कौन कहता है कि उम्र के साथ मनुष्य खड़ूस नहीं होता जाता ? बिल्कुल हो जाता है। मैं हूँ न इसकी जीती जागती उदाहरण ! दो साल से भी अधिक समय से मेरे मित्र मुझे कहते रहे हैं कि बाराहा का उपयोग करो किन्तु मैं हूँ कि अपनी तख्ती को ही सीने से चिपकाए बैठी रही। मुझ मूर्ख से ढंग से डाउनलोड नहीं हो पाया तो वह भी करवाया। फिर भी मैं तख्ती पर लिखती रही। पोस्ट लिखने तक तो ठीक था, टिपियाने का काम भी उसी पर लिख कॉपी पेस्ट करती रही। किसी ने फिर हिन्दी राइटर की सलाह दी। सलाह तो नेक थी, हिन्दी राइटर का उपयोग करना भी कोई रॉकेट साइंस सा नहीं था परन्तु वही पुराने का मोह ! चिपकी रही तख्ती से। तब तक जब तक मेरे कम्प्यूटर ने परेशान होकर कहना नहीं शुरू कर दिया कि वर्चुअल मैमोरी बहुत कम है। बार बार कहना शुरू किया। इतना कि मैं परेशान हो गई। टिपियाने की बीमारी तो है ही। उस पर हर पल तख्ती से कॉपी पेस्ट करते करते मैं तो नहीं शायद मेरा कम्प्यूटर परेशान हो गया था। या उसे अपनी मालकिन की मूर्खता पर शर्म आ रही थी। सो जब पानी सिर के ऊपर आ गया तो उसने असहयोग आन्दोलन शुरू कर दिया। कहते हैं न लातों के भूत बातों से नहीं मानते तो मैं क्यों बिना धमकाए मानती ? खैर देर आयद दुरस्त आयद। आज मैंने बाराहा का भी उपयोग किया और हिन्दी राइटर का भी। एक बार भी मेरे कम्प्यूटर ने मुझे चेतावनी नहीं दी।
आप पूछेंगे कि इसका उम्र से क्या सम्बन्ध। तो सम्बन्ध यह है कि जब उम्र कम होती है तो हर नई वस्तु आजमाए बिना रहा नहीं जाता। जब उम्र बढ़ती है तो हर नई वस्तु का उपयोग टाला जाता है। यह उम्र केवल वर्षों से नहीं नापी जाती आपके जीवन के प्रति मनोभावों, नजरिए, नए के प्रति जिज्ञासा व उत्साह से नापी जाती है। मेरी उम्र के बहुत से मित्र हर दिन नया आजमाते हैं और मैं नए से कतराती हूँ। सो वे किसी भी उम्र में युवा हैं व मैं :( वृद्धा,खड़ूस वृद्धा ! खैर, इस मामले में तो खड़ूसपन खत्म हुआ। नया अपनाने में कष्ट भी हुआ। मुझे यह जो पॉप अप खिड़की शब्द लेकर उपस्थित हो जाती है जरा भी नहीं सुहाती। उससे खीज होती है। बिन माँगे सुझाव सी लगती है। शायद इसे भी चुप कराने का कोई उपाय होगा। खड़ूसपन से छुटकारा पाने का एक और सबूत मेरा बाराहा का उपयोग करके पंजाबी लिखना था।
फिर भी अंत में यही कहूँगी कि तख्ती का उपयोग अधिक सरल था। उसमें हर अक्षर को लिखने के लिए a का उपयोग नहीं करना पड़ता। kसे क बनता है न कि ka से। हलन्त के लिए x लगाना होता है। फिर हलन्त आता ही कितनी बार है ? सो मुझे वह तरीका अधिक पसन्द है। फिर वह पुराना मित्र है। जब मुझे हिन्दी लिखने का शौक चर्राया था तब अपने छोटे पुत्रीवर को बताया। उसने ढूँढ कर मुझे www.hindikalam.com के बारे में बताया। वह हिन्दी लिखना पढ़ना न के बराबर ही जानता है परन्तु मेरी सहायता तो की। बाद में बड़ा पुत्रीवर जब घर आया तो मेरे कम्प्यूटर में यह तख्ती नामक औजार या जो भी कहो डाल गया। तब से मैं इसकी भक्त बनी रही।
आज तख्ती से क्षमा माँगते हुए बड़े दुख से उसे कहना पड़ा कि बहुत हुआ साथ तुम्हारा। अब कुछ नया भी आजमाऊँगी। यह लेख हिन्दी राइटर की सहायता से लिखा है। वैसे www.hindikalam.com का यह लाभ है कि जब किसी अन्य के कम्प्यूटर का उपयोग करना हो तो औन लाइन जाकर हिन्दी लिखी जा सकती है। परिवार में मेरे सिवा कोई हिन्दी लिखता पढ़ता नहीं है,(मेरा लिखा भी नहीं !) सो अन्य के कम्प्यूटर पर यही काम आता है।
घुघूती बासूती
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Thursday, April 16, 2009
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