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Friday, July 24, 2009

ऊपरवाला जब देता है तो छप्पर फाड़कर देता है !

यह कहावत बचपन से सुनती आई हूँ परन्तु प्रत्यक्ष में देखना अब हुआ। लगता है कि कोई आवारा अक्षय कलश वाला बादल मेरे साथ साथ चल रहा है। 'जहाँ मैं जाती हूँ वहीं चले आते हो' कि तर्ज पर यह बादल पहले सौराष्ट्र में मेरे गाँव पर बरसता रहा फिर जब मुम्बई गई तो वहाँ भी साथ लगा रहा। मूसलाधार बारिश में ही हम यहाँ से निकले और मूसलाधार बारिश, कभी कभी सामान्य भी, में हम मुम्बई की गीली खाक छानते रहे। लौटे तो फिर वही ‘कुत्ता बिल्ली छाप’ बारिश शुरू हो गई। बस इतनी ही गनीमत थी विमान के नीचे तैरते बादल कुछ समय के लिए कंजूस बन गए। राजकोट से २०० कि.मी की कार यात्रा इतनी दुरूह हो गई कि वाइपर भी बारिश से बुरी तरह हार रहे थे। सामने सड़क भी नजर नहीं आ रही थी। कमी थी तो रास्ते में ट्रैफिक जाम था। पता चला कि एक पेड़ सड़क पर गिरा हुआ था और कारों के अलावा, ट्रकों व बसों की एक लम्बी कतार फंसी हुई थी। भाग्य से यह एक कस्बा या छोटे शहर में हुआ था सो ड्राइवर गलियों के बीच से कभी आगे बढ़ाता तो कभी वापिस पीछे जाता हुआ कार को वापिस मुख्य सड़क पर ले आया।


हमारे मुम्बई प्रवास में यहाँ लगभग नहीं के बराबर वर्षा हुई। परन्तु जब से लौटी हूँ यह बादल बरस ही रहा है। पहले तो दो एक दिन कभी कभार ‘आँख मिचौली’ भी खेल लेता था ताकि मैं सुखाने डाले कपड़ों को कभी अंदर तो कभी बाहर टाँगती रहूँ और इस प्रकार मुफ्त में वजन कम करने का आनन्द लूँ। परन्तु मंगलवार से तो मूसलाधार ही बरस रहा है। बुधवार की सुबह से तो जो बरस रहा है तो थमने का नाम ही नहीं ले रहा। अब तो हाल यह है कि बाहर तो बाहर इसने घर के अन्दर भी बरसना शुरू कर दिया है। एक चक्रवात(गुजराती में वावाजोड़ा सा कुछ) और एक भूकंप(गुजराती में धरतीकम्प) ने यहाँ के काली कपासी मिट्टी( न जाने लोग कुछ लाली लिए, खुशी खुशी मूँगफली उगाने वाली इस मिट्टी को काली कपासी मिट्टी क्यों कहते हैं? यह इतनी चिकनी है कि यदि थोड़ी भी गीली मिट्टी पर चल लें तो चप्पलों का भार पाव से अधिक कुछ ही कदम में हो जाता है। फिर अनन्त काल तक चप्पलों से 'मिट्टी छुटाओ' अभियान चलाना पड़ता है।) पर बने मकानों की नींव ही पहले से हिला रखी है। सो इतने दिनों की बरसात की मार खाते खाते अब छत ने भी जवाब दे दिया है। वह घर के दो तीन भागों में पानी को रोकने का अपना युद्ध हार गई है। सो अब कुछ बाल्टियों व टब को अस्थाई तौर पर यह काम सौंप दिया है। छत पर बने गोदाम को तो पहले ही शत्रु पक्ष के हवाले कर दिया है।


कमी है तो पैक करने के उद्देश्य से हमने सारा सामान यहाँ वहाँ बिखेर रखा है। कान लगातार आती वर्षा की आवाज से थक गए हैं। बाहर बगीचा और सड़क पानी में डूबे हुए हैं। कैंचुए व मैंढक आश्रय के लिए हमारे बरामदे की तरफ बढ़े चले आ रहे हैं। स्नानगृहों की नालियों से कतार में तिलचट्टे शरण माँगते हुए चले आ रहे हैं। न जाने क्यों वे वहाँ पहुँचते ही पीठ के बल लेट जा रहे हैं। सो स्नानगृह औंधे पड़े तिचट्टों की मरणस्थली बना हुआ है। आज तो नालियों की जाली पर रखी नैपथेलीन की गोलियाँ भी उन्हें आने से नहीं रोक पा रहीं। हम बस बाहर पड़ी बगीचे की कुर्सियों पर साँपों के विराजमान होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।


पास का तालाब लबालब भरा पड़ा है। लगता है अब तक तो कारखाने के पास की दोनों झीलें भी अतिप्रवाह की चपेट में आ गईं होंगी। मैं वर्षा के आँकड़े पाना चाह रही हूँ किन्तु पति दिल्ली गए हुए हैं सो यह काम जरा कठिन है। पता नहीं उनको अहमदाबाद से यहाँ लाने को जो कार गई है वह उन तक पहुँच पाएगी या नहीं। दो दिन से हमारी स्कूल बस नहीं आई। कल वेरावल व आस पास के गाँवों से आने वाले कर्मचारियों रास्ते में बस फँस जाने की आशंका के कारण आधे दिन से कम के काम के बाद ही घर भेज दिया गया। मुझे लग रहा है कि मैं किसी समुद्र में जहाज के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद उसमें से बचाए सामान के साथ एक टापू में फँसी हुई हूँ।

मन में बस एक ही पुकार उठ रही है 'ओ आवारा बादल, कुछ दिन के लिए तो मेरा पीछा छोड़ और किसी अनावृष्टि वाले क्षेत्र में जाकर बरस!'

लगभग पाँच वर्ष पहले मैं ऐसी ही मूसलाधार बारिश में यहाँ रहने आई थी और लगता है कि ऐसी ही मूसलाधार बारिश में यहाँ से जाऊँगी।


पुनश्चः आज आस पास के गाँवों व वेरावल में जिनके घरों में पानी भर गया है उनके लिए भोजन के ५००० पैकेट गेस्ट हाउस में बनाकर भेजे जा रहे हैं। सो कामवाली वहाँ काम कर रही है। वह आज भी नहीं आएगी।


लगता है आवारा बादल ने मेरी सुन ली है। अब वर्षा रुक गई है। काश यह पोस्ट पहले ही लिख दी होती! क्या वह भी मेरा ब्लॉग पढ़ता है? अरे, मेरे पोस्ट करने से पहले ही सुन ली है! क्या वह मेरे कम्प्यूटर पर भी नजर रखता है? जो भी करता हो, मैं तो आशा करती हूँ कि वह भारत के अनावृष्टि वाले क्षेत्रों की तरफ का चक्कर लगा ही आए।

घुघूती बासूती

Friday, August 10, 2007

सौराष्ट्र में वर्षा ने की तबाही !वर्षा की तबाही के चित्र व आँकड़े व उसे विदा करने के लिए एक कविता। 1























रुक जाओ
१२ जून को मैंने वर्षा तुम जल्दी आना कविता में उसे आने का न्यौता दिया था । शायद वह मेरा न्यौता मान भी गई और कुछ ऐसी धूम धाम से आई है कि यदि किसी को पता चल जाए कि इसे मैंने बुलाया था तो मेरी खैर नहीं है । वैसे यह बहुत मूडी हो गई है । मेरे २ सप्ताह के दिल्ली प्रवास में एक बूँद भी नहीं बरसी । मेरे वापिस आने का समाचार भी इसे एक सप्ताह बाद मिला । किन्तु जब से मिला है तो हाथ धोकर पीछे पड़ गई है।
अपनी बात की पुष्टि करने के लिए मैं आपको सारे आँकड़े व चित्र दिखाऊँगी । हमारी दशा बहुत खराब हो गई है। सड़कें टूट गई हैं पुल भी काफी टूट फूट गए हैं। महीने भर का राशन रखने वालों का काम तो चल रहा है किन्तु जो रोज खरीदते व खाते हैं उनकी स्थिति खराब है। ये बात और है कि यह गुजरात है व यहाँ ऐसे समय में सहायता करने की परम्परा रही है। सबसे बड़ी बात यह है कि सहायता चाहने वाले स्वयं ही बता देते हैं कि उन्हें क्या चाहिये। प्रशासन भी आमतौर पर उद्योग की सहायता से बहुत मुश्तेदी से काम करता है। दो दिन से अखबार नहीं आया है । स्कूल सोमवार से बंद हैं । सड़कों पर इतना पानी भरा है कि परसों एक बस में बैठे लोग डूबते डुबते बचे।
पास में एक हिरन नामक नदी है जिसमें बरसात से लेकर अधिक से अधिक दिसम्बर तक कुछ पानी रहता है। इस नदी पर एक बाँध भी है। जब उसमें से भी पानी छोड़ना पड़ जाए तब स्थिति और खराब हो जाती है। यह नदी वही पौराणिक नदी है जिसके तट पर श्रीकृष्ण को बाण लगा था । यह प्रभास क्षेत्र कहलाता है। यह इलाका सौराष्ट्र के जूनागढ़ जिले में आता है।
कुछ दिन पूर्व वावाजोड़ा याने समुद्री तूफान आने का भी भय था किन्तु वह टल गया है। खैर अब आप आँकड़े देखिये और साथ मे् कुछ चित्र भी । यहाँ मैं यह चेतावनी देना चाहूँगी कि मैंने ऐसा काम कभी भी नहीं किया है तो कुछ या बहुत कुछ गल्तियाँ होंगी , कुछ आगे पीछे होगा, किन्तु यदि आप कड़ी आलोचना नहीं करेंगे तो एक छोटी सी जगह की सड़कों व पुलों का हाल देख सकेंगे । वैसे मेरी गल्तियों पर की गई रचनात्मक टिप्पणियों से मुझे कोई परहेज नहीं।
पहले पढ़िये एक कविता जो वर्षा से अपनी पहले की पुकार वापिस लेने को की गई है ......................





वर्षाने
तो की है तबाही
इसे जरा भी दया ना आई
आती है जब तो ऐसे आए
मुश्किल में सब पड़ जाए ।
रूकने का यह नाम न लेती
सबको यह है बड़ा भिगोती
स्कूलों में बच्चे ना जा पाएँ
घर में रहकर खूब सताएँ ।
घर में ना है सब्जी भाजी
कैसे खाएँ कुछ भी ताजी
मेंढकों ने है शोर मचाया
मच्छरों ने है हमे सताया ।
ऐसे में जब बिजली जाए
गर्मी में हम सो ना पाएँ
कोई तो है इसे समझाए
कहो इसे ये रुक के आए ।
घुघूती बासूती