आप एक पोस्ट लिखते हैं यह बताते हुए कि आपकी भैंस मर गई।
टिप्पणी आती है गुड।
आप एक पोस्ट लिखते हैं यह बताते हुए कि आपके पिताजी मर गए।
टिप्पणी आती है गुड।
आप एक पोस्ट लिखते हैं यह बताते हुए कि आपके ऊपर मुकदमा किया गया है।
टिप्पणी आती है गुड।
आप एक पोस्ट लिखते हैं यह बताते हुए कि आप अब ब्लॉगिंग से सन्यास ले रहे हैं।
टिप्पणी आती है गुड।
आप एक पोस्ट लिखते हैं यह बताते हुए कि आप टिप्पणी करने वालों की ठुकाई करेंगे।
टिप्पणी आती है गुड।
अरे भइया कुछ तो 'वेरी गुड' लायक भी होगा! क्या वेरी गुड के लिए अपने पूरे खानदान को मरवाना होगा या भैंसो के पूरे तबेले को? बात यह है कि बचपन से 'वेरी गुड' पाने की आदत पाली हुई है, जब भी अध्यापक बिना 'वेरी' वाला 'गुड' देते थे तो मन असन्तुष्ट ही रहता था, आज भी यह बीमारी लगी ही हुई है।
घुघूती बासूती
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Wednesday, February 03, 2010
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