पूरे देश में गणतंत्र दिवस मनाया गया । बहुत से लोगों ने इसे अपने टी वी पर देखा होगा । परन्तु कितने लोग ध्वाजारोहण में सम्मिलित हुए होंगे ? मैं अपने बावन वर्ष के जीवन में केवल ७ बार छोड़कर हर बार इसमें सम्मिलित हुई हूँ । ये ७ बार वे गणतंत्र दिवस थे जब मैं मुम्बई और विदेश में थी । मैं किसी अन्य से अधिक या कम देशभक्त नहीं हूँ , मुझे यह भाग्य इन ५०० या ६०० की आबादी वाली जगहों पर रहने के कारण मिला ।
इस बार भी हम इस कार्यक्रम में भाग लेने गए । सबसे पहले छोटी बच्चियों ने फूलों से हमारा स्वागत किया । फिर बच्चों द्वारा बनाई रंगोली दिखाई । स्कूल के प्रधानाचार्य हमें उस मैदान में ले गए जहाँ बच्चे पूरी तैयारी के साथ हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे । यहाँ पर मेरे पति ने ध्वाजारोहण किया । स्कूल के बच्चों व चौकीदारों की परेड देखी । फिर नर्सरी से लेकर दसवीं कक्षा के छात्रों का गाने व नृत्य का कार्यक्रम हुआ । छोटे छोटे बच्चों ने जब हाथ में झंडा पकड़ नाचा गाया तो उनका उत्साह देखते ही बना । बड़े बच्चों ने हिन्दी व अंग्रेजी में गणतंत्र दिवस का महत्व बताया । कुछ बच्चे विभिन्न पेशों के कपड़े पहन कर आए और उन्होंने अपने पेशे का परिचय दिया । फिर हाथ पकड़कर सबने कहा कि हम मिलजुल कर भारत माता की सेवा करेंगे व उसे सम्पन्न बनाएँगे । अपने बच्चों को इन कार्यक्रमों में देखना बहुत अच्छा लगता है । यहाँ तो सारे बच्चे ही अपने थे। मुख्य अतिथि याने घुघूता जी ने एक छोटा सा भाषण दिया।
स्कूल के प्रधानाचार्य ने उपस्थित लोगों का धन्यवाद किया । घुघूता जी व मैं पास के एक मैदान, जहाँ शामियाना आदि लगाकर मेला व अन्नपूर्णा रखी गई थी, को देखने चले गए । कुछ महत्वपूर्ण बदलाव आदि बताकर मैं घर की तरफ भागी । अन्नपूर्णा व कुछ खेल हमारी महिलामंडल की ही जिम्मेदारी थे ।
अन्नपूर्णा हम उस कार्यक्रम को कहते हैं जहाँ महिलाएँ अपने हाथ से बनाए खाद्य पदार्थों की बिक्री करती हैं ।
घर लौट कर आराम करने का बिल्कुल भी समय नहीं था । हम कमर कसकर रसोईघरों में लग गए । हमारा पिछला पूरा सप्ताह भागदौड़ में बीता था। हम महिलाएँ केक, दहीवड़े , समोसे, ब्रेडपकौड़े, पानीपूरी, इडली, सांबर,चटनी, गुलाबजामुन आदि बना रहीं थीं । केक, समोसे, दहीवड़े बनाने का जिम्मा हमारे मुहल्ले को मिला था । हमने केक २४ ता को बेक किये थे । २५ को उनपर आइसिंग की गई । गुजरात में अधिकतर लोग शाकाहारी होते हैं अत: ये केक बिना अंडे के थे । २६ की सुबह से एक घर में समोसे बन रहे थे ,एक में चटनी और एक में दही वड़े । शाम के ४ बजे तक सबको मेला स्थल पर पहुँच जाना था । और सबको सामान सहित पहुँचाने की भी व्यवस्था करनी थी । सारा समय फोन पर व्यवस्था करते व दौड़ते भागते बीता । महिलामंडल की समिति की दो सदस्याएँ सबके घर जाकर तैयार व्यंजनों को चख भी आईं व सुधार की आवश्यकता होने पर वह भी कर आईं ।
बाहर से कुछ मेहमान भी आये हुए थे , जिनकी मेजबानी भी हमें करनी थी । शाम को ५ बजे उन्हें लेकर मेले पहुँचे , रिबन काटकर मेले का उद्घाटन हुआ । हम मेहमानों को लेकर हर एक स्टॉल पर गये । हर चीज थोड़ी थोड़ी खाई । मेला बहुत सफल रहा. सब लोग खुश थे । यहाँ जहाँ केवल एक दुकान है, जहाँ कोई हलवाई की दुकान नहीं है, जहाँ कोई होटल रेस्टॉरेंट नहीं है , लोगों के लिए बाहर का खाना खाने का यह एक सुनहरा अवसर था । बच्चे खेलों के सटॉल्स पर मजा कर रहे थे, खाना , पीना, खेल कूद, जंगल में मंगल का वातावरण था । यही सब छोटी छोटी चीजें हैं जिस से हम इतने कम लोग अपने जीवन में कुछ बदलाव व कुछ रौनक ला सकते हैं ।
इस सबका सबसे बड़ा लाभ यह था कि मिलकर काम करने के कारण हमारे बीच एक जुड़ाव आ गया । हमारे मोहल्ले में ४ नई स्त्रियाँ मकान बदल कर आईं थीं व एक महिला के पति नये नये यहाँ नौकरी पर आये थे । मिलकर काम करने से हम सब के बीच मित्रता बढ़ गयी व नई स्त्रियाँ भी हमसे घुल मिल गयीं । वैसे ही दूसरे मोहल्ले की स्त्रियों के साथ भी सद्भाव बढ़ गया ।
देखते ही देखते नौ बज गए । एक दूसरे के स्टॉल की सफलता व व्यंजन के स्वाद की बात हुई । सबके खाली बर्तन घर पहुँचाए गए । हम लगभग साढ़े नौ बजे तक यह सब काम करते रहे ।
सो जहाँ अन्य बहुत से लोगों का गणतंत्र दिवस टी वी पर कार्यक्रम देख, सिनेमा देख या फिर एक दो घंटे के ध्वाजारोहण से समाप्त हुआ, वहीं हमारा एक सप्ताह पहले से आरम्भ होकर अभी भी चल रहा है । मेले में रूपये नहीं चलते केवल कूपन चलते हैं । सोमवार को हमने कूपन गिने । अब शनिवार को हर स्त्री को उसके द्वारा हुआ खर्चा मिल जाएगा । महिलामंडल की ओर से सभी पुरुष सहायकों व पतियों के लिए एक भोज रखा जाएगा । सो हमारा गणतंत्र दिवस अभी भी चल रहा है ।
घुघूती बासूती
बुधवार, जनवरी 30, 2008
शनिवार, जनवरी 26, 2008
कैक्टस के फूल
अबकी बार खूब फूल खिले हैं
काँटेदार कैक्टस के झाड़ों में,
हो सकता है ओ प्रियतम मेरे
फूल खिलें मन की बगिया में ।
काँटों में उलझी रही जीवन भर
अब शायद कलियों फूलों से खेलूँ ,
अबके सावन में ओ साजन मेरे
हो सकता है मैं भी झूले झूलूँ ।
मन्द पवन के झोंके आकर
मन को मेरे बहला ही जाएँ,
लौट लौट यादें तेरी आकर
मन में मेरे स्वप्न जगाएँ ।
बिजली चमके बादल कड़के
जीवंत हुई सारी आकांक्षाएँ,
धरती महके, अम्बर बरसे
प्रीत की ये है अगन लगाए ।
अबकी बार खूब फूल खिले हैं
काँटेदार कैक्टस के झाड़ों में,
हो सकता है ओ निर्मोही
आ जाए तू मेरी बाँहों में ।
घुघूती बासूती
काँटेदार कैक्टस के झाड़ों में,
हो सकता है ओ प्रियतम मेरे
फूल खिलें मन की बगिया में ।
काँटों में उलझी रही जीवन भर
अब शायद कलियों फूलों से खेलूँ ,
अबके सावन में ओ साजन मेरे
हो सकता है मैं भी झूले झूलूँ ।
मन्द पवन के झोंके आकर
मन को मेरे बहला ही जाएँ,
लौट लौट यादें तेरी आकर
मन में मेरे स्वप्न जगाएँ ।
बिजली चमके बादल कड़के
जीवंत हुई सारी आकांक्षाएँ,
धरती महके, अम्बर बरसे
प्रीत की ये है अगन लगाए ।
अबकी बार खूब फूल खिले हैं
काँटेदार कैक्टस के झाड़ों में,
हो सकता है ओ निर्मोही
आ जाए तू मेरी बाँहों में ।
घुघूती बासूती
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कविता
शुक्रवार, जनवरी 25, 2008
रावण की छींक
मैंने एक चिट्ठा पढ़ा .. सीता के साथ रावण ही नहीं, लक्षमण भी संबंध बनाता था ।
देखिये, ना तो सीता जी से प्रेम है, ना राम जी से और ना लक्ष्मण जी या रावण जी से कोई शत्रुता ! परन्तु सोचने की बात यह है कि यदि सीता जी को यह सब करना था तो उन्हें क्या इसके लिए वन ही उचित स्थान लगा ? ऐसी स्त्री के लिए, या फिर लक्ष्मण जी को भी ये सब काम करने के लिए क्या नगर बेहतर जगह ना लगती ? वह भी ऐसा नगर जहाँ से राम जी जा चुके होते । मैंने तो सुना था कि हम आधुनिक लोग राम व उनके साथियों के अस्तित्व पर विश्वास ही नहीं करते । यह नहीं पता था कि विश्वास नहीं करते और साथ में यह भी कहते हैं कि यदि विश्वास करना है तो उन्हें अपने धार्मिक आदर से वंचित करो ।
वैसे यह नाक से बच्ची जन्मने व फिर उसे उठाकर ले जाने का विचार आज की स्त्रियों की घटती दर के समय में बहुत उपयोगी रहेगा । वैसे ही बच्चा जन्मना बहुत कठिन, कष्टप्रद व महंगी व समय लगाने वाली प्रक्रिया है । यदि लेखक जीवित हैं तो पुरुषों को उनसे इस विधि को सीख लेना चाहिये । छींकों का क्या सर्दियों में आती ही रहती हैं । बस एक ही डर है कि अब छींक के बाद लोग रूमाल को देखा करेंगे कि कहीं कोई बच्ची तो नहीं आई साथ में । और वे लोग जो सीधे नाक से निकले तत्व को सड़क पर फेंक देते हैं वे अनजाने में नन्हीं बच्चियों को भी फेंक रहे हैं , शायद उन्हें उसका आभास भी नहीं होगा । लेखक जी से एक और बात साफ करवा लेनी चाहिये कि यह छींक वाला उपाय केवल पुरुषों में कारगार सिद्ध होता है या स्त्रियों में भी । और सबसे महत्वपूर्ण बात तो फल की है । यह कौन सा फल खाना या ना खाना होता है यह भी उन्हें बताना चाहिये ।
जहाँ तक हनुमान जी की बात है तो भाई उनमें तो पूरा विश्वास करना चाहिये आखिर वे स्मॉल या बिग मंकी हमारे पुरखे ही तो थे ।
अंत में बोलो ...
श्री रामानुजन जी की जय !
रावण जी की नाक की जय !
रावण की छींक की जय !
घुघूती बासूती
देखिये, ना तो सीता जी से प्रेम है, ना राम जी से और ना लक्ष्मण जी या रावण जी से कोई शत्रुता ! परन्तु सोचने की बात यह है कि यदि सीता जी को यह सब करना था तो उन्हें क्या इसके लिए वन ही उचित स्थान लगा ? ऐसी स्त्री के लिए, या फिर लक्ष्मण जी को भी ये सब काम करने के लिए क्या नगर बेहतर जगह ना लगती ? वह भी ऐसा नगर जहाँ से राम जी जा चुके होते । मैंने तो सुना था कि हम आधुनिक लोग राम व उनके साथियों के अस्तित्व पर विश्वास ही नहीं करते । यह नहीं पता था कि विश्वास नहीं करते और साथ में यह भी कहते हैं कि यदि विश्वास करना है तो उन्हें अपने धार्मिक आदर से वंचित करो ।
वैसे यह नाक से बच्ची जन्मने व फिर उसे उठाकर ले जाने का विचार आज की स्त्रियों की घटती दर के समय में बहुत उपयोगी रहेगा । वैसे ही बच्चा जन्मना बहुत कठिन, कष्टप्रद व महंगी व समय लगाने वाली प्रक्रिया है । यदि लेखक जीवित हैं तो पुरुषों को उनसे इस विधि को सीख लेना चाहिये । छींकों का क्या सर्दियों में आती ही रहती हैं । बस एक ही डर है कि अब छींक के बाद लोग रूमाल को देखा करेंगे कि कहीं कोई बच्ची तो नहीं आई साथ में । और वे लोग जो सीधे नाक से निकले तत्व को सड़क पर फेंक देते हैं वे अनजाने में नन्हीं बच्चियों को भी फेंक रहे हैं , शायद उन्हें उसका आभास भी नहीं होगा । लेखक जी से एक और बात साफ करवा लेनी चाहिये कि यह छींक वाला उपाय केवल पुरुषों में कारगार सिद्ध होता है या स्त्रियों में भी । और सबसे महत्वपूर्ण बात तो फल की है । यह कौन सा फल खाना या ना खाना होता है यह भी उन्हें बताना चाहिये ।
जहाँ तक हनुमान जी की बात है तो भाई उनमें तो पूरा विश्वास करना चाहिये आखिर वे स्मॉल या बिग मंकी हमारे पुरखे ही तो थे ।
अंत में बोलो ...
श्री रामानुजन जी की जय !
रावण जी की नाक की जय !
रावण की छींक की जय !
घुघूती बासूती
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लेख
तेरे ही डर से
अपने पर विश्वास नहीं था
कि मिल ना लूँ कहीं तुझसे
जीवन की किन्हीं गलियों में
सो नाम पता सब खो आई ,
सुन ना लूँ आवाज तुम्हारी ,
सो बन्द हथेली में मैं तेरा
कच्ची स्याही से ही लिखकर
फोन का नम्बर ले आई ।
अब धुले अंकों को पढ़ने का
प्रयास ये मेरा हास्यास्पद है
इतना, कि खुद पर हँस हँस
है आँख मेरी अब भर आई,
तेरी हर बात मन के अपने
किसी अनजान से कोने में
पड़ी तिजोरी के भीतर रख
जानबूझ चाभी मैं खो आई ।
तेरी छाया से डर इतना था
पकड़ ना ले मेरी छाया को
कि हाथ छुड़ा जा अन्धेरों में
मैं अपनी छाया भी खो आई ,
निज अन्तः के तूफान से डर
तुझसे बचती और छिपती मैं
इस सन्नाटों के मरघट में
कितनी दूर हूँ निकल आई ।
रंग ना लूँ कहीं मैं भी अपने
तन मन को तेरे ही रंग में
इस डर से मैं खुद ही जाकर
कालिमा बादल की ले आई,
कहीं रात में दिख ना जाऊँ
इस भय से घबराई इतना
छिटक चाँदनी की बाँहों से
रिश्ता अमावस से कर आई ।
घुघूती बासूती
कि मिल ना लूँ कहीं तुझसे
जीवन की किन्हीं गलियों में
सो नाम पता सब खो आई ,
सुन ना लूँ आवाज तुम्हारी ,
सो बन्द हथेली में मैं तेरा
कच्ची स्याही से ही लिखकर
फोन का नम्बर ले आई ।
अब धुले अंकों को पढ़ने का
प्रयास ये मेरा हास्यास्पद है
इतना, कि खुद पर हँस हँस
है आँख मेरी अब भर आई,
तेरी हर बात मन के अपने
किसी अनजान से कोने में
पड़ी तिजोरी के भीतर रख
जानबूझ चाभी मैं खो आई ।
तेरी छाया से डर इतना था
पकड़ ना ले मेरी छाया को
कि हाथ छुड़ा जा अन्धेरों में
मैं अपनी छाया भी खो आई ,
निज अन्तः के तूफान से डर
तुझसे बचती और छिपती मैं
इस सन्नाटों के मरघट में
कितनी दूर हूँ निकल आई ।
रंग ना लूँ कहीं मैं भी अपने
तन मन को तेरे ही रंग में
इस डर से मैं खुद ही जाकर
कालिमा बादल की ले आई,
कहीं रात में दिख ना जाऊँ
इस भय से घबराई इतना
छिटक चाँदनी की बाँहों से
रिश्ता अमावस से कर आई ।
घुघूती बासूती
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कविता
गुरुवार, जनवरी 24, 2008
मैं चोर हूँ !
याद है वह हिन्दी फिल्म जिसमें एक बच्चे की बाँह पर लिख दिया गया था... मैं चोर हूँ ! या चोर का बेटा हूँ ..या कुछ ऐसा ही । कुछ वर्ष पहले पंजाब में कुछ स्त्रियों के माथे पर जेबकतरी लिख दिया गया था । यह सब समाचार पढ़ने में जितने बुरे लगते हैं कुछ उतना ही बुरा जब कोई आपकी रचना उड़ा ले जाता है और सीधे से उसके नीचे अपना नाम लिख देता है तब लगता है ।
ये रचनाचोर भी भाँति भाँति के होते हैं । कुछ एक रचना चुराकर संतोष कर लेते हैं, कोई किसी एक ही चिट्ठाकार की रचनाएँ चुराने लायक समझता है, कोई जिस किसी की रचना चुरा लेता है और अपने चिट्ठे को ..कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानमति ने कुनबा जोड़ा.. जैसा रूप दे देता है । कुछ में थोड़ी बहुत लज्जा शेष होती है व वे पकड़े जाने पर या अपना चिट्ठा हटा लेते हैं या फिर पकड़ा हुआ चोरी का माल हटा लेते हैं और बिन पकड़े माल को चलने देते हैं ।
एक हमारे मित्र हैं हिमांशु कुमाऊनी जिन्होंने ११ मई २००७ को अपना चिट्ठा लिखने का मन बनाया । हो सकता हो मन उनका बहुत समय से कर रहा हो परन्तु उन्हें किन्हीं मुझ जैसे मुर्गे/मुर्गी की प्रतीक्षा थी जो उनका मनपसंद चिट्ठा लिखे और वे उसे धड़ल्ले से कॉपी पेस्ट कर अपने चिट्ठे का श्रीगणेश कर लें।
शायद उनकी भावना कुछ संगीतमयी थी । शायद वे अपने चिट्ठे पर केवल कुमाँऊनी गीत ही देना चाहते थे । या यह भी हो सकता है कि वे कुछ गड़बड़ाए बालक हैं । उन्हें समझ ही नहीं आता कि किस दिशा में जाएँ । आरम्भ हिन्दी में कुमाँऊनी चिड़िया घुघुति से करके मेरे शब्दों में बताते हैं कि घुघूती बासूती क्या है, कौन है । कुमाँऊ के बारे में बताते हैं आदि आदि । इस चिड़िया के बारे में बताते बताते वे अपनी दीदी को भी स्वर्गीय बना देते हैं । हो सकता है उनकी दीदी हो ही नहीं, हो सकता है कि हों व भाग्य से पृथ्वीवासी ही हों । देखिये ...
वहाँ एक चिड़िया पाई जाती है जिसे कहते हैं घुघुति । एक सुन्दर सौम्य चिड़िया । मेरी स्व दीदी की प्रिय चिड़िया। जिसे मामाजी रानी बेटी की यानी दीदी की चिड़िया कहते थे ।
यह रहा इनका चिट्ठा ...........
Friday, May 11, 2007
songs
घुघूती बासूती क्या है, कौन है ?
उत्तराखंड का एक भाग है कुमाऊँ ! वही कुमाऊँ जिसने हिन्दी को बहुत से कवि, लेखक व लेखिकाएँ दीं, जैसे सुमित्रानंदन पंत,मनोहर श्याम जोशी,शिवानी आदि ।वहाँ की भाषा है कुमाऊँनी । वहाँ एक चिड़िया पाई जाती है जिसे कहते हैं घुघुति । एक सुन्दर सौम्य चिड़िया । मेरी स्व दीदी की प्रिय चिड़िया । जिसे मामाजी रानी बेटी की यानी दीदी की चिड़िया कहते थे । घुघुति का कुमाऊँ के लोकगीतों में विशेष स्थान है ।कुछ गीत तो तरुण जी ने अपने चिट्ठे में दे रखे हैं । मेरा एक प्रिय गीत है ....
घूर घुघूती घूर घूरघूर घुघूती घूर,मैत की नौराई लागीमैत मेरो दूर ।मैत =मायका, नौराई =याद आना, होम सिक महसूस करना ।किन्तु जो गहराई, जो भावना, जो दर्द नौराई शब्द में है वह याद में नहीं है । नौराई जब लगती है तो मन आत्मा सब भीग जाती है , हृदय में एक कसक उठती है । शायद नौराई लगती भी केवल अपने मायके, बचपन या पहाड़ की ही है । जब कोई कहे कि पहाड़ की नौराई लग रही है तो इसका अर्थ है कि यह भावना इतनी प्रबल है कि न जा पाने से हृदय में दर्द हो रहा है । घुघूती बासूती भी नौराई की श्रेणी का शब्द है ।
और भी बहुत से गीत हैं । एक की पंक्तियां हैं ...घुघूती बासूतीभै आलो मैं सूती ।या भै भूक गो, मैं सूती ।भै = भाईआलो=आयाभूक गो =भूखा चला गयासूती=सोई हुई थीयह एक लोक कथा का अंश है । जो कुछ ऐसे है , एक विवाहिता से मिलने उसका भाई आया । बहन सो रही थी सो भाई ने उसे उठाना उचित नहीं समझा । वह पास बैठा उसके उठने की प्रतीक्षा करता रहा । जब जाने का समय हुआ तो उसने बहन के चरयो (मंगलसूत्र) को उसके गले में में आगे से पीछे कर दिया और चला गया । जब वह उठी तो चरयो देखा । शायद अनुमान लगाया या किसी से पूछा या फिर भाई कुछ बाल मिठाई (अल्मोड़ा, कुमाऊँ की एक प्रसिद्ध मिठाई) आदि छोड़ गया होगा । उसे बहुत दुख हुआ कि भाई आया और भूखा उससे मिले बिना चला गया , वह सोती ही रह गई । वह रो रोकर यह पंक्तियाँ गाती हुई मर गई । उसने ही फिर चिड़िया बन घुघुति के रूप में जन्म लिया ।
Posted by himanshu Kumar
इसके बाद इन्हें हमारे चिट्ठा जगत के बहुत सारे साथियों ने लताड़ा परन्तु इन्होंने उफ तक न की । भोले ये इतने हैं कि इन्होंने लताड़ती हुई टिप्पणियों को हटाया तक नहीं । पहले मैं सोचती रही कि शायद ये उन लोगों में से हैं जो ब्लॉग बनाकर छोड़ देते हैं । परन्तु नहीं इन्होंने अंग्रेजी में ब्लॉगिंग चालू रखी । यही नहीं श्रीमान जी ने किसी अन्य के साथ का अपना फोटो भी दे रखा है । अब शायद आप समझें कि मैं अपना फोटो नेट पर क्यों नहीं डालना चाहती । अभी तक तो श्रीमानजी ने केवल हमारा चिट्ठा चुराया है कल कहीं ये हमारा चेहरा ही ले उड़ें तो ? फिर उसे अपनी माँ, दादी, नानी या पत्नी को ही पहना डालें तो ?
अब आपने मेरी घुघूती बासूती क्या है, कौन है ? पोस्ट आधी तो पढ़ ही ली , सो यदि मन हो समय हो तो पूरी ही पढ़ लीजिये ।
उसने ही फिर चिड़िया बन घुघुति के रूप में जन्म लिया । घुघुति के गले में, चरयो के मोती जैसे पिरो रखे हों, वैसे चिन्ह होते हैं । ऐसा लगता है कि चरयो पहना हो और आज भी वह यही गीत गाती है :घुघूती बासूतीभै आलो मैं सूती ।किन्तु कहीं घुघुति और कहीं घुघूती क्यों ? जब भी यह शब्द किसी गीत में प्रयुक्त होता है तो घुघूती बन जाता है अर्थात उच्चारण बदल जाता है ।इस शब्द के साथ लगभग प्रत्येक कुमाऊँनी बच्चे की और माँ की यादें भी जुड़ी होती हैं । हर कुमाऊँनी माँ लेटकर , बच्चे को अपने पैरों पर कुछ इस प्रकार से बैठाकर जिससे उसका शरीर माँ के घुटनों तक चिपका रहता है, बच्चे को झुलाती है और गाती है :
घुघूती बासूतीमाम काँ छू =मामा कहाँ हैमालकोटी =मामा के घरके ल्यालो =क्या लाएँगेदूध भाती =दूध भातको खालो = कौन खाएगाफिर बच्चे का नाम लेकर ........ खालो ,....... खालो कहती है और बच्चा खुशी से किलकारियाँ मारता है ।
मैं अपने प्रिय पहाड़, कुमाऊँ से बहुत दूर हूँ । पहाड़ की हूँ और समुद्र के पास रहती हूँ । कुमाऊँ से मेरा नाता टूट गया है । लम्बे समय से वहाँ नहीं गई हूँ । शायद कभी जाना भी न हो । किन्तु भावनात्मक रूप से वहाँ से जुड़ी हूँ । आज भी यदि बाल मिठाई मिल जाए तो ........वहाँ का घर का बनाया चूड़ा ( पोहा जो मशीनों से नहीं बनता , धान को पूरा पकने से पहले ही तोड़ लिया जाता है ,फिर आग में थोड़ा भूनकर ऊखल में कूट कर बनाया जाता है ।) अखरोट के साथ खाने को जी ललचाता है । आज भी उस चूड़े की , गाँव की मिट्टी की महक मेरे मन में बसी है । मुझे याद है उसकी कुछ ऐसी सुगन्ध होती थी कभी विद्यालय से घर लौटने पर वह सुगन्ध आती थी तो मैं पूछती थी कि माँ कोई गाँव से आया है क्या ? मैं कभी भी गलत नहीं होती थी । यदि कोई आता तो साथ में चूड़ा , अखरोट , जम्बू (एक तरह की सूखी पत्तियाँ जो छौंका लगाने के काम आती हैं और जिन्हें नमक के सा पीसकर मसालेदार नमक बनाया जाता है ।), भट्ट (एक तरह की साबुत दाल) , आदि लाता था और साथ में लाता था पहाड़ की मिट्टी की महक ।
वहाँ के फल , फूल, सीढ़ीनुमा खेत , धरती, छोटे दरवाजे व खिड़कियों वाले दुमंजला मकान ,गोबर से लिपे फर्श , उस फर्श व घर की चौखट पर दिये एँपण , ये सब कहीं और नहीं मिलेंगे । एँपण एक तरह की रंगोली है जो कुछ कुछ बंगाल की अल्पना जैसी है । यह फर्श को गेरू से लेप कर भीगे पिसे चावल के घोल से तीन या चार उँगलियों से बनी रेखाओं से बने चित्र होते हैं । किसी भी कुमाऊँनी घर की चौखट को इस एँपण से पहचाना जा सकता है । दिवाली के दिन हाथ की मुट्ठियों से बने लक्ष्मी के पाँव ,जो मेरे घर में भी हैं बनते हैं । वे जंगलों में फलों से लदे काफल, किलमोड़े, व हिसालू के वृक्ष । जहाँ पहाड़ों में दिन भर घूम फिर कर अपनी भूख प्यास मिटाने के लिए घर नहीं जाना पड़ता, बस फल तोड़ो और खाओ और किसी स्रोत या नौले से पानी पियो और वापिस मस्ती में लग जाओ । वे ठंडी हवाएँ ,वह बर्फ से ढकी पहाड़ों की चोटियाँ, चीड़ व देवदार के वृक्ष !बस इन्हीं यादों को , अपने छूटे कुमाऊँ को , अपनी स्व दीदी की याद को श्रद्धा व स्नेह के सुमन अर्पण करने के लिए मैंने स्वयं को नाम दिया है घुघूती बासूती ! है न काव्यात्मक व संगीतमय, मेरे कुमाऊँ की तरह !
घुघूती बासूती
पुनश्च : यह पढ़ने के बाद यदि अब आप मेरी कविता उड़ने की चाहत पढ़ें तो आपको उसके भाव सुगमता से समझ आएँगें ।
घुघूती बासूती
ये रचनाचोर भी भाँति भाँति के होते हैं । कुछ एक रचना चुराकर संतोष कर लेते हैं, कोई किसी एक ही चिट्ठाकार की रचनाएँ चुराने लायक समझता है, कोई जिस किसी की रचना चुरा लेता है और अपने चिट्ठे को ..कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानमति ने कुनबा जोड़ा.. जैसा रूप दे देता है । कुछ में थोड़ी बहुत लज्जा शेष होती है व वे पकड़े जाने पर या अपना चिट्ठा हटा लेते हैं या फिर पकड़ा हुआ चोरी का माल हटा लेते हैं और बिन पकड़े माल को चलने देते हैं ।
एक हमारे मित्र हैं हिमांशु कुमाऊनी जिन्होंने ११ मई २००७ को अपना चिट्ठा लिखने का मन बनाया । हो सकता हो मन उनका बहुत समय से कर रहा हो परन्तु उन्हें किन्हीं मुझ जैसे मुर्गे/मुर्गी की प्रतीक्षा थी जो उनका मनपसंद चिट्ठा लिखे और वे उसे धड़ल्ले से कॉपी पेस्ट कर अपने चिट्ठे का श्रीगणेश कर लें।
शायद उनकी भावना कुछ संगीतमयी थी । शायद वे अपने चिट्ठे पर केवल कुमाँऊनी गीत ही देना चाहते थे । या यह भी हो सकता है कि वे कुछ गड़बड़ाए बालक हैं । उन्हें समझ ही नहीं आता कि किस दिशा में जाएँ । आरम्भ हिन्दी में कुमाँऊनी चिड़िया घुघुति से करके मेरे शब्दों में बताते हैं कि घुघूती बासूती क्या है, कौन है । कुमाँऊ के बारे में बताते हैं आदि आदि । इस चिड़िया के बारे में बताते बताते वे अपनी दीदी को भी स्वर्गीय बना देते हैं । हो सकता है उनकी दीदी हो ही नहीं, हो सकता है कि हों व भाग्य से पृथ्वीवासी ही हों । देखिये ...
वहाँ एक चिड़िया पाई जाती है जिसे कहते हैं घुघुति । एक सुन्दर सौम्य चिड़िया । मेरी स्व दीदी की प्रिय चिड़िया। जिसे मामाजी रानी बेटी की यानी दीदी की चिड़िया कहते थे ।
यह रहा इनका चिट्ठा ...........
Friday, May 11, 2007
songs
घुघूती बासूती क्या है, कौन है ?
उत्तराखंड का एक भाग है कुमाऊँ ! वही कुमाऊँ जिसने हिन्दी को बहुत से कवि, लेखक व लेखिकाएँ दीं, जैसे सुमित्रानंदन पंत,मनोहर श्याम जोशी,शिवानी आदि ।वहाँ की भाषा है कुमाऊँनी । वहाँ एक चिड़िया पाई जाती है जिसे कहते हैं घुघुति । एक सुन्दर सौम्य चिड़िया । मेरी स्व दीदी की प्रिय चिड़िया । जिसे मामाजी रानी बेटी की यानी दीदी की चिड़िया कहते थे । घुघुति का कुमाऊँ के लोकगीतों में विशेष स्थान है ।कुछ गीत तो तरुण जी ने अपने चिट्ठे में दे रखे हैं । मेरा एक प्रिय गीत है ....
घूर घुघूती घूर घूरघूर घुघूती घूर,मैत की नौराई लागीमैत मेरो दूर ।मैत =मायका, नौराई =याद आना, होम सिक महसूस करना ।किन्तु जो गहराई, जो भावना, जो दर्द नौराई शब्द में है वह याद में नहीं है । नौराई जब लगती है तो मन आत्मा सब भीग जाती है , हृदय में एक कसक उठती है । शायद नौराई लगती भी केवल अपने मायके, बचपन या पहाड़ की ही है । जब कोई कहे कि पहाड़ की नौराई लग रही है तो इसका अर्थ है कि यह भावना इतनी प्रबल है कि न जा पाने से हृदय में दर्द हो रहा है । घुघूती बासूती भी नौराई की श्रेणी का शब्द है ।
और भी बहुत से गीत हैं । एक की पंक्तियां हैं ...घुघूती बासूतीभै आलो मैं सूती ।या भै भूक गो, मैं सूती ।भै = भाईआलो=आयाभूक गो =भूखा चला गयासूती=सोई हुई थीयह एक लोक कथा का अंश है । जो कुछ ऐसे है , एक विवाहिता से मिलने उसका भाई आया । बहन सो रही थी सो भाई ने उसे उठाना उचित नहीं समझा । वह पास बैठा उसके उठने की प्रतीक्षा करता रहा । जब जाने का समय हुआ तो उसने बहन के चरयो (मंगलसूत्र) को उसके गले में में आगे से पीछे कर दिया और चला गया । जब वह उठी तो चरयो देखा । शायद अनुमान लगाया या किसी से पूछा या फिर भाई कुछ बाल मिठाई (अल्मोड़ा, कुमाऊँ की एक प्रसिद्ध मिठाई) आदि छोड़ गया होगा । उसे बहुत दुख हुआ कि भाई आया और भूखा उससे मिले बिना चला गया , वह सोती ही रह गई । वह रो रोकर यह पंक्तियाँ गाती हुई मर गई । उसने ही फिर चिड़िया बन घुघुति के रूप में जन्म लिया ।
Posted by himanshu Kumar
इसके बाद इन्हें हमारे चिट्ठा जगत के बहुत सारे साथियों ने लताड़ा परन्तु इन्होंने उफ तक न की । भोले ये इतने हैं कि इन्होंने लताड़ती हुई टिप्पणियों को हटाया तक नहीं । पहले मैं सोचती रही कि शायद ये उन लोगों में से हैं जो ब्लॉग बनाकर छोड़ देते हैं । परन्तु नहीं इन्होंने अंग्रेजी में ब्लॉगिंग चालू रखी । यही नहीं श्रीमान जी ने किसी अन्य के साथ का अपना फोटो भी दे रखा है । अब शायद आप समझें कि मैं अपना फोटो नेट पर क्यों नहीं डालना चाहती । अभी तक तो श्रीमानजी ने केवल हमारा चिट्ठा चुराया है कल कहीं ये हमारा चेहरा ही ले उड़ें तो ? फिर उसे अपनी माँ, दादी, नानी या पत्नी को ही पहना डालें तो ?
अब आपने मेरी घुघूती बासूती क्या है, कौन है ? पोस्ट आधी तो पढ़ ही ली , सो यदि मन हो समय हो तो पूरी ही पढ़ लीजिये ।
उसने ही फिर चिड़िया बन घुघुति के रूप में जन्म लिया । घुघुति के गले में, चरयो के मोती जैसे पिरो रखे हों, वैसे चिन्ह होते हैं । ऐसा लगता है कि चरयो पहना हो और आज भी वह यही गीत गाती है :घुघूती बासूतीभै आलो मैं सूती ।किन्तु कहीं घुघुति और कहीं घुघूती क्यों ? जब भी यह शब्द किसी गीत में प्रयुक्त होता है तो घुघूती बन जाता है अर्थात उच्चारण बदल जाता है ।इस शब्द के साथ लगभग प्रत्येक कुमाऊँनी बच्चे की और माँ की यादें भी जुड़ी होती हैं । हर कुमाऊँनी माँ लेटकर , बच्चे को अपने पैरों पर कुछ इस प्रकार से बैठाकर जिससे उसका शरीर माँ के घुटनों तक चिपका रहता है, बच्चे को झुलाती है और गाती है :
घुघूती बासूतीमाम काँ छू =मामा कहाँ हैमालकोटी =मामा के घरके ल्यालो =क्या लाएँगेदूध भाती =दूध भातको खालो = कौन खाएगाफिर बच्चे का नाम लेकर ........ खालो ,....... खालो कहती है और बच्चा खुशी से किलकारियाँ मारता है ।
मैं अपने प्रिय पहाड़, कुमाऊँ से बहुत दूर हूँ । पहाड़ की हूँ और समुद्र के पास रहती हूँ । कुमाऊँ से मेरा नाता टूट गया है । लम्बे समय से वहाँ नहीं गई हूँ । शायद कभी जाना भी न हो । किन्तु भावनात्मक रूप से वहाँ से जुड़ी हूँ । आज भी यदि बाल मिठाई मिल जाए तो ........वहाँ का घर का बनाया चूड़ा ( पोहा जो मशीनों से नहीं बनता , धान को पूरा पकने से पहले ही तोड़ लिया जाता है ,फिर आग में थोड़ा भूनकर ऊखल में कूट कर बनाया जाता है ।) अखरोट के साथ खाने को जी ललचाता है । आज भी उस चूड़े की , गाँव की मिट्टी की महक मेरे मन में बसी है । मुझे याद है उसकी कुछ ऐसी सुगन्ध होती थी कभी विद्यालय से घर लौटने पर वह सुगन्ध आती थी तो मैं पूछती थी कि माँ कोई गाँव से आया है क्या ? मैं कभी भी गलत नहीं होती थी । यदि कोई आता तो साथ में चूड़ा , अखरोट , जम्बू (एक तरह की सूखी पत्तियाँ जो छौंका लगाने के काम आती हैं और जिन्हें नमक के सा पीसकर मसालेदार नमक बनाया जाता है ।), भट्ट (एक तरह की साबुत दाल) , आदि लाता था और साथ में लाता था पहाड़ की मिट्टी की महक ।
वहाँ के फल , फूल, सीढ़ीनुमा खेत , धरती, छोटे दरवाजे व खिड़कियों वाले दुमंजला मकान ,गोबर से लिपे फर्श , उस फर्श व घर की चौखट पर दिये एँपण , ये सब कहीं और नहीं मिलेंगे । एँपण एक तरह की रंगोली है जो कुछ कुछ बंगाल की अल्पना जैसी है । यह फर्श को गेरू से लेप कर भीगे पिसे चावल के घोल से तीन या चार उँगलियों से बनी रेखाओं से बने चित्र होते हैं । किसी भी कुमाऊँनी घर की चौखट को इस एँपण से पहचाना जा सकता है । दिवाली के दिन हाथ की मुट्ठियों से बने लक्ष्मी के पाँव ,जो मेरे घर में भी हैं बनते हैं । वे जंगलों में फलों से लदे काफल, किलमोड़े, व हिसालू के वृक्ष । जहाँ पहाड़ों में दिन भर घूम फिर कर अपनी भूख प्यास मिटाने के लिए घर नहीं जाना पड़ता, बस फल तोड़ो और खाओ और किसी स्रोत या नौले से पानी पियो और वापिस मस्ती में लग जाओ । वे ठंडी हवाएँ ,वह बर्फ से ढकी पहाड़ों की चोटियाँ, चीड़ व देवदार के वृक्ष !बस इन्हीं यादों को , अपने छूटे कुमाऊँ को , अपनी स्व दीदी की याद को श्रद्धा व स्नेह के सुमन अर्पण करने के लिए मैंने स्वयं को नाम दिया है घुघूती बासूती ! है न काव्यात्मक व संगीतमय, मेरे कुमाऊँ की तरह !
घुघूती बासूती
पुनश्च : यह पढ़ने के बाद यदि अब आप मेरी कविता उड़ने की चाहत पढ़ें तो आपको उसके भाव सुगमता से समझ आएँगें ।
घुघूती बासूती
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लेख
बुधवार, जनवरी 23, 2008
मेरी कविताओं में उदासी क्यों है ?
मेरे कुछ मित्र मुझसे पूछते हैं कि मेरी कविताओं में इतनी उदासी, इतना दर्द क्यों होता है ? मैं मानती हूँ कि उनमें दर्द की मात्रा कुछ अधिक होती है । किन्तु यह भी तो आवश्यक नहीं कि यह दर्द मेरा अपना ही हो ,या मन का दर्द ही हो । कुछ दर्द शारीरिक, मानसिक व आत्मिक भी होते हैं । कुछ रचनाएँ अपने जीवन की सच्चाई से प्रेरित होती हैं, कुछ अपने आसपास के जीवन से, तो कुछ अपने काल्पनिक पात्रों पर लिखी होती हैं । कुछ पात्र इतने सजीव हो जाते हैं कि वे स्वयं के जीवन पर ही छा जाते हैं । कभी कभी तो मैं उनकी तरह सोचने भी लग जाती हूँ । यह भी सच है कि कुछ रचनाएँ तब लिखती हूँ जब मन गहरी उदासी से घिरा होता है , कुछ तब जब शरीर पीडा से युद्ध कर थक गया होता है ।
एक बात और है, मनुष्य आम तौर पर मित्रों के बीच हँसी ठिठोली करता है, किन्तु उन क्षणों में वह कागज कलम लिए हुए नहीं होता, न ही कमप्यूटर के सामने । उदासी तो बादलों की तरह तब घेरती है जब वह अकेला होता है और लिखना भी तब ही होता है । शायद यह भी सच है कि हास्य लिखना बहुत कठिन है व उसके लिए भाषा की पकड गहरी चाहिए, जो मेरी नहीं है । हल्का फुल्का लिखने के लिए बाहर के जीवन के अनुभव चाहिए जो कि मेरे पास कम ही हैं । कविता मन में एक आँधी की तरह आती है और स्वयं को लिखवा कर चली जाती है । तब लिखने या न लिखने या आलस्य का प्रश्न ही नहीं उठता, वह तो मुझे केवल माध्यम बनाती है । उस पर मेरा वश ही कहाँ है ? आवश्यकता होती है तो किसी भी प्रकार के कागज, चाहे वह टिशू पेपर ही हो या हाथ के समाचार पत्र का हाशिया और एक अदद कलम की ।
मेरा लेखन मेरे मन में वर्षों से घूमती कुछ कहानियों के कारण आरम्भ हुआ । इन पात्रों ने ही मुझे लिखने को बाध्य किया । कविताएँ भी इन्हीं पात्रों की देन हैं । मैंने अपनी पहली कविता अंग्रेजी में अपनी नायिका के लिए या यूँ कहिए अपनी नायिका से लिखवाई थी । कमप्यूटर के सीमित ग्यान के कारण मैं अपनी मेहनत खो बैठी । गद्य तो खो बैठी किन्तु कुछ कविताएँ डायरी में भी लिखी होने के कारण बच गईं । महीनों की मेहनत इस प्रकार से खोने के बाद गद्य के प्रति उदासीन हो गई थी । शायद अंग्रेजी से भी । फिर हिन्दी लिखने का शौक चर्राया और उसी शौक को ही आप लोग झेल रहे हैं और आशा करती हूँ कि झेलते रहेंगे । अब तो कभी कभी गद्य लिखने का भी यत्न करने लगी हूँ ।
घुघूती बासूती
एक बात और है, मनुष्य आम तौर पर मित्रों के बीच हँसी ठिठोली करता है, किन्तु उन क्षणों में वह कागज कलम लिए हुए नहीं होता, न ही कमप्यूटर के सामने । उदासी तो बादलों की तरह तब घेरती है जब वह अकेला होता है और लिखना भी तब ही होता है । शायद यह भी सच है कि हास्य लिखना बहुत कठिन है व उसके लिए भाषा की पकड गहरी चाहिए, जो मेरी नहीं है । हल्का फुल्का लिखने के लिए बाहर के जीवन के अनुभव चाहिए जो कि मेरे पास कम ही हैं । कविता मन में एक आँधी की तरह आती है और स्वयं को लिखवा कर चली जाती है । तब लिखने या न लिखने या आलस्य का प्रश्न ही नहीं उठता, वह तो मुझे केवल माध्यम बनाती है । उस पर मेरा वश ही कहाँ है ? आवश्यकता होती है तो किसी भी प्रकार के कागज, चाहे वह टिशू पेपर ही हो या हाथ के समाचार पत्र का हाशिया और एक अदद कलम की ।
मेरा लेखन मेरे मन में वर्षों से घूमती कुछ कहानियों के कारण आरम्भ हुआ । इन पात्रों ने ही मुझे लिखने को बाध्य किया । कविताएँ भी इन्हीं पात्रों की देन हैं । मैंने अपनी पहली कविता अंग्रेजी में अपनी नायिका के लिए या यूँ कहिए अपनी नायिका से लिखवाई थी । कमप्यूटर के सीमित ग्यान के कारण मैं अपनी मेहनत खो बैठी । गद्य तो खो बैठी किन्तु कुछ कविताएँ डायरी में भी लिखी होने के कारण बच गईं । महीनों की मेहनत इस प्रकार से खोने के बाद गद्य के प्रति उदासीन हो गई थी । शायद अंग्रेजी से भी । फिर हिन्दी लिखने का शौक चर्राया और उसी शौक को ही आप लोग झेल रहे हैं और आशा करती हूँ कि झेलते रहेंगे । अब तो कभी कभी गद्य लिखने का भी यत्न करने लगी हूँ ।
घुघूती बासूती
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लेख
सोमवार, जनवरी 21, 2008
तब क्या करोगी ???
तब क्या करोगी
जब तुम्हारा सूर्य
भूल जाये देना तुम्हें
अपना प्रकाश?
जब बादलों से घिरा रहे
हरदम तुम्हारा आकाश।
जब इतना अँधेरा छा जाये,
कि तुम स्वयं को भी ना देख पाओ।
इस अँधेरे में दिन क्या
वर्ष बीत जाएँ।
क्या करोगी युगों
उसका इन्तजार ?
या फिर इक दीया जलाकर
कुछ पाओगी प्रकाश ?
आरती का थाल सजाकर,
चाँदी के पात्र में ले जल
अर्घ ले रहोगी हरदम तैयार?
शायद आज सूर्य निकल आए
शायद आज होगा नव प्रभात,
सूर्य किरण बिखराएगा,
शायद वह घर आयेगा,
शायद छूएगा मन का आकाश,
अपनी रश्मि से तन मन
बारम्बार नहलाएगा।
क्या तुम स्वयं प्रतीक्षा
बन जाओगी ?
या फिर किसी चाँद की
खोज में निकल जाओगी?
वह चाँद जो अपनी चाँदनी
लिए कर रहा है इन्तजार,
क्या सूर्य किरण की चाहत लेकर
शशि प्रभा ही बन जाओगी?
या फिर युगों तक बन धरा
सूर्य की चाहत में
परिक्रमा उसकी हर पल लगाओगी ?
चाहे सूर्य ना दे तुम्हे अपना प्रकाश
फिर भी उसकी आस में
अँधेरे दिन बिताओगी ?
तब क्या करोगी
जब तुम्हारा सूर्य
पा जाए अवकाश
किन्तु तुम पाओ
कि अब नही आँखें
सह पाती प्रकाश।
भूल गया है तन
सूर्य का मादक स्पर्श
भूल गया है मन
उसकी गर्माहट
अब तो तुम हिम शिला
में हो गयी परिवर्तित।
क्या तब तुम्हारा सूर्य
तुम्हे पिघला पाएगा?
क्या वह बिसरे दिन
वापिस ला पाएगा ?
क्या वह गुजरा यौवन
लौटा लाएगा ?
बालों में तब चाँदी होगी
चेहरे पर तब बीते वर्षों ने
छोड़ी होंगी कितनी सारी रेखाएँ
हाथों में तब कम्पन होगा
साँसो पर ना काबू होगा।
क्या तुम बुन पाओगी
तब भी कल से सपने ?
तब क्या करोगी ?
बोलो तब क्या करोगी ?
घुघुती बासूती
जब तुम्हारा सूर्य
भूल जाये देना तुम्हें
अपना प्रकाश?
जब बादलों से घिरा रहे
हरदम तुम्हारा आकाश।
जब इतना अँधेरा छा जाये,
कि तुम स्वयं को भी ना देख पाओ।
इस अँधेरे में दिन क्या
वर्ष बीत जाएँ।
क्या करोगी युगों
उसका इन्तजार ?
या फिर इक दीया जलाकर
कुछ पाओगी प्रकाश ?
आरती का थाल सजाकर,
चाँदी के पात्र में ले जल
अर्घ ले रहोगी हरदम तैयार?
शायद आज सूर्य निकल आए
शायद आज होगा नव प्रभात,
सूर्य किरण बिखराएगा,
शायद वह घर आयेगा,
शायद छूएगा मन का आकाश,
अपनी रश्मि से तन मन
बारम्बार नहलाएगा।
क्या तुम स्वयं प्रतीक्षा
बन जाओगी ?
या फिर किसी चाँद की
खोज में निकल जाओगी?
वह चाँद जो अपनी चाँदनी
लिए कर रहा है इन्तजार,
क्या सूर्य किरण की चाहत लेकर
शशि प्रभा ही बन जाओगी?
या फिर युगों तक बन धरा
सूर्य की चाहत में
परिक्रमा उसकी हर पल लगाओगी ?
चाहे सूर्य ना दे तुम्हे अपना प्रकाश
फिर भी उसकी आस में
अँधेरे दिन बिताओगी ?
तब क्या करोगी
जब तुम्हारा सूर्य
पा जाए अवकाश
किन्तु तुम पाओ
कि अब नही आँखें
सह पाती प्रकाश।
भूल गया है तन
सूर्य का मादक स्पर्श
भूल गया है मन
उसकी गर्माहट
अब तो तुम हिम शिला
में हो गयी परिवर्तित।
क्या तब तुम्हारा सूर्य
तुम्हे पिघला पाएगा?
क्या वह बिसरे दिन
वापिस ला पाएगा ?
क्या वह गुजरा यौवन
लौटा लाएगा ?
बालों में तब चाँदी होगी
चेहरे पर तब बीते वर्षों ने
छोड़ी होंगी कितनी सारी रेखाएँ
हाथों में तब कम्पन होगा
साँसो पर ना काबू होगा।
क्या तुम बुन पाओगी
तब भी कल से सपने ?
तब क्या करोगी ?
बोलो तब क्या करोगी ?
घुघुती बासूती
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कविता
मंगलवार, जनवरी 15, 2008
क्या अब भी उस लड़की को छलांग ना लगाने की सलाह दोगे ?
नववर्ष को मुम्बई में हुई घटना के बाद भी क्या आप यही सोचते हैं कि एक अकेली लड़की यार्ड को जाती ट्रेन में सुरक्षित है ? २५ जून २००७ को मैंने एक पोस्ट लिखी थी, जिसमें इस लड़की को जीवन में पहली बार लगे भय की बात की थी ।
वह निर्भय थी । भय क्या होता है, उसने कभी नहीं जाना था । ना उसे अन्धेरे से भय लगता था, ना साँप या बिच्छू से । छात्रावास में जब साँप या बिच्छू निकलता तो वही उन्हें मारती या भगाती थी । ना उसे भूत प्रेत का भय था ना अकेले रहने से । बिल्कुल नए शहर में भी वह नए मकान में रात को अकेले रह जाती थी । सभी उसके साहस की दाद देते थे । उसकी बड़ी बहन तो यहाँ तक कहती थी कि काश मुझे थोड़ा कम डर लगता और इसे थोड़ा सा डर तो होता । जिस लड़की ने सदा अपने निर्णय स्वयं लिए , जिसे ना परिणामों का डर था ना कठिन रास्ते का । जिसने जो उसे सही लगा सदा वही किया, वह आज कैसे डर गई ?
यह उसके भय के उद्गार हैं .....
भय
मैंने ना जाना था भय कभी
निर्भय ही जीना जाना था
ना डरी अन्धेरी रात से कभी
ना बिच्छू से या साँपों से
भय ना लगा कभी अकेले
ना भूतों ना दैत्यों का ।
सदा अकेली चलने वाली मैं
कैसे उस दिन यूँ घब
नए शहर में निकल पड़ी
पहले दिन ना घबड़ाई
लोकल ट्रेन पकड़ अकेले
करती थी मैं आवाजाही ।
उस दिन कुछ नया नहीं था
जा बैठी मैं लोकल ट्रेन में
कोई नहीं था उस डब्बे में
सो थोड़ा सा चौंक गई मैं
जबतक कुछ सोचूँ उतरो
उतरो सबने चिल्लाया ।
यार्ड जा रही ट्रेन वह
चलने लग गई वह
पल भर सोचा मैंने
यदि कूदी तो मरूँगी
या फिर चोट खाऊँगी
फिर भी मैं कूदी उससे ।
क्यों कूदी मैं उससे ?
क्या जान नहीं थी प्यारी
इक क्षण में समझी मैं
क्यों जौहर करती थीं क्षत्राणी
उस इक क्षण में समझी मैं
क्या अर्थ है स्त्री होने का
क्या भय होता है बलात्कार का ।
कैसे मुझे स्वीकार था मरना
कैसे मुझे भय लगा यार्ड का
जहाँ हो सकते थे पुरुष बस
नोच खा सकते थे मुझे जो
इक क्षण में मेरे मन ने
मरने से ना डर दिखलाया ।
हुआ यूँ कि वह मुम्बई शहर में नई नई गई थी । वहाँ गई भी अकेली थी । बिना किसी की सहायता के वह रोज लोकल ट्रेन से सफर कर रही थी । वह दिन भी और दिनों सा था । कुछ नया या अलग नहीं था । स्टेशन पर ट्रेन आई व वह उसमें चढ़ गई । उसे अजीब या कुछ गलत तब लगा जब कोई और उस डिब्बे में नहीं चढ़ा । तभी कुछ लोग चिल्लाने लगे कि उतरो उतरो, यह ट्रेन तो यार्ड में जा रही है । इतने में ट्रेन चल पड़ी । उसके पास बस एक क्षण था निर्णय लेने का । या छलांग लगाए या यार्ड पहुँच जाए । उस एक क्षण में उसे लगा यार्ड जाना याने शायद वहाँ अकेली स्त्री होना व शायद बलात्कार की संभावना और छलांग लगाना याने मरना या घायल होना । बस चलती ट्रेन से उसने छलांग लगा दी । भाग्य से जान बच गई बस कुछ चोटें ही आईं पर सबसे बड़ी चोट उसके अहम् व उसकी निर्भयता को लगी ।
रात को जब उसने घर फोन किया तो वह पिता को पूरी बात बताती रही तथा चेन खींचने का खयाल न आने के कारण स्वयं पर हँसती रही । पिता भी तसल्ली देते रहे और मजाक करते रहे कि अभी तो जेब कटने, मोबाइल चोरी होने का अनुभव बाँकी है । जब तक यह सब ना हो तो मुम्बई का अनुभव अधूरा है । फिर उसने माँ से बात की । माँ उसके दर्द को अनुभव कर रही थी । पर उसका दर्द चोट का नहीं था । वह रो रही थी और कह रही थी, "माँ आज मैंने जाना कि स्त्री होने की क्या हानि है । मैंने कभी भी स्वयं को कमजोर नहीं समझा था । मुझे कभी भी भय नहीं लगा था । इस भय को मैंने पहली बार जाना । क्या यह भय स्त्री में नैसर्गिक होता है ? माँ , उस एक पल में मैं कल्पना कर सकी कि केवल पुरुषों की उपस्थिति में उस यार्ड में मेरे साथ क्या हो सकता था । और वह कल्पना इतनी भयानक थी कि मैंने चलती गाड़ी से छलांग लगा मरना या घायल होना बेहतर समझा । माँ यह नग्न भय था । भय अपने सबसे खूँखार रूप में । इस भय में कोई मिलावट या सोचने जैसा कुछ नहीं था । माँ मैं ऐसे भय के जीवन से घृणा करती हूँ । माँ यह उचित नहीं है, यह न्याय नहीं है । मुझे भय केवल इसलिए लगा कि मैं स्त्री हूँ । यदि पुरुष होती तो न डरती । माँ मैं इस संवेदना से घृणा करती हूँ । मैं ऐसा जीवन नहीं जीना चाहती जिसमें भय हो । ओह माँ, मैं उस संवेदना के बारे में सोच कर ही सिहर जाती हूँ । माँ, मुझे स्त्री क्यों बनाया तुमने ? यदि पुरुष मुझमें ऐसी भावना जगा सकते हैं तो मुझे पुरुष पसन्द नहीं । मैं कभी किसी पुरुष को जन्म नहीं दूँगी । हम ही उन्हें जन्म दें और फिर उन्हीं से डरें । जिसे तुमने जन्म दिया उससे तुम कैसे डर सकती हो ? क्या तुमने कभी इस डर का अनुभव किया ? यदि किया था तो मुझे भी इसे झेलने को जन्म क्यों दिया तुमने ? बचपन में जब क्षत्राणियों द्वारा जौहर को उनकी वीरता, उनकी महानता के रूप में पढ़ती थी तो बहुत आश्चर्य होता था कि यह क्या तुक हुई । पर माँ आज मैं उनके जौहर को समझ सकती हूँ । बलात्कार या मृत्यु की संभावना में से मैंने भी मृत्यु की संभावना को चुना । क्यों माँ, यह गलत है । मैंने तो पढ़ा था कि जीने की चाह ही स्वाभाविक है । तो फिर स्त्री के लिए यह अलग कैसे हो गया ? क्यों जीने की स्वाभाविक चाह मृत्यु से हार गई ?"माँ क्या उत्तर देती ? है किसी के पास इसका उत्तर ?घुघूती बासूती
उस समय १३ टिप्पणियाँ आईं थी । मैं आपसे अनुरोध करती हूँ कि जो बहस या चर्चा का विषय रहा उसके आधार पर लोग अपनी राय दें । मैं बहुत आभारी होउँगी ।
13 टिप्पणियाँ:
Udan Tashtari ने कहा…
मुझे लगा यह अति है. हरदम तो ऐसा नहीं होता. एक खराब मछली हजार मछलियों को बदनाम करती है. मुझे लगता है कि और अधिक आत्म विश्वास की आवश्यक्ता है, बस. कौन ज्यादा ताकतवर. आप निरीह हो जायें तो सब लूटेंगे वरना किसकी मजाल. बस यही सोच जगाना होगी...किस बात का भय और कैसी भावना!!! निरीह बने पुरुष को पुरुष ही रौंद जाता है...ऐसा न सोंचे. वैसे बहुत दिन बाद दिखीं, क्या बात है?
Gyandutt Pandey ने कहा…
यह भय तो वैसा ही है कि कल मुझे कोई भ्रष्ट कहे - या प्रमाणित कर दे तो मैं जीने की बजाय मरना पसन्द करूं. हर व्यक्ति - नर या नारी अपने लिये जो सीमा बनाता है तो अपने को भय के अधीन करता है. भय से मुक्ति, सोच में निहित है - सामाजिक मान्यताओं में नहीं. मैं सदा विक्तोर फ्रेंकल को याद करता हूं जो नात्सी उत्पीड़न केंद्रों में भी मात्र अपनी सोच के साथ भय मुक्त रहे - अपने उत्पीड़कों से भी अधिक मुक्त!
काकेश ने कहा
आपकी बात में सच्चाई तो है पर यह भय तो मानसिक है वास्तविक नहीं, ये भय स्त्री को हो सकता है तो पुरुष को भी हो सकता है..कि क्या होगा उसका अकेले वो जायेगा तो..इतने अनजाने लोगों के बीच.मन को यदि थोड़ा सा मजबूत कर लें तो सारे भय स्वत: मिट जाते हैं.इसके लिये हमें अपनी नयी पीढ़ी को ऎसी सकारात्मक शिक्षा देने की जरूरत है जिससे वह इन भयों से मुक्ति पा सके.
masijeevi < ने कहा…
भय सिर्फ एक निर्मिति है, हम और हमारा वातावरण इसे चारों और गढ़ते हैं- ये हमारे अंधेरे गुहों ये निकलकर जब तब झपट लेता है हमें, ताक में हमेशा ही होता है- वह डरी क्योंकि मिथ्या ही वह मानती आयी थी कि अपने भयों की वह अकेली नियंता है, सिर्फ वह अपने भय निर्मित करेगी- उका भय वाकी भी निर्मित करते हैं। और जिसे जन्म देती है उससे नहीं डरती, उनके अलावा से ही डरती है हर दोपाया लिंगधारी पुत्र नहीं हो सकता जेसे कि हर दोपाया लिंगधारी बलात्कारी नहीं होता।
masijeevi ने कहा…
और हॉं मुझे न जाने क्यों 'आशंका' हो रही है, (अभी पूरा विश्वास तो नहीं) कि ऊपर समीरजी ने आज यह टिप्पणी पोस्ट पढ़कर की है।
अभय तिवारी ने कहा…
बहुत ही अच्छा लिखा.. साहस और संवेदना का अद्भुत मिश्रण है आपमें.. साहस सिर्फ़ अँधेरे अकेले कमरे में सो जाने का ही नहीं.. ऐसे विषयों पर कलम चलाने का.. और अपनी निर्भय छवि को तोड़ सकने का भी..
अतुल शर्मा ने कहा…
यह भय एक सत्य है और इससे मुँह नहीं मोड़ा जा सकता। बातों की लीपा पोती से इस पर पर्दा नहीं डाला जा सकता। यहाँ भी कोई इस बात को नहीं स्वीकार नहीं कर रहा कि एक लड़की को रात को किसी निर्जन स्थान पर जाने में क्यों भय है। सब एक जैसे नहीं होते परंतु जो मिलेंगे वो कैसे होंगे, किसे पता। पहली बार जिस भय का अनुभव किया तो ऐसे विचार बन जाना स्वाभाविक है। ये अतिशयोक्ति लगे तो उन बालक बालिकाओं के बारे क्या जो बचपन में ही वीरान यार्ड में अंजान से नहीं बल्कि घर में, पास-पड़ौस में अपनों से इस भय को पा लेते हैं।उत्तर तो शायद ही कोई दे पाए।
sunita (shanoo) ने कहा…
घुघूती जी मैने कई बार इस बारे में सोचा मगर हर बार खुद को अकेले पाया...एसा नही की औरत में आत्मबल नही है या उसमे साहस नही है...सब कुछ है औरत मे पुरूष की अपेक्षा आत्मबल और साहस दोनो ज्यादा है मगर इश्वर की और से उसे एक नाजुक मन और नाजुक शरीर दिया गया है मै मानती हूँ की समीर भाई ने जो लिखा वह ठीक है मगर ऐक औरत अपना बचाव कैसे कर पायेगी जब चार या पाँच बलात्कारियों के बीच फ़ंस जायेगी?हाँ ये बात भी सत्य है की उस वक्त एक प्रतिशत वह अपने चातुर्य से बेवाकूफ़ बना पाये मगर इंसान और वहशी दरिंदे में फ़र्क होता है...औरत को पुरूष से डर नही डर है तो उनसे जो अपना पुरूषत्व खो बैठे है...जब रक्षक ही भक्षक बन जाये तो क्या किया जाये... जैसे एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है वैसे ही आजकल दिन रात होने वाली वारदातों ने डर पैदा कर दिया है...मगर फ़िर भी मेरे खयाल से एक माँ अपनी बेटी को यही कहेगी की तुम डरो मत,तुम्हारा साहस तुम्हारा आत्मबल ही सबसे बढ़ा साथी है उस वक्त जब तुम अकेली हो या घबरा रही हो...सुनीता(शानू)
अफलातून ने कहा…
समाज का आधे से अधिक हिस्सा एक लड़की के भय को समझने की संवेदना भी नहीं रखता !
Sanjeet Tripathi ने कहा…
क्या कहूं इस बात पर!!जिस परिस्थिति की बात आप कर रही है उस परिस्थिति में पहुंचकर हर नारी डर ही जाती है!!नारी एकबारगी चोर-उचक्को से नहीं डरेगी पर ऐसे हालत में डरती ही है……अफ़लातून जी की बातों में सच्चाई नज़र आती है मुझे!!
Divine India ने कहा…
वैसे मुम्बई में स्त्रियाँ रात के 1:30 बजे भी सफर करती है… हाँ भय का कोई कारण नहीं होता और स्थान-2 का फर्क भी होता है किंतु जब हम आत्मबल को छोड़ दे तो और हम पर हावी होने में समय नहीं लगायेंगे।
Vijendra S. Vij ने कहा…
सभी के अपने अपने द्रष्टिकोण है "मुझे भय केवल इसलिए लगा कि मैं स्त्री हूँ । यदि पुरुष होती तो न डरती । " यह दावा पुख्ता नही लगा. ..समीर जी की बात "निरीह बने पुरुष को पुरुष ही रौंद जाता है..." काफी असरदार सच्चाई है...लेख बढिया लगा..शब्द सच कह रहे है..
swapandarshi ने कहा…
Sabhi ke views ki kadra karate huye likhti hoo ki, aapke savaal ka ek matra jabab hai ki sabhi civilized or humane log ek behtar samaj banane mei sakriya bhaagidaari nibhaye. Rape ka dar sirf kisi ek jagah par kendrit nahi hai. Jitana unsafe railway ka khali yard hota hai, utana koi surkshit ghar bhi, school bhi?Ham apani bhumika as a individual bhi nibha sakate hai or kisi samajik process ka part bankar bhi.Sunsaan sadak mei nikalate samay dar lagta hai, par jaise hi koi doosari women nazar aati hai safety ka ahsas hota hai. Adhik se adhik aurate agar ghar se bahar nikle, din me, raat mei, safe, unsafe sabhi jagah par to aadhi se adhik problem solve ho sakti hai.Women have to reclaim common place for them and for safer society.Baki marna/suicide kisi baat ka hal nahi hai. Agar koi rape ka shikar hota bhi hai, to himmat rakhe/himmat de, or justice ke liye fight kare, as a individual or as a society. Ham jungle mei nahi rahate. Priyadarshini Matto ke Father or friends ne ye karke dikhaya hai.Doosara, apane bacho ko bhai bahano ko, sabhi ko safety se avagat karaye, apani safety ke protocol banane padte hai. or self-confidence ko bhi reality ke dharatal par rakh kar hi dekhana chiye.By the way mene is tarah ki galati ki hai, or mei is tarah ke yard se sahi salamat bahar nikal kar aayi hoo.Ye achcha hai ki aapne Daar ki problem ko is bahas mei shamil kiya hai.
घुघूती बासूती
वह निर्भय थी । भय क्या होता है, उसने कभी नहीं जाना था । ना उसे अन्धेरे से भय लगता था, ना साँप या बिच्छू से । छात्रावास में जब साँप या बिच्छू निकलता तो वही उन्हें मारती या भगाती थी । ना उसे भूत प्रेत का भय था ना अकेले रहने से । बिल्कुल नए शहर में भी वह नए मकान में रात को अकेले रह जाती थी । सभी उसके साहस की दाद देते थे । उसकी बड़ी बहन तो यहाँ तक कहती थी कि काश मुझे थोड़ा कम डर लगता और इसे थोड़ा सा डर तो होता । जिस लड़की ने सदा अपने निर्णय स्वयं लिए , जिसे ना परिणामों का डर था ना कठिन रास्ते का । जिसने जो उसे सही लगा सदा वही किया, वह आज कैसे डर गई ?
यह उसके भय के उद्गार हैं .....
भय
मैंने ना जाना था भय कभी
निर्भय ही जीना जाना था
ना डरी अन्धेरी रात से कभी
ना बिच्छू से या साँपों से
भय ना लगा कभी अकेले
ना भूतों ना दैत्यों का ।
सदा अकेली चलने वाली मैं
कैसे उस दिन यूँ घब
नए शहर में निकल पड़ी
पहले दिन ना घबड़ाई
लोकल ट्रेन पकड़ अकेले
करती थी मैं आवाजाही ।
उस दिन कुछ नया नहीं था
जा बैठी मैं लोकल ट्रेन में
कोई नहीं था उस डब्बे में
सो थोड़ा सा चौंक गई मैं
जबतक कुछ सोचूँ उतरो
उतरो सबने चिल्लाया ।
यार्ड जा रही ट्रेन वह
चलने लग गई वह
पल भर सोचा मैंने
यदि कूदी तो मरूँगी
या फिर चोट खाऊँगी
फिर भी मैं कूदी उससे ।
क्यों कूदी मैं उससे ?
क्या जान नहीं थी प्यारी
इक क्षण में समझी मैं
क्यों जौहर करती थीं क्षत्राणी
उस इक क्षण में समझी मैं
क्या अर्थ है स्त्री होने का
क्या भय होता है बलात्कार का ।
कैसे मुझे स्वीकार था मरना
कैसे मुझे भय लगा यार्ड का
जहाँ हो सकते थे पुरुष बस
नोच खा सकते थे मुझे जो
इक क्षण में मेरे मन ने
मरने से ना डर दिखलाया ।
हुआ यूँ कि वह मुम्बई शहर में नई नई गई थी । वहाँ गई भी अकेली थी । बिना किसी की सहायता के वह रोज लोकल ट्रेन से सफर कर रही थी । वह दिन भी और दिनों सा था । कुछ नया या अलग नहीं था । स्टेशन पर ट्रेन आई व वह उसमें चढ़ गई । उसे अजीब या कुछ गलत तब लगा जब कोई और उस डिब्बे में नहीं चढ़ा । तभी कुछ लोग चिल्लाने लगे कि उतरो उतरो, यह ट्रेन तो यार्ड में जा रही है । इतने में ट्रेन चल पड़ी । उसके पास बस एक क्षण था निर्णय लेने का । या छलांग लगाए या यार्ड पहुँच जाए । उस एक क्षण में उसे लगा यार्ड जाना याने शायद वहाँ अकेली स्त्री होना व शायद बलात्कार की संभावना और छलांग लगाना याने मरना या घायल होना । बस चलती ट्रेन से उसने छलांग लगा दी । भाग्य से जान बच गई बस कुछ चोटें ही आईं पर सबसे बड़ी चोट उसके अहम् व उसकी निर्भयता को लगी ।
रात को जब उसने घर फोन किया तो वह पिता को पूरी बात बताती रही तथा चेन खींचने का खयाल न आने के कारण स्वयं पर हँसती रही । पिता भी तसल्ली देते रहे और मजाक करते रहे कि अभी तो जेब कटने, मोबाइल चोरी होने का अनुभव बाँकी है । जब तक यह सब ना हो तो मुम्बई का अनुभव अधूरा है । फिर उसने माँ से बात की । माँ उसके दर्द को अनुभव कर रही थी । पर उसका दर्द चोट का नहीं था । वह रो रही थी और कह रही थी, "माँ आज मैंने जाना कि स्त्री होने की क्या हानि है । मैंने कभी भी स्वयं को कमजोर नहीं समझा था । मुझे कभी भी भय नहीं लगा था । इस भय को मैंने पहली बार जाना । क्या यह भय स्त्री में नैसर्गिक होता है ? माँ , उस एक पल में मैं कल्पना कर सकी कि केवल पुरुषों की उपस्थिति में उस यार्ड में मेरे साथ क्या हो सकता था । और वह कल्पना इतनी भयानक थी कि मैंने चलती गाड़ी से छलांग लगा मरना या घायल होना बेहतर समझा । माँ यह नग्न भय था । भय अपने सबसे खूँखार रूप में । इस भय में कोई मिलावट या सोचने जैसा कुछ नहीं था । माँ मैं ऐसे भय के जीवन से घृणा करती हूँ । माँ यह उचित नहीं है, यह न्याय नहीं है । मुझे भय केवल इसलिए लगा कि मैं स्त्री हूँ । यदि पुरुष होती तो न डरती । माँ मैं इस संवेदना से घृणा करती हूँ । मैं ऐसा जीवन नहीं जीना चाहती जिसमें भय हो । ओह माँ, मैं उस संवेदना के बारे में सोच कर ही सिहर जाती हूँ । माँ, मुझे स्त्री क्यों बनाया तुमने ? यदि पुरुष मुझमें ऐसी भावना जगा सकते हैं तो मुझे पुरुष पसन्द नहीं । मैं कभी किसी पुरुष को जन्म नहीं दूँगी । हम ही उन्हें जन्म दें और फिर उन्हीं से डरें । जिसे तुमने जन्म दिया उससे तुम कैसे डर सकती हो ? क्या तुमने कभी इस डर का अनुभव किया ? यदि किया था तो मुझे भी इसे झेलने को जन्म क्यों दिया तुमने ? बचपन में जब क्षत्राणियों द्वारा जौहर को उनकी वीरता, उनकी महानता के रूप में पढ़ती थी तो बहुत आश्चर्य होता था कि यह क्या तुक हुई । पर माँ आज मैं उनके जौहर को समझ सकती हूँ । बलात्कार या मृत्यु की संभावना में से मैंने भी मृत्यु की संभावना को चुना । क्यों माँ, यह गलत है । मैंने तो पढ़ा था कि जीने की चाह ही स्वाभाविक है । तो फिर स्त्री के लिए यह अलग कैसे हो गया ? क्यों जीने की स्वाभाविक चाह मृत्यु से हार गई ?"माँ क्या उत्तर देती ? है किसी के पास इसका उत्तर ?घुघूती बासूती
उस समय १३ टिप्पणियाँ आईं थी । मैं आपसे अनुरोध करती हूँ कि जो बहस या चर्चा का विषय रहा उसके आधार पर लोग अपनी राय दें । मैं बहुत आभारी होउँगी ।
13 टिप्पणियाँ:
Udan Tashtari ने कहा…
मुझे लगा यह अति है. हरदम तो ऐसा नहीं होता. एक खराब मछली हजार मछलियों को बदनाम करती है. मुझे लगता है कि और अधिक आत्म विश्वास की आवश्यक्ता है, बस. कौन ज्यादा ताकतवर. आप निरीह हो जायें तो सब लूटेंगे वरना किसकी मजाल. बस यही सोच जगाना होगी...किस बात का भय और कैसी भावना!!! निरीह बने पुरुष को पुरुष ही रौंद जाता है...ऐसा न सोंचे. वैसे बहुत दिन बाद दिखीं, क्या बात है?
Gyandutt Pandey ने कहा…
यह भय तो वैसा ही है कि कल मुझे कोई भ्रष्ट कहे - या प्रमाणित कर दे तो मैं जीने की बजाय मरना पसन्द करूं. हर व्यक्ति - नर या नारी अपने लिये जो सीमा बनाता है तो अपने को भय के अधीन करता है. भय से मुक्ति, सोच में निहित है - सामाजिक मान्यताओं में नहीं. मैं सदा विक्तोर फ्रेंकल को याद करता हूं जो नात्सी उत्पीड़न केंद्रों में भी मात्र अपनी सोच के साथ भय मुक्त रहे - अपने उत्पीड़कों से भी अधिक मुक्त!
काकेश ने कहा
आपकी बात में सच्चाई तो है पर यह भय तो मानसिक है वास्तविक नहीं, ये भय स्त्री को हो सकता है तो पुरुष को भी हो सकता है..कि क्या होगा उसका अकेले वो जायेगा तो..इतने अनजाने लोगों के बीच.मन को यदि थोड़ा सा मजबूत कर लें तो सारे भय स्वत: मिट जाते हैं.इसके लिये हमें अपनी नयी पीढ़ी को ऎसी सकारात्मक शिक्षा देने की जरूरत है जिससे वह इन भयों से मुक्ति पा सके.
masijeevi < ने कहा…
भय सिर्फ एक निर्मिति है, हम और हमारा वातावरण इसे चारों और गढ़ते हैं- ये हमारे अंधेरे गुहों ये निकलकर जब तब झपट लेता है हमें, ताक में हमेशा ही होता है- वह डरी क्योंकि मिथ्या ही वह मानती आयी थी कि अपने भयों की वह अकेली नियंता है, सिर्फ वह अपने भय निर्मित करेगी- उका भय वाकी भी निर्मित करते हैं। और जिसे जन्म देती है उससे नहीं डरती, उनके अलावा से ही डरती है हर दोपाया लिंगधारी पुत्र नहीं हो सकता जेसे कि हर दोपाया लिंगधारी बलात्कारी नहीं होता।
masijeevi ने कहा…
और हॉं मुझे न जाने क्यों 'आशंका' हो रही है, (अभी पूरा विश्वास तो नहीं) कि ऊपर समीरजी ने आज यह टिप्पणी पोस्ट पढ़कर की है।
अभय तिवारी ने कहा…
बहुत ही अच्छा लिखा.. साहस और संवेदना का अद्भुत मिश्रण है आपमें.. साहस सिर्फ़ अँधेरे अकेले कमरे में सो जाने का ही नहीं.. ऐसे विषयों पर कलम चलाने का.. और अपनी निर्भय छवि को तोड़ सकने का भी..
अतुल शर्मा ने कहा…
यह भय एक सत्य है और इससे मुँह नहीं मोड़ा जा सकता। बातों की लीपा पोती से इस पर पर्दा नहीं डाला जा सकता। यहाँ भी कोई इस बात को नहीं स्वीकार नहीं कर रहा कि एक लड़की को रात को किसी निर्जन स्थान पर जाने में क्यों भय है। सब एक जैसे नहीं होते परंतु जो मिलेंगे वो कैसे होंगे, किसे पता। पहली बार जिस भय का अनुभव किया तो ऐसे विचार बन जाना स्वाभाविक है। ये अतिशयोक्ति लगे तो उन बालक बालिकाओं के बारे क्या जो बचपन में ही वीरान यार्ड में अंजान से नहीं बल्कि घर में, पास-पड़ौस में अपनों से इस भय को पा लेते हैं।उत्तर तो शायद ही कोई दे पाए।
sunita (shanoo) ने कहा…
घुघूती जी मैने कई बार इस बारे में सोचा मगर हर बार खुद को अकेले पाया...एसा नही की औरत में आत्मबल नही है या उसमे साहस नही है...सब कुछ है औरत मे पुरूष की अपेक्षा आत्मबल और साहस दोनो ज्यादा है मगर इश्वर की और से उसे एक नाजुक मन और नाजुक शरीर दिया गया है मै मानती हूँ की समीर भाई ने जो लिखा वह ठीक है मगर ऐक औरत अपना बचाव कैसे कर पायेगी जब चार या पाँच बलात्कारियों के बीच फ़ंस जायेगी?हाँ ये बात भी सत्य है की उस वक्त एक प्रतिशत वह अपने चातुर्य से बेवाकूफ़ बना पाये मगर इंसान और वहशी दरिंदे में फ़र्क होता है...औरत को पुरूष से डर नही डर है तो उनसे जो अपना पुरूषत्व खो बैठे है...जब रक्षक ही भक्षक बन जाये तो क्या किया जाये... जैसे एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है वैसे ही आजकल दिन रात होने वाली वारदातों ने डर पैदा कर दिया है...मगर फ़िर भी मेरे खयाल से एक माँ अपनी बेटी को यही कहेगी की तुम डरो मत,तुम्हारा साहस तुम्हारा आत्मबल ही सबसे बढ़ा साथी है उस वक्त जब तुम अकेली हो या घबरा रही हो...सुनीता(शानू)
अफलातून ने कहा…
समाज का आधे से अधिक हिस्सा एक लड़की के भय को समझने की संवेदना भी नहीं रखता !
Sanjeet Tripathi ने कहा…
क्या कहूं इस बात पर!!जिस परिस्थिति की बात आप कर रही है उस परिस्थिति में पहुंचकर हर नारी डर ही जाती है!!नारी एकबारगी चोर-उचक्को से नहीं डरेगी पर ऐसे हालत में डरती ही है……अफ़लातून जी की बातों में सच्चाई नज़र आती है मुझे!!
Divine India ने कहा…
वैसे मुम्बई में स्त्रियाँ रात के 1:30 बजे भी सफर करती है… हाँ भय का कोई कारण नहीं होता और स्थान-2 का फर्क भी होता है किंतु जब हम आत्मबल को छोड़ दे तो और हम पर हावी होने में समय नहीं लगायेंगे।
Vijendra S. Vij ने कहा…
सभी के अपने अपने द्रष्टिकोण है "मुझे भय केवल इसलिए लगा कि मैं स्त्री हूँ । यदि पुरुष होती तो न डरती । " यह दावा पुख्ता नही लगा. ..समीर जी की बात "निरीह बने पुरुष को पुरुष ही रौंद जाता है..." काफी असरदार सच्चाई है...लेख बढिया लगा..शब्द सच कह रहे है..
swapandarshi ने कहा…
Sabhi ke views ki kadra karate huye likhti hoo ki, aapke savaal ka ek matra jabab hai ki sabhi civilized or humane log ek behtar samaj banane mei sakriya bhaagidaari nibhaye. Rape ka dar sirf kisi ek jagah par kendrit nahi hai. Jitana unsafe railway ka khali yard hota hai, utana koi surkshit ghar bhi, school bhi?Ham apani bhumika as a individual bhi nibha sakate hai or kisi samajik process ka part bankar bhi.Sunsaan sadak mei nikalate samay dar lagta hai, par jaise hi koi doosari women nazar aati hai safety ka ahsas hota hai. Adhik se adhik aurate agar ghar se bahar nikle, din me, raat mei, safe, unsafe sabhi jagah par to aadhi se adhik problem solve ho sakti hai.Women have to reclaim common place for them and for safer society.Baki marna/suicide kisi baat ka hal nahi hai. Agar koi rape ka shikar hota bhi hai, to himmat rakhe/himmat de, or justice ke liye fight kare, as a individual or as a society. Ham jungle mei nahi rahate. Priyadarshini Matto ke Father or friends ne ye karke dikhaya hai.Doosara, apane bacho ko bhai bahano ko, sabhi ko safety se avagat karaye, apani safety ke protocol banane padte hai. or self-confidence ko bhi reality ke dharatal par rakh kar hi dekhana chiye.By the way mene is tarah ki galati ki hai, or mei is tarah ke yard se sahi salamat bahar nikal kar aayi hoo.Ye achcha hai ki aapne Daar ki problem ko is bahas mei shamil kiya hai.
घुघूती बासूती
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