बहुत सुन्दर वर्षा हो रही है। खिड़की से बाहर देखती हूँ तो मन वैसे ही नाच उठता है जैसे पिछले वर्ष तक इस मौसम में मेरे घर के आसपास मोर! मन प्रसन्न है आह्लादित है। तभी एक विचार आता है कि यदि मैं खिड़की के उस पार होती तो? यदि मेरे सिर के ऊपर छत न होती, यदि मेरा सारा मकान वर्षा में भी सूखा न होता तो? याद करती हूँ कि जब कई दिन वर्षा होती रहे और कपड़े सूख न रहे हों तो यही बचपन से मेरी प्रिय वर्षा थोड़ी कम प्रिय हो जाती है। यदि छत टपक रही हो, कपड़ों, खाद्य सामग्री आदि में फफूँदी लग रही हो, तब? याद आती है गुजरात के भूकम्प के बाद की वह पहली वर्षा जब पता चला था कि मकान में कितनी जगह अदृष्य दरारें पड़ गईं थीं। जब ठीक गैस के चूल्हे के ऊपर पानी टपक रहा था। बच्चों के कमरे में छत बीचों बीच से मानो दो में विभाजित हो गई थी। कमरे में बाल्टियों पानी भर गया था। किन्तु बच्चे तो घर में थे ही नहीं सो केवल दोनों पलंग अलग कर बीच में टब, बाल्टियाँ आदि लगाकर काम चल गया था। फिर वह तो कम्पनी का मकान था सो जैसे ही कुछ दिन सूर्य चमका मरम्मत भी हो गई थी।
जिनके पास मकान ही नहीं हैं? झोंपड़ी वाले? उनका क्या? इस शहर में केवल दो बाँसों पर फटे पुराने कपड़ों, पॉलीथीन शीट्स आदि से तम्बू सा तान देने वाले? उनका तो फर्श ही नहीं होगा। नीचे कीचड़ और ऊपर से टपकता पानी! और वे जिन्हें यह भी नहीं मिलता?
सो एक ही वस्तु को हम इस पार या उस पार से अलग अलग दृष्टि से देखते हैं। सो कोई तथ्य देखने या अनुभव करने वाले की स्थिति बदलने पर अच्छे से बुरा,प्रिय से अप्रिय हो जाता है। तो क्या हमारा वस्तुओं, पदार्थों, ॠतुओं, मनुष्यों से मोह, प्रेम, लगाव क्या केवल परिस्थितिजन्य, सापेक्ष, शर्तबद्ध है? वही व्यक्ति जिसपर हम कभी जान छिड़कते थे, सम्बन्ध विच्छेद या विवाह विच्छेद के बाद इतना असह्य,अद्रष्टव्य,अश्राव्य क्यों हो जाता है? वस्तु,पदार्थ,ॠतु,अन्य व्यक्ति तो शायद जब वही रहे तब भी हमारा उससे प्रेम हमारी अपनी स्थिति-भौतिक,मानसिक या हम किस जगह खड़े हैं,पर निर्भर करता है?
एक छोटा सा किस्सा याद आया। एक नवविवाहिता गृहणी ने पति के लिए बीन्स(फलियों)की सब्जी बनाई। बीन्स पति की प्रिय सब्जी थी सो पति को बहुत अधिक पसन्द आई। उसने पत्नी का हाथ चूम लिया। अगले दिन जब वह फिर काम से लौटा तो पत्नी ने बीन्स बनाईं थीं। उसने खाईं और स्वाद को सराहा। तीसरे दिन भी बीन्स बनीं थीं। उसकी भवें टेढ़ीं हुईं किन्तु पत्नी तो नई नवेली थी सो उसने सब्जी चुपचाप खा ली। चौथे दिन भी बीन्स ही बनीं थीं। वह नाराज हुआ बोला कि यह रोज़ रोज़ बीन्स क्यों बनाती हो? पाचवें दिन भी जब बीन्स बनीं तो उसने सब्जी का बर्तन उठाकर पटक दिया। वह बड़बड़ाता हुआ घर से बाहर चले गया। पत्नी दर्पण के सामने आई और मुस्करा कर बोली, "आह बेबी, तुम कितनी चतुर हो! अब जीवन में फिर कभी तुम्हें उन गंधेली बेस्वाद बीन्स को ना देखना, ना खरीदना, ना बनाना, ना खाना पड़ेगा! अब वह भी बीन्स से वैसे ही चिढ़ेगा जैसे तुम! तुम सच में जीनियस हो!"
हेहेहे, पाँच दिन लगातार खाने, परसे जाने, देखने से ही पति का बीन्स प्रेम कपूर की तरह हवा में उड़ गया था। क्या यही है सापेक्ष, शर्तबद्ध, परिस्थितिजन्य प्रेम!सच तो यह है कि लगभग सभी प्रेम व मोह ऐसे ही होते हैं। अनुकूल हैं तो बल्ले बल्ले, प्रतिकूल हो गए तो छिः! वह तो कुछ विरले यह सोच कि आज न भी करती हूँ / करता हूँ तो कल तो मैं इस व्यक्ति, वस्तु, पदार्थ या ॠतु पर जान छिड़कती थी / छिड़कता था, तो आज कमसे कम उससे चिढ़ का ढिंढोरा तो न पीटूँ। उसको सम्मान न भी दूँ तो अपनी उस पूर्व मधुर भावना व उन स्मृतियों को तो सम्मान दूँ। क्योंकि आज वह मेरी / मेरा न भी हो तो वह पूर्व मधुर भावना व वे स्मृतियाँ तो मेरी बहुत अपनी हैं। है न विचित्र बात!
घुघूती बासूती
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Thursday, September 09, 2010
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