वर्षा तू भी तो मजबूर है
इस शहर में,
मुझ सी
तू भी कैदी है!
जैसे मैं इतनी खिड़कियों
बाल्कनियों के होने पर भी,
हूँ सलाखों के पीछे
तू भी तो
चाहे बरसती है अपने मन से
फिर भी गति न है तेरी तेरे मन की।
प्रकृति में क्या है उद्देश्य वर्षा का?
बादलों से तकना
प्यासी धरती को
सूखे मुरझाए वृक्षों को
भूरी जली हुई घास को
सूखी झीलों, तालाबों और कुँओं की प्यास को
नीचे और भी नीचे जाते पानी के स्तर को
और फिर भीग जाना सुन धरती की पुकार को
सुन प्यासी प्रकृति की मनुहार को
फिर जाना नीचे ही नीचे
धोते हुए सारे आसमान को
पेड़ों, घरों, पौधों, व घास को
जाना नीचे ही नीचे
वापिस धरती के गर्भ में,
सागर की गोद में,
नदियों के आलिंगन में।
वर्षा कब तूने चाहा फँस जाना
सड़कों पर, आँगनों, पुलियों और गड्ढों में?
किन्तु क्या तू समा सकती है
धरती के गर्भ में?
ये कंक्रीट के जंगल
ये टाइल्स से पटे आँगन
ये न जाने देंगे तुझे तेरे गंतव्य तक।
वर्षा कब मैंने चाहा फँस जाना
सलाखों के पीछे?
देखना बरसती वर्षा को
किन्तु न भीगना उसके जल में
न थिरकना उसके मधुर संगीत पर
कहाँ गए वे वर्षा नृत्य के दिन
कहाँ गए वे माँ बेटियों के मिल नाचने के दिन?
वर्षा सुन रही हो तुम?
बन्दिनी हो तुम
बन्दिनी हूँ मैं
देख सकती हूँ मैं
सुन्दर बरसती बौछार को
देख सकती हो तुम
गिरते भूगर्भ के जल स्तर को
किन्तु न मैं भीग सकती
न तुम भिगो सकती धरती के गर्भ को।
वर्षा आओ मिल तुम और मैं
आँसू बहाएँ बीते दिनों की याद में,
वर्षा आओ
तुम और मैं फिर भिगाएँ
मन, हिय और आँख को।
घुघूती बासूती
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Tuesday, June 15, 2010
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