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Tuesday, October 11, 2011

ओह!

कल एक युवक से मिलना हुआ। बातचीत हुई तो क्या करते हो पूछा। अच्छा खासा काम करता है, लगता है अच्छा खासा कमाता भी है। उसने बताया कि उसने बी एस सी की है और अब एम बी ए करना चाहता है। पहले पत्राचार से एम बी ए करने की सोच रहा था किन्तु अब एम बी ए विवाह तक स्थगित कर दिया है। विवाह के बाद कॉलेज में दाखिला लेकर पढ़ेगा। मैं थोड़ी चकराई क्योंकि अब तक मैंने लोगों को पढ़ाई खत्म होने तक विवाह स्थगित करते देखा था। यहाँ गंगा उल्टी बह रही थी। उसने मेरा चकराना भाँपा और बोला कि वह नौकरी करने वाली लड़की से विवाह करेगा ताकि उसकी पढ़ाई तक वह घर का खर्च चला सके। घर का खर्च का अर्थ उसके घर खर्च, घर का किराया के अतिरिक्त माता पिता के घर के खर्च व घर का किराया भी है। वह माता पिता से अलग मुम्बई में रहता है। माता पिता दिल्ली में रहते हैं। मैंने कहा अच्छा ऐसी लड़की से विवाह करने वाले हो, मुम्बई की ही है क्या? वह बोला कि अभी तो लड़की खोज रहे हैं। मैंने पूछा कौन तुम खोज रहे हो तो बोला कि नहीं माता पिता। सो उन्हें बता दिया है कि नौकरी करने वाली ही ढूँढे।

मैंने कहा कि हाँ आपके समाज में तो लड़की वाले वर की पढ़ाई भी पूरी करवा देते हैं। वह थोड़ा दुखी हो बोला कि हाँ दहेज तो मिलता ही है किन्तु जितना डॉक्टर, इन्जीनियर व आ ए एस को मिलता है उतना अन्य योग्यता वालों को नहीं मिलता, वे चाहे जितना मर्जी कमा लें। मेरा मन हो रहा था कि कहूँ, बहुत नाइन्साफी है यह तो! खैर, उसने मेरी आँखों में अपने लिए सहानुभूति पढ़ ही ली। वह और खुल गया। बोला कि उनके समाज में दहेज में पैसा माँगते अवश्य हैं किन्तु बहुओं को सताते जरा भी नहीं। शेष भारत में जैसे बहुओं को मारने जलाने की घटनाएँ होती हैं वैसी उसने अपने समाज में नहीं देखीं। उनके समाज में स्त्री का बहुत आदर है। जो माँगना होता है वह विवाह से पहले खुलकर माँग लेते हैं, बाद में कोई लफड़ा नहीं करते।

मेरे पति बोले कि क्या आजकल भी युवा दहेज लेने व देने को मना नहीं करते। वह बोला नहीं, यह तो खुला विद्रोह हो जाएगा। और जब मिल रहा है तो अपनी हानि के लिए कोई क्यों विद्रोह करेगा। लड़की भी नहीं करेगी। क्योंकि दहेज के पैसे से ही ससुराल वाले उसके लिए गहने कपड़े खरीदते हैं। फिर दहेज भी तो ससुराल में ही आता है और उसे भी ससुराल में ही रहना होता है सो उस ही को आराम रहेगा।

बात मुम्बई व उसके सबर्ब्स की चली। अभी वह काफी दूर रह रहा है। सोचता है कि विवाह हो जाएगा तो बान्द्रा में आ जाएगा। बान्द्रा में तो किराया बहुत अधिक है ना? हाँ, अभी तो मुझे लगता है कि क्यों इतना खर्चा किया जाए। विवाह के बाद तो बान्द्रा में ही रहना है। बात हमारे शाकाहारी होने की भी चली। उसने बताया कि वे तो विशुद्ध माँसाहारी होते हैं। रोज भी मछली, माँस, मुर्गा मिले तो खुश रहते हैं।

मैं सोच रही थी कि वह विवाह लड़की से करेगा या जादुई चिराग से। रगड़ों तो बान्द्रा व दिल्ली के मकान का किराया आ जाएगा, दो घरों का खर्च निकल आएगा, उसकी एम बी ए की फीस निकल आएगी। दहेज में कई लाख रुपए भी आ जाएँगे, नौकरी भी कर लेगी, स्वादिष्ट खाना भी बना लेगी, मछली भी छील साफ कर तल पका लेगी। शायद जब कहा जाएगा तो दो पुत्रों या एक पुत्र व एक पुत्री को जन्म भी दे देगी।

मेरे विचारों कि तन्द्रा तब टूटी जब वह पति से हमारे बच्चों के बारे में पूछ रहा था। पति मजे से बेटियों व जवाँइयों के काम व नौकरी के बारे में बता रहे थे। पूछा, बस बेटियाँ ही हैं। पति बोले, हाँ, दो हैं। वह लम्बी साँस ले बोला, ओह!

घुघूती बासूती

नोटः इस पोस्ट को श्री अनुराग शर्मा ने बहुत सुन्दर तरीके से पॉडकास्ट भी किया है। उनकी आभारी हूँ।

घुघूती बासूती