू की तरह ही ली जाती है। देखने में बहुत सुन्दर लगती है। ) न पहनने से परेशान थे। आज सलवार कुर्ता लगभग पूर्णतया दक्षिण भारत में स्वीकार कर लिया गया है। मुझे याद है एक दक्षिणी विद्यार्थी का यह कथन कि उत्तर भारत के प्रॉफेशनल कॉलेजों में सलवार कुर्ता अधिकतर दक्षिणी लड़कियाँ ही पहनती हैं जबकि उत्तर भारतीय लड़कियाँ जीन्स पहनती हैं। यह बात नब्बे के दशक की है। आज की स्थिति मैं नहीं जानती।


पूर्वोत्तर में भी आसाम में मेखला चादर है तो शेष जगह एक लुँगी की तरह का wrap around और ब्लाउज है। बंगाल में साड़ी पहनने का अलग ही तरीका है। परन्तु सब जगह समय के साथ बदलाव आया है। और सबसे अधिक बदलाव तो पुरुषों के पहनावे में आया है। गूगल में जाकर यदि पुरुषों के पारम्परिक भारतीय परिधान देखें तो लगेगा कि ये गायब हो गए हैं। अधिकतर पुरुषों को तो वे पहनने भी नहीं आएँगे! क्या कोई पुरुषों के पारम्परिक परिधानों के लुप्त होने के कारण बता सकेगा? या फिर मेरी बिटिया के स्कूल द्वारा मजाक में दिए हास्यास्पद तर्क से ही काम चलाना होगा? वहाँ बताया गया था कि एन्ग्लो वैदिक का एन्ग्लो लड़कों के लिए है और वैदिक लड़कियों के लिए ! अतः लड़के पैन्ट्स पहनेंगे और लड़कियाँ सलवार कुर्ता और दुपट्टा !


महाराष्ट्र में तब परकर पोल्का( लंहगा और लंहगे के ऊपरी भाग को ढकता हुआ ढीला ब्लाउज ) के स्थान पर स्कर्ट ब्लाउज को स्वीकारा गया। ९ गज की साड़ी के स्थान पर ६ गज की साड़ी चल निकली। साड़ी भी सारे भारत में अलग अलग तरह से पहनी जाती थी। माँ जब गाँव जातीं तो सीधे पल्ले की साड़ी पहनती। उल्टे पल्ले की साड़ी जो आज पूरे भारत में स्वीकार्य है तब गाँव में फैशन मानी जाती। शायद कोई हरियाणवी मित्र मेरी इस बात को भी मानेगा कि एक समय में हरियाणवी स्त्रियाँ घर से बाहर निकलते समय सलवार कुर्ता नहीं लंहगा पहनती थीं। साड़ी भी नहीं। तो कैसे लहंगे और जेब वाले लम्बे ब्लाउज(कुर्ती ) से सलवार कुर्ते, फिर साड़ी और फिर वापिस सलवार कुर्ते की यह स्वीकृति यात्रा हुई?


कैसे सलवार कुर्ते जैसे एक पूर्णतया पंजाबी परिधान को सम्पूर्ण भारत ने सुविधा के कारण अपना लिया ? जब स्त्रियाँ घर से बाहर बसों व ट्रेन से यात्रा करके जाने लगीं तो साड़ी को पार्टी परिधान मानने लगीं और सलवार कुर्ते को नित्य का परिधान! साड़ी में कितने ही गुण क्यों न हों कुछ असुविधा भी है। असुविधा को भी भूल जाएँ तो कुछ व्यवहारिक समस्याएँ हैं जिनके चलते यह भागने, दौड़ने, भीड़ में धक्कामुक्की करने व यात्रा में लेटने सोने के लिए सबसे सही नहीं है।


सलवार कुर्ता साड़ी की इन्हीं असुविधाओं के चलते व इसके 'पंजाबी किन्तु भारतीय तो है' की मान्यता व इससे लगभग सारा शरीर ढके जाने के कारण अधिक लोगों की स्वीकृति पा गया। परन्तु जैसे किसी समय दक्षिण भारत ने सलवार कुर्ते को मान्यता दी वैसे ही उत्तर भारत जीन्स व ट्राउजर्स को मान्यता देने की लड़ाई लड़ रहा है।


सत्तर के दशक में जब हम कॉलेज में थे तो आधी से अधिक छात्राएँ बेलबॉटम, ट्राउज़र्स, पेरेलल्स व जीन्स पहनती थीं। हो सकता है कि यह महानगरों में ही होता हो परन्तु मुझे प्रत्यक्ष में कोई विरोध नहीं दिखा। थोड़ा दबा सा विरोध फ्रॉक या स्कर्ट ब्लाउज का अवश्य होता था किन्तु रोक नहीं थी। मुझे आश्चर्य होता है कि आज लगभग पैंतीस या चालीस वर्ष के बाद इसका अधिक व मुखर विरोध हो रहा है। तब विरोध अधिकतर तब होता था जब ये ही परिधान विवाह के बाद पहने जाते थे।


क्या हम आज कम सहिष्णु हो गए हैं ? या संस्कृति के ठेकेदार अधिक मुखर हो गए हैं ? या फिर हमारे परिधान उस सीमा को पार कर गए हैं जहाँ तक समाज बदलाव को स्वीकार कर सकता है ? या फिर हमारे छात्र व छात्राएँ पार्टी व कॉलेज का अन्तर भूल गए हैं ? मुझे लगता है कि जीन्स या ट्राउज़र्स का विरोध करने की अपेक्षा कैज़ुअल, फ़ॉर्मल व पार्टी परिधानों का अन्तर समझना व समझाना अधिक उचित होगा। जीन्स(हिपस्टर कैज़ुअल नहीं हो सकती,कैज़ुअल वस्त्र शायद वे होते हैं जिन्हें हमें बारम्बार सम्भालना, ठीक करना नहीं पड़ता, यदि यह सब ध्यान रखना पड़े तो हम कैज़ुअल नहीं रह पाते! ) व टीशर्ट कैज़ुअल, ट्राउज़र्स व कॉलर व बाँह वाली कमीज, अमिनि स्कर्ट व स्कर्ट तक आता ब्लाउज फ़ॉर्मल, मिनि स्कर्ट या छोटी टॉप पार्टी परिधान मानी जाती हैं। प्रायः सभी दफ्तरों में यही नियम होता है। साड़ी व सलवार कुर्ते को सभी जगह मान्यता दी जाती है क्योंकि इन्हें पहनने से भारत में किसी को रोकना उतना ही गलत होगा जितना कई होटल व क्लब आदि में पुरुषों को धोती कुर्ते या कुर्ते पाजामे पहनने से रोकना गलत लगता है। पुरुषों के लिए पूरी बाँह की कमीज, टाई, व ट्राउजर्स, या सूट फॉर्मल होता है।


जैसे अपने सुविधाजनक होने के कारण सलवार कुर्ता पूरे भारत में मान्यता प्राप्त कर गया वैसे ही जीन्स भी अपनी सुविधाजनक व कम से कम मैन्टेनेन्स की लागत व टिकाऊ होने के कारण मान्यता प्राप्त कर ही लेंगी। जीन्स जेब व मेहनत के हिसाब से सबसे सस्ती पड़ती हैं। दो जीन्स में पूरा कॉलेज जीवन बिताया जा सकता है। एक में बिताने वाले भी बहुत मिल जाएँगे। ना इस्तरी का झँझट, ना आज कौन सा परिधान पहनें सोचने की झँझट, बस चार पाँच टी शर्ट्स में से कोई एक उठाई और जीन्स के साथ पहन ली। सलवार कुर्ते के साथ इस्तरी करने की समस्या रहती है। साड़ी तो खैर पहनना ही धोबी को हर बार इस्तरी के रुपए चढ़ाने वाला धोबीप्रिय परिधान है।


जो लोग वर्दी के पक्ष में हैं वे अमीर गरीब का तर्क देते हैं। मुझे लगता है कि मनुष्य में इस उम्र तक इतनी समझ तो आ ही जानी चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति की जेब अलग अलग होती है और दूसरों की बराबरी करना घाटे का सौदा है। वर्दी लागू करेंगे तो क्या सबके लिए बस में या साइकिल पर आना भी निर्धारित करेंगे ? जब कोई मंहगी नई मोटरसाइकिल या कार में आएगा तो क्या आप उसे रोक देंगे ? कभी न कभी तो इन नवयुवकों/ नवयुवतिओं को जीवन की सचाई का सामना करना ही होगा। हम उन्हें कहाँ तक बचा पाएँगे? कपड़ों के पीछे पागल न होना भी एक आत्मविश्वास की स्टेटमेंट होता है। मेरी बिटिया ने तो मेरी किसी युग की जीन्स में कॉलेज के तीन साल निकाल दिए। यह उसका फैशन या आत्मविश्वास का स्टेटमेंट था।


कुछ वर्ष पहले म्यानमार में छात्रों के लिए राष्ट्रीय पारम्परिक परिधान पहनना अनिवार्य कर दिया गया था। मेरे डॉक्टर मित्र को दुख था कि उसके बेटे जीन्स नहीं पहन सकेंगे क्योंकि लूँगी (longyi) पहनना अनिवार्य हो गया था।


हमारे अधिकार व स्वतंत्रता धीरे धीरे ही छीने जाते हैं, एक झटके में नहीं। छीनने वाले यह देखते रहते हैं कि हमारी सहनशक्ति कितनी है। यदि एक वार हम झेल जाएँ तो वह अन्तिम नहीं होगा। इसके बाद एक और फिर एक और होना निश्चित है। साड़ी जैसे परिधान जिसके लिए प्रत्येक भारतीय के मन में आदर है, शायद वैसा ही जैसा माँ के लिए होता है, उसे भी एक नई दृष्टि से देखा जा रहा है। बहुत से स्कूलों में एक तरफ तो जहाँ अध्यापिकाओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है वहीं साड़ी के ब्लाउज व उनमें से झलकती पीठ को छिपाने के लिए वर्दी के जैकेट पहनाए जा रहे हैं। अपने परिधान पर गर्व भी है और लज्जा भी!

यह तर्क भी दिया जा रहा है कि हमारी स्त्रियाँ ऐसे परिधान पहनती हैं कि यदि किसी अंग/भाग/ज़िस्म को लगातार देखते जाओ तो वे अपने वस्त्र ठीक करने लगती हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि उन्हें किसी ने यह नहीं सिखाया कि अपने से विपरीत लिंग के लोगों से बात करते समय दृष्टि उनके चेहरे पर केन्द्रित रखी जाती है न कि उनके शरीर के अन्य भागों पर। यदि आप किसी के बुर्के, या ढके सिर को भी घूरते जाएँगे तो वह उसे ठीक करने लगेगी या छूकर देखेगी कि कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं कि कहीं कौवे आदि ने सिर पर बीट तो नहीं कर दी। यदि यही किसी पुरुष के साथ किया जाए तो शायद वह भी सचेत हो जाएगा, मूँछ को घूरेंगे तो हाथ फिराकर देखेगा कि मूँछ पर खाना, दूध आदि तो नहीं लगा रह गया !

वैसे जहाँ तह उत्तरप्रदेश का प्रश्न है कम से कम अभी के लिए तो मायावती जी ने इस मुद्दे को सुलझा दिया है। परन्तु यह मुद्दा सरलता से मरता नहीं, रक्तबीज दानव की तरह बारम्बार उठ खड़ा होता है। स्त्रियों के लिए क्या उचित व अनुचित है या कहिए कि क्या स्त्रियोचित है हमारे समाज में अन्य महत्वपूर्ण समस्याओं के अभाव में, सबसे अधिक चिन्ता का विषय बनता जा रहा है।


यदि हम युवाओं को वयस्क मानने लगें तो जैसे वे देश के कर्णधारों का चुनाव कर सकते हैं शायद वैसे ही अपने वस्त्रों का भी कर लें।


घुघूती बासूती

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सोमवार, जून 22, 2009

ड्रेस कोड: शुभ्र श्वेत सलवार कुर्ता!

जब भी सुनती हूँ कि किसी कॉलेज में ड्रेस कोड लागू हुआ है तो अपने छात्र जीवन की याद आती है। सत्तर का दशक था। उस जमाने में लड़कियाँ इतनी आगे नहीं आईं थीं कि किसी को वे चुनौती लगतीं। सो प्रायः हमें हमारे हाल पर छोड़ दिया जाता था। अधिकतर किसी को(अध्यापक/अध्यापिका वर्ग को) हमारे पहनावे से कोई परेशानी नहीं थी। कभी कभार ही होता था कि कोई अध्यापक/अध्यापिका हमें घूरकर देख लेता।


अब यह मत सोचिए कि हम सलवार कुर्ते पहनते होंगे। विवाह पूर्व हमारे पास दो ही सलवार कुर्ते थे। एक तो हमने सिलाई सीखने के चक्कर में बनाया था और दूसरा जबर्दस्ती बनवाया गया था। जबर्दस्ती! हाँ बिल्कुल हास्यास्पद जबर्दस्ती होती थी छात्राओं के साथ! यह था शुभ्र श्वेत सलवार कुर्ता! आज भी उसकी याद आती है तो उससे चिढ़ ही उठती है।


किसी बावले से क्षण में, शिक्षा के क्षेत्र में किसी शक्तिशाली मानव ने यह निर्णय लिया था कि कॉलेज की लड़कियों की वर्दी होनी चाहिए। शायद सारे सप्ताह हमें वर्दी पहनाने में उन्हें स्वयं भी अटपटा लगा हो या लगा हो कि यह तो अति होगी सो केवल हर सोमवार पंजाब विश्वविद्यालय के कॉलेजों में पढ़ने वाली प्रत्येक छात्रा श्वेत वस्त्रधारी हो जाती थी। यह बात और है कि यदि सहशिक्षा वाला कॉलेज हो तो छात्र रंग बिरंगे परिधानों में ही होते थे। केवल छात्राएँ वर्दीधारी होती थीं। पता नहीं सहशिक्षा वाले हमारे कॉलेज के प्रिन्सिपल को यह अटपटा लगता था या केवल हमें ही लगता था। वर्दी का नियम केवल सफेद तक ही सीमित था,आप सफेद साड़ी,फ्रॉक,स्कर्ट ब्लाउज,ट्राउजर्स कुछ भी पहन सकती थीं। अधिकतर के पास सलवार कुर्ता इसलिए था कि रैगिंग के दिनों में सलवार कुर्ता ही वर्दी होती थी।


थोड़ा बहुत मनोविज्ञान जब पढ़ा तो इस शक्तिशाली मानव,जिसे हमारे लिए नियम बनाने का अधिकार था, की थोड़ी मानसिक चीरफाड़ कर कारण खोजना चाहा परन्तु असफलता ही हाथ आई। कारण आज भी समझ नहीं आता। वर्दी का विचार तो जो था सो था किन्तु केवल छात्राओं के लिए क्यों यह तर्क समझ नहीं आता था। सोचिए कॉलेज में खेलदिवस है या वार्षिकोत्सव है। छात्र होते थे रंगबिरंगे और छात्राएँ सफेद वर्दी में!यही हाल स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस के दिन होता था। हमारे साथ ही हमारे स्कूल में पढ़े छात्र बिना वर्दी के और हम वर्दी में रानी बेटियाँ बनी होती थीं।


बहुत वर्षों बाद एक बार जब मैं अपने एक सहपाठी के साथ कॉलेज के दिन याद कर रही थी तो उसे इस वर्दी वाली बात की याद दिलाई और पूछा कि केवल हमें क्यों पहनाई जाती थी तुम्हें क्यों नहीं। तब वह ठहाका लगाकर हँसा और बोला कि लड़कों से पंगा लेने को किसका दिमाग खराब हुआ था। लड़कों पर नियम कायदे लगाकर तो देखते कौन लड़का इस नियम को मानता? हड़ताल हो जाती। 'जो दबता है उसे ही दबाया जाता है।' हमें तुम्हारी वर्दी देखकर तुम पर बहुत हँसी आती थी।


हाँ, तो मुझे मेरा उत्तर उसके इस ब्रह्म वाक्य में मिल गया,'जो दबता है उसे ही दबाया जाता है।' शायद इसे सही करके ऐसे कहा जा सकता है कि स्त्री दबती है इसलिए दबाई जाती है। शायद दबती के पुल्लिंग की आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि यह केवल एक स्त्रियोचित गुण है।


आज 'ड्रेस कोड लागू करना गुनाह तो नहीं' लेख पढ़ा। मैं लेखक से पूर्णतया सहमत हूँ किन्तु केवल यह चाहती हूँ कि ऐसे ड्रेस कोड पुरुषों पर भी लागू किए जाएँ। कुर्ते पाजामों, धोती कुर्तों में घूमते विशुद्ध भारतीय बालक क्या सुन्दर दृष्य उत्पन्न करेंगे! अहा, तब ही तो हम सच्चे भारतीय कहलाएँगे, अपनी संस्कृति के सच्चे रक्षक! देखिए वातावरण कितना शुद्ध, सात्विक हो जाएगा। वस्त्र बदलते ही उनके मनोभाव भी स्वच्छ हो जाएँगे। लड़कियों पर तब वे बुरी नजर नहीं डालेंगे। सारी कलुषित भावनाएँ धुल जाएँगी।


मैं जानती हूँ कि ऐसा ही होगा क्योंकि वस्त्र ही छेड़छाड़ व बलात्कार का मुख्य कारण हैं। हम वर्दी पहनती थीं तब भी छेड़ी जाती थीं। हमारे वस्त्र तो ठीक होते थे केवल छेड़ने वालों के गलत होते थे। सो वस्त्र दोनों तरफ से ही भारतीय होने चाहिए। तभी मन शुद्ध होगा। आपकी क्या राय है?


मेरी राय अगले लेख में!


घुघूती बासूती