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Monday, October 24, 2011

नाकुशा नाकुशा ना रही, नकोशी नकोशी ना रही

वैसे इसका शीर्षक 'आओ डूब मरें' भी हो सकता था।

खबर है(मुम्बई मिरर,२३.१०.२०११, व सकाळ) कि सतारा व उसके आसपास की १५० नाकुशा व नकोशी नाम की लड़कियाँ अपना नाम बदलकर अस्मिता, एश्वर्या, कोमल, शिवानी, पूजा आदि बन गई हैं। यह 'नाम बदलो कार्यक्रम' सतारा जिले में २२.१०.२०११ को सम्पन्न हुआ।

सुनने में तो नाकुशा(नकुशा तो नहीं?)या नकोशी बुरे नहीं लगते फिर इतनी लड़कियाँ अपने नामों से क्यों नाराज थीं? क्यों उन्होंने स्वयं अपने नाम चुने और सुबह सुबह नाम बदलवाने को अपने दूर दराज के गाँवों से सतारा पहुँची?

तो सुनिए, हमारे इस स्त्रियों का आदर करने वाले देश में, देवियों की पूजा करने वाले देश में, बच्चियों को देवी का रूप मान नवरात्रियों में उनके पैर धोकर उनकी पूजा करने वालों के देश में, उनको जन्मने से रोकने के भाँति भाँति के अन्धविश्वास से लेकर व्यावहारिक से लेकर वैज्ञानिक उपाय जैसे टोटके, झाड़फूँक, तावीज,विशेष भोजन, भ्रूण हत्या,नर भ्रूण की गर्भ में स्थापना करना व न जाने कितने और तरीके अपनाए जाते हैं। ये सब तो हमने सुने हुए थे। आज एक नया उपाय पता चला। बच्ची को ऐसा नाम दे दो कि उसके बाद उस परिवार में कोई बच्ची जन्म लेने का दुस्साहस ही न करे।

जब किसी गर्भवती स्त्री ने पुत्र की आशा की हो और पुत्री हो जाए तो 'नको होती' जैसा कुछ मराठी में कहा जाता है जिसका अर्थ है, नहीं चाहिए थी। और यह लड़की नकोशी बन जाती है। नाकुशा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है जो अजित वडनेरकर जी समझा सकते हैं। ये सब बच्चियाँ जानती हैं कि वे अनचाही संतान हैं।

वैसे एक बात तो माननी होगी कि ये माता पिता खुल्लमखुल्ला बता देते हैं कि तुम नहीं चाहिए थी। कितने माता पिता तो यह नहीं कह पाते और पुत्र की चाह में पुत्री जन्मने के बाद उसे अच्छा सा नाम दे जीवन पुत्र की चाहत में गुजार देते हैं। स्पष्टवादिता भी एक गुण है और बच्ची जन्म से ही कोई भ्रम नहीं पालती।

खैर,अब पन्द्रह साल की नकोशी अस्मिता बन सकती है। नाकुशा कोमल और एक अन्य उज्जवला। यह बात और है कि नए नामों के प्रमाण पत्र बनाने वाले भी उनके माता पिता से बहुत भिन्न नहीं हैं सो नकोशी अस्मिता बनते बनते स्वाति बन गई है और उसे बताया गया है चिन्ता मत करो, तुम्हारा नाम ठीक कर अस्मिता कर दिया जाएगा। अस्मिता बनना चाहने वाली नकोशी को स्कूल पसन्द है व पढ़लिखकर अध्यापिका बनना चाहती है। वह दुखी है कि नाम बदलवाने के चक्कर में स्कूल में परीक्षा भी छूटी और नाम भी अपनी पसन्द का नहीं मिला।

प्रश्नः
१.जब इन नकोशियाँ, नाकुशाओं का माँ बनने का समय आएगा तो क्या ये बेटियाँ जन्मना चाहेंगी?
२.क्या इन्हें भ्रूण का लिंग पताकर अवान्छित भ्रूण को गिराने से रोकने का समाज का कोई नैतिक अधिकार बनता है?
३. क्या कल बुढ़ापे में इनके माता पिता को इनसे भरण पोषण माँगने का अधिकार होना चाहिए?

घुघूती बासूती

Tuesday, October 11, 2011

ओह!

कल एक युवक से मिलना हुआ। बातचीत हुई तो क्या करते हो पूछा। अच्छा खासा काम करता है, लगता है अच्छा खासा कमाता भी है। उसने बताया कि उसने बी एस सी की है और अब एम बी ए करना चाहता है। पहले पत्राचार से एम बी ए करने की सोच रहा था किन्तु अब एम बी ए विवाह तक स्थगित कर दिया है। विवाह के बाद कॉलेज में दाखिला लेकर पढ़ेगा। मैं थोड़ी चकराई क्योंकि अब तक मैंने लोगों को पढ़ाई खत्म होने तक विवाह स्थगित करते देखा था। यहाँ गंगा उल्टी बह रही थी। उसने मेरा चकराना भाँपा और बोला कि वह नौकरी करने वाली लड़की से विवाह करेगा ताकि उसकी पढ़ाई तक वह घर का खर्च चला सके। घर का खर्च का अर्थ उसके घर खर्च, घर का किराया के अतिरिक्त माता पिता के घर के खर्च व घर का किराया भी है। वह माता पिता से अलग मुम्बई में रहता है। माता पिता दिल्ली में रहते हैं। मैंने कहा अच्छा ऐसी लड़की से विवाह करने वाले हो, मुम्बई की ही है क्या? वह बोला कि अभी तो लड़की खोज रहे हैं। मैंने पूछा कौन तुम खोज रहे हो तो बोला कि नहीं माता पिता। सो उन्हें बता दिया है कि नौकरी करने वाली ही ढूँढे।

मैंने कहा कि हाँ आपके समाज में तो लड़की वाले वर की पढ़ाई भी पूरी करवा देते हैं। वह थोड़ा दुखी हो बोला कि हाँ दहेज तो मिलता ही है किन्तु जितना डॉक्टर, इन्जीनियर व आ ए एस को मिलता है उतना अन्य योग्यता वालों को नहीं मिलता, वे चाहे जितना मर्जी कमा लें। मेरा मन हो रहा था कि कहूँ, बहुत नाइन्साफी है यह तो! खैर, उसने मेरी आँखों में अपने लिए सहानुभूति पढ़ ही ली। वह और खुल गया। बोला कि उनके समाज में दहेज में पैसा माँगते अवश्य हैं किन्तु बहुओं को सताते जरा भी नहीं। शेष भारत में जैसे बहुओं को मारने जलाने की घटनाएँ होती हैं वैसी उसने अपने समाज में नहीं देखीं। उनके समाज में स्त्री का बहुत आदर है। जो माँगना होता है वह विवाह से पहले खुलकर माँग लेते हैं, बाद में कोई लफड़ा नहीं करते।

मेरे पति बोले कि क्या आजकल भी युवा दहेज लेने व देने को मना नहीं करते। वह बोला नहीं, यह तो खुला विद्रोह हो जाएगा। और जब मिल रहा है तो अपनी हानि के लिए कोई क्यों विद्रोह करेगा। लड़की भी नहीं करेगी। क्योंकि दहेज के पैसे से ही ससुराल वाले उसके लिए गहने कपड़े खरीदते हैं। फिर दहेज भी तो ससुराल में ही आता है और उसे भी ससुराल में ही रहना होता है सो उस ही को आराम रहेगा।

बात मुम्बई व उसके सबर्ब्स की चली। अभी वह काफी दूर रह रहा है। सोचता है कि विवाह हो जाएगा तो बान्द्रा में आ जाएगा। बान्द्रा में तो किराया बहुत अधिक है ना? हाँ, अभी तो मुझे लगता है कि क्यों इतना खर्चा किया जाए। विवाह के बाद तो बान्द्रा में ही रहना है। बात हमारे शाकाहारी होने की भी चली। उसने बताया कि वे तो विशुद्ध माँसाहारी होते हैं। रोज भी मछली, माँस, मुर्गा मिले तो खुश रहते हैं।

मैं सोच रही थी कि वह विवाह लड़की से करेगा या जादुई चिराग से। रगड़ों तो बान्द्रा व दिल्ली के मकान का किराया आ जाएगा, दो घरों का खर्च निकल आएगा, उसकी एम बी ए की फीस निकल आएगी। दहेज में कई लाख रुपए भी आ जाएँगे, नौकरी भी कर लेगी, स्वादिष्ट खाना भी बना लेगी, मछली भी छील साफ कर तल पका लेगी। शायद जब कहा जाएगा तो दो पुत्रों या एक पुत्र व एक पुत्री को जन्म भी दे देगी।

मेरे विचारों कि तन्द्रा तब टूटी जब वह पति से हमारे बच्चों के बारे में पूछ रहा था। पति मजे से बेटियों व जवाँइयों के काम व नौकरी के बारे में बता रहे थे। पूछा, बस बेटियाँ ही हैं। पति बोले, हाँ, दो हैं। वह लम्बी साँस ले बोला, ओह!

घुघूती बासूती

नोटः इस पोस्ट को श्री अनुराग शर्मा ने बहुत सुन्दर तरीके से पॉडकास्ट भी किया है। उनकी आभारी हूँ।

घुघूती बासूती

Monday, June 08, 2009

बिटिया तो है फूल की डाली... पर पहले कर दो उसे गर्भ से खाली

बात तब की है जब हम दिल्ली में थे। वहीं एक जान पहचान वाले सज्जन भी रहते थे। व्यवसायी हैं। हमारे साथ बिटिया और पुत्री वर (वही शब्द जमाता, जमाई, दामाद, जो न जाने क्यों मुझे जरा भी नहीं सुहाता) हमारे फ्लैट में रह रहे थे। तो फ्लैट के कुछ काम के सिलसिले में उनसे बात हुई। बात-बात में घुघूत की सेवानिवृत्ति की बात निकल आई। चर्चा होने लगी कि उसके बाद हम कहाँ रहेंगे आदि। फिर बात खर्चे पर चली आई- खर्चा कौन उठाएगा। स्वाभाविक था कि बिटिया और पुत्रीवर ही दिल्ली में रहते थे, सो वे भुगतान करेंगे। हम बाद में उन्हें पैसा लौटा दें या नहीं, यह अलग बात थी। हमने कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद हम उस शहर में रहना चाहेंगे जहाँ दोनों या कम से कम एक बेटी रहती हो। उन्‍होंने जानना चाहा ऐसा क्यों। हमने कहा कि भाई, कभी कोई दुख तकलीफ हुई तो। हमारी देखभाल करने वाली तो यही दो बेटिया है। वे ध्यान रखेंगी। उनकी नजर में हमारा यह फैसला सही नहीं था।


उन महाशय के अनुसार बेटियों से दुख तकलीफ में सहायता लेना गलत था। उनके मुताबिक, बेटियाँ तो फूलों की डाली हैं उन्हें तो बस देना ही देना होता है, उनसे कुछ भी लेना गलत है। आर्थिक सहायता तो दूर की बात... कष्ट में सहायता लेना भी गलत है।


उनकी ये बातें सुनकर मुझे अपने बचपन और किशोरावस्था में पढ़े स्कूली पुस्तकों के वे लेख याद आए जिनके कारण हिन्दी से मेरी शत्रुता सी हो गई। उनमें से एक बिटिया के विवाह व विदाई के बारे में था। आह, क्या समा बाँधा था- लड़की पराई होने का। बाबुल से विदाई का। बाबुल के घर की रोप का दूसरे घर में रोपे जाने आदि का! विवाह के समय प्रज्‍ज्वलित अग्नि में लड़की का भूतकाल जल जाने का और उसका नया जन्म होने का! विदाई के समय माता पिता, भाई बहन के फूट-फूटकर रोने का! जैसे वह मर ही गई हो। कहने को कितना मधुर परन्तु यथार्थ में कितना जहरबुझा! मेरी समझ में बेटियों के बारे में ऐसे लेख व लोक गीत ही तो कन्या भ्रूणों की हत्या का कारण होते हैं।


बिटिया, एक मधुर किन्तु पराया अहसास! उसे तो किसी और के घर जाना है। तभी तो आपको अपने घर के लिए चिराग की आवश्यकता है। सो उसे पैदा करने की चेष्टा में या तो पुत्रियों की पंक्ति खड़ी कर दीजिए या फिर भ्रूण परीक्षण करवाइए। ऐसे में घुघूती कितनी विषाक्त हो जाती है, केवल वही जानती है।


हमारे उन मित्र के मुताबिक हम बेटियों पर किसी सहायता के लिए कभी भी निर्भर नहीं होना चाहिए। आप सोचेगें कि वाह क्या विचार हैं, बेटियों को अपनी देखरेख, चिन्ता से मुक्त कर देने वाले! किन्तु ये विचार जहाँ बेटियों को माता-पिता की हर चिन्ता से मुक्त करते हैं, वहीं यदि दो से अधिक बेटियाँ होने की सम्भावना हो तो आने वाली बेटियों को संसार से भी मुक्त कर देते हैं। उन साहब की भी ऐसी कहानी थी। वे शायद नहीं जानते थे कि मैं उनकी यह कहानी जानती हूँ और उनका बेटी प्रेम भी।


बात ऐसी है कि उनकी और हमारी शादी आसपास ही हुई थी। उनकी भी दो बेटियाँ हुईं और मेरी भी। उनकी दोनों बेटियाँ मेरी बेटियों से कुछ दिन ही छोटी-बड़ी थीं। फिर एक दिन पता चला की उनकी तीसरी संतान होने वाली है। उन साहब ने पता कराया तो मशीन ने बताया कि वह संतान भी बेटी ही होगी। सो पाँचवें या छठे महीने में जब बेटी का होना एकदम पक्‍का हो गया तो उन्‍होंने इस अनचाही बेटी से छुटकारा पाने का फैसला किया। उस अजन्मी बेटी को जबर्दस्ती जन्म दिया गया। हाँ, इतने महीने बीतने पर गर्भपात नहीं होता। इतने माह में गर्भपात गैरकानूनी भी है और खतरनाक जानलेवा भी। सो, जबरन जन्म देकर मारा जाता है। प्रीमैच्योर लेबर पेन के लिए जबरन नसों में दवा चढ़ाई जाती है। बच्ची जबरन समय से पहले पैदा की जाती है और मार दी जाती है। तो उन्‍होंने तीसरी बेटी को यह तरीका अपनाकर दुनिया में आने से रोक दिया। यह थी उनकी तीसरी फूलों की डाली, जो समय से पूर्व ही माँ के गर्भ से निकाल कर मार दी गई। ... जानते हैं, उस अजन्‍मी बेटी की माँ का क्‍या कहना था। माँ का कहना था कि वह बिल्कुल उनकी बड़ी बेटी सी दिखती थी। यानी बच्ची के नैन-नक्श बन चुके थे, कैसी दिखती है, पता चल सकता था। लेकिन उस फूल की डाली को बढ़ने नहीं दिया गया।


और यह सब उस औरत को करना पड़ा, जो दुआ करती थी कि उसे बेटी हो। हुआ यों कि जब उन सज्‍जन की पत्‍नी पहली बार गर्भवती हुई ( मैं भी उस वक्‍त माँ बनने वाली थी), तब कहती थी कि सास, ससुर व पति को मुँडा (लड़का) चाहिए इसलिए मैं प्रार्थना करती हूँ कि कुड़ी( लड़की) ही होए। केवल उनको जलाने को यह कहती और मजे लेती। वह जीवंत स्त्री तीसरी बेटी के समय तक इतनी कमजोर पड़ चुकी थी कि वह उसे निकाल फेंकने को तैयार हो गई! बिना किसी विरोध के। उफ, बेटे की चाह में एक औरत (माँ) को कितना मजबूर बना दिया जाता है।


अब आइए शुरुआत के मुद्दे पर चलते हैं। यानी बेटियों से मदद लेने की बात। मैं पूछती हूँ कि क्या गलत है कि यदि मैं अपनी बेटियों को महज फूलों की डाली न मानकर व्यक्ति मानूँ। ऐसा व्यक्ति जो अपने माता-पिता का उत्तराधिकारी बनें। उनके बुढ़ापे और तकलीफ की घड़ी में उनका ध्यान भी रखे!


अब आप ही बताइए क्या होना बेहतर है,-फूलों की ऐसी डाली जो यदि नापसंद हो तो काटकर फेंक दी जाए या केवल व्यक्ति जिसके अधिकार भी हैं तो कुछ उत्तरदायित्व भी हैं... और हाँ जिसे साथ में जीने का अधिकार भी है।


मुझे तो संतान ही चाहिए थी, जो चाहे पुलिंग हो या स्त्रीलिंग परन्तु जिन्हें मैं प्यार करूँ और अच्छे व्यक्ति के रूप में बड़ा करूँ। मुझे फूलों की वे , आह, कवितामय डालियाँ नहीं चाहिए थीं जिनकी संख्या जितनी मैं चाहूँ उतनी ही हो। जिन्हें मैं 'बाबुल की दुआएँ लेती जा' गीत गाकर अपने संसार से विदा नहीं करूँ,जो 'बाबुल असी चिड़ियाँ दा ....' गाकर मुझसे विदा न हों, सदा मेरा संसार बनी रहें और जो मेरा सहारा हों और जिनका मैं सहारा होऊँ, किसी कर्त्तव्य में बन्ध कर नहीं, केवल स्नेह के बन्धन के कारण!


घुघूती बासूती


पुनश्चः इन्हें भी पढ़िए।


१ चूरन के साथ बछड़े वाली गाय का दूध पियें बेटा होगा
२ तो जिमाने के लिए कन्या कहाँ से आएँगी
३ जब न गायब बेटियों से पूछा जाएगा
४ अनचहाही मुसलमान बेटियाँ.. जमीनी हकीकत
५.लड़की मरै घड़ी भर का दुख, जिये तो जनम भर का
६.बिटिया का खौफ बना बेहिसाब मुनाफे का धंधा


घुघूती बासूती

Saturday, May 09, 2009

बेटा पिता का गुरु ! बेटियाँ माँ की !

आज सुबह जब यह समाचार पढ़ा कि एक पिता व पुत्र दोनों दसवीं की परीक्षा दे रहे हैं और पिता को पुत्र ही घर पर पढ़ाया करता था तो मेरे चेहरे पर मुस्कान तैरने लगी। पिता आठवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ चुका था व सिंचाई विभाग में काम करता है। पुत्र स्कूल जाता है और घर लौटकर पिता को पढ़ाता है व स्वयं भी पढ़ता है। पिता को आशा है कि दसवीं पास करने से उसकी पदोन्नति हो जाएगी।


मुझे सदा यह लगता है कि मेरे विचार व सोचने का तरीका मेरी बेटियों से बहुत प्रभावित है। जब मैं उस समय के बारे में सोचती हूँ जब वे इस संसार में नहीं आईं थीं और तब की मैं के बारे में सोचती हूँ तो पाती हूँ कि तब की मैं आज जैसी नहीं थी। कुछ कुछ तो थी परन्तु कोयले सी कार्बन थी। आज जितनी थोड़ी बहुत चमक मुझमें आई है वह उन्हीं के कारण है। उन्होंने अपनी तरफ से मुझे हीरा वाले कार्बन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कसर रही तो मेरे अपने प्रयासों में व मेरी सोखने की शक्ति में।


शायद ही कोई दिन ऐसा रहा हो जब उनसे मैंने कुछ नया नहीं सीखा। मैं उनके साथ सदा बच्ची ही बनी रही। माँ तो थी मैं उनकी किन्तु उनकी हर मस्ती, हर शैतानी व हर खेल में मैं भाग लेने की कोशिश करती थी। यहाँ तक कि उनके मित्र भी आते थे तो वे भी मुझे अपने खेलों में शामिल कर लेते थे। फिर सदा ही हम तीन व हमारे कुत्ते ही होते थे। पति तो सदा सुबह होते ही जो फोन पर लगते थे तो घर में बिताए अधिकतर समय उसी में लगे रहते थे। शाम को बहुत देर से घर आते थे। मेरी असली साथी तो सदा मेरी बेटियाँ ही रहीं।


जीवन का न जाने कितना दर्शन मैंने उनसे ही सीखा। पहले से पढ़े लेखकों व पुस्तकों को मैंने उनके साथ पढ़कर नई नजर से देखना सीखा। जब भी वे लाइब्रेरी से कोई किताब लातीं, चाहे वह बच्चों की ही क्यों न हो, सदा पढ़ने की मेरी भी बारी होती थी। मैंने फिर से कॉमिक पढ़े, फिर से ऍन रैंड पढ़ी, फिर से बच्ची से किशोरी और किशोरी से युवा हुई। लगता था कि जो बातें पहले केवल मस्तिष्क को छूती थीं तब हृदय को भी छूने लगीं। यदि पहले जीवन में सात रंग थे तो तब सात सौ शेड्स दिखने लगे। हर खुशी, हर वस्तु, हर सोच ने एक नया आकार व रंग ले लिया था। एक बिल्कुल ही नया रूप, आकार व रंग। पहले जो चीजें धुँधली थीं अब वे काफी साफ नजर आने लगी थीं। मैं अपने आप को भी समझने लगी थी। लोगों को , उनके व्यवहार को समझने लगी थी। आश्चर्य होता है कि पहले मैं यह सब क्यों नहीं समझ पाती थी।


कुछ इतने गूढ़ जीवन दर्शन से मेरा परिचय कराया कि मैं कभी कभी आश्चर्यचकित रह जाती हूँ सोचकर कि छोटे बच्चे जिस सत्य को देख पाते हैं हम क्यों नहीं। जैसे यदि हम किसी के लिए कुछ करते हैं तो वास्तव में उसके लिए नहीं अपने लिए, शुद्ध रूप से अपने स्वार्थ के लिए करते हैं। क्योंकि वैसा करना हमें खुशी देता है और हमारे मन में हमारी जो छवि है उसको और सुदृढ़ करता है। सो किसी अन्य के लिए किया मत सोचो अपने लिए किया सोचकर चलो। अतः वह अब हमें धन्यवाद देगा की कामना न करो। इस सोच ने ही जीवन को कितना सरल कर दिया।


मैं शाकाहारी थी किन्तु पशु प्रेम मैंने उनसे सीखा। मेरे लिए शाकाहारी होना केवल एक तथ्य था। शाकाहारी होने का कारण केवल अपने परिवार की जीवन प्रणाली का हिस्सा था। शायद माँसाहार से घृणा भी उसी का हिस्सा थी। पति का परिवार माँसाहारी था। बच्चियों को भी माँसाहारी बनाया। किन्तु जब वे बड़ी हुईं तो माँस जो उनका प्रिय भोजन था उन्होंने स्वयं पशु प्रेम के चलते त्याग दिया। मुझे कुत्तों ही नहीं हर प्राणी से प्यार करना उन्होंने ही सिखाया। कुत्तों की माँ व बिल्लियों की नानी उन्हीं ने बनाया।


मेरे जीवन मूल्यों पर उनकी गहरी छाप है। इतनी गहरी कि उन्हें घर छोड़े हुए १२ साल होने को हैं परन्तु बड़ी ने १७ साल में और छोटी ने १४ साल में मुझे जो सिखाया वह आज भी मैं नहीं भूली हूँ। कुछ भी नहीं हल्का पड़ा है बल्कि समय के साथ साथ मैं अपने पर उनकी छाप और भी साफ देख पाती हूँ। आज भी मैं उन्हें कहती हूँ कि यदि उम्र के साथ स्वार्थ, भ्रम व खड़ूसपन मुझमें आने लगे तो मुझे रोक लेना, टोक देना। मैं अपने जीवन में आई उन नन्हीं गुरुओं से सीखा कोई भी पाठ भूलना नहीं चाहती।


घुघूती बासूती


यह लेख जब हमारे प्रान्त में दसवीं की परीक्षाएँ हो रही थीं तब लिखा था।


घुघूती बासूती