सोमवार, जून 22, 2009

ड्रेस कोड: शुभ्र श्वेत सलवार कुर्ता!

जब भी सुनती हूँ कि किसी कॉलेज में ड्रेस कोड लागू हुआ है तो अपने छात्र जीवन की याद आती है। सत्तर का दशक था। उस जमाने में लड़कियाँ इतनी आगे नहीं आईं थीं कि किसी को वे चुनौती लगतीं। सो प्रायः हमें हमारे हाल पर छोड़ दिया जाता था। अधिकतर किसी को(अध्यापक/अध्यापिका वर्ग को) हमारे पहनावे से कोई परेशानी नहीं थी। कभी कभार ही होता था कि कोई अध्यापक/अध्यापिका हमें घूरकर देख लेता।


अब यह मत सोचिए कि हम सलवार कुर्ते पहनते होंगे। विवाह पूर्व हमारे पास दो ही सलवार कुर्ते थे। एक तो हमने सिलाई सीखने के चक्कर में बनाया था और दूसरा जबर्दस्ती बनवाया गया था। जबर्दस्ती! हाँ बिल्कुल हास्यास्पद जबर्दस्ती होती थी छात्राओं के साथ! यह था शुभ्र श्वेत सलवार कुर्ता! आज भी उसकी याद आती है तो उससे चिढ़ ही उठती है।


किसी बावले से क्षण में, शिक्षा के क्षेत्र में किसी शक्तिशाली मानव ने यह निर्णय लिया था कि कॉलेज की लड़कियों की वर्दी होनी चाहिए। शायद सारे सप्ताह हमें वर्दी पहनाने में उन्हें स्वयं भी अटपटा लगा हो या लगा हो कि यह तो अति होगी सो केवल हर सोमवार पंजाब विश्वविद्यालय के कॉलेजों में पढ़ने वाली प्रत्येक छात्रा श्वेत वस्त्रधारी हो जाती थी। यह बात और है कि यदि सहशिक्षा वाला कॉलेज हो तो छात्र रंग बिरंगे परिधानों में ही होते थे। केवल छात्राएँ वर्दीधारी होती थीं। पता नहीं सहशिक्षा वाले हमारे कॉलेज के प्रिन्सिपल को यह अटपटा लगता था या केवल हमें ही लगता था। वर्दी का नियम केवल सफेद तक ही सीमित था,आप सफेद साड़ी,फ्रॉक,स्कर्ट ब्लाउज,ट्राउजर्स कुछ भी पहन सकती थीं। अधिकतर के पास सलवार कुर्ता इसलिए था कि रैगिंग के दिनों में सलवार कुर्ता ही वर्दी होती थी।


थोड़ा बहुत मनोविज्ञान जब पढ़ा तो इस शक्तिशाली मानव,जिसे हमारे लिए नियम बनाने का अधिकार था, की थोड़ी मानसिक चीरफाड़ कर कारण खोजना चाहा परन्तु असफलता ही हाथ आई। कारण आज भी समझ नहीं आता। वर्दी का विचार तो जो था सो था किन्तु केवल छात्राओं के लिए क्यों यह तर्क समझ नहीं आता था। सोचिए कॉलेज में खेलदिवस है या वार्षिकोत्सव है। छात्र होते थे रंगबिरंगे और छात्राएँ सफेद वर्दी में!यही हाल स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस के दिन होता था। हमारे साथ ही हमारे स्कूल में पढ़े छात्र बिना वर्दी के और हम वर्दी में रानी बेटियाँ बनी होती थीं।


बहुत वर्षों बाद एक बार जब मैं अपने एक सहपाठी के साथ कॉलेज के दिन याद कर रही थी तो उसे इस वर्दी वाली बात की याद दिलाई और पूछा कि केवल हमें क्यों पहनाई जाती थी तुम्हें क्यों नहीं। तब वह ठहाका लगाकर हँसा और बोला कि लड़कों से पंगा लेने को किसका दिमाग खराब हुआ था। लड़कों पर नियम कायदे लगाकर तो देखते कौन लड़का इस नियम को मानता? हड़ताल हो जाती। 'जो दबता है उसे ही दबाया जाता है।' हमें तुम्हारी वर्दी देखकर तुम पर बहुत हँसी आती थी।


हाँ, तो मुझे मेरा उत्तर उसके इस ब्रह्म वाक्य में मिल गया,'जो दबता है उसे ही दबाया जाता है।' शायद इसे सही करके ऐसे कहा जा सकता है कि स्त्री दबती है इसलिए दबाई जाती है। शायद दबती के पुल्लिंग की आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि यह केवल एक स्त्रियोचित गुण है।


आज 'ड्रेस कोड लागू करना गुनाह तो नहीं' लेख पढ़ा। मैं लेखक से पूर्णतया सहमत हूँ किन्तु केवल यह चाहती हूँ कि ऐसे ड्रेस कोड पुरुषों पर भी लागू किए जाएँ। कुर्ते पाजामों, धोती कुर्तों में घूमते विशुद्ध भारतीय बालक क्या सुन्दर दृष्य उत्पन्न करेंगे! अहा, तब ही तो हम सच्चे भारतीय कहलाएँगे, अपनी संस्कृति के सच्चे रक्षक! देखिए वातावरण कितना शुद्ध, सात्विक हो जाएगा। वस्त्र बदलते ही उनके मनोभाव भी स्वच्छ हो जाएँगे। लड़कियों पर तब वे बुरी नजर नहीं डालेंगे। सारी कलुषित भावनाएँ धुल जाएँगी।


मैं जानती हूँ कि ऐसा ही होगा क्योंकि वस्त्र ही छेड़छाड़ व बलात्कार का मुख्य कारण हैं। हम वर्दी पहनती थीं तब भी छेड़ी जाती थीं। हमारे वस्त्र तो ठीक होते थे केवल छेड़ने वालों के गलत होते थे। सो वस्त्र दोनों तरफ से ही भारतीय होने चाहिए। तभी मन शुद्ध होगा। आपकी क्या राय है?


मेरी राय अगले लेख में!


घुघूती बासूती

37 टिप्पणियाँ:

लवली कुमारी / Lovely kumari ने कहा…

"मैं लेखक से पूर्णतया सहमत हूँ किन्तु केवल यह चाहती हूँ कि ऐसे ड्रेस कोड पुरुषों पर भी लागू किए जाएँ। कुर्ते पाजामों, धोती कुर्तों में घूमते विशुद्ध भारतीय बालक क्या सुन्दर दृष्य उत्पन्न करेंगे! अहा, तब ही तो हम सच्चे भारतीय कहलाएँगे, अपनी संस्कृति के सच्चे रक्षक! देखिए वातावरण कितना शुद्ध, सात्विक हो जाएगा। वस्त्र बदलते ही उनके मनोभाव भी स्वच्छ हो जाएँगे। लड़कियों पर तब वे बुरी नजर नहीं डालेंगे। सारी कलुषित भावनाएँ धुल जाएँगी।" - सहमत.

अजय कुमार झा ने कहा…

वाह घुघूती जी..इसे कहते हैं नहले पे दहला..बिलकुल ठीक है जी,,,भाई जब ड्रेस कोड हो तो दोनों तरफ के लिए हो न...वैसे मैं इस मामले में एक बात और भी कहना चाहता था...दरअसल हमारे यहाँ किसी भी नए नियम को इस तरह से अमली जामा पहनाया जाता है की उसका प्रस्तुतीकरण और उद्देश्य ही तुगलकी जैसा हो जता है..जबकि कई बार सचमुच ही वो फायदा पहुंचाने वाला होता है तब भी..मगर इस मुद्दे पर आपसे शत प्रतिशत सहमत हूँ ..आपने अपने संस्मरणों में से ..एक अच्छी बात निकाली...

बी एस पाबला ने कहा…

बिल्कुल ठीक। कथित ड्रेस कोड पर नियम, नर-नारी दोनों पर लागू होने चाहिये। इस संबंध में अन्यत्र पायी जाने वाली मेरी टिप्पणियों में यह भाव समाहित माना जाये।

Shefali Pande ने कहा…

बिलकुल सही लिखा आपने ....

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

ड्रेस कोड हो सकता है। लेकिन सब विद्यार्थियों के लिए हो और उस में भी पहनने वालों की राय के आधार पर क्यों नहीं बनाई जाए।

P.N. Subramanian ने कहा…

आपसे हम तो सहमत हैं.

डॉ .अनुराग ने कहा…

एक उर्दू कहानी याद आ रही है .जिसमे लेखिका अपने बचपन की याद करके सुनाती है ...अम्मी हर बात पे डराती थी ..ऊपर दुपट्टे के बगैर मत जाइओ जन्नत के दरवाजे नहीं खुलेगे ...बाथरूम का पानी मत पियो खुदा सब देखता है ..मै फिर भी खुदा से माफ़ी मांगकर नल से पानी पीती .....लड़को से बात मति करियो..जन्नत नसीब नहीं होगी...मै लड़को से बात करती ...की खुदा आप रखो अपनी जन्नत ....
तो लब्बे- लुआब ये की आदमी को बेचारे को समझदार औरत से हमेशा डर रहा .तभी तो रस्मो ओर रिवाजो के नाम पर इतनी बंदिशे लगा दी..वैसे इस फैसले में हैरानी की बात है की महिला प्रिंसपल की संख्या उस बैठक में भी थी जहाँ ये फैसला लिया गया ..पर आदमी की जात बड़ी दीवानी है खुद पर्दों में रखती है .फिर खुद ही शिकार करती है ...

Malaya ने कहा…

मुझे तो लगता है कि स्त्री-पुरुष का ड्रेस कोड हमारे समाज में पहले से ही लागू है। बिना किसी कानूनी बन्दिश के हम शालीन और सु्रुचिपूर्ण परिधान की प्रशन्सा करते हैं और फूहड़ अंग प्रदर्शन करते कपड़ों के प्रति निन्दा का भाव रखते हैं। अब यदि कोई इस सामाजिक वर्जना को तोड़कर बदन दिखाऊ, उत्तेजक कपड़े पहनने में सुख का अनुभव करता है, ज्यादा स्वतंत्र महसूस करता है, अपने को बिन्दास समझता है तो उसे ऐसा करने दीजिए। कुछ समस्याओं का समाधान यह समाज स्वयं ढूँढ लेता है। प्रमोद मुथालिक जैसों की उपादेयता ऐसे ही थोड़े न बनी रहती है। आखिर ये न होंगी तो उस दरिन्दे को हीरो कौन बनाएगा?

ड्रेस कोड की बात करके वो महाशय एक राजनैतिक गलती कर बैठे हैं। यह नारी सशक्तिकरण की राह में बहुत बड़ा रोड़ा है। महिलाओं के विरुद्ध पक्षपातपूर्ण अवधारणा से ग्रस्त हैं उनके ये विचार। लड़कियों को अपनी लोवर वेस्ट या अन्य उभार ढंकने को तब कहना चाहिए जब सभी लड़कों को कुर्ता-धोती पहनाने का जिम्मा लिया जा सके। पैण्ट उतार कर टांग दीजिए और शर्ट फाड़कर फेंक दीजिए तब क्वालिफाई करेंगे। इसे पहनकर लड़कियों के ड्रेस कोड की बात करना पोलिटिकली इन करेक्ट है। कोई सबसे पहले सभी लड़कों और मर्दों को कुर्ता-पायजामा सिला दे ताकि वे अपनी तोंद और रोंएदार छाती छिपाकर चलें तब लड़कियों से शालीन परिधान पहनने की बात करने लायक होगा। मर्दों को ढँकने से पहले यदि किसीने औरतों का ड्रेस कोड बनाया तो वे उसके मुँह पर चढ्ढी दे मारेंगी। यह बड़ा अफेन्सिव टाइप मामला बनता है जी। उन्होंने लड़कियों को समझ क्या रखा है? प्रकृति ने उन्हें जो शारीरिक विशिष्टियाँ दी हैं वे क्या छिपाने के लिए दी हैं?

धत्‌...! कितनी घटिया सोच उभर रही है यहाँ।

ali ने कहा…

घुघूती जी ,
(१) सबसे पहले इस बात से सहमत हूं कि : अगर ड्रेस कोड लागू किया ही जाना जरुरी हो तो स्त्री पुरुष में भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए !
(२) दूसरी बात ये कि मनुष्य , कपडे , अपनी सुविधा /अपने कम्फर्ट्स / अपने सौन्दर्य बोध के लिए पहनता है अतः कैसे कपडे पहने / कैसे न पहने ,उसे ही तय करने दिया जाए ! यानि वस्त्र विन्यास सम्बंधित रूचि नितांत व्यक्तिगत बात है ! इसमें क्या पश्चिम और क्या पूरब !
(३) तीसरी बात ये कि मैं अगर असहमत होऊंगा तो केवल "कपडे नहीं पहनने को लेकर" क्योंकि समुदाय के प्रति यह हम सभी का दायित्व है और यह निज स्वतंत्रता से ऊपर की बात है ! यदि कोई व्यक्ति अपनी इस स्वतंत्रता के अधिकार का इस्तेमाल करना भी चाहे तो वह अपने समुदाय से बाहर होकर ही ऐसा कर सकता है !
(४ )चौथी बात ये कि कुछ दिनों से कई ब्लागर्स की चिंताए पढ़ और देख रहा हूं कि कम कपडे पहनने के कारण बलात्कार को बढ़ावा मिलता है मेरे लिए यह बात तर्कहीन है , कुछ इस तरह, जैसे कि मैं कहूं कि 'लड़कों को ऐसे कपडे पहनाये जायें कि उनमे बलात्कार की इच्छा ही ना जागृत हो "
आदर सहित !

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

ड्रेसकोड सिर्फ स्कूलों और नौकरियो में लागू होना चाहिए और बाकी जगह नहीं . बहुत बढ़िया आलेख.

Manisha ने कहा…

पूर्ण सहमति।

मनीषा

बेनामी ने कहा…

agar ek dress code lagu ho jaaye
stri aur purush dono kae liyae to vaakii achcha hoga
kewal ladkiyon kae liyae hi kyun

har shabd sae sehmat hun
Rachna

hem pandey ने कहा…

ali जी की टिप्पणि से सहमत होते हुए इतना और जोड़ना चाहूंगा की ड्रेस कोड होना कोई बुरी बात नहीं है.

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

सफ़ेद ड्रेस को देखकर एक लड़के ने कमेन्ट किया बेचारी इतनी सी उम्र में विधवा हो गयी लड़की तुनक कर बोली क्या करे सब लड़के जो मर गए . यह एक वाकया जिसका मैं चश्मदीद गवाह हूँ

गिरिजेश राव ने कहा…

लड़के लड़कियों की एक ही जैसी ड्रेस क्यों नहीं? चोगा टाइप। रजनीश आश्रम जैसा कुछ कुछ।

भले उसके लिए फैशन डिजाइनर्स की प्रतियोगिता करा डालो। सारा झमेला खत्म। देखने से भी लगेंगे - पढ़वइये हैं।

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

shee kha aapne .

अभिषेक ओझा ने कहा…

'क्योंकि वस्त्र ही छेड़छाड़ व बलात्कार का मुख्य कारण हैं।' हाँ जी बात तो सही है... सारा दोष तो कपडों का ही है. करने वाले तो निहायती शरीफ होते हैं जी. मर्डर करने वाले के क्या दोष चलती तो गोली है. गोली को चढा दो फांसी. जब सारा दोष कपडों का है तो लोग कपडे खरीद के उसे क्यों नहीं छेड़ते...?

Raag ने कहा…

जिस देश में लोग वर्दी निर्धारित करना चाहते हैं, उसे देश के लोग ज़रा अपने देवी और देवियों की तसवीरें और मूर्तियाँ ज़रा निहार लें. आज की नारी आधी से ज्यादा देवियों से ज्यादा ही कपड़े पहनती होंगी.

अगर ईमानदारी से मैं अपनी किशोरावस्था याद करुँ, तो उस समय सलवार कुरता, साड़ी, या बुर्के के लड़की की कल्पना से ही मन मचल जाता था. मतलब ये की वो उम्र ऐसी थी की बस.... वर्दी वगै़रह का कोई मतलब नहीं था.

और फिर इस नज़र से देखा जाए तो उन देशों मैं सबसे कम बलात्कार होने चाहिए, जहाँ बुरका पहनती हैं औरतें? जब अपनी जवानी बेकाबू हो, समाज के नियम कानूनों की परवाह न हो और औरतों के लिए इज्ज़त न हो तो कपड़ों पर दोष देना सबसे आसान होता है.

मुझे अब ये जाने की बड़ी इच्छा हो रही है की घर मैं काम करने वाली नौकरानियां कितने उघारू कपड़े पहनती होंगी, क्यूंकि वे बलात्कार की शिकार अक्सर होती हैं. मेरा मन कहता है शाइनी आहूजा की नौकरानी राखी सावंत की तरह सज कर आती होगी, पक्का, और इस चक्कर मैं उनके पजामे का नाड़ा ढीला पड़ गया होगा. उस कामवाली को ही सजा दे देनी चाहिए.

बाकी, घुघूती जी आप तो खैर लिखती जबरदस्त हैं ही. मैं आपको अक्सर गूगल रीडर मैं पढ़ता हूँ, ज़रा अपनी पूरी फीड उपलब्ध करा दें तो बड़ी कृपा होगी.

Udan Tashtari ने कहा…

बिल्कुल सही कहा यदि लड़के लड़की में बिना भेद किए ड्रेस कोड लगाया जाता है तो फिर कैसी आपत्ति. तब तो अच्छा ही है.

Anil Pusadkar ने कहा…

के जी के दो और हायर सेकेंडरी के बारह यानी चौदह साल तक़ जो ड्रेस कोड का पालन करके भी नही समझता वो कालेज के कुछ सालों मे क्या समझेगा।अब तो ड्रेस कोड वाले स्कूलों मे भी छेड़छाड़ के किस्से सुनन्रे मिल जाते है।ड्रेस कोड़ या कपड़ो को कोसने से कुछ होने वाला नही रावण तो अपहरण करेगा ही।ये तो बीमार मानसिकता का सवाल है।बहुत अच्छा लिखा आपने घुघूती जी।आभार आपका।

कौतुक रमण ने कहा…

इतने पचड़े हो रहे हैं सिर्फ़ एक कपड़े के रंग और तरीके को लेकर. क्यों न हम प्री-वैदिक काल मे शिफ्ट कर जायें. हमारी असल संस्कृति तो वही है..... ???

Grrrrrrrrr

संजय बेंगाणी ने कहा…

जो दबता है उसे ही दबाया जाता है. बिलकुल सही.

छेड़छाड़ और बलात्कार बूर्के पहनने वालियों के साथ भी होते है. और उन देशों में कम होते हैं जिन्हे अविकसीत कहा जाता है और महिलाएं उपरी भाग में कुछ नहीं पहनती. सारा मामला दीमागी है, आँखों को दोष देना बेकार है.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

यहाँ अमरीका मेँ
ओपरा वीनफ्री इनाम देती है
(जब भी कोई स्त्री
किसी पुराने शोषण करनेवाले को पकडवाती है )
शायद आपने भी सुना / देखा होगा
मगर,
विस्मय इसी बात का होता है कि, ऐसे धृणित काम करनेवाले की मनोवैज्ञानिक जाँच पडताल या मूल कारण की कोई बात नहीँ करता -

स्त्री या पुरुष जो भी ऐसे बुरे काम करता है,
वो उन्हीँ के
बीमार मानस की उपज है ..
बाकि,
कपडे या माहौल को कारण बतलाना ,
महज
वाद विवाद का विषय रहेगा ..
इन्सान ना जाने कब
सही अर्थोँ मेँ
"सभ्य, सुसँस्क़ृत "
बन पायेगा ?
क्या पता ?...
शायद ..
अभी कुछ वर्षोँ मेँ तो ये होना असम्भव - सा लगता है
- लावण्या

रचना त्रिपाठी ने कहा…

कल मेरे घर में भी इसी विषय पर चर्चा चल रही थी तब तक आपका यह पोस्ट पढ़ने को मिला। बहुत अच्छा लगा। आपका प्रश्न जायज है।

पहले तो यह समाज अपने देखने का नजरिया बदले। लड़का हो या लड़की दोनो को एक ही नजरिये से देखे।

सिर्फ ड्रेश कोड लागू हो जाने से मानसिकता नही बदल जाती। जब तक हमारे समाज में इस मानसिकता के लोग है तब तक भ्रूण हत्या पर भी रोक नही लगायी जा सकती।

शोभना चौरे ने कहा…

मैने इसी आलेख पर असी ही टिप्पणी दी थी और आपने bilkul shi कहा jb kadkiyo का dress cod है toldko का क्यों nhi और जो dress भी nirdharit की है वो भी bilkul shi है .पर anilji की बात भी mhtv purn है की जब 14 sal तक school dres phni तो ky a हुआ ? kul milakar jab tak mansikta nhi bdlegi,mhilao ko dekhne ka nariya nhi bdlega dress se code se kuch nhi hoga .ak bat aur yha khna chahungi ki chedchad krne vale bhi adhiktar vhi hote hai jinke ghar me bahane bhi hoti hai aur vo bhno par dhake kpde phnne ka alai karte hai .

anuradha srivastav ने कहा…

बिल्कुल सही कहा ..

Kashif Arif ने कहा…

मैं आपकी बात से सहमत हुं ड्रेस कोड दोनो के लिये होना चाहिये। आगरा के सेण्ट जौंस कालेज मे जब हम पढते थे तो ड्रेस कोड नही थ लेकिन हमारा आखिरी साल पुरा होते ही वहां ड्रेस कोड लागु हो गया जो दोनो के लिये था।

एक बात मैं कहना चाहुंगा की अगर ड्रेस कोड ना हो तो अश्लिलता की ज़द मे आने वाले कपडे लडकियां ही पहनती हैं पता नही अपना ज़िस्म दिखाने मे उन्हे क्या मज़ा आता है?

लेकिन जब दिखते ज़िस्म को गौर से देखो तो छोटे कपडें को खिचं कर बडा करने की कोशिश करती है ऐसा क्यौं? जब शर्म आती है तो ऐसा कपडा पहनते ही क्यौं हो?

बी एस पाबला ने कहा…

Kashif Arif का प्रश्न भी ठीक है कि

जब दिखते ज़िस्म को गौर से देखो तो छोटे कपडें को खिचं कर बडा करने की कोशिश करती है ऐसा क्यौं? जब शर्म आती है तो ऐसा कपडा पहनते ही क्यौं हो?

वाकई में ऐसा होता भी है और यह प्रश्न घुमड़ता है फिर

Shiv Kumar Mishra ने कहा…

ड्रेस कोड की बात अगर शिक्षण संस्थानों तक सीमित है तो यह सबके लिए लागू होना चाहिए. हाँ, यह बात ज़रूर है कि जो जितना दबता है, उसे ही दबाया जाता है. इस बात का विरोध करना ही चाहिए. सबको करना चाहिए. केवल ड्रेस कोड के मामले में ही नहीं, हर मामले में.

अर्कजेश *Arkjesh* ने कहा…

ड्रेस कोड विद्यालय स्तर तक ठीक है, भेदभाव किये बिना । बाकी अब ऐसा समय आ गया है कि समाज यह निर्धारित नहीं कर पायेगा कि किसको क्या पहनना है । हां, तालिबान या उसके विभिन्न सन्स्करण सत्ता में आ जायें तो बात अलग है । सारी रोक महिलाओं को लेकर है । लेकिन जैसे-जैसे महिलायें भेदभाव सहना इन्कार कर देंगी ड्रेस कोड वगैरह नहीं चलने वाला ।

शायद कुछ दिन बाद इस विषय पर हम बहस करते नजर आयें कि यदि कोई कुछ न पहनना चाहे तो वह इसके लिये स्वतन्त्र है कि नहीं ।

रंजना ने कहा…

Sahmat hun aapse....

रंगनाथ सिंह ने कहा…
यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है.
रंगनाथ सिंह ने कहा…

जाहिर है यहाँ आने वाले ज्यादातर लोग आपकी पोस्ट से सहमत होंगे। पोस्ट और टिप्पणियाँ दोनों मजेदार हैं। खास तौर पर लड़कों के लिए धोति कुर्ता का सुझाव और लड़कों के लिए ऐसे ड्रेस का सुझाव जिससे उनमें कुत्सित भावनाएं उत्पन्न ही ना हो !!
ये सुझाव मजेदार तो हैं लेकिन पहले ही अपनाए जा चके हैं। मुझे लगता है कि ज्यादातर लोगों ने ध्यान नहीं दिया कि तालिबान स्त्री और पुरूष दोनों के लिए ड्रेस कोड लागु कर चुके हैं। आप ने किसी भी तालीबानी को चुस्त कपड़ों या घुटनों से ऊपर के कपड़ों में नहीं देखा होगा। अगर टिप्पणीकारों के सुझावों का आशय यह है कि पुरूष और स्त्री दोनों को एक ही तरह का कपड़ा पहनाया जाए तो फिर ये और भी मजेदार सुझाव है।
कुछ लोग की राय है कि लड़कियाँ ड्रेस कोड के लिए तैयार हैं गर लड़के भी तैयार हों !! यानि लड़कियाँ कुएं में छलाँग मारने को तैयार हैं बशर्ते लड़के को भी ढकेला जाए।
मुझे तो कोई ड्रेस कोड नहीं चाहिए । न अपने लिए न लड़कियों के लिए !! किसी भी शर्त पर नहीं चाहिए ।
आखिरी बात, घुघूती बासूती को अर्थ बता दें तो हमारी जिज्ञासा का समाधान हो जाए ?

aflatoon ने कहा…

हमारे प्रदेश की बहनजी ने तो महाविद्यालयों के प्राचार्यों को ड्रेस कोड मामले में हड़का दिया | पीड़ित पक्ष पर नियम लादना अनुचित | कहा जिसने ऐसे नियम लागू करने की कोशिश की तो कार्रवाई होगी |

Abhishek Prasad ने कहा…

आपकी बातों से पूर्णतया सहमत. मेरे अनुसार ड्रेस कोड हर संस्थानों में होना चाहिए (चाहे वो शिक्षण-संस्थान हो अथवा कोई कार्यालय). कपडे पहनने कि आजादी सबको है, लड़को को भी और लड़कियों को भी. पर बात तब बहस का मुद्दा बनती है जब वही कपडे अश्लील लगने लगते है. मैं सिर्फ धोती-कुरता (पुरुषों के लिए) और सलवार-कुर्ती (लड़कियों के लिए) कि ही तरफदारी नहीं करूँगा. बल्कि मैं हर उन कपड़ो के पक्ष में हूँ जिनमें सुन्दरता बढती है न कि दिखती हो. लड़कियों के लिए जींस बिलकुल भी बुरा नहीं है, पर अगर वक सलीके से पहना जाये. कभी JNU campus, Delhi घूम कर आईये, लडकियां जींस में नजर आएँगी पर साथ में टी-शर्ट कि बजाय एक लम्बा कुरता होता है जो सभ्य और सुन्दर दीखता है.
खैर अगर सिर्फ बहस करने पर आये तो ये बहस शायद मेरी उम्र तक ख़तम न हो. बस बात सीधी सी है कि किसी भी संस्थानों में ड्रेस-कोड लागु होना चाहिए और इसका विरोध नहीं होना चाहिए...

अपने ब्लॉग पर भी आपकी दस्तक चाहूँगा...

सुरेश शुक्ला ने कहा…

"आपरूप भोजन और पररूप श्रृंगार"

इसमें 'पररूप' की समझ ही सबसे बड़ी बात है। लोगों की सहनशीलता की हद में वस्त्र चुनाव करना चाहिए। आजकल टेलिविजन के सामने ज्यादा समय बिताने से (और भी माध्यम हैं) इसका निर्णय करना कठिन हो गया है। जब ज्यादा लोग साथ में गल्ती करने लगते हैं तो तात्कालिक अंकुश जरूरी हो जाता है।

Nirmla Kapila ने कहा…

अजी मै तो आपके साथ हूँ अगर एक सा ड्रेस कोद हो गया तो ये भी हो सकता है कि धोती कुर्ता ही सब के लिये हो तो कैसी रहेगी हा हा हा