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Saturday, April 25, 2009

स्त्रियों को नाम का अधिकार कहाँ है, यह तो संसार की अन्य वस्तुओं की तरह पुरुषों का एकाधिकार है।

पितृसत्तात्मक इस समाज में नाम पर भी स्त्री का अधिकार कहाँ है ? आपका कुछ खो जाए तो ढूँढ सकते हो, पुलिस में रपट लिखवा सकते हो परन्तु जिसका नाम ही खो जाए वह कहाँ ढूँढे, कहाँ रपट लिखवाए? रपट लिखवाने को भी तो एक नाम चाहिए ! अब नाम खोजती स्त्री किस नाम से लिखे ? उस नाम से जिससे वह बचपन से पुकारी जाती थी, जिस नाम को उसने जीवन के बीस पच्चीस वर्षों तक जिया, जिस नाम से उसने न जाने कितने तमगे जीते या उस नाम से जो मंगलसूत्र के साथ उसको पकड़ा दिया गया कि लो बिटिया अब इसे ही अपना सबकुछ समझो ? कहना सरल है किन्तु जीना कठिन।

विवाह के साथ बहुत कुछ खोया और पाया जाता है। जीवन में खोना व पाना सदा साथ साथ चलता है। यह स्वीकार भी किया जा सकता है। किन्तु अपनी पहचान खोना ! यह एक अक्षम्य व बर्बर समाज ही किसी से करवा सकता है। दुर्भाग्य से यह 'किसी' सदा स्त्री ही होती है। नाम खोने की पीड़ा वही समझ सकता है, जिसने अपना नाम खोया हो और जिसके लिए नाम का कोई महत्व रहा हो। अधिकतर पुरुष यही कहेंगे कि इसमें क्या बड़ी बात है। भाई, पल भर को अपने आप को अपनी सास के या पड़ोसी के नाम से जानने की कोशिश करके देखो। जीवन भर आप कहलाए थे समर दादाभाई हँसमुख और अचानक आपका नाम हो जाता है समर नान्जीभाई उदास !( या समर नान्जीबहन उदास और आप हैं पुरुष !)बोलिए कैसा लगेगा यह नया नाम ? क्या आपका हाथ हर बार किसी कागज पर यह नाम लिखते या यह हस्ताक्षर करते काँपेगा या नहीं ? हमारी पीढ़ी तो फिर भी भाग्यवान है कि सिमरन दादाभाई हँसमुख से केवल सिमरन नान्जीभाई उदास जैसी कुछ हो जाती है,सौभाग्य से सिमरन को तो अपने से चिपकाए रहती है। हमारी माँ की पीढ़ी का तो पहला नाम सिमरन तक बदल कर मंगला, श्यामा या गोपा या उस पल जो भी सुहाया कर दिया जाता था। सिमरन को स्मरण भी नहीं रहता था कि वह कभी सिमरन थी। यदि स्मरण करती थी तो सिवाय पीड़ा व नाम तक अपना न कह पाने की विवशता के कुछ भी हाथ नहीं आता था।हेम पान्डे जी ने अपने चिट्ठे शकुनाखर में छद्मनामधारी ब्लॉगर्स पर आधारित एक कहानी लिखी। उसपर बहुत सी टिप्पणियाँ आईं। वहीं ज्ञानदत्त पाण्डेय जी छद्मनामधारी मानव के बारे में कहते हैं.........

'मुझे नहीं लगता कि छद्मनाम से लिखने वाले या अपने बारे में कम से कम उजागर करने वाले बहुत सफल ब्लॉगर होते हैं। आपकी जिन्दगी में बहुत कुछ पब्लिक होता है, कुछ प्राइवेट होता है और अत्यल्प सीक्रेट होता है। पब्लिक को यथा सम्भव पब्लिक करना ब्लॉगर की जिम्मेदारी है। पर अधिकांश पहेली/कविता/गजल/साहित्य ठेलने में इतने आत्मरत हैं कि इस पक्ष पर सोचते लिखते नहीं।और उनकी ब्लॉगिंग बहुत अच्छी रेट नहीं की जा सकती।'

उनसे मैं यही कहूँगी कि सारी समस्या ही इस सोचने से उपजी है। यदि सोचती नहीं तो मैं भी गर्व के साथ अपना लेखन उस नाम के साथ ठेलती जाती जो मेरा नहीं है, परन्तु मैं ढो रही हूँ। संसार की अधिकतर स्त्रियाँ बहुत आराम से अपने नए नाम को अपना लेती हैं क्योंकि वे जन्मजात रानी बेटियाँ होती हैं, परम्पराओं को वे आराम से ओढ़ती, जीती हैं, प्रश्न नहीं करती, न समाज से न अपने आप से। परन्तु कभी कभी गलत नक्षत्र में कुछ ऐसी बेटियाँ भी जन्म ले लेती हैं ( वैसे बेटी का जन्म हो तो शुभ नक्षत्र तो हो ही नहीं सकते ! ) जो प्रश्न पूछने के असाध्य रोग से ग्रसित होती हैं। मैं उन्हीं अरानी बेटियों में से एक हूँ। प्रश्न करना और उनके उत्तर पाना और न पाने पर उन्हें खोजना अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानती हूँ। वैसे स्त्री और जन्मसिद्ध अधिकार शब्द एक दूसरे के साथ शोभा नहीं देते। स्त्री और कर्त्तव्य या त्याग कैसे एक दूसरे की शोभा बढ़ाते हैं। कुछ वैसे ही जैसे...

शशिनाच निशा, निशयाच शशि
शशिना निशयाच विभाती नभः।
( स्मरण के आधार पर लिखा है, अशुद्धियाँ हो सकती हैं।)
अर्थात चन्द्रमा से रात्रि की शोभा बढ़ती है और रात्रि से चन्द्रमा की। चन्द्रमा और रात्रि से आकाश की शोभा बढ़ती है।

ठीक ऐसे ही हे स्त्री,
त्याग या कर्त्तव्य से स्त्री की शोभा बढ़ती है और स्त्री से त्याग की। त्याग व स्त्री (या कहिए त्यागमयी स्त्री से,वैसे किसी अन्य प्रकार की स्त्री की कल्पना ही हृदय दहला देने वाली होती है ना!)से समाज की शोभा बढ़ती है।
सो हे स्त्री, तू त्याग किए जा, नाम से लेकर अधिकारों तक का। इसी में तेरा व समाज का कल्याण है।

मैं छद्म नाम से इसलिए लिखती हूँ क्योंकि आज जो मेरा नाम है उससे मैं नहीं लिख सकती। कोई रोकटोक की बात नहीं है। मैं सौभाग्यवती हूँ कि लिखने और उस नाम से लिखने की मुझे अनुमति मिली हुई है। बहुत सी स्त्रियों को तो शायद कम्प्यूटर पर समय खोटा करने की अनुमति भी नहीं मिलती होगी। मैं उस नाम से इसलिए नहीं लिख सकती क्योंकि मुझे वह नाम अपना लगता ही नहीं। जो नाम अपना था उसे तो मैंने सौभाग्यवती कहलाने की कीमत के रूप में चुका दिया सो अब वह मेरा कहाँ से रह गया? वैसे दिल को बहलाने को यह भी सोच सकती हूँ कि उस नाम से क्या प्यार जो स्वयं पितृसत्ता के अन्तर्गत मुझे कुछ वर्षों के लिए दिया गया था, तब तक के लिए जब तक मैं अपने घर(अर्थात अपने पति के घर) की तरह अपना असली नाम, कुल, गोत्र नहीं प्राप्त कर लेती। ठीक वैसे ही जैसे जब तक माता पिता बच्चे के लिए एक उपयुक्त नाम नहीं ढूँढ लेते वे उसे छोटू या पप्पू जैसे किसी वैकल्पिक नाम से बुलाते हैं। यहाँ बहुत सी कहावतें याद आती हैं,स्त्री तो धान की रोप की तरह है जब तक उखाड़कर नई जगह न लगाओ पनप नहीं सकती,पराया धन आदि आदि।

खैर,मेरी नाम खोने की समस्या थोड़ी अधिक गम्भीर इसलिए भी है कि विवाह से पहले के अधिकतर मित्र मुझे मेरे सरनेम से ही बुलाते थे। अब वह ही मेरा नहीं रह गया है। तो यह ओढ़ा हुआ नाम और भी अटपटा लगता है। अपने इसी अनुभव के कारण मैंने अपनी बेटियों को सदा हस्ताक्षर करते समय अपने नाम को महत्व देने को ही कहा सरनेम को बिल्कुल नहीं ताकि विवाह के बाद उनकी यातना मुझसे कुछ कम ही रहे।

बहुत से पुरुष व कुछ स्त्रियाँ पूछेंगी कि यदि मुझे नाम बदलने से इतना ही कष्ट था तो मैंने विवाह किया ही क्यों? विवाह तो मैंने व मेरे पति दोनों ने ही किया। किसी जोर जबर्दस्ती से नहीं,अपनी इच्छा से किया फिर नाम की कीमत मुझे ही क्यों चुकानी पड़ी?

मुझे याद आता है कि पी एच डी करती मेरी दीदी के विवाह के लिए जब वर ढूँढा जा रहा था तो दीदी ने वर की पढ़ाई आदि के अतिरिक्त एक और माँग की थी कि जहाँ तक हो सके कोशिश की जाए कि हमारे ही सरनेम वाला वर ढूँढा जाए। किन्तु एक तो कुमाऊँनी समाज बहुत छोटा व सीमित है उसपर एक ही सरनेम के लोग प्रायः एक ही गोत्र के होते हैं सो उसकी यह इच्छा पूरी करना बहुत कठिन हो गया था। अब वह वर्षों से पी एच डी की मेहनत कर जिस डॉक्टर शब्द को अपने नाम के आगे लगाना चाहती थी वह अन्त में लगा किसी पराए से नाम के आगे !

यह नाम बदलने की परम्परा तब इतनी कष्टप्रद व क्रूर नहीं लगती होगी जब लड़कियों का विवाह बहुत छोटी उम्र में हो जाता होगा। जब उन्होंने अपना नाम किसी कागज में वर्षों वर्ष लिखा नहीं होता होगा, जब वे अपने हस्ताक्षर की अभ्यस्त नहीं हुई होती होंगी,जब उन्होंने अपने उस नाम से ढेरों प्रमाणपत्र नहीं पाए होते होंगे।

वैसे वर्तमान में बहुत सी स्त्रियाँ अपने पुराने नाम को ही रखे रहती हैं। ऐसी स्त्रियों की संख्या कम है परन्तु निरन्तर बढ़ रही है। कुछ अपने पुराने सरनेम के आगे पति का सरनेम भी लगा लेती हैं। वैसे कुछ बहुत ही कम लोग एक नए सरनेम का सृजन कर लेते हैं जो दोनों के सरनेम के जोड़तोड़ से बना होता है।

प्रायः जब इस सरनेम बदलने की बहस छिड़ती है तो लोग कहते हैं कि पति पत्नी का अलग अलग सरनेम होगा तो बच्चों का क्या होगा? पारिवारिक एकता का क्या होगा? किन्तु क्यों हर ऐसे मुद्दे, जैसे विजातीय धर्म के विवाह आदि के मुद्दे को सुलझाने में स्त्री के सरनेम या धर्म की ही बलि माँगी जाती है? क्यों विवाह सुख पाते तो पति पत्नी दोनों हैं किन्तु कीमत प्रत्यक्ष रूप से केवल स्त्री से ही माँगी जाती है? परोक्ष में पुरुष भी काफी त्याग करते होंगे परन्तु सहज रूप से विवाह हो या मातृत्व सुख नाम, नौकरी आदि की बलि केवल स्त्री ही चढ़ाती है। कम से कम अपेक्षा तो उसी से की जाती है।

सो मैं इस छद्मनाम से इसलिए लिखती हूँ क्योंकि कम से कम यह नाम मेरा चुना हुआ तो है। यदि मुझसे मेरे नाम का अधिकार छिन गया तो यह नाम कम से कम मुझे एक छद्म नाम चुनने का अधिकार तो देता है। मेरे हर उस पहचान पत्र, जिसमें मेरा कोई विशेष योगदान नहीं है, में मेरा नहीं मेरे पति का नाम है। मेरे हर उस प्रमाणपत्र जिसमें मेरी प्रतिभा, मेरी मेहनत लगी थी, में मेरा खोया हुआ नाम है। कम से कम मेरा लेखन, मेरी रचनाएँ तो मेरी निजी हों। इसमें से तो मेरे प्रदेश,मेरे पहाड़,मेरी संस्कृति की सुगन्ध आती रहे। मुझे यह नाम अधिक अपना लगता है। मेरा या किसी भी छद्मनामधारी का लेखन इसलिए निम्नस्तरीय तो नहीं हो सकता कि वह छद्मनाम से लिखा जा रहा है। यदि वह निम्न स्तरीय है तो नाम के कारण नहीं अपितु इसलिए है क्योंकि मेरा या उनका लेखन परिपक्व नहीं हुआ है या भाषा का प्रवाह व ज्ञान कम है या हममें लेखन प्रतिभा है ही नहीं। चुनाव के इस मौसम में नाम के चुनाव के इस छोटे से अधिकार से तो मुझे वंचित नहीं रखा जा सकता ना !

घुघूती बासूती

पुनश्चः इसी विषय को आगे बढ़ाते हुए हेम पाण्डे जी ने एक और लेख... लिखा है।

घुघूती बासूती

Monday, December 29, 2008

गाली विमर्श: कुछ यादगार बातें

गाली विमर्श से मुझे इस विषय से सम्बन्धित कुछ यादगार बातें याद आ रही हैं और कुछ प्रतिदिन की प्रतिक्रियाएँ।


पहले प्रतिदिन वालीः
पति किसी मनुष्य या वस्तु को साला कहता है। पत्नी कहती है , 'ओह, तो यह भी मेरा भाई है। क्या उसे साला कहने के पीछे भावना उसे मेरा भाई घोषित करने की है या उसकी बहन को अपनी पत्नी ?' स्वाभाविक है भावना दूसरी ही रहती है। इसके बाद वह अपने तरकश में से अगला तीर निकालता है जिसके अन्तर्गत वह जिसे गाली दे रहा है उसका सम्बन्ध उसकी बहन से स्थापित करता है। ठीक इससे पहले वह उसे अपनी पत्नी का भाई घोषित कर चुका होता है। अब पत्नी पूछती है कि 'क्या तुम मेरे और उसके बीच सम्बन्ध स्थापित कर रहे हो या सम्बन्ध हैं यह तुम्हारा आशय है?' पति पत्नी को घूरता है, उसकी मंद बुद्धि व गालियों के क्षेत्र में उसके अज्ञान पर मुस्कराता है। परन्तु वही पत्नी जब गालियाँ देकर अपने गालियों के क्षेत्र में ज्ञान की वृद्धि का सबूत देती है तो पति नाराज, दुखी, निराश हो जाता है।


वैसे सिवाय नपुंसक क्रोध या सही समय पर सही बेहतर शब्द न मिल पाने के या कल्पना के अभाव के गाली देने के और क्या कारण हो सकते हैं? मुझे नहीं लगता कि लोग उसका अर्थ सोचकर गाली देते हैं और यह तो और भी भयानक स्थिति है। इसका अर्थ है कि आप जो भी कह रहे हैं वह बिना सोचे समझे कह रहे हैं। तर्क से उसे तो समझाया जा सकता है या बहस की जा सकती है जो तार्किक बात कर रहा हो, किन्तु जो बिना सोचे, साँस लेने की क्रिया के समान, गाली दे रहा हो उससे क्या तर्क किया जाए?


अब यादगार बातें:
मुझे एक नवयुवती की कही बात याद आ रही है, ' चाची गाली देकर तो देखो । देखो , कैसी केथार्सिस की फीलिंग होती है।' केथार्सिस याने भाव-विरेचन (?) याने कुछ वैसी संतुष्टि जो मवाद भरे फोड़े के फूटने पर होती है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि वह सही कह रही थी। यह गाली भी गुस्से का केथार्सिस ही होता होगा। देखा जाए तो स्त्रियों से अधिक इसकी आवश्यकता किसे हो सकती है? सदियों से दबाई,छिपाई हमारी इच्छाएँ,भावनाएँ,हमारा गुस्सा सच में केथार्सिस माँगता ही माँगता है। फिर भी क्या हम इसके लिए कोई सकारात्मक रास्ता नहीं ढूँढ सकते या कम से कम क्रोध में वह तो कहें जो हम कहना चाह रहे हैं न कि किसी के किसी से शारिरिक सम्बन्ध स्थापित करें,जो हमारा उद्देश्य बिल्कुल भी नहीं है। क्या यह कहना अधिक सही नहीं होगा कि 'मैं तुम्हें पीटना चाहता/चाहती हूँ।' अधिक रसमय बनाना हो तो मार मार कर भुर्ता तो है ही। या 'मैं तुम्हारा सिर फोड़ देना चाहता/चाहती हूँ।' या 'मैं तुम्हारी हत्या कर देना चाहता/ चाहती हूँ।'


गालियाँ कुछ कुछ उच्चारण के लहजे सी होती हैं। जिस समाज के बीच आप रहते हैं उस समाज के उच्चारण की तरह इसका रंग भी आप पर चढ़ जाता है। मुझे याद है बचपन में हमारी बदली ऐसी जगह हुई जहाँ गालियों के बिना पुरुषों,लड़कों का बात करना लगभग निषेध सा दिखता था। मैंने..पान खाया। ..पान तो ... बेकार था। हैं बे ..., क्यों बे ..., कल तू... क्यों नहीं आया ? अब जैसा कि समाज में होता आया है,(रूप देखकर तो ‌‌ॠषियों का मन भी डोलने लगता है,ॠषि पत्नियों का नहीं, 'boys will be boys' की तर्ज पर ) यह सब सीखकर भाई ने भी गाली दी। माँ गाली सुनकर सन्न रह गईं। कुछ उपाय तो करना ही था। सो उन्होंने कहा कि उन्हें अपने बेटे को दिए ऐसे बेकार संस्कारों के लिए पश्चात्ताप करना होगा। उन्होंने जाकर सिर से स्नान किया। फिर सारा दिन भूखे रहकर रामायण का पाठ किया। वह दृष्य अविस्मरणीय है,माँ के लम्बे बाल जो खुले होने पर धरती पर भी फैले हुए थे,सामने रखी रामायण और पश्चात्ताप में जलता भाई! यह उपाय रामबाण साबित हुआ। शायद ही कोई पुत्र हो जो गालियों का आनन्द उठाने के लिए माँ को भूखा रामायण का पाठ करवाए। अभी तक यह स्पष्ट नहीं हुआ कि पिताजी की क्या भूमिका रही थी।


वैसे मैं उस माँ का अनुसरण करने को नहीं कह रही,परन्तु यदि हम चाहते हैं कि हमारी पुत्रियाँ ये शब्द ना उपयोग करें तो हमें स्वयं चाहे हम स्त्री हों या पुरुष इन शब्दों से परहेज करना होगा। अन्यथा हमें ये शब्द दिन रात सुनने ही होंगे,और न केवल पुरुष के मुँह से स्त्री के मुँह से भी। अब निर्णय आपका अपना है।


साबुन से मुँह धोना भी एक इलाज है। स्त्रियों को समझाने वाले कितने पुरुष अपनी बुरी आदत को छोड़ने के लिए इस उपाय का उपयोग करेंगे?


घुघूती बासूती

Tuesday, December 23, 2008

नामो के नाम एक स्त्री की चिट्ठी

आज ज्ञानसिंधु जी द्वारा लिखित 'छात्राओं के लिए प्रश्नपत्र' पढ़कर बहुत समय पहले लिखा अपना एक लेख याद आ गया । आज उसे यहाँ दे रही हूँ।


नामो, बधाई हो, सुना है, तुम्हारा विवाह हो रहा है ।


एक स्त्री होने के नाते मैं तुम्हें कुछ बातें बताना चाहती हूँ । पापा जो चुपके से तुम्हारे तकिये के नीचे चिट्ठी रख गए, वह मैंने भी पढ़ी । लगभग हर पिता मौखिक या लिखित में अपनी पुत्री को ये बातें बताता या बतवाता है । ठीक भी है़, नए घर जा रही बिटिया के लिए मन में डर तो रहता ही है । उस चिट्ठी को ध्यान से पढ़ना, बहुत सी काम की बातें उसमें हैं । परन्तु बहुत सी और भी काम की बातें छोड़ दी गईं हैं । तुम्हारे पापा अन्य पापाओं की तरह आशावादी हैं । सोचते हैं कि यदि तुम अच्छा व्यवहार करोगी तो सब अच्छा ही होगा । मैं भी यही चाहूँगी । परन्तु हर बार ऐसा होता नहीं। सो अच्छा व्यवहार तो करना ही ,परन्तु यदि तुम्हारे पापा किसी फैक्ट्री में या किसी महत्वपूर्ण पद पर काम करते हों तो उन्हें शायद यह भी पता हो कि कुछ भी काम करने से पहले जब योजना बनाई जाती है तो योजना १ के साथ योजना २ और यदि काम अधिक महत्वपूर्ण हो तो योजना ३ भी बनाई जातीं हैं। प्रचलित भाषा में उन्हें प्लैन बी और सी कहा जाता है ।


सो नामो, प्लैन ए तो वह है जो तुम्हारे पापा तुम्हें बता रहे हैं । अब यदि जैसा तुम, तुम्हारे पापा व हम सब चाह रहे हैं वैसा न हो पाए तो प्लैन बी भी तैयार रहना चाहिए । प्लैन ए के अन्तर्गत यह मानकर चला जा रहा है कि तुम हर काम करने से पहले आज्ञा माँगोगी । यदि नहीं मिली तो ? चलो घूमने जाने की आज्ञा माँगोगी और नहीं मिली तो चल जाएगा । यदि बुखार आया और डॉक्टर के पास जाने की आज्ञा नहीं मिली तो ? यदि अपने मित्र व सखी से मिलना हो और पति या सास ससुर ने आज्ञा नहीं दी तो ? एक बार, दो बार तो मिले बिन रह जाओगी, परन्तु अनन्त काल तक ? एक आध बुखार तो मायके से साथ लाई गोलियों के सहारे झेल जाओगी, परन्तु अनन्त काल तक ? तो नामो, ऐसे में ' मैं डॉक्टर के पास जा रही हूँ, या मित्रों को घर बुला रही हूँ या उनसे मिलने जा रही हूँ ' यह सूचना दे देना ।
आशा है, तुम्हें कोई कष्ट नहीं देगा़, पीड़ा नहीं देगा । परन्तु यदि दी तो ? ऐसे में नामो, पहले जानने का यत्न करना कि तुम्हारे साथ ऐसा क्यों हो रहा है । हो सके तो बातों से हल निकालना । यदि हल न निकले तो कोशिश करना कि तुममें इतना आत्मविश्वास हो कि वे तुम्हें सताने की हिम्मत न करें । परन्तु बहुत से लोग परपीड़ा में ही सुख पाते हैं, यदि वे ऐसे लोग हों तो वहाँ रहने में कोई तुक नहीं होगी । ऐसे में रोना, पिटना यानि स्वयं को शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित मत होने देना । पहले से ही माता पिता से बात करके रखना कि तुम्हें दहेज नहीं चाहिए बल्कि अपने घर यानी जिसे लोग मायका कहते हैं, वहाँ तब तक रहने का अधिकार चाहिए होगा, जब तक तुम अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जातीं । नामो, जिस शहर तुम ब्याहकर जा रही हो, उस शहर में किसी ऐसे व्यक्ति का पता अपने साथ जरूर रखना जिसे समय असमय सहायता के लिए बुला सको । चाहे कुछ भी हो जाए, न किसी को तुम्हें मानसिक या शारीरिक क्षति पहुँचाने देना न स्वयं अपने को क्षति पहुँचाना । विवाह जीवन का एक बहुत महत्वपूर्ण भाग है परन्तु केवल वह ही जीवन की परिभाषा नहीं है । विवाह असफल होने पर भी जिया जाता है और जीवन को प्यार करके आत्मसम्मान के साथ जिया जाता है ।


सबको प्यार देना, सबका सम्मान करना परन्तु उन सबसे पहले स्वयं को प्यार करना, स्वयं को सम्मान देना । आत्मसम्मान की कीमत पर पाया गया विवाहित जीवन कभी सुखी नहीं हो पाता । देर सबेर यह याद आ ही जाता है कि तुम भी मनुष्य हो और वह मनुष्य ही क्या जिसमें आत्मसम्मान न हो ?
मेरी सीख अपने नाम की तरह तुम्हें उल्टी तो अवश्य लगेगी, परन्तु नामो, जीवन में बहुत कुछ उलट पुलट होता रहता है, सो प्लैन बी और सी को कभी मत भूलना।


यदि तुम्हारे मना कहने पर भी माता पिता विवाह पर खर्चा करें और जब तुम्हें उनकी आवश्यकता पड़े तो तुम्हारे विवाह को ही अपने कर्त्तव्य की इतिश्री मानें तो नामो, प्लैन सी की आवश्यकता होगी। इसके अन्तर्गत नामो, विवाह तब तक मत करना जब तक आत्मनिर्भर न हो जाओ। नौकरी चाहे दूसरे ही शहर की क्यों न हो तब तक मत छोड़ना जब तक तुम यह सुनिश्चित नहीं कर लेती कि उस घर में तुम्हारा स्वागत है, तुम वहाँ भली भांति जी सकोगी। तुम लम्बी अवधि का बिना वेतन के अवकाश ले सकती हो। नौकरी होने से मित्र भी होते हैं जो मुसीबत के समय में साथ दे सकते हैं।


वैसे तो आशा है तुम्हारे मंगेतर की माँ भी उसे ऐसा ही एक पत्र लिख चुकी होगी और वह भी अपने उत्तरदायित्व अच्छे से समझ गया होगा। ऐसा हुआ होगा तो नामो, सबकुछ बढ़िया ही रहेगा ऐसी आशा की जा सकती है।


तुम्हारी हितचिन्तक,
तीघूघु तीसूबा

पुनश्चः यह लेख लिखने की प्रेरणा मुझे 'मोना के नाम पापा की अनमोल चिट्ठी' पढ़कर मिली थी।


घुघूती बासूती

Friday, December 12, 2008

इन्हें चाँद चाहिए !!!

हाँ, चाहिए ही चाहिए। चाँद ही क्या तारे भी चाहिए । बहुधा ऐसा होता है कि लगता है कि हमें चाँद या कुछ और इसलिए चाहिए क्योंकि तुम्हारे पास है या क्योंकि तुम्हें चाहिए तो हमें भी चाहिए । परन्तु मुझे तो चाहिए, तब भी जब तुम्हें इसकी चाहत हो या न हो, तुम्हारे पास हो या न हो । मुझे अपने लिए चाहिए, तुमसे बिल्कुल पृथक और स्वतंत्र । यदि मिल गया तो मेरा मन होगा तो तुमसे भी बाँटूगी या नहीं बाँटूगी । चाँद या किसी और की चाहत मेरा नितान्त निजी मामला है । इसमें किसी और की अनुमति या पसन्द नापसन्द का कोई प्रश्न ही नहीं उठता । मिल गया तो खुशी भी मेरी होगी, नहीं मिला तो दुख भी मेरा । इससे किसी अन्य को क्या लेना देना है ? हाँ यदि इसे पाने के लिए मैं कोई गैरकानूनी काम करूँ तो अवश्य शिकायत करना । और यदि मेरी इस चाहत का कोई अनुचित लाभ उठाने का प्रयास करे तो उसे रोकना भी होगा और यदि कोई मेरी इस चाहत का मूल्य परिश्रम से अधिक या इसके अतिरिक्त माँगे या जबरदस्ती ले तो उसे सजा भी मिलनी ही होगी ।

'एक बात तो तय है। किसी भी स्त्री से उसकी सहमति के बगैर संबंध नहीं बनाया जा सकता।' यह बात कही जा रही है 'इन्हें चांद चाहिए' में ! एक और बात भी तय है, एक ही क्या बहुत सी बातें तय हैं, किसी की सहमति के बिना उसकी हत्या नहीं हो सकती, चोरी या जेब कतरना नहीं हो सकता, डाका नहीं डल सकता, यहाँ तक कि कोई आतंकवादी उसे आतंकित नहीं कर सकता । यह तथ्य यदि पहले ही पता होते तो इतने सारे न्यायालय बनाकर क्यों पैसा डुबाया जाता ? वकीलों से कहो कोई और धंधा अपनाएँ । यह तथ्य जानने के बाद अब मैं पहले से काफी अधिक सुरक्षित अनुभव कर रही हूँ । मैं तो सोच रही हूँ कि 'मैं असहमत हूँ' की एक तख्ती लटकाकर निश्चिन्त हो कभी भी, कहीं भी घूमने निकल जाऊँ । पुरुष नामक जीव जब यह तख्ती पढ़ेगा तो मुझे कभी कोई हानि न पहुँचाकर एक अच्छे बच्चे सा अपने रास्ते या फिर सहमत स्त्रियों, पुरुषों की खोज में किसी अन्य रास्ते चला जाएगा। यह बात यदि पहले पता होती तो ताज, औबेरॉय आदि में भी बड़े बड़े अक्षरों में यह लिखकर टांग दिया जाता ।

कुछ अति तो मैं कर रही हूँ, लेख काफी अच्छा है, परन्तु सफलता यदि इन्हीं कारणों से मिलती तो हर सफल पुरुष या हर वह सफल पुरुष जो किसी पुरुष के अधीन काम कर रहा है, समलैंगिक होता । हर सफल स्त्री जो किसी स्त्री के अधीन काम कर रही है, भी समलैंगिक होती । एक मछली सारे तालाब के जल को गंदा तो करती ही है परन्तु इन अपवादों को इतना तूल देकर सफलता और सफल व्यक्ति पर ही प्रश्नचिन्ह लगाकर हम जल के नाम को ही गंदा कर रहे हैं । क्या यह असफल लोगों की 'खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे'वाली मानसिकता को इंगित नहीं करती ?

जहाँ भी शक्ति, विशेषकर अकूत शक्ति बिना किसी उत्तरदायित्व के केन्द्रित होगी उसका दुरुपयोग होने की संभावना भी होगी, विशेषकर तब जब शक्ति किसी कुपात्र के हाथ में होगी । यहाँ कुपात्र से भी अधिक दोष उसका है जिसने उस कुपात्र को ऐसी शक्ति पकड़ाई ।

शक्ति का दुरुपयोग होता है,मानवीय कमजोरियों का लाभ कुछ लोग अवश्य उठाते हैं, चाहे वे पुरुष हों या स्त्री ! इसमें चाँद की चाहत का दोष नहीं है, दोष है तो केवल गलत मार्ग का, यदि उसका उपयोग हुआ हो । बहुधा जब हम कुछ नहीं पा पाते तो हमारा अहम् हमें पाने वालों की योग्यता को स्वीकार नहीं करने देता । क्योंकि यदि हम यह स्वीकारेंगे तो हमें अपनी अयोग्यता भी स्वीकारनी होगी ।

घुघूती बासूती

Monday, November 24, 2008

इक और विष का प्याला

अपने जीवन में इतना कुछ
इन आँखों ने देखा परखा है,
होता है अन्याय स्त्री पर
बचपन से देखा समझा है।


इतना कि वह सब बहता है
रग रग में बन कर हाला,
कमी है तो आओ ले आओ
इक और विष का प्याला !


घुघूती बासूती

Monday, August 11, 2008

माँ

ममतामयी माँ
लावण्यमयी माँ
त्यागमयी माँ
गरिमामयी माँ
सौम्या माँ
साड़ी में लिपटी माँ
बिन्दिया वाली माँ
लम्बे काले बालों वाली माँ।

आज की सफेद बालों वाली माँ
बिन बिन्दिया वाली माँ
बिन चरयो वाली माँ
बिन चूड़ी वाली माँ
बिन बिछिये वाली माँ
हल्के रंग पहनने वाली माँ
बैंगन, उरद ना खाने वाली माँ
हल्दी कुमकुम में ना जाने वाली माँ
दाँए हाथ में मौली बँधवाने वाली माँ।

दुर्भाग्यवती माँ
पिताजी की पत्नी माँ
पिताजी के नाम से जानी जाने वाली माँ
पिताजी की पूर्व सौभाग्यवती माँ
पिताजी की विधवा माँ
मेरे भाई की माँ
मेरे भतीजे की दादी माँ ।

हाँ, मेरी भी माँ
मेरी माँ के रूप में ना जानी जाने वाली माँ
मेरी बच्चियों की भी नानी माँ
उनकी नानी के नाम से ना जानी जाने वाली माँ
मेरे नाना की बेटी मेरी माँ
मेरे मामा की बहन मेरी माँ
मेरी मौसियों की भी बहन मेरी माँ
उनकी बहन के नाम से ना जानी जाने वाली माँ।

आज जब मंदिर जाती हो
या जब घर में पूजा होती है
तो क्या आशीर्वाद देते हैं
पंडितजी तुम्हें माँ ?
क्या अचानक सौभाग्यवती भवः
की जगह बुद्धिमती भवः कहते हैं ?
या फिर कहते हैं चिरंजीवी भवः ?
पूरे जीवन इस आशीर्वाद के बिन
तुम जीयी और खूब लम्बी उम्र जीयीं
पिताजी तो चिरंजीवी भवः सुनते सुनते चले गए
और तुम सौभाग्यवती सुनते सुनते
दुर्भाग्यवती बन गईं।
तुम्हें पुत्रवती भवः के आशीर्वाद भी खूब मिले होंगे
किन्तु फिर भी तुम्हारी गोद में
मैं आ ही गई
तब तुम क्या रोई थीं माँ
या केवल उदास हुईं थीं ?

माँ, तुम्हारा तो नाम ही खो गया
याद नहीं कभी किसीने तुम्हें
तुम्हारे नाम से पुकारा हो
माँ, तुम्हारा तो व्यक्तित्व ही
पिताजी से था
क्या किसीने कभी तुमसे पूछा कि
तुम क्या चाहती हो ?
पढ़ना है या बालिका वधू बनना है
नौकरी करनी है या गृहणी बनना है
कितने बच्चों की माँ बनना है
माँ बनना भी है या नहीं
मैंने भी नहीं पूछा कि क्या
मैं तुम्हारी कोख में आ जाऊँ ?
बस आ गई।

और अब तुम्हारे जीवन के
ये अनुत्तरित प्रश्न मुझे कचोटते हैं
क्या ये सब प्रश्न
तुम्हारे मन में भी उठते थे?
या तुमने उनको दबाना सीख लिया था
या फिर उन्हें सुनना
अपनी ही आवाज को सुनना
बन्द कर दिया था
कभी कभी सोचती हूँ माँ
कि इक दिन शायद मैं भी
तुम सी हो जाऊँ
प्रश्न करना छोड़ दूँ
क्या प्रश्न करना छोड़कर तुम संतुष्ट हो?

क्या मैं संतुष्ट हो जाऊँगी
जब आँखें मूँदकर चलूँगी
पति से दस कदम पीछे
जब अपनी खोज करना छोड़ दूँगी
जब अपनी पहचान को ढूँढना छोड़ दूँगी
कुछ विक्षिप्त सी स्थिति होगी
जब खोए हुए स्वयं को
ढूँढना भी छोड़ दूँगी
एक मेरी निजता ही तो मेरी है
नाम किसी का
घर किसी का
पता किसी का
एक मैं ही तो मेरी अपनी हूँ।

घुघूती बासूती

Wednesday, August 06, 2008

ज्वलनशील नारियाँ


नारियों के,
भारतीय नारियों के जलने पर
क्यों अफसोस है
वे तो सदा से ज्वलनशील रही हैं
उसमें न हमारा कोई दोष है,
नहीं तो कोई
उसके जीवित जलने की कल्पना
भी कैसे करता?
तब, जब हम चला रहे थे
अग्नि बाण
जब उत्कर्ष के चरम पर था
हमारा इतिहास
तब भी माद्री बन रही थी
जीवित मशाल।
तब जब हम थे भाग रहे
मुगलों से मुँह छिपा
जब पतन की गर्त में था
हमारा इतिहास
तब भी हम गौरान्वित थे,
क्या हुआ जो हम
न बचा सके अपनी
बेटियों की लाज,
ब्याह रहे थे उन्हें मुगलों से
पाने को कुछ स्वर्ण ग्रास
तब भी पत्नियाँ तो थीं हमारी
सीता, सती व सावित्री
कूद रहीं थीं पद्मिनियाँ
जलने को जौहर की आग में।
फिर जब बन रहे थे
पढ़ अंग्रेजी
जैन्टलमैन बाबू हम
तब भी इन ज्वलनशील नारियों
ने डुबाया था नाम देश का
आना पड़ा था इक
राजा राममोहन रॉय को,
जब भी कोई भद्र
मरणासन्न बूढ़ा खोलता था
करवा कन्यादान
किन्हीं नन्हीं बालाओं के
माता पिता के स्वर्गद्वार
तब उसके मरने पर
बैठ जातीं थीं चिता पर
ये नन्हीं बालाएँ
प्यार में उस वृद्ध के।
आज जब हम
दौड़ में बहुत आगे हैं
हमने आइ टी में रचा है
इक नया इतिहास
तब भी क्या करें
ये ज्वलनशील नारियाँ हमारी
कभी भी
इक माचिस की तीली की
छुअन से जल जाती हैं,
हम नहीं चाहते परन्तु ये
न जाने क्यों भस्म हो
जल मर जाती हैं?
हम भी तो हैं फूँकते
न जाने कितने अरब
सिगरेट और बीड़ियाँ
क्या जली है मूँछ भी
कभी गलती से हमारी आज तक?
फिर न जाने क्या गलत है
डी एन ए में
भारतीय ही नारी के
क्यों ज्वलनशील है वह
हम नहीं हैं जानते।
घुघूती बासूती

यह कविता बालकिशन जी की कविता 'मुझे मत जलाओ' को पढ़कर लिखी गई है।

Thursday, July 10, 2008

और अब मिला है एक अच्छा समाचार !

भारतीय समाज में स्त्रियों की घटती हुई संख्या कुछ वर्षों से न केवल स्त्रियों या स्त्रियों को सामाजिक न्याय दिलवाने में रुचि रखने वालों को ही, अपितु सारे समाज को परेशान किए हुई थी। पक्के पुरुषवादियों को भी यह चिन्ता खाए जा रही थी कि उनके बेटों का विवाह कैसे होगा। ऐसे समय में कोई भी समाचार जो यह बताए कि स्त्री पुरुष अनुपात थोड़ा भी बेहतर हुआ है एक आशा की किरण जगाता है।

आज के टाइम्स औफ इन्डिया द्वारा जारी किए गए इस समाचार के मुताबिक गुजरात में ० से ६ वर्ष तक की आयु में यह अनुपात २००५ में ८४६ था जो २००७ में बढ़कर ८८२ हो गया है। अभी भी स्थिति चिन्ताजनक बनी हुई है परन्तु कुछ सकारात्मक बदलाव दिख रहे हैं। सन् २००१ में यह अनुपात ८८३ था। यह अनुपात उसके बाद गिरता ही गया और लगता था कि स्त्री एक विलुप्त प्राणी बन जाएगी।

समाज के कई वर्गों ने इस स्थिति की गंभीरता को समझा व पुत्रियों को जन्म से पहले ही मारने के इस चलन के विरुद्ध अभियान चलाए। गुजरात में टाइम्स औफ इन्डिया ने 'जागो गुजरात' के अन्तर्गत 'सेव द गर्ल चाइल्ड' अभियान चलाया। बेटियों पर अभिमान करने वाले माता पिता से नित नए साक्षात्कार दिखाए जाते। अपनी बेटियों पर गर्व कर उन्हें कुछ बनाने वाले माता पिता को विशेष टी शर्ट्स, जिनपर 'सेव द गर्ल चाइल्ड'लिखा होता दिए जाते। 'बेटी बचाओ' आन्दोलन में सरकार व बहुत सी सामाजिक संस्थाओं की भागीदारी रही। कई जातियों व समुदायों ने अपनी अपनी जाति या समुदाय में इसे रोकने का बीड़ा उठाया। हाल में ही (शायद) पटेल लोगों ने निर्णय लिया कि जिस भी परिवार में दो से अधिक पुत्रियाँ होंगी तो तीसरी और उसके बाद की पुत्रियों की पढ़ाई लिखाई व विवाह का खर्चा समाज उठाएगा।

कई लोग पूछेंगे कि तीसरी बेटी या उससे बाद की का ही खर्चा क्यों उठाया जाएगा, सबका क्यों नहीं ? सोचने की बात यह है कि अधिकतर लोग दो बेटियाँ पैदा हो जाने पर ही भ्रूण परीक्षण कर स्त्री भ्रूण की हत्या करते हैं। सो इसको रोकने के लिए ही यह कदम उठाया गया होगा। कुछ सीमा तक परिवार नियोजन, जो भारत जैसी बड़ी जनसंख्या वाले देश के लिए, अपने आपमें एक बहुत आवश्यक व उपयोगी समाधान है, वह भी स्त्री की घटती जनसंख्या का एक कारण बन गया है। परिवार नियोजन के चलन में आने से पहले किसी परिवार में दो लड़के तीन लड़कियाँ होती थीं तो किसी में तीन लड़के और दो लड़कियाँ, कहीं पाँच छः लड़के और फिर एक लड़की तो कहीं पाँच छः लड़कियाँ और फिर एक लड़का। इस तरह से जनसंख्या तो चाहे बेहिसाब बढ़ रही थी परन्तु लड़के लड़कियों का जन्म के समय अनुपात बराबर सा ही रहता था। जन्म के बाद लड़कों के स्वास्थ्य, खानपान पर अधिक ध्यान दिया जाता था और उनकी छोटी सी बीमारी पर भी चिकित्सा करवाई जाती थी, जबकि लड़कियों के स्वास्थ्य, खानपान पर ध्यान कम दिया जाता था और उनकी चिकित्सा भी कम ही करवाई जाती थी अतः वयस्क होते होते यह अनुपात थोड़ा गड़बड़ा जाता था। स्थिति तब भी आज जैसी सोचनीय नहीं थी। परन्तु आज जब सबको एक या दो ही बच्चे चाहिए तो उन्हें एक पुत्र तो चाहिए ही। पहले जहाँ इस पुत्र लालसा में बच्चियों का जन्म होना सामान्य बात थी वहीं आज उन्हें जन्म ही नहीं दिया जा रहा है।

देखा जाए तो जो स्थिति आज है वह आने वाले समय का ट्रेलर भर भी नहीं है। जब ९० के दशक व उससे बाद में पैदा हुए बच्चे विवाह लायक होंगे तब समस्या बहुत विकराल रूप में सामने आएगी। आज भी हरियाणा, पंजाब व गुजरात में बहुत से लड़कों की शादी के लिए लड़कियाँ नहीं मिल रही हैं। बहुत से लोग आदिवासी या गरीब राज्यों से लड़कियाँ खरीदकर अपने बेटों का विवाह करवा रहे हैं। बहुपति प्रथा फिर से चलन में आ रही है। तो दस वर्ष बाद समस्या कितनी गंभीर हो जाएगी आप सोच सकते हैं। ऐसा न हो कि बेटों के माता पिता उन्हें कहेंगे कि 'पढ़ ले नहीं तो दुल्हन नहीं मिलेगी'। समस्या इतना विकराल रूप ले ले उससे पहले ही हमारे समाज को संभलना होगा। हम प्रत्येक वस्तु, सुख ,सुविधा के लिए सरकार का मुँह जोहते रहते हैं, परन्तु कोई भी सरकार पुरुषों को पत्नी नहीं दिलवा सकेगी।

स्त्रियाँ भी यह नहीं सोच सकतीं कि पुरुष प्रधान समाज ने जो किया उसकी सजा उस समाज के पुरुष भुगतें तो क्या बुराई है। क्योंकि जब यह अनुपात बिगड़ेगा तो स्त्रियों के प्रति अपराध और अधिक बढ़ेगा। स्त्रियाँ घर और बाहर आज से भी अधिक असुरक्षित हो जाएँगी। जो परिवारजन और अपराधी आज उनको खरीदने व बेचने से परहेज नहीं करते वे ऐसी स्थिति में कितने सक्रिय हो जाएँगे, यह अनुमान लगाना भी बहुत भयावह है।

दहेज विरोधी, घरेलू हिंसा विरोधी कानूनों से समाज में स्त्रियों की स्थिति में सुधार आया है। समय के साथ साथ समाज का स्त्रियों के प्रति दृष्टिकोण भी बदला है। अभी कल के ही समाचार पत्र में समाचार था कि अब बहुत से परिवार अपनी विधवा बेटियों ही क्या विधवा बहुओं के विवाह के लिए भी कदम उठा रहे हैं। शायद जैसा बदलाव हम गुजरात में देख रहे हैं वैसा ही बदलाव सारे भारत में आ जाए और किसी भी भ्रूण की हत्या इसलिए न हो कि वह स्त्री भ्रूण है। बहुत कुछ बदला है, बहुत कुछ सकारात्मक हो रहा है, परन्तु उससे भी बहुत अधिक करने की आवश्यकता है।

घुघूती बासूती

Tuesday, February 05, 2008

नोटपैड बहना ,क्यों डराती हो इतना ?

 

 

नोटपैड बहना ,
क्यों डराती हो इतना ?
चलो मिल बनाए गुझिया,
जिसे देख सीखे अपनी गुड़िया,
चलो लगाएँ उसे भी रसोई में
क्या धरा है उसकी पढ़ाई में ?
पढ़ना ही है तो कितना है पढ़ने को-
पढ़ो ‘गृहशोभा’, ‘गृहलक्ष्मी’, ‘मेरी सहेली’ ,
संपादिका हैं जिनकी कोई फिल्म स्टार
ये सिखाती हैं तरीके पति को रिझाने के,
बैंगन का नये तरीके का भर्ता बनाने के
मुन्ने को मालिश कर सुलाने के, ( मुन्नी को नहीं )
तरीके है पार्टी में मेकअप लगाने के,
बच्चों को बहलाने के,
रूठे पति को मनाने के,
छोड़ो ये पाब्लो- फाब्लो को ,
चलो पड़ोस हल्दी- कुमकुम को,
पर ना लाना विधवा सखी को
कर देगी वह अशुभ ,शुभ को ।
चलो मेरी बहना
काम है कितना !

- घुघूती बासूती

Tuesday, January 15, 2008

क्या अब भी उस लड़की को छलांग ना लगाने की सलाह दोगे ?

नववर्ष को मुम्बई में हुई घटना के बाद भी क्या आप यही सोचते हैं कि एक अकेली लड़की यार्ड को जाती ट्रेन में सुरक्षित है ? २५ जून २००७ को मैंने एक पोस्ट लिखी थी, जिसमें इस लड़की को जीवन में पहली बार लगे भय की बात की थी ।

वह निर्भय थी । भय क्या होता है, उसने कभी नहीं जाना था । ना उसे अन्धेरे से भय लगता था, ना साँप या बिच्छू से । छात्रावास में जब साँप या बिच्छू निकलता तो वही उन्हें मारती या भगाती थी । ना उसे भूत प्रेत का भय था ना अकेले रहने से । बिल्कुल नए शहर में भी वह नए मकान में रात को अकेले रह जाती थी । सभी उसके साहस की दाद देते थे । उसकी बड़ी बहन तो यहाँ तक कहती थी कि काश मुझे थोड़ा कम डर लगता और इसे थोड़ा सा डर तो होता । जिस लड़की ने सदा अपने निर्णय स्वयं लिए , जिसे ना परिणामों का डर था ना कठिन रास्ते का । जिसने जो उसे सही लगा सदा वही किया, वह आज कैसे डर गई ?
यह उसके भय के उद्गार हैं .....

भय
मैंने ना जाना था भय कभी
निर्भय ही जीना जाना था
ना डरी अन्धेरी रात से कभी
ना बिच्छू से या साँपों से
भय ना लगा कभी अकेले
ना भूतों ना दैत्यों का ।
सदा अकेली चलने वाली मैं
कैसे उस दिन यूँ घब
नए शहर में निकल पड़ी
पहले दिन ना घबड़ाई
लोकल ट्रेन पकड़ अकेले
करती थी मैं आवाजाही ।
उस दिन कुछ नया नहीं था
जा बैठी मैं लोकल ट्रेन में
कोई नहीं था उस डब्बे में
सो थोड़ा सा चौंक गई मैं
जबतक कुछ सोचूँ उतरो
उतरो सबने चिल्लाया ।
यार्ड जा रही ट्रेन वह
चलने लग गई वह
पल भर सोचा मैंने
यदि कूदी तो मरूँगी
या फिर चोट खाऊँगी
फिर भी मैं कूदी उससे ।
क्यों कूदी मैं उससे ?
क्या जान नहीं थी प्यारी
इक क्षण में समझी मैं
क्यों जौहर करती थीं क्षत्राणी
उस इक क्षण में समझी मैं
क्या अर्थ है स्त्री होने का
क्या भय होता है बलात्कार का ।
कैसे मुझे स्वीकार था मरना
कैसे मुझे भय लगा यार्ड का
जहाँ हो सकते थे पुरुष बस
नोच खा सकते थे मुझे जो
इक क्षण में मेरे मन ने
मरने से ना डर दिखलाया ।

हुआ यूँ कि वह मुम्बई शहर में नई नई गई थी । वहाँ गई भी अकेली थी । बिना किसी की सहायता के वह रोज लोकल ट्रेन से सफर कर रही थी । वह दिन भी और दिनों सा था । कुछ नया या अलग नहीं था । स्टेशन पर ट्रेन आई व वह उसमें चढ़ गई । उसे अजीब या कुछ गलत तब लगा जब कोई और उस डिब्बे में नहीं चढ़ा । तभी कुछ लोग चिल्लाने लगे कि उतरो उतरो, यह ट्रेन तो यार्ड में जा रही है । इतने में ट्रेन चल पड़ी । उसके पास बस एक क्षण था निर्णय लेने का । या छलांग लगाए या यार्ड पहुँच जाए । उस एक क्षण में उसे लगा यार्ड जाना याने शायद वहाँ अकेली स्त्री होना व शायद बलात्कार की संभावना और छलांग लगाना याने मरना या घायल होना । बस चलती ट्रेन से उसने छलांग लगा दी । भाग्य से जान बच गई बस कुछ चोटें ही आईं पर सबसे बड़ी चोट उसके अहम् व उसकी निर्भयता को लगी ।
रात को जब उसने घर फोन किया तो वह पिता को पूरी बात बताती रही तथा चेन खींचने का खयाल न आने के कारण स्वयं पर हँसती रही । पिता भी तसल्ली देते रहे और मजाक करते रहे कि अभी तो जेब कटने, मोबाइल चोरी होने का अनुभव बाँकी है । जब तक यह सब ना हो तो मुम्बई का अनुभव अधूरा है । फिर उसने माँ से बात की । माँ उसके दर्द को अनुभव कर रही थी । पर उसका दर्द चोट का नहीं था । वह रो रही थी और कह रही थी, "माँ आज मैंने जाना कि स्त्री होने की क्या हानि है । मैंने कभी भी स्वयं को कमजोर नहीं समझा था । मुझे कभी भी भय नहीं लगा था । इस भय को मैंने पहली बार जाना । क्या यह भय स्त्री में नैसर्गिक होता है ? माँ , उस एक पल में मैं कल्पना कर सकी कि केवल पुरुषों की उपस्थिति में उस यार्ड में मेरे साथ क्या हो सकता था । और वह कल्पना इतनी भयानक थी कि मैंने चलती गाड़ी से छलांग लगा मरना या घायल होना बेहतर समझा । माँ यह नग्न भय था । भय अपने सबसे खूँखार रूप में । इस भय में कोई मिलावट या सोचने जैसा कुछ नहीं था । माँ मैं ऐसे भय के जीवन से घृणा करती हूँ । माँ यह उचित नहीं है, यह न्याय नहीं है । मुझे भय केवल इसलिए लगा कि मैं स्त्री हूँ । यदि पुरुष होती तो न डरती । माँ मैं इस संवेदना से घृणा करती हूँ । मैं ऐसा जीवन नहीं जीना चाहती जिसमें भय हो । ओह माँ, मैं उस संवेदना के बारे में सोच कर ही सिहर जाती हूँ । माँ, मुझे स्त्री क्यों बनाया तुमने ? यदि पुरुष मुझमें ऐसी भावना जगा सकते हैं तो मुझे पुरुष पसन्द नहीं । मैं कभी किसी पुरुष को जन्म नहीं दूँगी । हम ही उन्हें जन्म दें और फिर उन्हीं से डरें । जिसे तुमने जन्म दिया उससे तुम कैसे डर सकती हो ? क्या तुमने कभी इस डर का अनुभव किया ? यदि किया था तो मुझे भी इसे झेलने को जन्म क्यों दिया तुमने ? बचपन में जब क्षत्राणियों द्वारा जौहर को उनकी वीरता, उनकी महानता के रूप में पढ़ती थी तो बहुत आश्चर्य होता था कि यह क्या तुक हुई । पर माँ आज मैं उनके जौहर को समझ सकती हूँ । बलात्कार या मृत्यु की संभावना में से मैंने भी मृत्यु की संभावना को चुना । क्यों माँ, यह गलत है । मैंने तो पढ़ा था कि जीने की चाह ही स्वाभाविक है । तो फिर स्त्री के लिए यह अलग कैसे हो गया ? क्यों जीने की स्वाभाविक चाह मृत्यु से हार गई ?"माँ क्या उत्तर देती ? है किसी के पास इसका उत्तर ?घुघूती बासूती
उस समय १३ टिप्पणियाँ आईं थी । मैं आपसे अनुरोध करती हूँ कि जो बहस या चर्चा का विषय रहा उसके आधार पर लोग अपनी राय दें । मैं बहुत आभारी होउँगी ।
13 टिप्पणियाँ:
Udan Tashtari ने कहा…
मुझे लगा यह अति है. हरदम तो ऐसा नहीं होता. एक खराब मछली हजार मछलियों को बदनाम करती है. मुझे लगता है कि और अधिक आत्म विश्वास की आवश्यक्ता है, बस. कौन ज्यादा ताकतवर. आप निरीह हो जायें तो सब लूटेंगे वरना किसकी मजाल. बस यही सोच जगाना होगी...किस बात का भय और कैसी भावना!!! निरीह बने पुरुष को पुरुष ही रौंद जाता है...ऐसा न सोंचे. वैसे बहुत दिन बाद दिखीं, क्या बात है?
Gyandutt Pandey ने कहा…
यह भय तो वैसा ही है कि कल मुझे कोई भ्रष्ट कहे - या प्रमाणित कर दे तो मैं जीने की बजाय मरना पसन्द करूं. हर व्यक्ति - नर या नारी अपने लिये जो सीमा बनाता है तो अपने को भय के अधीन करता है. भय से मुक्ति, सोच में निहित है - सामाजिक मान्यताओं में नहीं. मैं सदा विक्तोर फ्रेंकल को याद करता हूं जो नात्सी उत्पीड़न केंद्रों में भी मात्र अपनी सोच के साथ भय मुक्त रहे - अपने उत्पीड़कों से भी अधिक मुक्त!
काकेश ने कहा
आपकी बात में सच्चाई तो है पर यह भय तो मानसिक है वास्तविक नहीं, ये भय स्त्री को हो सकता है तो पुरुष को भी हो सकता है..कि क्या होगा उसका अकेले वो जायेगा तो..इतने अनजाने लोगों के बीच.मन को यदि थोड़ा सा मजबूत कर लें तो सारे भय स्वत: मिट जाते हैं.इसके लिये हमें अपनी नयी पीढ़ी को ऎसी सकारात्मक शिक्षा देने की जरूरत है जिससे वह इन भयों से मुक्ति पा सके.
masijeevi < ने कहा…
भय सिर्फ एक निर्मिति है, हम और हमारा वातावरण इसे चारों और गढ़ते हैं- ये हमारे अंधेरे गुहों ये निकलकर जब तब झपट लेता है हमें, ताक में हमेशा ही होता है- वह डरी क्‍योंकि मिथ्‍या ही वह मानती आयी थी कि अपने भयों की वह अकेली नियंता है, सिर्फ वह अपने भय निर्मित करेगी- उका भय वाकी भी निर्मित करते हैं। और जिसे जन्‍म देती है उससे नहीं डरती, उनके अलावा से ही डरती है हर दोपाया लिंगधारी पुत्र नहीं हो सकता जेसे कि हर दोपाया लिंगधारी बलात्‍कारी नहीं होता।
masijeevi ने कहा…
और हॉं मुझे न जाने क्‍यों 'आशंका' हो रही है, (अभी पूरा विश्‍वास तो नहीं) कि ऊपर समीरजी ने आज यह टिप्‍पणी पोस्‍ट पढ़कर की है।
अभय तिवारी ने कहा…
बहुत ही अच्छा लिखा.. साहस और संवेदना का अद्भुत मिश्रण है आपमें.. साहस सिर्फ़ अँधेरे अकेले कमरे में सो जाने का ही नहीं.. ऐसे विषयों पर कलम चलाने का.. और अपनी निर्भय छवि को तोड़ सकने का भी..
अतुल शर्मा ने कहा…
यह भय एक सत्य है और इससे मुँह नहीं मोड़ा जा सकता। बातों की लीपा पोती से इस पर पर्दा नहीं डाला जा सकता। यहाँ भी कोई इस बात को नहीं स्वीकार नहीं कर रहा कि एक लड़की को रात को किसी निर्जन स्थान पर जाने में क्यों भय है। सब एक जैसे नहीं होते परंतु जो मिलेंगे वो कैसे होंगे, किसे पता। पहली बार जिस भय का अनुभव किया तो ऐसे विचार बन जाना स्वाभाविक है। ये अतिशयोक्ति लगे तो उन बालक बालिकाओं के बारे क्या जो बचपन में ही वीरान यार्ड में अंजान से नहीं बल्कि घर में, पास-पड़ौस में अपनों से इस भय को पा लेते हैं।उत्तर तो शायद ही कोई दे पाए।
sunita (shanoo) ने कहा…
घुघूती जी मैने कई बार इस बारे में सोचा मगर हर बार खुद को अकेले पाया...एसा नही की औरत में आत्मबल नही है या उसमे साहस नही है...सब कुछ है औरत मे पुरूष की अपेक्षा आत्मबल और साहस दोनो ज्यादा है मगर इश्वर की और से उसे एक नाजुक मन और नाजुक शरीर दिया गया है मै मानती हूँ की समीर भाई ने जो लिखा वह ठीक है मगर ऐक औरत अपना बचाव कैसे कर पायेगी जब चार या पाँच बलात्कारियों के बीच फ़ंस जायेगी?हाँ ये बात भी सत्य है की उस वक्त एक प्रतिशत वह अपने चातुर्य से बेवाकूफ़ बना पाये मगर इंसान और वहशी दरिंदे में फ़र्क होता है...औरत को पुरूष से डर नही डर है तो उनसे जो अपना पुरूषत्व खो बैठे है...जब रक्षक ही भक्षक बन जाये तो क्या किया जाये... जैसे एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है वैसे ही आजकल दिन रात होने वाली वारदातों ने डर पैदा कर दिया है...मगर फ़िर भी मेरे खयाल से एक माँ अपनी बेटी को यही कहेगी की तुम डरो मत,तुम्हारा साहस तुम्हारा आत्मबल ही सबसे बढ़ा साथी है उस वक्त जब तुम अकेली हो या घबरा रही हो...सुनीता(शानू)
अफलातून ने कहा…
समाज का आधे से अधिक हिस्सा एक लड़की के भय को समझने की संवेदना भी नहीं रखता !
Sanjeet Tripathi ने कहा…
क्या कहूं इस बात पर!!जिस परिस्थिति की बात आप कर रही है उस परिस्थिति में पहुंचकर हर नारी डर ही जाती है!!नारी एकबारगी चोर-उचक्को से नहीं डरेगी पर ऐसे हालत में डरती ही है……अफ़लातून जी की बातों में सच्चाई नज़र आती है मुझे!!
Divine India ने कहा…
वैसे मुम्बई में स्त्रियाँ रात के 1:30 बजे भी सफर करती है… हाँ भय का कोई कारण नहीं होता और स्थान-2 का फर्क भी होता है किंतु जब हम आत्मबल को छोड़ दे तो और हम पर हावी होने में समय नहीं लगायेंगे।
Vijendra S. Vij ने कहा…
सभी के अपने अपने द्रष्टिकोण है "मुझे भय केवल इसलिए लगा कि मैं स्त्री हूँ । यदि पुरुष होती तो न डरती । " यह दावा पुख्ता नही लगा. ..समीर जी की बात "निरीह बने पुरुष को पुरुष ही रौंद जाता है..." काफी असरदार सच्चाई है...लेख बढिया लगा..शब्द सच कह रहे है..
swapandarshi ने कहा…
Sabhi ke views ki kadra karate huye likhti hoo ki, aapke savaal ka ek matra jabab hai ki sabhi civilized or humane log ek behtar samaj banane mei sakriya bhaagidaari nibhaye. Rape ka dar sirf kisi ek jagah par kendrit nahi hai. Jitana unsafe railway ka khali yard hota hai, utana koi surkshit ghar bhi, school bhi?Ham apani bhumika as a individual bhi nibha sakate hai or kisi samajik process ka part bankar bhi.Sunsaan sadak mei nikalate samay dar lagta hai, par jaise hi koi doosari women nazar aati hai safety ka ahsas hota hai. Adhik se adhik aurate agar ghar se bahar nikle, din me, raat mei, safe, unsafe sabhi jagah par to aadhi se adhik problem solve ho sakti hai.Women have to reclaim common place for them and for safer society.Baki marna/suicide kisi baat ka hal nahi hai. Agar koi rape ka shikar hota bhi hai, to himmat rakhe/himmat de, or justice ke liye fight kare, as a individual or as a society. Ham jungle mei nahi rahate. Priyadarshini Matto ke Father or friends ne ye karke dikhaya hai.Doosara, apane bacho ko bhai bahano ko, sabhi ko safety se avagat karaye, apani safety ke protocol banane padte hai. or self-confidence ko bhi reality ke dharatal par rakh kar hi dekhana chiye.By the way mene is tarah ki galati ki hai, or mei is tarah ke yard se sahi salamat bahar nikal kar aayi hoo.Ye achcha hai ki aapne Daar ki problem ko is bahas mei shamil kiya hai.
घुघूती बासूती

Friday, January 04, 2008

खुल्लमखुल्ला मोलेस्ट करेंगे हम इनको

स्त्री व हमारा समाज 3

मैंने बहुत पहले दो चिट्ठे स्त्रियों व हमारे समाज में उनके स्थान व उनकी समस्याओं आदि पर लिखे थे । मैं यह श्रृंखला चालू रखना चाहती थी परन्तु आलस्य जैसे किन्हीं कारणों से चालू नहीं रख पाई । कल जबसे मैंने मुम्बई वाली घटना के बारे में सुना है तब से उबल रही हूँ । किन्तु मैं जानती हूँ उबाल की स्थिति में कुछ लिखने पर बाद में पछताना भी पड़ सकता है अत: कल अपने लेखन को मैंने केवल टिप्पणियों तक सीमित रखा ।

खुल्लमखुल्ला मोलेस्ट करेंगे हम इनको
इस धरती पर नहीं जीने देंगे हम इनको
जमकर बेइज्जत रोज करेंगे हम इनको
जन्मने से पहले मार डालेंगे हम इनको
चैन से ना जीने देंगे कहीं भी हम इनको
जीवित जला डालेंगे जब चाहे हम इनको ।

भारत के एक बहुत बड़े पुरुष वर्ग का स्त्रियों के प्रति यह नारा बन गया है ।
मुझे लगता है कि हमारे समाज में स्त्रियों का अस्तित्व, उनकी अस्मिता, उनका जीने का अधिकार ही संकट में पड़ गया है । उनपर अत्याचार भ्रूण की अवस्था से लेकर मरने तक होता है । इस विषय पर पूरी चर्चा होनी चाहिये परन्तु आज का लेख मुम्बई की घटना से ही सम्बंधित रखने का यत्न करूँगी ।

भारत में जो हो रहा है वह अधिक निन्दनीय इसलिये भी है क्योंकि जो अपराध अन्य देशों में पुरुष अकेले में सबसे छिपकर करते हैं, वे अपराध भारत में ये संयुक्त रूप से एक भीड़, समूह या समाज का हिस्सा बनकर खुल्लमखुल्ला करते हैं । माना अपराध तो अपराध ही रहेगा चाहे वह एकान्त में हो या भीड़ में ! परन्तु जब वह अपराध खुल्लमखुल्ला होता है तो वह चोरी से डाके समान बन जाता है । चोरी से बचने के रास्ते निकाले जा सकते हैं परन्तु डाके से नहीं । चोर से मनुष्य इतना भयभीत नहीं रहता जितना डाके से । फिर जब वही अपराध सार्वजनिक स्थान पर एक समूह के रूप में किया जाता है तो पीड़ित व्यक्ति जान जाता है कि उसे समाज में से कोई भी बचाने नहीं आएगा, कि वह निरीह और अकेला है । उसे अपनी निरीहता पर या तो क्रोध आएगा और वह कोई फूलन देवी बन जाएगा या वह अवसाद में घिर जाएगा, या हीन भावना का शिकार हो जाएगा, या फिर स्वयं कठोर व निर्मम हो जाएगा और जिसपर
भी वश चले उसपर अन्याय करेगा ।
मुम्बई की घटना में सामूहिक शारीरिक शोषण, मानसिक व भावनात्मक शोषण हुआ । उन स्त्रियों व उनके साथ के पुरुषों के आत्म सम्मान को जबर्दस्त चोट पहुँचाई गई । कोई आश्चर्य ना होगा जब ऐसे भुक्त भोगी कन्या भ्रूण को जीना ना देना चाहें । मुझे तो तब भी आश्चर्य नहीं होगा जब वे स्त्रियाँ पुत्रों को भी जन्म देना ना चाहें । इतनी कम उम्र में संसार का इतना विकृत चेहरा देखना और उससे ऊपर उबरना कोई सरल काम न होगा ।

कुछ मित्रों व सखियों ने इन स्त्रियों के वस्त्रों पर आपत्ति उठाते हुए उन्हें अधनंगी होने के कारण अपने पर यह मुसीबत स्वयं बुलाने का जिम्मेदार ठहराया है । कुछ ने रात के उस समय घर या होटल से बाहर निकलने को गलत बताया है । कुछ ने आधुनिक, पाश्चात्य सभ्यता को इसका कारण माना है । ये सब मिथक हैं व इन्हें हम केवल अपने आप, अपने समाज, अपने देश, प्रदेश को निर्दोष ही नहीं निष्पाप साबित करने के लिए उपयोग करते हैं ।

जहाँ तक अनुचित वस्त्रों की बात है तो हमारी साड़ियाँ व छोटे से ब्लाउज भी इस लिहाज से कोई बहुत सही नहीं हैं । यदि वस्त्रों के कारण ऐसा होता तो शकुन्तला व उसकी सखियों को तो जब तब ऐसी घटनाओं से गुजरना पड़ता । क्या आज तक किसी साड़ी, सलवार कमीज या बुर्के वाली का बलात्कार नहीं हुआ ? गाँवों में जिन स्त्रियों को डाकिन, चुड़ेल, डायन आदि कहकर सारे गाँव में पीटते हुए नंगा घुमाया जाता है, जिनका सिर मुँडवा दिया जाता है, क्या वे पाश्चात्य कपड़े पहनती हैं । भारत के विभाजन के समय व अलग अलग दंगों में जिन स्त्रियों के साथ बलात्कार हुआ क्या वे अधनंगी घूम रही थीं ?

जहाँ तक समय की बात है तो बहुत से भारतीय त्यौहार, आदिवासी नृत्य आदि भी रात के समय ही मनाए जाते हैं । क्या किसी ने दिन में होते गर्बे की बात सुनी है ? तो क्या इन सब में भाग लेती स्त्रियों के साथ भी यही सब किया जाएगा ?

जो हर बुरी बात में पाश्चात्य सभ्यता का रोना लेकर बैठ जाते हैं उनसे अनुरोध है कि वे वहीं रुक जाएँ जहाँ वे विदेशियों के आगमन से पहले थे । ना पाश्चात्य दवाई खाएँ, ना पाश्चात्य वाहनों, जैसे बसों, कारों आदि में बैठें ।

क्या यह सब करने से क्या हमारा समाज आदर्श समाज बन जाएगा ? क्या भारतीय सभ्यता हर बुराई के लिए रामबाण है ? यह वही सभ्यता है जिसमें एक अन्य सभ्यता वाली स्त्री, शूर्पनखा के राम व लक्ष्मण से बारी बारी अपने से विवाह करने के प्रस्ताव भर से उसकी नाक काट दी गई थी । यहाँ दिन रात लड़के / पुरुष लड़कियों / स्त्रियों के सामने ना केवल विवाह जैसे आदरपूर्ण प्रस्ताव अपितु आती क्या खंडाला या फिर कई अन्य धृष्टतापूर्ण प्रस्ताव आए दिन रखते रहते हैं । क्या उन सबकी नाक काट दी जाती है या काट दी जानी चाहिये ? नहीं, आदर्श नारी को तो ऐसे प्रस्ताव पर शरमाकर वहाँ से भाग जाना चाहिये । फिर राम लक्ष्मण ने भी ऐसा ही क्यों नहीं किया ? क्यों ये दोहरे मापदंड बनाए गए हैं ? उस पर तुर्रा यह कि हमारा समाज विश्व में सबसे अच्छा , सबसे अधिक नैतिक , सबसे पुरातन और न जाने क्या क्या है । होगा , अवश्य होगा । परन्तु ऐसी भुक्त भोगी स्त्रियाँ भी क्या यह बात मानेंगी ? जब भी स्त्रियों के बराबरी के मुद्दे उठते हैं तो तोते की तरह आप लाख उन्हें बताएँ कि यह वह देश व संस्कृति है जहाँ "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता:" को मूल मंत्र मानकर चला जाता है, परन्तु क्या कोई इस बात को मानेगा ? शायद मानेगा, परन्तु मानेगी कोई भी नहीं !

सच तो यह है कि हमसे बड़े पाखंडी संसार में कहीं नहीं पाए जाते । स्त्रियों को पूजते हैं और फिर जब मन में आए उसे मूर्ति की तरह तोड़ देते हैं फिर खंडित मूर्ति की तरह उसे फेंक देते हैं । यह वह देश है जहाँ शायद हम अपने बेटों को सिखाते हैं कि नारी केवल एक माँस का टुकड़ा है, एक गुड़िया है, उससे खेलो, उसे नोचो या मुँह में ही डाल लो । या फिर जब मन चाहे उसे जला डालो । ऐसे ही पुरुष हमारे आज और कल हैं, हमारे भाग्य विधाता हैं । शायद हमारे नेता भी हों या बन जाएँ ।
वाह ! "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता:" क्या पूजा की हमने इन मेहमान स्त्रियों की !


इस विषय पर पुरानी पोस्ट्स....
१ ऐसा क्यों होता है http://ghughutibasuti.blogspot.com/2007/09/blog-post_06.html
२ स्त्रियों के मुद्दे पर .. कुछ प्रश्न कुछ उत्तर http://ghughutibasuti.blogspot.com/2007/09/blog-post_07.html


हर समाज की तरह हमारे समाज में भी गुण व अवगुण थे व हैं । समझदारी इसमें है कि गुणों को संभाल कर रखा जाए व अवगुणों को त्याग दिया जाए । यदि किसी और समाज से कुछ गुण मिलते हैं तो उन्हें ग्रहण किया जाए । और जो भी करें या ना करें किसी अन्य के जीवन के साथ खिलवाड़ को किसी भी मूल्य पर बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिये ।
http://१ ऐसा क्यों होता है http://ghughutibasuti.blogspot.com/2007/09/blog-post_06.html

http://२ स्त्रियों के मुद्दे पर .. कुछ प्रश्न कुछ उत्तर http://ghughutibasuti.blogspot.com/2007/09/blog-post_07.html


घुघूती बासूती

Tuesday, September 11, 2007

थक गयी है सीता

 

 

थक गई हूँ
थक गई हूँ सीता बन अग्नि परीक्षा देते देते
थक गई हूँ मैं सती सावित्री बन जीते जीते ।
कितना भागी यम के पीछे
सत्यवान को छुड़ाने के लिए

कितना गिड़गिड़ाई सत्यवान
को वापिस लाने के लिए ।
थक गई हूँ कर हर पल राम का अनुसरण
कुछ पल डगर मुझे अपनी चुनने दीजिये ।
कितना तड़पी इक युग भर
शापित अहिल्या शिला बनकर

कितनी प्रतीक्षा की राम की
पत्थर बनी उसकी डगर पर ।
थक गई हूँ शापित शकुन्तला बनकर
अब कुछ पल श्राप मुझे देने दीजिये ।
थक गई हूँ मन्दिरों में मूर्ति बन

कुछ पल पूजा तुम मेरी छोड़िये
थक गई हूँ रिश्तों के बोझ ढोकर
कुछ पल बेलगाम मुझे छोड़िये ।
थक गई हूँ पूज्या बनकर जीते जीते
अब केवल व्यक्ति मुझे बनने दीजिये ।

माँ, बहन, बेटी ,पत्नी ,सखी और प्रेयसी
कितने रूप में जग में जानी गई हूँ मैं
किन्तु हर रूप में रह गई कुछ प्यास सी
पाया बहुत कुछ पर खो गई खुद ही मैं ।
थक गई हूँ हर समय जीकर

औरों के लिए
अब कुछ पल स्वयं के लिए भी जीने दीजिये ।

- घुघूती बासूती

Friday, September 07, 2007

स्त्रियों के मुद्दे पर : कुछ उत्तर, कुछ और प्रश्न !

 

 [ ललित जी को भी उत्तर दिये जाएँगे धीरे धीरे ! बात निकली है तो दूर तलक जायेगी। 

यह मेरा काफी समय पहले लिखा लेख है । शायद काफी लोगों को स्त्री के स्त्री का शत्रु होने का रहस्य या कहें कारण , यहाँ मिल जाएँगे । ]

       हमने व हमारे समाज ने क्या गलतियाँ की हैं और क्या गलतियाँ अभी भी करे जा रहे हैं इसका कुछ कुछ परिणाम तो हमें वर्तमान में देखने को मिल रहा है, किन्तु भविष्य इन परिणामों को बहुत विकराल रूप में हमारे सामने प्रस्तुत करेगा । जब तक यह परिणाम हमारे इस मूल रूप से अन्धे समाज को भी दिखने लगेगें, तब तक बहुत नहीं तो काफी देर हो चुकी होगी । समस्याएँ बहुत हैं व अधिकतर हमारी अपनी बनाई हुई ही हैं ।

     इस  समय मैं भारतीय समाज में स्त्रियों के स्थान , भ्रान्तियों व उनसे उत्पन्न होने वाली हानियों कि चर्चा कर रही हूँ । आज तक इन सबसे मुख्य व प्रत्यक्ष रूप से केवल स्त्रियों को हानि होती थी । अतः हमारा समाज , जो कि मुख्य रूप से पुरुषों के लिए ही बना है, जहाँ का धर्म, संस्कृति , कायदे कानून, सब कुछ पुरुषों के हितों को ही ध्यान में रखकर बनाए गए हैं , चैन की नींद सो सकता था व अपने घर का कचरा कालीन के नीचे दबा सकता था । यहाँ यह भी कह दूँ कि केवल भारत या एक धर्म या समाज ही नहीं सब धर्म, संस्कृति, कायदे कानून, पुरुष के हितों को देखकर बने हैं । किन्तु आज हानि व हमला पुरुष के हितों , सुख चैन, सुविधाओं पर है । उसका व उसके समाज का अस्तित्व ही खतरे में है । स्त्रियों का तो खतरे में है ही , किन्तु वह बहुत ही सूक्ष्म बात है, पुरुष व पुरुष के अस्तित्व के सामने । सो हो सकता है, पुरुषों के साथ साथ वे अन्धी स्त्रियाँ भी , जो स्त्री के अस्तित्व, उसके आदर व उसके जीवन के महत्व को नहीं मानती, वे भी जाग जाएँ क्योंकि आखिर उनके लाड़ले बेटों का भविष्य दाँव पर लग गया है ।

    हमारा इतिहास गवाह है कि स्त्री पर जब भी , जैसे भी हो सकता था, अत्याचार किया गया । कुछ पुरुषों ने किया, कुछ स्वयं शक्ति चखने के लिए एक स्त्री ने दूसरी पर किया । यह शक्ति परीक्षण वह पुरुष पर तो कर नहीं सकती हैं ,अतः जैसे ही परिवार में उसकी स्थिति कुछ सुदृढ़ होती थी, तो वह परिवार में नई आई सदस्याओं पर कुछ रैगिंग की तर्ज पर यह शक्ति परीक्षण करती हैं । बार बार पुरुष यह कह कर कि स्त्री ही स्त्री की सबसे बड़ी शत्रु है , अपना पल्ला झाड़ लेता है । किन्तु जब आपके बच्चे की रैगिंग में टाँग टूट जाए या जान चली जाए, तो आप महाविद्यालय प्रशासन को यह कह कर कि विद्यार्थी ही विद्यार्थी का सबसे बड़ा शत्रु है बरी तो नहीं कर देते । तो फिर परिवार में हुए अत्याचार से स्वयं को परिवार का मुखिया होने के नाते कैसे बरी कर लेते हो ?

    स्त्री को घर से निकाला गया , जलाया गया, मारा गया, मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया । उसे वश में रखने के लिए कभी उसे कुछ लालच दिया गया तो कभी उससे कुछ सुविधाएँ छीन ली गईं । लालच के रूप में सुन्दर रंग बिरंगे वस्त्र , आभूषण , रंगीन सौभाग्य चिन्ह व सब प्रकार का भोजन ग्रहण करने का अधिकार । दंडित करने व लाइन में रखने के लिए यही सब सुवधाएँ उससे छीन ली जाती थीं । उसे बताया जाता था कि ये सब सुख उसे तभी तक प्राप्य हैं जब तक वह अपने जीवन के आधार, अपने स्वामी, अपने पति को जीवित व प्रसन्न रख पाएगी । ये सब निर्जला व्रत उपवास इसी भय की देन हैं । वह पति व अपनी सुविधाओं व बहुत बार अपने जीने के अधिकार को बचाने के लिए भौतिक रूप से जो बन पड़ता था करती थी । किन्तु अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखने के लिए पति का जीवन कैसे भी बचाना अनिवार्य था । सो भौतिक रूप से सब कुछ करने के बाद वह अन्ध श्रद्धा की शरण लेती थी ।

      विश्वास न हो ऐसी स्थिति की कल्पना करिये जहाँ आपका जीवन एक पतली डोर से लटका हुआ हो, जीवित जलाए जाने की तलवार आपके सिर पर लटक रही हो । उदाहरण के लिए यदि आपका जीवन किसी ऐसी शक्ति के हाथ में हो जो बहुत शक्तिशाली, क्रूर , अविवेकी व तर्कविहीन हो, लकीर की फकीर हो , जिस पर किसी न्याय की गुहार का कोई प्रभाव न पड़ता हो । वह शक्ति या व्यक्ति आप से कहे कि जब तक आप के सिर पर बाल हैं आप जीवित रहेंगे और जिस दिन ये बाल झड़े, आपको जीवित चिता के हवाले कर दिया जाएगा । अब आपके लिए ये बाल प्राणों से भी अधिक प्रिय होंगे । आप एक बार खाना भूल जाएँगे किन्तु बालों की साज संवार , सफाई, व स्वास्थ्य के विषय में कभी नहीं भूलेंगे । वे बाल आपकी जान हैं, धर्म हैं , या ये कहें कि वे ही आपका जीवन हैं । अब आप जब सब तरह से उनकी रक्षा करते नहीं थकते और फिर भी देखते हैं कि समय असमय आपके मित्रों , भाइयों, चाचा , ताऊओं के बाल झड़ ही जाते हैं और ऐसा होने पर उन्हें घसीट कर चिता पर रख दिया जाता है । उनकी चीखें आपके कानों के परदों को फाड़कर आपके अन्तर्मन तक को दहला जाती हैं । सोते जागते, खाते पीते ये चीखें आपका साथ नहीं छोड़ती । तब आप आध्यात्म, अलौकिक , दैवीय, अतिमानवीय शक्तियों का भी सहारा लेने लगते हैं । आपने देखा था कि दो मित्रो के बाल तब झड़ गए जब उन्होंने खाली पेट चाय पी थी या दो और के तब जब उन्होंने अपने बालों से तंग आकर उन्हें गाली दी थी । सो अब आप खाली पेट चाय पीना छोड़ देते हैं, बालों को कभी भूले से भी गाली नहीं देते हैं । यदि कोई सुझा दे कि गले में यह हरे मोती का धागा डाल लो तो बाल अधिक समय तक टिकते हैं, सो आप वह भी कर लेते हैं । यदि कहें कि बुधवार को दाढ़ी न बनाने से बाल सुरक्षित रहते हैं तो क्या आप केवल दाढ़ी बनाने के सुख के लिए जीते जी चिता में डाले जाने का खतरा , भय, आशंका मोल लेंगे ? सो अब आप चाहेंगे कि आशीर्वाद में भी यदि कोई आपको बालवान या बालवता कहे तो बेहतर है क्योंकि आपका चिरंजीवी होना तो उनके होने पर निर्भर है । आप प्राण जाएँ पर बाल न जाएँ में पूर्ण विश्वास करेंगे । सो इसको कहते हैं कंडिशनिंग ! अब न केवल आपके चेतन मन को बालों से मोह है अपितु आपका अवचेतन मन भी बालों के प्रति मोहित है । सो अब समाज कहता है कि बालों को इतना प्रेम करना, उनका ध्यान रखना, उन्हें जान से अधिक चाहना आपका स्वभाव है । यही आपके संस्कार हैं, यही आपका धर्म है, यही आपके देश की संस्कृति है ।      बिल्कुल सही है । जिन बालों के रहते आप पलंग पर सो सकते हैं , भांति भांति के व्यंजन खा सकते हैं, रंग बिरंगे कपड़े पहन सकते हैं , सबसे बड़ी बात कि जी सकते हैं, उन बालों पर आप क्यों न बलिहारी जाएँगे । यह तो है इस जन्म की बात !

घुघूती बासूती

चर्चा चालू है । अभी नया लिखने की स्थिति में नहीं हूँ । शीघ्र ही इस विषय पर और लिखूँगी ।

Thursday, September 06, 2007

ऐसा क्यों होता है ? समाज में स्त्रियों की स्थिति पर कुछ प्रश्न ।

ऐसा क्यों होता है कि स्त्री को जन्म से पहले ही भ्रूण की अवस्था में ही मार दिया जाता है ? ऐसा क्यों होता है कि पुत्र पुत्री से अधिक प्यारा होता है ?
ऐसा क्यों होता है कि यदि साधन सीमित हों तो वे सीमित साधन केवल पुरुष को दिए जाते हैं ?
ऐसा क्यों होता है कि त्याग की अपेक्षा केवल स्त्री से की जाती है ?
ऐसा क्यों होता है कि नालायक बेटे को भी पढ़ने के लिए कहा जाता है और लायक बेटी को घर के काम काज करने को कहा जाता है ?
ऐसा क्यों होता है कि अबला नारी से नौकरी करके आने के बाद घर के सारे काम करने की अपेक्षा की जाती है और सबल पुरुष से गर्मागर्म चाय के बाद आराम की ?
ऐसा क्यों होता है कि स्त्री यदि कहे कि वह कुछ निर्णय पति से पूछ कर लेगी तो सब उसकी वाह वाह करते हैं, यदि पुरुष कहे कि पत्नी से पूछ कर बताएगा तो वह कमजोर या दब्बू माना जाता है ?
ऐसा क्यों होता है कि यदि स्त्री कहे कि उसे घर जाना है पति आ गए होंगे तो कोई उसे उलाहना नहीं देता किन्तु यदि पुरुष यही कहे तो हास्य का पात्र बन जाता है ?
ऐसा क्यों होता है कि पत्नी का कहा जरा भी मानने वाला बीबी का गुलाम कहलाता है किन्तु ऐसी किसी उपाधि से स्त्रियों को सुशोभित नहीं किया जाता ?
ऐसा क्यों होता है कि जन्म स्त्री देती है, बड़ा वह करती है किन्तु बच्चा पिता का ही कहलाता है?
ऐसा क्यों होता है कि अधिकतर झगड़ा पुरुष करते हैं, गाली भी वही देते हैं किन्तु गालियों में नाम स्त्रियों का आता है ?
ऐसा क्यों होता है कि अधिकतर युद्ध पुरुष आरम्भ करते हैं व लड़ते भी वही हैं किन्तु युद्ध की कीमत स्त्रियों को चुकानी पड़ती है ?
ऐसा क्यों होता है कि बलात्कार पुरुष करता है और अनादर स्त्री का होता है, न कि बलात्कारी का?
ऐसा क्यों होता है कि मृत्यु स्त्री लिंग है और जन्म पुल्लिंग ?
ऐसा क्यों होता है कि अग्नि स्त्री लिंग है और जल पुल्लिंग ?
ऐसा क्यों होता है कि भूख स्त्री लिंग है और भोजन पुल्लिंग ?
ऐसा क्यों होता है कि घृणा स्त्री लिंग है और प्रेम, स्नेह पुल्लिंग ?
घुघूती बासूती

Monday, June 25, 2007

भय............है किसी के पास इसका उत्तर ?(एक किस्सा)

वह निर्भय थी । भय क्या होता है, उसने कभी नहीं जाना था । ना उसे अन्धेरे से भय लगता था, ना साँप या बिच्छू से । छात्रावास में जब साँप या बिच्छू निकलता तो वही उन्हें मारती या भगाती थी । ना उसे भूत प्रेत का भय था ना अकेले रहने से । बिल्कुल नए शहर में भी वह नए मकान में रात को अकेले रह जाती थी । सभी उसके साहस की दाद देते थे । उसकी बड़ी बहन तो यहाँ तक कहती थी कि काश मुझे थोड़ा कम डर लगता और इसे थोड़ा सा डर तो होता । जिस लड़की ने सदा अपने निर्णय स्वयं लिए , जिसे ना परिणामों का डर था ना कठिन रास्ते का । जिसने जो उसे सही लगा सदा वही किया, वह आज कैसे डर गई ?
हुआ यूँ कि वह मुम्बई शहर में नई नई गई थी । वहाँ गई भी अकेली थी । बिना किसी की सहायता के वह रोज लोकल ट्रेन से सफर कर रही थी । वह दिन भी और दिनों सा था । कुछ नया या अलग नहीं था । स्टेशन पर ट्रेन आई व वह उसमें चढ़ गई । उसे अजीब या कुछ गलत तब लगा जब कोई और उस डिब्बे में नहीं चढ़ा । तभी कुछ लोग चिल्लाने लगे कि उतरो उतरो, यह ट्रेन तो यार्ड में जा रही है । इतने में ट्रेन चल पड़ी । उसके पास बस एक क्षण था निर्णय लेने का । या छलांग लगाए या यार्ड पहुँच जाए । उस एक क्षण में उसे लगा यार्ड जाना याने शायद वहाँ अकेली स्त्री होना व शायद बलात्कार की संभावना और छलांग लगाना याने मरना या घायल होना । बस चलती ट्रेन से उसने छलांग लगा दी । भाग्य से जान बच गई बस कुछ चोटें ही आईं पर सबसे बड़ी चोट उसके अहम् व उसकी निर्भयता को लगी ।
रात को जब उसने घर फोन किया तो वह पिता को पूरी बात बताती रही तथा चेन खींचने का खयाल न आने के कारण स्वयं पर हँसती रही । पिता भी तसल्ली देते रहे और मजाक करते रहे कि अभी तो जेब कटने, मोबाइल चोरी होने का अनुभव बाँकी है । जब तक यह सब ना हो तो मुम्बई का अनुभव अधूरा है । फिर उसने माँ से बात की । माँ उसके दर्द को अनुभव कर रही थी । पर उसका दर्द चोट का नहीं था । वह रो रही थी और कह रही थी, "माँ आज मैंने जाना कि स्त्री होने की क्या हानि है । मैंने कभी भी स्वयं को कमजोर नहीं समझा था । मुझे कभी भी भय नहीं लगा था । इस भय को मैंने पहली बार जाना । क्या यह भय स्त्री में नैसर्गिक होता है ? माँ , उस एक पल में मैं कल्पना कर सकी कि केवल पुरुषों की उपस्थिति में उस यार्ड में मेरे साथ क्या हो सकता था । और वह कल्पना इतनी भयानक थी कि मैंने चलती गाड़ी से छलांग लगा मरना या घायल होना बेहतर समझा । माँ यह नग्न भय था । भय अपने सबसे खूँखार रूप में । इस भय में कोई मिलावट या सोचने जैसा कुछ नहीं था । माँ मैं ऐसे भय के जीवन से घृणा करती हूँ । माँ यह उचित नहीं है, यह न्याय नहीं है । मुझे भय केवल इसलिए लगा कि मैं स्त्री हूँ । यदि पुरुष होती तो न डरती । माँ मैं इस संवेदना से घृणा करती हूँ । मैं ऐसा जीवन नहीं जीना चाहती जिसमें भय हो । ओह माँ, मैं उस संवेदना के बारे में सोच कर ही सिहर जाती हूँ । माँ, मुझे स्त्री क्यों बनाया तुमने ? यदि पुरुष मुझमें ऐसी भावना जगा सकते हैं तो मुझे पुरुष पसन्द नहीं । मैं कभी किसी पुरुष को जन्म नहीं दूँगी । हम ही उन्हें जन्म दें और फिर उन्हीं से डरें । जिसे तुमने जन्म दिया उससे तुम कैसे डर सकती हो ? क्या तुमने कभी इस डर का अनुभव किया ? यदि किया था तो मुझे भी इसे झेलने को जन्म क्यों दिया तुमने ? बचपन में जब क्षत्राणियों द्वारा जौहर को उनकी वीरता, उनकी महानता के रूप में पढ़ती थी तो बहुत आश्चर्य होता था कि यह क्या तुक हुई । पर माँ आज मैं उनके जौहर को समझ सकती हूँ । बलात्कार या मृत्यु की संभावना में से मैंने भी मृत्यु की संभावना को चुना । क्यों माँ, यह गलत है । मैंने तो पढ़ा था कि जीने की चाह ही स्वाभाविक है । तो फिर स्त्री के लिए यह अलग कैसे हो गया ? क्यों जीने की स्वाभाविक चाह मृत्यु से हार गई ?"
माँ क्या उत्तर देती ? है किसी के पास इसका उत्तर ?
घुघूती बासूती

Saturday, May 19, 2007

एक और कायर ?

कायर....२
इस कविता में भी मैं एक आत्महत्या के विषय में लिख रही हूँ । मैं आत्महत्या को बिल्कुल भी सही नहीं मानती । यह गलत है । हर हाल में गलत है । एक जीवन को समाप्त करना, चाहे वह अपना ही क्यों न हो, विशेषकर, तब जब यह जीवन सम्भावनाओं से भरा हुआ हो, सर्वथा गलत है । किन्तु मैं उन परिस्थितियों के बारे में लिखना चाहती हूँ जो किसी को ऐसा कदम उठाने की तरफ बढ़ने में सहायता करते हैँ । थोड़ा सा सहारा, थोड़ा सा सकारात्मक रवैया शायद उन्हें ऐसा करने से रोक दे । तब भी कुछ लोग बिना किसी को अपना दुख बताए शायद जीवन समाप्त कर लें, तब शायद कोई भी उनकी सहायता न कर सके । किन्तु अधिकतर मामलों में लोग मरना नहीं चाहते । वे मृत्यु को तभी चुनते हैं जब उन्हें सारे रास्ते बंद नजर आते हैं । जब वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपनों से सहायता माँग चुके होते हैं और जब उन्हें विश्वास हो जाता है कि कोई उनकी सहायता नहीं करेगा विशेषकर उनके अपने ।
यहाँ पर मैं एक विवाहिता नवयौवना की पीड़ा के विषय में लिख रही हूँ । उसे अपने पति या ससुराल से क्या शिकायत थी लिखना कोई आवश्यक नहीं है । आप स्वयं ही कयास लगा सकते हैं । जो अधिक महत्वपूर्ण है वह है उसके अपनों का उसके प्रति संवेदना रहित व्यवहार !वह केवल थोड़ा सा सहारा चाहती थी ..........

मैंने चाहा था हँसकर जीना
जीवन मेरा हो गया दुश्वार
बहती जलधारा सी मैं थी
मैं बन गई बांध बंधी धार
जितना मैंने उड़ना चाहा
पंख मेरे थे उसने कतरे
माँ से भी मैं बोली थी
अब ऐसे ना जी पाऊँगी
आ माँ, मुझे ले जा ले आकर
जीवन मेरा बना अंगार
कहती थी वह बिटिया मेरी
कैसे भी निभा तू लेना
अब ना वापिस तुझे ला पाऊँगी
मेरी भी तू सोच कुछ
कैसे समाज में मुख दिखलाऊँगी ।

सारे रास्ते जब बंद हो गए
जीवन से थी मैंने पाई हार
सुलगा कर इक माचिस को मैंने
करना चाहा जीवन उद्धार
मरने पर तो सब जलते हैं
पर मैं बन गई जीती मशाल ।

आज मुझे कायर तुम कहते हो
कहाँ गई थीं कल ये सब बात
मैंने भी था जीवन जीना चाहा
पर ना जीने देते थे हालात
ओ बड़ी बातें करने वालो
क्या तुम दे पाते मेरा साथ
तुम जलती माचिस को छू लो
फिर देना मुझे उपदेश
ओ मुझे कायर कहने वालो
क्या जानो तुम दर्द मेरा
कैसे होता है मन इतना पीड़ित
कि जीवन ज्योति बुझा हम पाते
तुमने तो दुनिया देखी है
क्यों न मुझे तुम लौटा थे लाते ।

इतना ही तो मैंने चाहा था
कुछ ऐसा हो जाए कि मैं
कर पाऊँ नवजीवन की शुरुआत
कुछ दिन मुझे सबल बनाते
अपने घर में मुझे ठहराते
मेरे घावों पर मरहम लगाते
फिर मैं नई राह निकलती
अपनी मंजिल खुद पा लेती ।

सुलग रही जब आत्मा चिता सी मेरी
क्यों तुम ना थे तब आग बुझाते
देखो मैं हवन कुंड बन गई
जवित हूँ पर भूत बन गई
पोर पोर में होती पीड़ा
बाल मेरे हैं झुलसाए
अब तो मेरे अपने भी
मुझसे हैं आँख चुराएँ ।

कुछ घंटों या दिन की ये पीड़ा
जीवन पर्यन्त सुलगने से बेहतर
मन आत्मा की पीड़ा के बदले
जलने की पीड़ा को गले लगाया
नारकीय जीवन से मुक्ति दिलाए
वह मृत्यु ही अब मुझे है भाए ।

जीने की हुईं खतम लालसा
मरने की थी बेला आई
जीने के इस अद्भुत खेल में
हार सदा से मैं पाती आई
अब तुम जाओ रपट लिखाओ
मेरे मरने का केस बनाओ
जीते जी ना साथ दे सके
अब मरने पर रस्म निभाओ ।

घुघूती बासूती

Friday, May 11, 2007

क्षमा करना माँ

क्षमा करना माँ
मैंने भी तुम्हारी इच्छाओं,
अपेक्षाओं को नज़र अन्दाज कर दिया माँ
क्षमा करना माँ ,
मैं तुम जैसी न बन सकी,
मैं प्रश्न करती रही
औरों से नहीं तो स्वयं से तो करती रही माँ,
मैं त्याग तो करती रही
किन्तु इन प्रश्नों ने मुझे
त्यागमयी न बनने दिया,
मैं ममता तो लुटाती रही
किन्तु ममतामयी न हो सकी।
मैंने तो सुहाग चिन्हों को भी नकार दिया,
साखा, पोला, लोहा, सिन्दूर, बिछिये,
चरयो कहीं पेटी में रख दिये,
सौभाग्यवती,पुत्रवती भव: न कहने दिया कभी,
समझौते के तौर पर
पिताजी बुद्धिमती ही बनाते गये मुझे
और इस बुद्धि ने ही सिखाये मुझे इतने प्रश्न
प्रश्न पर प्रश्न !
कोई मुझे उत्तर न दे सका माँ।

क्यों मेरी बेटियों के जन्म से लोग दुखी थे
क्यों मेरे जन्म पर पेड़े न बँटे थे
क्यों मेरा नाम मुझसे छिन गया
क्यों मेरा गाँव मुझसे छिन गया
क्यों मेरा मैं मुझसे छिन गया ?

मेरे प्रश्नों के मेरे पास सही उत्तर तो न थे
किन्तु एक प्रतिक्रियावाद में
मैंने मन ही मन अपना इक नाम रख लिया
मैंने खूब चाहा पुत्रवती न बनना
मैंने और अधिक चाहा पुत्रीवती बनना
शायद इच्छा शक्ति से ही
मैंने पुत्रियों को जन्म भी दे दिया।
कितनी खुश थी मैं एक पुत्री होने पर
फ़िर एक और पुत्री होने पर मैं और खुश हुई
मैंने राहत की साँस ली
अब तो मैं पुत्रवती होने से बच गई।
मुझे पुरुषों से,पुत्रों से कोई शिकायत न थी माँ
मैं तो बस उन अवाँछित आशीर्वादों से तंग थी माँ।
मैं तंग थी उस संस्कृति से माँ
जिसमें मेरा अवमूल्यन होता था माँ
जिसमें मेरी ही नस्ल के शत्रु बसते थे
जिसमें मेरी ही नस्ल उत्साहित थी
न ई न ई तकनीक आई थी
मेरी नस्ल का नामों निशां मिटाने को
हमने तो पढ़ा विज्ञान हमें आगे बढ़ाएगा
किन्तु यहाँ तो विज्ञान
हमें संसार से ही विदा कर रहा था
और मेरी संस्कृति ने, समाज ने
विज्ञान का क्या सदुपयोग निकाला
फ़िर भी सब मुझे इन्हीं दोनों का वास्ता देते थे
तो मैं, माँ, बस प्रश्न पूछती थी ,
तुमसे नहीं तो स्वयं से ।

याद है माँ,
जब मैं तुम्हारे घर आती थी
जब तुम खाना बनाती थीं
तब यही होता था प्रश्न
जवाँई को क्या है खाना पसन्द
जब मैं सास के घर जाती थी
कोई नहीं पूछता था कि क्या है मुझे पसन्द
मैं कहाँ घूमना चाहती थी
मैं क्या खाना चाहती थीं
तब भी जब मैं खाना बनाऊँ
तब भी जब कोई और बनाए
क्यों माँ ?
क्या मेरी जीभ में स्वाद ग्रन्थि न थीं
मेरा पेट न था
क्या मेरी इच्छाएँ न थीं ?

बड़ी बड़ी बातों को छोड़ो माँ
छोटी छोटी बातें भी सालती हैं।
फ़िर वे ही प्रश्न
कितने सारे प्रश्न
जो मुझे ममता, गरिमा व त्याग
सबके प्रचुर मात्रा में होने पर भी
ममतामयी नहीं बनने देते
गरिमामयी नहीं बनने देते
त्यागमयी नहीं बनने देते
कुल मिलाकर मेरे स्त्रीत्व को
(मेरी नजर में नहीं समाज,
संस्कृति वालों की नजर में )
मुझसे चुरा लेते हैं।
काश, ये प्रश्न न होते
पर माँ ,इन्हीं प्रश्नों पर तो
मेरा बचा खुचा मैं टिका है।

जानती हो माँ,
आखिर समय बदल गया
अब जब मैं पुत्रियों के घर जाती हूँ
वे व जवाँई पूछते हैं
क्या खाओगी माँ
कहाँ चलोगी माँ
कौन सी फ़िल्म देखोगी माँ
कौन सी पुस्तक खरीदोगी माँ
अचानक इस पुत्रीवती माँ की भी
पसन्द नापसन्द हो गई
उसकी जीभ में फ़िर से सुप्त स्वाद ग्रन्थियाँ उग गईं
उसकी आँखों,उसका मन,
उसका मस्तिष्क, सबका पुनर्जन्म हो गया
और मैं पुत्रीवती, माँ व्यक्ति बन गई ।
देखो माँ, अव्यक्ति मानी जाने वाली
इन स्त्रियों, मेरी पुत्रियों ने
मुझे व्यक्ति बना दिया।
घुघूती बासूती