Monday, August 29, 2016

फसल


हम वह काटते हैं 
जो हमने बोया था
और वह भी 
जो बेशर्मी से 
अपने आप उग आया हो
बिन बुलाए मेहमान सा
जिसे हम देख न पाएँ हों
गुड़ाई के समय
या निकालने में अलसा गए हों
या फिर सहिष्णुता दिखाते हुए
छोड़ दिया हो उसके हाल 
और वह भी जिसके बीज
किसी षणयंत्र के अन्तर्गत
छिड़क दिए गए हों 
हमारे खेत में
कोयल के अंडों की तरह
जो पैदा हुए और पलते रहे
हमारी फसल के बीच।
अब पक चुकी है फसल
और हम काट रहे हैं,
जो बोया सो काट रहे हैं
सोचते हुए,
हैरान और परेशान से
कभी अपने बीजों के नमूने
और कभी फसल का 
मिलान करते हुए,
किंकर्तव्यविमूढ़ कुछ पल
फिर लग जाते हैं
अनाज की बिनाई के
असाध्य से काम में।
 
घुघूती बासूती

Thursday, May 05, 2016

'मजे में हूँ।'

उत्तर में कितना सच हो कितनी औपचारिकता?

कोई कहे, 'नमस्ते। कैसी हो?' तो क्या उत्तर दिया जाए?

मजे में /आनन्द है/ बढ़िया/ सब ठीक है/ आपकी कृपा है? क्या तब भी, जब सर फटा जा रहा हो, हाल की बीमारी से दिखना भी कम हो गया हो, कान तो लगभग बहरे हो गए हों, मस्तिष्क की सोचने, समझने की शक्ति खत्म हो गई हो, कुछ याद न रहता हो, भूरे सलवार कुरते के साथ जामुनी दुपट्टा लेकर बाहर चली जाती होऊँ, बच्चे बीमार चल रहे हों, पति का मधुमेह बढ़ गया हो, कामवाली छुट्टी पर चली गई हो, ढंग से सोए हुए जमाना बीत गया हो, घर के खर्चे में आधा खर्चा दवाई और डॉक्टर की फीस का हो, कमी थी तो घर पर मेहमान आने वाले हों?
या फिर सच बता दिया जाए? सुनने वाला अफ़सोस करेगा कि क्यों पूछा था।

मुझे याद है लगभग पच्चीस साल पहले एक तीन साल की बच्ची होती थी जिससे कैसी हो पूछने पर वह सच बता देती थी। कहती थी, 'मेले पैल में फोला हो गया है। मुझे खाँछी हो गई है। मेली नोज़ी लीक कल लही है। मुझे जोल का बुखाल आ गया है।'

उसने 'हैलो, हाओ आर यू?' के उत्तर में 'फ़ाइन, थैंक यू' कहने की परिपक्वता, समझ व सांसारिकता नहीं सीखी थी। वह तो 'बच्चे मन के सच्चे' का जीताजागता उदाहरण थी।

सो अब कई बार कोई पूछता है कि कैसी हो तो मेरा मन करता है उस तीन साल की बच्ची की तरह ही उत्तर दे दूँ, किन्तु सामने वाले का खयाल कर औपचारिकतावश प्रायः झूठ बोल देती हूँ, कहती हूँ, 'मजे में हूँ।'

घुघूती बासूती

Thursday, March 31, 2016

बच्चों के साथ क्वालिटी समय या अनमना समय

अपनी नतिनी तन्वी को हर शाम सोसायटी के पार्क खेलने ले जाती हूँ। बहुत अच्छा और बड़ा पार्क है। छोटे बच्चों के साथ प्रायः माता पिता, दादा दादी, नाना नानी या आया आती हैं। अभी तक मेरे सामने कोई गम्भीर दुर्घटना तो नहीं घटी किन्तु कई बार बच्चों को झूले से चोट लगते देखती हूँ। प्रायः ये दुर्घटनाएँ रोकी जा सकती हैं। दो बातें अभिभावकों का ध्यान अपने बच्चे की सुरक्षा से भटका देती हैं, एक तो है मोबाइल दूसरा अन्य अभिभावकों से बातें करने में खो जाना।
कल ही एक छः सात साल की बच्ची झूले पर बैठकर लगातार अपनी माँ को पुकारे जा रही थी। प्रायः बच्चों को झूला तो मिल जाता है किन्तु झुलाने वाले गायब हो जाते हैं। बच्चे झूला छोड़ना भी नहीं चाहते सो जाकर बुला भी नहीं पाते। उन्हें भय रहता है कि एक बार अपनी बारी निकल जाने दी तो न जाने कब बारी मिलेगी। खैर, बच्ची लगातार बुलाती रही किन्तु माँ नहीं आई। अचानक बच्ची नीचे गिरी और उठने लगी। उठने पर लकड़ी के झूले की पट्टी निश्चित उसके सर पर लगती। मैं पास में ही तन्वी को झुला रही थी। स्टे डाउन, डोन्ट गेट अप चिल्लाती उसके झूले को पकड़ने दौड़ी। भाग्य से इसके पहले कि झूला उसके सर से टकराता मेरे हाथ में था।
इस बार माँ पल भर में ही पहुँच गई थी और मुझे आभार कह बच्ची को डाँटती हुई यह कहते हुए घसीटते हुए ले गई, हुण तेन्नू कदे एथ्थे नहीं लावाँगी। तेन्नू झूटे लेणा वी नहीं आन्दा।
उसका इतना जल्दी पहुँच जाना सिद्ध करता है कि वह आस पास ही थी किन्तु बच्ची की पुकार को जानबूझ कर अनसुना कर रही थी।
परसों एक और माँ बच्ची को पींग लेना सिखा रही थी और न सीख पाने पर फटकार रही थी कि मुझे विश्वास नहीं होता कि तुम मेरी बेटी हो। माँ में सिखाने धैर्य नहीं था और बच्ची को रुआँसा कर वह चलती बनी।
कुछ दिन पहले एक वृद्ध एक पाँच सात महीने के बच्चे को गोद में लकर आए। उन्होंने दस बारह साल की अपनी पोती के हाथ में बच्चा दे उसे झूले पर बैठा दिया। बच्ची झूले को पकड़े या बच्चे को? सो उसकी एक बाँह झूले की चेन के दूसरी तरफ से निकाल बच्चा गोद में बैठा दिया। फिर एक तरफ से चेन पकड़ उन्होंने जो झुलाना शुरु किया लगा कि वे भूल गए हैं कि नन्हा सा बच्चा एक ही हाथ के सहारे बच्ची ने पकड़ रखा है। और एक ही तरफ से चेन को लगातार हिलाते रहने से न केवल झूला तेज जा रहा था बल्कि बहुत टेढ़ा जा रहा था। मुझे लग रहा था कि बच्चा अब गोद से छिटकेगा ही। भाग्य से बच्चे का पिता डैडी, डैडी, रोको, रोको, इतना तेज मत झुलाओ कहता हुआ आया और बच्चे को अपने साथ ले गया।

एक दिन लगभग दो वर्ष की बच्ची अकेली घिसलपट्टी की सीढ़ियाँ चढ़ रही थी। उसका पिता मोबाइल पर व्यस्त था। लड़खड़ाती हुई बच्ची के पिता से जब मैंने पूछा क्या यह अकेली सीढ़ी चढ़ सकती है तो उसने कहा, हाँ थोड़ा चढ़ जाती है किन्तु गिर सकती है। फिर उसका ध्यान बच्ची पर गया जो काफी ऊपर चढ़ डगमग हो रही थी। लपक कर उसने बच्ची को सम्भाला, किन्तु उसे नीचे उतार वापिस मोबाइल पर व्यस्त हो गया।
ऐसा भी नहीं है कि अधिक ध्यान रखने से बच्चों को चोट नहीं लगेगी किन्तु इतनी लापरवाही आश्चर्यचकित अवश्य करती है। यह बात भी समझ नहीं आती कि क्या हम अपने बच्चों को कुछ मिनट का अबाधित, बिना किसी अन्य से मोबाइल पर बतिआए समय नहीं दे सकते। बच्चों के साथ ऐसे अनमने और जबरन बिताए समय का क्या लाभ? शायद इसीलिए क्वालिटी समय की इतनी बात होती है। आखिर हमारे बच्चे से अधिक महत्वपूर्ण और वह भी उसके साथ खेलने के समय में, संसार में क्या हो सकता है?
घुघूती बासूती