बुधवार, अगस्त 29, 2007

मैं समझ गई



मैं समझ गई मित्र मेरे
कैसे जुड़े ये अपने तार
कैसे हुआ मन को प्यार
तू समझ गया मेरा सार
मैं नही् बोली कभी आभार
कुछ बात हुई तेरी मेरी
हल्का हुआ मन का भार
पल भर को तूने देखा
मैंने तो मुड़कर ना देखा
तेरा चेहरा भी याद नहीं
मेरा चेहरा तू भूल गया
याद तो इक एहसास रहा
ना तेरा मेरा इतिहास रहा
तू चला गया अपनी राहों पर
मैं किंकर्तव्यविमूढ़ चौराहे पर
जिस तरफ भी जाऊँ धोखा है
तूने भी कभी ना मुझे रोका है
लौटूँ तो किस ओर मुड़ूँ
जीवन से मैं कैसे जुड़ूँ
सपने सच तो हो न सके,
सच को ही सपना बनाया है
अपने तो अपने हो न सके
अब गैरों को अपना बनाया है
साथी अपना कोई हो न सका
अब राहों को साथी बनाया है
साथी राहों में मिल ना सका
अपने तो खो गए अतीत में
अब अतीत को अपना बनाया है
हाथों से तुझको छू न सकी
तेरी परछाई को ही मैंने छूआ है
चाहा पर तुझसे ना खेल सकी
खेला हरदिन मैंने केवल जूआ है ।
घुघूती बासूती

शनिवार, अगस्त 25, 2007

क्या हम कभी नहीं सुधरेंगे ?

क्या हम कभी नहीं सुधरेंगे ?
बच्चों को विग्यान पढ़ाती हूँ तो यह भी पढ़ाती हूँ कि मनुष्य क्यों सबसे श्रेष्ठ प्राणी
है । जानती हूँ कि यह सरासर झूठ है, किन्तु पढ़ाना पढ़ता है । कहती हूँ कि हम
दो पैरों पर चलते हैं इसलिये हमारे हाथ काम करने के लिए खाली रहते हैं । इन्हीं
हाथों से हम लिख पाते हैं , औजार उपयोग कर सकते हैं । हमारा मस्तिष्क सबसे अधिक विकसित है । हम कल्पना कर सकते हैं , रचना कर सकते हैं । यह नहीं
बताती कि इन्हीं हा्थों व मस्तिष्क के बल पर हम जहाँ मन चाहे वहाँ तबाही फैला
देते हैं ।
हैदराबाद में अपने घर के लोगों , प्रिय जनों से फोन पर पूछकर कि वे ठीक हैं, चैन की साँस लेती हूँ । जानती हूँ कि जो मरे उन्हें भी नहीं मरना चाहिये था , कि वे भी
किसी के सगे सम्बन्धी हैं । किन्तु हर बार जब मरने वाला या घायल हम या
हमारे प्रिय नहीं होते तो हम केवल अफसोस करके घटना को भूल जाते हैं ।
कब तक हम एक दूसरे को यूँ मारते रहेंगे? क्या कोई यह नहीं सोचता कि एक
बच्चे को पैदा करने , बड़ा करने में माता पिता की कितनी मेहनत व प्यार लगता है ? जिस भी मनुष्य को हम मार रहे हैं वह किसी के जीवन का आधार है ।
कब तक यह होता रहेगा ? कोई तो मनुष्य को थोड़ा कम मानविक बनाए और अधिक पाशविक बनाए । क्योंकि पशु कभी इतने लोगों, अन्य पशुओं को, सामूहिक व योजनाबद्ध तरीके से नहीं मारते । वे मारते हैं तो केवल अपनी जठराग्नि मिटाने को, ना कि कोई खुन्दक निकालने या किसी अन्य कारण से ।
मैं तो बस उस दिन की प्रतीक्षा में हूँ जब मनुष्य थोड़ा कम मानव रह जायेगा । शायद तब ही हम में कुछ सुधार भी आएगा ।
घुघूती बासूती

गुरुवार, अगस्त 23, 2007

तेरी खुशबू


तेरी खुशबू मुझमें
कुछ यूँ बसी है कि
मोंगरे की कलियाँ
जानती हैं नाम तुम्हारा
जब मैं उन्हें सूँघती हूँ
वे मुझमें तेरा नाम
सूँघ लेती हैं।

घुघूती बासूती

सोमवार, अगस्त 20, 2007

किशोर मन



खेल रहे सब बच्चे कंचे, क्यों ना जाकर उनसे खेलूँ मैं
गुड़िया ले घर घर खेल, क्यों ना सखियों संग खेलूँ मैं
क्यों ना छोड़ मोटी पोथी को, कुछ कॉमिक पढ़ डालूँ मैं
पिक्चर जा रही सब सखियाँ, क्यों ना उन संग जाऊँ मैं
आज नहीं घर में कोई, क्यों माँ की साड़ी ना पहनूँ मैं
पहन आभूषण सुन्दर , क्यों नवयौवना ना बन जाऊँ मैं
पहन ऊँची एड़ी की सैन्डल, क्यों ना बड़ी बन जाऊँ मैं
नित देखता रहता है मोहन, क्यों राधा ना बन जाऊँ मैं
लगा आँखों में काजल सुरमा, क्यों ना स्वप्न सजाऊँ मैं
हृदय की नई धड़कन को, क्यों बेकाबू ना हो जाने दूँ मैं
आज बना बालों का जूड़ा, क्यों न उसमें फूल लगाऊँ मैं
सुन मधुर गानों की धुन, क्यों न उनपर पैर थिरकाऊँ मैं
ले गिटार सामने वाले लड़के का, क्यों न संग बजाऊँ मैं
आ रहे कार्टून टी वी पर, क्यों न आसन वहीं जमाऊँ मैं ?

जाग जाग ओ पागल लड़की ! उठ छोड़ जीवन का सब रस
रसायनशास्त्र की हर रिएक्शन रट, न्युमेरिकल कर ले बस
छोड़ दे धुनें गिटार की, भौतिकी में ध्वनि को पढ़ लेना तुम
सुन ना हृदय की धड़कन अब, श्वसनतंत्र को पढ़ लेना तुम
जोड़ ना इस मन को किसी से, बीजगणित पढ़ लेना तुम।

माँ, बाबा तुम लौट आए हो, जल्दी से खाना मुझे दे दो तुम
बारह बजे तक मुझे पढ़ना है, ग्यारह बजे कॉफी दे देना तुम
बाबा, पाँच बजे का अलार्म लगा है, भूल ना जाना उठाना तुम ।

घुघूती बासूती
१९.८.२००७

शनिवार, अगस्त 18, 2007

तुम पूछते हो

तुम पूछते हो , कि मैं क्यों नहीं विचलित होती
जब मुझे कुछ करने से स्वयं को रोकना पड़ता है
जब मुझे स्वयं अपने पर लगाम लगानी पड़ती है
जब मैं कहती हूँ पल पल नहीं संभव यह या वह
तुम कहते हो मैं तो बहुत परेशान हो जाता हूँ जब
अपने मन जी ना सकूँ मैं, निर्णय ना ले सकूँ जब
तुम भूल जाते हो, मुझमें और तुममें है यह अन्तर
तुम युगों युगों से रहे हो अपने तन मन के मालिक
मैं युगों से जीती आई हूँ पहन अपने ही ये बन्धन
आज तुम और मैं ,मैं और तुम बिल्कुल हैं बराबर
किन्तु बेड़ियों के चिन्ह यूँ ही तो ना मिट जाएँगे
इतने गहरे पड़े हैं हृदय में ये चिन्ह कि मीत मेरे
तुझे भी मुझ संग लग इनको रगड़ छुटाना होगा
यदि चाह है तुझे इक बराबर के मुक्त साथी की
तो कानूनों से बाहर निकल लगा प्रहार बेड़ी पर
ला अपने व अपने इस समाज में कुछ परिवर्तन
उड़ने दे मुझे भी अपने सी मुक्त असीम गगन में
ना काट पर मेरे, खींच मत अदृष्य ये लक्ष्मण रेखा
फिर देख जीवन कैसे खिलखिलाता व मुस्कराता है
देख कैसे बिन बाँध नदिया मतवाली बन बहती है
ऐसा संगीत गूँजेगा कि जड़ सब चेतन हो जाएगी
तब देखना प्रकृति कैसे हँस तुझसे मिलने आएगी ।
घुघूती बासूती
१७.८.२००७

बुधवार, अगस्त 15, 2007

ब्लॉगवाणी में अपने ब्लॉग को लेकर मैं धर्मसंकट में

सबसे पहले तो आप सबको स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ !
ब्लॉगवाणी में अपना ब्लॉग देखकर मैं धर्मसंकट में पड़ जाती हूँ । वहाँ एक काउंटर है जो बताता है कि कितने लोगों ने आपका चिट्ठा पसन्द किया है । जब कोई और इस काउंटर को आगे नहीं सरकाता तो समस्या गम्भीर हो जाती है । अब क्या किया जाए ? स्वयं अपने काउंटर को आगे बढ़ाने का अर्थ है कि मुझे अपना लेख या कविता पसन्द है ? यदि यह ना कहें तो इसका अर्थ है कि मुझे अपना लिखा स्वयं पसन्द नहीं है ।यदि ऐसा है तो मैं औरों से इसे पढ़ने की आशा क्यों करती हूँ ? कम से कम संसार के एक व्यक्ति यानि लेखक या कवि को तो अपनी रचना पसन्द होनी ही चाहिये । यदि ऐसा नहीं है तो वह लिखता ही क्यों है ?
फिर भी मैं देखती हूँ कि बहुत से लेखक वहाँ शून्य को ही रहने देते हैं ।
क्या अपने काउंटर को स्वयं आगे बढ़ाने वाले और न बढ़ाने वाले कुछ अलग प्रकार के प्राणी हैं ?
कई बार लगता है कि मैं सबसे पहला काम सब शून्यों को १ बनाने का ही करूँ । आपकी राय क्या है ? क्या मुझे यह काम दूसरों के बलॉग में करना चाहिये ? या अपने में करना चाहिये?
कुछ अनिर्णय की स्थिति में ,
घुघूती बासूती
१५.०८.२००७

मंगलवार, अगस्त 14, 2007

शब्दों की वापसी

तेरा आना
शब्दों की वापसी है
उन भूले बिसरे शब्दों की वापसी
जिनसे नाता टूट गया था
कैसे कहते लिखते थे ये शब्द
मैं बिल्कुल भूल गई थी
कि शब्दों में छिपे रहते हैं भाव
मैं भूल गई थी
शब्दों में होते थे अर्थ
मैं यह भूल गई थी ।
शब्दों का मिठास
कड़वाहट, खट्टापन
खारा व कसैला स्वाद
ना याद रहा था ।
बस कुछ शब्द ही
रह गए थे शब्दकोष में
‘आओ’ ,’जाओ’,’खाओ’,’नहाओ’
‘नमक अधिक है’
‘बहुत मीठा है’
‘ठंडा है' या 'गरम है’ ;
क्या यह ही सच था
या यह मेरा भ्रम है ?
घुघूती बासूती

सोमवार, अगस्त 13, 2007

एक सपने की हत्या

कुछ मैंने की, कुछ तूने की
कुछ मिलकर हम दोनों ने की
इक सपने की हमने हत्या की ।

समझोतों का ये जीवन जीया
मिलकर गरल कुछ हमने पीया
जो करना था वह हमने न किया ।

थोड़ी तूने, थोड़ी मैंने ये दूरी बनाई
मिलकर हमने थी जो सेज सजाई
उसके बीचों बीच ये दीवार बनाई ।

कुछ तू ना समझा कुछ मैं न समझी
बातों बातों में कब जिन्दगी ही उलझी
मिल हमें जो सुलझानी थी ना सुलझी ।

अपनी अलग अलग राहें चुन लीं
मन की हमने ना बातें सुन लीं
अंधेरी हमने अपनी राहें कर लीं ।

कुछ तू आता कुछ मैं आती पास तेरे
मन से जो सुनता मन के बोल मेरे
मैं जीती तेरे लिये तू जीता लिये मेरे ।

पर ऐसा कभी कुछ भी हो ना सका
थोड़ा मैं थी थकी थोड़ा तू था थका
जीवन हमें कितना कुछ दे न सका ।

ध्येय हमारा हरदम इक ही था
संग जीना और संग मरना था
फिर सपने को क्यों यूँ मरना था ।

अब आ मिल कुछ संताप करें
सपने के मरने का विलाप करें
हम दोनों मिल पश्चात्ताप करें ।

घुघूती बासूती

शुक्रवार, अगस्त 10, 2007

सौराष्ट्र में वर्षा ने की तबाही !वर्षा की तबाही के चित्र व आँकड़े व उसे विदा करने के लिए एक कविता। 1























रुक जाओ
१२ जून को मैंने वर्षा तुम जल्दी आना कविता में उसे आने का न्यौता दिया था । शायद वह मेरा न्यौता मान भी गई और कुछ ऐसी धूम धाम से आई है कि यदि किसी को पता चल जाए कि इसे मैंने बुलाया था तो मेरी खैर नहीं है । वैसे यह बहुत मूडी हो गई है । मेरे २ सप्ताह के दिल्ली प्रवास में एक बूँद भी नहीं बरसी । मेरे वापिस आने का समाचार भी इसे एक सप्ताह बाद मिला । किन्तु जब से मिला है तो हाथ धोकर पीछे पड़ गई है।
अपनी बात की पुष्टि करने के लिए मैं आपको सारे आँकड़े व चित्र दिखाऊँगी । हमारी दशा बहुत खराब हो गई है। सड़कें टूट गई हैं पुल भी काफी टूट फूट गए हैं। महीने भर का राशन रखने वालों का काम तो चल रहा है किन्तु जो रोज खरीदते व खाते हैं उनकी स्थिति खराब है। ये बात और है कि यह गुजरात है व यहाँ ऐसे समय में सहायता करने की परम्परा रही है। सबसे बड़ी बात यह है कि सहायता चाहने वाले स्वयं ही बता देते हैं कि उन्हें क्या चाहिये। प्रशासन भी आमतौर पर उद्योग की सहायता से बहुत मुश्तेदी से काम करता है। दो दिन से अखबार नहीं आया है । स्कूल सोमवार से बंद हैं । सड़कों पर इतना पानी भरा है कि परसों एक बस में बैठे लोग डूबते डुबते बचे।
पास में एक हिरन नामक नदी है जिसमें बरसात से लेकर अधिक से अधिक दिसम्बर तक कुछ पानी रहता है। इस नदी पर एक बाँध भी है। जब उसमें से भी पानी छोड़ना पड़ जाए तब स्थिति और खराब हो जाती है। यह नदी वही पौराणिक नदी है जिसके तट पर श्रीकृष्ण को बाण लगा था । यह प्रभास क्षेत्र कहलाता है। यह इलाका सौराष्ट्र के जूनागढ़ जिले में आता है।
कुछ दिन पूर्व वावाजोड़ा याने समुद्री तूफान आने का भी भय था किन्तु वह टल गया है। खैर अब आप आँकड़े देखिये और साथ मे् कुछ चित्र भी । यहाँ मैं यह चेतावनी देना चाहूँगी कि मैंने ऐसा काम कभी भी नहीं किया है तो कुछ या बहुत कुछ गल्तियाँ होंगी , कुछ आगे पीछे होगा, किन्तु यदि आप कड़ी आलोचना नहीं करेंगे तो एक छोटी सी जगह की सड़कों व पुलों का हाल देख सकेंगे । वैसे मेरी गल्तियों पर की गई रचनात्मक टिप्पणियों से मुझे कोई परहेज नहीं।
पहले पढ़िये एक कविता जो वर्षा से अपनी पहले की पुकार वापिस लेने को की गई है ......................





वर्षाने
तो की है तबाही
इसे जरा भी दया ना आई
आती है जब तो ऐसे आए
मुश्किल में सब पड़ जाए ।
रूकने का यह नाम न लेती
सबको यह है बड़ा भिगोती
स्कूलों में बच्चे ना जा पाएँ
घर में रहकर खूब सताएँ ।
घर में ना है सब्जी भाजी
कैसे खाएँ कुछ भी ताजी
मेंढकों ने है शोर मचाया
मच्छरों ने है हमे सताया ।
ऐसे में जब बिजली जाए
गर्मी में हम सो ना पाएँ
कोई तो है इसे समझाए
कहो इसे ये रुक के आए ।
घुघूती बासूती

मंगलवार, अगस्त 07, 2007

दिल्ली मिलन के २५ दिन बाद

दिल्ली के चिट्ठाकार मिलन को लगभग २५ दिन हो गये हैं । शायद सब लोग इसे भूल भी चुके होंगे । पर मैंने वे पल सहेज कर रख लिये हैं । मुझे तो वह मिलन बहुत सफल व आनन्ददायक लगा । मुझे उसमें किसी प्रकार की कटुता या किसी का किसी को कुछ गलत या अनादर भाव से कहना नहीं दिखा या सुना। यह बात और है कि मेरे कान कुछ कमजोर हैं , किन्तु यदि ये दुखदायी बातों को छानकर ही मुझे सुनाते हैं तो मुझे इन कानों से कोई शिकायत नहीं, और न ही कमजोर आँखों से ।
मुझे सारा वातावरण सौहार्दपूर्ण लगा । यदि हम अपने आपको a bundle of nerves ( नाड़ीतंत्र को शरीर के बाहर ही रखने लगें ) ही बना लें तो हमें कहीं भी असुविधा ही होगी । कोई कितने ही प्रेम से बात करे हम गलत ही अर्थ लगाएँगे । मैं जितने भी लोगों से मिल पाई वे सब मुझे बहुत अच्छे लगे । जिनसे न मिल पाई उसका मलाल रह गया । यदि हम खाना खड़े होकर खाते तो और अधिक लोगों से मिलने व बोलने का अवसर मिलता । चाहे उस दिन मैं खड़े होने की स्थिति में न थी अतः मेरे लिये तो बैठना ही सुविधाजनक था । यदि तबीयत अधिक साथ देती तो मैं स्वयं ही उठ उठकर अपनी सीट बदलती । बहुत से लोगों से बात करने की इच्छा मन में ही रह गयी । पर जिनसे भी बात की , उनसे मिलना , बतियाना बहुत भला लगा । कुछ नवयुवक नवयुवतियों में मुझे अपने बच्चे दिखे । कुछ बुजुर्गों में ( चाहे वे उम्र में मुझसे छोटे रहे हों ) मुझे मित्र दिखे ।
जो सबसे अधिक अच्छा लगा वह इन सबका हिन्दी प्रेम , विशेषकर युवाओं का । मुझे विश्वास हो गया कि हिन्दी एक जीवित भाषा है और इन सबके होते हुए कभी भी लुप्त नहीं होगी । यहाँ पर मैं एक अनुरोध करना चाहती हूँ, जो उस दिन करना भूल गई । चाहे अंग्रेजी की पुस्तकें माँगकर या किसी पुस्तकालय से लो , किन्तु यथासंभव हिन्दी की पुस्तकें खरीद कर पढ़ो । यह बात उन लोगों पर विशेष रूप से लागू होनी चाहिये जो कमाते हैं व विद्यार्थी नहीं हैं । क्योंकि लेखक लेखन तभी करेगा जब उसकी पुस्तकें बिकेंगी । और जो भी पुस्तक विक्रेता हिन्दी पुस्तकें नहीं रखते उनसे भी पूछो कि हिन्दी की पुस्तकें हैं क्या । यह नुस्खा मैंने बहुत कारगार होते देखा है । अपने छोटे से कस्बे में जब हम बार बार एक ही चीज की माँग करते रहते हैं तो वह थक हारकर वह चीज रखने लगता है ।
वैसे एक मित्र ने अपने चिट्ठे में मेरा नाम न लेते हुए मेरी टाँग खिंचाई भी की है । किन्तु सोचने की बात है कि ३० लोगों में उन्होंने मुझे टाँग खिंचाई या ध्यान देने या मेरी दूसरों से होती बातें सुनने लायक तो समझा । यही गनीमत है और इस को ही प्रशंसा ( compliment )
मानकर खुश हो लेती हूँ । वही गिलास आधा खाली या आधा भरे की तर्ज में !
एक और बात है , मुझे नहीं पता था कि महानगरों में भी इतने बड़े दिलों के मालिक बैठे हैं । मैं यह भूल गयी थी कि महानगरों में रहने वालों की जड़ें भी आमतौर पर गाँवों व कस्बों में ही होती हैं । किसी का मुझे घर से कैफे तक ले जाना, चक्कर आने पर बैठाना , बेटे की तरह हाथ पकड़ कर ले जाना । अपने जाने पर मेरे पति को फोन कर यह बताना कि वे जा रहे हैं व मीटिंग का स्थान बदल गया है । किसी का यह कहना कि ..... जी न कहो, माफी न माँगो, किसी का मुझे प्रणाम करना ( जबकि मैं प्रणाम की परंपरा में ही विश्वास नहीं करती ) , मैथिली जी व उनके पुत्र की सादगी व अपनापन , रंजना जी व सुनीता से इतना प्यार मिलना , दिल्ली वासियों ने मेरा दिल जीत लिया । इससे अप्रत्यक्ष रूप से मेरे पति को भी लाभ हुआ है । उन्हें आप सबका आभारी होना चाहिये । मैं जो दिल्ली में रहने के नाम से ही घबरा जाती थी, अब पति की सेवानिवृत्ति के बाद दिल्ली में रहने को तैयार हो गयी हूँ ।
सो कुल मिला कर मेरे लिए वह दिन एक यादगार दिन बन गया ।
घुघूती बासूती