Saturday, November 07, 2020

जिसके भीतर जो होगा वही बाहर निकलेगा।

यह बात हम हर समय देखते हैं। सबसे अधिक तब जब व्यक्ति को चोट लगे, बहुत पीड़ा हो। हमारे बचपन में हम ऐसे में हे राम, उई माँ, कुमाँऊनी में ओ इजा (माँ), ओ बौज्यू (पिता) सुनते थे। आजकल शिट, फ़... सुनते हैं।

स्कूली दिनों में एक बार बहुत कष्ट में हस्पताल के एमर्जेंसी वार्ड में रहना पड़ा था। एक व्यक्ति भद्दी गालियाँ दे रहा था, चीख चीख कर। सारा कमरा उसकी गालियों से गूँजायमान रहता था। एक बार उसने एक डॉक्टर को झन्नाटेदार थप्पड़ भी मारा जो सबको सुनाई दिया। मैंने डॉक्टर से इस विषय में पूछा तो उसने कहा कि वह एक सड़क दुर्घटना में घायल है। बचने की आशा नहीं है। बहुत दर्द है, इसलिए ऐसा कर रहा है। यह सामान्य है।


परिवार में मैंने तब तक कभी अपशब्द नहीं सुने थे। किन्तु मस्तिष्क में बैठ गया कि अति कष्ट में अपशब्द निकलना सामान्य है। एक भय भी कि कभी मैं भी ऐसा करूँगी।


तीन चार साल बाद पिताजी को स्ट्रेन्ग्युलेटेड हर्निया में दर्द से तड़पते हुए देखा, उन्हें रिक्शे में लाद हस्पताल ले गई। दर्द असह्य होने पर वे रिक्शे से उतर जमीन पर लेट तड़पने लगे। मृत्यु भूमि पर आए शायद और भूमि पर तड़पन अधिक सुविधाजनक था। मुझे भय था कि अब गालियाँ बरसेंगी किन्तु वे हे राम और ओ इजा, ओ बौज्यू ही कहते रहे। जब तक  डॉक्टर ने हर्निया को ठीक नहीं किया वे राम और माता पिता को ही गुहार लगाते रहे।


जब बेटियों का जन्म होना था तो मुझे फिर भय था कि प्रसव पीड़ा में कहीं मुँह से गालियाँ ना बरसें। किन्तु ऐसा नहीं हुआ।
फिर कितने ही औपरेशन हुए, हर्निया हुआ, हर बार होश में आने पर पति से यही पूछा कि मैं बेहोशी में क्या बड़बड़ा रही थी। अपशब्द कभी नहीं थे।  


पिताजी ने पूरी शक्ति से हे राम कहकर प्राण त्यागे।


सो कष्ट और अपशब्दों का सम्बन्ध हमारे भीतर क्या है से है ना कि पीड़ा से।

किन्तु अब बाहर, घर परिवार सब जगह ये ही शब्द सुनाई देते हैं। कोई इसे बुरा नहीं समझता, यदि समझता होता तो इसका इलाज करता। इलाज बहुत कठिन नहीं है। जिन शब्दों को हम बोल रहे हैं उनको कल्पना में देखो, सूँघो महसूस करो। शायद बोलने का मन ना करे।


राम या भगवान की जगह नास्तिक कुछ अन्य शब्द बोल सकते हैं, माँ, पिता, गुलाब, कमल, कार्ल मार्क्स, माओ, अमेरिका, चीन या कुछ भी। वे सब शिट और फ़... से तो बेहतर ही होंगे अपने भीतर संजोने को।


घुघूती बासूती

Monday, May 07, 2018

एक सपने की हत्या

कुछ मैंने की, कुछ तूने की
कुछ मिलकर हम दोनों ने की
इक सपने की हमने हत्या की ।

समझौतों का ये जीवन जीया
मिलकर गरल कुछ हमने पीया
जो करना था वह हमने न किया ।

थोड़ी तूने, थोड़ी मैंने ये दूरी बनाई
मिलकर हमने थी जो सेज सजाई
उसके बीचों बीच ये दीवार बनाई ।

कुछ तू ना समझा कुछ मैं न समझी
बातों बातों में कब जिन्दगी ही उलझी
मिल हमें जो सुलझानी थी ना सुलझी ।

अपनी अलग अलग राहें चुन लीं
मन की हमने ना बातें सुन लीं
अंधेरी हमने अपनी राहें कर लीं ।

कुछ तू आता कुछ मैं आती पास तेरे
मन से जो सुनता मन के बोल मेरे
मैं जीती तेरे लिये तू जीता लिये मेरे ।

पर ऐसा कभी कुछ भी हो ना सका
थोड़ा मैं थी थकी थोड़ा तू था थका
जीवन हमें कितना कुछ दे न सका ।

ध्येय हमारा हरदम इक ही था
संग जीना और संग मरना था
फिर सपने को क्यों यूँ मरना था ।

अब आ मिल कुछ संताप करें
सपने के मरने का विलाप करें
हम दोनों मिल पश्चात्ताप करें ।

घुघूती बासूती

क्यों उसे ऐसा लगा कि गुलाबी या जामुनी रंग लेने से उसका जेंडर ही बदल जाएगा?

कुछ दिन पहले एक स्त्री को उसके कार्यालय में उसके बच्चे के क्रेश/ डे केयर से फ़ोन आया , 'आपका बच्चा सम्भाले नहीं सम्भल रहा है, तोड़ फोड़ कर रहा है, आकर उसे ले जाइए.' स्त्री की नई नई नौकरी है और वह भी अपनी सोसाइटी, जहाँ बच्चे का क्रेश भी है, से बहुत अधिक दूर. बच्चे को लेने पहुँचने में डेढ़ घंटा आराम से लग सकता था. उसने क्रेश संचालिका से कहा, 'आप मेरी बात मेरे बच्चे से करवा दीजिए.' संचालिका बोली , 'नहीं, मैं बात नहीं करवा सकती ,वह मेरा फोन भी तोड़ देगा. '  असहाय माँ बोली,' मेरी बात तो करवाइए. फोन तोड़ देगा तो मैं नया खरीद दूँगी .' बहुत बार कहने पर संचालिका बच्चे से बात करवाने को तैयार हो गयी.
बच्चे से बात करने पर पता चला कि सब बच्चे रंग बिरंगे कागजों पर चित्रकारी कर रहे हैं. बच्चे को गुलाबी रंग का कागज दिया गया. उसे बदलने को कहने पर जामुनी रंग का कागज दिया गया. ये दोनों रंग वह पसंद नहीं करता क्योंकि वे लडकियों के रंग हैं. कागज न बदलने पर उसे इतना गुस्सा आया कि उसने कागज फाड़ दिया. रंग फेंक दिए. रोकने पर और भी अधिक उत्पात करने लगा.
माँ के बहुत समझाने और कल उसकी पसन्द के रंग का कागज देने के आश्वासन पर वह शांत हुआ.
वह बच्चा इतना विचलित, क्रोधित क्यों हुआ होगा? क्यों उसे ऐसा लगा कि गुलाबी या जामुनी रंग लेने से उसका जेंडर ही बदल जाएगा? वे लोग कुछ समय पहले ही अमेरिका से भारत रहने आए हैं. अमेरिका में रंगों को लड़के लडकियों के रंगों में बाँट दिया गया है. कोई भी लड़का गुलाबी या जामुनी रंग पहनना या उपयोग करना नहीं चाहता. कोई भी लड़की नीला रंग पसंद करती है या नहीं कहना कठिन है किन्तु लड़की के लिए उपहार आदि लोग गुलाबी या जामुनी रंग में ही लेते हैं. आप गुब्बारा खरीदने  जायेंगे तो गुब्बारे वाला लडकी को गुलाबी या जामुनी रंग का गुब्बारा ही देगा.
अब यह समस्या भारत में भी होने लगी है. स्त्रियों के लिए विशेष टैक्सी हो या लोकल ट्रेन के डिब्बे का रंग सुनिश्चित करना हो तो वह गुलाबी या जामुनी ही होगा. इससे सुविधा तो हो सकती है किन्तु रंगों को भी स्त्री पुरुष के रंगों में बाँट देना कहाँ तक सही है?
पता नहीं हमारा समाज कहाँ जा रहा है? कुछ वर्ष पहले हमने आतंक के रंग निश्चित किए. वह रंग जो हमारी संस्कृति में  त्याग , बलिदान, ज्ञान, सेवा व शुद्धता का प्रतीक है उसे राजनीति ने आतंक से जोड़ दिया. तब भी मुझे रंगों का यह विभाजन सही नहीं लगा था. मैंने एक लेख 'रंग हो जाने चाहिए बेरंग'
http://ghughutibasuti.blogspot.in/2009/06/blog-post_04.html लिखा था.
आज भी मुझे नन्हें बच्चों के मन में इस तरह रंगों का विभाजन करना बिलकुल नहीं भाया. क्या इस तरह हम बच्चों से रंगों में अपनी पसंद निर्धारित करने का अवसर नहीं छीन रहे? क्या हम रंगों के प्रति बच्चों को सहज नहीं रहने दे सकते? विशेष रंग उनपर थोप कर हम उनका  पसंद करने का अधिकार  ही उनसे छीन ले रहे हैं.
घुघूती बासूती