मैं समझ गई मित्र मेरे
कैसे जुड़े ये अपने तार
कैसे हुआ मन को प्यार
तू समझ गया मेरा सार
मैं नही् बोली कभी आभार
कुछ बात हुई तेरी मेरी
हल्का हुआ मन का भार
पल भर को तूने देखा
मैंने तो मुड़कर ना देखा
तेरा चेहरा भी याद नहीं
मेरा चेहरा तू भूल गया
याद तो इक एहसास रहा
ना तेरा मेरा इतिहास रहा
तू चला गया अपनी राहों पर
मैं किंकर्तव्यविमूढ़ चौराहे पर
जिस तरफ भी जाऊँ धोखा है
तूने भी कभी ना मुझे रोका है
लौटूँ तो किस ओर मुड़ूँ
जीवन से मैं कैसे जुड़ूँ
सपने सच तो हो न सके,
सच को ही सपना बनाया है
अपने तो अपने हो न सके
अब गैरों को अपना बनाया है
साथी अपना कोई हो न सका
अब राहों को साथी बनाया है
साथी राहों में मिल ना सका
अपने तो खो गए अतीत में
अब अतीत को अपना बनाया है
हाथों से तुझको छू न सकी
तेरी परछाई को ही मैंने छूआ है
चाहा पर तुझसे ना खेल सकी
खेला हरदिन मैंने केवल जूआ है ।
घुघूती बासूती





