Tuesday, September 25, 2007

कविता : उड़ने की चाहत

उड़ने की चाहत

बन घुघुती जीना चाहा,
आज बन गयी पिंजरे की चिड़िया ,
पंख फैला गगन में उड़ना चाहा,
पर पंख हिलाना भूल गयी।

चाहा था आकाश में उड़ना
पर धरा की धूल बन गयी,
सोने के पिंजरे में रह कर
चांदी के दाने आहार मान गयी।

इतने वर्ष कैद में रहकर
जब मैंने फिर उड़ना चाहा,
रत्नजड़ित पंख ये मेरे
अब तो उड़ना भूल गये।

टकटकी लगाये मेरी आँखें
हर समय तकती रहती नभ को,
शायद आए मेरा पक्षी साथी
और सिखाए फिर से उड़ना।

आखिर एक साँझ
जब सारा आकाश,
चमक रहा था
सूरज कीअंतिम किरणों से।

मैंने देखा इक पक्षी
दूर गगन में मंडराता,
मेरी ही चाहत में वह
लगता था उड़ता जाता।

उसकी आँखों का केन्द्र थी मैं
उसकी चाहत का अंत थी मैं,
सोचा अब तो वह आयेगा
उड़ना फिर से मुझे सिखायेगा।

उड़ निकलूँगी उसके साथ
फिर उड़ान के सपने होंगे,
फिर गगन चूमूँगी उसके साथ
दूर उँचाइयों में हम वह होंगे।

सोचा पंछी ही जानेगा
इक दूजे पंछी का दुख,
फिर से मेरा मन जानेगा
इक साथी संग उड़ने का सुख।

देखा वह मुझे तकता
आ रहा है मेरी ओर,
मेरे इस बन्दी हृदय में
हो रहा था धड़कनों का शोर।

सोचा फिर से मैं चहकूँगी
गाऊँगी मैं गीत हजार,
सोचा फिर से मैं महकूँगी
उड़ गगन में बारम्बार।

फिर से खाऊँगी फल काफल का
फिर से पीऊँगी जल स्रोतों का,
देवदार की ऊँची डाली
नीचे होगी हरियाली।

चुन चुन नीड़ बनाऊँगी
चीड़ के कोमल पत्तों का,
झूम झूम जाऊँगी
सुन निनाद झरनों का।

कैसी तृप्ति देगी
हिमालय की शीतल बयार,
दूर तक दृष्टि देखेगी
पहाड़ी पुष्पों की बहार।

इन सपनों में खोई थी मैं
जागी आँखों सोई थी मैं,
इतने में वह आया
जो था मेरे मन भाया।

खुला हुआ था पिंजरा मेरा
बाहर मैं निकल आई,
पंखों की बाँहें
मैंने थीं फैलाईं।

उसको देख यूँ लगा
कबसे ढूँढ रहा वह मुझको,
उसके जीवन का उद्देश्य ही
इक दिन था पा लेना मुझको।

जाने कबसे घुटी आवाज
जैसे मैंने फिर से पाई,
पाकर उसको अपने आगे
इक बार मैं चहचाई।

आँखों से मिली आँखें
मैं आगे बढ़ती आई,
मन मैं हुई गुदगुदी
चोंच चोंच से टकराई।

पर यह क्या?
पंजे उसके मुझे पकड़ रहे थे
बन्धन उसके मुझको जकड रहे थे,
उसकी खूनी आँखों में मैने देखा काल
भय से मन था मेरा बेहाल।

फिर से देखा मैने उसको
फिर जाना यह राज,
मुक्ति जाना था मैने जिसको
वह तो निकला इक शाहबाज।

हाय विधि की विडम्बना
थी कितनी क्रूर,
देखे मैने थे जो सपने
हो गये सब चूर।

आखिर ले उड़ा वह
मुझे दूर गगन मे,
सहमी हुइ थी मैं
फिर भी मुसकाई मैं मन में।

माना यह था मेरा अंत
माना यह थी मेरी अन्तिम उड़ान,
किन्तु फिर से थी मैं गगन मे
पूरा हुआ था उड़ने का अरमान।

कल थी मैं पिंजरे की बन्दी
आज ना बन्दी कहलाऊँगी,
कल थी मैं धरा की कैदी
आज गगन में मर जाऊँगी।

यह थी मेरी अन्तिम यात्रा
यह थी मेरी अन्तिम उड़ान,
उड़ने की चाहत में मैंने
दे दिया था अपना जीवनदान।

अब ना था मेरा मन घबराता
अब ना था आतुर मन बेहाल,
बंद कर ली मैंने आँखे अपनी
देख अन्तिम बार सूरज लाल।

धन्यवाद ओ मेरे भक्षक
धन्यवाद ओ शाहबाज,
मुक्ति की चिर चाहत
जो तूने पूरी कर दी आज ।

घुघूती बासूती

30 comments:

  1. hey, cool poem.. oh and you managed it.. good for you. Looks like you have some geniuses by marriage in your family. Lucky you!

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  2. वाह आपने हमारी सुन ही ली और चिट्ठा शुरु कर ही दिया। बधाई ! आप भी ब्लॉगियाने लगीं। :)

    परिचर्चा पर आपकी जो कविताएं हैं उन्हें भी यहाँ ले आइए, वहाँ सभी ने नहीं पढ़ी अभी।

    नारदमुनि का आशीर्वाद लेना न भूलिए, इसके बिना चिट्ठाजगत में गति नहीं। इस पते पर उन्हें ईपत्र द्वारा चिट्ठे का नाम पता दे दीजिए। फिर अपने चिट्ठे पर एक आवकजावक सूचक यंत्र यहाँ से लगाइए और बस मीटर पर बढ़ते नंबरों का मजा लीजिए।

    एक बात और आप ब्लॉगर पर २००५ से रजिस्टर हैं, लेकिन लिखा कुछ नहीं। इतना वक्त लगा दिया फैसला करने में ? यह चिट्ठा पुराने ब्लॉगर पर है। चिट्ठे पर कुछ भी संशोधन से पहले एक काम करिए कि नए ब्लॉगर पर शिफ्ट हो जाइए। नए ब्लॉगर पर बहुत सी नईं फीचर्स हैं। इसके लिए आपके पास जीमेल का अकाऊंट होगा ही। न हो तो बताइगा।

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  3. बधाई आपको अपना चिट्ठा शुरु करने की। आपकी मनोकामना पूरी हो:-
    उड़ निकलूँगी उसके साथ
    फिर उड़ान के सपने होंगे,
    फिर गगन चूमूँगी उसके साथ
    दूर उँचाइयों में हम वह होंगे।

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  4. सही कहा, आपने श्रीश। घुघुतीबासूती को पिछले एक वर्ष से हिन्दी में चिट्ठा शुरू करने के लिए मैं भी कहता रहा हूँ।

    कुछ कारणों से परिचर्चा पर जाना कम ही हो पाता है, इसलिए आपकी कविताओं का पूरा आस्वादन नहीं मिल पाता। अपनी कविताओं को आप इस चिट्ठे पर ले आएँ तो बेहतर रहेगा। साथ ही अपनी रूचि के समसामयिक विषयों पर आप गद्य में भी लिखें। आपके भीतर महान लेखिका और कवयित्री के संस्कार और बीजांकुर हैं। उन्हें आप बाहर निकालें और हिन्दी साहित्य को समृद्ध करें।

    मैत्रेयी पुष्पा भी प्रौढ़ावस्था में आकर साहित्य के मैदान में कूदीं थीं और आज वह हिन्दी की सर्वाधिक लोकप्रिय महिला साहित्यकार हैं।

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  5. संजय बेंगाणी10:26 am

    चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है.

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  6. Yes Neha and thanks. My thanks to Manjit too. I am sure I am going to trouble him again very soon with new problems as they crop up. :)

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  7. धन्यवाद श्रीश जी,अनूप जी, प्रमेन्द्र जी,सृजन जी व संजय जी । नारदमुनि का आशीर्वाद लेना तो चाहती हूँ पर शायद वे आजकल आशीर्वाद नहीं दे रहे हैं । आपके बताए अनुसार उनसे निवेदन अवश्य करूँगी ।
    श्रीश जी, हाँ, अंग्रेजी में चिट्ठा बहुत पहले ही लिखने की सोच रही थी किन्तु अचानक हिन्दी की ऐसी धुन लगी कि अंग्रेजी में लिखी कुछ कविताएँ यूँ ही पड़ी रहीं । मैं यह समझती रही कि हिन्दी के लिए नया चिट्ठा बनाना पड़ेगा । यह पता नहीं था कि अपने पुराने वाले के अन्तर्गत हिन्दी का भी बना सकती हूँ ।
    सृजन जी ,यत्न करूँगी कि गद्य भी लिखूँ । एक दो प्रयासों को यदि आप उचित समझें तो आपको मेल कर दूँगी और यदि आप सोचें कि वे यहाँ डालने योग्य हैं तो फिर डाल दूँगी । मैं केवल पढ़ने भर का निवेदन करूँगी उससे अधिक नहीं ।
    मेरा यूँ उत्साह बढ़ाने के लिए एक बार फिर आप सब का धन्यवाद ।
    घुघूती बासूती

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  8. हिन्दी चिट्ठे जगत में स्वागत है।

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  9. धन्यवाद उन्मुक्त जी ।
    घुघूती बासूती

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  10. चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है घुघूती बासूती जी

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  11. This comment has been removed by the author.

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  12. It's lovely to experiment like Ghughuti Basuti, pioneered Chhayavaad and revolutionary due to its unconventional nature. She voiced her protest against exploitation through her verses.
    कुछ लोग उससे कतरा कर
    दूर से गुजर रहें हैं।
    ki kabhi kabhi manavon ka tandav dekh wo " ghughuti" bhi roti hai..
    uske swar rudn hain, Haaye manav tu samajh ab ..uska gaana kitne logon ki pran lahari hai .

    aap ne badhiyan likha hai .bas likhate rahiye ..aur
    jaise mayur nachte hain badal ko dekhkar hum in kavitayon ko dekh nayi varsha ko abhilashit , manmohini nritya sansar mein kho se jayenge ; Basuti aur likho .
    Nirala ki kavita aaj jeevant si jaan padti hai ..
    Himmat karne waalo ki kabhi haar nahi hoti:)

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  13. स्वागत है चिट्ठा जगत में।

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  14. धन्यवाद अभिजीत जी व अतुल जी ।
    घुघूती बासूती
    ghughutibasuti.blogspot.com
    miredmiragemusings.blogspot.com/

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  15. कविता तो अच्छी लगी, पर उत्तरार्ध वेदनात्मक प्रसन्नता लिये हुए!

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  16. अरे दीदी भाई को छुट्टियो से वापस आकर पत्र लिखुगी कहा था और भूल गई यह वही कविता है जो परिचर्चा मे आपकी कविता के सन्दर्भ मे लिखि थी आपने इसका एक अंश वहा भी पढा था धन्यवाद होसला अफ़जाई के लिये पर पत्रोतर जरुर लिख दे जवाब के इन्त्जार मे आपका छोटा भाई अरुण

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  17. मैं तो कुछ समझ ही नहीं पा रहा??? किस बात का स्वागत समारोह चल रहा है. यह कोई नई घुघुतीबासूती जी हैं क्या?? कि वही वाली जो हमेशा से लिखती आईं है...कोई मुझे बताये, आखिर हो क्या रहा है?

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  18. आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा.
    ऎसेही लिखेते रहिये.
    क्यों न आप अपना ब्लोग ब्लोगअड्डा में शामिल कर के अपने विचार ऒंर लोगों तक पहुंचाते.
    जो हमे अच्छा लगे.
    वो सबको पता चले.
    ऎसा छोटासा प्रयास है.
    हमारे इस प्रयास में.
    आप भी शामिल हो जाइयॆ.
    एक बार ब्लोग अड्डा में आके देखिये.

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  19. हाँ मैं भी ससमीरजी की तरह कुछ असमंजस में हूँ.

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  20. उड़ने की चाहत कविता में सचमुच गहराई है बहुत अच्छी कविता के लिए दिल से बधाईयाँ.../

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  21. कविता बहुत अच्छी है पर कल से यह सब टिप्पणियां देख कर मै भी चकराया हुआ हूं।

    कुछ भेजे में आ ही नही रहा कि यह हो क्या रहा है!

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  22. चकराने वालों में मेरा नाम भी है

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  23. यह क्या हो रहा है उड़ते उड़ाते कहाँ आ गए हम :)
    वैसे कविता बहुत ही सुंदर लगी बहुत ही प्यारी
    बधाई आपको :)

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  24. कल थी मैं धरा की कैदी
    आज गगन में मर जाऊँगी। ----शब्द मौन हो गए... मूक हुई मैं... आस जगी , इक सपना जागा .... कल मैं भी धरा से उठ गगन की बाँहों में मर मोक्ष पाऊँगी.....परम आनन्द पा जाऊँगी !!!!
    भावों से भरी रचना को बार बार पढ़ने का आनन्द आ रहा है....!

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  25. यह तो घुघूती जी बड़ा धमाकेदार ,उड़ाकेदार पदार्पण था आपका ब्लॉग जगत में -कविता क्या है विडम्बनाओं की आत्मकथा कहिये !

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  26. पहली बार आया इस ब्लॉग पर. अनकहे को अभिव्यक्त किया अपने.

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  27. बहुत सुन्दर. सात साल पहले आप की उड़ान अपेक्षाकृत ऊंची थी

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