Monday, June 14, 2021

पिताजी

 पिताजी

पिताजी में सदा हर काम, हर बात, जीवन के प्रति उमंग होती थी. छोटी छोटी बातें उन्हें खुश कर देती थीं. मैंने उन्हें कभी किसी काम को टालते नहीं देखा. ( माँ कभी कभी मजे से टाल देती थीं , सिवाय पुस्तक, पत्रिका, समाचार पत्र पढने को ) हर समय उर्जा और उत्साह से भरे होते थे. मृत्यु से तीन महीने पहले तक मेरे पास थे. सुबह शाम इतना तेज चलते हुए सैर करते थे कि सब लोग देखकर दंग रह जाते थे. छोटे छोटे बच्चे अपने अपने गेट पर खड़े होकर उनकी प्रतीक्षा करते थे. वे एक दूसरे की भाषा नहीं समझते थे. किन्तु बच्चे उन्हें नमस्कार करने को खड़े रहते थे.
उनकी मृत्यु से तीन महीने पहले मैंने उन्हें कहीं पांच किलोमीटर दूर पैदल चलकर अपने साथ घूमने जाने को कहा तो वे उसी क्षण चल पड़े.
पिताजी को उनके भगवान, माँ के प्रति अद्भुत अकूत प्रेम, उनके उद्यम, उनकी निडरता से अलग करके नहीं देख सकती.
जाने से एक माह पूर्व मेरी उपस्थिति में ही उन्हें मृत्यु का आभास हो गया था. या उनके शब्दों में काल उन्हें एक महीने का नोटिस दे गया था.
उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या तुम माँ का ध्यान रखोगी , उन्हें अपने साथ रखोगी और भाई के पास से ले जाती , लाती रहोगी. मेरे हाँ कहने के बाद उन्होंने बस मुझे अपने परिवार और बच्चियों का ध्यान रखने को कहा और उसके बाद एक भी बार संसार की समस्याओं के बारे में नहीं सोचा.
उस एक महीने उन्होंने लगातार केवल राम नाम ही जपा. हाथ से माला ले लेने पर वे उँगलियों पर काल्पनिक माला जपते रहे. अपनी अन्य दैनिक पूजा, आराधना को शायद बिस्तर पर होने के कारण छोड़ दिया. या शायद वे अपने हिस्से की कर चुके थे. कोई मिलने आता तो मुस्करा कर हाथ जोड़ देते. और फिर अपने जाप में लग जाते. भाई के प्रति उनका स्नेह ही उनका अंतिम सांसारिक लगाव रह गया था.
उन्हें न भोजन, न पानी , न दवा में रूचि रह गयी थी. न उन्हें कोई कष्ट था, न पीड़ा. डॉक्टर ने उनपर कोई जबरदस्ती न खिलाने न, दवा की जिद करने को कहा था. उनका कहना था कि उनके organs और शरीर धीरे धीरे बंद हो रहे हैं, बस उनके आराम का ध्यान रखना है.
जब भी उनके अंतिम दिनों को याद करती हूँ तो लगता है उनका जपा यह मन्त्र उनपर फलीभूत हुआ. बिलकुल जैसे फल पकने पर अपनी शाखा से अलग हो जाता है वे प्राणों/ जीवन/ शरीर से अलग हो गए.
ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे
सुगन्धिम् पुष्टिवर्धनम् .
उर्वारुकमिव बन्धनान्
मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्.
रात एक बजे उनके पूरी शक्ति से बिलकुल स्पष्ट अंतिम शब्द थे , हे राम !
पापा, हमारे लिए भी जपा था न!
जन्मदिन की शुभकामनाएँ पिताजी! आपको बहुत बहुत प्यार. आपके लिए कभी नहीं रोई. कोई कारण ही नहीं था या है. जैसा स्वच्छ , स्वस्थ, कार्यशील , विवेकपूर्ण , आनन्दमय जीवन आपने जिया, विरले ही जी सकते हैं. आपके पास कितना कम धन था और कितना अधिक आनन्द था.
आपके लिए ही निर्वाण षट्कम में 'चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम्' कहा गया होगा.
वैसे मैं सदा आपके साथ शिव को ही जोडती थी. मुझे बचपन भर लगता था वे आपके मित्र हैं. किन्तु आप अंत समय राम जपते रहे.
एक और बात सदा कुछ भी अच्छा, बहुत स्वाद खाते, बहुत अच्छा पहनते, जीते समय याद आती है. आप सदा कहते थे, 'तुमने खा लिया, मेरा पेट भर गया. ' आशा है आप सदा की तरह तृप्त होंगे. चाहे भूमि के कणों में, चाहे वायु में, चाहे आकाश में या अपने प्रिय पेड़ पौधों, हरियाली में या यदि कोई राम है तो उसके पास या किसी संसार की वृहत चेतना में बहते हुए. साथ में मेरा स्नेह भी बहता होगा पापा. Love you.
घुघूती बासूती

Saturday, November 07, 2020

जिसके भीतर जो होगा वही बाहर निकलेगा।

यह बात हम हर समय देखते हैं। सबसे अधिक तब जब व्यक्ति को चोट लगे, बहुत पीड़ा हो। हमारे बचपन में हम ऐसे में हे राम, उई माँ, कुमाँऊनी में ओ इजा (माँ), ओ बौज्यू (पिता) सुनते थे। आजकल शिट, फ़... सुनते हैं।

स्कूली दिनों में एक बार बहुत कष्ट में हस्पताल के एमर्जेंसी वार्ड में रहना पड़ा था। एक व्यक्ति भद्दी गालियाँ दे रहा था, चीख चीख कर। सारा कमरा उसकी गालियों से गूँजायमान रहता था। एक बार उसने एक डॉक्टर को झन्नाटेदार थप्पड़ भी मारा जो सबको सुनाई दिया। मैंने डॉक्टर से इस विषय में पूछा तो उसने कहा कि वह एक सड़क दुर्घटना में घायल है। बचने की आशा नहीं है। बहुत दर्द है, इसलिए ऐसा कर रहा है। यह सामान्य है।


परिवार में मैंने तब तक कभी अपशब्द नहीं सुने थे। किन्तु मस्तिष्क में बैठ गया कि अति कष्ट में अपशब्द निकलना सामान्य है। एक भय भी कि कभी मैं भी ऐसा करूँगी।


तीन चार साल बाद पिताजी को स्ट्रेन्ग्युलेटेड हर्निया में दर्द से तड़पते हुए देखा, उन्हें रिक्शे में लाद हस्पताल ले गई। दर्द असह्य होने पर वे रिक्शे से उतर जमीन पर लेट तड़पने लगे। मृत्यु भूमि पर आए शायद और भूमि पर तड़पन अधिक सुविधाजनक था। मुझे भय था कि अब गालियाँ बरसेंगी किन्तु वे हे राम और ओ इजा, ओ बौज्यू ही कहते रहे। जब तक  डॉक्टर ने हर्निया को ठीक नहीं किया वे राम और माता पिता को ही गुहार लगाते रहे।


जब बेटियों का जन्म होना था तो मुझे फिर भय था कि प्रसव पीड़ा में कहीं मुँह से गालियाँ ना बरसें। किन्तु ऐसा नहीं हुआ।
फिर कितने ही औपरेशन हुए, हर्निया हुआ, हर बार होश में आने पर पति से यही पूछा कि मैं बेहोशी में क्या बड़बड़ा रही थी। अपशब्द कभी नहीं थे।  


पिताजी ने पूरी शक्ति से हे राम कहकर प्राण त्यागे।


सो कष्ट और अपशब्दों का सम्बन्ध हमारे भीतर क्या है से है ना कि पीड़ा से।

किन्तु अब बाहर, घर परिवार सब जगह ये ही शब्द सुनाई देते हैं। कोई इसे बुरा नहीं समझता, यदि समझता होता तो इसका इलाज करता। इलाज बहुत कठिन नहीं है। जिन शब्दों को हम बोल रहे हैं उनको कल्पना में देखो, सूँघो महसूस करो। शायद बोलने का मन ना करे।


राम या भगवान की जगह नास्तिक कुछ अन्य शब्द बोल सकते हैं, माँ, पिता, गुलाब, कमल, कार्ल मार्क्स, माओ, अमेरिका, चीन या कुछ भी। वे सब शिट और फ़... से तो बेहतर ही होंगे अपने भीतर संजोने को।


घुघूती बासूती

Monday, May 07, 2018

एक सपने की हत्या

कुछ मैंने की, कुछ तूने की
कुछ मिलकर हम दोनों ने की
इक सपने की हमने हत्या की ।

समझौतों का ये जीवन जीया
मिलकर गरल कुछ हमने पीया
जो करना था वह हमने न किया ।

थोड़ी तूने, थोड़ी मैंने ये दूरी बनाई
मिलकर हमने थी जो सेज सजाई
उसके बीचों बीच ये दीवार बनाई ।

कुछ तू ना समझा कुछ मैं न समझी
बातों बातों में कब जिन्दगी ही उलझी
मिल हमें जो सुलझानी थी ना सुलझी ।

अपनी अलग अलग राहें चुन लीं
मन की हमने ना बातें सुन लीं
अंधेरी हमने अपनी राहें कर लीं ।

कुछ तू आता कुछ मैं आती पास तेरे
मन से जो सुनता मन के बोल मेरे
मैं जीती तेरे लिये तू जीता लिये मेरे ।

पर ऐसा कभी कुछ भी हो ना सका
थोड़ा मैं थी थकी थोड़ा तू था थका
जीवन हमें कितना कुछ दे न सका ।

ध्येय हमारा हरदम इक ही था
संग जीना और संग मरना था
फिर सपने को क्यों यूँ मरना था ।

अब आ मिल कुछ संताप करें
सपने के मरने का विलाप करें
हम दोनों मिल पश्चात्ताप करें ।

घुघूती बासूती