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Monday, November 14, 2011

सौम्या का चलती ट्रेन से फेंका जाना, बलात्कार व हत्या व अब न्याय

क्या संसार में कोई ऐसी स्त्री होगी जिसे ऐसा अंत मिलना चाहिए? एक एक हाथ वाले भिखारी ने लेडीज़ कम्पार्टमेंट में घर लौट रही एक तेईस वर्षीय सेल्सवुमेन सौम्या को मोलेस्ट किया, जब उसने प्रतिरोध किया तो उसने उसे गाड़ी से बाहर फेंक दिया, स्वयं भी गाड़ी से बाहर कूद गया और फिर घायल सौम्या को घसीटकर सुनसान जगह ले गया और उसका बलात्कार कर उसकी हत्या की कोशिश की। अचेत सौम्या को हस्पताल ले जाया गया जहाँ पाँच दिन बाद उसकी मृत्यु हो गई।

लोग किसी भिखारी के लिए प्रायः बेचारा शब्द उपयोग करते हैं। यदि वह अपाहिज भी हो तो और भी बेचारा। किन्तु इस दुगुने बेचारे ने जिस प्रकार से एक अकेली स्त्री का शिकार किया, उसमें किसी प्रकार की बेचारगी नजर नहीं आती।

एक फास्ट ट्रैक अदालत ने गोबिन्दसामी नामक इस ३० वर्षीय ......, (क्या शब्द उपयोग किया जाए? इस कृत्य को अमानुष तो नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह कृत्य प्रायः मानव ही करते हैं) को मृत्यु दंड दिया है। वैसे इस अपराध के लिए मृत्युदंड बहुत ही उदार सजा है। यदि सौम्या के जीवन के बारे में उस क्षण से, जिस क्षण गोबिन्दसामी उसके सामने आया होगा, लेकर उसकी मृत्यु तक, सोचा जाए तो मृत्युदंड बहुत ही सरल व उदार सजा लगती है। काश कोई तरीका होता कि सम्मोहन या किसी अन्य तकनीक से गोबिन्दसामी को भी वह पीड़ा, वह भय, वह घबड़ाहट, वह दीनहीनता, असहायता, दयनीयता का भाव, वह स्वयं का असम्मान, वस्तुकरण, मानव से किसी के खिलवाड़ के लिए खिलौना बना दिया जाना, फेंक दिया जाना और फिर स्वयं का खिलौने से भी बदतर उपयोग किया जाना व फिर तोड़कर मरने के लिए छोड़ दिए जाना...... यह सब महसूस कराए जा सकते। यह सब महसूस करने के बाद ही उसे मृत्यु रूपी मुक्ति मिलती तो शायद उसे अपने अपराध का बोध होता।

बहुत पहले मैंने दो पोस्ट लिखीं थीं


सौम्या के बारे में पढ़कर मुझे ये पोस्ट्स, वह किस्सा जिसके कारण ये लिखीं, इनपर आई टिप्पणियाँ याद आ रही हैं। सोच रही हूँ कि यदि सौम्या एक हाथ वाले भिखारी का सामना नहीं कर सकी तो वह लड़की क्या यार्ड में किसी पुरुष समूह के संभावित हमले का मुकाबला कर सकती थी? एक हाथ वाला तो दो हाथ वाली से कम सक्षम होना चाहिए ना? भिखारी तो अभिखारी से कमजोर होना चाहिए ना? फिर क्यों हमारी भारतीय लड़कियाँ प्रायः दूब सी नरम, नाजुक व उस ही की तरह रौंद दी जाती हैं? प्रायः रौंदे जाने पर भी फिर से उठ बैठती हैं। क्या उन्हें सदा कमजोर ही बनाया जाता है? कम खिलाया जाता है? कम खाने, नाजुक/दुबले बने रहने की प्रेरणा दी जाती है? मुकाबला न करके रौंदे जाने को अपना प्रारब्ध मान चलना सिखाया जाता है? बचपन से मारपीट, लड़ाई झगड़े, हाथापाई से दूर रखा जाता है? अन्यथा मारपीट तो स्वाभाविक रूप से लड़के सीख ही जाते हैं फिर लड़कियाँ क्यों नहीं? क्या इसलिए कि मारपीट कर सकने वाली लड़कियों से कल कोई सरलता से मारपीट नहीं कर पाएगा, उसे डरा सहमा नहीं पाएगा?

मुझे वह फ़िज़िकल एजुकेशन वाला अध्यापक भी याद आता है जो बढ़ती उम्र की किशोरियों को कम खाकर पतला दुबला बने रहने की दिन रात सलाह देता था, वह अध्यापिका भी जो कहती थी कि इतनी लम्बी हो जाओगी तो बाद में लड़का मिलना कठिन हो जाएगा। जबकि हर फ़िज़िकल एजुकेशन वाले अध्यापक का काम लड़कियों को बलशाली, अपना बचाव करने में सक्षम बनाना होना चाहिए।

न जाने क्यों मुझे लगता है कि हमारे समाज में स्त्री का जो स्थान है (पूजनीय वाला, नारी तुम केवल श्रद्धा हो वाला और श्रद्धा को दर्द थोड़े ही होता है!और श्रद्धा कराते तो नहीं ही करती, आँचल में दूध आँख में पानी वाला, सावित्री वाला) और पुरुष को जन्म से जो ट्रेनिंग दी जाती है(कुलदीपक, जो माँगोगे वही मिलेगा, सारा संसार तुम्हारा है, आँख का तारा राज दुलारा, तुम्हारे लिए कोई बन्धन नहीं हैं, खींसे निपोर कर गाली दो, पॉर्न देखो, लड़कियों पर छींटाकशी करो, छेड़ोगे तो लड़कियाँ तुम पर वारी जाएँगी, डराओगे तो सहेली, माँ बहन पत्नी तुम्हारा आदर करेंगी, श्रेष्ठ हो, चाहे अपाहिज भिखारी ही क्यों न हो, मारो पीटो, मर्दानगी दिखाओ)वे स्त्री के प्रति अपराधों के लिए उत्तरदायी हैं।

समय आ गया है कि हमारी बेटियाँ शक्तिशाली बनें,उनका भरपूर शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक विकास हो। जैसे हर सवा पाँच फुटा छः फुटे से, हर साठ किलो का सत्तर किलो वाले से डरा सहमा नहीं रहता क्योंकि उसे डरना नहीं सिखाया जाता,उसे लगता है कि उसे भी छः फुटे या ७० या सौ किलो वाले की तरह जीने, घूमने का अधिकार है, न मिलने की स्थिति पर कानून उसकी सहायता करेगा और छः फुटे या ७० या सौ किलो वाले भी उनके इस अधिकार को समझते व प्रायः इस अधिकार का आदर भी करते हैं क्योंकि नहीं करेंगे तो कानून उनसे निपटेगा। वैसे ही स्त्री को भी शक्तिशाली बनाकर व उसे कानून का सहारा देकर निर्भय बनाना होगा। उन्हें भी वैसे ही पौष्टिक भोजन कराया जाए जैसा बेटों को कराया जाता है। गोरी सुन्दर रोल मॉडेल देकर गोरा व सुन्दर बनना ही जीवन का उद्देश्य न बनाकर साहसी व शक्तिशाली रोल मॉडेल प्रस्तुत कर साहसी व शक्तिशाली बनना भी उनका ध्येय हो पाए तो बेहतर हो।

जिस प्रकार से समाज में लोगों को अपनी शक्ति का दुरुपयोग नहीं करने दिया जाता,ट्रक वाला कार को, कार वाला स्कूटर को,स्कूटर वाला पैदल को कुचलकर नहीं जा सकता,उसी प्रकार जो व्यक्ति बलात्कार कर स्त्रियों को निर्भय हो जीने न दे उसे बलात्कार करने योग्य ही नहीं रहने दिए जाना चाहिए।

घुघूती बासूती

नोटः मैं बलात्कार के लिए मृत्युदंड के पक्ष में नहीं हूँ, क्योंकि यदि ऐसा किया जाए तो बलात्कारी बलात्कार के बाद हत्या भी करना चाहेगा। ताकि सबूत न बचें और यदि बलात्कार के लिए मृत्युदंड है तो फिर बलात्कार के बाद की हत्या के लिए एक और बार तो फाँसी पर नहीं चढ़ाया जाएगा अतःपीड़िता की हत्या लगभग निश्चित हो जाएगी। इस केस में तो हत्या भी हुई।

घुघूती बासूती

Thursday, March 24, 2011

अरुणा शानबाग

यदि मानव को अपने मानव होने पर गर्व होता हो तो उसे केवल इस नाम को याद करना चाहिए, सारा गर्व चकनाचूर हो जाएगा, एक पल में ही।

यदि पुरुष को अपने बल व पौरुष पर गर्व होता हो तो भी उसे केवल इस नाम को याद करना चाहिए, सारा गर्व चकनाचूर हो जाएगा, एक पल में ही।

यदि न्याय प्रणाली को अपने न्याय पर गर्व होता हो तो भी उसे केवल इस नाम को याद करना चाहिए, सारा गर्व चकनाचूर हो जाएगा, एक पल में ही।

यदि भारतीयों को अपनी परिवार व्वस्था पर गर्व होता हो तो उन्हें केवल इस नाम को याद करना चाहिए, सारा गर्व चकनाचूर हो जाएगा, एक पल में ही।

यदि जीवन को अपने को मृत्यु से बड़ा समझ अपने पर गर्व होता हो तो उसे केवल इस नाम को याद करना चाहिए, सारा गर्व चकनाचूर हो जाएगा, एक पल में ही।

यदि आधुनिक चिकित्सा को अपनी सफलताओं पर गर्व होता हो तो उसे केवल इस नाम को याद करना चाहिए, सारा गर्व चकनाचूर हो जाएगा, एक पल में ही।

यदि माताओं को पुत्र पैदा करने पर गर्व होता हो तो उन्हें केवल इस नाम को याद करना चाहिए, सारा गर्व चकनाचूर हो जाएगा, एक पल में ही।

अरुणा शानबाग! यह नाम सुनामी व भूकम्प को मानव से अधिक सहृदय सिद्ध करता है। प्राकृतिक आपदा को मनुष्य झेल सकता है किन्तु अपने ही सहकर्मी द्वारा ऐसा क्रूर व्यवहार? फिर उस दुष्ट को जीवन जीने के लिए खुला छोड़ देने वाला न्याय व समाज? इस समाज में ही वह जीता होगा। शायद पत्नी व बच्चे भी होंगे। कौन मानव होंगे जो उसे बेटा, भाई, पति या पिता कहते होंगे? यदि हममें से किसी के परिवार में ऐसा मानव जन्म लेता तो हम क्या करते? क्या उसकी माँ होना स्वीकार कर पाते या सबसे पास के खंबे पर रस्सी डाल लटक जाते या सबसे पास वाले जल में कूद जाते? यदि एसे मानव से हमारा विवाह तय हो रहा होता तो क्या विवाह करतीं या आजीवन कुँवारी रहना बेहतर समझतीं? यदि होश सँभालने पर पता चलता कि ऐसा मानव हमारा पिता है तो क्या उसका दिया खाना स्वीकार करते या भीख माँग, या शरीर बेच जीना स्वीकारते? क्या उसके साथ एक ही कमरे में बैठ पाते?

या फिर पापी से नहीं पाप से घृणा करते? उस पापी को स्वीकार लेते? शायद हाँ, किन्तु तब जब...

१. वह दिन रात अरुणा की सेवा करता।

२.हर जागते पल अरुणा का चेहरा, मुड़े तुड़े हाथ आदि निहारता।

३.यदि उसकी उपस्थिति अरुणा के लिए कष्टप्रद होती तो भी दिनरात उसे अरुणा के आज के चित्र सी सी टी वी पर देखने पड़ते। पल पल अपने द्वारा किए अत्याचार का परिणाम देखना पड़ता। पल पल अपने को कोसता। उस क्षणिक आनन्द, परदुख में अपना सुख ढूँढने की अपनी प्रवृत्ति पर स्वयं लज्जित होता। जब वह पश्चात्ताप की आग में तिल तिल जलता। जब जीवन की घड़ी की सुई उसके लिए भी वहीं अटक जाती जहाँ निरपराध अरुणा के लिए अटकी। जब वह पल पल मृत्यु माँगता। जब उसे मृत्यु जीवन से कहीं बेहतर लगती।

तब शायद तब उससे घृणा करने की बजाए उसके अपराध से घृणा करने की सोची जा सकती थी।

घुघूती बासूती

Tuesday, March 15, 2011

जापानी भूकम्प व सुनामी से उपजे प्रश्न..............घुघूती बासूती

जापान में आए भूकम्प व सुनामी ने बहुत से लोगों को मौत की नींद सुलाया होगा किन्तु न जाने कितने लोगों को जीवन व रिश्तों के बीच में से एक चुनने को मजबूर किया होगा और जीवन चुनने पर जीवन भर के लिए उनकी नींद व चैन गायब कर दिया होगा।

सोचिए, आपके घर में आप पति पत्नी हैं, शायद एक दो बच्चे हैं, (या आप अकेले हैं) और बहुत वृद्ध माँ या पिता हैं, या फिर वृद्ध के स्थान पर कोई बेहद बीमार व्यक्ति है, कोई लकवाग्रस्त है या कोई और असहाय है। अचानक टी वी पर या सेल फोन पर भूकम्प की चेतावनी आती है। आप क्या करेंगे? बाहर भागेगें या फिर वृद्ध या असहाय को हाथ पकड़ या घसीटते हुए या पीठ पर लाद बाहर ले जाने की चेष्टा करेंगे, यह जानते हुए भी कि जब तक आप दरवाजे तक भी न पहुँचेंगे भूकम्प आ चुका होगा?

यह स्थिति तो फिर भी सरल है, भूकम्प आने पर घर के अन्दर रहते हुए भी आपके बच जाने की संभावना काफी है। सो आप माँ का हाथ पकड़े बैठे रह सकते हैं। किन्तु यदि सुनामी की चेतावनी आए और आप जानते हैं कि उससे रक्षा तो कोई भी नहीं कर सकता तब आप क्या करेंगे? क्या तिनके की तरह बहने के बाद जल समाधि लेने को घर में बैठे रहेंगे? या फिर अपने इलाके के सबसे ऊँचे टीले की तरफ भागेंगे? हो सकता है कि माँ के साथ जल समाधि लेना पसन्द करेंगे। किन्तु तब क्या जब आपकी अपनी संतान हो? वे घर में हैं तो उन्हें लेकर भागना आपका पहला दायित्व न होगा? यदि वे स्कूल, छात्रावास या कहीं और हों और वे अभी भी आप पर आर्थिक, मानसिक या भावनात्मक रूप से निर्भर हैं तब भी आपके लिए उनके लिए जीना सर्वोपरि न होगा? यदि आप पति या पत्नी हैं तब भी क्या एक दूजे के लिए जीना आपका पहला कर्त्व्य न होगा? और यदि आपका वृद्ध या असहाय के अतिरिक्त कोई और अपना न हो तो भी क्या अपने लिए जीना आपका प्राणी धर्म न होगा?

और यदि आप उस वृद्धा माँ को छोड़ भाग लिए तो? तो क्या जीवन भर अपने को निकृष्ट संतान मान अपराध बोध के साथ जिएँगे? या फिर आप इतने व्यावहारिक होंगे कि अपने दिल को यह कह कर बहला लेंगे कि अपनी जान बचाना प्राणी मात्र का प्रथम कर्त्तव्य है?

मुझे पूरा विश्वास है कि जैसे विमान यात्रा के समय बताया जाता है कि औक्सीजन मास्क की आवश्यकता पड़ने पर पहले स्वयं मास्क पहनो फिर अपनों की पहनने में सहायता करो या उन्हें पहनाओ। हर बार मैं सोचती हूँ कि यदि ऐसी स्थिति आई तो क्या मैं ऐसा कर पाऊँगी? जानती हूँ कि यह निर्देश सही है। आप ही यदि बेहोश हो गए तो आपपर निर्भर बच्चा या असहाय स्वयं को क्या बचा पाएगा? बचा भी लिया तो कैसे जी पाएगा?

मेरे सामने भी एक बार इतनी बुरी तो नहीं किन्तु ऐसी सी ही स्थिति आई थी। मेरी किशोर बेटियों के सामने भी एक बार आई थी। जब हम कर्नाटक‍‍- महाराष्ट्र की लगभग सीमा पर रहते थे तब १९९३ का लातूर भूकम्प आया था। मुझे देर रात या कहिए सुबह तक जागने की बीमारी थी, किन्तु एक बार जब सोती तो घोड़े, गधे, खच्चर सभी बेचकर ही सोती चाहे इस बेचने की प्रक्रिया में सुबह ही हो जाती। उस कुम्भकर्णी नींद से न अलार्म, न फोन की घंटियाँ(जो रात भर पति के लिए बजती ही रहती थीं), न कोई सामान्य आवाज मुझे उठा सकती थी। मुझे यदि कोई आवाज उठा सकती थीं तो बेटियों के बचपन में उनके रोने का पहला स्वर और बाद में उनके मुँह से हल्के से भी निकली 'माँ' की पहली पुकार! पति को केवल और केवल फोन की घंटी या अलार्म उठा सकते थे।(दोनो अपने अपने बेबीज़ पर समर्पित थे, कारखाना उनका बेबी था!) सो उस रात भी मैं 'माँ उठो, भूकम्प' सुनकर उठी थी। बड़ी बिटिया छोटी का हाथ थामे, उसे घसीटती हुई हमारे कमरे में लाई थी। हम दोनों उठे और मैं फायर एस्केप से नीचे जाने को कहती रही, पति वहीं बैठे रहने को कहते रहे। सीढ़ी तक जाना और नीचे उतरना बहुत समय लेता। फायर एस्केप तो झूल ही रहा होगा। खैर, बड़ी बिटिया ने स्वयं भागने के स्थान पर बहना को उठाया, हमें उठाया और सबसे अधिक जागी हुई वह, हमारे साथ उस झूलते मकान में बैठी प्रलय की प्रतीक्षा करती रही।

मेरे सामने यह स्थिति २००१ के गुजरात भूकम्प के समय आई। गणतंत्र दिवस था। मेरे बगीचे की दीवार के बाद ही वह मैदान था जहाँ पति झंडा फहराने वाले थे, बच्चों के स्कूल के कार्यक्रम, खेल, मस्ती के कार्यक्रम होने वाले थे। मुझे बुखार था सो मैं घर पर ही सोई हुई थी। नौ बजे का कार्यक्रम था। घुघूत उससे पहले कारखाने का काम निपटाने कारखाने में व्यस्त थे। ८० मीटर के प्री हीटर टावर पर वेल्डिंग का काम हो रहा था। पाँच कर्मचारी उस ऊँचाई पर लकड़ी के प्लेटफॉर्म पर बैठे काम कर रहे थे। घुघूत निरीक्षण कर रहे थे कि अचानक धरती और साथ साथ प्री हीटर टावर वैसे ही झूलने लगे जैसे बचपन में आप और हम झूले पर बैठ पींगे चढ़ाते थे। ८० मीटर की ऊँचाई पर बैठे लोग तो खैर ऐसे झूल रहे थे कि धरती पर खड़ा व्यक्ति अपने नीचे खिसकती धरती को भूल उन्हें ही देखता रह जाए।(सौभाग्य से वे बच गए। )

मैं पलंग पर सोई हुई थी कि अचानक बादल आकाश पर गरजने की बजाए धरती के अंदर गरजने लगे। इस गड़गड़ाहट को सुन मैं जागी और तीन शब्द मेरे मस्तिष्क में कौंध गए.....भूकम्प, ताशी, डोली। मैं छलाँग लगा उठी और उठने से पहले ही चिल्लाने लगी, 'ताशी, डोली कम, ताशी, डोली कम, बेबी कम, वाल्कीज़, कम ताशी, डोई कम!' सौभाग्य से वे कुत्ते थे, बिल्लियाँ नहीं, सो वे आ गए और उन्हें बाहर करने के बाद ही मैं घर से बाहर निकली। बाहर हमारी कार का खुला बूट जोर जोर से हिल व खड़खड़ा रहा था, सामने गेट पर गोलाई में लोहे के सरियों पर चढ़ी बेल झूल रही थी। बाहर जाने के रास्ते के दोनो ओर का लॉन ऊपर नीचे हो रहा था। चलना या खड़ा रहना असम्भव लग रहा था। सामने के घर के लोग बाहर आ गए थे। मैं चिल्ला रही थी, 'आपकी माँ कहाँ हैं, उन्हें बाहर बुलाओ।' वे 'ओह हाँ' कह 'माँ, माँ' चिल्ला रहे थे। बचपन से मेरे दुःस्वप्नों में जो भूत मुझे अनन्त ऊंचाई वाले झूले पर झूला झुलाते थे, लगता था वे आज सच में अपना करतब दिखा रहे थे। सामने वालों की माँ के बाहर आने तक प्रकृति का ताण्डव बन्द हो गया था। मुझे फिर भी अपनी माँ की याद आई। समाचार सुनती माँ, जो मेरी चिन्ता में न जाने कितनी मौत मर जाती। मैं अन्दर भागी। सबसे पहला फोन भाई को किया। कहा 'मैं सुरक्षित हूँ।' मेरा यह कहना था कि फोन लाइन मृत हो गईं। उसके बाद लगभग तीन दिन तक हमारा संसार से कोई सम्पर्क नहीं रहा। बेटियाँ छात्रावास में हमारी चिन्ता में घुलती रहीं। तब तक जब तक उन्हें मामा को फोन करने का ध्यान नहीं आया।

मैं बस यह सोचती हूँ कि यदि मेरे पास कुत्तों की जगह अपनी छोटी बिटिया की तरह बिल्लियाँ होतीं? प्रायः वे बुलाने पर नहीं आती हैं। मैं तब क्या करती? उन्हें छोड़ भाग पाती? यदि घर में कोई बिस्तर पर पड़ा होता, जो चल न पाता, तो? उसे छोड़ भाग पाती? क्या हमारा उत्तरदायित्व विशेषकर उनके लिए ही है जिन्हें या तो हमने जन्म दिया है या जिन्हें हमने बच्चों की तरह पाला है, जो हमपर पूर्णतया निर्भर हैं, जिनके जीवन में हम ही माँ बाबा हैं, चाहे वे कुत्ते या बिल्लियाँ ही क्यों न हों?

यह भूकम्प व सुनामी मुझे बहुत से नैतिक प्रश्नों में उलझा गया है।

हाँ, जाते जाते एक और प्रश्न। यदि हम स्वयं स्वस्थ, गतिशील न होकर बिस्तर पर पड़े होते और हमारे बच्चे या हमारा परिवार हमारे लिए सुनामी में जल समाधि लेने को तैयार होता तो? क्या हम उन्हें यह करने देते? या फिल्मों की तरह कसमें दे उन्हें घर व हमें छोड़ने को मजबूर करते? या यदि पास में पिस्तौल होती तो...............!

आप बताइए आप क्या करते?

घुघूती बासूती

Monday, February 28, 2011

बच्चा खोने का दर्द .............................................घुघूती बासूती

लगभग रोज शाम को काम से घर लौटते समय बेटियाँ फोन करती हैं। यदि किसी दिन फोन न आए दिन अधूरा लगता है। यदि रास्ते से फोन न कर पाए तो प्रायः सोने से पहले, खाना बनाते, गर्म करते हुए या पति के व्यायाम खत्म करने तक फोन कर ही देती है। कल भी बहुत देर से फोन आया। मैं घुघूत को खाना दे रही थी, सो उन्हें देकर मैं बातें करती रही। घुघूत को समझ नहीं आता कि मुझे भूख क्यों नहीं लगती, खाना छोड़ मैं कैसे उनसे बातें करती रह सकती हूँ। किन्तु बिटिया से बात और खाने के बीच में से यदि भूख से बेहाल न हो तो कोई भी माँ बात करना ही चुनेगी।

सोचती हूँ कि एक माँ मैं हूँ जो बेटियों के (और अपने भी) जीवन की हर छोटी बड़ी खुशी, कष्ट, खाँसी, जुकाम से लेकर कोई मजेदार घटना, महत्वपूर्ण घटना या फिर मन्डेन, सामान्य बात को भी साझा करने के सौभाग्य को सामान्य माँ बेटी का व्यवहार समझती हूँ और एक वह अभागी माँ जमनीबाई धन्गड(या धनगड या धन्गाड Dhangad ) है जो सालों तक इस बात से ही अनजान थी कि उसकी बेटियाँ कहाँ हैं, जीवित हैं या नहीं, कैसी हैं आदि। अब जब जानती है कि कहाँ हैं और कैसी दिखती हैं तो भी उनसे मिलने को तड़प रही है।(मुम्बई मिरर २३.०२.२०११ )

किसी का दर्द महसूस करने के लिए क्या कोई विशेष उपकरण चाहिए होता है या फिर एक और हृदय या शरीर का अंग? नहीं, बिल्कुल नहीं। भुक्तभोगी जितना तो नहीं, किन्तु पल भर को भी यदि हम किसी व्यक्ति के स्थान पर स्वयं को रखकर कल्पना भर करें तो उस व्यक्ति की पीड़ा का एक अच्छा खासा अनुमान तो हम लगा ही पाते हैं, उसकी चीस के एक भाग को तो हम भी महसूस कर पाते हैं। कल्पना में तलवार की धार की जगह सूई की नोक को तो महसूस कर ही पाते हैं। तो फिर यह कैसे हो सकता है कि भारत में प्रति घंटे सात बच्चे खो जाते हैं, (हिन्दुस्तान टाइम्स, मुम्बई, २१.०२.२०११ ) सात बच्चे अपने माता पिता भाई बहन के लिए बिलखते होंगे और सात माता, सात पिता, सात नानियाँ, सात दादियाँ, सात नाना, सात दादा और न जाने कितने भाई व कितनी बहन उस खोए बच्चे के लिए बिलखती होंगी।

कैसा दर्द होगा यह? इसमें मृत्यु की अन्तिमता नहीं होगी, दुख होगा, भय होगा, अवसाद होगा, पल पल जागती आशा होगी, पल पल अन्धकार में छाई गहरी धुँध से बुरी तरह से घिरने के आभास सी निराशा होगी, मुँह तक जाता हर निवाला यह प्रश्न करता होगा कि बच्चे के मुँह में भी कुछ गया होगा या नहीं। हर मुस्कान चेहरे पर आने के लिए मन से क्षमा माँगती होगी, हर हँसी अपराध बोध में खत्म होती होगी। यदि कोई घंटा बिना उसकी याद किए बीत जाए तो मन लज्जित होता होगा अपने को कोसता होगा। हर बच्चे में अपना बच्चा दिखता होगा। हर भीड़ में, भिखारी में, ढाबे में बर्तन धोते बच्चे में, वैश्या में, आँखें अपने उस बच्चे को ढूँढती होंगी, जो सामने आ भी जाए तो शायद पहचान न पाएँ।

कैसा होता होगा यह दर्द वाला प्रश्न क्या देश के कर्णधार, भाग्य विधाता स्वयं से नहीं पूछते होंगे? पूछते होंगे तो क्या मेरी कल्पना जैसे उत्तर उनका मन नहीं देता होगा? देता होगा तो वे क्या कुछ ऐसा नहीं सोच, कर पाते होंगे जिससे खोए बच्चे वापिस मिल जाएँ? क्या कोई समाधान इतना असम्भव है? वह भी आज के कम्प्यूटर व इन्टरनेट के युग में?

जमनीबाई धन्गड एक दिहाड़ी मजदूर है। तीस वर्ष पहले उसकी बेटियाँ, पाँच वर्षीय गुलाब व तीन वर्षीय लक्ष्मी वसई से खो गईं। उसने रपट दर्ज कराई। बच्चियाँ न मिलने पर उसने कुछ ऐक्टिविस्ट से सहायता माँगी। उन्हें एक अन्य थाने से पता चला कि बच्चियाँ किसी होम में भेज दी गई थीं। वहाँ से सहायता न मिल पाने पर न्यायालय का द्वार खटखटाया गया। तीन साल बाद पता चला कि बच्चियाँ विदेशियों को बच्चे गोद देने वाली संस्था में भेजी गईं थीं व वे स्वीडन निवासी दम्पत्ति को गोद दे दी गईं थीं। उनका अधिक पता ठिकाना नहीं रखा गया था और उन्हें खोजने में सालों लग गए। २००८ में बच्चियों, जो अब स्त्रियाँ थीं व स्वयं माँए थीं, का पता चला। जमनीबाई को उनके फोटो दिखाए गए।

जमनीबाई अपनी बेटियों से मिलने की आस में जी रही है। किन्तु यदि कभी वे मिलेंगी भी तो वह कैसा मिलन होगा? अलग भाषा, शायद अलग धर्म, अलग संस्कृति, मान्यताएँ, मूल्य, बेटियों को कोई साझा यादें नहीं, माँ को केवल ३० वर्ष पुरानी यादें, किन्तु तीस साल से टीसता दर्द जो कभी पुराना नहीं पड़ता होगा, जिन्हें वह गले लगाएगी वे क्या उसकी गुलाब व लक्ष्मी होंगी? एना में वह क्या गुलाब को ढूँढ पाएगी और सोफ़िया में अपनी लक्ष्मी को? क्या माँ बेटी का रिश्ता केवल खून का होता है? उन साझी यादों का क्या जो किसी भी परिवार को बाँधती हैं?

जमनीबाई के पास स्वीडन जाने के लिए पैसे नहीं हैं। एना व सोफ़िया दो साल पहले अपनी माँ को खोजती भारत आईं थीं व असफल होकर लौट गईं। अब उन्हें मिलाने का उत्तरदायित्व क्या उनका नहीं होना चाहिए जिनका ३० वर्ष पहले उत्तरदायित्व उन्हें खोजने का था, जिन्हें मिलीं और जिन्होंने माँ द्वारा एक थाने पर खोने की रपट लिखाने पर भी बच्चियों की माँ तक उन्हें पहुँचाने का अपना उत्तरदायित्व नहीं निभाया, या फिर उस संस्था का जिसने बच्चियों को विदेशियों को गोद देने से पहले कम से कम यह तो पता किया होता कि कहीं इनके अभिभावक इनको खोज तो नहीं रहे। टी वी भारत में आ चुका था। क्या बच्चों को गोद देने से पहले बार बार उनका चेहरा टी वी पर दिखाया गया था? तीस साल या पचास साल पहले भी इतना तो किया ही जा सकता था कि हर पाए गए बच्चे के फोटो यदि हर थाने में नहीं तो एक केंद्र में उपलब्ध कराए जाते और बच्चे कहाँ भेजे गएँ हैं इसका भी लेखा जोखा रखा जाता। अभिभावक उस केन्द्र में बार बार जाकर जानकारी प्राप्त कर सकते थे।

आज के समय में तो हर खोए या मिले बच्चे का कम्प्यूटर में फोटो व जानकारी रखी जा सकती है जो नेट पर उपलब्ध हो सकती है। शायद हर भीख माँगते बच्चे की भी फोटो व किस क्षेत्र में वह भीख माँगता है की जानकारी रखी जा सकती हैं। बेहतर तो यह होगा कि कौन इन बच्चों से भीख मँगवा रहा है या काम करवा रखा है, यह ही पता कर उन्हें सजा दिलाई जा सकती है।

यह कल्पना करके ही कि मैं भी कोई जमनीबाई हो सकती थी और तीस साल तक अपनी बेटियों से मिले बिना जी सकती थी, हृदय काँप जाता है।

घुघूती बासूती

Wednesday, December 08, 2010

कार्य कारण / कारण और प्रभाव व चूड़ीदार पाजामा........घुघूती बासूती

कब क्या बात किसी को कुछ सामान्य असामान्य या महान करने को उकसा दे कहा नहीं जा सकता। कौन बात या व्यक्ति किस कृत्य या घटना का निमित्त बने कहा नहीं जा सकता।
एक तीन साल की बच्ची अपने द्वारा बनाए एक चित्र से एक १५९ किलो की ३५ वर्षीया अध्यापिका को इतनी जोर से झकझोर सकती है कि वह ९५ किलो वजन ही गँवा बैठे।

हुआ यह कि एक तीन साल की बच्ची ने अपनी नर्सरी कक्षा में एक चित्र बनाया। कोई विशेष चित्र नहीं था। बस चार पतली सी टाँगे व बाँहें थीं, एक सिर था और एक काफी भीमकाय सी काया सन्तरी कपड़े पहने थी। अध्यापिका लिंडा पहले तो चित्र देख मुस्काई फिर बच्ची से पूछा कि क्या यह तुम्हारी माँ है? बच्ची बोली, "नहीं मेरी माँ मोटी नहीं है। यह तुम हो। " अध्यापिका यह सुन रो पड़ी और उसने कुछ न कुछ करने की ठान ली। वह वेट वाइज़ नामक एक समूह जिसका उद्देश्य वजन सही रखना है की सदस्य बन गई। चार वर्ष में लिंडा ९५ किलो वजन कम कर ६४ किलो की हो गई है। लिंडा ने उस सत्य को उजागर करने वाले चित्र को अपने फ्रिज के द्वार पर लगा रखा है ताकि वह कभी भटक न जाए।

(लिंडा इससे पहले भी अपने डॉक्टर से अपने वजन के बारे में बात कर चुकी थी। उसकी मशीन पर उसका वजन देखा ही नहीं जा सकता था क्योंकि वह केवल १२२ किलो तक ही दिखाती थी। डॉक्टर ने कहा था कि वह कुछ वर्ष ही जी सकेगी। शल्य चिकित्सा द्वारा गैस्ट्रिक बैन्ड लगाना ही एक उपाय बचा था। और उसके वजन के साथ शल्य चिकित्सा करना भी खतरनाक था। सो उसने शल्य चिकित्सा नहीं करवाई।)

एक विशेष टेप्स का थोड़ा सा खुलासा सुन पढ़कर ही मैं टीवी के समाचार सुनना बन्दकर, चार चार समाचार पत्रों को अधिक पढ़ना बन्दकर, सरसरी नजर डाल, फिर से सिलाई मशीन, उपन्यास आदि ले बैठना शुरू कर चुकी हूँ। जिसका परिणाम हैं उधड़े, बटन निकले कपड़ों के ढेर का कुछ वैसे ही सिकुड़ जाना जैसे लिंडा का वजन व काया का सिकुड़ना, सालों से रखे नए कपड़े के टुकड़ों का जादुई रूप से वस्त्रों में परिवर्तित होना, जैसे उनका ब्लाउज, सलवार या चूड़ीदार पजामे के रूप में नया जन्म होना।

कहाँ किसी स्त्री का भारतीय मीडिया व उद्योग के दिग्गजों से वार्तालाप होना, कौन बनेगा करोड़पति की तर्ज पर कौन बनेगा यह मंत्री या वह मंत्री तय करना (इन दोनों में कोई अन्तर है क्या?), क्या होगा कल का समाचार, क्या होगा उसका प्रारूप तय करना और कहाँ पेड़ों का कटने से बचना, कपड़ों का सिल जाना, दर्जियों के धंधे पर प्रभाव पड़ने के आसार होना? भला कैसे यह सब सम्बन्धित हो सकते हैं? असम्भव तो लगते हैं किन्तु सम्बन्ध है।


देखिए, ये टेप सुन व उनके विषय में पढ़ने के बाद मैं इस अभियान में जुटी हूँ कि घर में जो चार समाचार पत्र आते हैं वे सारे नहीं तो आधे तो बन्द किए जाएँ। एक रविवार मैंने चारों का वजन लिया था। मेरी रसोई की मशीन जो दस ग्राम तक का वजन सही दे देती है ने उनका वजन ८५० ग्राम बताया था। अब यदि सप्ताह के अन्य दिन इतना वजन न भी हो तो भी ५५० ग्राम तो हो ही जाता है। जी हाँ, मैं अभी नापकर आई हूँ। देखिए यदि हम सब समाचार पत्र लेना बन्द कर दें तो कितना कागज बचेगा और फलस्वरूप पेड़ भी। यदि समाचार पत्र नहीं होंगे तो.... कोई व्यक्ति समाचार बनाने वालों पर प्रभाव कैसे डालेगा? नहीं डाल पाएगा तो शायद कौन बनेगा .....मंत्री भी न निर्धारित कर पाए या कर पाने का प्रयास न करे। शायद कुछ कम घोटाले हों।


यदि समाचार पत्र पढ़ना बन्द करूँगी तो अपने समय के साथ कुछ तो करना पड़ेगा। शायद कपड़े सिलना शुरू कर दूँ, सो दर्जियों की रोजी रोटी पर प्रभाव पड़ेगा। शायद फिर से उपन्यास पढ़ना शुरू कर दूँ तो लेखकों पर प्रभाव पड़ेगा। यदि सोचूँ कि मनघड़न्त समाचार सुनने से बेहतर है कि मनघड़न्त कहानियाँ ही टी वी पर देखूँ तो शायद फिर से सिनेमा देखना शुरू कर दूँ। या फिर मैं स्वयं मनघड़न्त कहानियाँ लिखना शुरू कर दूँ!

यदि मेरी तरह ही कुछ और लोगों पर भी ऐसा ही प्रभाव पड़ा हो तो शायद प्रकृति व अर्थव्यवस्था पर भी कुछ प्रभाव पड़े। उस बच्ची को ही कहाँ पता था कि वह अपनी अध्यापिका लिंडा को जीवन दान दे रही है और साथ में ही जीने लायक जीवन दे रही है। टेप वाली स्त्री को क्या पता है या जानने में क्या रुचि होगी कि वह कुछ पेड़ बचाने व सलवार, पजामे सिलने का निमित्त बन रही है। और पजामा मेरे वर्षों से सोए हुए अंग्रेजी ब्लॉग को जगाने का निमित्त! हाँ, हाँ, समय हो तो मेरा पजामा ब्लॉग, नहीं, नहीं, अंग्रेजी ब्लॉग भी देख आइए। जी, लिंक भी दे रही हूँ.. चूड़ीदार पाजामाज़!

घुघूती बासूती

Tuesday, December 07, 2010

कि दिल अभी भरा नहीं!

कार्ला ब्रूनी व सार्कोज़ी फतेहपुर सीकरी गए और कहा जा रहा है कि वहाँ उन्होंने पुत्र के लिए प्रार्थना भी की। पहले विवाह से एक का एक पुत्र व दूसरे के तीन पुत्र हैं किन्तु पुत्रों से भी कभी मन भरता है? सो उन्होंने भी एक 'हमारे' पुत्र की माँग ऊपर वाले से कर ली।

यह बात चाहे यह सिद्ध करे कि फ्रान्स व भारत में बहुत साम्य है या हमारी व उनकी जीवन से अपेक्षाएँ एक सी हैं या नहीं, बस एक बात तो सिद्ध हो जाती है कि यदि समाचार सच है तो मेरी सविताबेन कामवाली और इन फ्रान्सीसी बी में कोई विशेष अन्तर नहीं है।

पाँच छः बच्चों की माँ सविताबेन जब फिर से गर्भवती हुई तो मैंने उससे पूछा कि बार बार (लगभग हर साल) माँ बनने से उसके स्वास्थ्य, परिवार के स्वास्थ्य व आर्थिक स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है, बच्चियों को भी काम करना पड़ता है तो क्या रुक जाना बेहतर नहीं? सविताबेन ने कहा कि उसे एक बेटा चाहिए सो वह कोशिश करे जा रही है। मैंने जब कहा कि बेटा तो तुम्हारा है। वह बोली कि एक ही है, एक तो और तो चाहिए ही क्योंकि अभी दिल भरा नहीं है।

बहुत सम्भव है कि राष्ट्रपति व उनकी पत्नी को जब अकबर वाला किस्सा सुनाया गया हो तो मजाक में या यूँ ही पति या पत्नी या दोनों ने कहा हो कि उन्हें भी अकबर की तरह संतान चाहिए या शायद पुत्र ही कहा हो। किन्तु सुनने वाले को लगा हो कि वाह देखो ये भी हमारी तरह पुत्र की चाहत रखते हैं। सो सब समाचारपत्र इसकी चर्चा कर रहे हैं।

कल शायद जब कोई दम्पत्ति केवल पुत्री या पुत्रियों से सन्तुष्टि की बात करेगा तो घर के बड़े कह सकेंगे कि फ्रान्स के राष्ट्रपति तक का मन तीन पुत्र पाकर भी पुत्रों से नहीं भरा तो तुम, किस खेत की मूली(या गाजर?) हो?

घुघूती बासूती

Wednesday, November 03, 2010

मेरी बिटिया की बाई की बाई

छोटी बिटिया की महरी बहुत कुशल है। एक्स्पर्ट या निपुण की कोटि में आती है। दो साल की नौकरी में वह 600 रुपये से 3000 रुपये की पगार व एक बच्चे की 800 रुपये प्रति माह की फ़ीस +पुस्तकें + वर्दी आदि पर पहुँच गयी है। उसका काम इतना अच्छा है कि बिटिया उसे झाड़ू पोछे व बर्तन साफ़ करने से शुरू कर घर की केयरटेकर तक ले गयी। हर कुछ महीने में उसकी पगार बढ़ती गयी और वह कुछ नयी जिम्मेदारी सम्भालती गयी। अब तो यह हाल है कि वह कहती है कि अब मेरी पगार मत बढ़ाना क्योंकि अब आपके घर में मेरे करने लायक और कोई नया काम नहीं बचा है।

बिटिया उसे घर की चाभी देकर जाती है। जब काम से घर लौट कर आती है तो चमचमाता, साफ़ सुथरा घर मिलता है। ऐसा लगता है जैसे उसके जाने के बाद किसी ने जादू से उसका घर चमका दिया हो।

पति द्वारा सताई गयी व छोड़ी गयी सरस्वती को आज इतना खुश व सफल देख बिटिया व मेरा मन बहुत खुश हो जाता है। पिछले साल ही तो जब उसे एक दुर्घटना में चोट लगी थी तो हमने उसकी सेवा की थी। छोटी सी चोट ऐसी बिगड़ी कि उसे औपरेशन कराना पड़ा। हाँ, उसने 800 रुपये देकर महरी रख ली थी।

अब जबकि वह ठीक हो चुकी है तब भी वह उस महरी को निकाल नहीं पायी है। कहती है कि उसे वह निकाल नहीं सकती, कि वह बुढ़िया है, कि उसे उसके बच्चों से मोह हो गया है। कि करने दो उसे भी काम ना! कि आप लोग मुझे इतना देते हो। कि इतना पाने का तो मैने स्वप्न भी कभी नहीं देखा था। अब मैं जितने भी नये घर पकड़ती हूँ केयरटेकर कहकर ही पकड़ती हूँ ना कि महरी कहकर और मेरी कमाई इतनी होती है कि मैं बहुत खुश हूँ।

बिटिया के घर का पुराना सोफ़ा,(उसका सामान कितना पुराना हो सकता है? उसकी उम्र ही क्या हुयी है?) लगभग सारा पुराना फ़र्नीचर उसके ही घर में है। ढेरों बर्तन आदि सब उसके ही घर पहुँचते हैं। किन्तु मुझे जो बात सबसे अधिक मोहित करती है वह है उसके पास भी महरी का होना।

कया बाई की भी बाई होना उन्नति है? जो भी हो मुझे प्रगति लगती है।

घुघूती बासूती

Tuesday, October 19, 2010

पिछले लेख से आगे...... एक कटु सत्य!...........................घुघूती बासूती

मेरे पिछले लेख पर मुझे बहुत सारी टिप्पणियाँ मिलीं। बहुत से मित्रों को लगा कि आज के युग में हमारी महरी, महाराज, धोबी आदि किसी भी बड़ी दुकान, मॉल में जाकर सामान खरीद सकते हैं। सही है, उन्हें कोई रोक भी नहीं सकता। उन्हें हर उस दुकान पर जाना चाहिए, जहाँ मूल्य के अनुसार बढ़िया से बढ़िया सामान मिले, या कहिए पैसा वसूल हो। इतनी मेहनत करने के बाद वे भी क्यों न वातानुकूलित मॉल में जाकर खरीददारी के साथ साथ ठंडक का भी आनन्द उठाएँ?

शायद कोई कानून उन्हें कहीं भी जाने से रोकता न हो, किन्तु क्या हमारे मॉल, होटल, रेस्टॉरन्ट, हाउसिंग सोसायटी आदि के नाम ही उन्हें पराए, उच्चारण व याद रखने में कठिन या कहिए असम्भव नहीं लगेंगे? क्या ऐसे नाम जिन्हें कोई एक वर्ग उच्चारित ही न कर सके, उस वर्ग को आमन्त्रित करते हुए लगेंगे? ये मॉल्स, होटल, रस्टॉरन्ट, हाउसिंग सोसायटीज़ क्या ऐसे नाम रखकर उस वर्ग को बाहर रखने का यत्न नहीं कर रहे हैं, जो न इन नामों को समझ पाते हों, न जिन्हें इन नामों में से किसी अपनेपन, अपनी भाषा या संस्कृति का बोध होता हो , जिन्हें ये लोग न याद रख पाते हों, न उच्चारित कर पाते हों? ये नाम रखने के पीछे की मानसिकता शायद यही है कि ये आज के भारत के आभिजात्य वर्ग के लिए बनी हैं, या कम से कम अंग्रेजी जानने वालों के लिए बनी हैं। यह मॉल में लगने वाले ॉ का उच्चारण भी तो बिल्कुल नया है।

कोई व्यक्ति अपनी मातृभाषा या अन्य किसी भारतीय भाषा में महारत रखता हो, चाहे उसमें लिखता भी हो, कितना भी पढ़ता क्यों न हो वह यदि अंग्रेजी नहीं जानता तो इन दुकानों के नाम भी नहीं पढ़ पाएगा, वहाँ किस वस्तु का क्या मूल्य है, किसपर कितनी छूट मिल रही है, क्या नई स्कीम आई है, किस डिब्बे के अन्दर क्या माल है यह सब नहीं जान पाएगा। व्यावहारिक रूप से वह अनपढ़ ही है। उससे जब पूछोगे कि किस दुकान में गए थे तो वह प्रायः सही नाम नहीं बता पाएगा। कुछ मिलता जुलता नाम ही बोलकर काम चलाएगा।

मैंने गूगल में एक दो जगह जैसे http://www.mumbai77.com/pages/shopping/malls/ जाकर नामों की लिस्ट बनाई। (नाम देते देते रुक गई हूँ, क्योकि यह न जाने अपराध ही न हो।)
उनमें लगभग २५ नाम शुद्ध विदेशी हैं। तीन मिले जुले और ५ ही चाहे मॉल तो लगाते हैं अपने नाम के साथ किन्तु नाम भारतीय हैं। वे किसी भी भारतीय को याद रखने या उच्चारण करने सरल लगेगें। एक नाम को अलग अलग लोग अलग उच्चारित करते हैं जैसे डिमान्ड, डीमैट, डिम आर्ट व और भी न जाने क्या कहा जाता है। किन्तु महरी, ड्राइवर आदि को सही उच्चारण करते अभी तक नहीं सुना है। मजे की बात तो यह है कि मैं स्वयं उसका नाम भूल जाती हूँ और अपने ड्राइवर से जो नाम सुनती हूँ वही मुझे याद रहता है यानि डीमैट! सोचती हूँ कि डिम आर्ट ही यद रख पाती तो अक्षरों को जरा सरका कर नाम तो ठीक बनता।

ऐसा नहीं है कि ये लोग अनपढ हैं किन्तु अपनी भाषा में पढवा कर इनके माता पिता ने अपना पैसा और इनका समय ही बर्बाद करवाया। यदि कई वर्ष स्कूल जाकर भी आप दुकानों के नाम, सामान के नाम, उपयोग करने की विधि आदि नहीं पढ़ सकते तो क्या लाभ? क्या इन लोगों ने ही मातृभाषा प्रेम को ढोने का जिम्मा लिया है? क्यों नहीं इस प्रेम को अमीरो, नेताओं, पूँजीपतियों के मजबूत कंधे ढोते? या फ़िर भाषा के लिए मरने मारने को उतारू होने वाले लोग? उनके बच्चे तो सदा या तो विदेशों में पढ़ते हैं या फ़िर शहर के सबसे बढिया अंग्रेजी स्कूल में।

इस विषय पर फ़िर कभी। आज तो मैं केवल यह बात कर रही हूँ कि जब आप मेरे स्वागत के लिए बिछे पाँवपोछ से लेकर ऊपर टंगे बोर्ड, नाम पट्टी तक मुझे समझ न आने वाली भाषा में लिखते हैं तो आप बिना मुँह खोले मुझे यही कह रहे हैं कि ’जा फ़ूट, यह जगह तेरे जैसे के लिए नहीं है’। ’यह शहर, यह प्रदेश तेरा नहीं है’ । माँ को तो यही लगता है, यह बात और है कि बचपन में उन्होंने घर घर जाकर बेटियों को स्कूल भेजने का यत्न किया था। कुछ समय पहले ही तो मैंने उनके मुख से वह गीत सुना था जो माता पिता से बेटियों को पढने भेजने का संदेश देता था। या कि उन्होंने भी बचपन में ही स्वतन्त्रता के लिए निकलने वाले जलूसों में भाग लिया, पुलिस के डंडे खाए। या कि यह कि उन्होंने ७५ साल पहले १२ साल की उम्र में( माँ ने बारह साल में ही शायद इतना उत्पात मचाया था कि सरकारी नौकरी वाले नानाजी ने उन्हें गाँव भेजने में ही अपनी नौकरी व माँ की सुरक्षा समझी होगी) अपने गाँव में घूँघट नहीं करूँगी का विद्रोही एलान किया था और इसे निभाया भी था। या यह कि उन्होंने जहाँ भी पिताजी की बदली हुई उस जगह के पुस्तकालय की पूरी हिन्दी पुस्तकें( जो कि सौ पचास नही, कई अलमारी भर होती थीं) पढ डाली। या यह कि हिन्दी में लिखी पुस्तकें या किसी अन्य भाषा के हिन्दी अनुवाद वाली पुस्तकें खरीदने के लिए हर साल जब सूची बननी होती थी तो माँ से सलाह ली जाती थी। या यह कि आज भी मैं माँ के लिए कुछ और नहीं केवल पुस्तकें खरीदती हूँ। या यह कि पिताजी के सेवा निवृत होने पर जब वे महाराष्ट्र आए तो माँ ने स्थानीय व सबसे ताजा समाचार पढने के लिए मराठी समाचार पत्र पढने शुरु कर दिए। किन्तु व्यावहारिक दृष्टि से वे अनपढ हैं। जब भारत परतन्त्र था तब उन्हें ऐसा कभी नहीं लगा, किन्तु हमारी स्वतन्त्रता जितनी पुरानी होती जा रही है उतना ही यह सच उनके सामने आ रहा है। और यही कटु सत्य भी है।

घुघूती बासूती

पुनश्च:

और विडम्बना यह है कि यदि हम इस बडी भारतीय आबादी के लिए स्थानीय या भारतीय भाषाओं के उपयोग की बात करते हैं तो हम अपने बच्चों को ठीक उनकी स्थिति में डाल रहे हैं क्योंकि अब हमारे बच्चे भारतीय भाषाओं को ठीक से पढ नहीं पाते, और दैनिक बातों से अधिक समझ नहीं पाते। इसे जो चाहे कहें किन्तु बहुत से लोगों के लिए यह भी सत्य है।

घुघूती बासूती

Wednesday, October 13, 2010

क्या आप चाहेंगी कि आप, आपकी महरी, महाराज, धोबी, सेवक, बॉस सब एक ही दुकान में टकराएँ?......... ...................घुघूती बासूती

नहीं? तो क्या यह चाहेंगी कि केवल आप ही बढ़िया, उत्कृष्ट ब्रान्डेड सामान खरीदें? क्या सच में किसी सामान का असली मूल्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह सामान हमसे ऊँचे वर्ग के लोग उपयोग करते हैं या निचले वर्ग के ? या उसकी अनिवार्यता इस बात पर निर्भर करती है कि हमारे वर्ग के अधिकतर लोगों के पास वह वस्तु है?

क्या किसी रैस्टॉरेन्ट का खाना इस बात से कम या अधिक स्वादिष्ट हो जाता है कि वहाँ खाना कोई जानी मानी हस्ती खा रही है या कोई ऐरा गैरा? यदि आपके सामने वाले मेज पर कोई अभिनेता, क्रिकेटर या कोई जाने माने उद्योगपति बैठे हों तो क्या खाने का स्वाद बेहतर हो जाता है और यदि पड़ोस के होटल का कोई अदना कर्मचारी आकर बैठ जाए तो स्वाद कम हो जाता है?

उत्तर देना कठिन है। बुद्धि कुछ कहती है किन्तु हमारी व्यवहारिकता, जन्म से सीखे हुए संस्कार कुछ और कहते हैं। लोकतन्त्र की बातें नागरिक शास्त्र की पतली पुस्तक में ही दफ़न होकर रह गई है। जो हमारे साथ दशकों से परछाई की तरह चले आ रहे हैं वे हैं संस्कार! हाँ, वे ही संस्कार जिनकी दुहाई यहाँ वहाँ, जब तब दी जाती है। सच में क्या आप मेरी कुछ महीनों पहले तक की पड़ोसिन की तरह कुक के साथ सिनेमा देखने जा सकती हैं?

एक दिन कुक ने बताया कि कल वह और मेरी पड़ोसिन शाहरुख खान की कोई बहुचर्चित फिल्म देखने गई थीं। वे तो मुझे बुलाने को भी कह रही थीं किन्तु कुक ने उन्हें बताया कि मैं तबीयत खराब होने के कारण शायद नहीं ही जाऊँगी सो मुझे नहीं बुलाया। यदि वे मुझे बुलातीं तो क्या मैं जाती? क्या मैं आज तक कभी अपनी किसी महरी, कुक आदि के साथ रिक्शे पर बैठ कहीं गई हूँ? क्या वह और मैं एक सोफे पर बैठ साथ साथ टी वी देखेंगी? क्या मिलकर चाय आदि पिएँगी? नहीं ? तो फिर यह सब समानता के पाठ जो हमने पढ़े व पढ़ाए उनका क्या?

यदि मुम्बई में रहने से यह सब सम्भव है तो मुम्बई धन्य है। मुम्बई मेरा भी उद्धार करो।

बात जो शुरु की थी वह इसलिए कि बिटिया फोन पर बता रही थी कि उसकी महरी लक्ष्मी जो बहुत साफ सुथरा काम करती है, जिसके पास बिटिया के घर की चाभी रहती है, जिसकी पगार बढ़ाते बढ़ाते वह तीन हजार तक ले गई है, जिसके एक बच्चे के स्कूल की फीस वह देती है, जिसके पैरों पर मोटर सायकिल की टक्कर के बाद चोट लगने पर हमने कुर्सी पर बैठाकर स्वयं जमीन पर बैठ साफ सफाई व पट्टी की थी, फिर जवाँई जिसे अपनी कार में बैठाकर उसके घर छोड़ आया था, हाँ वही लक्ष्मी एक नया प्रैशर कुकर खरीदकर अपने घर में खाना पका रही थी और प्रैशर कुकर फट गया। भाग्य से कोई चोट आदि नहीं आई। बिटिया ने ब्रान्ड पूछी तो कोई अनसुनी सी ब्रान्ड थी। बिटिया के यह पूछने पर कि कोई जानी पहचानी ब्रान्ड का प्रैशर कुकर क्यों नहीं खरीदा था उसने कहा कि जिन दुकानों से हम सामान खरीदते हैं वे ऐसी ब्रान्ड नहीं रखते और जैसी दुकानों पर आप जाती हैं वैसी दुकानों में हम कभी गए नहीं ना ही जा सकते हैं।

तबसे वह सोच रही है और उसकी बात सुनने के बाद से मैं सोच रही हूँ कि क्या जिन मॉल्स, दुकानों में हम जाते हैं वहाँ महरी का स्वागत होगा? क्या हम भी यह पसन्द करेंगे कि वह और हम एक ही जगह खरीददारी करें? ऐसा नहीं है कि वह पैसा नहीं खर्च करती। हमसे एक दो सौ रुपए कम का ही जूता वह भी अपने बच्चे को दिलाती है और हमारा ब्रान्डेड सालों साल चलता है और उसके बच्चे का छह महीने भी नहीं। सो वास्तव में उसका जूता हमारे जूते से, उसका प्रैशर कुकर हमारे से अधिक मँहगा होता है। क्या ऐसे अधिक खर्च कर घटिया वस्तु खरीदकर वह समाज में अपने वर्ग का कर/ कर्ज चुका रही है?

मुझे मुम्बई में आजकल खबरों में चर्चित लेखक रोहिन्गटन मिस्त्री के उपन्यास 'सच ए फाइन बैलेन्स' की याद आती है। एक ऐसी पुस्तक जो पत्थर के हृदय को भी निचोड़ दे। जिसमें एक परिवार व विशेषकर एक चाचा भतीजे के सारे कष्टों का कारण उनका निकम्मापन नहीं था, न ही उनकी मन्द बुद्धि थी। उनकी समस्या का कारण उनकी उन्नति करने की चाहत थी। उन्नति की चाहत जो उन्हें चमड़े की साफ सफाई करने से कपड़े सिलने तक ले गई और उसके फल स्वरूप किसी शक्तिशाली वर्ग की नाराजगी से बर्बादी तक।

मैंने कहाँ शुरु किया था और कहाँ अन्त करूँ समझ नहीं पा रही। किन्तु जिस विषय पर मैं बात करना चाह रही हूँ उस विषय के अन्तर्गत आने वाली बातों, समस्याओं का भी तो न कोई प्रारम्भ है और न कोई अन्त। वे तो द्रोपदी की साड़ी की तरह अनन्त हैं। इनपर तो बातें होती रहेंगी। बार बार हमें साहस कर अपने अन्दर झाँकना होगा और सोचना होगा कि क्या कुछ जीवन मूल्य केवल नागरिक शास्त्र की पतली पुस्तक में ही पाए जाने के लिए होते हैं? क्या हम भला करना तो पसन्द करते हैं किन्तु केवल दान की तरह न कि अन्य के अधिकार की तरह! हम वह सब ही करना चाहते हैं जिससे हम अपनी ही दृष्टि में ऊपर उठ जाएँ, वह सब नहीं जो किसी अन्य वर्ग को हमसे ऐसे व्यवहार की अपेक्षा करना सिखाए। अभी तो मैं द्रोपदी की साड़ी के पहले कुछ अँगुल में प्रिन्ट में लिखे सन्देश को पढ़ने की चेष्टा कर रही हूँ। पूरी साड़ी पर लिखे सन्देश तो शायद हमारी आने वाली पीढ़ियाँ भी नहीं पढ़ पाएँगी।

तब तक कोशिश करने के लिए ही तो कोई मुझे ब्राउनी पॉइन्ट दे!
(हा, क्या यह चिन्तन भी अपने स्वार्थ के लिए?)

घुघूती बासूती

नोटः
1. Brownie point= an imaginary mark given for an attempt to please.( to try to do the right thing?)
2.स्वास्थ्य की समस्या सुलझने तक कुछ पुराने चिन्तन/musings या ब्लाह ब्लाह पोस्ट करने की चेष्टा करूँगी। इतने लम्बे अवकाश से ब्लॉग जगत से नाम ही न काट दिया जाए!
घुघूती बासूती

Thursday, July 22, 2010

चाहें तो कई युग लग सकते हैं चाहें तो कुछ पल भर ही!

रश्मि रविजा का लेख ' कितने युग और लगेंगे इस मानसिकता को बदलने में??' पढ़ा। उन्होंने लेख में बेटी के विवाह के समय वर पक्ष द्वारा उसके माता पिता का घोर अनादर किए जाने की घटना बताई है। यह होता रहता है। समाज में ऐसे व्यवहार को बहुत सही न भी कहा जाए तो भी उसे सहा जाता है। वह व्यवहार वर पक्ष से कुछ कुछ अपेक्षित भी होता है। ठीक वैसे ही जैसे कुछ समय पहले तक पति द्वारा पत्नी को डाँटा जाना, पत्नी का पति से कुछ भी ( खाना खाने पकाने, कपड़े धोने, घर की सफाई आदि से कुछ बड़ा काम ) करने से पहले अनुमति लेना, पति का घर के काम में हाथ न बँटाना आदि सब अपेक्षित व्यवहार होते थे। यदि कोई इससे हटकर काम करता था तो उस सामान्य व्यवहार को महान की श्रेणी में डाल दिया जाता था। यदि कोई पति पत्नी को डाँटता नहीं था, उसे अपने मन का करने देता था,( तो विचित्र क्या हुआ? क्यों भाई, प्रकृति ने मन और दिया ही क्यों था उसे?) घर के काम कर देता था, बच्चे की नैपी बदल देता था, रोते बच्चे को चुप करा देता था तो स्त्री को ऐसा लगता था जैसे पिछले जन्म में उसने ना जाने क्या पु्ण्य किए थे कि उसे ऐसा पति मिला। वह यह नहीं सोचती थी कि ऐसा ही पति मिलना उसका अधिकार है। जिसका पति यह सब नहीं करता वह दुर्भाग्यवान है, उसे पति के व्यवहार में बदलाव की माँग व कोशिश करनी चाहिए।

हाँ, तो अब आते हैं रश्मि द्वारा बताई घटना पर। वे बता रही थीं को २५० की बजाए बरात में ५०० लोग आ गए थे सो खाना कम पड़ गया। अब एक दिन यदि ना खाएँ, कम खाएँ, देर से खा लें तो वर पक्ष की नाक न कट जाएगी? अब कुछ लोगों की नाक कटती भी क्या है, टपक पड़ती है। कटी तो पहले से होती है वह तो वे गोंद से चिपकाए घूम रहे होते हैं, सो कभी भी गिर सकती है। ऐसे ही पहले से कटी नाक वाले लोगों को अपनी नाक का अधिक ही ध्यान रहता है। अब आपके शरीर का जो अंग ठीक ठाक काम कर रहा होता है आपको उसके होने का अहसास ही कहाँ होता है? जो अंग दर्द कर रहा हो, बीमार हो उस ही का आभास हर पल रहता है। सो उनकी नाक की समस्या तो समझ आ सकती है।

२५० की जगह ५०० लोग इसलिए आए होंगे क्योंकि कन्या पक्ष वर पक्ष के शहर में आकर विवाह करने को मान गए होंगे। अब जब पैसा किसी और की जेब से जा रहा हो तो सगे सम्बन्धी ही क्या, दोस्त के दोस्त, दोस्त के दोस्त का चाचा, जीजा, भतीजा सबको सपरिवार खुला निमन्त्रण रहा होगा। शायद वर पक्ष के घर के माली, धोबी, महरी से लेकर उनका पान वाला ,रद्दी वाला सभी जीमने पहुँचे हों। अपनी दरियादिली और पौरुष भी दिखाने का ऐसा सुअवसर फिर कब आने वाला था? लड़की वालों को जो मजा उन्होंने छकाया उसके जितने अधिक दर्शक हों उतना ही बेहतर। यह क्या कि आप कुश्ती लड़ें और दूसरे को धूल भी चटवा दें और कोई ताली बजाने वाला भी न हो? यदि यही अपने पैसे से बारात लेकर दूसरे शहर जाना होता तो शायद एक बस भर लोग ही जाते। (हाँ जानती हूँ कि शायद बस का पैसा भी लड़की वालों को देना होता होगा! क्यों नहीं? लड़के के जन्म के समय के हस्पताल के बिल भी सुरक्षित रखने चाहिए तो वे भी लड़की वालों को पकड़ाए जा सकते हैं!) किन्तु फिर भी जाने में मेहनत लगती, एक छुट्टी तो लेनी ही पड़ती, अपना काम छोड़कर आना पड़ता तो मनुष्य जरा सोचकर ही आता।

अब आते हैं इस बात पर कि इतना अपमान सहकर भी कन्या पक्ष चुप क्यों रह जाता है। इसके कई कारण हैं। कुछ तो सामाजिक हैं।

शुरू से हमें यह सिखाया जाता है कि वर पक्ष महान है व कन्या पक्ष याचक जबकि कन्यादान भी वही लेते हैं। सो याचक कौन है यह समझना कोई कठिन नहीं है।

इसके अतिरिक्त यह भी कारण है कि बेटी को इसी विपक्ष के बीच जाकर रहना है वह भी बिना तलवार या ढाल! सो उनसे पंगा लेकर उन्हीं के घर असहाय बिटिया को कैसे भेजा जा सकता है? सो बेहतर है कि मक्खन लगाए जाओ और मनाए जाओ कि बिटिया सुरक्षित रहेगी।

तीसरा और महत्वपूर्ण कारण है इज्जत! यदि बारात लौट गई तो इज्जत भी चली जाएगी।

चौथा और बहुत ही बुनियादी कारण है इतने बड़े खर्चे की बरबादी। सालों से बचाया पैसा, कभी कभी उधार लिया पैसा, कभी भविष्य निधि से निकाला पैसा इस विवाह के यज्ञ में भेंट चढ़ा होता है। अब यह सब बरबाद कैसे होने दिया जाए? सो जैसे भी हो खुशामद कर बिटिया का विवाह सम्पन्न करा उसे विदा किया जाए। यह सोचे बिना कि जो लोग विवाह मंडप पर ऐसे नाटक कर रहे हैं वे लोग कैसा परिवार सिद्ध होंगे। क्योंकि इतना पैसा जुए में लग चुका होता है सो और भी फेंका जाता है। बाज़ार के इस मूलमंत्र को भूलकर कि कभी कभी हमें अपनी कम से कम हानि करवाकर जो हाथ में आए उसे लेकर बाज़ार से निकल लेना चाहिए। जब जब निवेशक पूरा पैसा वापिस पाने को छटपटाता है तो दलदल में और भी डूबता जाता है। अब जो विवाह हुआ ही पैसे के बल पर है उसमें कन्या पक्ष निवेशक समान तो हुआ ही!दुल्हे के लिए जो पैसा माँगा गया वह लागत तो हुई ही। यह भी एक वित्तीय व्यवहार है, जिसमें पैसे का आदान प्रदान हुआ।

ये ही वे कारण हैं जो ऐसे निर्लज्ज बारातियों को दो लात जमाने से कन्यापक्ष को रोकते हैं। यदि ये कारण दूर कर दिए जाएँ तो कन्या पक्ष भी मानव की तरह आत्मसम्मान वाला व्यवहार करेगा व उसकी अपेक्षा भी करेगा और ऐसा ही व्यवहार पाएगा भी।

विवाह यदि लड़की के ही शहर में हो, यदि वह कम खर्च में सादा हो, यदि पूरे मौहल्ले, कस्बे, शहर को ना बुलाया जाए तो यदि स्थिति बिगड़े, यदि वरपक्ष का व्यवहार बुरा हो जाए तो आराम से उनसे कहा जा सकता है कि नमस्ते आप चलिए। ना तो आपका बहुत बड़ा तमाशा बनेगा, न ही बहुत बड़ी आर्थिक हानि ही होगी।

मैंने भी ऐसे ही एक विवाह के बारे में सुन रखा है। प्रकृति ने एक बड़ा समुद्री तूफान लाकर मुझे उस विवाह को देखने व कन्या पक्ष की तरफ से वहाँ जाकर उस लड़की का,उसके माता पिता का, उनके सगे सम्बन्धियों का अनादर देखने से व अपना भी अनादर होने से बचा दिया। उस तूफान के कारण हम विवाह में नहीं जा पाए। जब उस विवाह के बारे में सोचती हूँ तो यही समझ पाती हूँ कि वे लोग असहाय केवल इसलिए हुए क्योंकि..

१ वे अपने शहर में नहीं लड़के के शहर में थे।

२ उन्होंने इतने लोगों को बुला रखा था कि ऐसे में अपनी इज्जत बचाकर इतने बेशर्म परिवार में भी बेटी का विवाह कर दिया।

३ इतना जबर्दस्त प्रबन्ध किया था कि उसे बर्बाद होने से बचाना ही उचित समझा।

४ वरपक्ष की संख्या भी इतनी अधिक थी वही ५०० जैसी कि उस भीड़ में मनुष्य शायद उचित अनुचित के बारे में सोच भी नहीं सका।

५ जिस विवाह(wedding) की इतनी हाइप हुई हो उसे फ्लॉप शो कैसे होने दिया जाए। यह और बात है कि wedding सफल रही विवाह (marriage)नहीं।

यही यदि रेजिस्टर्ड विवाह हो रहा होता तो शायद कन्या पक्ष को बिल्कुल भी झुकना न पड़ता। संसार का नियम है जो झुके उसे झुकाओ। सो वह लड़की झुकती गई तब तक जब तक विवाह बन्धन का इलास्टिक खिंचते खिंचते टूट नहीं गया। अब न बन्धन है न झुकना केवल कड़वाहट बची है।

प्रायः हम यह सोचते हैं कि प्रेम विवाह व स्त्री का स्वावलम्बी होना हमें इस स्थिति से बचा सकते हैं। वे बचाते भी हैं परन्तु सदा नहीं। क्योंकि ७०० या ८०० की उस भीड़ में स्वावलम्बी स्त्री व उसका प्रेमी भी भीड़ का ही हिस्सा बन भीड़ सा सोचने लगते हैं। और फिर एक बुरी शुरुआत एक बुरे अन्त की ओर उन्हें बहाए ले जाती है। वर के माता पिता एक बार चखी जीत को बार बार आजमाते हैं चाहे ऐसा करने में उनके ही पुत्र का विवाह ही क्यों न टूट जाए। पुत्र ने भी देखा होता है कि जोर जबर्दस्ती के आगे पत्नी व उसका परिवार झुके थे सो उसे उस शक्ति में मजा आने लगा। विवाह के दिन की कड़ुवाहट तो थी ही फिर यह भी पता था कि उसके माता पिता गलत थे और उन्हें सही सिद्ध करने की जिद भी थी। सो अपने माता पिता की हर अनुचित माँग को मनवाना उसके जीवन का उद्देश्य बन गया। सो एक और विवाह टूट गया दिल जो टूटे वे तो टूटे ही।

सादे विवाह इस सबसे हमें बचा सकते हैं। यदि न भी बचाएँ तो कमसे कम नई शुरुआत करना सरल तो कर ही सकते हैं। यह नहीं कि एक विवाह ही परिवार को उजाड़ चुका हो।

घुघूती बासूती

Thursday, December 17, 2009

एलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है?..........घुघूती बासूती

क्या पता क्यों आता था? मैंने तो यह फिल्म देखी नहीं । परन्तु जब जब किसी के गुस्से के बारे में देखती, सुनती, पढ़ती हूँ तो इस फिल्म का नाम याद अवश्य आ जाता है। गुस्सा आना भी समझा जा सकता है किन्तु गुस्से में पगलाना और किसी को जान से मार देना मेरी समझ से परे है। वह भी तब जब बात इतनी छोटी हो कि आम व्यक्ति उस पर ध्यान भी न दे। पता नहीं उनके मस्तिष्क की वायरिंग ही गड़बड़ होती है कि जल्दी ही गरम हो जाता है उनका मस्तिष्क। काश मस्तिष्क में भी कोई फ्यूज़ लगा होता जो ऐसे समय में उड़ जाता और मस्तिष्क ठंडा होने पर जुड़ जाता। न भी जुड़ता तो स्वयं ही भुगतते, किसी अन्य को जान से हाथ तो न धोना पड़ता।

अब यह सड़क पर वाहन चालकों के क्रोध को ही देख लीजिए। रोड रेज़ शब्द है इसके लिए। अपना स्वयं का वाहन है फिर भी इतना क्रोध तो यदि धूप में पैदल चल रहे होते तो पता नहीं हाथ में कुल्हाड़ी या गंडासा या दोनों ही लिए चलते क्या?
मुम्बई हवाई अड्डे के पास के पुल पर १५ दिसम्बर की सुबह एक सैन्ट्रो कार ने एक हौन्डा सिटी कार से आगे निकलने का दुस्साहस किया। हौन्डा सिटी के चालक को यह असह्य लगा। वह तेज गति से सैन्ट्रो के सामने कार ले आया और रास्ता रोक दिया। सैन्ट्रो कार का चालक उतर कर कारण पूछने लगा तो पीछे बैठे व्यक्ति ने उसका कॉलर पकड़ लिया और चालक तेजी से कार चलाने लगा जिससे कुछ मीटर तक वह घिसटता गया कॉलर जब छोड़ा गया तो वह कार के पिछले पहिए के नीचे कुचला गया। हस्पताल में उसकी मृत्यु हो गई।

आप कहेंगे कि जमाना खराब आ गया है, या ये आजकल के युवक बहुत बिगड़ गए हैं। किन्तु यह बात जमाने या युवकों की नहीं है।

कुछ दिन पहले पढ़े एक समाचार ने मुझे यह सोचने को बाध्य किया कि शायद मनुष्य है ही ऐसा। पहले शायद संचार माध्यम कम थे और समाचार लोगों तक पहुँचते नहीं थे किन्तु होता सदा से शायद ऐसा ही रहा है। अब किसी ९८ वर्षीया स्त्री को हम या यह जमाना क्या बिगाड़ेगा?

हुआ यूँ कि अमेरिका के एक वृद्धों के नर्सिंग होम में दो वृद्धाएँ क्रमशः ९८ व १०० वर्ष की, एक ही कमरे में रहती थीं। ९८ वर्षीया को लगता था कि १०० वर्षीया कमरे को हड़पे हुए है, कि उससे बहुत लोग मिलने आते हैं आदि आदि। अब यदि हम किसी से नाराज होना चाहें तो हजार कारण ढूँढ सकते हैं। सो उसने भी ढूँढ लिए होंगे। एक शाम उसने १०० वर्षिया के पलंग के सामने मेज रख दिया ताकि वह शौचालय न जा सके। नर्स ने वह हटाया। अगली सुबह जब नर्स कमरे में आई तो उसने देखा कि १०० वर्षीया के सिर के चारों तरफ एक पॉलीथीन की थैली है और वह मर चुकी है। पहले उसने सोचा कि वृद्धा ने आत्म हत्या कर ली। किन्तु बाद में देखा कि उसके गले पर गला घोंटने के निशान हैं। रात को जब १०० वर्षीया वृद्धा सो गई तो ९८ वर्षीया वृद्धा ने उसके चेहरे पर पॉलीथीन की थैली चढ़ा दी और उसका गला भी दबा दिया था।

अब इस हत्या को क्या कहा जाएगा? यह भी कहा जा सकता है कि उनके बच्चों को उनका ध्यान रखना चाहिए था, उन्हें अपने साथ रखना चाहिए था। किन्तु कैसे बच्चे? उनक संतानें तो अब तक स्वयं ७० वर्ष के आस पास की उम्र की होंगी व उन्हें स्वयं कोई ध्यान रखने वाले की आवश्यकता होगी। मैं तो यही कहूँगी कि मनुष्य शायद एक हिंसक प्राणी ही है और समाज व कानून का भय ही उसे भद्र बनाता है। यह भय खत्म हुआ या उस भय को वह भुला बैठा तो अपने वास्तविक हिंसक स्वरूप में आ जाता है।

घुघूती बासूती

Wednesday, December 16, 2009

मैडम, दूसरा नोट दीजिए।.....घुघूती बासूती

आप दुकान पर जाती हैं। कुछ खरीदती हैं और ५०० रुपए का नोट देती हैं। दुकानदार उसे देखता है, ध्यान से देखता है, आपको देखता है, फिर ध्यान से देखता है। नोट बाहर उजाले में ले जाकर देखता है। गनीमत है कि आपको भी बाहर ले जाकर नहीं देखता। दुकान में किसी और विक्रेता को दिखाता है, सिर हिलाता है और कहता है कि मैडम, दूसरा नोट दीजिए। आप चुपचाप बटुए में से एक और नोट निकाल कर दे देती हैं।

यदि एक ही नोट लेकर गई होतीं तो क्या होता? सामान वापिस दे देतीं। उससे भी बुरा होता यदि किसी रेस्टॉरेन्ट में खाना खा चुकी होतीं और वही इकलौता नोट होता तब क्या करतीं? नोट तो आप स्वयं बनाती नहीं। वे तो आपको अधिकतर बैंक से ही प्राप्त होते हैं। नौकरी पेशा लोगों का तो वेतन बैंक में ही जाता है और आप अधिकतर ए टी एम से नोट प्राप्त करती हैं। बैंक जाकर भी लें तो वहाँ खड़े होकर एक एक नोट को तो ट्यूबलाइट की तरफ करके असली है या नकली देखने से रहीं। और जो नोट किसी एक विक्रेता ने लेने से मना कर दिया उसे भी आप घर पर तो रखेंगी नहीं। वह विक्रेता भी कौन सा नोट पहचानने की मशीन है? वह भी तो शायद नकली नोटों के भय से यूँ ही सहमा हुआ कुछ अधिक ही चौंकन्ना तो नहीं हो रहा? यह सोच आप वह नोट किसी और विक्रेता को पकड़ा ही देंगी। सो ये नकली नोट हमारी अर्थव्यवस्था में प्रवाहित होते रहते होंगे।

स्वयं वित्तमंत्री श्री प्रणव मुखर्जी कहते हैं कि स्थिति चिन्ताजनक है। वे मानते हैं कि ०.००१% नोट जाली हो सकते हैं। याने एक लाख नोटों में से एक जाली होता है। यदि वह आपके पास ही आ जाए तो?
जाली नोटों से हमारी अर्थ व्यवस्था को तो खतरा है ही किन्तु आपके सम्मान को भी काफी खतरा हो सकता है।

क्या यह बेहतर नहीं होगा कि सरकार बैंकों से कहे कि वे नोट पहचानने वाले उपकरणों का उपयोग कर नकली नोट अलग कर दे? बैंक यह हानि उठाना नहीं चाहेंगे किन्तु नकली नोट आम जनता को भी तो नहीं पकड़ाए जा सकते। शायद यह हानि सरकार को ही उठानी होगी।

अब तक नकली दूध, नकली घी तो चल ही रहा था अब नकली नोट भी!

समस्या का कोई समाधान तो होना ही चाहिए।

घुघूती बासूती

Monday, December 14, 2009

ब्रेड बँटवारा और स्त्री /पुरुष विमर्श.......घुघूती बासूती

ब्रेड बँटवारा और स्त्री /पुरुष विमर्श
समीरलाल जी उड़नतश्तरी की तश्तरी पर ब्रेड परोस लाए। और आज की मंहगाई में पेट पर बेल्ट कसते हुए ब्रेड का विभाजन भी बहुत बढ़िया तरीके से किया। सभी सद्भाव बनाए रहने वालों को उत्तर ३ ही सही लगा। परन्तु उसमें एक परेशानी है।

बँटवारा तो बराबर हुआ किन्तु पेट भी क्या बराबर भरा? बिल्कुल नहीं। सो यह तो पुरुष के साथ अन्याय हुआ।(अब मुझसे यह न पूछें कि पुरुष १ टुकड़ा क्यों खाता है और स्त्री आधा ही क्यों? शायद स्त्री को भूख कम लगती है़ शायद वह डायटिंग कर रही है, शायद पति को भूख अधिक लगती है। जो भी हो यह पहले से सुनिश्चित है कि वे कितना खाते हैं। इसपर बहस नहीं हो सकती।)

यदि ब्रेड के एक टुकड़े का भार ३० ग्राम है तो पति रोज ३० ग्राम खाता है और पत्नि १५ ग्राम। अब गरीबी वाले पाँचवे दिन यदि दोनों आधी आधी खाएँगे तो पत्नी को तो उसकी निश्चित खुराक १५ ग्राम मिल जाएगी किन्तु बेचारे पति को तो १५ ग्राम खा आधे पेट ही रहना होगा। सो यह सरासर अन्याय होगा।
सही तरीका होगा कि ब्रेड के तीन टुकड़े किए जाएँ। हर टुकड़ा १० ग्राम का। अब यदि पत्नी एक टुकड़ा जो १० ग्राम का है,खाए तो उसे अपनी दो तिहाई खुराक मिल जाएगी। पति दो टुकड़े खाए तो उसे भी २० ग्राम याने दो तिहाई खुराक मिल जाएगी।

तो देखिए हल सदा वे ही नहीं होते जो सामने दिख रहे होते हैं। हल ढूँढने पर मिल भी जाते हैं और वे लीक से हटकर भी हो सकते हैं। इसीलिए कहते हैं,डब्बे से निकलकर सोचिए। Think out of the box!That may also be called lateral thinking!

वैसे समीरलाल जी का यह स्त्री /पुरुष विमर्शियों में सद्भाव स्थापित करने का तरीका बहुत बढ़िया लगा। क्या ही अच्छा होता कि थोड़ा सा मक्खन व जैम भी ब्रेड पर लगा होता तो विमर्शों में मिठास भी घुल जाता।

घुघूती बासूती

Sunday, December 13, 2009

मित्र की कीमत एक सीताफल!.........घुघूती बासूती

जी हाँ, वही सीताफल जो शरीफ़ा भी कहलाता है। इस शरीफ़े ने चार लड़कों की शराफ़त ही हर ली और एक की तो लगभग जान ही ले ली।

हुआ यूँ कि वनगाँव आश्रमशाला के १२ से १४ साल उम्र के पाँच लड़के जंगल में घूमने गए। वहाँ उन्हें एक सीताफल मिला जिसे तोड़कर वे अपने साथ ले आए। क्योंकि वह कच्चा था सो उसे पकाने के लिए डबका के सन्दूक में रख दिया गया। अगले दिन जब सन्दूक खोला गया तो फल गायब था। डबका पर फल खाने का सन्देह हुआ। सो अन्य चारों ने मिलकर उसकी जमकर पिटाई की। कमर में बाँधे जाने वाले काले धागे से उसका गला भी घोंटने का प्रयास किया। फिर वे अपने बेहोश दोस्त को घसीटकर एक नाले के पास फेंक आए।

दो दिन तक जब डबका अनुपस्थित रहा तो शाला के अधिकारियों ने उसके घर जाकर पता लगाया कि कहीं वह घर तो नहीं पहुँचा। वहाँ न मिलने पर उन्होंने उसे जंगल में ढूँढना शुरू किया। दो दिन से बेहोश पड़ा डबका उन्हें मिल गया। उसकी जान बचा ली गई।

किन्तु क्या हममें इतना क्रोध भर गया है कि एक सीताफल के लिए हम किसी की जान ले सकते हैं? इतना क्रोध आया कहाँ से? क्या इतने छोटे बच्चे भी इतने निर्मम हो सकते हैं? या क्या हम जन्म से ही निर्मम होते हैं और हमारा समाज व परिवार हमें दया और मोह सिखाता है?

क्या हमें बच्चों को अपने क्रोध पर काबू पाना नहीं सिखाना चाहिए? माता पिता से यह अपेक्षा करना वैसा ही है जैसे गूँगे से गाना गाने की। तो स्कूल में अध्यापकों को पहले दो एक साल क्या बच्चों को शिष्टता, व्यवहार, सहयोग, नैतिक मूल्य, क्रोध पर काबू करना, क्रोध को सही दिशा देना, अपनी भावनाओं को दिखाने का सही तरीका आदि ही नहीं सिखाना चाहिए? पढ़ना लिखना दो एक साल बाद भी हो सकता है किन्तु अच्छा मनुष्य बनाने में देर नहीं होनी चाहिए।

किन्तु प्रश्न यह उठता है कि अध्यापकों को क्रोध पर काबू पाना कौन सिखाएगा? सबसे पहले तो उन्हें ही यह सिखाना पड़ेगा। जब मैंने अध्यापन शुरू किया था तो अपने आपसे यह प्रतिज्ञा की थी कि जिस दिन भी मेरा मन हाथ उठाने का होगा उसी दिन मैं पढ़ाना बंद कर दूँगी। मेरे अध्यापन के दिनों में एक अध्यापिका अपने क्रोध के लिए जानी जाती थीं। उन्हें गुस्सा बहुत सरलता से आ जाता था और फिर उनके हाथ में होता था डंडा और विद्यार्थियों का सुकोमल शरीर धुन देती थीं। क्योंकि उनकी उम्र बहुत कम थी सो मैं उन्हें रोक पाती थी। मैंने उनसे निवेदन किया कि जब भी क्रोध आए तो दस तक गिनें। चाहें तो बोलकर ही गिनें। इससे विद्यार्थियों को भी पता चल जाएगा कि उन्हें जोर का गुस्सा आया है। और डंडा तो कभी भी अपने साथ न रखें। यह तरकीब सफल रही।

परन्तु मुझसे भी उम्र में बड़ी एक अध्यापिका थीं जो आराम से अपनी कलाई की सारी चूड़ियाँ उतारती थीं और फिर आराम से बच्चों की ठुकाई करती थीं। जिसका अर्थ तो यह हुआ कि वे सोच समझकर पीटती थीं। एक अन्य अध्यापक तो पिटाई करते समय अपने होशोहवास ही खो बैठते थे।

जब अध्यापक विद्यार्थियों को मारते हैं तो क्या वे उन्हें यह पाठ नहीं पढ़ाते कि गुस्सा आए तो मारो? किसी से कोई गलती हो जाए तो मारो। याने समस्या का समाधान यही है। यही पाठ घर में अभिभावक भी सिखाते हैं। फिर क्या आश्चर्य जो एक शरीफ़े के लिए बच्चे अपनी सारी शराफ़त, सारी दोस्ती ताक पर धर दें और जान लेने पर उतारू हो जाएँ?

घुघूती बासूती

Friday, December 11, 2009

एक बल्ब जलाना चाहते हैं तो दो लाख रुपए का जुगाड़ कर लें ! ....घुघूती बासूती

सन्तोष अहीरे जी ने आठ साल की बड़ी लम्बी मेहनत मशक्कत के बाद किसी तरह एक छुटके से स्टॉल का जुगाड़ किया और लग गए जूतों चप्पलों की मरम्मत कर अपना व अपने परिवार का पेट पालने। परन्तु वे क्या जानते थे कि इस एश्वर्य के लिए बहुत बड़ा बिल भी चुकाना पड़ता है। पहले महीने उनका बिजली का बिल ३० रुपए का था, दूसरे महीने ३७० रुपए और तीसरे महीने! तीसरे महीने बिल था २.०१५ लाख रुपए! मीटर भी स्टॉल के अन्दर है और उसके साथ कोई छेड़छाड़ भी नहीं हुई है।

जब वे बिजली विभाग में गए तो उन्हें बताया गया कि बिल सही है और वे आधा अभी भर दें अन्यथा बिजली काट दी जाएगी। ( टाइम्स औफ इन्डिया ११.१२.२००९)

अब यदि वे इतना बिल भर सकते तो मोची की दुकान लगाने के बदले जूतों का शोरूम न खोल लेते?
मुझे १९९८ में हमारे आन्ध्र प्रदेश के कड़पा जिले में बिताए दिनों की एक घटना याद गई। वहाँ हमारी कामवाली भी एक कमरे के मकान में रहती थी जहाँ उसने समझदारी कर बल्ब नहीं ट्यूबलाइट लगा रखी थी। एक बार उसका बिल भी चार हजार कुछ सौ रुपयों का आया। उसने बिजली विभाग में शिकायत की कि यह गलत है। वह केवल एक ट्यूबलाइट जलाती है। किन्तु उसकी सुनवाई नहीं हुई। बिल न भरने के कारण उसके घर की बिजली काट दी गई।

उन दिनों पिताजी भी हमारे साथ थे व वे मुख्यमंत्री चन्द्र बाबू नायडू के बारे में समाचार पत्रों में पढ़ते रहते थे कि कैसे वे हर शिकायत पर ध्यान देते हैं। सो उन्होंने कामवाली को सलाह दी कि वह एक पत्र उन्हें लिखे। उसने वही किया। और कुछ ही दिनों में बिजली विभाग वाले उसके घर आकर उसके घर की बिजली वापिस चालू कर गए और सही बिल भी दे गए।

कामवाली तो नायडू जी की बहुत बड़ी प्रंशसक बन गई। किन्तु वे अगला चुनाव हार गए। शायद जिन लोगों को उन्होंने सही रास्ते पर आने के लिए खींचा हो, जैसे बिजली विभाग वाले आदि ने उन्हें अपना मत नहीं दिया।

तो यह जादू किया नायडू को लिखे एक पत्र ने। परन्तु क्या कुछ और मुख्यमंत्री भी उनके जैसे तुरन्त कार्यवाही करने वाले हैं? शायद सन्तोष अहीरे जी भी पत्र लिखकर पता लगा सकते हैं। पता नहीं कि साधारण जनता के कष्ट दूर करने का खतरा सब मुख्यमंत्री भी उठाएँगे या नहीं।

घुघूती बासूती

Wednesday, December 09, 2009

प्रिये, सोने से पहले जरा मेरे नकली दाँत संभाल देना!

यह संवाद किसी वृद्ध दंपत्ति के बीच हो तो चलेगा तो क्या दौड़ेगा। किन्तु जब ऐसी स्थिति सुहागरात को आई तो संवाद का चाहे जो हुआ दुल्हन तो भाग ली।

जी हाँ, देखभाल कर चुने गए इस वर से कई बार मिलने पर भी दुल्हन या उसके परिवार वालों को जरा भी शक नहीं हुआ कि दूल्हे मियाँ नकली चीजें फिट करवाकर ही इतने टिप टॉप नजर आ रहे हैं।

सुहागरात को सबसे पहले दूल्हे ने अपना विग उतारकर रखा। दुल्हन ने सब्र कर लिया। सोचा होगा देर सबेर लगभग सभी पति गंजे तो हो ही जाते हैं तो चलो आज ही सही। किन्तु जब उन्होंने अपने नकली दाँत भी निकाल डाले तो उसने वहाँ से भाग निकलने में ही अपनी भलाई समझी।

दुल्हन ने जिस युवा से सगाई की थी वह कुछ क्षणों में ही दंत व बालविहीन प्रौढ़ में परिवर्तित हो जाएगा इसकी तो उसने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी। उसने अपने घर जाकर माँ को पति के इस मैटामोर्फिसिस के बारे में बताया और फिर पुलिस में धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज करा दी।

वैसे दूल्हे की उम्र २७ साल बताई गई थी और जब दूल्हे के पिता की उम्र ५३ साल है तो फिर समझ में नहीं आता कि बेचारा किस विपत्ति का मारा है जो नौबत विग व नकली दाँतों तक आ पहुँची। अब दूल्हा व उसका पिता गिरफ्तार कर लिए गए हैं। शायद ऐसी ही किसी हृदयविदारक स्थिति को देककर कहा गया होगा,'आए थे हरि भजन को ओटन लगे कपास'जैसा कुछ।

सोचने की बात यह भी है कि क्या स्त्रियों को भी भावी पति को बताना होगा कि वे वैक्सिंग करती हैं, भवें ठीक करवाती हैं, ऊपरी होंठ के ऊपर के बाल हटवाती हैं आदि आदि? या फिर क्या अधेड़ उम्र लोग जब विवाह करें तो बताएँ कि उनके गाल, ठोड़ी या ललाट बोटोक्स के इंजेक्शन के दम पर झुर्री विहीन हैं, या बाल डाई किए हुए हैं। आज यह कहना कठिन है कि शरीर का कौन सा हिस्सा स्वाभाविक है और कौन सा सर्जन या ब्यूटी पार्लर ने निखारा है।

एक युवती जो बचपन से कुछ अधिक ही स्वस्थ थी, विवाह से एक साल पहले डायटिंग करने लगी। पति ने छरहरी युवती को देखा और छरहरी युवती से विवाह रचाया। विवाह के बाद छरहरेपन से अधिक स्वाभाविक रूप से भोजन खाना श्रेयस्कर समझ युवती वापिस ८० किलो की हो गई। मुझे तब भी लगता था कि शायद यह धोखा है। बहुत से पुरुष भी कुछ महीनों के लिए जिम जाकर सिक्स पैक वाले बन जाते हैं और विवाह के बाद वापिस तौंदू बन जाते हैं।

मुझे तो लगता है कि जैसे लोग दहेज की सूची बनाकर देते हैं वैसे ही दूल्हा दुल्हन को असली नकली की सूची भी बनाकर एक दूसरे को दे देनी चाहिए और हाँ, साथ में अपने पिछले कुछ सालों का वजन भी लगे हाथ लिखकर दे देना चाहिए।

घुघूती बासूती

Wednesday, November 18, 2009

आओ खेलें खेल

चलिए खेल खेलते हैं। नेट है और खेल हैं। और खेल भी कैसे? चलिए पहले किसी नारी को विभिन्न वस्त्र पहनाते हैं। अरे, इसमें किसी को क्या आपत्ति? वस्त्र पहनाएँगे तो निर्वस्त्र तो करना ही होगा! पहले वस्त्र पहनाएँ, निर्वस्त्र करें, फिर वस्त्र पहनाएँ, अपनी इच्छा के पहनाएँ फिर चलिए आगे चलें।

आगे खेल यह है कि हमें किसी स्त्री का बलात्कार करना है। चलिए यही खेल खेल लेते हैं। सच के जीवन में तो यह करना थोड़ा कठिन है फिर इस आभासी जगत में क्यों ना हाथ आजमाया जाए? चलिए उसका तो बलात्कार कर लिया अब उसकी बेटियों का भी क्यों न किया जाए?

भाई लोगो, अब आपके मनोरंजन के लिए और हाँ, लगे हाथ अभ्यास के लिए भी ऐसे खेल उपलब्ध हैं। सोच क्या रहे हैं, यह अभ्यास ही तो जीवन में काम आएगा। और हाँ, बेटियों को जन्म गलती से भी न दीजिएगा, क्योंकि यही खेल अन्य पुरुष भी खेल रहे हैं, तैयारी कर रहे हैं आपकी बेटी के बलात्कार के लिए।

हाल ही में खबर पढ़ी थी कि नेट पर ऐसे खेल उपलब्ध हैं। एक माँ अपने १५ वर्षीय बेटे में अजीब सा बदलाव देख रही थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि उसे क्या हो रहा है। बदलाव तो वह देख रही थी किन्तु क्या व क्यों पर उँगली नहीं रख पा रही थी। फिर एक दिन उसने उसे नेट पर यह खेल खेलते देखा। पूछने पर उसने बताया कि एक दिन वह नेट पर घूम रहा था जब एक पॉप अप आया कि उसे एक स्त्री को वस्त्र पहनाने हैं। वह आकर्षित हुआ और खेल खेलने लगा और एक के बाद एक सीढ़ी चढ़ते हुए खेल में आगे बढ़ने लगा। स्वाभाविक है कि उसमें बदलाव आए। माँ उसे मनोष्चिकित्सक के पास ले गई।

आज के युग में जब हमारा बच्चा अपने घर में भी सुरक्षित नहीं है अभिभावकों के लिए कम्प्यूटर में अधिक से अधिक सुरक्षा का उपाय करना आवश्यक हो गया है। अब हम उसकी मासूमियत के कारण उसे सुरक्षित नहीं मानकर चल सकते। बाहर का खतरा और खतरनाक लोग अब नेट के जरिए हमारे घरों में प्रवेश कर चुके हैं।

घुघूती बासूती

Thursday, September 06, 2007

ऐसा क्यों होता है ? समाज में स्त्रियों की स्थिति पर कुछ प्रश्न ।

ऐसा क्यों होता है कि स्त्री को जन्म से पहले ही भ्रूण की अवस्था में ही मार दिया जाता है ? ऐसा क्यों होता है कि पुत्र पुत्री से अधिक प्यारा होता है ?
ऐसा क्यों होता है कि यदि साधन सीमित हों तो वे सीमित साधन केवल पुरुष को दिए जाते हैं ?
ऐसा क्यों होता है कि त्याग की अपेक्षा केवल स्त्री से की जाती है ?
ऐसा क्यों होता है कि नालायक बेटे को भी पढ़ने के लिए कहा जाता है और लायक बेटी को घर के काम काज करने को कहा जाता है ?
ऐसा क्यों होता है कि अबला नारी से नौकरी करके आने के बाद घर के सारे काम करने की अपेक्षा की जाती है और सबल पुरुष से गर्मागर्म चाय के बाद आराम की ?
ऐसा क्यों होता है कि स्त्री यदि कहे कि वह कुछ निर्णय पति से पूछ कर लेगी तो सब उसकी वाह वाह करते हैं, यदि पुरुष कहे कि पत्नी से पूछ कर बताएगा तो वह कमजोर या दब्बू माना जाता है ?
ऐसा क्यों होता है कि यदि स्त्री कहे कि उसे घर जाना है पति आ गए होंगे तो कोई उसे उलाहना नहीं देता किन्तु यदि पुरुष यही कहे तो हास्य का पात्र बन जाता है ?
ऐसा क्यों होता है कि पत्नी का कहा जरा भी मानने वाला बीबी का गुलाम कहलाता है किन्तु ऐसी किसी उपाधि से स्त्रियों को सुशोभित नहीं किया जाता ?
ऐसा क्यों होता है कि जन्म स्त्री देती है, बड़ा वह करती है किन्तु बच्चा पिता का ही कहलाता है?
ऐसा क्यों होता है कि अधिकतर झगड़ा पुरुष करते हैं, गाली भी वही देते हैं किन्तु गालियों में नाम स्त्रियों का आता है ?
ऐसा क्यों होता है कि अधिकतर युद्ध पुरुष आरम्भ करते हैं व लड़ते भी वही हैं किन्तु युद्ध की कीमत स्त्रियों को चुकानी पड़ती है ?
ऐसा क्यों होता है कि बलात्कार पुरुष करता है और अनादर स्त्री का होता है, न कि बलात्कारी का?
ऐसा क्यों होता है कि मृत्यु स्त्री लिंग है और जन्म पुल्लिंग ?
ऐसा क्यों होता है कि अग्नि स्त्री लिंग है और जल पुल्लिंग ?
ऐसा क्यों होता है कि भूख स्त्री लिंग है और भोजन पुल्लिंग ?
ऐसा क्यों होता है कि घृणा स्त्री लिंग है और प्रेम, स्नेह पुल्लिंग ?
घुघूती बासूती

Saturday, May 19, 2007

एक और कायर ?

कायर....२
इस कविता में भी मैं एक आत्महत्या के विषय में लिख रही हूँ । मैं आत्महत्या को बिल्कुल भी सही नहीं मानती । यह गलत है । हर हाल में गलत है । एक जीवन को समाप्त करना, चाहे वह अपना ही क्यों न हो, विशेषकर, तब जब यह जीवन सम्भावनाओं से भरा हुआ हो, सर्वथा गलत है । किन्तु मैं उन परिस्थितियों के बारे में लिखना चाहती हूँ जो किसी को ऐसा कदम उठाने की तरफ बढ़ने में सहायता करते हैँ । थोड़ा सा सहारा, थोड़ा सा सकारात्मक रवैया शायद उन्हें ऐसा करने से रोक दे । तब भी कुछ लोग बिना किसी को अपना दुख बताए शायद जीवन समाप्त कर लें, तब शायद कोई भी उनकी सहायता न कर सके । किन्तु अधिकतर मामलों में लोग मरना नहीं चाहते । वे मृत्यु को तभी चुनते हैं जब उन्हें सारे रास्ते बंद नजर आते हैं । जब वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपनों से सहायता माँग चुके होते हैं और जब उन्हें विश्वास हो जाता है कि कोई उनकी सहायता नहीं करेगा विशेषकर उनके अपने ।
यहाँ पर मैं एक विवाहिता नवयौवना की पीड़ा के विषय में लिख रही हूँ । उसे अपने पति या ससुराल से क्या शिकायत थी लिखना कोई आवश्यक नहीं है । आप स्वयं ही कयास लगा सकते हैं । जो अधिक महत्वपूर्ण है वह है उसके अपनों का उसके प्रति संवेदना रहित व्यवहार !वह केवल थोड़ा सा सहारा चाहती थी ..........

मैंने चाहा था हँसकर जीना
जीवन मेरा हो गया दुश्वार
बहती जलधारा सी मैं थी
मैं बन गई बांध बंधी धार
जितना मैंने उड़ना चाहा
पंख मेरे थे उसने कतरे
माँ से भी मैं बोली थी
अब ऐसे ना जी पाऊँगी
आ माँ, मुझे ले जा ले आकर
जीवन मेरा बना अंगार
कहती थी वह बिटिया मेरी
कैसे भी निभा तू लेना
अब ना वापिस तुझे ला पाऊँगी
मेरी भी तू सोच कुछ
कैसे समाज में मुख दिखलाऊँगी ।

सारे रास्ते जब बंद हो गए
जीवन से थी मैंने पाई हार
सुलगा कर इक माचिस को मैंने
करना चाहा जीवन उद्धार
मरने पर तो सब जलते हैं
पर मैं बन गई जीती मशाल ।

आज मुझे कायर तुम कहते हो
कहाँ गई थीं कल ये सब बात
मैंने भी था जीवन जीना चाहा
पर ना जीने देते थे हालात
ओ बड़ी बातें करने वालो
क्या तुम दे पाते मेरा साथ
तुम जलती माचिस को छू लो
फिर देना मुझे उपदेश
ओ मुझे कायर कहने वालो
क्या जानो तुम दर्द मेरा
कैसे होता है मन इतना पीड़ित
कि जीवन ज्योति बुझा हम पाते
तुमने तो दुनिया देखी है
क्यों न मुझे तुम लौटा थे लाते ।

इतना ही तो मैंने चाहा था
कुछ ऐसा हो जाए कि मैं
कर पाऊँ नवजीवन की शुरुआत
कुछ दिन मुझे सबल बनाते
अपने घर में मुझे ठहराते
मेरे घावों पर मरहम लगाते
फिर मैं नई राह निकलती
अपनी मंजिल खुद पा लेती ।

सुलग रही जब आत्मा चिता सी मेरी
क्यों तुम ना थे तब आग बुझाते
देखो मैं हवन कुंड बन गई
जवित हूँ पर भूत बन गई
पोर पोर में होती पीड़ा
बाल मेरे हैं झुलसाए
अब तो मेरे अपने भी
मुझसे हैं आँख चुराएँ ।

कुछ घंटों या दिन की ये पीड़ा
जीवन पर्यन्त सुलगने से बेहतर
मन आत्मा की पीड़ा के बदले
जलने की पीड़ा को गले लगाया
नारकीय जीवन से मुक्ति दिलाए
वह मृत्यु ही अब मुझे है भाए ।

जीने की हुईं खतम लालसा
मरने की थी बेला आई
जीने के इस अद्भुत खेल में
हार सदा से मैं पाती आई
अब तुम जाओ रपट लिखाओ
मेरे मरने का केस बनाओ
जीते जी ना साथ दे सके
अब मरने पर रस्म निभाओ ।

घुघूती बासूती

Tuesday, May 15, 2007

कायर

कितना सरल है किसी को बुजदिल कह देना ! कभी मृत्यु को करीब से देखा है ? कभी हाथ में विष उठाया है ? कभी गले में फंदा डाल अपने आप से बहस की है ? कभी मरना चाहकर भी अपने परिवार के बारे में सोचकर मरने का कार्यक्रम स्थगित या रद्द किया है ? जिस जान से ९० साल के अधमरे बीमार वृद्ध तक चिपके रहते हैं उसी जान को जब कोई किशोर एक झटके में दे डालता है तो उसकी मनःदशा क्या रही होगी ? बस वह पल यदि निकल जाता तो कल वह फिर युद्ध में जूझने को निकल पड़ता । सोचो कहाँ हम माता पिता में कमी रह गई ? कहाँ हमारी शिक्षा प्रणाली में कमी रह गई ? क्यों हम अपने बच्चों को आश्वस्त नहीं कर सके कि जो भी हो ,सफल रहें या असफल, हर हाल में वे हमारे पास वापिस आ सकते हैं और नए सिरे से जीवन आरम्भ कर सकते हैं , कि हम उन पर अपनी जजमेंट नहीं पास करेंगे, कि जीवन बहुत बड़ा और लम्बा है, कि एक जगह असफल भी रहो या आइ आइ टी जैसी जगह को भी छोड़कर यदि तुम कुछ और करना चाहोगे तो भी हम तुम्हारे साथ हैं ?
इन प्रश्नों के उत्तर ढूँढो । बच्चों पर जजमेंट न पास करो ।
बस इन्हीं भावों को लिए कविताएँ रच डालीं । आज एक प्रस्तुत है शेष फिर पोस्ट करूँगी ।
घुघूती बासूती

कायर


मुझे कायर कहने वालो
मेरा जीवन जीकर देखो
बस इक झलक देख ही
मेरे जीवन की शायद
तुम इतना घबरा जाओगे
मेरे जीवन में न तुम
कभी वापिस आ पाओगे,
आओ तुमको भी अपने
मरने की झलक दिखाऊँ
आओ देखो तुम भी आकर
मुझे ए कायर कहने वालो ।

देखो कैसे हो जाता है जीवन बेमानी
कैसे फिर जाता है आशाओं पर पानी
कैसे इक बालक की दी जाती कुर्बानी
कैसे माता पिता ने न मेरी इच्छा जानी ।

मैंने बनना चाहा था इक चित्रकार
पर मुझे पकड़ाए चीर फाड़ के औजार
कितना मैंने उनको समझाना चाहा
सुन्दर चित्र अपने दिखाए बारम्बार
पर वे ना माने मेरे दिल की बात
पढ़ने को कहते थे मुझे वे दिनरात
पहुँच गया मैं पूरे करने उनके सपने
वे सपने जो ना थे मेरे कभी अपने ।

हाथ में चाकू था मुँह में उबकाई
कितना कहा था पापा से मैंने,
बात पर उन्हें नहीं समझ में आई,
उस दिन हद हो गई जब मृत स्त्री
एक काटने को मुझे पकड़ाई
मेरे सपनों में भी वह आती थी
कैसे काटूँ उसको मैं
चीर फाड़ ना कभी मुझे भाई
रात रात ना सो पाता था
उसका चेहरा नजर आता था
लिखा पत्र पापा को मैंने
ना होगी मुझसे ये पढ़ाई
वे बोले बेटा कैसे भी हो
तुम कर लो अपनी पढ़ाई
मेरा बेटा डॉक्टर होगा तो
देखो कितनी होगी बड़ाई
ना पूरी करो जो तुम शिक्षा
कितनी होगी जग हँसाई ।

उस दिन हाथ मेरे काँप रहे थे
कितनी सबने थी हँसी उड़ाई
फिर से मैं था बोला पापा
मैं न बन सकूँगा कभी कसाई
पर पापा बोले बन जा तू डॉक्टर
इसमें ही तेरी और हमारी भलाई
भाग गया था मैं अपने घर
पर फुसलाकर भेजा मुझको वापिस
ना झेल सका यह सब मैं जब
तब अपने गले में डाली रस्सी
उसमें मैंने मजबूत गाँठ लगाई
खिसका दी कुरसी पैरों से
जीभ मेरी थी बाहर आई
डाल कर देखो इक पल फंदा
या फिर इक उँगली को ही
तुम कस लो रबर बैंड से
और देखो कितना कष्ट
है इसमें ओ मेरे भाई
जीना मैंने भी चाहा था
पर ना इन शर्तों पर
मैंने जीना चाहा
बन चित्रकार जी तो लेता
पर यह काटम काट न
कभी मुझे भाई ।

सो अन्त हुआ मेरे जीवन का
बिना चाहत अपनी पूरी कर
मुक्ति है आशाओं से मैंने पाई
ओ मुझपर व्यंग्य करने वालो
आओ मेरा जीवन जी लो
छोड़ गया हूँ स्वप्न अधूरे
आओ कुछ तो तुम भी जी लो ।


घुघूती बासूती