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Wednesday, July 25, 2012

सत्तावनवाँ अध्याय खत्म......................... घुघूती बासूती


इक्कीस और पैंतीस होता है छप्पन। बड़ी दी और दी तुम दोनों ने तो मिलकर छप्पन अध्याय लिखे और चलती बनीं मुझे छोड़कर। एक मैं हूँ कि आज सत्तावनवा अध्याय समाप्त कर रही हूँ जीवन का। पता नहीं, मेरे जीवन की पुस्तक में कितने और अध्याय जुड़ने शेष हैं।

अध्यायों का जुड़ना तो ठीक है। हर अध्याय में ३६५ पन्ने और हर अध्याय में हमारे जीवन की वर्ष भर की कहानी। हम दर्ज करना चाहें या नहीं, ये लिखी जा रही हैं, यह कहानी तो जादुई कलम से लिखी जा रही है। हर दुख, हर सुख, हर नई अनुभूति को दर्ज करती हमारी जीवन पुस्तक या कहिए फिल्म की कहानी पल पल लिखी जा रही है।

अध्यायों का यूँ उम्र बढ़ने के साथ जुड़ता जाना तो ठीक है किन्तु जब वे अध्याय लगभग कोरे हों तब? क्या तब भी ये अध्याय जिए जाने चाहिए?

कोई समय ऐसा था कि एक पन्ना उस दिन की घटनाओं को दर्ज करने को कम पड़ता था। अब समय ऐसा है कि इस अध्याय के न जाने कितने पन्ने कोरे ही रह गए। तो क्या अब नए अध्याय लिखे जाने चाहिए? या फिर पुस्तक को बन्द कर चलते बनना चाहिए?

वे भी दिन थे जब अध्यायों में पन्ने लिखे जाते थे, खेल में मिली ट्रॉफीज़ को लेकर, मनभावन स्कूल कॉलेज में दाखिले, नई सखी, मित्र, उसपर पड़ी नजर, अचानक अपने जेंडर के प्रति जागरुक होने, पहले लगाव, फिर प्यार, नदी में आई बाढ़, विवाह, नए घर संसार, नई संतान, संतान मोह, नौकरी आदि को लेकर।

बच्चे बड़े हो गए। पति व माँ के अतिरिक्त कोई उत्तरदायित्व नहीं बचे। तो फिर क्यों ये कोरे कागज वाले अध्याय दर्ज किए जाएँ?

देश का जो हाल है उसमें जीना, एक स्त्री का जीना, बिना लड़े जीना, एक लज्जाजनक बात लगता है। हर पल भय सताता है कि जो सुदूर हो रहा है कल यहाँ भी होगा। खाप की खप्प (शोर ) हर जगह सुनाई देगी। मेरे कान में रूई डाल लेने से दूर से बजते ये ढोल वहीं न रुक जाएँगे। ये बढ़ते जाएँगे, मेरी तरफ, मेरी बेटियों की तरफ, तुम्हारी तरफ, तुम्हारी बेटियों की तरफ और हमारी अजन्मी नातिन, पोतियों की तरफ। इनके हौसले बुलन्द हो रहे हैं क्योंकि तुममें, मुझमें साहस ही नहीं है। वोट बैंक भी ये ही हैं सो कोई भी सरकार जब तक आत्मघात न करना चाहे इनका विरोध नहीं करेगी। सो तैयार रहो, अजगर की तरह ये हमें जकड़ लेंगे। तब हमारा चिल्लाना व्यर्थ होगा। अभी जब आवाज शेष है हम चिल्ला नहीं रहे।

एक छोटी सी, हल्की सी विरोध की आवाज मैं उठा रही हूँ। मोटी होने के बाद पहली जीन्स खरीदी हैं। उन्हे सही लम्बा करने के लिए दुकान पर छोड़ा था। कल घुघूत वे ले आए। आज मैं उन्हें पहनूँगी। क्या विरोध के रूप में हम सब जीन्स दिवस मना सकते हैं? मंहगा पड़ेगा उनके लिए जो पहनते नहीं हैं। किन्तु कैसा रहेगा जब नानी दादी भी विरोध में जीन्स पहन लें, एक दिन के लिए ही सही? बैन करने वालों की अम्मा, दादी, नानी ही यदि जीन्स पहन लें तो? किन्तु यदि स्त्रियों में इतनी ही एकता होती तो क्या हमारी यह गति होती?

हममें एकता हो तो कैसे हो? हम तो डाली से टूटे पत्ते हैं जिन्हें पवन उड़ा कर कहीं भी पहुँचा देती है। फिर हमें यह बताया जाता है कि हममें से जो जितनी स्वामीभक्त होगी वह उतनी ही स्वामी की प्रिय होगी। अन्तःपुर पर शासन करेगी। सो अलग अलग पेड़ों, अलग अलग शाखों की जबरन तोड़ी गई ये पत्तियाँ क्या एक होकर कुछ कर सकती हैं? हममें सिवाय स्त्री होने के, स्त्री होने की प्रताड़ना झेलने के क्या साँझा है? न रक्त साँझा, न बिरादरी सी कोई बहनादरी। आम, नीम, बरगद, इमली के पत्तों को जबरन एक जगह इकट्ठा कर देने से अपनापन तो न हो जाएगा, जुड़ाव तो न हो जाएगा। फिर एक ही पेड़ पर, एक ही शाख पर उगे पत्ते हमें कहते हैं कि स्त्री ही स्त्री की शत्रु है। एक घर के सारे जमाताओं से तो कहो कि मिलजुल कर रहें, साँझा व्यापार करें। फिर देखें कि कितना भाईचारा होता है।

खैर वर्ष बीत गया, एक अध्याय खत्म हुआ। लगभग कोरा। बेटियों, जवाइयों ने रात बारह बजे फूलों के तीन बुके, केक, चॉकलेट भेजे। खाली खाली साल भर सा गया। मेरा घर फूलों से सज महक गया।

कहना चाहती हूँ, बेटियों, समय रहते देश छोड़ भाग जाओ। उसपर और फिर कभी।

अठ्ठावनवाँ वर्ष लगने को है मन अठ्ठावन मन भारी है। मुम्बई में हृाल ही में एक वकील स्त्री ने अपना जन्मदिन मनाया था। पार्टी से भाई व मित्रों के साथ लौटते समय पुलिस ने पकड़ लिया। परमिट होने पर भी इनडीसेन्सी के लिए पकड़ लिया, पीट दिया। वैसे तो स्त्री होना ही इनडीसेन्ट है। फिर इस अधम जन्म में, जन्मदिन की खुशी मनाने जैसा है क्या? बस यह चिन्तन सा कुछ है। जन्मदिन की शुभकामनाएँ घुघूती।

घुघूती बासूती



Monday, July 26, 2010

जब तुम होगे साठ साल के............. घुघूती बासूती






७० के दशक का एक गीत होता था... 'जब हम होंगे साठ साल के और तुम होगी पचपन की!' उस ही गीत की कुछ आगे की पंक्तियाँ थीं.. 'जब तुम होगे साठ साल के और मैं होंगी पचपन की।' कल का सारा दिन यह गीत गुनगुनाते बीता। कल मैं पचपन की हो गई। घुघूत तो कुछ महीने पहले ही साठ के हो चुके हैं। ३७ साल पहले मैंने अपना अठारहवाँ जन्मदिन उनके साथ मनाया था। कल पचपनवाँ मनाया। इस बीच ३७ जन्मदिन बहुधा साथ तो कभी कभार अकेले मनाए। बचपन से तो नहीं, हाँ, मेरी किशोरावस्था से हमारा साथ है।

कल का दिन बहुत बढ़िया था। मौसम तो गजब का था ही। परसों रात बारह बजे से ही बेटियाँ जन्मदिन की शुभकामनाएँ दे रहीं थीं। कल दिन भर बीच बीच में उनसे बात होती रही। बड़ी बिटिया कुछ दिन के लिए विदेश में है फिर भी बहुत लम्बी नहीं तो भी बातें तो हुईं ही। छोटी बेटी और मैं तो बार बार बातें कर ही रहे थे। जँवाइयों ने भी बात की।
कल कितने ही मित्रों व सहेलियों ने याद किया। भान्जी व भतीजी ने फोन किया। भाई भाभी ने याद किया। माँ से बात करवाई। माँ को अब याद नहीं रहता। भाई को उन्हें बताना पड़ा कि जन्मदिन है। मैं भी तो अभी से भूलने लगी हूँ। क्या कभी मैं भी अपनी जन्मी बेटियों का जन्मदिन भूल जाऊँगी?

बेटियों ने सरप्राइज की योजना बनाई थी। जब मेरे हाथ में तरह तरह के ऑर्किड्स के दो गुलदस्ते आए तो लगा जैसे दोनों बेटियाँ ही मेरे गले लग रही होएँ। छोटी बिटिया ने कहा कि उसे पता है कि मुझे ऑर्किड्स कितने पसन्द हैं। साथ में मेरी पसन्द का डार्क चॉकलेट केक व मेवों का डब्बा था।

मैं गुलदस्तों से दूर नहीं हो पाती हूँ। तरह तरह से उनके फोटो लेती हूँ। यह काम मेरे लिए बहुत कठिन है क्योंकि हाथ हिल जाता है। अभी जब कम्प्यूटर वाले कमरे में हूँ तो इन्हें भी अपने साथ ले आई हूँ।

लगता है कि वे दोनों मेरे आस पास हैं। याद आता है अपना पैंतिसवाँ जन्मदिन, जब निश्चय किया कि कुछ नहीं बनाऊँगी। बेटियों ने कहा कि नहीं, वे केक बनाएँगी। नन्हें हाथों ने मुझसे पूछ पूछकर बहुत बड़ा सा केक बनाया। परन्तु शाम को जब पूरी की पूरी मित्र मंडली परिवार सहित अपने उस वनवास वाली बस्ती में जहाँ झट से कुछ भी खरीदा नहीं जा सकता था, जन्मदिन की बधाई देने पहुँची तो केक खिलाते हुए मन बेटियों की सूझबूझ, समझदारी व जिद के आगे नतमस्तक हो गया।

सोचती हूँ कि बिटिया को मेरी पसन्द का कितना ध्यान रहता है। कब बेटी 'दी' हो जाती है, कब माँ! सहेली व सलाहकार तो वह सदा ही होती है।

दोनों गुलदस्ते बहुत सुन्दर हैं। एक में तीन तरह के ऑर्किड्स हैं व एक में एक ही किस्म के। तीन तरह वाले में एक प्रकार का तो लाल रंग का एन्थुरियम है। तीन बत्तख की चोंच जैसे हैं, हाँ उनके कलगी और लगी हुई है।

मन विह्वल हो रहा है। कभी 'दी' यूँ ही मेरी पसन्द का ध्यान रखती थी। ३७ साल पहले वाले अठारहवें जन्मदिन पर भी तो उसने अपनी रिसर्च के लिए किए लखनऊ प्रवास से मेरे लिए लाई साड़ी पर फॉल लगाया था, ब्लाउज, पेटीकोट सिला था ! उसे भी सदा मेरे लिए चॉकलेट व मेवों की याद रहती थी। 'दी' होती तो वह भी तो एक सप्ताह पहले ही साठ की हुई होती। २५ साल बीत गए हैं 'दी' किन्तु हर सुख व दुख में तुम साथ रहती हो। साथ तो ४२ साल पहले साथ छोड़ने वाली 'बड़ी दी' भी रहती हैं। परन्तु मेरी प्रेम कथा में 'दी' तुम भी तो किस तरह से गुँथी हुई हो!

ये तीनों बत्तख जैसे(हैलिकोनिया का कोई प्रकार? नहीं, नहीं, ये तो बर्ड्स औफ़ पैरेडाइज़ हैं! परन्तु हैं शायद हैलिकोनिया परिवार के ही! ) ऑर्किड्स जो हैं न वे हम तीनों हैं। जो पहले मुरझा जाएगा वह 'बड़ी दी' जो उसके बाद वह 'दी' तुम और जो सबसे अन्त में वह मैं!

प्रेम के कितने ही तो रूप हैं। सब सुन्दर हैं। प्रेमियों का प्रणय, पति पत्नी का उससे भी कुछ आगे निकला हुआ प्रेम जिसमें प्रणय भी है, मित्रों का स्नेह भी, माँ की ममता भी, वात्सल्य भी, करुणा भी है, पिता का वरद हस्त भी। माता पिता का अपने बच्चों के लिए प्रेम, वात्सल्य, ममता तो हर माता पिता जानता है। बच्चा जन्मा नहीं कि औसीटॉसिन इस भावना की बाढ़ भी अपने साथ ले आता है। माता पिता के लिए प्रेम किन्हीं हॉर्मोन्स के कारण नहीं अपने बचपन की मधुर यादों के कारण होता है। बहनों का स्नेह तो बेजोड़ होता ही है, एकदम अलग, अद्वितीय। भाई बहन का एक अलग किस्म का अदृष्य पतली डोरियों से खींचता स्नेह। भाभी में बहन ढूँढता स्नेह। सहेलियों का स्नेह तो कोई सहेली ही समझ सकती हैं। मित्र से अपनत्व की बँधी वह डोर जिसका कौनसा सिरा कब किसके हाथ में होता हैं समझ ही नहीं आता। डोर है यह भी तभी महसूस होता है जब जरा सा दूर जाएँ और डोर खिंचने लगती है। वह ऑल्टर ईगो वाला आभास!

यह प्रेम है तो जीवन है, जन्म है, ऐसी मृत्यु है जिसे कोई बार बार फिर से जीता है। अन्यथा क्या जिए और क्या मरे? यह न हो तो क्या है? (यह सब तब हैं जब प्रेम के बीच कोई लालच, स्वार्थ ना आ जाएँ।)

ऐसे में जब भी प्रेमी शब्द सुन कोई अभागा भड़क उठता है तो सोचती हूँ कि उन्होंने प्रेम का ऐसा कौन सा विभत्स रूप देख लिया होगा कि किसी के भी ब्लॉग में प्रेम विवाह, प्रेमी शब्द सुन उन जैसा प्रायः नरम दिल मनुष्य यूँ क्यों भड़कता है कि हर प्रेमी के गाल पर उनके थप्पड़ का अहसास ही नहीं होता अपितु लगता है कि प्रेम शब्द ही गाली हो। हृदय में कुछ चटख जाता है। एक बार विषाक्त भोजन खाने पर हम भोजन करना नहीं छोड़ देते, हाथ जलने पर पका खाना नहीं खाना छोड़ देते तो प्रेम जैसे भाव को उससे लुटने पिटने पर भी क्या यूँ ही छोड़ा जा सकता है? यदि हमने किसी हत्यारे प्रेमी को भी देखा हो तो प्रेम करना क्यों छोड़ेंगे या प्रेमियों से घृणा क्यों करेंगे? क्या किसी हत्यारे डॉक्टर, वकील, चित्रकार, ड्राइवर, अध्यापक को देखने के बाद इलाज, वकालत, कार, अध्ययन से तौबा कर लेते हैं? फिर प्रेम से ऐसी घृणा क्यों?

यह सब तो पचपन वर्ष का सार है। जीवन के अन्तिम जन्मदिन पर क्या सोच रही होऊँगी पता नहीं। बस, प्रेम से घृणा न कर रही होऊँ तो भी धन्य हो जाऊँगी। अभी तो प्रेम, तुझे सलाम।

घुघूती बासूती

पुनश्चः सभी ऑर्किड्स के नाम कोई बता पाए तो आभारी रहूँगी।
घुघूती बासूती