

हमारे सोचने से क्या होता है? इन्डोनेशिया की एक औक्टॉपस की प्रजाति तो ऐसा बिल्कुल नहीं सोचती। वे नारियल के कटोरीनुमा खोल इकट्ठा करते हैं। अब अष्टभुज हैं तो अपनी भुजाओं का प्रयोग भी खूब करते हैं। वे समुद्र के तल से मनुष्यों द्वारा फेंके गए नारियल के खोल उठाते हैं। उनमें से रेत आदि खाली करते हैं और फिर उन्हे अपने निवास स्थान पर ले जाते हैं। वहाँ जाकर दो खोलों को तरीके से एक के ऊपर एक रखकर अपना मकान बना लेते हैं।
काश हमारे नाप के खोल भी मिलते। फिर हम भी अपनी मनपसंद जगह पर अपना मकान बना लेते। जब ऊब जाते तो मकान उठाकर कहीं और ले जाते।
अपृष्ठवंशी प्राणी द्वारा औजार के उपयोग का यह पहला उदाहरण है।
नोटः चित्र नैशनल ज्योग्राफिक से साभार लिए गए हैं।
घुघूती बासूती
Ati sundar.
ReplyDelete--------
अंग्रेज़ी का तिलिस्म तोड़ने की माया।
पुरुषों के श्रेष्ठता के 'जींस' से कैसे निपटे नारी?
दिलचस्प सूचना।
ReplyDeleteवीडियो देखा था, मजेदार.
ReplyDeleteरोचक ,ऑक्टोपस बुद्धिमान होते हैं !
ReplyDeleteशुरू में हम भी प्रकृति प्रदत्त खोलों,पत्थर,चट्टानों, घासफूस वगैरह का इस्तेमाल करते रहे हैं ...कृत्रिम खोल तो अब बना पा रहे हैं, हो सकता है आक्टोपस भी आगे चल कर हमारी तरह से कृत्रिम खोल बनाने लग जाएँ !
ReplyDeleteये नारियल वाला आइडिया तो बड़ा पसंद आया।
ReplyDeleteवैसे अंग्रेजों के पास तो चलते फिरते घर होते हैं।
रोचक जानकारी।आभार।
ReplyDeleteवाह! ग़ज़ब कि जानकारी....
ReplyDeleteरोचक एवं नवीन जानकारी !
ReplyDeleteरोचक जानकारी..हमारे नाप का नारियल....हा हा!! :)
ReplyDeleteबहुत खूब.. अली जी से सहमत हूँ। नैसर्गिक वासस्थानों से शुरुआत कर आज इंसान भी तो नकली घरौंदो में रह रहा है.. क्या पता कल को ऑक्टोपस का कल ये नैसर्गिक ठिकाने से मन भर जाये..
ReplyDeleteरोचक प्रसंग.
ReplyDeleteअब तो कीड़े मकोड़ों को सहानुभूति दिखाने से पहले इनकी बुद्धिमत्ता को नमन करें ...
ReplyDeleteरोचक दिलचस्प जानकारी ....
एक नई जानकारी मिली! धन्यवाद!
ReplyDeleteवाह। अब चोट कैसी है?
ReplyDelete"काश हमारे नाप के खोल भी मिलते। फिर हम भी अपनी मनपसंद जगह पर अपना मकान बना लेते। जब ऊब जाते तो मकान उठाकर कहीं और ले जाते।"
ReplyDeleteविचार अच्छा है जी
वीडियो कुछ ही दिन पहले देखा था
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मजेदार और बेहतर जानकारी..
ReplyDeletehar koi apna ashiyana bnana janta hai
ReplyDeletebudhimta ka anutha udaharn
मनुष्य को बुद्धि की खासियत जो प्रकृति ने दी है .. इसके सिवा और कोइर् सुविधा वो नहीं देनेवाली !!
ReplyDeleteरोचक! एक आशियाना तो सबकी जरूरत है। कोई-कोई अच्छा बना लेता है।
ReplyDeleteजानकर अच्छा लगा कि घर बनाने के जीन्स हमें अपने इंसानी पूर्वजों से नहीं मिले हैं.
ReplyDeleteघर का होना ही सुखद एहसास है :)
ReplyDeleteबहुत सुन्दर रचना
ReplyDeleteबहुत बहुत बधाई .....