Showing posts with label बाल सहाय केन्द्र. Show all posts
Showing posts with label बाल सहाय केन्द्र. Show all posts

Saturday, March 14, 2009

खोया बचपन, गुमनाम जीवन

बच्चों का खो जाना एक हृदयविदारक घटना होती है। जिस परिवार का बच्चा खो जाता हैं उनका जीवन तो जीते जी नरक बन जाता होगा। मुझे लगता है खोने में मिलने की आशा की किरण चाहे रहती है परन्तु जब बच्चा सालों साल घर नहीं लौटता होगा तो अनिश्चितता और बच्चे के साथ क्या हो रहा होगा सोच सोचकर माता पिता व परिवार के सदस्यों की हालत बहुत दुखद होती होगी। मृत्यु होने पर रो धोकर उस सत्य को अन्त में मान लिया जाता है। उस दुख के साथ जीना सीख लिया जाता है।

हर बड़े शहर में माता पिता सदा इस बात के प्रति सजग भी रहते हैं और भयभीत भी कि उनका बच्चा कहीं खो न जाए। मुझे याद है जब मैं अपनी सवा साल की बेटी को लेकर पहली बार मुम्बई पहुँची तो सबसे पहले उसे अनजान व्यक्ति की धारणा सिखाई। निर्लज्जता से यह बताया कि कुछ लोग अपने होते हैं कुछ पराए। इससे पहले उसे यही पता था कि सभी अपने होते हैं। पहले ही दिन वह जाकर एक भिखारिन से बड़े प्रेम से बातें करने लगी। लगभग उसका हालचाल पूछने के अंदाज में। तब स्ट्रैंज मैन, स्ट्रैंज वुमैन व अंकल, आँटी में अंतर बताया। बिजली के बिल की लाइन में खड़ी वह मुझसे पूछती कि क्या यह व्यक्ति अंकल है या स्ट्रैंज मैन !

कल जब मैंने पढ़ा कि अहमदाबाद स्टेशन में बाल सहाय केन्द्र के पोस्टर लगाए गए हैं और पुलिस कर्मचारियों को जब कोई अकेला बच्चा नजर आता है तो वे उससे पूछताछ कर उसको घर पहुँचाने की कोशिश करते हैं, बहुत खुशी हुई। पुलिस इंस्पैक्टर डी बी जाडेजा को जब नौ वर्ष की एक बच्ची स्कूल यूनिफॉर्म में कन्धे पर बैग लटकाए स्टेशन पर घूमती दिखी तो उन्होंने उसे बुलाया, उसके रोने पर उसे चुप कराया और बाल सहाय केन्द्र का बोर्ड उसे दिखाया। फिर पूछने पर उसने बताया कि उसे जबर्दस्ती स्कूल भेजा जाता था सो वह अपने घर हिम्मतनगर से भाग आई थी। उसे उसके घर पहुंचाया गया।

छह महीने पहले एक बारह वर्ष का बच्चा इस केन्द्र में आया और उसने बताया कि चार लोगों ने उसका अपहरण कर लिया था और वह उनसे बचकर भाग आया है। पुलिस को उसकी कहानी पर शक तो हुआ परन्तु उन्होंने राजकोट में उसके घर फोन कर पता किया तो पता चला कि माँ के उसकी शैतानी पर डाँटने पर वह घर छोड़कर आ गया था। अब सहायता लेने के लिए उसने कहानी बनाई थी। खैर, जो भी हो उसे अपने माता पिता से वापिस मिला दिया गया।

सरकार व पुलिस की सहायता से यह केन्द्र चलाया जा रहा है। सन २००८ में इस केन्द्र ने ११५ बच्चों को उनके माता पिता के पास पहुँचाया। यदि यह केन्द्र ना होता तो इन ११५ बच्चों का भविष्य क्या होता सोचकर ही कंपकंपी हो आती है।

भारतीय मानवाधिकार समिति के अनुसार भारत में प्रति वर्ष ४५,००० बच्चे खो जाते हैं। इनमें से ११,००० कभी नहीं मिलते। नेशनल सेन्टर फोर मिसिंग चिल्ड्रन के अनुसार घर छोड़कर भागने वाले बच्चों की संख्या १०,००,००० प्रति वर्ष है। अर्थात हर ३० सेकेन्ड में एक बच्चा घर छोड़कर चला जाता है। एक अनुमान के अनुसार केवल १० प्रतिशत मामलों में ही पुलिस के पास रिपोर्ट दर्ज करवाई जाती है। कैसी विडंबना है कि बच्चे अपने ही घर को छोड़कर दर दर की ठोकरें खाने को तैयार रहते हैं। यदि इसमें से कुछ प्रतिशत बच्चे भी असामाजिक तत्वों के हाथ आ जाते होंगे तो भी स्थिति की भयावहता का अनुमान लगाया जा सकता है। क्या यह बेहतर नहीं होगा कि बच्चों को फिल्म व डॉक्यूमेन्ट्री के द्वारा घर छोड़ने के भयानक परिणामों से अवगत कराता जाए? यह बात भी सोचने की है कि बच्चे घर छोड़कर क्यों जाते हैं? आज जब हम वयस्क संतान पर वृद्ध माता पिता की देखभाल का उत्तरदायित्व कानूनन डालना चाहते हैं तो माता पिता अपने ही जन्मे बच्चे के उत्तरदायित्व से कैसे मुक्त किए जा सकते हैं?

मुझे लगता है आज के कम्प्यूटर के युग में खोए बच्चों को जब तक कोई अपहृत नहीं कर लेता अपने घर पहुँचाना इतना कठिन भी नहीं होना चाहिए। यदि सभी खोए बच्चों का एक फोटो सहित डैटा बेस बना लिया जाए तो जब भी कोई बच्चा रेलवे स्टेशन में या सड़कों में अकेला जीवन यापन करता दिखे तो उसकी फोटो को यहाँ डालकर मिलान किया जा सकता है। यदि यह सुविधा सब थानों में ना भी हों तो भी मुख्य नगरों में बनाई जा सकती है और उनकी सहायता छोटे थाने भी ले सकते हैं। ऐसे सॉफ्ट वेयर होंगे भी और बनाने असंभव भी नहीं होंगे।

इसके लिए एक और काम भी किया जा सकता है। जैसे सभी करदाताओं को पैन नम्बर दिया जाता है वैसे ही जन्म का पंजीकरण करवाते समय एक स्टील के पैन्डेन्ट या ऐसी ही शरीर में पहनने योग्य वस्तु में बच्चे की नागरिक संख्या भी दी जा सकती है। वहीं इस संख्या के साथ पंजीकरण केन्द्र के कम्प्यूटर में माता पिता का पता आदि भी लिखा जा सकता है। यह सब जानकारी कम्प्यूटर में रहे और समय समय पर पता बदलने के साथ माता पिता उसे सही करवाते रहें तो समस्या का सरल समाधान हो सकता है। पैन्डेन्ट बच्चे के गले में तब तक पहनाया जा सकता है जब तक वह बड़ा ना हो जाए। बड़े होने पर भी वह पर्स में रखा जाए तो दुर्घटना आदि होने पर तुरन्त पता चल सकता है कि वह कौन है और परिवार को सूचना दी जा सकती है। सब खोए बच्चों का अपहरण नहीं हुआ होता। शायद बाद में वे गलत हाथों में पड़ जाते होंगे। ऐसे में एक बड़ी संख्या में बच्चों को उनके घर पहुँचाया जा सकता है। शायद यह उपाय व्यवहारिक न हो तो ऐसे में हमें व्यवहारिक उपाय ढूँढने होंगे। इसके लिए लोगों से सुझाव माँगे जा सकते हैं।

काम कठिन तो हो सकता है किन्तु कोई भी कीमत बच्चों की सुरक्षा से बड़ी नहीं हो सकती। खोए बच्चों का बचपन तो खो ही जाता है और यदि वे जीवित रहें तो उनका शेष जीवन भी शायद गुमनामी में ही बीतता होगा।

नोटः ये आंकड़े समाचार पत्र व नैट से लिए गए हैं। गल्तियों की संभावना हो सकती है।

घुघूती बासूती