Showing posts with label किस्सा. Show all posts
Showing posts with label किस्सा. Show all posts

Saturday, January 30, 2016

मैं बनी बेबी मगरमच्छ

आज याने ३० जनवरी को मेरी नतिनी तन्वी तीन साल की हो जाएगी।
और २९ की मेरी शाम कुछ ऐसे बीती उसकी नतिनी बनकर।

जब से प्ले स्कूल जाना शुरु किया है उसे जुकाम पकड़े रहता है। बीच बीच में बुखार भी हो जाता है। शायद यह उसकी वायरसों से पहली मुठभेड़ है इसलिए। आज भी जुकाम अधिक था इसलिए निश्चय किया गया कि शाम को उसे पार्क खेलने नहीं ले जाया जाएगा, (पार्क भी मैं ही ले जाती हूँ) और घर में ही उसका मनोरंजन किया जाएगा।

उसका जन्मदिन आज स्कूल में मनाया गया। कल घर में और परसों बाहर जाकर मनाया जाएगा। उसका मन बहलाने को निर्णय किया गया कि दो उपहार आज ही दे देंगे। किन्तु तन्नी तो इतनी मस्त है, आज के भौतिकतावादी समय के बिल्कुल विपरीत है कि कमसे कम दस बार उपहार की बात करने पर भी उसे उपहार लेने में जरा भी रुचि नहीं थी। बाज़ार जाने पर भी कुछ चुनने को कहो तो अधिक से अधिक एक खिलौना उठा लेती है और कहती है, 'मेरे पास हैं।'

सो जो खेल उसने खेला उसका आरम्भ उसका दूध खत्म करवाने के लिए मैंने ही किया था। उसके पास कुछ चुम्बक वाली सपाट मछलियाँ, व्हेल, डोल्फिन, कछुआ, स्टार फिश, ओक्टोपस, लाइट हाउस आदि हैं। मैंने धूप में बैठकर अपनी उंगलियों से मुँह की आकृति बनाई और उसे मगरमच्छ कहा और उसकी मछलियों पर और दूध पर इस आकृति से आक्रमण करवाया, क्योंकि मगरमच्छ भूखा था सो यदि दूध  नहीं पीती तो दूध भी पी लेता। उसने दूध तो पी लिया किन्तु उसे खेल इतना पसन्द आया कि घंटों मेरे साथ यही खेल खेलती रही।

कुछ देर तो उसकी उँगलियाँ मगरमच्छ का मुँह बन मेरे हाथ से मछलियाँ खाती रहीं किन्तु बाद में मैं याने मेरी उँगलियाँ बेबी मगरमच्छ बना दी गईं। और वह याने उसकी उँगलियाँ नानू मगरमच्छ। उसकी उँगलियाँ शिकार पकड़ उन्हें चबाती और फिर 'च्यू च्यू ग्राइंड ग्राइंड' करने के बाद मेरी उँगलियों को खिला देतीं। (इस बात का संकेत कि चबाने का काम उसे कितना उबाऊ लगता है इसलिए नानू बन वह मुझे चबा कर खिला रही थी।) सब तरह की मछलियाँ कछुआ आदि खिलाने के बाद उसने मुझे लाइटहाउस भी खिला दिया। स्वाभाविक था कि मेरे नन्हे मगरमच्छीय पेट में दर्द भी हुआ। फिर उसने मुझे दवाई पिलाई जो अलग अलग चुम्बक वाले अक्षर थे और खेल जारी रखा। पहली नीले अक्षर वाली दवाई जब बेबी मगरमच्छ को पिलाई गई तो उसने कड़वी है की शिकायत की। तब वह लाल अक्षर वाली दवाई लाई और बोली कि लाल याने मीठी। मेरे द्वारा पेट भर गया कहने पर वह मेरे पेट के ओने कोने में कहीं जगह ढूँढ और खिलाती ही रही।

उसके उपहार ज्यों के त्यों पैक किए हुए पड़े ही रह गए। किन्तु साठ वर्षीय बेबी मगरमच्छ को एक तीन साल की ऐसी मगरमच्छ नानू मिल गई जो 'च्यू च्यू ग्राइंड ग्राइंड' करके उसके मुँह में खाना ही नहीं लाइटहाउस भी डाल देती है। वैसे आज तो उसने मुझे भयंकर माँसाहारी भी बना दिया।

स्कूल वाला केक मुझे क्यों नहीं मिला पूछने पर उसने बताया कि वह केवल बच्चों के लिए था और सुबह के समय तक मैं नानू ही थी, बेबी मगमच्छ नहीं, सो मैं केक के लिए अयोग्य थी।
घुघूती बासूती

Friday, September 18, 2015

'दो रुपए का नोट'

बात सन १९८० की है। हम तब मुम्बई में गोरेगाँव में नए नए रहने आए थे। बचपन सीमेन्ट कारखानों की बस्तियों में गुजरा था। शहर के नाम पर चन्डीगढ़ में हॉस्टल में रही थी। कुछ समय पुणे में छुट्टियों के समय बिताया था। कभी छुटटियों में पहाड़ जाते थे। विवाह के बाद दिल्ली गई जरूर किन्तु घर से बाहर कम ही निकली। विवाह के बाद भी एक वैसी ही सीमेन्ट कारखाने की बस्ती में रही थी। शहरों की भीड़भाड़ और कठिनाइयों से लगभग अनजान थी। चोरी, जेबकतरी से न कभी पाला पड़ा था न सावधान रहना ही सीखा था।
पति का दफ्तर चर्चगेट स्टेशन के ठीक सामने था। एक दिन सोचा कि पति के साथ बिटिया के लिए कुछ खरीददारी की जाए। प्रायः जब तक वे घर लौटते दुकानें बन्द हो चुकी होती थीं। सो निर्णय हुआ कि मैं ही शाम को बिटिया के साथ उनके दफ्तर पहुँच जाऊँ और फिर हम साथ खरीददारी को निकल जाएँ।
मुम्बई की पहली लोकल ट्रेन यात्रा करने के लिेए मैं गोद में बिटिया को उठाए और दूसरे कन्धे पर पर्स लटकाए गोरेगाँव स्टेशन पहुँच गई। टिकट खरीदा और लोकल ट्रेन आने पर महिला कम्पार्टमेंट में बैठ गई। बैठते से ही बिटिया को कुछ देने को पर्स खोला तो उसके अन्दर रखा मेरा वॉलेट गायब था। टिकट भी उस ही में रखा था और पैसे भी। जेबकतरे जी ने वॉलेट निकाल कर मेरा पर्स बन्द करने का कष्ट भी किया था। मेरे चेहरे का उड़ा रंग देख एक छात्रा ने पूछा कि क्या हुआ। मैंने उसे वॉलेट गायब होने के बारे में बताया। वह मुस्करा कर बोली, 'निश्चिन्त रहिए। मैं चर्नी रोड पर उतर रही हूँ। आपको वहाँ से चर्चगेट का टिकट खरीदकर दे दूँगी।' चर्नी रोड चर्चगेट से एक स्टेशन ही पहले है।
पर्स की एक जेब में मुझे एक 'दो रुपए का नोट' मिल गया। उसे देखकर मुझे जितनी खुशी हुई वह आज कभी हजार के नोट को देखकर भी नहीं हो सकती। मैंने उसे कहा कि मेरे पास 'दो रुपए का नोट' है। वह बोली कि 'आप टिकट नहीं खरीद सकेंगी। खरीदने के लिए बाहर निकलेंगी तो टिकट चेकर पकड़ सकता है। मैं ही खरीदकर आपको दे दूँगी।'
खरीददारी का तो सारा मूड उखड़ चुका था। अब तो बस किसी तरह पति के दफ्तर पहुँचना ही उद्देश्य रह गया था। मन ही मन यह मनाते कि कोई टिकट चेकर ना आ जाए, मैं सोचती रही कि यदि आया तो यह कहने पर कि वॉलेट चोरी हो गया वह मेरी बात मानेगा थोड़े ही। हर बिना टिकट यात्री यही तो कहता होगा। खैर, टिकट चेकर नहीं आया और किसी तरह चर्नी रोड स्टेशन आ ही गया।
हम ट्रेन से उतरे। वह मुझे वहीं प्लैटफॉर्म पर छोड़ वहीं रुकने को कह टिकट लेने जाने लगी तो मैंने बड़ी कातरता से अपना वह इकलौता 'दो रुपए का नोट' आगे बढ़ा दिया। मन में यह संशय भी था कि यह मुम्बई है। कहीं यह आखिरी पूँजी भी लेकर वह गायब हो गई तो क्या होगा। वह हँसने लगी और बोली,' पहले मैं टिकट लाती हूँ, आप पैसे बाद में देना।' थोड़ी देर में वह टिकट लेकर आ गई और उसने मुझसे पैसे लेने से मना कर दिया। बोली, 'अपने पास रखिए कहीं पति दफ्तर में नहीं मिले तो फोन करके किसी को बुलाने के काम आएगा।'
मैं पति के दफ्तर पहुँची और बिना खरीददारी किए हम घर लौट आए। खरीददारी कैसे करते? सारे पैसे तो जेबकतरे की जेब में चले गए थे। वह क्रेडिट कार्ड, ए टी एम, मोबाइल फोन के युग से बहुत पहले का युग जो था।
बाद में दो बार और जेब, नहीं, पर्स कटा, एक बार फिर मुम्बई में और एक बार दिल्ली में। किन्तु तब तक 'सारे अन्डे एक ही टोकरी में रखने' की आदत छूट चुकी थी। कुछ जेब में या जेब नहीं हुई तो एक कपड़े की छोटी सी थैली में रख कपड़ों में पिन करना सीख लिया था। यह सिलसिला तब तक चला जब तक हर एअरपोर्ट, स्टेशन, मॉल आदि में तलाशी का सिलसिला शुरू नहीं हुआ। उस बात को इतने साल बीत गए हैं किन्तु उस भली छात्रा की मुस्कान कभी नहीं भुला सकती।
आज भी जब कोई व्यक्ति ट्रेन में पर्स चोरी हो जाने, सामान चोरी हो जाने या जेब कट जाने की बात कहता है तो लोगों के रोकने पर भी कुछ तो सहायता कर ही देती हूँ ताकि वह घर तक तो पहुँच जाए या घर से किसी को सहायता के लिए बुला सके। क्या पता मेरी तरह वह सच ही बोल रहा हो।
घुघूती बासूती

Friday, October 10, 2014

यही पैसा किसी गरीब बच्चे पर खर्च क्यों नहीं करतीं?

क के पास दो बिल्लियाँ हैं। कोई महान खानदानी, विशेष नस्ल वाली बिल्लियाँ नहीं, एनिमल शेल्टर से ली गईं सबसे कमजोर, घायल, बीमार और परजीवी टिक्स, फ्लीज़ और खुजली से पीड़ित थीं ये। एक की टाँग भी टूटी हुई थी। एक नर और एक मादा। क की महीनों की मेहनत, उसके पति के सहयोग और कितनी ही बार वेट के पास ले जाकर इलाज कराने, सारे वैक्सीनेशन कराने, स्पे कराने से वे स्वस्थ, सुन्दर, पालतू बिल्लियाँ बन गईं।

उन बिल्लियों को सही खुराक मिलती है। उन्हें नहलाया धुलाया जाता है, ब्रश किया जाता है। उनके पास खिलौने हैं, बैठने, लेटने, कहीं चढ़कर बैठने के लिए बिस्तरा, टोकरियाँ, पर्च हैं।

क के कई मित्रों व सहकर्मियों को क के बिल्लियों का इतना ध्यान रखने, उनपर पैसा खर्च करने से बहुत कष्ट होता है। उन्हें यह फिजूलखर्ची लगती है, समय की बर्बादी लगती है।

एक दिन तो एक सहकर्मी मित्र को कुछ अधिक ही जोश आ गया। वह क के इस तरह पैसा बर्बाद करने पर बुरा भला कहने लगा। उसे बताने लगा कि कैसे वह इसी पैसे का सदुपयोग किसी गरीब या अनाथ बच्चे के लिए कर सकती है। क ने कहा," सही कह रहे हो। तुम बताओ यह कैसे किया जा सकता है।"

मित्र ने कई संस्थाओं के नाम बताए और फिर क को प्रेरित किया कि वह बिल्लियों को उनके हाल पर छोड़ इन संस्थाओं में दान देकर बच्चों का उद्धार करे।

क ने कहा, "ठीक है, तुम्हें बाल कल्याण में इतनी रुचि है यह देख मुझे खुशी हुई। कल ही मैं इन संस्थाओं के फॉर्म मंगाकर तुम्हें दे देती हूँ। तुम वहाँ दान करने लगना।"

वह एकदम से हड़बड़ा गया। बोला," मैं? मैं क्यों? ये तो तुम्हारे लिए बता रहा था। मैं अपने पैसे बर्बाद नहीं कर सकता। मेरे पास इतना फालतू पैसा नहीं है।"

क ने कहा," अभी तो तुम मुझे इन संस्थाओं को दान देने का उपदेश दे रहे थे। अब क्या हुआ?"

मित्र बोला," मैं तो इसलिए कह रहा था क्योंकि तुम बिल्लियों पर खर्च करती हो।"

क ने उत्तर दिया," तुम और मैं बराबर कमाते हैं। मैं तो कमसे कम बिल्लियों पर खर्च करती हूँ। तुम किस पर खर्च करते हो? सब अपने पर?"

"हाँ। और मेरे पास किसी अन्य पर खर्च करने को फालतू पैसा है भी नहीं। और यह जो तुम गरीब बच्चों की बजाए बिल्लियों पर पैसा बहाती हो, यह बर्बादी है, मीननेस है, स्वार्थ है। तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। मैं तुम्हें इससे रोक रहा हूँ तो तुम मुझे ही अक्ल बता रही हो। मैं तो कभी बिल्लियों पर पैसे खर्च नहीं करता।"

क ने कहा, " हाँ, केवल अपने पर खर्च करते हो और कर रहे हो। वह बर्बादी नहीं है? मैं कमसे कम किसी का तो ध्यान रख रही हूँ, किसी के साथ तो अपनी खुशी बाँट रही हूँ। मुझे जानवरों से प्यार है तो मैं उनका भला कर रही हूँ। तुम्हें बच्चों से प्यार है तुम उनका भला करो।"

मित्र गुस्से से तमतमाता बड़बड़ाता उठ गया, " भले का तो जमाना ही नहीं है। बच्चे भूखे मर रहे हैं और इन्हें बिल्लियों की पड़ी है! मुझे कहती है कि मैं अनाथालय में दान दूँ, CRY को दान दूँ। मेरे पास क्या फालतू पैसा है! हुँह!"

घुघूती बासूती

पुनश्चः
यह किस्सा बिल्कुल सच है। ऐसे 'पर उपदेश कुशल बहुतेरे' कभी कभी जीवन में मिल जाते हैं और अपने कुतर्कों से हमें दंग कर जाते हैं। हम बस सोचते रह जाते हैं कि क्या ये सच में अंधे हैं, मूर्ख हैं या इन्हें सच में लगता है कि इनका दायित्व तो बस दूसरों को राह दिखाने भर का है उस राह चलना तो दूसरों का काम है।

घुघूती बासूती

Friday, June 08, 2012

पाँच पैसे का सिक्का..........................घुघूती बासूती




पिछली बार आपने कब 'पाँच पैसे का सिक्का' देकर कुछ खरीदा था? खरीदना तो छोड़िए, पिछली बार आपने कब 'पाँच पैसे का सिक्का' देखा था? कठिन है ना याद करना ! बहुत से तो ऐसे होंगे जो सोच भी नहीं सकते कि किसी युग में पाँच पैसे में अच्छी खासी नामी कम्पनी की टॉफी मिल जाती थी, या पाँच पैसे में अन्तर्देशीय पत्र मिलता था।

आज माँ के मुँह से 'वहाँ मेज पर एक पाँच पैसे का सिक्का पड़ा है' सुनकर विचित्र लगा। पाँच पैसे का सिक्का मेज पर कैसे आया? उनका स्थान तो मेरा पुराने सिक्कों वाला डब्बा है जो किसी सिक्का इकट्ठा करने की शौकीन नतिनी या नाती या किसी बच्चे को मिलेगा। मैं अचम्भित थी तभी याद आया कि मेज पर एक पाँच रुपए का सिक्का पड़ा है।

मैंने पूछा, 'पीले रंग का है ना?'
वे बोली, 'हाँ।'
मैंने कहा, 'माँ, वह पाँच रुपए का सिक्का है।'
वे बोली, 'ओह।'

कुछ देर को मैं उस भविष्य में खो गई जब पचास रुपए का, या यूँ ही रुपए का मूल्य गिरता गया तो शायद पाँच सौ का सिक्का यहाँ वहाँ मेज पर पड़ा होगा और मैं लाठी हाथ में लिए बिटिया से बोल रही होऊँगी बेटा एक पाँच रुपए का सिक्का मेज पर पड़ा है और वह सोचेगी कि ऐसे सिक्के तो उसके या उसकी संतान के कॉइन कलैक्शन में पाए जाते हैं, मेज पर नहीं। मेरे मन में, शायद अवचेतन में ही सही तब 'पाँच रुपए का सिक्का' कुछ वही कीमत रखेगा जो माँ के अवचेतन या बिना सोचे समझे पलों में पाँच पैसे का सिक्का!

वे अपने कमरे में चली गईं और मैं भूत, वर्तमान व भविष्य के बारे में सोचती रह गई। माँ का भूत व वर्तमान मेरे भविष्य में गडमड हुआ जा रहा था। मैं भी उनके कमरे में चली गई ताकि एक बार फिर उनसे 'एक पैसे की चार जलेबी जिनके ऊपर दही डला होता था' वाली बात सुन सकूँ।

वे तब छोटी थीं, बारह साल से पहले की कोई भी उम्र रही होगी याने १९३५ से कभी पहले की बात है। बारह साल में उनका विवाह हुआ था। नानी को दमा रहता था। जिस दिन दमे के कारण सुबह सुबह सब बच्चों, देवरों के लिए नाश्ता न बना पातीं तो बच्चों को एक एक पैसा देतीं। हलवाई की दुकान से बच्चे 'एक पैसे की चार जलेबी जिनके ऊपर दही डला होता था' लाते। वह खाने के बाद नानी गरम दूध पीने को देतीं। दही व दूध का यह मेल मुझे समझ तो नहीं आता किन्तु मुझे तो अपने बचपन में नित जलेबी खाने का औचित्य भी नहीं समझ आता।

बचपन में यह किस्सा सुन मैं माँ से कहती कि उनके स्थान पर मैं होती तो रसोई के बाहर बच्चों ( या शायद बच्चियों)के लिए जो चूल्हा बना होता था उसमें ही मैं तो अवश्य अपने लिए व अन्य बच्चों के लिए कुछ बना लेती। रसोई में बनाना तो मना था क्योंकि छुआछूत जो मानी जाती थी। किन्तु माँ के शब्दों में मैं व भाई, हम बच्चे थे ही कब, हम तो बूढ़े पैदा हुए थे। हुड़दंग जो नहीं मचाते थे। या शायद इसलिए कि 'चार जलेबी जिनके ऊपर दही डला होता था' खरीदकर नहीं खाते थे।

जिसने एक पैसे की चार जलेबी खाईं हों उसके लिए पाँच पैसे बीस जलेबियों के बराबर हैं। एक किलो में शायद बीस या बाइस जलेबियाँ आती हैं और शायद आज जलेबियाँ सौ रुपए किलो मिलती होंगी। तो हुए न उनकी नजरों में पाँच पैसे आज के सौ रुपए के नोट के बराबर ! वे मेरे कमरे में 'पाँच पैसे का सिक्का पड़ा है' कहने पर मेरे जाकर उसे सम्भालने की आशा करें तो क्या आश्चर्य?

घुघूती बासूती

Friday, July 09, 2010

रिज़वान की कमीजें और उसका अंग्रेजी कौशल

मुम्बई पुलिस कुर्ला में हुए छोटी बच्चियों के बलात्कार व हत्याओं की गुत्थी सुलझाने की कोशिश में लगी हुई है। तीसरी हत्या व बलात्कार के लिए एक आरोपी को गिरफ्तार भी कर लिया गया है। परन्तु पहले हुए दोनों अपराधों के अपराधी को पकड़ना अभी भी शेष है। लगता है उसे ६ तारीख से कोई लगाव है। सभी अपराध ६ तारीख को हुए हैं। सो ६ तारीख को अभिभावक बच्चियों को स्कूल नहीं भेजते , उन्हें घरों से बाहर नहीं निकलने देते।

परसों रात पुलिस को एक नवयुवक कुर्ला की सड़कों में निरुद्देश्य घूमता मिला सो उसे पकड़कर पूछताछ की गई। यह दृष्य एक टी वी की समाचार चैनेल ने भी अपने केमरे में सुरक्षित कर लिया। सो वह चैनेल उस युवक से पूछताछ के दृष्य को दिखाने लगी। और जब हमारे टी वी वाले दिखाते हैं तो बार बार दिखाते हैं, जबतक वह आपके स्मृति पटल पर खुद न जाए तब तक दिखाते हैं। पूछताछ तो अपनी जगह ठीक थी किन्तु जिस बात पर चैनेल जोर दे रही थी वह थी उस संदिग्ध व्यक्ति की संदिग्ध कमीजें या यूँ कहिए कमीजें (कमीज नहीं)पहनने का अन्दाज। बार बार संवाददाता उसकी कमीजों की बात कर रहा था। वह व्यक्ति कमीज नहीं, तीन कमीजें पहने हुए था, एक के ऊपर एक! यह बात पुलिस व संवाददाता को बहुत परेशान कर रही थी। पुलिस ने तो यह भी जाँचा की कहीं उसने तीन पतलूनें भी तो नहीं पहनी हैं।
व्यक्ति नशे में था। शायद इसीकिए पुलिस द्वारा पकड़े जाने से भी अधिक परेशान नहीं हुआ दिख रहा था। अब तीन कमीजें पहनना कोई अपराध तो है नहीं तो शायद पूछताछ के बाद उसे छोड़ दिया गया क्योंकि कल के समाचार पत्रों में उसका कोई जिक्र मुझे दिखा नहीं।

जो बात पुलिस व संवाददाता को बहुत परेशान कर रही थी, यानि उसकी कमीजें, बहुवचन में कमींजें, वे मुझे परेशान नहीं कर रही थीं। मुझे उसकी बहुवचनीय कमीजों के दो कारण नजर आए। एक तो यह कि शायद उसके पास रहने व कमीज रखने को जगह न हो। यदि रहने को जगह न हो तो कीमती या कैसा भी सामान रखने को भी जगह नहीं होगी। अब यदि किसी तरह उसके पास तीन कमीजें हो जाएँ, खरीदकर या कैसे भी, तो उन्हें सुरक्षित रखने का सबसे बेहतर तरीका उन्हें पहनना ही है। कोई कहेगा तो फिर तीन का क्या लाभ? तो वह व्यक्ति बदल बदल कर कभी इसे ऊपर तो कभी उसे ऊपर पहन सकता है और अपना अलग अलग कमीज पहनने का शौक पूरा कर सकता है।

दूसरा कारण यह हो सकता है कि वह व्यक्ति रिज़वान किस्म का व्यक्ति हो। रिज़वान याने मेरा वर्षों पुराना तीसरी कक्षा में पढ़ने वाला छात्र। अब तो वह भी २८ या ३० वर्ष का हो गया होगा। रिज़वान वह था जिसने शायद ही कभी गृहकार्य किया हो , दिन का टाइम टेबल पढ़कर पुस्तकें बस्ते में रखी हों, घर जाकर बस्ता खोला हो, सोमवार से शनिवार तक नहाया हो आदि आदि। उसके शरीर पर मैल की परतें जमती जाती थीं, उसके बस्ते में कचरे का ढेर लगता जाता था, परन्तु उसे कोई परेशानी नहीं होती थी। उसे कक्षा में चाहे सजा मिले, खड़ा कर दो, बाहर निकाल दो, उसे न खुशी होती थी न विशेष दुख! ऐसी साधु प्रवृत्ति का समदर्शी, दुख सुख में सदा मुस्कराते रहने वाला कोई और मनुष्य मैंने नहीं देखा।

यदि उससे कोई पुस्तक बाहर निकलवानी हो, उसकी नोटबुक जाँचनी हो, उससे कुछ लिखवाना, पढ़वाना चाहो तो दो तरीके थे, या तो उससे कहो और फिर अनन्त काल तक नहीं तो घण्टी बजने तक उसके द्वारा उक्त पुस्तक, नोटबुक, पेन्सिल आदि निकालने की प्रतीक्षा करो या फिर स्वयं जाकर उसके बस्ते के कबाड़ में डुबकी लगाकर उक्त पुस्तक, नोटबुक, पेन्सिल आदि को बाहर निकालकर उसे पकड़ा दो। कुछ बार पहला तरीका आजमाने के बाद दूसरा तरीका ही सही लगता था। कुछ बार उससे बस्ते को ठीक करने को कहने और बार बार उसमें उलझने के बाद उसे सिखाते हुए स्वयं ही उसके बस्ते को थोड़ा ठीक करना ही सही लगने लगता था।

इसी प्रकार उसके बेतरतीब कपड़ों और शरीर पर जमे मैल से निबटने को उसे नल के पास ले जाकर साबुन पकड़ाकर कम से कम हाथ मुख धुलवाना ही एक उपाय था। ऐसे ही एक दिन मैंने उसकी प्याज सी परतों वाली कमीजों को देखा। उसकी मैली कॉलर को टेढ़ा व मुड़ा हुआ देखकर जब मैं ठीक करने लगी तो एक के नीचे एक कॉलर निकलती चली गई। सभी स्कूल की युनिफॉर्म के रंग की नहीं थीं, कुछ अन्य रंगों की भी थीं। उससे पूछने पर उसने बताया कि जब उसे लगता है कि उसकी कमीज गंदी हो गई है तो वह ऊपर से एक और पहन लेता है। काश, उसके माता पिता उसके लिए इतनी सारी युनिफॉर्म की कमीजें न खरीदकर देते!

इसी बालक ने मेरी अच्छी अध्यापिका होने की एक ऐसी प्रशंसा की थी कि वह मुझे व सुनने वालों को गुदगुदा भी गई व लम्बे समय तक याद रहेगी। वह लगभग सब अध्यापकों से मार खाता था। सौभाग्य से मैं कभी छात्रों पर हाथ नहीं उठाती थी सो उसे भी कभी नहीं मारा था। परन्तु जब उसका परीक्षा परिणाम आया तो वह सिवाय मेरे पढ़ाए विषय अंग्रेजी के सब विषयों में फेल था। तब उसने बहुत गर्व से सबको जा जाकर कहा था, "मैं घुघूती मैम के विषय में तो पास हो गया / मेरी तो बस अंग्रेजी ही अच्छी है तभी तो मैं उसमें पास हो गया। सब मारते थे परन्तु उनके विषयों में फेल हो गया, केवल जो मैम नहीं मारती थीं उनके विषय में पास हो गया।"

और यह तब जब मैं अपने सख्त पेपर जाँचने के लिए जानी जाती थी। एक एक कौमा, या छोटे अक्षर की जगह बड़े या बड़े की जगह छोटे लिखने के लिए भी अंक काटती थी और रिज़वान के घर में कोई भी अंग्रेजी नहीं जानता था और न ही उसके घर में किसी ने कभी उसे पढ़ाया था। फिर भी रिज़वान ने पास होकर मेरी हर कक्षा में मेरे विषय में सबके पास होने के रिकॉर्ड को न बिगाड़कर मुझे धन्य कर दिया था।

घुघूती बासूती

Tuesday, April 27, 2010

टिमटिम तारा का जाना, अवकाश, शोक और बच्चों को लगा शौक

अभी अभी 'अनवरत' पर दिनेशराय द्विवेदी जी का राजकीय शोक पर लिखा लेख पढ़कर आ रही हूँ। इससे पहले 'मुसाफिर हूँ यारों' में नीरज जाट के चन्डीगढ़ पर तीन लेख पढ़े थे। मन यूँ ही चन्डीगढ़मय हो रहा था। सो मुझे अपने स्कूली दिनों के एक उस दिन की याद आ गई जब शोक मनाने के लिए स्कूल में छुट्टी हो गई थी।

मैं स्कूल में नई नई गई थी। इससे पहले बस्ती के स्कूलों में ही पढ़ी थी। ये स्कूल आठवीं तक ही होते थे और उसके बाद निकट के शहर में जाकर पढ़ना होता था। अंग्रेजी स्कूल में भी पढ़ना था और मिशनरी में भी नहीं पढ़ना था। बस्ती के शेष सारे बच्चे या तो हिन्दी स्कूल में पढ़ने जाते थे या फिर कॉन्वेन्ट में। मुझमें तब भी यह स्वतन्त्र रहने का रोग था बल्कि अब से और भी अधिक था। किसी भी धर्म, विशेषकर अन्य के धर्म के गीत गाना व कॉन्वेन्ट स्कूल का लगभग तानाशाही शासन मुझे रास नहीं आने वाला था, यह जानती थी। सो एक ऐसे स्कूल में गई जो बहुत अधिक लोकतान्त्रिक था, अधार्मिक था या कहिए जहाँ धर्म नहीं था। किन्तु यहाँ केवल दो समस्या थीं, एक तो यह कि अपनी बस में आने वाली मैं इकलौती छात्रा थी, दूसरी यह कि मुझे सुबह सुबह सवा या डेढ़ घंटे पहले स्कूल पहुँचना पड़ता था।

स्कूल गर्मियों में सुबह साढ़े सात बजे लगता था। हमारी बस के दो चक्कर लगते थे पहला सुबह साढ़े पाँच बजे जाता था और सवा छह बजे तक स्कूल पहुँचा देता था। दूसरा पौने सात बजे का होता और स्कूल साढ़े सात या सात पैंतीस पर पहुँचा देता था। ठीक साढ़े सात पर स्कूल का गेट बन्द हो जाता था। उसके बाद आने वाले पूरी असेम्बली भर सजा पाते और उनका नाम लेट लतीफों के रजिस्टर में चढ़ जाता, हर लेट आने वाले बच्चे के कारण उसके हाउस के अंक कम हो जाते आदि आदि। प्रिन्सिपल से अपनी समस्या बताने पर उन्होंने कहा कि देर से आने की वे अनुमति नहीं देंगी। कॉन्वेन्ट में पढ़ने की अनुमति मेरा मन नहीं देता था सो मैंने साढ़े पाँच की बस से जाना ही स्वीकार कर लिया।

वीरान स्कूल में इतनी सुबह जाकर अपनी कक्षा में बैठ जाना, कुछ पढ़ते रहना या बस यूँ ही स्कूल के विशाल मैदानों के चक्कर लगाना मेरे दिन का आरम्भ होता था। भय की बात कभी मन में नहीं आई। भय होता भी तो मनुष्य नाम के प्राणी से ही होता। खैर, कुछ ही दिनों में गर्मियों की छुट्टियाँ हो गईं।

गर्मियों के अवकाश के बाद का पहला दिन था। डेढ़ घंटे की प्रतीक्षा के बाद स्कूल शुरू हुआ। सभी बच्चों में इस दिन बहुत उत्साह रहता है। मैं तो अभी भी काफी नई थी सो मित्र भी नहीं ही थे। असेम्बली में केवल राष्ट्रीय भावना वाले गीत ही होते थे। प्रार्थना थी....
हम नौजवान देश के बढ़ते ही जाएँगे
हम हर कदम पर शान्ति का घर बसाएँगे।

उस दिन असेम्बली में घोषणा की गई कि एक अध्यापिका का निधन हो गया है सो मौन रखा जाएगा और उसके बाद स्कूल की छुट्टी हो जाएगी। अध्यापिका का नाम तो याद नहीं परन्तु जो नाम मेरे सहपाठियों ने उन्हें दिया था और जिसका उपयोग कर उन्होंने मुझे उनकी बातें बताईं थीं वह याद है। सब उन्हें टिम टिम तारा कहते थे। अभी छुट्टियों से कुछ दिन पहले ही उनका विवाह हुआ था। वे पिछली कक्षा में हिन्दी पढ़ाती थीं। एक कविता थी टिम टिम तारा वाली बस उसको पढ़ते समय ही बच्चों ने उनका नामकरण कर दिया था। सब बच्चे उदास थे। टन्नी तो बहुत ही अधिक उदास था। टन्नी का नामकरण टिम टिम तारा ने किया था। टन्नी नामक एक कठपुतली की कहानी पाठ्यपुस्तक में थी। हमारा टन्नी भी बहुत शैतान व अशान्त था। एक पल भी टिक कर नहीं बैठता था। सो टिम टिम तारा ने उसे कहा कि वह भी टन्नी ही है। उस दिन सब दुखी साथियों से मैंने टिम टिम तारा के बारे में विस्तार से जाना और इस बातचीत के द्वारा बहुत से छात्रों को भी जाना।

टिम टिम तारा का विवाह छुट्टियों से कुछ दिन पहले ही हुआ था। बच्चों ने 'मिस' को उपहार भी दिया था। और वे आशा कर रहे थे कि छुट्टियों के बाद देखेंगे कि मिस विवाह के बाद कैसी दिखती हैं। किन्तु छुट्टियों में ही मिस रसोई में जल गईं और मर गईं। कई जोड़ी आँखों में नमी थी। एक दो स्पष्ट रो रहे थे। यह शोक मनाने को मिली एक ऐसी छुट्टी थी जब कम ही विद्यार्थी सिनेमा का कार्यक्रम बनाते। शायद किसी ने भी नहीं बनाया। जब भी कभी शोक के लिए छुट्टी मिलती है तो मुझे वह अपनी अनदेखी मिस टिम टिम तारा याद आ जाती हैं। उस दिन दोपहर को डेढ़ बजे तक मुझे बैठकर स्कूल बस की प्रतीक्षा करनी थी। टिम टिम तारा बहुत देर तक मेरे साथ रहीं थीं।

घुघूती बासूती

Thursday, April 01, 2010

जरा माचिस तो देना!.............................घुघूती बासूती

एक नया गैस सिलिन्डर जब लगाया तो ठीक से बैठ नहीं रहा था। पति व ड्राइवर दोनों ने कोशिश कर ली। फिर गैस एजेन्सी से उनके वर्दीधारी मैकेनिक को बुलाया, उसने जबरदस्ती लगा तो दिया परन्तु मेरे यह पूछने पर कि इतनी लड़ाई लड़कर कोई स्त्री यह कैसे लगाएगी, उसने कहा कि अब यह आपके पास थोड़े ही फिर से आएगा। अब जिसके पास भरकर पहुँचेगा उसका सरदर्द है, आप क्यों परेशान होती हैं? ठीक भी तो है। जब फिर किसी के घर खाना नहीं बन पाएगा तो उसको बुलाया जाएगा और फिर कुछ बक्शीश भी तो दी ही जाएगी।

उसने कहा कि गैस का पाइप भी बदल ही लो। सो हमने 'हाँ' कह दी। पाइप बदलते समय वैसी ही लड़ाई शायद कुकिंग रैंज के नॉज़ल से लड़ी जैसी गैस सिलिन्डर से लड़ी थी, सो गैस लीक होने लगी, जो उस समय हमें पता नहीं लगी। पता लगता भी कैसे? जितने युद्ध उसने सिलिन्डर, पाइप आदि से लड़े थे उस बीच न जाने कितनी गैस लीक हो चुकी थी। सो उस गैसीय वातावरण में और नई लीक कैसे पता चलती? जाते समय उसने एक आपातकालीन फोन नम्बर दिया याने उसका अपना मोबाइल नम्बर दिया और कहा जब भी कभी जरूरत पड़े बुला लेना।

उसे फिर बुलाया गया। तो वह बोला 'यदि थोड़ी लीक हो रही है तो खाना बनाते समय ही गैस चालू रखो बाकी समय रैग्यूलेटर बन्द रखो कुछ नहीं होगा। जब बर्नर जल रहे होंगे तो गैस लीक नहीं होगी। वह केवल तब लीक होगी जब बर्नर बन्द होंगे और रैग्यूलेटर खुला होगा। मैं सुबह आऊँगा।'

वह आया तो आते से ही माचिस माँगी। मैंने पूछा माचिस क्यों तो बोला, 'गैस कहाँ से लीक हो रही है देखूँगा।'

मैं दंग। 'नहीं, ऐसे चैक नहीं कर सकते। साबुन के घोल से देखो।'

वह माचिस पर ही अटका हुआ था। 'जरा सी गैस लीक हो रही है। कुछ नहीं होगा।'

मुम्बई के खतरे* समझते हुए किसी भी बाहर वाले को पति की उपस्थिति में ही बुलाया जाता है। परन्तु ये भाईसाहब पहले भी आ चुके थे और क्योंकि गैस कम्पनी के थे तो शायद हम अपने नियम को तोड़ देते। पता नहीं। शायद। घुघूत दफ्तर के लिए तैयार हो रहे थे। उन्होंने आकर माचिस जलाकर चैक करने से जरा जोर से बोलकर रोका। साबुन के घोल से बुलबुले बनते दिखाकर बताया कि कहाँ से गैस निकल रही है। फिर विशेषज्ञ को बताया कि ठीक करने के लिए क्या करना होगा।

सोचती हूँ, मैं भी जरा जोर से बोलना सीख लूँ। या फिर जब यह भी जानती ही थी कि ठीक करने के लिए क्या करना होगा तो बिना विशेषज्ञ ही गैस जैसे खतरनाक काम को स्वयं ही कर लेती।

सोचती हूँ एक फाइअर इक्स्टिंगग्विशर या अग्निशामक भी खरीद ही लूँ।

पति चिन्तित हैं कि यदि वे घर पर न होते तो मैं विशेषज्ञ को माचिस टेस्ट करने से रोक पाती क्या? रोक तो लेती किन्तु वह मेरी सुनता यह नहीं जानती। न सुनने की सूरत में उसे बाहर जाने को ही कहना पड़ता। स्थिति थोड़ी कष्टप्रद हो सकती थी। शायद एक विशेषज्ञ को एक स्त्री का अक्ल सिखाना नागवार लगता। शायद उसके अहम् को चोट पहुँचती। आप ही सोचिए आप जो काम करते हैं उसमें यदि कोई स्त्री मीनमेख निकाले तो आपको कैसा लगेगा? शायद पुरुष भी निकाले तो भी खुन्दक आएगी किन्तु यदि स्त्री निकालेगी तो? वह भी एक गृहणी जो विशेषज्ञ भी नहीं है? पता नहीं। पंगे से बच गई।

* कुछ दिन पहले ही एक नकली पुलिसवाला अपने पिता की वर्दी पहन स्त्रियों से उनके जेवर लूटने का प्रयास ठीक मेरे घर के सामने करता पकड़ा गया। आजकल मुम्बई में लोग पुलिस वाले बन स्त्रियों से कहते हैं कि सामने खतरा है और अपने गहने हमारे पास सुरक्षा के लिए रख दो। परन्तु यह वृद्धा कुछ अधिक ही चुस्त व खतरों से खेलने वाली निकली। उसने ठग महाराज को कहा कि यह लो मेरा मंगलसूत्र, पास में ही मेरा घर है मैं और गहने लेकर आती हूँ। ठग महाराज गहनों के लालच में खड़े रहे। वृद्धा सीधे थाने गई और पुलिस को साथ लेकर आई। सो अब ठग महाराज अन्दर हैं।

घुघूती बासूती

पुनश्चः मैं भी कितनी भुलक्कड़ हूँ! आपको इस विशेषज्ञ गैस मैकेनिक का नाम तो बताना ही भूल गई। ओह, शायद मेरे अवचेतन मन ने मुझे किसी मानहानि के दावे से बचाने के लिए ही नाम बताने से रोका होगा। उसका नाम था .....राम। ..... याने हिन्दी में उत्तर जाँचने के बाद जो टिक का निशान लगाते हैं उसको हिन्दी में क्या कहते हैं? बस वही राम! कई लोग यहाँ हस्ताक्षर कर दो कहने की बजाए कहते हैं यहाँ .... कर दो। सही, वही शब्द! आपने सही अनुमान लगाया। वही राम उसका नाम था। इतना सही नाम होने पर भी वह कितना गलत काम करने जा रहा था! काका हाथरसी की वह नाम वाली लम्बी कविता याद आ गई।

घुघूती बासूती

Monday, June 01, 2009

माँ की यादों के झरोखे से बहते किस्से..... १ धानसिंह का भाई मानसिंह

धानसिंह का भाई मानसिंह


माँ मेरे पास दस वर्ष बाद रहने आईं हैं। जब तक पिताजी थे दोनों लगभग हर वर्ष सर्दियाँ हमारे साथ गुजारते थे। भारतीय समाज में जहाँ बेटी के घर का पानी भी नहीं पिया जाता था वहाँ मैंने उन्हें हमारे पास आने व रहने के लिए लगभग ३१ वर्ष पहले के जमाने में कैसे सहमत किया यह एक अलग कहानी है। यहाँ तो मैं आपको माँ से सुने किस्से सुनाने जा रही हूँ। माँ से बात करते हुए वे अपनी वर्षों पहले पढ़ी कविताएँ, कहानियाँ या उपन्यास में लेखक ने क्या कहा था आज भी सुना देती हैं। कभी शकुन्तला ने दुष्यन्त को कमल के पत्ते पर नाखून से खुरचकर क्या पत्र लिखा था, कभी किसी कवि की कल्पना तो कभी अपनी दूसरी कक्षा में पढ़ी कविता। माँ ८६ वर्ष की हैं।


उनके बताए कुछ किस्से तो पहले भी सुना चुकी हूँ। लीजिए यह एक जो उन्होंने मुझे तब सुनाया जब मैंने उन्हें नींबूपानी दिया और कहा कि पी लीजिए अन्यथा गरम हो जाएगा तो उन्हें यह याद आया।


धानसिंह का भाई मानसिंह, कोठलपुर में उतरा है
मिलना है तो मिल लो, नहीं तो शीतलपुर को जाता है।



एक स्त्री के पति से मिलने कुछ मेहमान आए। स्त्री भात पका रही थी। वह भात पकाने पर उसका माँड निकालती थी। माँड में बहुत से बी विटामिन होते हैं व ढेर सारा शक्तिवर्धक कार्बोहाइड्रेट। अब यह सब उसे पता था या नहीं, मैं कह नहीं सकती परन्तु यह गरमागरम माँड वह अपने पति को पीने को देती थी। माँड पीना कोई बहुत गर्व का काम नहीं माना जाता होगा। शायद गरीब ही पीते होंगे। सो वह चाहती थी कि इससे पहले कि माँड ठंडा हो जाए पति रसोई में आकर माँड पी ले। मेहमानों के सामने कैसे कहे कि आइए माँड पी लीजिए। सो उसने ये पंक्तियाँ कहीं। मैं और आप ना भी समझ पाएँ परन्तु पति समझ गया और रसोई में आकर माँड पीकर वापिस अपने मेहमानों के बीच चला गया।


चलिए इन पंक्तियों का अर्थ समझते हैं।


धानसिंह= धान से बना चावल
मानसिंह= माँड, क्योंकि धान से बने चावल से बना है इसलिए धानसिंह का भाई (कवि वाली छूट ली गई है।)
कोठलपुर= कोठल या कुठला जो पुराने जमाने में लकड़ी से बना एक कटोरा जैसा होता था। क्योंकि माँड उसमें निकाला गया इसलिए कोठलपुर में उतरा है।
शीतलपुर= शीतल या ठंडा हो जाएगा।


घुघूती बासूती

Tuesday, May 19, 2009

आप तो अपनी ही जात वाले हो।

अली जी का किस्सा 'कोतो टोको' पढ़कर मुझे अपने पति के घर का एक किस्सा याद आ गया। बात बहुत पहले की है, लगभग ३५ वर्ष पहले की, जब फाउन्टैन पेन उपयोग किए जाते थे और खरीदने से पहले उनसे लिखकर निब की जाँच की जाती थी।


दादा पैन की दुकान पर गए। पैन चुना और फिर उससे लिखकर देखा। प्रायः ऐसे में व्यक्ति अपना नाम ही लिखता है या हस्ताक्षर करता है। दादा ने भी वही किया। दादा का नाम पढ़कर दुकानदार बोला," साहब आप तो अपनी ही जात वाले हो। आपसे दो रुपया कम लूँगा।"


उस जमाने में दो रुपए कम नहीं होते थे। परन्तु जाति में विश्वास न करने वाले दादा बोले," तुम अपना पूरा पैसा लो, मैं तो अपने दोस्त का नाम लिख रहा था।"


दुकानदार बोला, " साहब, आप बहुत ईमानदार हो, दो रुपए बचाने के लिए भी झूठ नहीं बोले।"
उस बेचारे को क्या पता था कि दादा ने ईमानदारी नहीं की थी और झूठ बोला था, जातिवाद से बचने के लिए!


आज भी जब कभी किसी पेन को हस्ताक्षर करने से पहले चलाकर देखती हूँ तो दादा का यह किस्सा याद आ जाता है।


घुघूती बासूती

Saturday, December 13, 2008

को छू रे तू भागवान !

आज महेन जी का ब्लॉग खोलने में बहुत कठिनाई हो रही थी । जब कोई काम कठिन हो जाए तो मैं उसके पीछे हाथ धोकर पड़ जाती हूँ । सो यदि आराम से उनका ब्लॉग खुल जाता तो बस एक रचना पढ़कर टिपिया कर चली आती । परन्तु यहाँ तो युद्ध स्तर पर प्रयत्न हो रहे थे । ब्लॉगवाणी में अब नीचे दिए हुए उनके ब्लॉग के नाम को क्लिक किया । सारी पोस्ट्स की सूची नजर आई । नजर 'जागर' शब्द पर पड़ी । यह तो ठेठ कुमाँऊनी शब्द है । परन्तु ब्लॉग तो खुल ही नहीं रहा था । हारकर url टाइप करके पहुँची । वहाँ गोपालबाबू का गाया 'घुघूती ना बासा' सुना । फिर 'जागर' सुनी । फिर जागर की हाइपरलिंक से 'Kumaoni Culture' पर पहुँची । वहाँ कई पोस्ट्स पढ़ीं । वहीं पर 'रामी (रामी बौराणी*)' पढ़ने को मिली । वह किस्सा पढ़कर मुझे अपने एक प्रिय किस्से ' को छू रे तू भागवान' की याद गई । चलिए आप भी सुनिए ।


माँ बताती थीं कि जैसा कि पहाड़ों में होता था, एक लड़की की बहुत छोटी उम्र में शादी हो गई । बच्ची थी सो गौना नहीं हुआ । वह शादी के खेल व दूल्हे को भूल भाल गई और अपने मायके में ही बड़ी होने लगी ।


पहाड़ों में मकानों के बड़े बड़े आँगन होते हैं । जिनके चारों तरफ पत्थरों से बनी दीवार होती है । उसके ऊपर स्लेट या ऐसे ही सपाट पत्थर लगाए होते हैं । ऊँचाई चौड़ाई भी ऐसी होती है कि आराम से बैठा जा सकता है । मकान आमतौर पर दुमंजिले होते हैं और नीचे की मंजिल में गाय भैंसें बाँधी जाती हैं । सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर रहने वाले कमरों में जाया जाता है । अन्दर की ओर से छत लकड़ी की होती है । बाहर से स्लेट के पत्थर होते हैं । दरवाजे बेहद नीचे होते हैं जिनको पार करने में मुझ जैसे छोटे कद वालों का सिर भी टकरा जाता था और कका से सुनने को मिलता था 'चेलियाँ की चौड़ नजर' या कुछ ऐसा ही जिसका अर्थ होता है कि लड़कियों को सिर झुकाकर रहना चाहिए ।


अब मेरी कल्पना में माँ वाली कहानी जीवन्त हो उठती है । लड़की जो अब किशोरी हो गई है दीवार पर बैठी है। शायद हिसालू या किलमोड़े या काफल ( तीनों पहाड़ी जंगली फल हैं ) या अखरोट व चूड़ा खा रही है। (अहा वह स्वाद !) या शायद दीवार पर बैठी धूप तापती हुई चौलाई का साग साफ कर रही है । या फिर आँगन में बनी ओखली में धान कूटकर चावल या चूड़ा बना रही है । एक अजनबी उनके घर आया व सीधे अन्दर ही आता गया । आँगन में आने से पहले कोई पुकार नहीं लगाई, न खाँसा ही, न किससे मिलना है ही कहा, न लड़की से उसके पिता जोशज्यू के बारे में ही पूछा । सो लड़की अपना काम या खाना छोड़कर अजनबी को सम्बोधित करके कहती है, " को छू रे तू भागवान, न पूछणीं न गाछणीं लमालम भीतरी उणीँ ?" अर्थात "कौन है रे तू भाग्यवान, न पूछ रहा है न पता कर रहा है और सीधे घर में ही घुसा आ रहा है ?"


इससे पहले कि अजनबी कोई उत्तर देता लड़की की इजा(माँ) घर से बाहर आती है और लड़की से बोलती है," ना चेली यस नी कुणीं, यो तो तेर पाण्डेज्यूँ छन ।"( न बेटी ऐसा नहीं कहते, ये तो तेरे पाण्डेजी हैं, (पाण्डे पति का सरनेम है) ।) लड़की अपने उस अजनबी पति को सिर से पैर तक निहारती है और घर के अन्दर चली जाती है।
आज भी यह किस्सा मुझे रोज याद आता है । जब भी दरवाजे पर मेरे पति आते हैं तो मैं यही शब्द " को छू रे तू भागवान, न पूछणीं न गाछणीं लमालम भीतरी उणीँ ?" कहकर उनका स्वागत करती हूँ । परन्तु दुख इस बात का होता है कि मुझे टोकने को कोई इजा नहीं होती ।


घुघूती बासूती


( कुमाँऊनी बन्धु क्षमा करें, मुझे कुमाँऊनी बोलनी नहीं आती जितनी समझ आती थी वह भी बचपन व घर छूटने के साथ भूल गई हूँ, सो बहुत सी गल्तियाँ होंगी परन्तु भाव गलत नहीं हैं । क्यूँल तो निश्चित रूप से गलत है । परन्तु कुमाऊँनी की धातु तो याद नहीं ! कौ, कौल दोनों ही गलत लग रहे हैं सो क्यूँल ही लिख दिया था । रात को सोए में याद आया यह कुणीं हो सकता है सो अब वह कर दिया । )


घुघूती बासूती

Saturday, August 02, 2008

‘गंदा बच्चा’

मैं और मेरी सहेली लगभग सदा साथ रहते थे। एक बार हम मेरे घर की ओर जा रहे थे। हम आपस में बात कर रहे थे जिसमें गंदा बच्चा शब्द आया। सामने से एक लम्बा सा, बच्चा ना दिखने वाला, लड़का आ रहा था । वह हमसे उलझ गया कि वह गंदा बच्चा नहीं है। हमने कितना कहा कि तुम्हें नहीं कहा परन्तु वह तो अड़ गया कि उसे ही कहा है। जब वह बिल्कुल नहीं माना तो मैंने कहा, "ठीक है, तुम्हें ही कहा था । अब क्या किया जाए ?" उपाय तो उसके भी पास कोई नहीं था। वह भन्नाता, झल्लाता अपने रास्ते, जो हमारे रास्ते पर ही पड़ता था, चला गया।

स्वाभाविक है कि उसके बाद से उसका नाम हमारे लिए गंदा बच्चा ही हो गया। उसको देखते से ही मन में यही शब्द आता था। यदि वह मुझे या मेरी सहेली को कभी दिखता तो हम कहते कि आज गंदा बच्चा दिखा था। हम ही क्या हमारी अन्य सहेलियों के लिए भी उसका यही नामकरण हो चुका था। दूर से भी कोई उसे आता देखता तो एक दूसरे को बता दिया जाता कि गंदा बच्चा रहा है।

एक बार हमारे कॉलेज में मेला था। हम सबके पास अलग अलग स्टॉल थे। लड़कियों के कॉलेज में मेला हो और शहर भर के लोग ना आएँ यह कैसे हो सकता था ? खूब भीड़ जमा थी। मेरी सहेली का घर पास ही था और उसके पास स्कूटी भी थी। सो जब किसी चीज की आवश्यकता पड़ी तो वह अपने घर से लाने के लिए स्कूटी पर चली गई।

रास्ते में एक राउन्ड एबाउट, ट्रेफिक आइलैंड पर स्कूटी घुमाने पर उसकी स्कूटी फिसलकर, स्किड हो गई। उसकी बाँह , घुटने आदि भी छिल गए और कपड़े गंदे हो गए घुटनों से पैन्ट्स फट भी गईं। जब वह गिरी तो एक व्यक्ति उसे उठाने आया। उसने सहेली की स्कूटी पकड़ ली और स्कूटी को साथ लेकर उसको घर तक छोड़ आया। हाँ, आपने सही अनुमान लगाया, यह और कोई नहीं वही गंदा बच्चा था।

शायद उसने सच में यह सोचा कि हम उसे गंदा बच्चा कह रहे हैं या शायद हमसे बात करने के लिए उसने यह बहाना बनाया, पता नहीं। परन्तु जो भी हो वह एक अच्छा व्यक्ति था।

घुघूती बासूती

Monday, March 10, 2008

सेही ने शेर पर साधा निशाना । घायल शेर भागा ।

लगभग पाँच दिन पहले एक समाचार पढ़ा था, कि एक शेर ने सेही (porcupine ) का शिकार करने की कोशिश की और सेही ने अपने बाण जैसे दो काँटे( quills ) उसपर दाग दिये और शेर बेचारा पीठ पर काँटे लगाये जान बचाकर भागा । अब वन्य अधिकारी उसको ढूँढ रहे हें ताकि ये काँटे निकाल कर उसका घाव ठीक किया जा सके । लगता है सेही का माँस कई जानवरों को इतना पसन्द है कि वे लालच में घायल होने का खतरा भी मोल ले लेते हैं ।


यह समाचार पढ़कर मुझे २० वर्ष पहले का समय याद आ गया । क्लब में कोई कार्यक्रम चल रहा था । अचानक जैकी नामक एक कुत्ता भागता हुआ आया और एक चक्कर लगाकर चला गया । मुझे उसके कान से कुछ पैन्सिल या तीर सा लटकता दिखा परन्तु इससे पहले कि कुछ समझ पाऊँ वह भाग गया था । जैकी कभी किसीका पालतू कुत्ता हुआ करता था । उसे पालने वाले की जब बदली हुई तो वह उसे वहीं छोड़कर चले गए थे । उसी मकान में जो रहने आए वे और उनका परिवार जैकी का ध्यान रखने लगे । उनका पालतू तो उसे नहीं कह सकते थे परन्तु वे उसे खाना खिलाते थे । जैकी कॉलॉनी भर का सांझा कुत्ता बन गया था ।


जैकी की विशेषता यह थी की वह हर स्कूटर व मोटरसायकल का पीछा करता था । अन्यथा वह बेहद निरापद प्राणी था । बच्चे उसके साथ निश्चिन्त खेलते थे ।
रात को क्लब का कार्यक्रम समाप्त होने पर जब हम लोग घर आकर सोने जा रहे थे तो जैकी का ध्यान रखने वाले परिवार की महिला का फोन आया । वे फोन पर रो रहीं थीं । उनके पति कुछ दिनों के लिए बाहर गए हुए थे । घर पर वे अपनी बेटियों के साथ थीं । क्लब से लौटकर उन्होंने जैकी को पीड़ा से रोते हुए पाया । उसके कान में सेही का काँटा चुभा हुआ था । उन्होंने बताया कि उनके बगीचे में एक सेही भी रहती थी । शायद जैकी ने उसे छेड़ दिया होगा । उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें । इतनी रात में कोई जानवरों का डॉक्टर मिलना भी सम्भव नहीं था । वैसे भी डॉक्टर वहाँ नहीं रहता था । हमें १२ कि.मी. दूर ले जाना पड़ता था । सबको हमारे परिवार का कुत्ता प्रेम पता था सो वे जानना चाह रहीं थीं कि क्या हम कुछ करेंगे । मैंने कहा कि पति से बात करती हूँ । पति बोले कि बस अभी पहुँचता हूँ ।


गाड़ी निकाल वे कुत्तों के घाव पर लगाने वाला मलहम लेकर वहाँ पहुँचे । जैकी किसी अनजान को तो हाथ नहीं लगवाने दे रहा था । आमतौर पर कुत्ते का इलाज करते समय उसका मुँह बाँध दिया जाता है । जैकी इसके लिए भी तैयार नहीं था । वैसे ही बेचारा बहुत कष्ट में था । पति ने सुझाया कि जैकी को बाड़ के पास ले आया जाए । वहाँ तारों के घेरे के एक तरफ उनके बगीचे में वे लोग जैकी को पकड़े रखें । तारों के बाहर से वे कोशिश करेंगे । वैसा ही किया गया । उसका सिर ऐसे पकड़ा गया कि काँटा तार के बाहर की तरफ आ गया । उन्होंने व उनकी बेटियों ने रोते रोते उसका सिर कस कर पकड़े रखा । दूसरी तरफ से पति ने खींचकर काँटा बाहर निकाला । जैकी जोर से चिल्लाया । वह अपने पैर से बार बार छूकर देख रहा था कि काँटा क्या सच में निकल गया है । उसके मलहम लगाया गया ।

जब वे घर आए तो मैंने जैकी का हाल पूछा । अनजाने कुत्ते से छेड़छाड़ करना अपने को कटवाने का खुला न्यौता तो था ही । सो मैं चिन्तित थी । पति ने पूरी बात बताई और कहा कि काँटा निकालने के बाद उसके चेहरे पर जो राहत दिखी वह देखने लायक थी । ऐसे में ही जानवरों के ऋाथ ना होने का दुख होता है । बेचारे बहुत असहाय हो जाते हैं ।

आशा है कि जैकी की तरह ही उस बेचारे शेर की पीठ से भी काँटे निकाल लिए गए होंगे ।

शेरों से सम्बन्धित दो और पोस्ट्स:

शेर,चरवाहे भारवाड़ और गोफेण


मुझे कल की छुट्टी चाहिये ।


घुघूती बासूती

Thursday, March 06, 2008

मेरे मामा को शेर ने काट लिया है । मुझे कल की छुट्टी चाहिये ।

हम लोग तब नए नए यहाँ आए थे । यह तो पता था कि हम शेरों के इलाके के बहुत निकट हैं परन्तु कितना निकट हैं यह नहीं पता था । यह तब पता चला जब हमारा ड्राइवर बोला कि उसे अगले दिन की छुट्टी चाहिए, उसे अपने मामा को देखने जाना है । हमने पूछा कि मामा को क्या हो गया । जो उत्तर हमें मिला उसे सुनने की तो हमने बिल्कुल आशा नहीं थी । हम बहुत बड़ा सा 'क्या' कहकर आश्चर्यचकित रह गए । वह बोला, 'उसके मामा को शेर ने काट लिया है ।'
यदि वह बोला होता कि कुत्ते ने काट लिया है, या साँप ने तो मामा से सहानुभूति तो होती परन्तु बात समझ में तो आती । हमने सोचा शायद यह भाषा की गड़बड़ है , हमें उसकी बात समझ नहीं आ रही । हमने एक बार फिर पूछा, "मामा को शेर ने काफी घायल कर दिया होगा ।"
वह बोला, "हाँ, दो तीन दाँत लगा दिये हैं छाती पर ।"
"बस?"
"हाँ ।"
"ऐसा कैसे ?"
"शेर उन्हें पहचानता था ।"
यह तो एक और ही नई बात सुनने को मिल रही थी । हम तो बस केवल कुछ मानवों, कुत्ते, बिल्लियों द्वारा ही पहचाने जाते हैं और यहाँ इन मामाजी को शेर भी पहचानता था । हीन भावना तो हुई परन्तु पूरी बात जानने की उत्सुकता भी थी। आखिर रोज रोज शेर लोगों को काटता तो नहीं , मार भले ही देता हो।
"यह सब हुआ कैसे ? क्या वे जंगल में थे ?"
"नहीं वे तो गाँव में ही गायें चरा रहे थे ।"
"फिर?"
"शेर ने गाय पर हमला किया । गलती से मामा बीच में आ गए ।"
"शेर उन्हें कैसे पहचानता था ?"
"वह शेर तीन और शेरों के साथ बहुत दिनों से हमारे गाँव में घूम रहा है । कभी खेत में मिल जाता है तो कभी आते जाते रास्ते में ।"
"फिर तुम लोग क्या करते हो ?"
"कुछ नहीं, शाम को अपने जानवर घर के अंदर बाँध लेते हैं ।"
"ओह ! कहाँ इलाज हो रहा है ?"
"अभी तो जूनागढ़ के हस्पताल में भर्ती हैं । एक दो दिन में छुट्टी मिल जाएगी ।"
शेर का हमला, नहीं नहीं , काटना,शेर से जानपहचान,शायद शेर ने मामाजी से ओह सॉरी भी कहा हो , यह सब सुनकर हमें लग रहा था या तो हम स्वप्नलोक में थे या कार्टूनलोक में ।
आज यह सब बात इसलिए याद आ गई क्योंकि शहर से घर आते आते बहुत देर हो गई थी । रास्ते का एक बहुत बड़ा भाग सुनसान है । एक सूखी नदी को पार करते हैं । कई बार नदी के पास ठीक सड़क के किनारे चिता जल रही होती है और लोग उसके आसपास ऐसे बैठे होते हैं जैसे आग ताप रहे हों । सियारों की हूहू सुनाई दे रही होती है । ( अभी भी सुनाई दे रही है ।) कभी कोई लोमड़ी या सियार रास्ता काट जाता है ।
मैंने उससे पूछा," क्या कभी इस रास्ते पर शेर मिला है ।"
वह बोला "तीन बार तो कार से लौटते समय का उसे ध्यान में है । एक बार तो जब दीदी लोगों को अहमदाबाद छोड़कर आ रहा था तब ।"
"फिर क्या किया ?"
"कुछ नहीं , कार देखकर वह सड़क के किनारे खड़ा हो जाता है। हम कार दूसरी तरफ से निकाल लेते हैं।"
"जब तुम मोटरसायकल पर होते हो तब क्या करते हो ?"
"कुछ नहीं , किनारे से निकाल लेता हूँ ।"
"शेर क्या करता है ?"
"बस वह किनारे पर खड़ा हमारे गुजरने की प्रतीक्षा करता है । फिर चल पड़ता है ।"
"यदि पैदल हो तो ?"
"तब भी कुछ नहीं । एक किनारे से निकल जाते हैं ।"
"उसके पास से ? वापिस नहीं लौट जाते ? "
"नहीं शेर को छेड़ो नहीं तो कुछ नहीं कहता है ।"
देखिये शेर तक इतने भले होते हैं कि छेड़ो ना तो अपने रास्ते ही नहीं जाते अपितु आपके लिए रास्ता भी छोड़ देते हैं । आज अपने ड्राइवर से बहुत सी बाते हुईं । अधिकतर शेरों की । चर्चा कल या परसों या जब मन हुआ तो जारी रखूँगी ।
घुघूती बासूती

Tuesday, February 19, 2008

मेरे लिए झाँसी की रानी का पोस्टर क्यों नहीं ?

माँ बहुत ही क्रान्तिकारी सी रही थीं जीवन भर । बहुत सी बातें हैं जिनके लिए मैं उनका बहुत आदर करती हूँ । जैसे १२ वर्ष की आयु में जब वे विवाह कर गाँव गईं तो उन्होंने घूँघट निकालने से साफ मना कर दिया । आज चोखेरबाली http://sandoftheeye.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.htmlमें जब बन्धनों की बात हुई तो भी मुझे अपनी माँ पर गर्व हुआ । वह तो यही कहती थीं कि ‘अभी समय है जो मन में आए पहनो । बाद में क्या होगा क्या पता ।’ ना कभी उन्होंने दृष्टि नीची करने का सुझाव दिया । वैसे गाँव में जहाँ दरवाजे नीचे होते हैं सिर भटकने पर चाचाजी से 'चेलियाँ की चौड़ नजर' (लड़कियों को दृष्टि नीची रखनी चाहिये सा कुछ) बहुत सुनते थे । ऐसा लगता था कि वे मजाक करते थे । और वैसे भी हम कभी- कभार ही तो गाँव जाते थे और पकृति ने चौड़ नजर दी या नहीं परन्तु 'चौड़ कद' तो दे ही दिया । सो मेरा सिर बहुत कम दरवाजों पर ही भटकता था ।

हमारे बाहर जाने, खेलने कूदने, शोर मचाने, भरी दोपहरी छत पर चढ़ने पर उन्होंने कभी रोक- टोक नहीं लगाई । ना उन्होंने हमारे लिए हमारा जीवन निर्धारित करने का प्रयास कभी किया । सदा हमें सबसे आगे रहने, जीवन में उनसे व पिताजी से आगे बढ़ने को कहा । परन्तु जब से मेरी अपनी उम्र बढ़ी है व वे वृद् हुईं हैं, उनसे बहुत से वैचारिक मतभेद, विशेषकर स्त्रियों पर,होते रहते हैं ।

कुछ बातें बचपन मे् भी कचोटती थीं । आज जब गाहे बगाहे http://taanabaana.blogspot.com/2008/02/blog-post_18.htmlमें विनीतकुमार जी की पोस्ट पढ़ी तो वह बात याद आ गई । और याद आईं बहुत सी और बातें भी जो प्रगतिशील माता पिता भी जाने अनजाने में कर देते हैं ।

माँ सदा कहती थीं कि भाई के जन्म से पहले उन्होंने दिवार पर सरदार पटेल का पोस्टर लगा रखा था ताकि सदा आँखों के सामने रहे । वे सरदार पटेल सा बच्चा चाहती थीं । भाई कितने अच्छे थे, बचपन भर व अब भी, यह मैं http://ghughutibasuti.blogspot.com/2008/02/blog-post_17.htmlमें बता चुकी हूँ । परन्तु मुझे सदा यह आश्चर्य होता था कि वे कभी मेरे जन्म से पहले लगाए गए पोस्टरों या मेरी दोनों बड़ी बहनों के जन्म से पहले ऐसा कुछ किये की बात नहीं करती थीं । सबसे बड़े भाई के बचपन की भी बहुत बातें बताती थीं । मेरे बचपन की भी कुछ बताती थीं । वैसे मुझे स्वयं ही तीन चार वर्ष के बाद की बहुत सी याद रखने लायक बातें ऐसे याद हैं जैसे मैं आज भी उन्हें चलचित्र सा देख रही होऊँ । बचपन भर मैंने माँ से यह प्रश्न नहीं पूछा । परन्तु अब जब भी वे उस पोस्टर की बात करती हैं तो मेरा मन यही पूछने का होता है कि मेरे जन्म से पहले कौन सा पोस्टर लगाया था और कई बार पूछ भी लेती हूँ। एक- आध बार तो यह भी पूछ चुकी हूँ कि क्या 'झाँसी की रानी' के पोस्टर/ चित्र नहीं मिलते थे । कई बार वे कह भी देती थीं कि ‘तुम तो मेरे बिना झाँसी की रानी को देखे ही तलवार उठाए रहती हो !’

परन्तु यह पूछना सैक्रिलेज (उनकी प्रिय पवित्र भावनाओं, आस्थाओं का अपमान सा )लगता है । यह क्यों होता है कि जो प्रश्न पूछे जाने चाहिये उन्हें पूछने पर स्वयं ही दुख होता है कि क्यों पूछकर आरोप लगा रही हूँ । परन्तु यह तो सच है कि जिस घर में बेटे होते थे उन घरों में बेटियों का बचपन आमतौर पर विस्मर्णीय ही रहता था ।

घुघूती बासूती

Friday, April 27, 2007

यह कैसा न्याय ?......... साथ में एक किस्सा भी !

कुछ दिन पहले एक बन्धु ने अपने चिट्ठे में लिखा था कि किस प्रकार एक विशेष प्रकार के अपराधियों को मार पीट कर उन्हें उनके करे की सजा देनी चाहिए । तब भी मुझे लगा था कि यह गलत है व भावना में बहकर न्याय नहीं होता । मेरा सबसे बड़ा भय यही था कि किसी निर्दोष को सजा न मिल जाए या, जोश में आकर लोग अपराध से अधिक सजा न दे डालें , या कुछ लोग यह रास्ता अपने शत्रुओं को मजा चखाने के लिए न उपयोग करें ।
कल के टाइम्स औफ इन्डिया में एक समाचार पढ़ा । अमेरिका में एक संस्था इनोसेन्स प्रोजेक्ट द्वारा निर्दोष लोगों को न्याय दिला रही है । इसने २०० ऐसे व्यक्तियों को, जिन्हें लम्बी कारावास हुई थी व जो कुल मिलाकर २४७५ वर्ष कारावासों में बिता चुके थे, डी एन ए के प्रमाणों द्वारा मुक्ति दिलवाई है । यदि आप हिसाब लगाएँगे तो हर निर्दोष ने औसतन १२वर्ष व साढ़े चार महीने कैद में गुजारे ! २००वाँ व्यक्ति जेरी मिलर, उम्र ४८ वर्ष, ने २४ वर्ष कैद में बिताए हैं । उसे एक ४४ वर्षीय महिला का बलात्कार करने के लिए सजा दी गई थी । किसी अपराधी ने बलात्कार करके महिला को कार के बूट में बन्द कर दिया था । ऐसा कर वह भाग गया और कुछ लोगों ने, जिन्होंने उसे देखा था, उस अपराधी का चित्र बनवाने में मदद की । इसी चित्र के आधार पर जेरी पकड़ा गया ।
क्या आप इस व्यक्ति व उसके परिवार की व्यथा की कल्पना कर सकते हैं ? पहली तो बात किसी भी निर्दोष व्यक्ति को जब दोषी करार दिया जाता है तो यह उसके व उसके परिवार के साथ अन्याय है व यह उनके मान सम्मान को धूल में मिला देता है । किन्तु बलात्कार का दोष तो ऐसा है कि जिसपर लगे यह उसके व उसके प्रिय जनों के बलात्कार सा है । सोचिये उसकी पत्नी या महिला मित्र या प्रेमिका की मनोदशा ! यदि उन्हें न भी विश्वास होता हो तब भी उनके मन में संदेह तो आता होगा । क्या होगी उसके माता पिता व परिवार की दशा ! कौन परिवार सह पाएगा कि उनका पुत्र एक बलात्कारी है ?
जब भी कोई अपराध होता है, विशेष रूप से जघन्य, तो सब लोग, पुलिस, मीडिया , सरकार आदि, जल्द से जल्द अपराधी को पकड़ना चाहते हैं व लोगों का क्रोध शान्त कतना चाहते हैं ।
यह सही भी है किन्तु किसी भी निर्दोष को सजा देना एक नया अपराध करने से भी बड़ा अपराध है । जिसके साथ अपराध किया गया हो उसे लोगों की सहानुभुति तो मिलती है किन्तु इस बेचारे के साथ तो न न्याय, न सहानुभूति !
अतः हमें याद रहना चाहिये कि एक पीड़ित को न्याय दिलाने के चक्कर में आवेश में आकर एक निरअपराधी को सजा नहीं होनी चाहिये । जब मैंने यह समाचार पढ़ा तो मुझे बचपन में अपने साथ घटी एक घटना याद आ गई ।
घटना
जब मैं लगभग १२ वर्ष की थी तो एक बार मेरे माता पिता व अड़ोसी पड़ोसी सब एक विवाह में गए हुए थे । हमारे घर दूर दूर थे व इस स्थिति में दूर दूर तक कोई भी घर में नहीं था । एक चोर हमारे घर आया । मैंने उसे देख लिया, और.... हँसिये नहीं, उसे पकड़ने उसके पीछे भागी । बेचारे चोर ने ऐसी बच्ची की कल्पना नहीं की होगी । सो वह भी भागा, वह आगे और मैं पीछे , रात के अन्धकार में बगीचे में पहुँच गए । अचानक एक लाइट के नीचे शायद उसे यह खयाल आया कि वह एक बच्ची से डर कर भाग रहा है , सो वापिस मेरी तरफ आया । तब मुझे भी लगा कि कुछ अधिक ही वीरता हो गई । सो चिल्लाई.. भैय्या, चोर,चोर , पकड़ो । चोर रुक गया और मैं भी रुक रही । शायद उसने सोचा होगा कि जब छोटी बहन इतनी बड़ी वीरांगना है तो बड़ा भाई कैसा होगा । हम दोनों खड़े थे फिर वह भागने लगा और मैं फिर से उसके पीछे ! तब तक भाई भी आ गया और मैंने चिल्ला कर कहा कि दूसरी तरफ से जाओ । घर के चारों और बगीचा था और मैं उसे घेर कर पकड़ना चाहती थी । वह बेचारा !
एक तरफ कूँआ तो दूसरी तरफ खाई !
एक तरफ बहना तो दूसरी तरफ भाई !
गन्नों में जा बाढ़ से बाहर छलांग लगाई !
ऐसे उस बेचारे ने हमसे अपनी जान छुड़ाई !
इस घटना के कुछ दिन बाद मैंने उस चोर को दो तीन बार देखा । मैं अपने पिताजी के साथ थी व आसपास सब जान पहचान वाले लोग थे । चाहती तो पकड़वा सकती थी । कुछ और नहीं तो दो चार हाथ तो उसे पड़ ही जाते । किन्तु उस उम्र में भी मुझे इस बात का एहसास था कि कम से कम शून्य दशमलव एक प्रतिशत तो गलत होने की संभावना है । आज भी मुझे उसकी वे भेदती आँखें याद हैं, वह अवश्य सोचता होगा कि मैंने उसे पकड़वाया क्यों नहीं । किन्तु मैं जानती हूँ मैंने ठीक किया था । यदि मैं पूरी तरह से आश्वस्त नहीं थी तो मैं उसपर आरोप नहीं लगा सकती थी ।
घुघूती बासूती