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Friday, May 07, 2010

क्या किसी के कहने से मैं अपनी कलम का रुख बदल दूँ?.......................घुघूती बासूती

परसों की मेरी पोस्ट पर एक युवा मित्र ने मुझे सुझाव दिया है कि मैं अपनी कलम का रुख बदल दूँ। उनका कहना है कि स्त्रियों को लेकर मेरी कलम एक तरफ ही चलती है। उनका सुझाव है कि मुझे स्त्रियों के शरीर को अधिक ढकने के लिए कुछ करना चाहिए। गर्मी की भरी दुपहरी उनके शरीर का पूरा ढका न होना मित्र को कष्टप्रद लगता है। यदि वे अपने शरीर को गरीबी के कारण नहीं ढक पा रहीं तो यह चिन्ता का विषय है किन्तु यह चिन्ता सर्दियों में अधिक सही होगी। यदि यह उनकी पसन्द का मामला है तो मैं इस 'स्त्री को अधिकाधिक वस्त्र पहनाओ' आन्दोलन से नहीं जुड़ सकती। मेरे लिए यह महत्वपूर्ण तो क्या कोई मुद्दा ही नहीं है। मुद्दे ही ढूँढने हैं तो और ढेरों हैं।

एक और बात, मैं न तो धर्म( religion) के अनुसार चलती हूँ , न मैं कोई काम आँख मूँदकर इसलिए करती हूँ कि कोई संस्कृति यह कहती है। यदि मैं किसी बात को ठीक समझती हूँ तो अवश्य करती हूँ, यदि मेरा कोई प्रिय मुझसे कुछ करवाना चाहे तो यदि उससे मेरे किसी विश्वास या नैतिकता पर आँच नहीं आती तो मैं कर लेती हूँ। जिस संस्कृति का मुझपर थोड़ा बहुत प्रभाव पड़ा है उस संस्कृति में कपड़े केवल कपड़े होते हैं, अच्छाई या नैतिकता या धर्म का कोई तमगा नहीं। इसके अनुसार सब लोग, कबीले आदि अपनी सुविधानुसार, अपने प्रदेश के जलवायु व जीवनोपार्जन के साधनों के अनुसार कपड़े पहनते हैं या कम से कम पहनते थे। वे कपड़े किसी दूर देश जन्मे किसी नैतिकता या धर्म का दर्शन सिखाने वाले के कहे अनुसार नहीं पहनते थे। अब आज यह चलन हो गया है कि सब लोग किसी एकदम अलग जलवायु, वातावरण, परिस्थितियों व जीवनोपार्जन के बिल्कुल अलग साधनों वाले देश में बने सदियों पहले के नियमों का कड़ाई से पालन करें तो मैं इस लड़ाई में विरोधी दल में ही रहूँगी। मुझसे सहायता की अपेक्षा न करें।

मैं जहाँ से आती हूँ याने उत्तराखंड, वहाँ स्त्रियाँ किसी गुड़िया की तरह लपेटकर अलमारी में नहीं सजाई जातीं। वे कठिन काम करती हैं। वे अपनी भैंसों के लिए जंगलों में घास काटती हैं, पेड़ों पर चढ़कर पत्ते तोड़ती या काटती हैं, खेतों में काम करती हैं, नौले(स्रोत)या नदी की धारा से पानी भरकर लाती हैं, दूध दुहती हैं, गोबर को खाद के गड्ढे में सम्भालती हैं,भैंस को नहलाती हैं,धान कूटती हैं,घर को गोबर से लीपती हैं। अब ये सब काम तो ऐसे नहीं हैं कि स्त्री ढेरों कपड़ों में लिपट कर करे। जैसे महाराष्ट्र में स्त्रियाँ लाँघ वाली साड़ी पहनकर ढेरों काम करती थीं (व हैं),इस बात से बेखबर कि उनकी टाँगों की पिंडलियाँ दिख रही हैं। जैसे मेरी कामवाली काम पर आते से ही साड़ी ऐसे खोंस लेती है कि वह घुटनों के ऊपर ही रह जाती है।
उत्तराखंड में सदियों से मेरे पूर्वज, स्त्री व पुरुष पूर्वज, एक धोती में खाना बनाते भी थे और खाते भी थे। खाना बनाने वाली घर की ही कोई स्त्री, बहू, माँ, भाभी,सास होती थी व जिन्हें वे खाना थाली में डालकर देती थीं वे उस घर के पुरुष भी होते थे जो ससुर, जेठ या देवर भी हो सकते थे। अब वे एक दूसरे को कितना घूर घूर कर देखते थे व एक दूसरे को नजरों में ही कितना नापते थे यह तो मैं नहीं जानती। किसके कितने अंग दिख रहे हैं या बिना अन्तःवस्त्रों(एक नान धोत अर्थात छोटी सी धोती अन्दर से तौलिए की तरह और लपेट ली जाती थी। ) के कितना अनुमान लगाया जा सकता है, इस कार्यक्रम से मैं बिल्कुल अनभिज्ञ हूँ। परन्तु वहाँ अराजकता थी या इतना नैतिक पतन हुआ कि लोग धरातल में चले गए ऐसा मैंने नहीं सुना। हाँ, यह अवश्य देखा है कि उस वातावरण में रही केवल दो कक्षा स्कूली शिक्षा पाई मेरी माँ के लिए हमारे कपड़े कभी भी मुद्दा नहीं बने और आज ८७ वर्ष की उम्र में भी नहीं हैं। उनकी अपेक्षा कुछ युवा मित्र वस्त्रों को लेकर यूँ चिन्तित हैं जैसे वस्त्र के लिए मनुष्य बना हो, वस्त्र मनुष्य के लिए नहीं। याद रहे कि इन्हीं स्त्रियों में इतना साहस था कि इन्होंने चिपको आन्दोलन चलाया था।

मेरी झारखंड में रहने वाली बंगला सहेली मीना की माँ भी गर्मियों भर ब्लाउज नहीं पहनती थी। वैसे वे कोई आदिवासी नहीं बंगला ब्राह्मण थीं। शायद बिगड़ने को वे कॉलेज तो क्या स्कूल भी नहीं गईं थीं। उड़ीसा , बंगाल, मध्य प्रदेश, झारखंड व सारे आदिवासी इलाकों में स्त्रियाँ कम से कम गर्मियों भर तो केवल एक धोती में रहती थीं। ब्लाउज नामक वस्त्र नहीं पहनती थीं। मुझे याद है कि एक युवा इन्जीनियर के माता पिता मध्य प्रदेश से आए। हम बच्चे यह देखकर दंग रह गए कि उच्च वर्ग की उनकी माताजी केवल धोती पहनती थीं पेटीकोट नहीं। तब माँ ने बताया था कि सन १९४३ के आस पास जब वे कटनी क्षेत्र में रही थीं तो अधिकाँश स्त्रियाँ ब्लाउज भी नहीं पहनती थीं। हो सकता है कि पेटीकोट भारतीय मूल का वस्त्र ही न हो। शायद हम अनसिले कपड़े ही पसन्द करते हों।

शायद इसीलिए मेरी जानकारी के अनुसार भारत में दर्जी कोई जाति ही नहीं है। जबकि राम के जमाने से ही रजक याने धोबी रहे हैं। हमारी संस्कृति में बहुत खुलापन था और हमें उस पर गर्व होना चाहिए। आप यदि १७०० या १८०० सन को भारतीय संस्कृति मानते हैं तो क्यों नहीं पीछे जाते? क्यों नहीं उस समय पर जाते जब भारत में विदेशी हमलावर नहीं आए थे? यदि समस्या है कि कितना पीछे जाएँ तो जाने दीजिए। चलिए आगे बढ़िए और जियो और जीने दो।


अब आप चाहें कि किसी सुदूर देश में बने कायदे कानून हम इसलिए मानें कि कुछ सदियों तक उन नियमों को मानने वालों ने हम पर शासन किया और उनके साथ रहने वाले शहरी लोग उनकी नकल कर स्वयं को भी शासक वर्ग से जोड़ने लगे तो मेरे लिए यह सम्भव नहीं है। मैं नकल भी तभी करूँगी और करती हूँ भी जब मुझे वह व्यवहार, वस्त्र आदि या तो सुविधाजनक लगें या भाएँ। यह कैसे सम्भव होगा कि इस कृषिप्रधान देश की, गाय भैंस पालने वाली स्त्रियाँ उनके वस्त्र पहनें जहाँ लीपने को कोई मिट्टी का फर्श तो क्या मिट्टी ही नहीं थी,लीपने को गोबर नहीं था, चढ़ने को पेड़ ही नहीं थे,काटने को घास ही नहीं थी,भरने को पानी भी कितना रहा होगा, कह नहीं सकती। कैसे तो वे जीते होंगे? शायद दूसरों के देशों पर कब्जा जमाकर या पता नहीं कैसे। किन्तु उनका रहनसहन, उनके मूल्य मैं क्यों अपनाऊँ। या फिर मैं उन विक्टोरियन मूल्यों या वस्त्रों को क्यों अपनाऊँ जो कभी यहाँ का नया शासक वर्ग पहनता था या जीता था। तब जब वे मेरी पसन्द भी न हों।

आप पूछेंगे कि फिर पश्चिम के वस्त्र व मूल्य क्यों अपनाने को तैयार हूँ? मेरी इच्छा। वैसे यहाँ एक बात साफ हो जानी चाहिए कि ये वस्त्र व विचार आज के पश्चिम के हैं, आज से एक हजार या पन्द्रह सौ वर्ष पहले के नहीं। शायद मुझे पसन्द हैं, शायद सुविधाजनक लगते हैं, शायद पश्चिम से हमने बहुत कुछ सीखा है, शायद आज पश्चिम व हमारे विचार कुछ मिलते जुलते हैं, शायद पश्चिम मुझे प्रगतिशील लगता है, शायद हमारे पुरुष भी पश्चिमी वस्त्र पहनते हैं। कारण जो भी हों यदि मेरे चुने हुए हैं, मुझ पर थोपे नहीं गए हैं तो किसी को क्या कष्ट? वैसे आप क्या जानें कि मैं क्या पहनती हूँ? और यह आपकी चिन्ता का विषय भी क्यों होए?

भारत की गर्मियों में पुरुष का कोट पहनना या सूट पहनना विचित्र लगता है। परन्तु उसे लगता है कि वह उसे पहन कर जँच रहा है सो पहनता है, नित्य नहीं तो विशेष अवसरों में। परन्तु वही पुरुष अवसर मिलते से ही या ए सी से दूर होते से ही कोट को उतार फेंकता है। कारण,यह सर्दियों को छोड़कर हमारे जलवायु के अनुकूल नहीं है। ठीक वही हाल स्त्री को पूरा ढकने वाले धार्मिक आस्थाओं वाले वस्त्रों का है। मजबूरी के अतिरिक्त शायद ही कोई शौक से उसे घर में पहनकर बैठती होगी या आराम करती होगी। इन वस्त्रों की भी समय, स्थान व परिस्थितियों के अनुसार उपयोगिता होगी ही। मुझे याद है मैंने जीवन के तीन वर्ष एक मरुस्थल में बिताए थे। एक दो बार जब रेत की आँधी चली तो मुझे भी अपनी साड़ी के आँचल से अपना चेहरा तक ढकना पड़ा। इससे मेरी आँखों में रेत नहीं गई और मेरे बाल भी रेत से बच गए। यह तब जब हमारे घर में दिन रात पानी आने की व्यवस्था थी क्योंकि समुद्री पानी से खारापन निकालकर पानी चौबीसों घंटे मिलता था। सोचिए कि आज से हजार, पन्द्रह सौ साल पहले पानी की भी कमी होगी और सुविधाओं की भी। शायद तब सिर ढकने से लम्बे समय तक सिर धोने से बचा जा सकता हो। अन्यथा रेत की आँधी झेलने के बाद सिर धोने के लिए अमूल्य पानी खर्च करना पड़ता। तो यह उस स्थान की, उस युग की मजबूरी रही होगी। स्त्री व पुरुष का अपने वस्त्रों के ऊपर एक और लबादा पहनना भी अपने वस्त्रों को बचाने का एक व्यवहारिक उपाय था। किन्तु आज भारत में रहकर, यहाँ की गर्मी में अपने को पकाने को मैं तो कतई तैयार नहीं हूँ,न धर्म के लिए, न संस्कृति के लिए न किसी अन्य कारण से।

जहाँ तक धर्म की या भगवान की ऐसी किसी इच्छा का प्रश्न है तो एक तो मैं धार्मिक नहीं उसपर जिस धर्म में मैं जन्मी उसमें ऐसी किसी बात का जिक्र नहीं है। होता भी तो कोई अन्तर नहीं पड़ता। फिर मैं क्यों किन्हीं अन्य परिस्थितियों, अन्य काल, अन्य स्थान में जन्मे किसी धर्म से यूँ प्रभावित होऊँ कि सबकुछ छोड़ छाड़कर वस्त्रों के पीछे डंडा लेकर चल पड़ूँ? जो भगवान को मानते हैं व उसकी शक्ति में विश्वास करते हैं वे यह भी समझ सकते हैं कि यदि वह वही है जैसा वे मानते हैं तो उसमें इतनी शक्ति तो होती ही कि जिसे वह कपड़ों में ममी की तरह लपेटना चाहता उसे अधिक नहीं तो कम से कम फर से तो ढक ही देता!यह वह कुत्ते, बिल्ली, शेर, चूहे आदि के लिए कर सकता था तो मानवी के लिए क्यों नहीं? वैसे तो वह सर्व शक्तिमान उसे लबादे में भी जन्म दे सकता था। या फिर लबादा उतारते से ही मौत के घाट उतार सकता था।

तो भाई मेरे, यह समस्या ईश्वर की नहीं है। यह समस्या आपकी आँखों की है। अब यदि सूरज की किरणों से आप परेशान होते हैं तो धूप का चश्मा कौन पहनता है? आप ना? सूरज को तो न आप ढक सकते हैं न नष्ट कर पाते हैं, सो अपनी आँखों को चौंधियाने से बचाने को स्वयं ही कुछ उपकरण पहन लेते हैं। आप तो पुरुष हैं,सामर्थ्यवान हैं, क्यों नही ऐसा कुछ खोज लेते जिसको पहन आपको सब नारियाँ कपड़ों में लिपटी नजर आएँ। आपकी समस्या भी हल हो जाएगी और स्त्री की भी।

यहाँ एक युवती की हत्या हो गई।(यदि आत्महत्या भी हुई तो भी वे क्या कारण थे कि एक स्त्री जो विवाह रचाना चाहती थी, जो सन्तान को जन्म देना चाहती थी वह स्वयं मृत्यु को गले लगा ले? ) हत्या भी केवल और केवल सम्मान या कहिए झूठी प्रतिष्ठा के लिए और आप हैं कि कपड़ों के पीछे पड़े हैं, स्त्री कितनी ढकी है इसके लिए चिन्तित हैं। मुझे याद है कि बहुत पहले मैंने कहा था कि यदि स्त्री को जला भी दिया गया हो और वह मर रही हो, पीड़ा से यहाँ वहाँ भाग रही हो, तो भी समाज के ठेकेदार कहेंगे कि जरा यूँ उकड़ू हो बैठ जल कि तेरा शरीर हमें उत्तेजित न करे। अब और क्या कहूँ? यदि अपने पिता और अपने युग के पुरुषों से हताशा थी तो अब अपने बच्चों से भी कम उम्र के पुरुषों से और भी अधिक हताशा है। इन्हें हमसे अधिक महत्वपूर्ण हमारे कपड़े लगते हैं। हम जिएँ या मरें, हमारे कपड़े सही ढंग से हमें ढक रहे हों, बस यह इनकी चिन्ता है। क्या यदि हम जलते मकान से कम वस्त्रों में बाहर निकलेंगी तो ये हमें और वस्त्र पहनकर आने को वापिस जलते मकान में धकेल देंगे? हमें इन्हें यह अधिकार कदापि नहीं देना है। हमें जीना है और अपने मूल्यों पर जीना है, अपने लिए जीना है।


घुघूती बासूती