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Tuesday, May 03, 2011

जब डॉक्टर कोई नई दवा लिख दे या केमिस्ट कोई नई दवा दे तो बिन जाँच पड़ताल के मत खाइए।

मैं तो यहाँ तक भी कहूँगी कि जहाँ तक हो सके एक दो अच्छे केमिस्ट की दुकानें निश्चित कर लीजिए और उन्हीं से बिल के साथ दवा खरीदिए। यदि डॉक्टरों की कमी न हो तो साफ लिखाई लिखने वाले या कम्प्यूटर पर टाइप कर परची देने वाले डॉक्टर को चुनें। यदि नए शहर जाएँ तो बड़े रोग की प्रतीक्षा करने की अपेक्षा चार छींक आने या नाक बहने पर ही डॉक्टर खोजना अभियान आरम्भ करिए। कोई अच्छा सा पारिवारिक चिकित्सक मिल जाए और उसकी लिखाई भी साफ व स्पष्ट हो तो अपने को भाग्यवान समझ उनकी शरण में चले जाइए। ये आपके प्राण रक्षक सिद्ध हो सकते हैं।

मैं यह सब क्यों कह रही हूँ? कल मुम्बई मिरर में पहले पन्ने पर ही समाचार था कि गलत दवा... मीथोट्रेक्सेट खाने के कारण एक व्यक्ति की मृत्यु। मीथोट्रेक्सेट शब्द ने मेरे कान खड़े कर दिए। सात वर्ष पहले मैं इस दवा के विषय में जितना जान सकती थी उतनी जानकारी प्राप्त की थी और अपने नए पुराने डॉक्टरों से मिलकर या बातकर खाऊँ या न खाऊँ का कठिन निर्णय लिया था।

मरने वाले व्यक्ति के लिए मैट एक्स एल ५० दवा हाइपर टेन्शन के लिए लिखी गई थी जिसे मीथोट्रेक्सेट पढ़कर केमिस्ट ने मीथोट्रेक्सेट जैसी दवा जो केवल कैंसर, भयंकर रह्युमैटिक रोगों या जाइन्ट सैल आर्टराइटस में दिया जाता है। इस दवा के भयंकर साइड इफेक्ट्स हैं। यह शायद केवल जीवन मृत्यु सी स्थिति में दी जाती है। शायद डॉक्टर के लिए लेने वाले को मॉनिटर करना भी आवश्यक है। किन्तु यह ६५ वर्षीय दर्जी यह दवा लेने लगा और २४ घंटे में ही उसकी हालत खराब हो गई व उसे हस्पताल में दाखिल करना पड़ा जहाँ पाँच दिन बाद उसकी मृत्यु हो गई। ६५ वर्षीय व्यक्ति के चार अवयस्क पुत्र हैं व एक अविवाहित पुत्री है।

सात वर्ष पहले जाइन्ट सैल आर्टराइटिस (आर्टराइटिस ही सही शब्द है। यह आर्थराइटिस नहीं है। यह एक ऑटोइम्यून रोग है ) से ग्रस्त तब पाया गया था जब दिखना लगभग बन्द हो गया था, सर दर्द से फट रहा था, ई एस आर अजब गजब था, सी रिएक्टिव प्रोटीन बहुत बढ़ा हुआ था, ब्लड प्रैशर भी अनोखा था, लगता था कि मृत्यु बहुत बेहतर है। स्टेरॉइड इलाज आरम्भ हुआ। शहर से बहुत दूर होने के कारण बिना धमनी की बायोप्सी के दवा शुरू की गई।

बाद में जब बड़े हस्पताल में दाखिल हो जाँच कराई गई तब ही इस दवा का नाम पता चला और इसके बारे में पूरी जानकारी ली। तब यह दवा लेने को कहा गया था। खरीद भी ली थी किन्तु पारिवारिक डॉक्टर ने कहा कि अभी इस ब्रह्मास्त्र का उपयोग नहीं करेंगे। यह भविष्य के लिए सुरक्षित रखेंगे।

मुम्बई में देखती हूँ कि अति व्यस्त डॉक्टर किसी सहायक को डिक्टेशन दे दवाई आदि लिखवाते हैं। प्रायः वे टाइप करते हैं फिर डॉक्टर पढ़कर हस्ताक्षर कर देता है। छोटे शहरों के बहुत से डॉक्टर मरीज से दवा खरीदकर लाकर दिखाने को कहते हैं। मैं प्रायः सोचती थी कि ऐसा वे इसलिए करते होंगे कि मरीज उनकी बताई दुकान या फिर उनके क्लिनिक से जुड़ी उनके बन्धु की दुकान से दवा खरीदें। अब समझ में आया कि ऐसा वे मरीज की भलाई व शायद प्राण रक्षा के लिए ही करते होंगे।

बहुत सी दवाई की दुकानों में कम उम्र, या कम पढ़े लिखे बच्चे काम करते हैं। मेरी कामवाली की दस पास बेटी को भी एक केमिस्ट की दुकान में नौकरी मिल गई थी। एक अन्य दुकान में एक कक्षा नौ का छात्र दवा निकालने का काम करता था। वह सातवीं कक्षा से यह काम कर रहा है।

जो भी हो हमें दवा सोच समझकर ही लेनी चाहिए व जरा सी भी शंका होने पर डॉक्टर से बात करनी चाहिए। आखिर हमारी जान हमारे लिए तो बहुमूल्य है ही।

घुघूती बासूती