बात तब की है जब हम दिल्ली में थे। वहीं एक जान पहचान वाले सज्जन भी रहते थे। व्यवसायी हैं। हमारे साथ बिटिया और पुत्री वर (वही शब्द जमाता, जमाई, दामाद, जो न जाने क्यों मुझे जरा भी नहीं सुहाता) हमारे फ्लैट में रह रहे थे। तो फ्लैट के कुछ काम के सिलसिले में उनसे बात हुई। बात-बात में घुघूत की सेवानिवृत्ति की बात निकल आई। चर्चा होने लगी कि उसके बाद हम कहाँ रहेंगे आदि। फिर बात खर्चे पर चली आई- खर्चा कौन उठाएगा। स्वाभाविक था कि बिटिया और पुत्रीवर ही दिल्ली में रहते थे, सो वे भुगतान करेंगे। हम बाद में उन्हें पैसा लौटा दें या नहीं, यह अलग बात थी। हमने कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद हम उस शहर में रहना चाहेंगे जहाँ दोनों या कम से कम एक बेटी रहती हो। उन्होंने जानना चाहा ऐसा क्यों। हमने कहा कि भाई, कभी कोई दुख तकलीफ हुई तो। हमारी देखभाल करने वाली तो यही दो बेटिया है। वे ध्यान रखेंगी। उनकी नजर में हमारा यह फैसला सही नहीं था।
उन महाशय के अनुसार बेटियों से दुख तकलीफ में सहायता लेना गलत था। उनके मुताबिक, बेटियाँ तो फूलों की डाली हैं उन्हें तो बस देना ही देना होता है, उनसे कुछ भी लेना गलत है। आर्थिक सहायता तो दूर की बात... कष्ट में सहायता लेना भी गलत है।
उनकी ये बातें सुनकर मुझे अपने बचपन और किशोरावस्था में पढ़े स्कूली पुस्तकों के वे लेख याद आए जिनके कारण हिन्दी से मेरी शत्रुता सी हो गई। उनमें से एक बिटिया के विवाह व विदाई के बारे में था। आह, क्या समा बाँधा था- लड़की पराई होने का। बाबुल से विदाई का। बाबुल के घर की रोप का दूसरे घर में रोपे जाने आदि का! विवाह के समय प्रज्ज्वलित अग्नि में लड़की का भूतकाल जल जाने का और उसका नया जन्म होने का! विदाई के समय माता पिता, भाई बहन के फूट-फूटकर रोने का! जैसे वह मर ही गई हो। कहने को कितना मधुर परन्तु यथार्थ में कितना जहरबुझा! मेरी समझ में बेटियों के बारे में ऐसे लेख व लोक गीत ही तो कन्या भ्रूणों की हत्या का कारण होते हैं।
बिटिया, एक मधुर किन्तु पराया अहसास! उसे तो किसी और के घर जाना है। तभी तो आपको अपने घर के लिए चिराग की आवश्यकता है। सो उसे पैदा करने की चेष्टा में या तो पुत्रियों की पंक्ति खड़ी कर दीजिए या फिर भ्रूण परीक्षण करवाइए। ऐसे में घुघूती कितनी विषाक्त हो जाती है, केवल वही जानती है।
हमारे उन मित्र के मुताबिक हम बेटियों पर किसी सहायता के लिए कभी भी निर्भर नहीं होना चाहिए। आप सोचेगें कि वाह क्या विचार हैं, बेटियों को अपनी देखरेख, चिन्ता से मुक्त कर देने वाले! किन्तु ये विचार जहाँ बेटियों को माता-पिता की हर चिन्ता से मुक्त करते हैं, वहीं यदि दो से अधिक बेटियाँ होने की सम्भावना हो तो आने वाली बेटियों को संसार से भी मुक्त कर देते हैं। उन साहब की भी ऐसी कहानी थी। वे शायद नहीं जानते थे कि मैं उनकी यह कहानी जानती हूँ और उनका बेटी प्रेम भी।
बात ऐसी है कि उनकी और हमारी शादी आसपास ही हुई थी। उनकी भी दो बेटियाँ हुईं और मेरी भी। उनकी दोनों बेटियाँ मेरी बेटियों से कुछ दिन ही छोटी-बड़ी थीं। फिर एक दिन पता चला की उनकी तीसरी संतान होने वाली है। उन साहब ने पता कराया तो मशीन ने बताया कि वह संतान भी बेटी ही होगी। सो पाँचवें या छठे महीने में जब बेटी का होना एकदम पक्का हो गया तो उन्होंने इस अनचाही बेटी से छुटकारा पाने का फैसला किया। उस अजन्मी बेटी को जबर्दस्ती जन्म दिया गया। हाँ, इतने महीने बीतने पर गर्भपात नहीं होता। इतने माह में गर्भपात गैरकानूनी भी है और खतरनाक जानलेवा भी। सो, जबरन जन्म देकर मारा जाता है। प्रीमैच्योर लेबर पेन के लिए जबरन नसों में दवा चढ़ाई जाती है। बच्ची जबरन समय से पहले पैदा की जाती है और मार दी जाती है। तो उन्होंने तीसरी बेटी को यह तरीका अपनाकर दुनिया में आने से रोक दिया। यह थी उनकी तीसरी फूलों की डाली, जो समय से पूर्व ही माँ के गर्भ से निकाल कर मार दी गई। ... जानते हैं, उस अजन्मी बेटी की माँ का क्या कहना था। माँ का कहना था कि वह बिल्कुल उनकी बड़ी बेटी सी दिखती थी। यानी बच्ची के नैन-नक्श बन चुके थे, कैसी दिखती है, पता चल सकता था। लेकिन उस फूल की डाली को बढ़ने नहीं दिया गया।
और यह सब उस औरत को करना पड़ा, जो दुआ करती थी कि उसे बेटी हो। हुआ यों कि जब उन सज्जन की पत्नी पहली बार गर्भवती हुई ( मैं भी उस वक्त माँ बनने वाली थी), तब कहती थी कि सास, ससुर व पति को मुँडा (लड़का) चाहिए इसलिए मैं प्रार्थना करती हूँ कि कुड़ी( लड़की) ही होए। केवल उनको जलाने को यह कहती और मजे लेती। वह जीवंत स्त्री तीसरी बेटी के समय तक इतनी कमजोर पड़ चुकी थी कि वह उसे निकाल फेंकने को तैयार हो गई! बिना किसी विरोध के। उफ, बेटे की चाह में एक औरत (माँ) को कितना मजबूर बना दिया जाता है।
अब आइए शुरुआत के मुद्दे पर चलते हैं। यानी बेटियों से मदद लेने की बात। मैं पूछती हूँ कि क्या गलत है कि यदि मैं अपनी बेटियों को महज फूलों की डाली न मानकर व्यक्ति मानूँ। ऐसा व्यक्ति जो अपने माता-पिता का उत्तराधिकारी बनें। उनके बुढ़ापे और तकलीफ की घड़ी में उनका ध्यान भी रखे!
अब आप ही बताइए क्या होना बेहतर है,-फूलों की ऐसी डाली जो यदि नापसंद हो तो काटकर फेंक दी जाए या केवल व्यक्ति जिसके अधिकार भी हैं तो कुछ उत्तरदायित्व भी हैं... और हाँ जिसे साथ में जीने का अधिकार भी है।
मुझे तो संतान ही चाहिए थी, जो चाहे पुलिंग हो या स्त्रीलिंग परन्तु जिन्हें मैं प्यार करूँ और अच्छे व्यक्ति के रूप में बड़ा करूँ। मुझे फूलों की वे , आह, कवितामय डालियाँ नहीं चाहिए थीं जिनकी संख्या जितनी मैं चाहूँ उतनी ही हो। जिन्हें मैं 'बाबुल की दुआएँ लेती जा' गीत गाकर अपने संसार से विदा नहीं करूँ,जो 'बाबुल असी चिड़ियाँ दा ....' गाकर मुझसे विदा न हों, सदा मेरा संसार बनी रहें और जो मेरा सहारा हों और जिनका मैं सहारा होऊँ, किसी कर्त्तव्य में बन्ध कर नहीं, केवल स्नेह के बन्धन के कारण!
घुघूती बासूती
पुनश्चः इन्हें भी पढ़िए।
१ चूरन के साथ बछड़े वाली गाय का दूध पियें बेटा होगा २ तो जिमाने के लिए कन्या कहाँ से आएँगी ३ जब न गायब बेटियों से पूछा जाएगा ४ अनचहाही मुसलमान बेटियाँ.. जमीनी हकीकत ५.लड़की मरै घड़ी भर का दुख, जिये तो जनम भर का ६.बिटिया का खौफ बना बेहिसाब मुनाफे का धंधा घुघूती बासूती