Thursday, January 24, 2008

मैं चोर हूँ !

याद है वह हिन्दी फिल्म जिसमें एक बच्चे की बाँह पर लिख दिया गया था... मैं चोर हूँ ! या चोर का बेटा हूँ ..या कुछ ऐसा ही । कुछ वर्ष पहले पंजाब में कुछ स्त्रियों के माथे पर जेबकतरी लिख दिया गया था । यह सब समाचार पढ़ने में जितने बुरे लगते हैं कुछ उतना ही बुरा जब कोई आपकी रचना उड़ा ले जाता है और सीधे से उसके नीचे अपना नाम लिख देता है तब लगता है ।


ये रचनाचोर भी भाँति भाँति के होते हैं । कुछ एक रचना चुराकर संतोष कर लेते हैं, कोई किसी एक ही चिट्ठाकार की रचनाएँ चुराने लायक समझता है, कोई जिस किसी की रचना चुरा लेता है और अपने चिट्ठे को ..कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानमति ने कुनबा जोड़ा.. जैसा रूप दे देता है । कुछ में थोड़ी बहुत लज्जा शेष होती है व वे पकड़े जाने पर या अपना चिट्ठा हटा लेते हैं या फिर पकड़ा हुआ चोरी का माल हटा लेते हैं और बिन पकड़े माल को चलने देते हैं ।


एक हमारे मित्र हैं हिमांशु कुमाऊनी जिन्होंने ११ मई २००७ को अपना चिट्ठा लिखने का मन बनाया । हो सकता हो मन उनका बहुत समय से कर रहा हो परन्तु उन्हें किन्हीं मुझ जैसे मुर्गे/मुर्गी की प्रतीक्षा थी जो उनका मनपसंद चिट्ठा लिखे और वे उसे धड़ल्ले से कॉपी पेस्ट कर अपने चिट्ठे का श्रीगणेश कर लें।
शायद उनकी भावना कुछ संगीतमयी थी । शायद वे अपने चिट्ठे पर केवल कुमाँऊनी गीत ही देना चाहते थे । या यह भी हो सकता है कि वे कुछ गड़बड़ाए बालक हैं । उन्हें समझ ही नहीं आता कि किस दिशा में जाएँ । आरम्भ हिन्दी में कुमाँऊनी चिड़िया घुघुति से करके मेरे शब्दों में बताते हैं कि घुघूती बासूती क्या है, कौन है । कुमाँऊ के बारे में बताते हैं आदि आदि । इस चिड़िया के बारे में बताते बताते वे अपनी दीदी को भी स्वर्गीय बना देते हैं । हो सकता है उनकी दीदी हो ही नहीं, हो सकता है कि हों व भाग्य से पृथ्वीवासी ही हों । देखिये ...

वहाँ एक चिड़िया पाई जाती है जिसे कहते हैं घुघुति । एक सुन्दर सौम्य चिड़िया । मेरी स्व दीदी की प्रिय चिड़िया। जिसे मामाजी रानी बेटी की यानी दीदी की चिड़िया कहते थे ।
यह रहा इनका चिट्ठा ...........


Friday, May 11, 2007

songs
घुघूती बासूती क्या है, कौन है ?
उत्तराखंड का एक भाग है कुमाऊँ ! वही कुमाऊँ जिसने हिन्दी को बहुत से कवि, लेखक व लेखिकाएँ दीं, जैसे सुमित्रानंदन पंत,मनोहर श्याम जोशी,शिवानी आदि ।वहाँ की भाषा है कुमाऊँनी । वहाँ एक चिड़िया पाई जाती है जिसे कहते हैं घुघुति । एक सुन्दर सौम्य चिड़िया । मेरी स्व दीदी की प्रिय चिड़िया । जिसे मामाजी रानी बेटी की यानी दीदी की चिड़िया कहते थे । घुघुति का कुमाऊँ के लोकगीतों में विशेष स्थान है ।कुछ गीत तो तरुण जी ने अपने चिट्ठे में दे रखे हैं । मेरा एक प्रिय गीत है ....
घूर घुघूती घूर घूरघूर घुघूती घूर,मैत की नौराई लागीमैत मेरो दूर ।मैत =मायका, नौराई =याद आना, होम सिक महसूस करना ।किन्तु जो गहराई, जो भावना, जो दर्द नौराई शब्द में है वह याद में नहीं है । नौराई जब लगती है तो मन आत्मा सब भीग जाती है , हृदय में एक कसक उठती है । शायद नौराई लगती भी केवल अपने मायके, बचपन या पहाड़ की ही है । जब कोई कहे कि पहाड़ की नौराई लग रही है तो इसका अर्थ है कि यह भावना इतनी प्रबल है कि न जा पाने से हृदय में दर्द हो रहा है । घुघूती बासूती भी नौराई की श्रेणी का शब्द है ।
और भी बहुत से गीत हैं । एक की पंक्तियां हैं ...घुघूती बासूतीभै आलो मैं सूती ।या भै भूक गो, मैं सूती ।भै = भाईआलो=आयाभूक गो =भूखा चला गयासूती=सोई हुई थीयह एक लोक कथा का अंश है । जो कुछ ऐसे है , एक विवाहिता से मिलने उसका भाई आया । बहन सो रही थी सो भाई ने उसे उठाना उचित नहीं समझा । वह पास बैठा उसके उठने की प्रतीक्षा करता रहा । जब जाने का समय हुआ तो उसने बहन के चरयो (मंगलसूत्र) को उसके गले में में आगे से पीछे कर दिया और चला गया । जब वह उठी तो चरयो देखा । शायद अनुमान लगाया या किसी से पूछा या फिर भाई कुछ बाल मिठाई (अल्मोड़ा, कुमाऊँ की एक प्रसिद्ध मिठाई) आदि छोड़ गया होगा । उसे बहुत दुख हुआ कि भाई आया और भूखा उससे मिले बिना चला गया , वह सोती ही रह गई । वह रो रोकर यह पंक्तियाँ गाती हुई मर गई । उसने ही फिर चिड़िया बन घुघुति के रूप में जन्म लिया ।

Posted by himanshu Kumar
इसके बाद इन्हें हमारे चिट्ठा जगत के बहुत सारे साथियों ने लताड़ा परन्तु इन्होंने उफ तक न की । भोले ये इतने हैं कि इन्होंने लताड़ती हुई टिप्पणियों को हटाया तक नहीं । पहले मैं सोचती रही कि शायद ये उन लोगों में से हैं जो ब्लॉग बनाकर छोड़ देते हैं । परन्तु नहीं इन्होंने अंग्रेजी में ब्लॉगिंग चालू रखी । यही नहीं श्रीमान जी ने किसी अन्य के साथ का अपना फोटो भी दे रखा है । अब शायद आप समझें कि मैं अपना फोटो नेट पर क्यों नहीं डालना चाहती । अभी तक तो श्रीमानजी ने केवल हमारा चिट्ठा चुराया है कल कहीं ये हमारा चेहरा ही ले उड़ें तो ? फिर उसे अपनी माँ, दादी, नानी या पत्नी को ही पहना डालें तो ?

अब आपने मेरी घुघूती बासूती क्या है, कौन है ? पोस्ट आधी तो पढ़ ही ली , सो यदि मन हो समय हो तो पूरी ही पढ़ लीजिये ।

उसने ही फिर चिड़िया बन घुघुति के रूप में जन्म लिया । घुघुति के गले में, चरयो के मोती जैसे पिरो रखे हों, वैसे चिन्ह होते हैं । ऐसा लगता है कि चरयो पहना हो और आज भी वह यही गीत गाती है :घुघूती बासूतीभै आलो मैं सूती ।किन्तु कहीं घुघुति और कहीं घुघूती क्यों ? जब भी यह शब्द किसी गीत में प्रयुक्त होता है तो घुघूती बन जाता है अर्थात उच्चारण बदल जाता है ।इस शब्द के साथ लगभग प्रत्येक कुमाऊँनी बच्चे की और माँ की यादें भी जुड़ी होती हैं । हर कुमाऊँनी माँ लेटकर , बच्चे को अपने पैरों पर कुछ इस प्रकार से बैठाकर जिससे उसका शरीर माँ के घुटनों तक चिपका रहता है, बच्चे को झुलाती है और गाती है :
घुघूती बासूतीमाम काँ छू =मामा कहाँ हैमालकोटी =मामा के घरके ल्यालो =क्या लाएँगेदूध भाती =दूध भातको खालो = कौन खाएगाफिर बच्चे का नाम लेकर ........ खालो ,....... खालो कहती है और बच्चा खुशी से किलकारियाँ मारता है ।
मैं अपने प्रिय पहाड़, कुमाऊँ से बहुत दूर हूँ । पहाड़ की हूँ और समुद्र के पास रहती हूँ । कुमाऊँ से मेरा नाता टूट गया है । लम्बे समय से वहाँ नहीं गई हूँ । शायद कभी जाना भी न हो । किन्तु भावनात्मक रूप से वहाँ से जुड़ी हूँ । आज भी यदि बाल मिठाई मिल जाए तो ........वहाँ का घर का बनाया चूड़ा ( पोहा जो मशीनों से नहीं बनता , धान को पूरा पकने से पहले ही तोड़ लिया जाता है ,फिर आग में थोड़ा भूनकर ऊखल में कूट कर बनाया जाता है ।) अखरोट के साथ खाने को जी ललचाता है । आज भी उस चूड़े की , गाँव की मिट्टी की महक मेरे मन में बसी है । मुझे याद है उसकी कुछ ऐसी सुगन्ध होती थी कभी विद्यालय से घर लौटने पर वह सुगन्ध आती थी तो मैं पूछती थी कि माँ कोई गाँव से आया है क्या ? मैं कभी भी गलत नहीं होती थी । यदि कोई आता तो साथ में चूड़ा , अखरोट , जम्बू (एक तरह की सूखी पत्तियाँ जो छौंका लगाने के काम आती हैं और जिन्हें नमक के सा पीसकर मसालेदार नमक बनाया जाता है ।), भट्ट (एक तरह की साबुत दाल) , आदि लाता था और साथ में लाता था पहाड़ की मिट्टी की महक ।
वहाँ के फल , फूल, सीढ़ीनुमा खेत , धरती, छोटे दरवाजे व खिड़कियों वाले दुमंजला मकान ,गोबर से लिपे फर्श , उस फर्श व घर की चौखट पर दिये एँपण , ये सब कहीं और नहीं मिलेंगे । एँपण एक तरह की रंगोली है जो कुछ कुछ बंगाल की अल्पना जैसी है । यह फर्श को गेरू से लेप कर भीगे पिसे चावल के घोल से तीन या चार उँगलियों से बनी रेखाओं से बने चित्र होते हैं । किसी भी कुमाऊँनी घर की चौखट को इस एँपण से पहचाना जा सकता है । दिवाली के दिन हाथ की मुट्ठियों से बने लक्ष्मी के पाँव ,जो मेरे घर में भी हैं बनते हैं । वे जंगलों में फलों से लदे काफल, किलमोड़े, व हिसालू के वृक्ष । जहाँ पहाड़ों में दिन भर घूम फिर कर अपनी भूख प्यास मिटाने के लिए घर नहीं जाना पड़ता, बस फल तोड़ो और खाओ और किसी स्रोत या नौले से पानी पियो और वापिस मस्ती में लग जाओ । वे ठंडी हवाएँ ,वह बर्फ से ढकी पहाड़ों की चोटियाँ, चीड़ व देवदार के वृक्ष !बस इन्हीं यादों को , अपने छूटे कुमाऊँ को , अपनी स्व दीदी की याद को श्रद्धा व स्नेह के सुमन अर्पण करने के लिए मैंने स्वयं को नाम दिया है घुघूती बासूती ! है न काव्यात्मक व संगीतमय, मेरे कुमाऊँ की तरह !
घुघूती बासूती

पुनश्च : यह पढ़ने के बाद यदि अब आप मेरी कविता उड़ने की चाहत पढ़ें तो आपको उसके भाव सुगमता से समझ आएँगें ।
घुघूती बासूती

11 comments:

  1. इन पोस्‍ट चोरों के खिलाफ कोई कड़ा कदम उठाना चाहिए

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  2. हा हा हा आपकी तस्वीर तो जरूर चोरी हो जायेगी...चोरो का कोई भरोसा नही है...
    वैसे मेरे खयाल से अमिताभ बच्चन जी की फ़िल्म थी वो जिसमे उनके हाथ पर लिखा था,"मेरा बाप चोर है"

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  3. एक प्रयास और कर रहा हूँ ...देखिये क्या होता है..

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  4. ब्लॉगर बनना है मगर लिखना आता नहीं, अतः चोरी करनी पड़ती. मजबूर है बेचारा.

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  5. ऐसे लोगों के खिलाफ कदम उठाना चाहिऐ।

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  6. अफसोस यह है कि क्या किया जाए ऐसे बंधुओं का।

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  7. ghughuti ji,i think every original writer on net is hooked by these kind off theifs,may be u can place one logo of copyscape that your page is protected under copyscape,it can help a little bit.u can visit www.copyscape.com

    aur tarkash par aapka blog puraskar ke liye namankit hone ke liye badhai.

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  8. इस तरह की चोरी भी तो प्रशँसा का ही एक रूप है, बेचारे को आप का लिखने का तरीका बहुत पसंद आया पर उसे स्वीकारने से लजा रहा शायद? :-)

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  9. धन्यवाद आशीष महर्षि जी, संजय जी, ममता जी व संजीत जी । कुछ तो करना ही चाहिये, कुछ नहीं तो एक पोस्ट लायक सामान तो बना ही लेना चाहिये ।
    धन्यवाद सुनीता जी । अब पता चला ना कि क्यों मैं अपना नाम व चेहरा छुपाकर रखती हूँ ।
    धन्यवाद काकेश जी । आशा है आपका प्रयास सफल होगा ।
    महक जी धन्यवाद । नामांकन व चुने जाने में काफी दूरी होती है । आशा है आपकी शुभकामनाएँ अपना रंग दिखाएँगी ।
    सुनील जी, आपकी बात से सहमत हूँ । मेरे बच्चों को जब मैंने इस चिट्ठा चोरी के बारे में बताया था तो उन्होंने कहा था कॉन्ग्रेट्स, यू हेव एराइव्ड ! वैसे भी मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी । जब कुछ नहीं कर पा रही हूँ तो यही सोचकर दिल बहला रही हूँ ।
    घुघूती बासूती

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  10. @mehek
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    इससे अंश भर भी क्या लाभ होगा यह भी तो बताईये? यकीन मानिए लोगो वगैरह लगाने से कुछ नहीं होगा, चोरी रुक नहीं जाएगी। बहुत संभावना है कि चोर उस पर नज़र भी नहीं मारेगा।

    क्यों?

    मैं सड़क पर नोटों का ब्रीफकेस खुला रख जाऊँ और साथ में तख्ती लगा जाऊँ जिस पर लिखा हो "चोरी मत करो" तो आपको क्या लगता है कि वह चोरी नहीं होगा? मैं कहता हूँ कि वह चोरी भी होगा और तख्ती भी साथ में चोरी हो जाएगी!! :)

    इंटरनेट वही सड़क है, नोटों का ब्रीफकेस हमारा ब्लॉग आदि पर पड़ा माल है और वह तख्ती वही लोगो है जो आपने लगाने का सुझाव दिया।

    ऐसे चोरियाँ नहीं रूकती। :)

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  11. अब ऐसे लोगों का क्या किया जाय, हम भी सोच रहे हैं काहे को माथापच्ची करें और लिखें। घात लगाकर बैठ जाते हैं जैसे ही कोई अच्छा लिखे अपने नाम से चेप दें।

    इसका एक ही ईलाज है अच्छा ना लिखें, ना आप अच्छा लिखेंगी ना कोई चोरी करेगा।

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