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Friday, June 08, 2012

पाँच पैसे का सिक्का..........................घुघूती बासूती




पिछली बार आपने कब 'पाँच पैसे का सिक्का' देकर कुछ खरीदा था? खरीदना तो छोड़िए, पिछली बार आपने कब 'पाँच पैसे का सिक्का' देखा था? कठिन है ना याद करना ! बहुत से तो ऐसे होंगे जो सोच भी नहीं सकते कि किसी युग में पाँच पैसे में अच्छी खासी नामी कम्पनी की टॉफी मिल जाती थी, या पाँच पैसे में अन्तर्देशीय पत्र मिलता था।

आज माँ के मुँह से 'वहाँ मेज पर एक पाँच पैसे का सिक्का पड़ा है' सुनकर विचित्र लगा। पाँच पैसे का सिक्का मेज पर कैसे आया? उनका स्थान तो मेरा पुराने सिक्कों वाला डब्बा है जो किसी सिक्का इकट्ठा करने की शौकीन नतिनी या नाती या किसी बच्चे को मिलेगा। मैं अचम्भित थी तभी याद आया कि मेज पर एक पाँच रुपए का सिक्का पड़ा है।

मैंने पूछा, 'पीले रंग का है ना?'
वे बोली, 'हाँ।'
मैंने कहा, 'माँ, वह पाँच रुपए का सिक्का है।'
वे बोली, 'ओह।'

कुछ देर को मैं उस भविष्य में खो गई जब पचास रुपए का, या यूँ ही रुपए का मूल्य गिरता गया तो शायद पाँच सौ का सिक्का यहाँ वहाँ मेज पर पड़ा होगा और मैं लाठी हाथ में लिए बिटिया से बोल रही होऊँगी बेटा एक पाँच रुपए का सिक्का मेज पर पड़ा है और वह सोचेगी कि ऐसे सिक्के तो उसके या उसकी संतान के कॉइन कलैक्शन में पाए जाते हैं, मेज पर नहीं। मेरे मन में, शायद अवचेतन में ही सही तब 'पाँच रुपए का सिक्का' कुछ वही कीमत रखेगा जो माँ के अवचेतन या बिना सोचे समझे पलों में पाँच पैसे का सिक्का!

वे अपने कमरे में चली गईं और मैं भूत, वर्तमान व भविष्य के बारे में सोचती रह गई। माँ का भूत व वर्तमान मेरे भविष्य में गडमड हुआ जा रहा था। मैं भी उनके कमरे में चली गई ताकि एक बार फिर उनसे 'एक पैसे की चार जलेबी जिनके ऊपर दही डला होता था' वाली बात सुन सकूँ।

वे तब छोटी थीं, बारह साल से पहले की कोई भी उम्र रही होगी याने १९३५ से कभी पहले की बात है। बारह साल में उनका विवाह हुआ था। नानी को दमा रहता था। जिस दिन दमे के कारण सुबह सुबह सब बच्चों, देवरों के लिए नाश्ता न बना पातीं तो बच्चों को एक एक पैसा देतीं। हलवाई की दुकान से बच्चे 'एक पैसे की चार जलेबी जिनके ऊपर दही डला होता था' लाते। वह खाने के बाद नानी गरम दूध पीने को देतीं। दही व दूध का यह मेल मुझे समझ तो नहीं आता किन्तु मुझे तो अपने बचपन में नित जलेबी खाने का औचित्य भी नहीं समझ आता।

बचपन में यह किस्सा सुन मैं माँ से कहती कि उनके स्थान पर मैं होती तो रसोई के बाहर बच्चों ( या शायद बच्चियों)के लिए जो चूल्हा बना होता था उसमें ही मैं तो अवश्य अपने लिए व अन्य बच्चों के लिए कुछ बना लेती। रसोई में बनाना तो मना था क्योंकि छुआछूत जो मानी जाती थी। किन्तु माँ के शब्दों में मैं व भाई, हम बच्चे थे ही कब, हम तो बूढ़े पैदा हुए थे। हुड़दंग जो नहीं मचाते थे। या शायद इसलिए कि 'चार जलेबी जिनके ऊपर दही डला होता था' खरीदकर नहीं खाते थे।

जिसने एक पैसे की चार जलेबी खाईं हों उसके लिए पाँच पैसे बीस जलेबियों के बराबर हैं। एक किलो में शायद बीस या बाइस जलेबियाँ आती हैं और शायद आज जलेबियाँ सौ रुपए किलो मिलती होंगी। तो हुए न उनकी नजरों में पाँच पैसे आज के सौ रुपए के नोट के बराबर ! वे मेरे कमरे में 'पाँच पैसे का सिक्का पड़ा है' कहने पर मेरे जाकर उसे सम्भालने की आशा करें तो क्या आश्चर्य?

घुघूती बासूती