Showing posts with label स्त्री विमर्श. Show all posts
Showing posts with label स्त्री विमर्श. Show all posts

Tuesday, July 15, 2014

त्याग या स्त्री के कैरियर की महत्वहीनता?


कुछ दिन पहले पति के कॉलेज के समय के साथियों ने एक पार्टी की जिसमें हम पत्नियों को भी बुलाया गया। एक दम्पत्ति से मैं लगभग तीस साल पहले मिल चुकी थी, शेष सबसे पहली बार मिल रही थी। लगभग सब पुरुष व कामकाजी स्त्रियाँ रिटायर हो चुके थे। तीन स्त्रियाँ थीं जो नौकरी नहीं करती थीं।

कुछ मेज जोड़ दिए गए थे और जैसी कि परम्परा है, एक तरफ आमने सामने पुरुष बैठे थे और दूसरी तरफ स्त्रियाँ। सो कॉलेज व हॉस्टेल के जमाने के पति के मित्र कैसे व कौन थे यह जानने व उनके उस समय के किस्से सुनने की मेरी हल्की सी जिज्ञासा जो थी वह ज्यों की त्यों धरी रह गई। एक बार फिर मैं पति के मित्र/ सहयोगी/ बिरादरी या किसी भी अन्य प्रकार से सम्बन्धित पुरुषों के समूह की बिल्कुल ही आपस में असम्बन्धित, अनजानी पत्नियों के बीच थी और मुझे उनके साथ समय बिताना था, जानपहचान करनी थी और उनके साथ पार्टी व अपना मनोरंजन करना था। मैं समाज की इस आशा से सदा ही स्तब्ध रह जाती हूँ कि वह स्त्री से सदा यह अपेक्षा करता है और उसके जरा से विरोध से स्तब्ध व आहत हो जाता है।

खैर, पिछले ३७ वर्ष से सदा स्वयं को ऐसे ही समूहों में पाती रही हूँ सो अनजानी स्त्रियों से बतियाने का गुर सीख चुकी हूँ। जिस स्त्री से ३० साल पहले मिली थी और जिसे मिलने की मुझे जरा भी याद न थी वह मेरे बगल में बैठी थीं। कुछ देर अतिथी धर्म निभाने को उसके पति भी मेरी दूसरी बगल में बैठे और मेरी बेटियों के बारे में पूछने लगे। मेरे बड़ी बिटिया के पोस्ट डॉक्टरल रिसर्च करने पर उन्होंने उसका विषय पूछा। उसका विषय बताते ही सामने बैठी स्त्री के कान खड़े हो गए। पति के मित्र तो पाँच मिनट खबर लेने को साथ बैठने के बाद उठकर पुरुषों के बीच जा बैठे। ये स्त्री जिन्हें मैं डॉ क कहूँगी मुझसे बोलीं,"एक्सक्यूज़ मी। मैंने आपकी थोड़ी बात सुनी। आपकी बेटी कहाँ रिसर्च कर रही है? कहाँ से एम एस सी की? कहाँ से पी एच डी की? यह मेरे क्षेत्र का विषय है।"

ऐसा कम ही होता है कि कोई मुझे बिटिया के विषय या उसके विषय से सम्बन्धित क्षेत्र का मिले। मेरी तो उसके विषय में स्वयं की जानकारी बहुत कम है। मुझे यह सोच बहुत खुशी हुई कि मेरी पीढ़ी की कोई स्त्री उस विषय से सम्बन्धित है। मैंने उनसे पूछा, "अरे वाह, आप तो क्षेत्र में बहुत सीनियर होंगी। आप कहाँ काम करती हैं?"

डॉ क ने बताया कि शादी के कुछ समय बाद ही उनपर परिवार का इतना उत्तरदायित्व आ गया कि उन्हें रिसर्च छोड़ घर पर ही रहना पड़ा। उनके गाइड या रिसर्च इन्चार्ज ने दो साल तक उनके लिए जगह बनाए रखी किन्तु दो साल बाद डॉ क ने कह दिया कि वे इतनी व्यस्त हो गई हैं कि कभी लौट नहीं पाएँगी अतः उनकी प्रतीक्षा न की जाए।

मेरे यह कहने पर कि बच्चे बड़े हो जाने पर वे फिर से काम शुरू कर सकती थीं वे बोलीं कि काम बच्चों के उत्तरदायित्व के कारण नहीं इन लॉ उत्तरदायित्व के कारण छोड़ा था। उनकी उम्र का ध्यान कर मैंने कहा कि क्या अभी सास ससुर हैं तो वे बोलीं नहीं। मैंने कहा कि अब तो आपको खालीपन सताता होगा। किन्तु इतनी देर से रिसर्च में तो नहीं लौट सकतीं ना। तो वे बोलीं कि नहीं मेरा उत्तरदायित्व तो अब भी चालू है।

मैं कुछ चकित हुई तो उन्होंने बताया कि उनकी दो ननदें हैं जिनका उन्हें ध्यान रखना होता है। वे अपना ध्यान नहीं रख पातीं। एक मानसिक रूप से काफी चैलेंज्ड हैं और दूसरी भी कुछ कम किन्तु वैसी ही हैं।

वे शाम भर कभी अपने अमेरिका में रिसर्च के समय के किस्से सुनाती रहीं तो कभी भारत के। कभी अपनी पी एच डी के जमाने के तो कभी अपने गाइड के।

आकर्षक व्यक्तित्व वाली उस सौम्य सी दिखने वाली स्त्री में मैं कुछ ऐसी उलझी कि अन्य किसी से कम ही बात हुई।
जब से उनसे मिली तब से यही सोच रही हूँ कि यदि विवाह बाद किसी दुर्घटना के कारण यह सब हुआ होता तो बात अलग थी। किन्तु यह कोई दुर्घटना नहीं थी। यह परिस्थिति तो पहले से ही थी। फिर बात वहीं आती है कि

१. उनका प्रेम विवाह तो था नहीं। तो उन्होंने इस विवाह के लिए सहमति क्यों दी? क्या उन्हें यथास्थिति का पता नहीं था?

२. उनके पति तो अपने विवाह से पहले से ही अपनी बहनों की स्थिति जानते थे। सो यह भी जानते थे कि उनकी पत्नी से क्या अपेक्षाएँ होंगी। सो उन्होंने किसी ऐसी स्त्री का चयन क्यों नहीं किया जो कामकाजी न थी। जो इतना अधिक पढ़ी लिखी न थी।

३. कैसे उनके सबसे अच्छे कॉलेज से ही पढ़े, चाहे खूब कमाते इन्जीनियर किन्तु ग्रेजुएट पति ने अपने लिए पी एच डी, विदेश में भी पोस्ट डॉक करी स्त्री का चुनाव किया, यह जानते हुए कि उसे काम छोड़ घर रहना होगा?

४. क्या ऐसा करने में उनकी अन्तर्आत्मा ने उन्हें कचोटा या नहीं? या उन्हें स्त्री का कैरियर महत्वहीन लगता था?

५. डॉ क के माता पिता ने उसके लिए ऐसा घर क्यों चुना?

६. क्या माता पिता को उनकी बहनों के बारे में पता नहीं था? पता था तो क्या उन्हें लगता था कि सास के बाद या सास के वृद्ध या बीमार होने के बाद उनका कुछ और प्रबन्ध हो जाएगा?

७.क्या उन्होंने इस बारे में जानने के बाद अपनी बेटी के काम करते रहने के बारे में कुछ भी सुनिश्चित नहीं किया था?

८. क्या बेटी के काम छोड़ने के बाद उन्हें अपने चयन पर अपराध बोध हुआ होगा?

क्या आप सबको यह पढ़कर सामान्य सा लग रहा है या एक प्रतिभा की समाप्ति पर दुख, क्षोभ या क्रोध आ रहा है?

या आपको यह त्याग महान और अनुकरणीय लग रहा है?

क्या वह स्त्री अपने त्याग और तपस्या के आलोक से ही प्रसन्न व सन्तुष्ट होंगी?

यदि हाँ तो उन्होंने लगातार मुझसे अपनी रिसर्च की बातें क्यों कीं?

मैं ऐसे पुरुषों को भी जानती हूँ जिन्होंने परिवार के लिए ऐसे त्याग किए किन्तु वे परिवार उनके जन्म के परिवार थे न कि विवाह के बाद के जहाँ मनुष्य के पास चुनाव का विकल्प होता है। मैंने ऐसा एक भी पुरुष नहीं देखा जो चुनाव करके ऐसी स्थिति को अपनाए जहाँ उसे अपनी पत्नी के लिए ही नहीं उसके परिवार के सदस्यों के लिए अपने प्रिय विषय व जाने पहचाने जीवन को छोड़ त्याग व सेवा का जीवन जीना पड़े।

कुछ उलझन में,

घुघूती बासूती

Friday, March 08, 2013

चाहती हूँ


चाहती हूँ

चाहती हूँ कि
नतिनी को
कभी बोझ न लगे
उसका स्त्री होना,
उसके कदम न रोक ले
उसका स्त्री होना,
हँसी पर पहरा न लगा दे
उसका स्त्री होना,
चेहरा छिपाने को मजबूर न करे
उसका स्त्री होना,
उसके विकल्प न सीमित करे
उसका स्त्री होना,
उसका नाम न बदलवा दे
उसका स्त्री होना,
उसका काम न तय करवाए
उसका स्त्री होना,
उससे काम न छुड़वा दे
उसका स्त्री होना,
उसकी खुशियों पर न डाका डाले
उसका स्त्री होना,
उसे जमाने से ज्ञान न दिलवाए
उसका स्त्री होना,
उसके पहनावे पर न हावी हो जाए
उसका स्त्री होना,
चन्द नैसर्गिक खुशियों के बदले न जीवन गिरवी रखवाए
उसका स्त्री होना,
उसकी उड़ान न रोके
उसका स्त्री होना,
उसे आभासी पक्षी ही बन सन्तोष न करवाए
उसका स्त्री होना।

घुघूती बासूती

आभासी पक्षी* जैसे घुघूती बासूती नाम रख पक्षी होने का आभास पाना।

घुघूती बासूती

Monday, January 07, 2013

निमन्त्रण


निमन्त्रण

स्त्रियो, अपने भीतर व बाहर झाँककर देखो
देखो शायद तुम्हारा कोई अदृश्य हाथ भी हो
वह हाथ जो
तब ताली बजाता है
जब तुम्हारे दो हाथ
बलात्कारियों से
तुम्हारा बचाव
करने में अपने को
कम पाते हैं।

देखो,
उस हाथ को काटकर फेंक दो
अन्यथा फिर बलात्कार होगा
और वह फिर ताली बजाएगा।

ताली एक हाथ से नहीं बजती
बलात्कार का आरोपी केवल
बलात्कारी नहीं होता
बलत्कृता ही जड़ होती है
इस अपराध की।

कभी वह जीन्स पहन
कभी वह स्कर्ट पहन
कभी वह बॉय फ्रैन्ड रख
कभी देर रात बाहर निकल
कभी वह सर उठाकर
कभी वह बराबरी का नारा लगा
तो
कभी भाई, पिता, पति, ससुर,
देवर, पुत्र या प्रपोत्र द्वारा
खींची हुई लक्षमण रेखा
पार कर
दे आती है बलात्कारी को
निमन्त्रण।

अन्यथा
भारत में बलात्कार?
कैसे सम्भव था?
यहाँ स्त्री पूजक बसते हैं
बलात्कारी तो इन्डिया में रहते हैं।

घुघूती बासूती

Wednesday, August 22, 2012

बेचारा पति


एक सहेली ने अपने पड़ोस की बात व इससे उपजे हुए अपने प्रश्नों के बारे में यह  बताया.......
एक पड़ोसी दम्पत्ति हैं। दोनो ही नौकरी करते हैं। तीन महीने पहले उनका बच्चा पैदा हुआ। पत्नी घर से ही काम कर रही है। पहले से ही चाभी लेकर उनकी अनुपस्थिति में भी काम करने वाली एक महरी व एक कुक हैं। बच्चे के आगमन के बाद उसकी देखभाल के लिए भी एक आया रख ली गई। किन्तु कोई आया टिकती ही नहीं। हर कुछ दिन बाद एक नई आया खोजी जाती है।

अभी कल ही पति ने किसी काम से फोन किया तो पुरुष ने फोन नहीं उठाया। बाद में उसने उनके घर की घंटी बजाई। दरवाजा खोलने पर उसने अपना दुखड़ा बताया कि घर आते से ही पत्नी आया का रोना लेकर बैठ गई। वह बोला बाद में बात करेंगे और स्नान करने चला गया। फिर कुछ खा पीकर समस्या के बारे में सुना। उसने बताया कि अब कल या तो उसके माता पिता, या उसके सास ससुर आकर बच्चे को सम्भालेंगे या फिर पत्नी ही मायके या ससुराल चली जाएगी। आया जब मिलेगी तो वापिस आ जाएगी।

उसके जाते ही उसके पति बोले, 'बेचारा......(पति )'! फिर उन्होंने उसे सारा किस्सा सुनाया। उनकी सारी सहानुभूति उस युवा पति के साथ थी। वह बोली कि एक अट्ठाइस तीस वर्ष का हट्टा कट्टा नवयुवक जो पूरा दिन दफ्तर में था, जिसने बच्चे को स्तनपान नहीं कराया, लंगोट नहीं बदले, रोने पर चुप नहीं कराया, जिसने कई बार आया को सोते से नहीं जगाया, बार बार जगाकर आया के क्रोध व काम छोड़ देने की धमकी और अन्त में अपना हिसाब माँगती आया को नहीं झेला, और इस तनाव भरे वातावरण में कम्प्यूटर पर अपना काम भी नहीं निपटाया। दफ्तर से टिप्पणी करने वाले व फेसबुक आदि पर टिपियाने, बतियाने वाले सभी मित्र दफ्तर जाने व वहाँ काम करने की भयंकर थकान के बारे में उससे बेहतर जानते हैं।

पत्नी ने नौ माह गर्भ में सन्तान को पाला पोसा, दफ्तर भी गई, फिर प्रसव पीड़ा सही, स्तनपान करा रही है, घर से दफ्तर का काम कर रही है, आया, महरी, कुक से काम भी करवा रही है, एक आँख बच्चे पर भी रख रही है। गर्भावस्था, प्रसव व स्तनपान का उसके शरीर व मन पर कुछ तो प्रभाव पड़ता होगा। दो कोशिकाओं से एक २०‍‍ या २१ इंच के ३ से ४ किलो के बच्चे को अपने अंदर रचना, विकसित करना शरीर से क्या मूल्य वसूलता होगा यह कल्पना ही किसी संवेदनशील व्यक्ति को हिला सकती है। किन्तु स्त्री न जाने क्यों वज्र की बनी मानी जाती है।

यदि वह टोके तो... 'क्या तुम मजाक भी नहीं समझ पाती?'
वह बोली, 'न जाने स्त्री के प्रति असंवेदनशीलता यदि टोक दी जाए तो वह मजाक कैसे बन जाती है? क्यों स्त्री सम्बन्धित बातें मजाक हैं? उसका थकना मजाक, उसकी आवश्यकताएँ मजाक, उसका कष्ट, उसका मोटा होना, पतला होना, गुस्सा होना, अपने अधिकारों को माँगना, सब मजाक।'

मैं सोचती हूँ.......
समाजशास्त्री शायद इस मजाक की क्रिया, उसके पात्रों, पात्रों की समाज, संसाधनों व सत्ता में स्थिति, उनकी श्रेष्ठता या हीनता पर कुछ लिख चुके होंगे। मैं भी इसे समझना चाहती हूँ।
क्यों चुटकुलों में पति ही पत्नी के घर से कुछ दिन के लिए बाहर याने मायके जाने पर, उसके मरने पर, किसी के साथ चले(भाग ) जाने पर, खुश होता है? क्यों चुटकुले में पत्नी चाहिए विज्ञापन निकलने पर हजारों पति उसके उत्तर में लिखते हैं, मेरी पत्नी ले लो, मेरी पत्नी ले लो?

कुछ दिन मित्र लोग जब स्त्री पुरुष, पति पत्नी वाले चुटकुले पढ़ें तो उनमें पति के स्थान पर पत्नी और पत्नी के स्थान पर पति पढ़कर देखें। तब जब वहाँ किसी पत्नी को पति के न मरने पर बिलखते देखें, दफ्तर में ही पड़े रहते, सहेलियों के साथ भटकते (ताकि पति को झेलना न पड़े) देखें, पड़ोसी के सौन्दर्य पर लट्टू होते देखें तो बताइए कि क्या यह सब सुनना पढ़ना भौंडापन, लगभग अश्लील नहीं लगता? क्या हँसी आती है या उबकाई?

यह भी सोच रही हूँ कि क्या सच में उसका पति मजाक कर रहा था या उसे सच में सहानुभूति युवा पति से थी? क्या उसे युवा पत्नी की थकान का अनुमान नहीं था? या क्या वह उस विषय में सोचना ही नहीं चाहता था? क्योंकि पत्नियाँ थकने लगेंगी तो जब भी घर में पैर रखें तो स्वयं को थका मानने व परिवार को ऐसा मनवाने वाले पति का क्या होगा? प्रबंधन गुरु व  शिव खेरा जो कई पुस्तकें लिख चुके हैं  एशियन मेल की बात करते हैं। वे घर पर सदा थके रहने वाले एशियन मेल की बात करते हैं।  

और यह सच है। बचपन से हमें सिखाया जाता था कि पुरुष दफ्तर, कारखाने, दुकान, स्कूल आदि से थका आता है। सहेलियों, मित्रों के पिता जब घर आ जाएँ या उनकी छुट्टी के दिन उनके घर जाने को मना किया जाता था क्योंकि उनके पिता आराम कर रहे होंगे। बाद में स्त्रियों को भी काम पर जाते और वहाँ से वापिस आते देखा। एक बार भी नहीं कहा गया कि मित्र की माँ आराम कर रही होगी। उन्हें दफ्तर, स्कूल से आते ही कपड़े बदल रसोई में घुसते, बच्चों को होमवर्क कराते देखती । पत्नी के साथ ही काम करने वाले पति को पत्नी पानी, चाय, नाश्ता देती और फिर खाना बनाने लगती। उसी दफ्तर से वही काम करके आए पुरुष को आराम चाहिए और स्त्री को नहीं। और फिर भी सुनती हूँ, बेचारा पुरुष!

पुनश्चः सुखद बात यह है कि नई पीढ़ी के बहुत से दम्पत्तियों को मिलकर रसोई सम्भालते देखती हूँ, गर्भवती पत्नी के लिए खाना बनाते, उसका मन प्राण से ध्यान रखते देखती हूँ तो लगता है कि भविष्य शायद बेहतर हो, कि शायद मेरी पीढ़ी की, एक वर्ग की माँओं ने अपने बेटों को अच्छे जीवन मूल्य दिए हैं, कि शायद स्त्रियाँ अब जीवन में आगे बढ़ने का उतना मूल्य न चुकाएँ जितना अब तक चुकाती रही हैं, शायद अब वे भी काम से आकर कभी कभार कह सकें, 'मैं आज बहुत थकी हूँ।'

घुघूती बासूती

Thursday, July 05, 2012

शताब्दी बदल गई किन्तु शायद कुछ भी नहीं बदला..............................घुघूती बासूती


कभी पिछली सदी में......
सास सिन्दूर लगाने, साखा पोला पहनने को बाध्य करती थी, ससुर साड़ी पहनने को, एक पड़ोसिन चूड़ी बिछिए क्यों नहीं पहने पूछना न भूलती थी तो दूसरी मंगलसूत्र। ससुर को जीन्स, बेलबॉटम, ट्राउजर्स अश्लील लगते तो सास को स्नान करते ही बाल सूखने की भी प्रतीक्षा असह्य हो उठती और उससे पहले ही सिन्दूर न भरने पर बेटे का जीवन संकट में दिखता। सास सुबह उठते ही साखा पोला कलाइयों में हैं या नहीं देखती तो ससुर को आँचल सर पर क्विकफिक्स से फिक्स चाहिए होता और सास ससुर दोनों को आवाज का वॉल्यूम कन्ट्रोल अपने हाथ में चाहिए होता व खनकती हँसी पर बन्धन लगाना अपना अधिकार लगता। ननद को लगता कि चेहरा लीपना पोतना अनिवार्य है, आँखों को यूँ बिन लाइनर नंगा रखना असभ्य, वैक्सिंग थ्रेडिंग न करना सीधे रिजर्व फॉरेस्ट से आने का ध्योतक और ऐसी वन्य जीव को तो वापिस वहीं पहुँचा देना ही बेहतर।

आज.......
यदि वही स्त्री नर्स होती तो उसका हस्पताल गहरे काले आई लाइनर, मैरून लिपस्टिक, फाउन्डेशन क्रीम  लगाने व यूनिफॉर्म में मोतियों की माला व कान के स्टड्स भी पहनने को, भवें बनवाने, संवारने, ऊपरी होंठ के ऊपर थ्रेड करवाने, हाथ व बाँहें वैक्स करवाने को बाध्य करता। सो क्या बदला? यदि प्रोफेशनल होकर भी अन्य लोग स्त्रियों को बताएँगे कि कैसे काम के लिए तैयार होना है, कैसे बनना सँवरना है, क्या क्या पहनना है तो क्या स्त्री की स्वायत्तता खत्म हो उसका अस्तित्व पुनः दूसरों के हाथ में न आ गया? क्या पढ़लिखकर भी वह दूसरों के हाथ की कठपुतली भर न बन गई?

मुम्बई मिरर के अनुसार मुम्बई के कई बड़े निजी हस्पताल नर्सों की ग्रूमिंग के प्रति बहुत सजग होते जा रहे हैं व उन्हें समझा रहे हैं कि स्त्री के लिए साफ सुथरे या नीट एन्ड टायडी का तात्पर्य भवें संवारना, ऊपरी होंठ के ऊपर थ्रेड करवाना, हाथ व बाँहें वैक्स करवाना होता है। मरीज ठीक होकर जाते समय अपना हस्पताल का अनुभव अपने साथ ले जाता है। यदि वह अच्छा रहा हो तो वह अन्य लोगों को भी उसी हस्पताल में इलाज करवाने की सलाह देता है।

अब तक हम अच्छे अनुभव का अर्थ अच्छा इलाज, मृदु व्यवहार, समय पर सबकुछ मिलना, सहायता व सेवा को तत्पर अपने काम में निपुण स्टाफ, हस्पताल का स्वच्छ  वातावरण आदि ही मानते आए थे। किन्तु अब लगता है कि स्टाफ का सौन्दर्य बोध भी बहुत अधिक मायने रखता है।

एक बात जो समझ में नहीं आई वह यह कि स्त्री मरीज भी तो चाहती होगी कि पुरुष डॉक्टर, वार्डबॉय, टेकनिशियन या कहिए पूरा पुरुष स्टाफ भी मनमोहक लगे। क्यों न उनकी मूँछों का स्टाइल, उनकी लम्बाई, उनपर दिए गए ताव, दाढ़ी के स्टाइल, कोई विशेष कट जैसे कि वह होंठ के नीचे ठोड़ी पर बैठी दो मक्खी के नाप वाली दाढ़ी या कोई भी अन्य कट जो लगे कि स्त्रियों को भाएगा, निर्धारित किया जा सकता है। उनकी भी मैट्रोसेक्सुअल लुक हो। आज के अभिनेताओं की तरह वैक्स करी बाँहें, संवरी भौंहें क्यों न हों? कान में रिंग या स्टड हों। चश्मे वाले डॉक्टर, वार्डबॉय, टेकनिशियन चश्मा उतार कॉन्टेक्ट लेंस लगवाएँ। आखिर स्त्री मरीज भी तो हस्पताल से जब जाएँ तो अपनी सहेलियों से भी कहें कि इसी हस्पताल में जाओ।

समाज की सच्चाई तो यह है कि स्त्रियाँ कितनी भी पढ़लिख जाएँ, नौकरी करें, ढेरों पैसा कमाएँ, लोगों की जान बचाएँ, कुछ भी कर लें, समाज तो उन्हें कन्ट्रोल करने के नए नए, विचित्र या लुभावने, तर्कसंगत या अतार्किक तरीके खोजता ही रहता है।

बहुत कठिनाई से बहुत सी स्त्रियों ने बिन्दी, सिन्दूर, चूड़ियों, बिछियों, मंगलसूत्र, साड़ी आदि अनिवार्य रूप से पहनने से छूट पाई थी। पूर्ण रूप से अपने मन का पहनने करने की छूट तो बहुत दूर थी किन्तु आर्थिक स्वतंत्रता के साथ उन्हें पहनावे के मामले में भी स्वतंत्रता मिलने लगी थी।

किन्तु कन्ट्रोल फ्रीक ब्रिगेड को चैन कहाँ? जो नौकरी उन्हें मुक्त करती है वही उन्हें केवल स्त्री होने के कारण नियमों में जकड़ रही हैं। पहले बहुत से स्कूलों में अध्यापिकाओं को केवल साड़ी ही पहनने को कहा जाता था। सलवार कुर्ता तक मना था। भाग्य नियन्ताओं को साड़ी अधिक ग्रेसफुल लगती थी। फिर अचानक कन्ट्रोल फ्रीक्स को स्त्रियों की साड़ी ब्लाउज के बीच से झाँकती पीठ व पेट देख पेट दर्द होने लगा। वही साड़ी जिसके ग्रेसफुल होने पर वे भाषण देते न थकते थे उन्हें परेशान करने लगी। एकाध महिला राजनेता ने व कई स्कूलों ने पीठ व पेट दिखने से बचने का उपाय जैकेट में ढूँढ निकाला और ग्रेसफुल साड़ी को और ग्रेसफुल बना दिया। जैकेट क्यों पहनें पूछने पर वही यूनिफॉर्म दिखने, जैकेट पर स्कूल का नाम लिखे होने आदि का तर्क दे दिया। उन्हीं स्कूलों में अध्यापकों के लिए किसी जैकेट का प्रावधान नहीं किया गया।

स्वतन्त्र होने के लिए आर्थिक स्वतन्त्रता आवश्यक है अतः लड़कियाँ भी एम बी ए करने लगीं। किन्तु इन कॉलेजों में भी सप्ताह में एक दिन उन्हें साड़ी पहनने को बाध्य किया जाता है। बहुत से अन्य कॉलेज भी नियम बनाते हैं कि लड़कियाँ क्या पहनें व क्या नहीं।

अब यदि नौकरी करते समय भी वे लगभग वैसे ही बन्धनों में जकड़ दी जाएँगी जो पहले संस्कृति के नाम पर लगाए जाते थे तो क्या बदला? यदि मुझे लगाने को बाध्य किया जाए तो सिन्दूर व आइलाइनर में मुझे कोई अन्तर नजर नहीं आता। यह सब नई पैकिंग में वही पुरानी विचारधारा है जो स्त्रियों के लिए नियम बनाना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझती थी।

हस्पताल या किसी भी कार्यस्थल पर बातचीत करने का लहजा, तरीका, शिष्टाचार, मरीजों या ग्राहक से कैसे बातचीत व व्यवहार किया जाए यह स्त्री पुरुष सारे स्टाफ को सिखाना एक अच्छी पहल होगी किन्तु यूँ स्त्रियों पर नियम लागू करना एक खतरनाक चलन बन सकता है। देखने में ये नियम निर्दोष लगते हैं किन्तु यह स्त्री स्वायत्तता पर अतिक्रमण ही है।

घुघूती बासूती

Wednesday, May 23, 2012

पति की आँखों में आँसू .....................घुघूती बासूती


उसने पति की आँखों में आँसू कभी न देखे थे। पति ही क्या अपनी भी आँखों में नहीं देखे थे, बच्चों की आँखों में भी बहुत ही कम। ऐसा कहा जा सकता है कि अपने परिवार में आँसू लगभग नहीं ही देखे थे। पति को तो माता पिता की मृत्यु पर भी रोते नहीं देखा था, कुछ अपनों की अकाल मृत्यु पर भी नहीं, बहन व बेटियों के विवाह में भी नहीं।

सो उस दिन क्या हुआ कि आमिर खान के सत्यमेव जयते देखते समय उनकी आँख से अश्रुधारा बह रही थी। वह रसोई में खाना बनाते बनाते, खाने की मेज पर सब्जी काटते हुए, चलते फिरते काम करते हुए शो देख कम, सुन अधिक रही थी। कढ़ाही में सब्जी छौंक, दाल प्रेशरकुकर में डाल वह भी टी वी के सामने पंखे के नीचे बैठ गई। अमेरिका में ले जाकर पति द्वारा सताई, भूखी रखी पत्नी अपनी बात बता चुकी थी। केरल की लेक्चरर निशाना की जान जाने के बारे में बताया जा चुका था। पंजाब की युवती अपने पति को आस्ट्रेलिया पढ़ने भेजने व उसकी व उसके परिवार की माँगों को पूरा करके भी पति को न पाने की कहानी सुना रही थी।

अचानक कुछ कहने को उसने पति की तरफ देखा तो आँसू ठोड़ी से नीचे लुढ़क रहे थे। यह कैसे हो सकता था। स्त्रियों, लड़कियों पर होते अत्याचारों को लेकर वे दोनों काफी चिन्तित होते थे, बेटियों के माता पिता होने के कारण अपने समाज का यह घिनौना स्वरूप जहाँ उन्हें लज्जित करता था वहीं चिन्तित भी करता। किन्तु आँसू!

"तुम्हारी आँख तो ठीक है ना?"
"हाँ।"
"फिर आँसू क्यों?"
कोई उत्तर नहीं।
"रो रहे हो?"
कोई उत्तर नहीं।

वह उठकर जाकर दूसरी आँख को देखती है। धारा वहाँ से भी बह रही थी।
जीवन में कितने दुख आए किन्तु आँसू नहीं आए। फिर आज ये आँसू क्यों? वह पूछती है वे कोई उत्तर नहीं देते।

"तुम तो कभी नहीं रोते थे।"
"इन लड़कियों के जीवन के जो सबसे सुखद साल होने चाहिए थे यूँ रुला तड़पा कर बितवाए गए हैं। इस उम्र में मनुष्य कितना उल्लसित होता है, कितना आशावादी होता है।"

तभी रानी त्रिपाठी आ गई। वह क्या आई, उसके पति के चेहरे की मुस्कान लौट आई। वे ऐसे मुस्करा रहे थे, हँस रहे थे जैसे वह उनकी अपनी बेटी हो जिसने अन्याय के विरुद्ध झुकने की बजाए उसे ललकारा। वह पति को ही बार बार देख रही थी। पति के आँसू सूख रहे थे व आँखें भी अब मुस्करा रही थीं।

अब वे दोनों यही कह रहे थे कि रानी ने बिल्कुल सही किया सिवाय उसी दिन शादी करने की घोषणा करने के। क्योंकि दहेज का लोभी न होने का अर्थ एक बहुत बड़े खोट से मुक्त होना तो होता है किन्तु इस खोट के अतिरिक्त भी कई बातें देखने की होती हैं, जैसे कि स्वभाव, जीवन दर्शन, अन्य जीवन मूल्य आदि। दहेज का लोभी न होना अपने आप में चरित्र का एक बड़ा गुण हो सकता है किन्तु सबकुछ नहीं। रानी खुश है यह देख व उसका आत्म विश्वास देख उन दोनों को बहुत सन्तोष हो रहा था।

कह रहे थे कि काश, रानी की तरह हर लड़की व उसके माता पिता समझ पाते कि पैसे से बेटी रूपी बला को अपने सर से उतार किसी और के सर रखा जा सकता है किन्तु बेटी रूपी एक व्यक्ति की खुशियाँ कभी नहीं खरीदी जा सकतीं। सो यदि आप अपनी बेटी को प्यार करते हैं, उसका व्यक्ति के रूप में आदर करते हैं तो उसकी खुशियाँ खरीदने की चेष्टा भी मत कीजिए। यदि आप लड़की हैं तो किसी को अपने लिए वर खरीदने मत दीजिए। प्रायः इस वर का मूल्य पैसों के साथ साथ आपका स्वाभिमान भी होता है।

उसने पति को कभी ऐसे कार्यक्रम देखते नहीं देखा था। उसने पति को कभी रोते नहीं देखा था। स्त्रियों का आदर करते हैं यह तो वह जानती थी, उनके साथ अन्याय होता नहीं देख सकते यह भी जानती थी, किन्तु वे उनकी पीड़ा को इस तरह महसूस करते हैं यह वह नहीं जानती थी। उस दिन उसने पति का एक नया ही रूप देखा।(वह सोचती है व सोचकर मुस्कराती है कि बुढ़ापा व सेवानिवृत्ति उसे उनके न जाने कितने कितने नए व पुराने छिपे हुए रूप दिखाए, ये रूप देखने के लिए उनका उसके सामने बैठा होना भी तो आवश्यक है। )

उसने यह भी देखा कि किसी भी सत्य के सत्य से अधिक, कटु सत्य या भयावह सत्य ही क्यों न हो, उसकी प्रस्तुति कैसे की जाती है यह बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। यदि समाज को बदलना है तो निर्जीव आँकड़े बताते रहने से कुछ नहीं होगा। समाज की बुराइयों को इस तरह से समाज के सामने लाना होगा कि लोग सोचने को मजबूर हो जाएँ। इस लिहाज से आमिर खान का सत्यमेव जयते अब तक सफल रहा है। वे कलाकार हैं, मनुष्य के हृदय को निचोड़कर रख देने की कला में माहिर, तो यदि एक भले काम में उनकी कला का उपयोग किया जाए तो क्या बुरा है ! लोग कहते हैं कि वह नया क्या कह रहा है किन्तु अपनी या आपकी बात यूँ कहना कि सुनने वाला हिल जाए भी तो एक कला है। शायद इसीलिए लोग नुक्कड़ नाटकों में समाज की समस्याएँ उठाने की कोशिश करते थे।

घुघूती बासूती

Tuesday, May 15, 2012

ना, प्लीज़, लिजलिजी भावुकता तो रहने ही दो!.............................घुघूती बासूती


जब हम स्त्रियों, बच्चियों, बेटियों, लड़कियों की बात करते हैं तो वैसे नहीं करते जैसे किसी सामान्य मानव की करते हैं जिसके अधिकार हैं, दुख हैं, सुख हैं, इच्छाएँ हैं, आकांक्षाएँ हैं, जो सही भी हैं, गलत भी, बुरी भी, भली भी। हम उन्हें या तो सारी समस्याओं की जड़ मान जन्म ही नहीं देना चाहते या फिर एक तो चलेगी या यदि बहुत ही भले हुए तो दो तो चलेंगी किन्तु उससे अधिक नहीं, ना, ना बाबा, क्या लड़कियों की लाइन लगानी है, जैसी बातें करते हैं, उनके दहेज की चिन्ता में दुबले हुए जाते हैं, उन्हें 'पराया धन', 'चिड़िया', 'मेहमान', 'पराई अमानत' कहते हैं या फिर 'बेटियों से ही घर की रौनक होती है', या उन्हें 'लक्ष्मी' कहते हैं, उन्हें 'पूजनीय' बनाने की चेष्टा करते हैं, उसे 'माँ' मानते हैं, उससे पैर नहीं छुआते, उसके पैर पूजते हैं। अर्थात वह सबकुछ करते हैं जो उसे सामान्य सहज न होने दे, उसे चेताता रहे कि वह अलग है, परिवार की सदस्य होते हुए भी या तो परिवार पर बोझ है या उसमें विशेष स्थान रखने वाली 'मेहमान' है जिसे जहाँ वह है वहाँ सदा नहीं रहना, जिसका घर परिवार दूर कहीं और है।

'साडा चिड़ियाँ दा चम्बा वे बाबुल असाँ उड़ जाणाँ', 'बाबुल की दुआएँ लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले' आदि गीत स्त्री का भला नहीं करते अपितु बचपन से ही ऐसे गीत व विभिन्न आशीर्वाद जैसे 'सौभाग्यवती भवः', 'पुत्रवती भवः', विभिन्न मुहावरे, लोकोक्तियाँ जैसे 'अबला तेरी यही कहानी आँचल में दूध आँख में पानी' आदि स्त्री को अपने को या तो कुछ 'कम मानव' या त्याग की मूर्ति टाइप कुछ 'अधिक मानव' मानने को प्रेरित करते हैं। यदि बच्ची अधिक सोचने विचारने वाली हुई तो ये बातें उसे उद्वेलित करती हैं, यदि नहीं तो वह इस यथास्थिति को स्वीकार कर अपने को एक 'बोझ' या 'परजीवी' मानती हुई जीती है, यदि एक और चतुर मानसिकता व बुद्धि की हुई तो 'इस परिवार' से जितना बटोर सकती है बटोरकर अपने 'असली घर' ले जाने को तत्पर रहती है, दहेज की माँग हो या न हो वह जितना हो सके जब जब हो सके 'उस घर' ले जाना चाहती है, जो देखा जाए तो तर्कसंगत है। 'यह घर' तो जब उसका है ही नहीं तो वह इससे क्यों जुड़े?

स्कूल में दसवीं में एक हिन्दी पुस्तक थी, शायद नाम था 'साहित्य श्री'। इसमें 'बिटिया की विदाई' जैसे नाम का एक पाठ था जो इतना लिजलिजा था कि इसे झेलना कठिन हो जाता था। मुझे लगभग सबकुछ पढ़ना पसन्द था, विज्ञान भी व भाषाएँ भी। किन्तु पूरे स्कूली जीवन में जो पढ़ना मुझे अंगारों पर चलने समान लगता था वह यही पाठ था। उसमें बेटी के विवाह, फेरों, 'अग्नि में अब तक के जीवन के जलकर राख होने', व 'पति की परिणीता के रूप में नए जन्म' की बात, विदाई के हृदयविदारक दृष्य का वर्णन था।  

लेखक का नाम मुझे याद नहीं किन्तु उस उम्र में भी यदि वह व्यक्ति मुझे मिल जाता तो वह मेरे शब्दबाणों से न बच पाता। किन्तु कहते हैं न कि जीवन का हर अनुभव कुछ न कुछ सिखा जाता है सो इस पाठ ने मुझे जीवन भर के लिए इन विदाई गीतों, बेटी के जन्म, विवाह, हर बार उनके घर से जाते समय की विदाई के रोने के प्रति प्रभावशून्य कर दिया। जब भी ऐसा कोई क्षण मेरे जीवन में आया, चाहे अपने विवाह के रूप में या बेटियों के विवाह के रूप में आँखें कभी गीली नहीं हुईं, मन ने कहा 'न घुघूती प्लीज़, लिजलिजी भावुकता तो रहने ही दो!' 


पिछले महीने बारी बारी दोनो बेटियाँ व जवाँई हमारे पास रहकर गए। हवाईयात्रा ने इतनी सुविधा कर दी है कि दो एक छुट्टी लेकर भी बच्चे हमसे मिलने आ सकते हैं। जब बिटिया जा रही थी तो माँ कुछ भावुक होकर शकुन्तला के जाते समय  कण्व ॠषि  द्वारा कहे शब्द दोहरा रही थीं, 'यदि मुझ जैसे वनवासी को बेटी(पाली हुई )के जाने पर इतना दुख हो रहा है तो गृहस्थों को कितना दुख होता होगा।' मैं बेटी जवाँई को छोड़ने नीचे कार तक गई और लौटकर आकर माँ से बात करने लगी। उन्हें बताया कि मेरे लिए उसका जाना जरा भी कष्टप्रद बात नहीं है।

उन्हें कहा कि बेटे या बेटी किसी का भी जाना दुखदायी नहीं है। दोनो बेटियों के विवाह में भी मैं न भावुक हुई न परेशान। जिनसे विवाह कर रही थीं उन्हें जानती थी। बेटियों पर विश्वास था, उनकी पसन्द पर विश्वास था। सो माँ को याद दिलाया कि कैसे हम निश्चिन्त थे। एक का विवाह तो रजिस्टर्ड था और हमने केवल उत्सव मनाया, कोई चिन्ता कोई परेशानी नहीं हुई। दूसरी का सप्तपदी वाला था और हमने तो विवाह की रस्म जरा लम्बी खिंच जाने पर कुछ झपकियाँ भी लीं थीं, केमरे ने जो दर्ज कर लिया। पति व मैं कई फोटो में मस्त सोते हुए पाए गए। चिन्ता, परेशानी रोना, उदास होना हमसे कोसों दूर था। एक दो मजाक हुए और माँ भी हँस पड़ीं।

बेटा हो या बेटी वे दोनों ही अपने घर जाएँगे ही। सन्तान जब बड़ी हो जाए तो वह हमसे अलग रहेगी ही। वे आए, हमारे साथ सुखद समय बिताया, बाबा (घुघूत ) का जन्मदिन मनाया अब अपना अपना काम देखेंगे अपने घर जाएँगे। शायद यह बेटियों शब्द के साथ 'आँसू चिपका देना' हमारी बचपन से कन्डिशनिंग का फल है। मैंने माँ को डीकन्डिशन कर दिया, न अपने लिए रोने दिया न बेटियों के लिए।

शायद बेटियों के जाने के साथ जो उदासी, आँसू या आँखें नम होना प्रचलित है उसका कारण एक प्रकार की असहायता है। माता पिता बेटी को दूसरे को सौंप उन दूसरों व उसके भाग्य के हवाले कर देते थे व आज भी करते हैं। बस यही कारण है कि बेटी का नाम लेते ही विदाई, आँसू शब्द भी साथ चले आते हैं। शायद इन आँसुओं के साथ माता पिता बेटी के प्रति अपना उत्तरदायित्व भी बहा देते हैं और भविष्य का कोई अपराधभाव भी।

जब बेटी विवाह से पहले व बाद में भी हमारे घर का वही हिस्सा बनी रहती है जो परिवार के अन्य सदस्य जैसे बेटे होते हैं तो पलकें भीगती नहीं, हँसी ठहाके गूँजते हैं, माँ जितना बेटी को जाते समय अपना ध्यान रखने को कहती है शायद बेटों की माएँ भी उन्हें कहती होंगी। यदि हम बेटियों को सक्षम बनाएँ, उनका साथ देने को सदा तत्पर रहें तो हम 'लिजलिजी भावुकता' को छोड़, अपनी व बेटी दोनों की आँखों में आँसुओं की जगह विश्वास व खुशी की चमक ला सकते हैं।

घुघूती बासूती

Monday, November 14, 2011

सौम्या का चलती ट्रेन से फेंका जाना, बलात्कार व हत्या व अब न्याय

क्या संसार में कोई ऐसी स्त्री होगी जिसे ऐसा अंत मिलना चाहिए? एक एक हाथ वाले भिखारी ने लेडीज़ कम्पार्टमेंट में घर लौट रही एक तेईस वर्षीय सेल्सवुमेन सौम्या को मोलेस्ट किया, जब उसने प्रतिरोध किया तो उसने उसे गाड़ी से बाहर फेंक दिया, स्वयं भी गाड़ी से बाहर कूद गया और फिर घायल सौम्या को घसीटकर सुनसान जगह ले गया और उसका बलात्कार कर उसकी हत्या की कोशिश की। अचेत सौम्या को हस्पताल ले जाया गया जहाँ पाँच दिन बाद उसकी मृत्यु हो गई।

लोग किसी भिखारी के लिए प्रायः बेचारा शब्द उपयोग करते हैं। यदि वह अपाहिज भी हो तो और भी बेचारा। किन्तु इस दुगुने बेचारे ने जिस प्रकार से एक अकेली स्त्री का शिकार किया, उसमें किसी प्रकार की बेचारगी नजर नहीं आती।

एक फास्ट ट्रैक अदालत ने गोबिन्दसामी नामक इस ३० वर्षीय ......, (क्या शब्द उपयोग किया जाए? इस कृत्य को अमानुष तो नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह कृत्य प्रायः मानव ही करते हैं) को मृत्यु दंड दिया है। वैसे इस अपराध के लिए मृत्युदंड बहुत ही उदार सजा है। यदि सौम्या के जीवन के बारे में उस क्षण से, जिस क्षण गोबिन्दसामी उसके सामने आया होगा, लेकर उसकी मृत्यु तक, सोचा जाए तो मृत्युदंड बहुत ही सरल व उदार सजा लगती है। काश कोई तरीका होता कि सम्मोहन या किसी अन्य तकनीक से गोबिन्दसामी को भी वह पीड़ा, वह भय, वह घबड़ाहट, वह दीनहीनता, असहायता, दयनीयता का भाव, वह स्वयं का असम्मान, वस्तुकरण, मानव से किसी के खिलवाड़ के लिए खिलौना बना दिया जाना, फेंक दिया जाना और फिर स्वयं का खिलौने से भी बदतर उपयोग किया जाना व फिर तोड़कर मरने के लिए छोड़ दिए जाना...... यह सब महसूस कराए जा सकते। यह सब महसूस करने के बाद ही उसे मृत्यु रूपी मुक्ति मिलती तो शायद उसे अपने अपराध का बोध होता।

बहुत पहले मैंने दो पोस्ट लिखीं थीं


सौम्या के बारे में पढ़कर मुझे ये पोस्ट्स, वह किस्सा जिसके कारण ये लिखीं, इनपर आई टिप्पणियाँ याद आ रही हैं। सोच रही हूँ कि यदि सौम्या एक हाथ वाले भिखारी का सामना नहीं कर सकी तो वह लड़की क्या यार्ड में किसी पुरुष समूह के संभावित हमले का मुकाबला कर सकती थी? एक हाथ वाला तो दो हाथ वाली से कम सक्षम होना चाहिए ना? भिखारी तो अभिखारी से कमजोर होना चाहिए ना? फिर क्यों हमारी भारतीय लड़कियाँ प्रायः दूब सी नरम, नाजुक व उस ही की तरह रौंद दी जाती हैं? प्रायः रौंदे जाने पर भी फिर से उठ बैठती हैं। क्या उन्हें सदा कमजोर ही बनाया जाता है? कम खिलाया जाता है? कम खाने, नाजुक/दुबले बने रहने की प्रेरणा दी जाती है? मुकाबला न करके रौंदे जाने को अपना प्रारब्ध मान चलना सिखाया जाता है? बचपन से मारपीट, लड़ाई झगड़े, हाथापाई से दूर रखा जाता है? अन्यथा मारपीट तो स्वाभाविक रूप से लड़के सीख ही जाते हैं फिर लड़कियाँ क्यों नहीं? क्या इसलिए कि मारपीट कर सकने वाली लड़कियों से कल कोई सरलता से मारपीट नहीं कर पाएगा, उसे डरा सहमा नहीं पाएगा?

मुझे वह फ़िज़िकल एजुकेशन वाला अध्यापक भी याद आता है जो बढ़ती उम्र की किशोरियों को कम खाकर पतला दुबला बने रहने की दिन रात सलाह देता था, वह अध्यापिका भी जो कहती थी कि इतनी लम्बी हो जाओगी तो बाद में लड़का मिलना कठिन हो जाएगा। जबकि हर फ़िज़िकल एजुकेशन वाले अध्यापक का काम लड़कियों को बलशाली, अपना बचाव करने में सक्षम बनाना होना चाहिए।

न जाने क्यों मुझे लगता है कि हमारे समाज में स्त्री का जो स्थान है (पूजनीय वाला, नारी तुम केवल श्रद्धा हो वाला और श्रद्धा को दर्द थोड़े ही होता है!और श्रद्धा कराते तो नहीं ही करती, आँचल में दूध आँख में पानी वाला, सावित्री वाला) और पुरुष को जन्म से जो ट्रेनिंग दी जाती है(कुलदीपक, जो माँगोगे वही मिलेगा, सारा संसार तुम्हारा है, आँख का तारा राज दुलारा, तुम्हारे लिए कोई बन्धन नहीं हैं, खींसे निपोर कर गाली दो, पॉर्न देखो, लड़कियों पर छींटाकशी करो, छेड़ोगे तो लड़कियाँ तुम पर वारी जाएँगी, डराओगे तो सहेली, माँ बहन पत्नी तुम्हारा आदर करेंगी, श्रेष्ठ हो, चाहे अपाहिज भिखारी ही क्यों न हो, मारो पीटो, मर्दानगी दिखाओ)वे स्त्री के प्रति अपराधों के लिए उत्तरदायी हैं।

समय आ गया है कि हमारी बेटियाँ शक्तिशाली बनें,उनका भरपूर शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक विकास हो। जैसे हर सवा पाँच फुटा छः फुटे से, हर साठ किलो का सत्तर किलो वाले से डरा सहमा नहीं रहता क्योंकि उसे डरना नहीं सिखाया जाता,उसे लगता है कि उसे भी छः फुटे या ७० या सौ किलो वाले की तरह जीने, घूमने का अधिकार है, न मिलने की स्थिति पर कानून उसकी सहायता करेगा और छः फुटे या ७० या सौ किलो वाले भी उनके इस अधिकार को समझते व प्रायः इस अधिकार का आदर भी करते हैं क्योंकि नहीं करेंगे तो कानून उनसे निपटेगा। वैसे ही स्त्री को भी शक्तिशाली बनाकर व उसे कानून का सहारा देकर निर्भय बनाना होगा। उन्हें भी वैसे ही पौष्टिक भोजन कराया जाए जैसा बेटों को कराया जाता है। गोरी सुन्दर रोल मॉडेल देकर गोरा व सुन्दर बनना ही जीवन का उद्देश्य न बनाकर साहसी व शक्तिशाली रोल मॉडेल प्रस्तुत कर साहसी व शक्तिशाली बनना भी उनका ध्येय हो पाए तो बेहतर हो।

जिस प्रकार से समाज में लोगों को अपनी शक्ति का दुरुपयोग नहीं करने दिया जाता,ट्रक वाला कार को, कार वाला स्कूटर को,स्कूटर वाला पैदल को कुचलकर नहीं जा सकता,उसी प्रकार जो व्यक्ति बलात्कार कर स्त्रियों को निर्भय हो जीने न दे उसे बलात्कार करने योग्य ही नहीं रहने दिए जाना चाहिए।

घुघूती बासूती

नोटः मैं बलात्कार के लिए मृत्युदंड के पक्ष में नहीं हूँ, क्योंकि यदि ऐसा किया जाए तो बलात्कारी बलात्कार के बाद हत्या भी करना चाहेगा। ताकि सबूत न बचें और यदि बलात्कार के लिए मृत्युदंड है तो फिर बलात्कार के बाद की हत्या के लिए एक और बार तो फाँसी पर नहीं चढ़ाया जाएगा अतःपीड़िता की हत्या लगभग निश्चित हो जाएगी। इस केस में तो हत्या भी हुई।

घुघूती बासूती

Thursday, June 16, 2011

महिलाओं के लिए चौथा सबसे खतरनाक देश भारत!

हम उस देश के वासी हैं......
१. जहाँ स्त्री जीवित जलाई जाती है।
२. जहाँ स्त्री गर्भ में मारी जाती है।
३. जहाँ स्त्रियों की ऑनर किलिंग की जाती है।
४. जहाँ स्त्री पर तेजाब डाला जाता है।
५. जहाँ स्त्री की तस्करी की जाती है।

मेरा भारत महान, इन्डिया शाइनिंग, ऊँची विकास दर और न जाने क्या क्या कहते हम थकते नहीं हैं। किन्तु थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन की कानूनी समाचार सेवा ट्रस्ट लॉ ने जो सर्वे करवाया उसके अनुसार महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश हैं...

१. अफगानिस्तान
२. कोन्गो
३. पाकिस्तान
४. भारत
५. सोमालिया

इस सर्वे में घरेलू हिंसा, महिलाओं के प्रति आर्थिक भेदभाव से लेकर एसिड हमलों को आधार बनाया गया है. इस सर्वेक्षण के तहत पांच देशों के 213 जेंडर मामलों के जानकारों से सवाल पूछे गए. इसके तहत उनसे खतरनाक का मतलब, स्वास्थ्य सुविधाओं, यौन हिंसा, हिंसा, सांस्कृतिक या धार्मिक तथ्यों से जुड़े सवाल पूछे गए.


'भारत का चौथा नंबर मुख्य तौर पर कन्या भ्रूण की हत्या और मानव तस्करी के कारण है. 2009 में तात्कालीन गृह सचिव मधुकर गुप्ता ने कहा था कि हर साल 10 करोड़ लोग खासकर महिलाओं और लड़कियों की तस्करी की जाती है. यह बात इतनी आम है लेकिन सरकार और पुलिस के चंगुल से बच जाती है.

भारत के केंद्रीय जांच ब्यूरो सीबीआई का अंदाज है कि 2009 में 90 फीसदी तस्करी देश में ही हुई और देश में करीब 30 लाख यौनकर्मी हैं जिनमें अधिकतर बच्चियां हैं.

यौन कर्मियों के अलावा मजदूरी, जबरन विवाह के मामले भी शामिल हैं. और आंकड़ें कहते हैं कि इस तरह के अवैध काम करने के वालों के खिलाफ तेजी से कार्रवाई नहीं की जा रही है।'

हम सब जानते हैं कि यह सब हमारे देश में होता है। स्त्री भ्रूण हत्या जैसी नई प्रथा का जन्म हमारे ही देश में हुआ है। प्रायः यह सोचा जाता है कि विज्ञान मनु्ष्य को समझदार बनाता है, रुढ़ियाँ तोड़ता है, लोगों की आँख खोलता है। किन्तु हमारे देश में तो धड़ल्ले से विज्ञान का दुरुपयोग स्त्री भ्रूण हत्या के लिए किया जाता है। पहले स्त्री शिशु हत्या होती थी जिससे परिवार के हाथ खून में रंग जाते थे। किन्तु अब हमने एक साफ सुथरा तरीका ढूँढा है। हस्पताल जाओ, भ्रूण का लिंग पता लगाओ और स्त्री हो तो हत्या वहीं डॉक्टर से करवाओ। न जन्म देने तक उसे झेलो और न जन्म के बाद मारने का लफड़ा।

किन्तु यह मानव तस्करी वाली बात विशेषकर उसके आँकड़ें हजम करने कठिन हैं। यदि ये आँकड़े सही हैं तो कहा जा सकता है कि हर बारह में से एक भारतीय बेचा खरीदा जाता है। क्योंकि यह मुख्यतः स्त्रियों के साथ होता है व स्त्रियों की जनसंख्या यदि ५८.६ करोड़ मानकर चलें तो यह मानना कि उनमें से १० करोड़ या यदि यह भी मान लें कि इसमें से एक करोड़ तस्करी लड़कों की होती होगी तो भी ५८.६ करोड़ स्त्रियों में से ९ करोड़ की तस्करी होती है मानना काफी कठिन है। इसका अर्थ हुआ कि १५.३५ प्रतिशत स्त्रियों की तस्करी होती है। किन्तु यह बात असम्भव सी लगती है। मुझे लगता है यह लाख, करोड़ और मिलियन बिलियन को मिलाकर बोलने के कारण है। अचानक हम मिलियन बिलियन में बात करने लगे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि 2009 में तात्कालीन गृह सचिव मधुकर गुप्ता ने जब कहा था कि हर साल 10 करोड़ (१०० मिलियन ) लोग खासकर महिलाओं और लड़कियों की तस्करी की जाती है तो कहीं वे १०० लाख तो नहीं कह रहे थे। वैसे भारतीय १०० लाख नहीं १ करोड़ सोचता है। 'In 2009, India's Home Secretary Madhukar Gupta had remarked that at least 100 million people were involved in human trafficking in India, according to the survey.' कहीं ऐसा तो नहीं है कि १ करोड़ लोग बेचे खरीदे नहीं जाते बल्कि कुल मिलाकर १ करोड़ लोग बिकते, बेचते खरीदते हैं व इस धंधे से जुड़े हैं।

जो भी हो, यदि ये आँकड़े कुछ गलत भी हों, तो भी दस बीस प्रतिशत कम करके भी कहें तो भी इन आँकड़ों व संसार में स्त्रियों के लिए इतनी खतरनाक जगह होने के लिए हमें लज्जा तो आनी ही चाहिए साथ साथ 'यत्र नारी पूजयन्ते' वाली सुभाषित को भी बदल 'जहाँ नारी गर्भ में ही मारी जाती हो' जैसी कोई नई सुभाषित रचनी चाहिए। साथ साथ अपने जीवित होने व बेचे खरीदे न जाने को भी अपना सौभाग्य मानना चाहिए।

घुघूती बासूती

Friday, May 07, 2010

क्या किसी के कहने से मैं अपनी कलम का रुख बदल दूँ?.......................घुघूती बासूती

परसों की मेरी पोस्ट पर एक युवा मित्र ने मुझे सुझाव दिया है कि मैं अपनी कलम का रुख बदल दूँ। उनका कहना है कि स्त्रियों को लेकर मेरी कलम एक तरफ ही चलती है। उनका सुझाव है कि मुझे स्त्रियों के शरीर को अधिक ढकने के लिए कुछ करना चाहिए। गर्मी की भरी दुपहरी उनके शरीर का पूरा ढका न होना मित्र को कष्टप्रद लगता है। यदि वे अपने शरीर को गरीबी के कारण नहीं ढक पा रहीं तो यह चिन्ता का विषय है किन्तु यह चिन्ता सर्दियों में अधिक सही होगी। यदि यह उनकी पसन्द का मामला है तो मैं इस 'स्त्री को अधिकाधिक वस्त्र पहनाओ' आन्दोलन से नहीं जुड़ सकती। मेरे लिए यह महत्वपूर्ण तो क्या कोई मुद्दा ही नहीं है। मुद्दे ही ढूँढने हैं तो और ढेरों हैं।

एक और बात, मैं न तो धर्म( religion) के अनुसार चलती हूँ , न मैं कोई काम आँख मूँदकर इसलिए करती हूँ कि कोई संस्कृति यह कहती है। यदि मैं किसी बात को ठीक समझती हूँ तो अवश्य करती हूँ, यदि मेरा कोई प्रिय मुझसे कुछ करवाना चाहे तो यदि उससे मेरे किसी विश्वास या नैतिकता पर आँच नहीं आती तो मैं कर लेती हूँ। जिस संस्कृति का मुझपर थोड़ा बहुत प्रभाव पड़ा है उस संस्कृति में कपड़े केवल कपड़े होते हैं, अच्छाई या नैतिकता या धर्म का कोई तमगा नहीं। इसके अनुसार सब लोग, कबीले आदि अपनी सुविधानुसार, अपने प्रदेश के जलवायु व जीवनोपार्जन के साधनों के अनुसार कपड़े पहनते हैं या कम से कम पहनते थे। वे कपड़े किसी दूर देश जन्मे किसी नैतिकता या धर्म का दर्शन सिखाने वाले के कहे अनुसार नहीं पहनते थे। अब आज यह चलन हो गया है कि सब लोग किसी एकदम अलग जलवायु, वातावरण, परिस्थितियों व जीवनोपार्जन के बिल्कुल अलग साधनों वाले देश में बने सदियों पहले के नियमों का कड़ाई से पालन करें तो मैं इस लड़ाई में विरोधी दल में ही रहूँगी। मुझसे सहायता की अपेक्षा न करें।

मैं जहाँ से आती हूँ याने उत्तराखंड, वहाँ स्त्रियाँ किसी गुड़िया की तरह लपेटकर अलमारी में नहीं सजाई जातीं। वे कठिन काम करती हैं। वे अपनी भैंसों के लिए जंगलों में घास काटती हैं, पेड़ों पर चढ़कर पत्ते तोड़ती या काटती हैं, खेतों में काम करती हैं, नौले(स्रोत)या नदी की धारा से पानी भरकर लाती हैं, दूध दुहती हैं, गोबर को खाद के गड्ढे में सम्भालती हैं,भैंस को नहलाती हैं,धान कूटती हैं,घर को गोबर से लीपती हैं। अब ये सब काम तो ऐसे नहीं हैं कि स्त्री ढेरों कपड़ों में लिपट कर करे। जैसे महाराष्ट्र में स्त्रियाँ लाँघ वाली साड़ी पहनकर ढेरों काम करती थीं (व हैं),इस बात से बेखबर कि उनकी टाँगों की पिंडलियाँ दिख रही हैं। जैसे मेरी कामवाली काम पर आते से ही साड़ी ऐसे खोंस लेती है कि वह घुटनों के ऊपर ही रह जाती है।
उत्तराखंड में सदियों से मेरे पूर्वज, स्त्री व पुरुष पूर्वज, एक धोती में खाना बनाते भी थे और खाते भी थे। खाना बनाने वाली घर की ही कोई स्त्री, बहू, माँ, भाभी,सास होती थी व जिन्हें वे खाना थाली में डालकर देती थीं वे उस घर के पुरुष भी होते थे जो ससुर, जेठ या देवर भी हो सकते थे। अब वे एक दूसरे को कितना घूर घूर कर देखते थे व एक दूसरे को नजरों में ही कितना नापते थे यह तो मैं नहीं जानती। किसके कितने अंग दिख रहे हैं या बिना अन्तःवस्त्रों(एक नान धोत अर्थात छोटी सी धोती अन्दर से तौलिए की तरह और लपेट ली जाती थी। ) के कितना अनुमान लगाया जा सकता है, इस कार्यक्रम से मैं बिल्कुल अनभिज्ञ हूँ। परन्तु वहाँ अराजकता थी या इतना नैतिक पतन हुआ कि लोग धरातल में चले गए ऐसा मैंने नहीं सुना। हाँ, यह अवश्य देखा है कि उस वातावरण में रही केवल दो कक्षा स्कूली शिक्षा पाई मेरी माँ के लिए हमारे कपड़े कभी भी मुद्दा नहीं बने और आज ८७ वर्ष की उम्र में भी नहीं हैं। उनकी अपेक्षा कुछ युवा मित्र वस्त्रों को लेकर यूँ चिन्तित हैं जैसे वस्त्र के लिए मनुष्य बना हो, वस्त्र मनुष्य के लिए नहीं। याद रहे कि इन्हीं स्त्रियों में इतना साहस था कि इन्होंने चिपको आन्दोलन चलाया था।

मेरी झारखंड में रहने वाली बंगला सहेली मीना की माँ भी गर्मियों भर ब्लाउज नहीं पहनती थी। वैसे वे कोई आदिवासी नहीं बंगला ब्राह्मण थीं। शायद बिगड़ने को वे कॉलेज तो क्या स्कूल भी नहीं गईं थीं। उड़ीसा , बंगाल, मध्य प्रदेश, झारखंड व सारे आदिवासी इलाकों में स्त्रियाँ कम से कम गर्मियों भर तो केवल एक धोती में रहती थीं। ब्लाउज नामक वस्त्र नहीं पहनती थीं। मुझे याद है कि एक युवा इन्जीनियर के माता पिता मध्य प्रदेश से आए। हम बच्चे यह देखकर दंग रह गए कि उच्च वर्ग की उनकी माताजी केवल धोती पहनती थीं पेटीकोट नहीं। तब माँ ने बताया था कि सन १९४३ के आस पास जब वे कटनी क्षेत्र में रही थीं तो अधिकाँश स्त्रियाँ ब्लाउज भी नहीं पहनती थीं। हो सकता है कि पेटीकोट भारतीय मूल का वस्त्र ही न हो। शायद हम अनसिले कपड़े ही पसन्द करते हों।

शायद इसीलिए मेरी जानकारी के अनुसार भारत में दर्जी कोई जाति ही नहीं है। जबकि राम के जमाने से ही रजक याने धोबी रहे हैं। हमारी संस्कृति में बहुत खुलापन था और हमें उस पर गर्व होना चाहिए। आप यदि १७०० या १८०० सन को भारतीय संस्कृति मानते हैं तो क्यों नहीं पीछे जाते? क्यों नहीं उस समय पर जाते जब भारत में विदेशी हमलावर नहीं आए थे? यदि समस्या है कि कितना पीछे जाएँ तो जाने दीजिए। चलिए आगे बढ़िए और जियो और जीने दो।


अब आप चाहें कि किसी सुदूर देश में बने कायदे कानून हम इसलिए मानें कि कुछ सदियों तक उन नियमों को मानने वालों ने हम पर शासन किया और उनके साथ रहने वाले शहरी लोग उनकी नकल कर स्वयं को भी शासक वर्ग से जोड़ने लगे तो मेरे लिए यह सम्भव नहीं है। मैं नकल भी तभी करूँगी और करती हूँ भी जब मुझे वह व्यवहार, वस्त्र आदि या तो सुविधाजनक लगें या भाएँ। यह कैसे सम्भव होगा कि इस कृषिप्रधान देश की, गाय भैंस पालने वाली स्त्रियाँ उनके वस्त्र पहनें जहाँ लीपने को कोई मिट्टी का फर्श तो क्या मिट्टी ही नहीं थी,लीपने को गोबर नहीं था, चढ़ने को पेड़ ही नहीं थे,काटने को घास ही नहीं थी,भरने को पानी भी कितना रहा होगा, कह नहीं सकती। कैसे तो वे जीते होंगे? शायद दूसरों के देशों पर कब्जा जमाकर या पता नहीं कैसे। किन्तु उनका रहनसहन, उनके मूल्य मैं क्यों अपनाऊँ। या फिर मैं उन विक्टोरियन मूल्यों या वस्त्रों को क्यों अपनाऊँ जो कभी यहाँ का नया शासक वर्ग पहनता था या जीता था। तब जब वे मेरी पसन्द भी न हों।

आप पूछेंगे कि फिर पश्चिम के वस्त्र व मूल्य क्यों अपनाने को तैयार हूँ? मेरी इच्छा। वैसे यहाँ एक बात साफ हो जानी चाहिए कि ये वस्त्र व विचार आज के पश्चिम के हैं, आज से एक हजार या पन्द्रह सौ वर्ष पहले के नहीं। शायद मुझे पसन्द हैं, शायद सुविधाजनक लगते हैं, शायद पश्चिम से हमने बहुत कुछ सीखा है, शायद आज पश्चिम व हमारे विचार कुछ मिलते जुलते हैं, शायद पश्चिम मुझे प्रगतिशील लगता है, शायद हमारे पुरुष भी पश्चिमी वस्त्र पहनते हैं। कारण जो भी हों यदि मेरे चुने हुए हैं, मुझ पर थोपे नहीं गए हैं तो किसी को क्या कष्ट? वैसे आप क्या जानें कि मैं क्या पहनती हूँ? और यह आपकी चिन्ता का विषय भी क्यों होए?

भारत की गर्मियों में पुरुष का कोट पहनना या सूट पहनना विचित्र लगता है। परन्तु उसे लगता है कि वह उसे पहन कर जँच रहा है सो पहनता है, नित्य नहीं तो विशेष अवसरों में। परन्तु वही पुरुष अवसर मिलते से ही या ए सी से दूर होते से ही कोट को उतार फेंकता है। कारण,यह सर्दियों को छोड़कर हमारे जलवायु के अनुकूल नहीं है। ठीक वही हाल स्त्री को पूरा ढकने वाले धार्मिक आस्थाओं वाले वस्त्रों का है। मजबूरी के अतिरिक्त शायद ही कोई शौक से उसे घर में पहनकर बैठती होगी या आराम करती होगी। इन वस्त्रों की भी समय, स्थान व परिस्थितियों के अनुसार उपयोगिता होगी ही। मुझे याद है मैंने जीवन के तीन वर्ष एक मरुस्थल में बिताए थे। एक दो बार जब रेत की आँधी चली तो मुझे भी अपनी साड़ी के आँचल से अपना चेहरा तक ढकना पड़ा। इससे मेरी आँखों में रेत नहीं गई और मेरे बाल भी रेत से बच गए। यह तब जब हमारे घर में दिन रात पानी आने की व्यवस्था थी क्योंकि समुद्री पानी से खारापन निकालकर पानी चौबीसों घंटे मिलता था। सोचिए कि आज से हजार, पन्द्रह सौ साल पहले पानी की भी कमी होगी और सुविधाओं की भी। शायद तब सिर ढकने से लम्बे समय तक सिर धोने से बचा जा सकता हो। अन्यथा रेत की आँधी झेलने के बाद सिर धोने के लिए अमूल्य पानी खर्च करना पड़ता। तो यह उस स्थान की, उस युग की मजबूरी रही होगी। स्त्री व पुरुष का अपने वस्त्रों के ऊपर एक और लबादा पहनना भी अपने वस्त्रों को बचाने का एक व्यवहारिक उपाय था। किन्तु आज भारत में रहकर, यहाँ की गर्मी में अपने को पकाने को मैं तो कतई तैयार नहीं हूँ,न धर्म के लिए, न संस्कृति के लिए न किसी अन्य कारण से।

जहाँ तक धर्म की या भगवान की ऐसी किसी इच्छा का प्रश्न है तो एक तो मैं धार्मिक नहीं उसपर जिस धर्म में मैं जन्मी उसमें ऐसी किसी बात का जिक्र नहीं है। होता भी तो कोई अन्तर नहीं पड़ता। फिर मैं क्यों किन्हीं अन्य परिस्थितियों, अन्य काल, अन्य स्थान में जन्मे किसी धर्म से यूँ प्रभावित होऊँ कि सबकुछ छोड़ छाड़कर वस्त्रों के पीछे डंडा लेकर चल पड़ूँ? जो भगवान को मानते हैं व उसकी शक्ति में विश्वास करते हैं वे यह भी समझ सकते हैं कि यदि वह वही है जैसा वे मानते हैं तो उसमें इतनी शक्ति तो होती ही कि जिसे वह कपड़ों में ममी की तरह लपेटना चाहता उसे अधिक नहीं तो कम से कम फर से तो ढक ही देता!यह वह कुत्ते, बिल्ली, शेर, चूहे आदि के लिए कर सकता था तो मानवी के लिए क्यों नहीं? वैसे तो वह सर्व शक्तिमान उसे लबादे में भी जन्म दे सकता था। या फिर लबादा उतारते से ही मौत के घाट उतार सकता था।

तो भाई मेरे, यह समस्या ईश्वर की नहीं है। यह समस्या आपकी आँखों की है। अब यदि सूरज की किरणों से आप परेशान होते हैं तो धूप का चश्मा कौन पहनता है? आप ना? सूरज को तो न आप ढक सकते हैं न नष्ट कर पाते हैं, सो अपनी आँखों को चौंधियाने से बचाने को स्वयं ही कुछ उपकरण पहन लेते हैं। आप तो पुरुष हैं,सामर्थ्यवान हैं, क्यों नही ऐसा कुछ खोज लेते जिसको पहन आपको सब नारियाँ कपड़ों में लिपटी नजर आएँ। आपकी समस्या भी हल हो जाएगी और स्त्री की भी।

यहाँ एक युवती की हत्या हो गई।(यदि आत्महत्या भी हुई तो भी वे क्या कारण थे कि एक स्त्री जो विवाह रचाना चाहती थी, जो सन्तान को जन्म देना चाहती थी वह स्वयं मृत्यु को गले लगा ले? ) हत्या भी केवल और केवल सम्मान या कहिए झूठी प्रतिष्ठा के लिए और आप हैं कि कपड़ों के पीछे पड़े हैं, स्त्री कितनी ढकी है इसके लिए चिन्तित हैं। मुझे याद है कि बहुत पहले मैंने कहा था कि यदि स्त्री को जला भी दिया गया हो और वह मर रही हो, पीड़ा से यहाँ वहाँ भाग रही हो, तो भी समाज के ठेकेदार कहेंगे कि जरा यूँ उकड़ू हो बैठ जल कि तेरा शरीर हमें उत्तेजित न करे। अब और क्या कहूँ? यदि अपने पिता और अपने युग के पुरुषों से हताशा थी तो अब अपने बच्चों से भी कम उम्र के पुरुषों से और भी अधिक हताशा है। इन्हें हमसे अधिक महत्वपूर्ण हमारे कपड़े लगते हैं। हम जिएँ या मरें, हमारे कपड़े सही ढंग से हमें ढक रहे हों, बस यह इनकी चिन्ता है। क्या यदि हम जलते मकान से कम वस्त्रों में बाहर निकलेंगी तो ये हमें और वस्त्र पहनकर आने को वापिस जलते मकान में धकेल देंगे? हमें इन्हें यह अधिकार कदापि नहीं देना है। हमें जीना है और अपने मूल्यों पर जीना है, अपने लिए जीना है।


घुघूती बासूती

Wednesday, May 05, 2010

क्या आपने कभी सुना है.........घुघूती बासूती

क्या आपने कभी सुना है कि किसी माता पिता ने अपनी प्रतिष्ठा/सम्मान के लिए अपने......
१. गंजेड़ी, नशेड़ी पुत्र की हत्या कर दी?
२.बलात्कारी पुत्र की हत्या कर दी?
३.देशद्रोही पुत्र की हत्या कर दी?
४.आतंकवादी पुत्र की हत्या कर दी?
५.हत्यारे पुत्र की हत्या कर दी?
६.घूसखोर पुत्र की हत्या कर दी?
७.बेईमान पुत्र की हत्या कर दी?
८. चोर,डाकू, जेबकतरे,अपहरणकर्ता पुत्र की हत्या कर दी?

और भी बहुत से अनैतिक कृत्य होंगे जिन्हें आप यहाँ जोड़ सकते हैं। परन्तु शायद 'मदर इन्डिया' के बाद ऐसा नहीं हुआ या दिखाया गया।

यदि माता पिता अपना सुख चैन गंवाकर, अपना पेट काटकर और भी न जाने क्या क्या करके बच्चों को बड़ा करते हैं और बच्चों का जीवन इस उपकार का बन्धक होता है तो यह उपकार तो और भी बड़ी मात्रा में पुत्र पर भी किया जाता है तो इसी अधिकार से वे पुत्र की हत्या क्यों नहीं करते? क्या इसमें भी हानि लाभ का गणित आड़े आता है? क्या हिसाब लगाया जाता है कि पुत्र कितना कमाकर देगा या मुखाग्नि देकर स्वर्ग का टिकट कटवाएगा? मातृत्व व पितृत्व भी यदि गणित में जकड़ा है तो फिर इस रिश्ते में ऐसी विशेषता रह ही क्या गई? क्यों इसकी पवित्रता का ढोल पीटा जाता है? क्यों नहीं हम यह मान लेते कि हम अपने सुख के लिए माता पिता बने ? क्या माता या पिता बनना अपने आप में काफी नहीं है? क्या उसके लिए हम कोई मूल्य चाहते हैं? यह नहीं भूला जा सकता कि चयन या विकल्प का अधिकार केवल माता पिता के पास है, संतान के पास नहीं। सो माता पिता बनना हमारी पसन्द थी, संतान बनना संतान की नहीं।
दोनों प्रश्नों के उत्तर चाहिए।

घुघूती बासूती

Friday, April 02, 2010

सानिया प्रसंगः सानिया और उनके प्रशंसकों को उनका निर्णय मुबारक!...........घुघूती बासूती

सानिया वाले प्रसंग में जो कुछ बिन्दु महत्वपूर्ण हो सकते हैं उनमें से कुछ ये हैं.....

१.सानिया हम सबकी तरह स्वतन्त्र हैं किसी से भी विवाह करने या न करने के लिए।

२.यह बात सभी मानते नहीं तो जानते हैं किन्तु जब बात पाकिस्तान की आती है तो हम मस्तिष्क से नहीं मन से सोचते हैं।

३.सानिया केवल एक स्त्री, खिलाड़ी या भारतीय ही नहीं हैं वे एक नायिका बन गई हैं, हृदय साम्राज्ञी, भारतीय यूथ आइकन! उन्होंने इस प्रतिष्ठा की माँग की थी या नहीं यह अलग बात है किन्तु इसको उन्होंने भुनाया भी खूब है।

४. जब आप नायक या हृदय सम्राट या साम्राज्ञी बनते हैं तो उसके बहुत से लाभ व हानि होते हैं। लाभ के तौर पर लोगों का अपार प्यार, सम्मान, और इस कारण से ढेरों विज्ञापन व अपार धन व वी आइ पी स्टेटस मिलता है। हानि के रूप में आपको सार्वजनिक जीवन में वही करना पड़ता है जो आपके इन चाहने वालों को पसन्द हो। आप जिस स्थान पर हैं वे इन्हीं के कारण हैं। अन्यथा विश्व टैनिस में जो रैंकिंग सानिया की है वह ऐसी महान भी नहीं है। महान होती भी तो खेल के लिए तमगे, पुरुस्कार व डॉलर मिलते ही रहते हैं। जो विज्ञापन की कमाई व वी आइ पी स्टेटस मिला है वह इसी पागल, भावुक भीड़ के कारण मिला है।

भगवान भी भगवान इसलिए होता है क्योंकि उसके भक्त होते हैं। भक्ति करना छोड़ दीजिए तो भगवान की भगवानियत भी नाम की ही रह जाएगी। किसी महान नेता के सड़क से गुजरने पर नारे मत लगाइए, उसकी जय मत बोलिए और देखिए वह कैसे हीन भावना से ग्रस्त हो जाएगा।

५.सानिया कुछ भी कर लें उनकी टैनिस की उपलब्धियाँ उनके साथ रहेंगी किन्तु उनके चाहने वालों को यह अधिकार है कि वे उन्हें अपना प्यार देना बन्द कर दें, उन्हें अपने हृदय के साम्राज्य से बेदखल कर दें या उनसे रूठ जाएँ। कानूनन उन्हें सानिया के जीवन में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। परन्तु कानूनन सानिया को भी लोकप्रिय रहने का कोई अधिकार नहीं है।

६.यह भी सोचने की बात है कि यदि ऐसे ही किसी पाकिस्तानी स्त्री से हमारे किसी नायक ने विवाह किया होता तो भी क्या इतनी हाय तौबा होती? या तब यह लगता कि चलो एक पाकिस्तानी को भारतीय बना दिया? पता नहीं।

७. सानिया ने भारतीयों की भावनाओं या अपने भविष्य को ध्यान में रखकर दुबई में रहने का निश्चय किया है या कम से कम ऐसी घोषणा की है। यह शायद उन्होंने 'जोर का झटका धीरे से लगे' के अन्तर्गत किया है।

८. जो सबसे बड़ी बात है वह यह है कि..
क. सानिया टैनिस अच्छा खेलती हैं या शायद बहुत अच्छा।
ख. उनकी शक्ल सूरत लोगों को पसन्द है।
ग. वे लोकप्रिय हैं।
घ. वे सफल टैनिस खिलाड़ी होने के साथ साथ सफल मॉडेल भी हैं।
ड़. वे धनवान हैं।

किन्तु जो बात सबसे महत्वपूर्ण है वह यह है कि इतना सब होने पर भी वे न तो स्त्री के लिए आदर्श हैं न मनुष्य के लिए। वे उभरते टैनिस खिलाड़ियों, खिलाड़ी लड़कियों, मॉडेल्स आदि के लिए अपने प्रमुख क्षेत्रों खेल व मॉडेलिंग की आदर्श शायद हो सकती हैं।

वे इन बातों में भी आदर्श हो सकती हैं कि
१.अपना काम करो और किसी समाज के ठेकेदार पर कान न दो।
२.जो मन करे वह पहनो।
३.जितना धन कमा सकती हो कमाओ।
४.जिससे मन करे विवाह करो। यह निर्णय केवल उनका व उनके मंगेतर व उनके जीवन के महत्वपूर्ण लोगों से सम्बन्ध रखता है।
५.यदि किसी से सगाई हो भी जाए तो यदि लगे कि निभेगी नहीं तो उसे तोड़ दो ताकि बाद में दोनों का जीवन नर्क न बने।
६. अर्थात वे एक स्वतन्त्र व्यक्ति हैं व अपने ढंग से जीवन जीती हैं।
आदि आदि।

किन्तु वे कबसे कोई दार्शनिक या विचारक हो गईं कि वे हमारा आदर्श बन जाएँ? यदि आपको याद हो तो कुछ महीने पहले ही उन्होंने एक विचित्र इन्टरव्यू टी वी पर दिया था। शब्द इधर उधर हो सकते हैं किन्तु सार नहीं। उन्होंने कहा था.....
'यदि शादी करने के बाद भी खेलना है तो शादी करनी ही क्यों है?'और उसके बाद एक बेहद मूर्ख व फूहड़ हँसी। ऐसे जैसे जो ऐसा सोचती या करती हैं वे सब महामूर्खाएँ हैं। मैं प्रायः भुलक्कड़ हूँ किन्तु वह बात व हँसी इतनी मारक थी कि कभी भी नहीं भूल सकती। वह उन सब स्त्रियों का अनादर था जो विवाह के बाद नौकरी करती हैं, पढ़ाई करती हैं, रिसर्च करती हैं, अभिनय करती हैं, मॉडेलिंग करती हैं, चित्र बनाती हैं, पत्रकारी करती हैं आदि। वह मेरी जैविक व मानस बेटियों (या जो मेरी बेटी समान हैं) का अनादर था।
किन्तु उन्होंने कब कहा था कि वे प्रबुद्ध हैं? कि उनका कोई महान जीवन दर्शन है? जो उन्हें सही लगता है वे वह करें जो अन्य स्त्रियों को सही लगता है वे वह करेंगी।

यदि हम उन्हें उनके विचारों के लिए महान मानें या उनके विचार जानना चाहें तो यह कुछ वैसा होगा जैसा स्वामी रामदेव से विमान उड़ाना सीखना, तरला दलाल से पुलिस की समस्याएँ जानना, आदि आदि। बेहतर होगा कि हम उनका अनुसरण केवल उनके क्षेत्र में करें न कि अन्य क्षेत्रों में भी।

अन्त में, हमारे कुछ मित्रों व जम्मू कश्मीर की सरकार के विचारों में कोई विशेष अन्तर नहीं है। वहाँ वे यह बिल ला रहे थे, शायद कानून बन भी गया हो कि जो भी जम्मू कश्मीर की नागरिक स्त्री किसी जम्मू कश्मीर के बाहर के नागरिक से विवाह करेगी वह जम्मू कश्मीर की नागरिकता, वहाँ जमीन खरीदने का अधिकार आदि खो देगी, शायद मतदान का भी। मुझे तो आश्चर्य है कि जीवन का अधिकार क्यों बक्श दिया? खाप तो वह भी नहीं बक्शतीं! यहाँ हमारे मित्र यह सुझा रहे हैं कि उन्हें भारत की तरफ से न खेलने दिया जाए। वे भारतीय नागरिक रहना चाहें तो भी उन्हें यह अधिकार न दिया जाए। स्त्री के साथ जो उस पर हमारे या किसी अन्य के अधिकार, उसका हमारी या किसी अन्य की जागीर बनने का भाव मन में उपजता है वही सबसे बड़ी समस्या है। इसका समाधान बहुत सरल भी नहीं है। शायद बार बार झटके ही इसका इलाज हैं। और ये झटके तो अब समाज को लगते ही रहेंगे। सब सानिया भी नहीं होंगी जो 'जोर का झटका धीरे से लगे' में विश्वास करती हैं।

सानिया को भी अब अपने प्रशंसक खोने के लिए तैयार रहना चाहिए। उन्होंने अपने अधिकार का उपयोग कर अपने मनपसन्द से विवाह करने का निर्णय किया है तो बहुत से प्रशंसकों ने प्रशंसक पद से त्यागपत्र देने का। दोनों को उनके निर्णय मुबारक!

घुघूती बासूती

चिट्ठाचर्चा

Saturday, March 20, 2010

एक टिप्पणी, एक लेख .....................घुघूती बासूती

इस लेख में बहुत कुछ जोड़ भी सकती हूँ किन्तु वह फिर कभी। यह बस यूँ ही नारी पर टिपियाते हुए (स्त्री के मन से अनायास निकला हुआ) कह दिया। जोड़ने को माँ के साथ हुए अनगिनित वाद विवाद व वार्ताएँ हैं, हजारों वे बातें हैं जो आज तक अनकही रह गईं। कहने पर उलाहने मिलने की संभावनाएँ ही अधिक रहती हैं। कभी स्त्री के हाजिर जवाब होने पर यह सुनने को मिलता है कि यूँ ही पटर पटर जवाब देती होगी इसीलिए........... कुछ भी जोड़ सकते हैं जैसे ससुराल वाले नाराज होते होंगे, पति नाराज होता होगा आदि आदि। यदि अभागिन हुई तो पिटाई होती होगी आदि। जो गुण पुरुष को नेता बनाते हैं वे ही स्त्री को दुष्टा, कलमुँही व न जाने क्या क्या बनवाते हैं। आप मन मस्तिष्क का उपयोग करना चाहती हैं किन्तु जिस पोस्ट के लिए आपने अर्जी दी थी वहाँ केवल समर्पण की आवश्यकता है। आप गलत समय पर गलत ग्रह में गलत जीन्स लेकर आ गई हैं। बचपन के सारे गुण अचानक अवगुण बन जाते हैं। बार बार सुनने को मिलता है कि तुम्हें तो वकील होना चाहिए था। जो यह भी सिद्ध करता है कि तर्क सही ही है किन्तु चुभता है। स्त्री होने की कीमत काफी अधिक चुकानी पड़ती है प्रायः.।

खैर, आप टिप्पणी पढ़िए........

रचना जी, विज्ञापनों का जो मुद्दा उठाया गया है वह अपनी जगह ठीक है। वहाँ विचित्र व आपत्तिजनक विज्ञापनों की बात हो रही थी।

समस्या रवैये या कहिए attitude की है। इसका कोई सरल उपाय नहीं है। यह रवैया ही टिप्पणियों में चाहे अनचाहे झलकने लगता है। यह सदियों के अनुकूलन/ conditioning का परिणाम है। स्त्रियों का यहाँ, वहाँ, हर ब्लॉग पर भ्रमण करना कुछ व्यक्तियों के अवचेतन मन पर वही प्रभाव छोड़ता है (प्रहार करता है ) जो एक दो पीढ़ी पहले स्त्रियों को अड़ोस पड़ोस में जाकर बैठने, बतियाने, या मेला देखने, घूमने जाने पर होता था। लगता था कि ये खाली (पंजाबी में वेल्ली जनानी ) औरत समय बरबाद कर रही है। यह फालतू, घटिया औरत है। स्त्री से हर समय स्वयं को काम में व्यस्त रखने की अपेक्षा की जाती थी। यदि सब काम खत्म हो जाएँ तो सिलाई, कढ़ाई, बुनाई तो कर ही सकती थी,(मैं भी करती रही हूँ।) किसी का सिर या पैर दबा सकती थी।

लोग कहना तो शायद सही ही चाहते हैं किन्तु आदत ही ऐसी पड़ गई है कि यदि स्त्री की बात करनी है तो कुछ छोटा दिखाने वाले ( derogatory) शब्द या भाषा, या फिर सीख देने वाली भाषा अनचाहे ही अपने आप कूदकर चली आती है। मायावती, सोनिया,ममता व अपने कार्यक्षेत्रों में जब अधिक से अधिक सामना स्त्री बॉसेज़ से होने लगेगा तो यह सब अपने आप ही छूटता जाएगा। यह कुछ कुछ वैसा ही है जैसे छोटे बच्चे से बात करते समय बहुत से लोग तुतलाने वाली भाषा की मोड में आ जाते हैं, बच्चे के गाल नोचने लगते हैं आदि। हम हर समय चैतन्य नहीं रहते हैं, प्रायः स्वचालित/ औटो पायलेट वाली मोड में जीते हैं और यह उनकी स्वाभाविक यन्त्रवत प्रतिक्रिया होती है।

जहाँ तक 'स्त्रियाँ कहाँ हैं, क्यों नहीं बोल रहीं' का उत्तर है तो क्या कभी ऐसा हुआ है कि आप समाचारपत्र पूरा का पूरा बिना एक स्त्री के रूप में आहत हुए पढ़ लें? या फिर ढेर सारे ब्लॉग बिना आहत हुए पढ़ लें? हाँ, हमें आपत्ति करनी चाहिए किन्तु कब तक और किस किस की? हम करते हैं, परन्तु बीच बीच में चुप भी हो जाती हैं। कश्मीर में स्त्रियों की नागरिकता को लेकर, महाराष्ट्र में बच्चों के अधिवास को लेकर जहाँ डोमिसाइल उस ही को मिलेगा जिसका पिता महाराष्ट्र में पैदा हुआ हो,या न्यायाधीष जब कहें कि पीड़िता को अपने बलात्कारी से विवाह करने का अधिकार होना चाहिए? हाँ, अवश्य होना चाहिए। किन्तु तब जब वह अपनी सजा भी पूरी कर ले। घर, बाहर, सड़क, दफ्तर, कॉलेज कौन सा स्थान ऐसा है जहाँ हमें इस रवैये का सामना नहीं करना पड़ता? यदि सड़क पर पुरुष सीटी बजाता है,बुरा व्यवहार करता है तो हमें कपड़ों पर उपदेश मिल जाते हैं। यदि स्त्री का बलात्कार होता है तब भी। यदि घर पर स्त्री का उत्पीड़न होता है तो या तो यह कहा जाता है कि तुमने ही पति को मारने को उकसाया होगा या यदि सास द्वारा उत्पीड़न हो तो यह सुनने को मिलता है कि 'स्त्री ही स्त्री की शत्रु है।'

तो जब आप रैगिंग का विरोध करते हैं तो क्या हम च च च कहने की बजाए यह कहती हैं कि 'पुरुष ही पुरुष का शत्रु है?' या फिर जब आप कहते हैं कि नगर में अपराध बढ़ गया है, हत्याएँ हो रही हैं, खुले आम घूस माँगी जा रही है या फिर जब कहीं पुरुषों पर लाठी चार्ज होता है तो क्या वही ब्रह्म वाक्य 'पुरुष ही पुरुष का शत्रु है' कह देते हैं? या फिर यदि पति दफ्तर से परेशान सताया हुआ,पुरुष बॉस की झाड़ खाकर आता है तो गरम चाय देने या उसके घावों पर मरहम लगाने की बजाए यह कह देती हैं कि 'पुरुष ही पुरुष का शत्रु है।'

स्त्री दफ्तर से आती है तो आते से ही उसे रसोई में घुसना चाहिए, पति, ससुर सास को चाय देकर भोजन बनाना चाहिए। क्योंकि वह नौकरी करके किसी पर उपकार नहीं कर रही। बड़ी अफसर होगी तो दफ्तर में। किन्तु जब पति उस ही दफ्तर से उस ही पद से काम करके आता है तो वह थका होता है, उससे उलझना नहीं चाहिए, उसे एक मुस्कान के साथ चाय देनी चाहिए। फिर निर्बाध टी वी देखने देना चाहिए।

समाज को बदलने में समय लगेगा। यदि बदलाव में उन्हें अपना लाभ दिखेगा तो जल्दी बदलेंगे यदि हानि तो देर लगाएँगे। खैर बदलना तो पड़ेगा ही। हमें क्रोध आना स्वाभाविक है किन्तु साथ साथ इस समाज की मानसिकता को भी समझना ही होगा। यह समझना होगा कि वे हम पर आक्रमण नहीं कर रहे,हमारे प्रति उनकी भाषा ही ऐसी है,लहजा ही ऐसा है। यदि स्त्री शक्तिशाली बनें,ऊँचे पदों पर बैठें तो देखिए लहजा, भाषा सब बदल जाएँगे, कम से कम स्त्री के सामने तो।

घुघूती बासूती

Thursday, March 11, 2010

भारत में स्त्री की औकात

लीजिए बहनो और भाइयो, यदि आप किसी भ्रम में जी रहे थे तो तुरन्त उससे बाहर निकल आइए। यदि आप भारतीय नारी को महान मानने वालों का लिखा पढ़ते यह सोच रहे थे कि शायद आपका ही घर परिवार एक अपवाद है अन्यथा शेष भारत में तो जो वह कहे वही होता है, उसकी आज्ञा सबको शिरोधार्य होती है, उसकी इच्छा, उसकी आज्ञा, मान ही सर्वोपरि है, तो जाग जाइए। निम्न कथन किसी पाश्चात्य सभ्यता को मानने, जीने वाले दिशा भ्रमित छद्म नारीवादी का नहीं है, अपितु विशुद्ध भारतीय संस्कृति में रचे बसे उस व्यक्ति का है, जो अपने को जनसाधारण का नेता मानता है, जो हर तरह से भारतीय संस्कारों वाला है, लाखों लोग जिसके पदचिन्हों पर चलने को अपना सौभाग्य मानते हैं। लीजिए, आप भी पढ़िए और स्वयं को धन्य मानिए कि ये लोग हमारा प्रतिनिधित्व करते हैं। इनके प्रतिनिधित्व में स्त्रियों को किसी आरक्षण की क्या आवश्यकता? ये तो पहले से ही हमें इतना सम्मान देते हैं। हम निश्चिन्त होकर अपना उत्तरदायित्व इनके हाथों में दे सकते हैं। ये कहें तो चूल्हा फूँक सकते हैं, ये कहें तो शासन कर सकते हैं।

नेता जी का कथन जैसा मैंने समाचारपत्र में पढ़ाः
If.. (they)think that the women would vote independent...then they are mistaken...If I asked Rabri Devi to vote a certain way,do you think she would do otherwise?
Rashtriya Janata Dal president Lalu Prasad voicing his opposition to the women's reservation Bill
TOI 10/3/10 page 20


अनुवादः यदि वे सोचते हैं कि स्त्रियाँ स्वतंत्र वोट देंगी तो वे भ्रम में हैं। यदि मैं राबड़ी देवी को किसी को वोट देने को कहूँ तो क्या वह उसके विरुद्ध जा सकती है?
राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव का कथन।

बहुत लज्जा की बात है कि इस देश में जहाँ नारी तुम यह हो, वह हो, कहा जाता है वहाँ पति अपनी पूर्व मुख्यमंत्री पत्नी की औकात सार्वजनिक तौर पर बता देते हैं। सोचिए कि जो स्वयं किसी का हुक्म बजा रही हो उसके आदेशों पर एक पूरा राज्य काम कर रहा था।

स्त्री की भारतीय समाज में क्या स्थिति है इसका इससे ज्वलंत प्रमाण / उदाहरण और क्या हो सकता है? अब भी यदि हम यह कहते फिरें कि भारत में स्त्रियों का स्थान बहुत ऊँचा है तो क्या कहा जाए? किसी की इतनी हिम्मत नहीं होगी कि सार्वजनिक तौर पर यह कह सके कि वह अपने बनिहार(मजदूर) को आदेश देता है कि किसे वोट दे। किन्तु यहाँ एक नेता बड़े गर्व के साथ ऐसी बात कह रहा है।

कोई मुझे यह बात बता सकता है कि जब हमारे जमीनी नेता स्वयं ही यह बात स्वीकार करते हैं कि स्त्रियों की स्थिति इतनी दयनीय है कि एक स्त्री मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठकर भी, मतदान देने जैसे अपने अहम सामाजिक व राष्ट्रीय कर्त्तव्य को निभाने में भी पति आज्ञा की अवहेलना नहीं कर सकती, तो फिर वे स्वयं ही उसकी स्थिति सुधारने के लिए उसके लिए आरक्षण की माँग क्यों नहीं करते रहे हैं? वे तो आरक्षण को ही सामाजिक बदलाव व पिछड़ों को आगे लाने की कुँजी मानते रहे हैं। तो जब पिछड़ों को नौकरियों में २७ प्रतिशत आरक्षण मिला था और हाल में ही जब शिक्षा में भी उन्हें आरक्षण मिला था तो क्यों नहीं स्वयं ही आगे आकर उन्होंने व उनके दल ने इस आरक्षण में स्त्रियों के लिए आरक्षण की माँग की? वे तो सब जानते हैं कि स्त्री कितनी दलित,दमित,दबी कुचली हुई है,समाज व परिवार में उसकी स्थिति केवल हुक्म बजाने वाली की है। तो उन्हें तो अपने हिस्से के आरक्षण में से उसे भी आरक्षण देना चाहिए था। वे तो सामाजिक न्याय के लिए लड़ने वाले नेताओं में से हैं। या यह न्याय केवल अपने लिए या अपनी जाति के पुरुषों के लिए ही है। जब बात किसी अन्य के लिए न्याय की हो तो अधिक महत्वपूर्ण नहीं रह जाती।

खैर जो भी हो, नेताजी ने समाज में स्त्रियों की स्थिति बहुत सम्मानित मानने वालों को दर्पण तो दिखा ही दिया। मैं आभारी हूँ।


घुघूती बासूती

Tuesday, January 05, 2010

पुरुष जितना समय स्त्री के वस्त्रों, साज श्रृंगार व पहनावे पर सोचकर व्यर्थ करते हैं यदि अपने पहनावे व रखरखाव पर लगाएँ तो................घुघूती बासूती

तो.. स्वाभाविक है अधिक चुस्त,सुन्दर व स्वस्थ दिखेंगे व महसूस करेंगे। और सबसे बड़ी बात स्त्रियों को भी अधिक भाएँगे। भाएँगे केवल उपर्युक्त कारणों से ही नहीं अपितु अपने अखड़ूस व्यवहार के कारण भी। पुरुषों का एक बड़ा प्रतिशत स्त्रियों की चिन्ता में दुबला(मोटा???) हुआ जा रहा है। और चिन्ताएँ भी कैसी? हमारे वस्त्रों की, हमारे आभूषणों की, हमारी चूड़ी, बिंदी और सिंदूर की! कभी उन्हें हमारे फैशन से कष्ट होता है तो कभी हमारे श्रृंगार न करने से!और अब तो स्त्री की श्रृंगार सामग्री बनाने, बेचने वालों की भी चिन्ता!

कल ही संवेदनाओं के पंख में एक लेख पढ़ा। जिसपर मैंने निम्नलिखित टिप्पणी की है...

'नव वर्ष की हार्दिक शुभ कामनाएँ।
बहुत रोचक बात कही है। संसार कभी भी किसी के लिए रुका नहीं रहता। वह बदलता रहता है, प्रगति करता रहता है। यदि चूड़ी, बिंदी और सिंदूर का उपयोग केवल इसलिए किया जाए कि इससे लोगों को रोजगार मिलता है तो शायद हमें वापिस लकड़ी के चूल्हे जलाने होंगे, उपले जलाने होंगे, पुरुषों को धोती, लंगोट,बंडी पहननी होगी, मोची गठित जूते पहनने होंगे, खड़ाऊँ पहनने होंगे,शनि देव को तेल दान करना होगा,बैलगाड़ी व घोड़ागाड़ी उपयोग करने होंगे,पीतल व मिट्टी के बर्तन उपयोग करने होंगे,आदि आदि..........
अन्यथा बहुत से लोगों का रोजगार चले जाएगा!
बात कुछ जमी नहीं! सीधे से कहिए कि स्त्रियों को चूड़ी, बिंदी और सिंदूर का उपयोग करना चाहिए क्योंकि उन्हें यह सब धारण करता देख आपके मन को सुकून मिलता है। क्यों व्यर्थ में इसे रोजगार से जोड़ रहे हैँ? वैसे तर्क के लिए आप कुलिओं का जिक्र भी कर रहे हैं। वैसे वह एक बाद में आया विचार सा ही है।
सिगरेट, बीड़ी पीना बंद करने की भी ऐसी ही हानियाँ होंगी। पटाखे बजाना छोड़ने की भी। सूची बहुत लम्बी है।
घुघूती बासूती'

माना स्त्रियों में करुणा कुछ अधिक ही होती है या ऐसा माना जाता है, किन्तु केवल किसी का रोजगार बचाने के लिए तो मैं सिन्दूर लगाने से रही।

स्त्रियों की इतनी ही चिन्ता है तो जरा अपने कानूनों में सुधार करो। कानून के रखवालों में सुधार करो। अपनी नजरों में सुधार करो। अपने स्वयं में व अपने पुत्रों, पिता व भाई, सहपाठियों, सहयोगियों में सुधार करो। अपने हाथों को अपने पास रखो। अपने शरीर व मन पर लगाम कसो। ताकि कोई रुचिका आत्महत्या को बाध्य न हो। कोई बड़ा पुलिस अफसर किसी स्त्री अफसर के पृष्ठ भाग को न थपथपाए। कोई अबोध बालिका किसी पुरुष की हवस का शिकार न बने। (कल या परसों ही मुम्बई में एक पाँच साल की बालिका अपने ही खून में लथपथ सिसकती हुई दो स्त्रियों को मिली। वह बलात्कार की शिकार बच्ची बोलने में अक्षम हो गई थी। अपना नाम भी नहीं बता पा रही थी। हाँ, उसकी भी गलती थी। उसने बुरका, साड़ी या सलवार कुर्ता नहीं पहना था। पाश्चात्य फ्रॉक,वह भी गुलाबी रंग का पहना हुआ था। परन्तु क्या इस दुस्साहस की सजा बलात्कार है मान्यवरो? )

अपने परिवार में अपनी कम समझदार स्त्रियों को 'परिवार का मुखिया' होने के नाते केवल क्या पहनना है ही न सिखाओ, उन्हें परिवार की नई सदस्याओं का सम्मान करना, उससे दहेज न माँगना, उसे प्रताड़ित न करना, उसका रगड़ा न लगवाना भी सिखाओ। बताओ कि कॉलेज में भी रैगिंग पर पाबन्दी लग गई है सो 'मुझे प्रताड़ना मिली थी तो अब बहू को भी मैं प्रताड़ित करूँगी' वाली परम्परा बन्द करो।

हमारा परिधान च श्रृंगार ही मत देखो, हमारी आत्मा पर पड़े छाले भी देखो। हमारे शरीर व आत्मा पर सदियों से पहनी बेड़ियों के घाव भी देखो। हमारी भ्रूण हत्या देखो,पचासों लड़कियों में कोई न कोई दोष देख ठुकराने वाले वर लड़कियों की भावनाएँ भी समझें। उसके परिवार से दहेज व बारात की खातिरदारी की माँग बन्द करें। वर पक्ष होने के कारण अपने को देवलोक से आया हुआ मानना बन्द करें। जरा जीवित स्त्रियों के जलते हुए शरीर की कल्पना करो। अपनी सिगरेट को अपने शरीर पर छुआओ और फिर उस भीषण कष्ट की कल्पना करो जिसे हमारे देश की हजारों युवतियाँ अपने शोषण व अत्याचार से छोटा व क्षणिक कष्ट समझकर गले लगाती हैं। सोचो, सोचो।

हमें सदा नारीत्व की बात छोड़ गाँव की स्त्रियों व गरीब स्त्रियों का कल्याण करने में उर्जा लगाने को कहने वाले पुरुष कभी इन्हीं गाँव की स्त्रियों व गरीब स्त्रियों के पतियों को यह क्यों नहीं सिखाते कि बीड़ी फूँकने में व्यर्थ समय गंवाने की बजाए कभी कभार वे भी पानी भर लाएँ, लकड़ी चुन लाएँ, कम से कम उस दिन तो, जब उन्हें कोई काम न मिले। गरीब कामवाली(महरी) स्त्रियों के पतियों को क्यों नहीं कहते कि अपनी कमाई दारू में न उड़ाएँ, उड़ाएँ भी तो कमसे कम पत्नी की कमाई तो न उड़ाएँ, पत्नी की कमाई भी उड़ाएँ तो कमसे कम उस ही के पैसे से लाई दारू के नशे को हथियार बना उसकी ही धुनाई तो न करें।

यह भी और बहुत कुछ जब वे कर चुकें तो आएँ व हमें क्या पहनें, क्या न पहनें, क्या पढ़ें, क्या लिखें, कहाँ व कब जाएँ आदि सिखाने की सोचें।

एक बार फिर दोहराती हूँ कि स्त्री की लड़ाई पुरुष से नहीं, पितृसत्तात्मक समाज से व उस समाज द्वारा युगों से पहनाई बेड़ियों से है। हो सके तो इस स्थिति में सुधार करने में स्त्रियों की सहायता करें। लाभ पुरुषों सहित पूरे समाज का होगा।

नोट: मुझे किसी आभूषण, परिधान, प्रसाधन, श्रृंगार या किसी की मान्यता से कोई विरोध नहीं है। विरोध केवल किसी पर यह सब थोपे जाने से है।

घुघूती बासूती

Friday, June 26, 2009

एन्ग्लो वैदिकः लड़के एन्ग्लो, लड़कियाँ वैदिक ! एक परिवार में दो संस्कृतियों का मिलन।

वस्त्र कैसे हों? यह एक बहुत ही कठिन व निजी प्रश्न है और इसमें स्थान, जलवायु, आर्थिक स्थिति और उम्र भी बहुत बड़ी निर्णायक भूमिका निभाती है। इसे व्यक्ति विशेष पर छोड़ देना ही सबसे बेहतर होता है। किन्तु जब लोग किसी संस्था से जुड़ते हैं तो संस्था को लगता है कि वे लोग संस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं और संस्था चाहने लगती है कि उसके प्रतिनिधि उसके मूल्यों को अपने व्यवहार, व्यक्तित्व व पहनावे में संसार के सामने रखें। व्यवहार अधिक महत्वपूर्ण है परन्तु उसे नियन्त्रित करना अधिक कठिन है सो संस्थाएँ पहनावे को ही नियन्त्रित करने में लग जाती हैं। सच तो यह है कि हमारा उथलापन पहनावे को ही व्यक्तित्व मान लेता है।


संस्थाएँ यदि पहनावे में क्या अपेक्षित है यह भर दिशा निर्देश या गाइडलाइन्स में बता दें तो समस्या काफी सीमा तक सुलझ सकती है। वे कौन से वस्त्र पहनें भारतीय या विदेशी यह निर्णय न ही करें तो बेहतर है। वैसे भी जिस देश का काम काज अंग्रेजी में होता है वहाँ परिधान के भारतीय होने पर जोर देना गलत होगा। फिर यह देश इतना बड़ा और इतनी विविधता लिए है कि किसी एक या दो परिधानों पर भारतीयता का ठप्पा लगाना मूर्खता ही होगी। अस्सी के दशक में जब दक्षिण भारत में सलवार कुर्ते का चलन बढ़ा तब वहाँ के परम्परावादी लोग लड़कियों के लहंगे व आधी साड़ी या पावदा (यह वहाँ का अविवाहित किन्तु बड़ी लड़कियों का पाराम्परिक परिधान है, था कहना अधिक उचित होगा। अब यह केवल विवाह व त्यौहारों तक सीमित हो गया है। लहंगे के ऊपर साड़ी का ब्लाउज और आधी साड़ी लहंगे पर चुनरी की तरह बाँई तरफ से खोंसी जाती है और फिर साड़ी के पल्लू की तरह ही ली जाती है। देखने में बहुत सुन्दर लगती है। ) न पहनने से परेशान थे। आज सलवार कुर्ता लगभग पूर्णतया दक्षिण भारत में स्वीकार कर लिया गया है। मुझे याद है एक दक्षिणी विद्यार्थी का यह कथन कि उत्तर भारत के प्रॉफेशनल कॉलेजों में सलवार कुर्ता अधिकतर दक्षिणी लड़कियाँ ही पहनती हैं जबकि उत्तर भारतीय लड़कियाँ जीन्स पहनती हैं। यह बात नब्बे के दशक की है। आज की स्थिति मैं नहीं जानती।


पूर्वोत्तर में भी आसाम में मेखला चादर है तो शेष जगह एक लुँगी की तरह का wrap around और ब्लाउज है। बंगाल में साड़ी पहनने का अलग ही तरीका है। परन्तु सब जगह समय के साथ बदलाव आया है। और सबसे अधिक बदलाव तो पुरुषों के पहनावे में आया है। गूगल में जाकर यदि पुरुषों के पारम्परिक भारतीय परिधान देखें तो लगेगा कि ये गायब हो गए हैं। अधिकतर पुरुषों को तो वे पहनने भी नहीं आएँगे! क्या कोई पुरुषों के पारम्परिक परिधानों के लुप्त होने के कारण बता सकेगा? या फिर मेरी बिटिया के स्कूल द्वारा मजाक में दिए हास्यास्पद तर्क से ही काम चलाना होगा? वहाँ बताया गया था कि एन्ग्लो वैदिक का एन्ग्लो लड़कों के लिए है और वैदिक लड़कियों के लिए ! अतः लड़के पैन्ट्स पहनेंगे और लड़कियाँ सलवार कुर्ता और दुपट्टा !


महाराष्ट्र में तब परकर पोल्का( लंहगा और लंहगे के ऊपरी भाग को ढकता हुआ ढीला ब्लाउज ) के स्थान पर स्कर्ट ब्लाउज को स्वीकारा गया। ९ गज की साड़ी के स्थान पर ६ गज की साड़ी चल निकली। साड़ी भी सारे भारत में अलग अलग तरह से पहनी जाती थी। माँ जब गाँव जातीं तो सीधे पल्ले की साड़ी पहनती। उल्टे पल्ले की साड़ी जो आज पूरे भारत में स्वीकार्य है तब गाँव में फैशन मानी जाती। शायद कोई हरियाणवी मित्र मेरी इस बात को भी मानेगा कि एक समय में हरियाणवी स्त्रियाँ घर से बाहर निकलते समय सलवार कुर्ता नहीं लंहगा पहनती थीं। साड़ी भी नहीं। तो कैसे लहंगे और जेब वाले लम्बे ब्लाउज(कुर्ती ) से सलवार कुर्ते, फिर साड़ी और फिर वापिस सलवार कुर्ते की यह स्वीकृति यात्रा हुई?


कैसे सलवार कुर्ते जैसे एक पूर्णतया पंजाबी परिधान को सम्पूर्ण भारत ने सुविधा के कारण अपना लिया ? जब स्त्रियाँ घर से बाहर बसों व ट्रेन से यात्रा करके जाने लगीं तो साड़ी को पार्टी परिधान मानने लगीं और सलवार कुर्ते को नित्य का परिधान! साड़ी में कितने ही गुण क्यों न हों कुछ असुविधा भी है। असुविधा को भी भूल जाएँ तो कुछ व्यवहारिक समस्याएँ हैं जिनके चलते यह भागने, दौड़ने, भीड़ में धक्कामुक्की करने व यात्रा में लेटने सोने के लिए सबसे सही नहीं है।


सलवार कुर्ता साड़ी की इन्हीं असुविधाओं के चलते व इसके 'पंजाबी किन्तु भारतीय तो है' की मान्यता व इससे लगभग सारा शरीर ढके जाने के कारण अधिक लोगों की स्वीकृति पा गया। परन्तु जैसे किसी समय दक्षिण भारत ने सलवार कुर्ते को मान्यता दी वैसे ही उत्तर भारत जीन्स व ट्राउजर्स को मान्यता देने की लड़ाई लड़ रहा है।


सत्तर के दशक में जब हम कॉलेज में थे तो आधी से अधिक छात्राएँ बेलबॉटम, ट्राउज़र्स, पेरेलल्स व जीन्स पहनती थीं। हो सकता है कि यह महानगरों में ही होता हो परन्तु मुझे प्रत्यक्ष में कोई विरोध नहीं दिखा। थोड़ा दबा सा विरोध फ्रॉक या स्कर्ट ब्लाउज का अवश्य होता था किन्तु रोक नहीं थी। मुझे आश्चर्य होता है कि आज लगभग पैंतीस या चालीस वर्ष के बाद इसका अधिक व मुखर विरोध हो रहा है। तब विरोध अधिकतर तब होता था जब ये ही परिधान विवाह के बाद पहने जाते थे।


क्या हम आज कम सहिष्णु हो गए हैं ? या संस्कृति के ठेकेदार अधिक मुखर हो गए हैं ? या फिर हमारे परिधान उस सीमा को पार कर गए हैं जहाँ तक समाज बदलाव को स्वीकार कर सकता है ? या फिर हमारे छात्र व छात्राएँ पार्टी व कॉलेज का अन्तर भूल गए हैं ? मुझे लगता है कि जीन्स या ट्राउज़र्स का विरोध करने की अपेक्षा कैज़ुअल, फ़ॉर्मल व पार्टी परिधानों का अन्तर समझना व समझाना अधिक उचित होगा। जीन्स(हिपस्टर कैज़ुअल नहीं हो सकती,कैज़ुअल वस्त्र शायद वे होते हैं जिन्हें हमें बारम्बार सम्भालना, ठीक करना नहीं पड़ता, यदि यह सब ध्यान रखना पड़े तो हम कैज़ुअल नहीं रह पाते! ) व टीशर्ट कैज़ुअल, ट्राउज़र्स व कॉलर व बाँह वाली कमीज, अमिनि स्कर्ट व स्कर्ट तक आता ब्लाउज फ़ॉर्मल, मिनि स्कर्ट या छोटी टॉप पार्टी परिधान मानी जाती हैं। प्रायः सभी दफ्तरों में यही नियम होता है। साड़ी व सलवार कुर्ते को सभी जगह मान्यता दी जाती है क्योंकि इन्हें पहनने से भारत में किसी को रोकना उतना ही गलत होगा जितना कई होटल व क्लब आदि में पुरुषों को धोती कुर्ते या कुर्ते पाजामे पहनने से रोकना गलत लगता है। पुरुषों के लिए पूरी बाँह की कमीज, टाई, व ट्राउजर्स, या सूट फॉर्मल होता है।


जैसे अपने सुविधाजनक होने के कारण सलवार कुर्ता पूरे भारत में मान्यता प्राप्त कर गया वैसे ही जीन्स भी अपनी सुविधाजनक व कम से कम मैन्टेनेन्स की लागत व टिकाऊ होने के कारण मान्यता प्राप्त कर ही लेंगी। जीन्स जेब व मेहनत के हिसाब से सबसे सस्ती पड़ती हैं। दो जीन्स में पूरा कॉलेज जीवन बिताया जा सकता है। एक में बिताने वाले भी बहुत मिल जाएँगे। ना इस्तरी का झँझट, ना आज कौन सा परिधान पहनें सोचने की झँझट, बस चार पाँच टी शर्ट्स में से कोई एक उठाई और जीन्स के साथ पहन ली। सलवार कुर्ते के साथ इस्तरी करने की समस्या रहती है। साड़ी तो खैर पहनना ही धोबी को हर बार इस्तरी के रुपए चढ़ाने वाला धोबीप्रिय परिधान है।


जो लोग वर्दी के पक्ष में हैं वे अमीर गरीब का तर्क देते हैं। मुझे लगता है कि मनुष्य में इस उम्र तक इतनी समझ तो आ ही जानी चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति की जेब अलग अलग होती है और दूसरों की बराबरी करना घाटे का सौदा है। वर्दी लागू करेंगे तो क्या सबके लिए बस में या साइकिल पर आना भी निर्धारित करेंगे ? जब कोई मंहगी नई मोटरसाइकिल या कार में आएगा तो क्या आप उसे रोक देंगे ? कभी न कभी तो इन नवयुवकों/ नवयुवतिओं को जीवन की सचाई का सामना करना ही होगा। हम उन्हें कहाँ तक बचा पाएँगे? कपड़ों के पीछे पागल न होना भी एक आत्मविश्वास की स्टेटमेंट होता है। मेरी बिटिया ने तो मेरी किसी युग की जीन्स में कॉलेज के तीन साल निकाल दिए। यह उसका फैशन या आत्मविश्वास का स्टेटमेंट था।


कुछ वर्ष पहले म्यानमार में छात्रों के लिए राष्ट्रीय पारम्परिक परिधान पहनना अनिवार्य कर दिया गया था। मेरे डॉक्टर मित्र को दुख था कि उसके बेटे जीन्स नहीं पहन सकेंगे क्योंकि लूँगी (longyi) पहनना अनिवार्य हो गया था।


हमारे अधिकार व स्वतंत्रता धीरे धीरे ही छीने जाते हैं, एक झटके में नहीं। छीनने वाले यह देखते रहते हैं कि हमारी सहनशक्ति कितनी है। यदि एक वार हम झेल जाएँ तो वह अन्तिम नहीं होगा। इसके बाद एक और फिर एक और होना निश्चित है। साड़ी जैसे परिधान जिसके लिए प्रत्येक भारतीय के मन में आदर है, शायद वैसा ही जैसा माँ के लिए होता है, उसे भी एक नई दृष्टि से देखा जा रहा है। बहुत से स्कूलों में एक तरफ तो जहाँ अध्यापिकाओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है वहीं साड़ी के ब्लाउज व उनमें से झलकती पीठ को छिपाने के लिए वर्दी के जैकेट पहनाए जा रहे हैं। अपने परिधान पर गर्व भी है और लज्जा भी!

यह तर्क भी दिया जा रहा है कि हमारी स्त्रियाँ ऐसे परिधान पहनती हैं कि यदि किसी अंग/भाग/ज़िस्म को लगातार देखते जाओ तो वे अपने वस्त्र ठीक करने लगती हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि उन्हें किसी ने यह नहीं सिखाया कि अपने से विपरीत लिंग के लोगों से बात करते समय दृष्टि उनके चेहरे पर केन्द्रित रखी जाती है न कि उनके शरीर के अन्य भागों पर। यदि आप किसी के बुर्के, या ढके सिर को भी घूरते जाएँगे तो वह उसे ठीक करने लगेगी या छूकर देखेगी कि कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं कि कहीं कौवे आदि ने सिर पर बीट तो नहीं कर दी। यदि यही किसी पुरुष के साथ किया जाए तो शायद वह भी सचेत हो जाएगा, मूँछ को घूरेंगे तो हाथ फिराकर देखेगा कि मूँछ पर खाना, दूध आदि तो नहीं लगा रह गया !

वैसे जहाँ तह उत्तरप्रदेश का प्रश्न है कम से कम अभी के लिए तो मायावती जी ने इस मुद्दे को सुलझा दिया है। परन्तु यह मुद्दा सरलता से मरता नहीं, रक्तबीज दानव की तरह बारम्बार उठ खड़ा होता है। स्त्रियों के लिए क्या उचित व अनुचित है या कहिए कि क्या स्त्रियोचित है हमारे समाज में अन्य महत्वपूर्ण समस्याओं के अभाव में, सबसे अधिक चिन्ता का विषय बनता जा रहा है।


यदि हम युवाओं को वयस्क मानने लगें तो जैसे वे देश के कर्णधारों का चुनाव कर सकते हैं शायद वैसे ही अपने वस्त्रों का भी कर लें।


घुघूती बासूती

सम्बन्धित लेख
ड्रेस कोड:शुभ्र श्वेत सलवार कुर्ता!

Monday, June 22, 2009

ड्रेस कोड: शुभ्र श्वेत सलवार कुर्ता!

जब भी सुनती हूँ कि किसी कॉलेज में ड्रेस कोड लागू हुआ है तो अपने छात्र जीवन की याद आती है। सत्तर का दशक था। उस जमाने में लड़कियाँ इतनी आगे नहीं आईं थीं कि किसी को वे चुनौती लगतीं। सो प्रायः हमें हमारे हाल पर छोड़ दिया जाता था। अधिकतर किसी को(अध्यापक/अध्यापिका वर्ग को) हमारे पहनावे से कोई परेशानी नहीं थी। कभी कभार ही होता था कि कोई अध्यापक/अध्यापिका हमें घूरकर देख लेता।


अब यह मत सोचिए कि हम सलवार कुर्ते पहनते होंगे। विवाह पूर्व हमारे पास दो ही सलवार कुर्ते थे। एक तो हमने सिलाई सीखने के चक्कर में बनाया था और दूसरा जबर्दस्ती बनवाया गया था। जबर्दस्ती! हाँ बिल्कुल हास्यास्पद जबर्दस्ती होती थी छात्राओं के साथ! यह था शुभ्र श्वेत सलवार कुर्ता! आज भी उसकी याद आती है तो उससे चिढ़ ही उठती है।


किसी बावले से क्षण में, शिक्षा के क्षेत्र में किसी शक्तिशाली मानव ने यह निर्णय लिया था कि कॉलेज की लड़कियों की वर्दी होनी चाहिए। शायद सारे सप्ताह हमें वर्दी पहनाने में उन्हें स्वयं भी अटपटा लगा हो या लगा हो कि यह तो अति होगी सो केवल हर सोमवार पंजाब विश्वविद्यालय के कॉलेजों में पढ़ने वाली प्रत्येक छात्रा श्वेत वस्त्रधारी हो जाती थी। यह बात और है कि यदि सहशिक्षा वाला कॉलेज हो तो छात्र रंग बिरंगे परिधानों में ही होते थे। केवल छात्राएँ वर्दीधारी होती थीं। पता नहीं सहशिक्षा वाले हमारे कॉलेज के प्रिन्सिपल को यह अटपटा लगता था या केवल हमें ही लगता था। वर्दी का नियम केवल सफेद तक ही सीमित था,आप सफेद साड़ी,फ्रॉक,स्कर्ट ब्लाउज,ट्राउजर्स कुछ भी पहन सकती थीं। अधिकतर के पास सलवार कुर्ता इसलिए था कि रैगिंग के दिनों में सलवार कुर्ता ही वर्दी होती थी।


थोड़ा बहुत मनोविज्ञान जब पढ़ा तो इस शक्तिशाली मानव,जिसे हमारे लिए नियम बनाने का अधिकार था, की थोड़ी मानसिक चीरफाड़ कर कारण खोजना चाहा परन्तु असफलता ही हाथ आई। कारण आज भी समझ नहीं आता। वर्दी का विचार तो जो था सो था किन्तु केवल छात्राओं के लिए क्यों यह तर्क समझ नहीं आता था। सोचिए कॉलेज में खेलदिवस है या वार्षिकोत्सव है। छात्र होते थे रंगबिरंगे और छात्राएँ सफेद वर्दी में!यही हाल स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस के दिन होता था। हमारे साथ ही हमारे स्कूल में पढ़े छात्र बिना वर्दी के और हम वर्दी में रानी बेटियाँ बनी होती थीं।


बहुत वर्षों बाद एक बार जब मैं अपने एक सहपाठी के साथ कॉलेज के दिन याद कर रही थी तो उसे इस वर्दी वाली बात की याद दिलाई और पूछा कि केवल हमें क्यों पहनाई जाती थी तुम्हें क्यों नहीं। तब वह ठहाका लगाकर हँसा और बोला कि लड़कों से पंगा लेने को किसका दिमाग खराब हुआ था। लड़कों पर नियम कायदे लगाकर तो देखते कौन लड़का इस नियम को मानता? हड़ताल हो जाती। 'जो दबता है उसे ही दबाया जाता है।' हमें तुम्हारी वर्दी देखकर तुम पर बहुत हँसी आती थी।


हाँ, तो मुझे मेरा उत्तर उसके इस ब्रह्म वाक्य में मिल गया,'जो दबता है उसे ही दबाया जाता है।' शायद इसे सही करके ऐसे कहा जा सकता है कि स्त्री दबती है इसलिए दबाई जाती है। शायद दबती के पुल्लिंग की आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि यह केवल एक स्त्रियोचित गुण है।


आज 'ड्रेस कोड लागू करना गुनाह तो नहीं' लेख पढ़ा। मैं लेखक से पूर्णतया सहमत हूँ किन्तु केवल यह चाहती हूँ कि ऐसे ड्रेस कोड पुरुषों पर भी लागू किए जाएँ। कुर्ते पाजामों, धोती कुर्तों में घूमते विशुद्ध भारतीय बालक क्या सुन्दर दृष्य उत्पन्न करेंगे! अहा, तब ही तो हम सच्चे भारतीय कहलाएँगे, अपनी संस्कृति के सच्चे रक्षक! देखिए वातावरण कितना शुद्ध, सात्विक हो जाएगा। वस्त्र बदलते ही उनके मनोभाव भी स्वच्छ हो जाएँगे। लड़कियों पर तब वे बुरी नजर नहीं डालेंगे। सारी कलुषित भावनाएँ धुल जाएँगी।


मैं जानती हूँ कि ऐसा ही होगा क्योंकि वस्त्र ही छेड़छाड़ व बलात्कार का मुख्य कारण हैं। हम वर्दी पहनती थीं तब भी छेड़ी जाती थीं। हमारे वस्त्र तो ठीक होते थे केवल छेड़ने वालों के गलत होते थे। सो वस्त्र दोनों तरफ से ही भारतीय होने चाहिए। तभी मन शुद्ध होगा। आपकी क्या राय है?


मेरी राय अगले लेख में!


घुघूती बासूती

Monday, June 08, 2009

बिटिया तो है फूल की डाली... पर पहले कर दो उसे गर्भ से खाली

बात तब की है जब हम दिल्ली में थे। वहीं एक जान पहचान वाले सज्जन भी रहते थे। व्यवसायी हैं। हमारे साथ बिटिया और पुत्री वर (वही शब्द जमाता, जमाई, दामाद, जो न जाने क्यों मुझे जरा भी नहीं सुहाता) हमारे फ्लैट में रह रहे थे। तो फ्लैट के कुछ काम के सिलसिले में उनसे बात हुई। बात-बात में घुघूत की सेवानिवृत्ति की बात निकल आई। चर्चा होने लगी कि उसके बाद हम कहाँ रहेंगे आदि। फिर बात खर्चे पर चली आई- खर्चा कौन उठाएगा। स्वाभाविक था कि बिटिया और पुत्रीवर ही दिल्ली में रहते थे, सो वे भुगतान करेंगे। हम बाद में उन्हें पैसा लौटा दें या नहीं, यह अलग बात थी। हमने कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद हम उस शहर में रहना चाहेंगे जहाँ दोनों या कम से कम एक बेटी रहती हो। उन्‍होंने जानना चाहा ऐसा क्यों। हमने कहा कि भाई, कभी कोई दुख तकलीफ हुई तो। हमारी देखभाल करने वाली तो यही दो बेटिया है। वे ध्यान रखेंगी। उनकी नजर में हमारा यह फैसला सही नहीं था।


उन महाशय के अनुसार बेटियों से दुख तकलीफ में सहायता लेना गलत था। उनके मुताबिक, बेटियाँ तो फूलों की डाली हैं उन्हें तो बस देना ही देना होता है, उनसे कुछ भी लेना गलत है। आर्थिक सहायता तो दूर की बात... कष्ट में सहायता लेना भी गलत है।


उनकी ये बातें सुनकर मुझे अपने बचपन और किशोरावस्था में पढ़े स्कूली पुस्तकों के वे लेख याद आए जिनके कारण हिन्दी से मेरी शत्रुता सी हो गई। उनमें से एक बिटिया के विवाह व विदाई के बारे में था। आह, क्या समा बाँधा था- लड़की पराई होने का। बाबुल से विदाई का। बाबुल के घर की रोप का दूसरे घर में रोपे जाने आदि का! विवाह के समय प्रज्‍ज्वलित अग्नि में लड़की का भूतकाल जल जाने का और उसका नया जन्म होने का! विदाई के समय माता पिता, भाई बहन के फूट-फूटकर रोने का! जैसे वह मर ही गई हो। कहने को कितना मधुर परन्तु यथार्थ में कितना जहरबुझा! मेरी समझ में बेटियों के बारे में ऐसे लेख व लोक गीत ही तो कन्या भ्रूणों की हत्या का कारण होते हैं।


बिटिया, एक मधुर किन्तु पराया अहसास! उसे तो किसी और के घर जाना है। तभी तो आपको अपने घर के लिए चिराग की आवश्यकता है। सो उसे पैदा करने की चेष्टा में या तो पुत्रियों की पंक्ति खड़ी कर दीजिए या फिर भ्रूण परीक्षण करवाइए। ऐसे में घुघूती कितनी विषाक्त हो जाती है, केवल वही जानती है।


हमारे उन मित्र के मुताबिक हम बेटियों पर किसी सहायता के लिए कभी भी निर्भर नहीं होना चाहिए। आप सोचेगें कि वाह क्या विचार हैं, बेटियों को अपनी देखरेख, चिन्ता से मुक्त कर देने वाले! किन्तु ये विचार जहाँ बेटियों को माता-पिता की हर चिन्ता से मुक्त करते हैं, वहीं यदि दो से अधिक बेटियाँ होने की सम्भावना हो तो आने वाली बेटियों को संसार से भी मुक्त कर देते हैं। उन साहब की भी ऐसी कहानी थी। वे शायद नहीं जानते थे कि मैं उनकी यह कहानी जानती हूँ और उनका बेटी प्रेम भी।


बात ऐसी है कि उनकी और हमारी शादी आसपास ही हुई थी। उनकी भी दो बेटियाँ हुईं और मेरी भी। उनकी दोनों बेटियाँ मेरी बेटियों से कुछ दिन ही छोटी-बड़ी थीं। फिर एक दिन पता चला की उनकी तीसरी संतान होने वाली है। उन साहब ने पता कराया तो मशीन ने बताया कि वह संतान भी बेटी ही होगी। सो पाँचवें या छठे महीने में जब बेटी का होना एकदम पक्‍का हो गया तो उन्‍होंने इस अनचाही बेटी से छुटकारा पाने का फैसला किया। उस अजन्मी बेटी को जबर्दस्ती जन्म दिया गया। हाँ, इतने महीने बीतने पर गर्भपात नहीं होता। इतने माह में गर्भपात गैरकानूनी भी है और खतरनाक जानलेवा भी। सो, जबरन जन्म देकर मारा जाता है। प्रीमैच्योर लेबर पेन के लिए जबरन नसों में दवा चढ़ाई जाती है। बच्ची जबरन समय से पहले पैदा की जाती है और मार दी जाती है। तो उन्‍होंने तीसरी बेटी को यह तरीका अपनाकर दुनिया में आने से रोक दिया। यह थी उनकी तीसरी फूलों की डाली, जो समय से पूर्व ही माँ के गर्भ से निकाल कर मार दी गई। ... जानते हैं, उस अजन्‍मी बेटी की माँ का क्‍या कहना था। माँ का कहना था कि वह बिल्कुल उनकी बड़ी बेटी सी दिखती थी। यानी बच्ची के नैन-नक्श बन चुके थे, कैसी दिखती है, पता चल सकता था। लेकिन उस फूल की डाली को बढ़ने नहीं दिया गया।


और यह सब उस औरत को करना पड़ा, जो दुआ करती थी कि उसे बेटी हो। हुआ यों कि जब उन सज्‍जन की पत्‍नी पहली बार गर्भवती हुई ( मैं भी उस वक्‍त माँ बनने वाली थी), तब कहती थी कि सास, ससुर व पति को मुँडा (लड़का) चाहिए इसलिए मैं प्रार्थना करती हूँ कि कुड़ी( लड़की) ही होए। केवल उनको जलाने को यह कहती और मजे लेती। वह जीवंत स्त्री तीसरी बेटी के समय तक इतनी कमजोर पड़ चुकी थी कि वह उसे निकाल फेंकने को तैयार हो गई! बिना किसी विरोध के। उफ, बेटे की चाह में एक औरत (माँ) को कितना मजबूर बना दिया जाता है।


अब आइए शुरुआत के मुद्दे पर चलते हैं। यानी बेटियों से मदद लेने की बात। मैं पूछती हूँ कि क्या गलत है कि यदि मैं अपनी बेटियों को महज फूलों की डाली न मानकर व्यक्ति मानूँ। ऐसा व्यक्ति जो अपने माता-पिता का उत्तराधिकारी बनें। उनके बुढ़ापे और तकलीफ की घड़ी में उनका ध्यान भी रखे!


अब आप ही बताइए क्या होना बेहतर है,-फूलों की ऐसी डाली जो यदि नापसंद हो तो काटकर फेंक दी जाए या केवल व्यक्ति जिसके अधिकार भी हैं तो कुछ उत्तरदायित्व भी हैं... और हाँ जिसे साथ में जीने का अधिकार भी है।


मुझे तो संतान ही चाहिए थी, जो चाहे पुलिंग हो या स्त्रीलिंग परन्तु जिन्हें मैं प्यार करूँ और अच्छे व्यक्ति के रूप में बड़ा करूँ। मुझे फूलों की वे , आह, कवितामय डालियाँ नहीं चाहिए थीं जिनकी संख्या जितनी मैं चाहूँ उतनी ही हो। जिन्हें मैं 'बाबुल की दुआएँ लेती जा' गीत गाकर अपने संसार से विदा नहीं करूँ,जो 'बाबुल असी चिड़ियाँ दा ....' गाकर मुझसे विदा न हों, सदा मेरा संसार बनी रहें और जो मेरा सहारा हों और जिनका मैं सहारा होऊँ, किसी कर्त्तव्य में बन्ध कर नहीं, केवल स्नेह के बन्धन के कारण!


घुघूती बासूती


पुनश्चः इन्हें भी पढ़िए।


१ चूरन के साथ बछड़े वाली गाय का दूध पियें बेटा होगा
२ तो जिमाने के लिए कन्या कहाँ से आएँगी
३ जब न गायब बेटियों से पूछा जाएगा
४ अनचहाही मुसलमान बेटियाँ.. जमीनी हकीकत
५.लड़की मरै घड़ी भर का दुख, जिये तो जनम भर का
६.बिटिया का खौफ बना बेहिसाब मुनाफे का धंधा


घुघूती बासूती

Friday, May 15, 2009

बच्ची को भूल गए ! (इतना क्यों कुढ़ती हूँ ? भाग २)

कुछ वर्ष पहले की बात है। हमारी बस्ती में किसी की बिटिया के जुड़वा बच्चे हुए, एक लड़की और एक लड़का। दो बच्चों को वह अकेली पाल नहीं सकती थी। सो कौन सा बच्चा नानी के पास रहा होगा यह अनुमान कोई भी भारतीय लगा सकता है। अधिकतर लोग कहेंगे कि एक को तो नानी के पास रहना ही था तो यदि लड़की को रखा गया तो क्या गलत हुआ। मैं केवल इस निर्णय के आधार को जानना चाहती हूँ। क्या यह निर्णय बच्चों के जन्म के समय के भार को देखकर किया गया कि कौन बच्चा कमजोर है और किसे माँ के दूध से वंचित रखा जा सकता है ? क्यों सदा ऐसे निर्णय लड़कियों के विरुद्ध जाते हैं ।


खैर जैसा कि होना था लड़की ही नानी के पास रही। वह कुछ महीने की हुई जब गुजरात में भूकंप ( गुजराती में इसका बहुत अच्छा नाम है, धरतीकम्प) आया। सारा परिवार घर से बाहर भागा। कौन घर में छूट गई? वही बच्ची ! बाहर आकर उन्हें ध्यान आया कि वह तो अन्दर ही छूट गई। कोई उसे लेने अन्दर नहीं दौड़ा। मैं अपने कुत्तों को बुलाकर उन्हें साथ लेकर बाहर जा सकती थी। उन्हें छोड़कर बाहर भागने की सोच भी नहीं सकती थी तो वे उस बच्ची को कैसे भूल सके?



बाद में यह किस्सा हँस हँसकर बताया गया। मानती हूँ बताने वाली स्त्री ही थी। इसीलिए तो दुख भी अधिक हुआ और फिर वही कंडिशनिंग की बात आ जाती है। जन्म से ही (आजकल तो कोख में ही) हमें यह पता रहता है कि पुरुष जान का मूल्य अधिक है। हम इसे एक ऐसा यथार्थ मान लेते हैं कि प्रश्न ही नहीं करते। खैर, मानना होगा कि स्त्री की जान बहुत जीवट वाली होती है अन्यथा अबतक तो उसे विलुप्त हो ही जाना चाहिए था।



घुघूती बासूती
भाग १ स्त्री का मूल निवास बदल गया।

Thursday, May 14, 2009

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी के प्रश्न और उत्तर देने का मेरा प्रयास

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी के प्रश्नों के उत्तर तो मैं बहुत पहले ही दे चुकी हूँ। आज फिर प्रस्तुत कर रही हूँ। वैसे हो सकता है कि सभी प्रश्नों के उत्तर उन्हें न मिलें या संतुष्ट न कर पाएँ।


यह भी मानती हूँ कि जितने प्रश्न मैं करती हूँ उन सबके उत्तर मेरे पास नहीं हैं, तभी तो प्रश्न करती हूँ। कुछ ऐसे भी विषय उठाए जाते हैं जिनके उत्तर मिलने में समय लगेगा किन्तु यदि यथास्थिति को स्वीकार कर लिया जाएगा तो बेहतर की खोज कैसे होगी ?


पुरुष को कोसने की जहाँ तक बात है तो अधिकतर पितृसत्ता को कोसा जाता है न कि पुरुष को। सोचने की बात यह है कि पुरुष भी पितृसत्ता के कारण कुछ हानियाँ भी झेल रहा है, जैसे...
१ पितृसत्ता के चलते स्त्रियों का उतना समुचित विकास नहीं हो पाता जितना अन्यथा होता। उसे भी ऐसी ही पत्नी, सहयोगी, सहेली मिलती है जो अपनी क्षमता का पूरा लाभ नहीं उठा पाईं।
२ स्त्री भ्रूण हत्या के चलते उसके लिए जीवन संगिनी पाना भी कठिन होता जा रहा है।
३ सदियों से होते आए अन्याय के कारण उस पुरुष को भी शक की नजर से देखा जाता है, जो समता में विश्वास करता हो।
४ अन्यायी समाज कभी भी उतना सुखद नहीं हो सकता जितना न्यायपूर्ण समाज हो सकता है। न ही ऐसा समाज उतना आर्थिक व सामाजिक विकास कर सकता है। जिस समाज में आधी आबादी दबाई व कुचली हुई हो वह कैसे पूर्ण विकसित हो सकता है ? उसी समाज में स्त्री के साथ पुरुष को भी रहना पड़ता है।
ऐसी ही और भी बहुत सी हानियाँ गिनवाई जा सकती हैं।


जिस दिन पुरुष यह समझ लेगा कि एक बेहतर व समता में विश्वास करने वाला समाज उसके लिए भी लाभदायक होगा तो वह भी पितृसत्ता के विरुद्ध आवाज उठाएगा।


उन्होंने अन्त में पूछा है......

इस बात पर सवाल कि यदि आपके घर के लड़के की शादी जिस लड़की से होने वाली है और मालूम हो जाये कि उसके साथ बलात्कार हुआ था तो क्या उसको घर की बहू बना लिया जायेगा? (यह सवाल विशेष रूप से उन महिलाओं से जो नारी सशक्तिकरण के नाम पर झंडा बुलन्द करतीं हैं और पुरुषों को गाली देकर इतिश्री कर लेतीं हैं)

मेरा उत्तरः यदि मेरा बेटा होता तो वह अपनी पसन्द से ही शादी करता। यदि उसकी पसन्द वह लड़की होती जिसका बलात्कार हुआ है तो भी वह उसकी पत्नी बनती। हाँ, शायद बलात्कारी से जितनी शत्रुता उस लड़की को होती उतनी ही मुझे भी हो जाती।

यदि मेरी बेटी बलात्कारी से विवाह करना चाहती तो मैं उसको मनःचिकित्सक से मिलने की सलाह अवश्य देती।
शायद समझ आया हो कि मुझे बलात्कारी विभत्स व अग्रहणीय लगता है न की बलत्कृत


अन्त के तीनों प्रश्नों के उत्तर उन्हें मेरी इस पुनः पोस्ट किए लेख में मिल जाएँगे। मैं लेख के साथ उसपर आईं टिप्पणियाँ भी यहाँ दे रही हूँ क्योंकि उस लेख पर कुछ बहुमूल्य टिप्पणियाँ आईं थीं। देखिए.........


स्त्रियों के मुद्दे पर : कुछ उत्तर, कुछ और प्रश्न

यह मेरा काफी समय पहले लिखा लेख है । शायद काफी लोगों को स्त्री के स्त्री का शत्रु होने का रहस्य या कहें कारण , यहाँ मिल जाएँगे । ]

हमने व हमारे समाज ने क्या गलतियाँ की हैं और क्या गलतियाँ अभी भी करे जा रहे हैं इसका कुछ कुछ परिणाम तो हमें वर्तमान में देखने को मिल रहा है, किन्तु भविष्य इन परिणामों को बहुत विकराल रूप में हमारे सामने प्रस्तुत करेगा । जब तक यह परिणाम हमारे इस मूल रूप से अन्धे समाज को भी दिखने लगेगें, तब तक बहुत नहीं तो काफी देर हो चुकी होगी । समस्याएँ बहुत हैं व अधिकतर हमारी अपनी बनाई हुई ही हैं ।

इस समय मैं भारतीय समाज में स्त्रियों के स्थान , भ्रान्तियों व उनसे उत्पन्न होने वाली हानियों कि चर्चा कर रही हूँ । आज तक इन सबसे मुख्य व प्रत्यक्ष रूप से केवल स्त्रियों को हानि होती थी । अतः हमारा समाज , जो कि मुख्य रूप से पुरुषों के लिए ही बना है, जहाँ का धर्म, संस्कृति , कायदे कानून, सब कुछ पुरुषों के हितों को ही ध्यान में रखकर बनाए गए हैं , चैन की नींद सो सकता था व अपने घर का कचरा कालीन के नीचे दबा सकता था । यहाँ यह भी कह दूँ कि केवल भारत या एक धर्म या समाज ही नहीं सब धर्म, संस्कृति, कायदे कानून, पुरुष के हितों को देखकर बने हैं । किन्तु आज हानि व हमला पुरुष के हितों , सुख चैन, सुविधाओं पर है । उसका व उसके समाज का अस्तित्व ही खतरे में है । स्त्रियों का तो खतरे में है ही , किन्तु वह बहुत ही सूक्ष्म बात है, पुरुष व पुरुष के अस्तित्व के सामने । सो हो सकता है, पुरुषों के साथ साथ वे अन्धी स्त्रियाँ भी , जो स्त्री के अस्तित्व, उसके आदर व उसके जीवन के महत्व को नहीं मानती, वे भी जाग जाएँ क्योंकि आखिर उनके लाड़ले बेटों का भविष्य दाँव पर लग गया है ।

हमारा इतिहास गवाह है कि स्त्री पर जब भी , जैसे भी हो सकता था, अत्याचार किया गया । कुछ पुरुषों ने किया, कुछ स्वयं शक्ति चखने के लिए एक स्त्री ने दूसरी पर किया । यह शक्ति परीक्षण वह पुरुष पर तो कर नहीं सकती हैं ,अतः जैसे ही परिवार में उसकी स्थिति कुछ सुदृढ़ होती थी, तो वह परिवार में नई आई सदस्याओं पर कुछ रैगिंग की तर्ज पर यह शक्ति परीक्षण करती हैं । बार बार पुरुष यह कह कर कि स्त्री ही स्त्री की सबसे बड़ी शत्रु है , अपना पल्ला झाड़ लेता है । किन्तु जब आपके बच्चे की रैगिंग में टाँग टूट जाए या जान चली जाए, तो आप महाविद्यालय प्रशासन को यह कह कर कि विद्यार्थी ही विद्यार्थी का सबसे बड़ा शत्रु है बरी तो नहीं कर देते । तो फिर परिवार में हुए अत्याचार से स्वयं को परिवार का मुखिया होने के नाते कैसे बरी कर लेते हो ?

स्त्री को घर से निकाला गया , जलाया गया, मारा गया, मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया । उसे वश में रखने के लिए कभी उसे कुछ लालच दिया गया तो कभी उससे कुछ सुविधाएँ छीन ली गईं । लालच के रूप में सुन्दर रंग बिरंगे वस्त्र , आभूषण , रंगीन सौभाग्य चिन्ह व सब प्रकार का भोजन ग्रहण करने का अधिकार । दंडित करने व लाइन में रखने के लिए यही सब सुवधाएँ उससे छीन ली जाती थीं । उसे बताया जाता था कि ये सब सुख उसे तभी तक प्राप्य हैं जब तक वह अपने जीवन के आधार, अपने स्वामी, अपने पति को जीवित व प्रसन्न रख पाएगी । ये सब निर्जला व्रत उपवास इसी भय की देन हैं । वह पति व अपनी सुविधाओं व बहुत बार अपने जीने के अधिकार को बचाने के लिए भौतिक रूप से जो बन पड़ता था करती थी । किन्तु अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखने के लिए पति का जीवन कैसे भी बचाना अनिवार्य था । सो भौतिक रूप से सब कुछ करने के बाद वह अन्ध श्रद्धा की शरण लेती थी ।

विश्वास न हो ऐसी स्थिति की कल्पना करिये जहाँ आपका जीवन एक पतली डोर से लटका हुआ हो, जीवित जलाए जाने की तलवार आपके सिर पर लटक रही हो । उदाहरण के लिए यदि आपका जीवन किसी ऐसी शक्ति के हाथ में हो जो बहुत शक्तिशाली, क्रूर , अविवेकी व तर्कविहीन हो, लकीर की फकीर हो , जिस पर किसी न्याय की गुहार का कोई प्रभाव न पड़ता हो । वह शक्ति या व्यक्ति आप से कहे कि जब तक आप के सिर पर बाल हैं आप जीवित रहेंगे और जिस दिन ये बाल झड़े, आपको जीवित चिता के हवाले कर दिया जाएगा । अब आपके लिए ये बाल प्राणों से भी अधिक प्रिय होंगे । आप एक बार खाना भूल जाएँगे किन्तु बालों की साज संवार , सफाई, व स्वास्थ्य के विषय में कभी नहीं भूलेंगे । वे बाल आपकी जान हैं, धर्म हैं , या ये कहें कि वे ही आपका जीवन हैं । अब आप जब सब तरह से उनकी रक्षा करते नहीं थकते और फिर भी देखते हैं कि समय असमय आपके मित्रों , भाइयों, चाचा , ताऊओं के बाल झड़ ही जाते हैं और ऐसा होने पर उन्हें घसीट कर चिता पर रख दिया जाता है । उनकी चीखें आपके कानों के परदों को फाड़कर आपके अन्तर्मन तक को दहला जाती हैं । सोते जागते, खाते पीते ये चीखें आपका साथ नहीं छोड़ती । तब आप आध्यात्म, अलौकिक , दैवीय, अतिमानवीय शक्तियों का भी सहारा लेने लगते हैं । आपने देखा था कि दो मित्रो के बाल तब झड़ गए जब उन्होंने खाली पेट चाय पी थी या दो और के तब जब उन्होंने अपने बालों से तंग आकर उन्हें गाली दी थी । सो अब आप खाली पेट चाय पीना छोड़ देते हैं, बालों को कभी भूले से भी गाली नहीं देते हैं । यदि कोई सुझा दे कि गले में यह हरे मोती का धागा डाल लो तो बाल अधिक समय तक टिकते हैं, सो आप वह भी कर लेते हैं । यदि कहें कि बुधवार को दाढ़ी न बनाने से बाल सुरक्षित रहते हैं तो क्या आप केवल दाढ़ी बनाने के सुख के लिए जीते जी चिता में डाले जाने का खतरा , भय, आशंका मोल लेंगे ? सो अब आप चाहेंगे कि आशीर्वाद में भी यदि कोई आपको बालवान या बालवता कहे तो बेहतर है क्योंकि आपका चिरंजीवी होना तो उनके होने पर निर्भर है । आप प्राण जाएँ पर बाल न जाएँ में पूर्ण विश्वास करेंगे । सो इसको कहते हैं कंडिशनिंग ! अब न केवल आपके चेतन मन को बालों से मोह है अपितु आपका अवचेतन मन भी बालों के प्रति मोहित है । सो अब समाज कहता है कि बालों को इतना प्रेम करना, उनका ध्यान रखना, उन्हें जान से अधिक चाहना आपका स्वभाव है । यही आपके संस्कार हैं, यही आपका धर्म है, यही आपके देश की संस्कृति है । बिल्कुल सही है । जिन बालों के रहते आप पलंग पर सो सकते हैं , भांति भांति के व्यंजन खा सकते हैं, रंग बिरंगे कपड़े पहन सकते हैं , सबसे बड़ी बात कि जी सकते हैं, उन बालों पर आप क्यों न बलिहारी जाएँगे । यह तो है इस जन्म की बात !

घुघूती बासूती

चर्चा चालू है । अभी नया लिखने की स्थिति में नहीं हूँ । शीघ्र ही इस विषय पर और लिखूँगी ।

17 टिप्पणियाँ:

अजित ने कहा…

समर्थ सार्थक लेखन। चर्चा चालू रखिये। अगली पोस्ट की प्रतीक्षा में।
4:54 अपराह्न
Rachna ने कहा…

हे नर , क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम


क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम
कि नारी को हथियार बना कर
अपने आपसी द्वेषो को निपटाते हो
क्यों आज भी इतने निर्बल हो तुम
कि नारी शरीर कि
संरचना को बखाने बिना
साहित्यकार नहीं समझे जाते हो तुम
तुम लिखो तो जागरूक हो तुम
वह लिखे तो बेशर्म औरत कहते हो
तुम सड़को को सार्वजनिक शौचालये
बनाओ तो जरुरत तुम्हारी है
वह फैशन वीक मे काम करे
तो नंगी नाच रही है
तुम्हारी तारीफ हो तो
तुम तारीफ के काबिल हो
उसकी तारीफ हो तो
वह "औरत" की तारीफ है
तुम करो तो बलात्कार भी "काम" है
वह वेश्या बने तो बदनाम है

हे नर
क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम
5:10 अपराह्न
ललित ने कहा…

सर्वप्रथम "या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता, नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं सुरेश्वरी" फिर "गतिस्वं गतिस्वं त्वमेकां भवानि" तक ऋषि, मुनि, देवों, सभी ने नारी की पूजा की है। हिन्दू शास्त्र कहते हैं "यत्र नार्येस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता", शंकराचार्य ने भी देवी की स्तुति में अनेकानेक काव्य लिखे हैं।

हिन्दू लोग नारी की रक्षा, सम्मान को बचाने के लिए अपनी जान देते आए हैं, देते रहेंगे।

इस्लाम में नारी को कुछ निम्न स्थान दिया गया है। एक पुरुष को चार-चार विवाह की अनुमति होती है। भारत में विदेशी आक्रमणों के बाद विशेषकर मुगल शासनकाल में नारी की ऐसी दयनीय स्थिति शुरू हुई थी। किन्तु अब धीरे धीरे समाज परिवर्तन हो रहा है आशा है शीघ्र ही नर-नारी दोनों बराबर होकर कदम से कदम मिलाकर विश्व को प्रगति पथ पर ले जाएँगे।

आपके लेखों में पुरुष वर्ग के प्रति जितनी निराशा, विरोधाभास और वैचारिक जहरीलापन प्रकट हो रहा है उससे लगता है कि शायद आपको किसी इस्लाम अनुयायी पुरुष से धोखा, दर्द मिला हो। पिता, पुत्र, भाई, पति-प्रेमी का सच्चा स्नेह-प्रेम न मिल पाया हो। निवेदन है कि निष्पक्ष, निरपेक्ष होकर शान्त मन से सोचें...

अनेक पुरुषों ने नारी की वन्दना मे, प्रशंसा में, काव्य से लेकर महाकाव्य तक लिखे हैं। लेकिन महिलाओं द्वारा पुरुष की प्रशंसा में कितने काव्य लिखें हैं? 'देवियाँ' में भी ऐसी कृतघ्नता क्यों?
6:10 अपराह्न
अभय तिवारी ने कहा…

बहुत ज़बरदस्त तरीके से अपनी बात रखी है आपने घुघूती जी..

श्रीमान ललित, आप लेख समझने की कोशिश करें.. लेखक के विषय में अपने अनुचित अनुमान न निकालें.. और उस ऊर्जा का इस्तेमाल स्वयं अपने दिमाग की ग्रंथियों को सुलझाने में करें, वह बेहतर होगा..
आप यहाँ जिस मानसिकता का प्रदर्शन कर रहे हैं न सिर्फ़ वह साम्प्रदायिक है बल्कि ठीक वही पुरुष-वर्चस्ववादी है जिसका घुघुती जी ने उल्लेख किया है..

आप को अधिकार किसने दिया कि आप किसी स्त्री से इस तरह के सवाल करें? ये निहायत अशिष्टता, मूर्खता और अहंमन्यता है..

क्या किसी "देवी" से बात करने का यही तरीका जानते हैं आप?
7:38 अपराह्न
Rachna ने कहा…

@abhay tiwari
you have said what i wanted to say
so not repeating . Mam is a senior lady and an icon and one has to meet her to understand what she is
8:44 अपराह्न
masijeevi ने कहा…

इस अच्‍छी खासी चर्चा में हिंदू-मुसलमान के आने की जगह कैसे निकाली गई भई ?

घुघुतीजी फिलहाल ऐसी टिप्‍पणियों को इग्‍नोर मारें और जारी रहें।
10:15 अपराह्न
anitakumar ने कहा…

घुघुती जी
आपने बड़े सरल ढगं से उस शक्ति खीचतान को समझाया है जिसकी मैं ने अपने कमेंट में चर्चा की थी। रचना जी ने बहुत सुन्दर कविता के सहारे अपनी बात कही है। ललित जी बेवजह सांप्रदायिक प्रवति दिखा रहे हैं, और देवियों ने पुरुषों की तारिफ़ में अगर लिखना शुरु कर दिया तो क्या समाज उनके चरित्र पर लाछन न लगाएगा। पुरुष स्त्री की तारिफ़ करे तू श्रंगार रस और अगर स्त्री करे तो कुल्टा॥
चर्चा जारी रखिए पलीज
10:55 अपराह्न
Mired Mirage ने कहा…

मसीजीवी जी निश्चिन्त रहिये । मेरे पास हिन्दु मुस्लिम वाली बात के लिये भी उत्तर हैं । यह अच्छा ही है कि लोग ऐसे प्रश्न पूछें । शीघ्र ही उत्तर दूँगी थोड़ा सा स्वास्थ्य के कारण देर हो सकती है ,किन्तु उत्तर अवश्य दूँगी ।
घुघूती बासूती
10:57 अपराह्न
Lavanyam -Antarman ने कहा…

घुघूती जी,
स्त्री का सँघर्ष सदीयोँ को पार करता हुआ आज २१ वीँ सदी के प्रथम चरण तक आ पहुँचा है --
आप ने अपने विचार साफ तरीके से लिखे हैँ ..
आगे भी पढने की उत्सुक्ता बनी रहेगी ..
आशा है आप के स्वास्थ्य मेँ सुधार है
..ध्यान रखियेगा,
स स्नेह,
-- लावण्या
11:58 अपराह्न
Sanjeet Tripathi ने कहा…

आपकी कविताएं जितनी स्पर्शी होती है उतने ही ज्वलंत आपके लेख, चिंतन के लिए मजबूर करने वाले!!


बंधु ललित, इतनी आसानी से किसी के प्रति अनुमान लगा लेने की कला आपने कहां से सीखी। या यूं कहें कि किसी भी प्रसंग मे हिन्दु-मुस्लिम वाला संदर्भ जोड़ने की कला आपने कहां से सीखी बंधु। अगर ऐसी कोई संस्था हो जो यह सब सीखाती हो तो काश वह बंद की जा सके!!
12:04 पूर्वाह्न
रंजू ने कहा…

बहुत ही ज्वलंत सवालो और जवाबो से रचा है आपका यह लेख पर यह वक्त अब बदल रहा है
और बदलेगा ...कुछ कभी इसी तरह का मैंने भी लिखा था

तुम पुरुष हो इसलिए तोड़ सके सारे बंधनो को
मैं चाहा के इस से मुक्त ना हो पाई
रोज़ नापती हूँ अपनी सूनी आँखो से आकाश को
चाहा के भी कभी में मुक्त गगन में उड़ नही पाई

ना जाने कितने सपने देखे,कितने ही रिश्ते निभाए
हक़ीकत की धरती पर बिखर गये वो सब
मैं चाहा के भी उन रिश्तो की जकड़न तोड़ नही पाई

बहुत मुश्किल है अपने इन बंधनो से मुक्त होना
तुम करोगे तो यह साहस कहलायेगा
मैं करूंगी तो नारी शब्द अपमानित हो जाएगा!!

रंजना
9:14 पूर्वाह्न
Ashutosh ने कहा…

बासूती जी,

मेरे ब्लाग पे पधारने का बहुत बहुत धन्यवाद ।

सही कहा आपने । कल चक्र की निरंतरता बनी रहती है । समय घाव तो भर देता है , परंतु दाग के चिन्ह रह ही जाते है ।

पीड़ा हमारा सहज स्वाभाव नही है , जीवन से मिली विषमता एवं कथोराघत से यह ही सीख पाया हू बस । यात्रा जरी है और साथ ही सीखने - समझने का प्रयास भी ।

- आशुतोष
12:01 अपराह्न
Pramod Singh ने कहा…

बहुत सही.. प्रेरणाजोत बनी रहिए..
1:14 अपराह्न
Shastri JC Philip ने कहा…

काफी चिंतनीय विषय. चर्चा को आगे बढाईये -- शास्त्री जे सी फिलिप

मेरा स्वप्न: सन 2010 तक 50,000 हिन्दी चिट्ठाकार एवं,
2020 में 50 लाख, एवं 2025 मे एक करोड हिन्दी चिट्ठाकार!!
9:26 अपराह्न
रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

"यत्र नार्येस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता",
हमेशा से हीं नारी हमारे समाज में श्रद्धा की दृष्टि से देखी जाती रही है, आपकी प्रस्तुति वेहद -वेहद प्रशंसनीय है. शब्द और बिंब में ग़ज़ब का तालमेल. बहुत -बहुत वधाईयाँ .
1:50 अपराह्न
महावीर ने कहा…

बहुत ही सशक्त लेख है, इस चर्चा को जारी रखिए।
यह सांप्रदायिक चर्चा यहीं रुक जाए तो उचित होगा। व्यर्थ में ही मूल लेख से दूर जा रहे हैं। इस्लामी संस्कृति पर कीचड़ फेंक कर ४ पत्नियों की बात करेंगे, वे लोग द्रौपदी को फिर पांच पतियों के बीच लाकर खड़ा कर देंगे, राजाओं की बहु-विवाह रीत के उदाहरण देकर व्यर्थ का एक नया बखेड़ा खड़ा हो जाएगा। जिन चिन्तनशील मुद्दों पर चर्चा चल रही है, वह खटाई में पड़ जाएगी।
6:40 अपराह्न
हरिराम ने कहा…

गम्भीर चिन्तन विषयक लेख है आपका! साथ ही इन समस्याओं को सुलझाने हेतु कुछ सुझाव भी दें, तो सबको मार्गदर्शन मिलेगा। ललित जी की टिप्पणी हमें भी अच्छी नहीं लगी। उन्हें सम्माननीय महिलाओं पर व्यक्तिगत अनुमान व प्रश्न नहीं करने चाहिए, भले ही दूसरे पैराग्राफ में ऐतिहासिक कटुसत्य लिखा है। पर सद्भावना और संहति की दृष्टि से यह भड़काऊ हो सकता है। कृपया उक्त टिप्पणी को delete कर दीजिए।
11:43 पूर्वाह्न

अन्त में अपने ही एक अन्य लेख की ये पंक्तियाँ पढ़वाती हूँ.......

मुझे किसी पुरुष से कोई शिकायत नहीं है । केवल एक सुन्दर बराबरी के समाज की कल्पना भर करना चाहती हूँ , जहाँ स्त्रियाँ ना पूजी जाएँ ना दुत्कारी जाएँ । न हमें देवी बनना है न प्रतिमा, केवल व्यक्ति बनकर रहना है । क्या यह बहुत बड़ी माँग है ?

घुघूती बासूती