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Friday, March 26, 2010

आइ पी एल यदि तमाशा है तो तमाशे पर टैक्स क्यों नहीं लगता ?

हाँ, मुझे भी क्रिकेट पसन्द था और काफी सीमा तक अभी भी है। मैंने भी आम भारतीय बच्चे की तरह खूब बल्ला घुमा रखा है और न जाने कितने घंटे, जो कुल मिलाकर शायद महीने नहीं तो कुछ सप्ताह तो अवश्य हो जाएँगे, टैनिस गेंद या क्रिकेट गेंद से कुछ कम सख्त कॉर्क की गेंद को चौक्के छक्के के बाद बाड़ में से ढूँढने में बिताए हैं।

बचपन व किशोरावस्था में खूब कमेन्ट्री सुनी है। स्कूल, कॉलेज में रिसेस व छुट्टी की प्रतीक्षा की है ताकि स्कोर जान सकें। पॉली उम्रीगर,रमाकान्त सरदेसाई, अजित वाडेकर व सोलकर को रेडिओ में कमेन्ट्री सुनकर ही बिन देखे खूब सराहा है। इन खिलाड़ियों को भारत के लिए खेलने के बदले में आदर, सम्मान व यश के अलावा शायद ही कुछ अधिक आर्थिक लाभ मिला हो। निजि संस्थाएँ इन्हें अपने दफ्तरों में नौकरी देकर स्वयं को धन्य समझती थीं।

तब के क्रिकेट व आज के क्रिकेट और तब के क्रिकेटर व आज के क्रिकेटर की स्थिति में बहुत अन्तर आ गया है। खिलाड़ी अच्छा खेल रहे हैं, उनमें आत्मविश्वास भी बहुत है और वे अच्छा कमा भी रहे हैं। भारत में यदि कोई क्षेत्र हैं जहाँ किसी प्रोत्साहन की आवश्यकता नहीं है तो वह क्रिकेट ही है। फिर भी लगता है कि देश में यदि किसी काम के लिए सरकार व समाज दिल खोलकर प्रोत्साहन दे रहा है तो वह क्रिकेट ही है।

लगभग दो सप्ताह पहले नवीं मुम्बई के डी वाइ पाटिल स्टेडियम में आइ पी एल का पहला मैच था। मैच के अतिरिक्त ओपनिंग समारोह भी था। जो कि हर हाल में मनोरंजन ही माना जा सकता था। संसार के जाने माने कलाकार व एक भारतीय अभिनेत्री व अन्य कलाकार मनोरंजन के लिए बुलाए गए थे। समारोह भव्य था। यह बात और है कि टी वी के दर्शकों को यह अनुमान नहीं होगा कि जो सफेद महीन कपड़े का तम्बू जैसा बीचों बीच ताना गया था वह वहाँ बैठकर देखने वाले बहुत से दर्शकों के मनोरंजन में सबसे बड़ी बाधा बन गया था। उसके कारण हम विशालकाय टी वी का परदा नहीं देख पा रहे थे। कार्यक्रम जितनी दूरी पर हो रहा था उतनी दूरी से बिना दूरबीन के चेहरे देखना कठिन ही था। देखने का सबसे अच्छा तरीका था कि नीचे होते कार्यक्रम पर एक नजर डालकर ऊपर परदे पर लोगों को पहचाना जाए और फिर वापिस नीचे देखा जाए।

मैच भी बढ़िया रहा। जीवन में पहली बार स्टेडियम में मैच देख रही थी, बल्कि इतनी बड़ी भीड़ का हिस्सा भी लगभग पहली बार ही थी। वहाँ मैच देखने का अनुभव घर बैठकर देखने से बहुत अलग था। जो वातावरण वहाँ बनता है वह घर में संभव ही नहीं है। शायद जब कुछ मित्र लोग मिलकर किसी बड़े टी वी/परदे पर देखें तो थोड़ा बहुत वैसा वातावरण बन सकता है। आजकल साथ में तो पानी या दूरबीन भी नहीं ले जाई का सकती तो शोर मचाने, पटाखे फोड़ने व आतिशबाजी का प्रबन्ध भी आयोजकों व विज्ञापन देने वाले कर देते हैं। ऐसा उत्सव का वातावरण बनता है कि व्यक्ति सबकुछ भूलकर इस उत्सव का एक उत्साही भाग भर बन जाता है। यदि उत्साह में कुछ कमी आए तो आइ पी एल की विशेष धुन बजने लगती है और लोगों में जोश आ जाता है। मैक्सिकन लहर भी अपने आप न उठकर आयोजकों द्वारा ही उठवाई जाती है। खिलाड़ियों के कौशल के अतिरिक्त आइ पी एल में जो भी था वह एक तमाशा अवश्य था। एक बढ़िया सुरुचिपूर्ण तमाशा जिसे बार बार देखें तो यह व्यसन की श्रेणी में आ जाएगा।

मुझे मैच देखकर बहुत आनन्द आया,जीवन में एक नया अनुभव हुआ। किन्तु बस एक ही बात समझ नहीं आती कि आइ पी एल पर टैक्स क्यों नहीं लगता। यदि सरकार को पैसे की आवश्यकता नहीं है तो टैक्स से जुटाई राशि भारत के अन्य गरीब खेलों व खिलाड़ियों व उनकी सुविधाओं पर खर्च करी जा सकती है। वैसे भी क्रिकेट व क्रिकेटर भारत के सबसे अमीर लोगों द्वारा खरीद लिए गए हैं। अब वे पैसा बनाने का एक साधन हैं। तो क्यों न जैसे पैसा कमाने के अन्य साधनों व अन्य धंधों में टैक्स लगता है वैसे ही यहाँ भी लगे। हमारे भारतीयों व उनके जीवन स्तर को देखकर लगता है कि देश यदि अधिक नहीं तो कम से कम दो शताब्दियों में जी रहा है,अधिक नहीं तो दो भारत तो अवश्य ही हैं, एक क्रिकेट या कहिए आइ पी एल का भारत तो दूसरा गुल्ली डंडे, कंचों, खो और कबड्डी वाला भारत। गली, व सड़क पर खेला जाने वाला क्रिकेट भी इस दूसरी श्रेणी में ही आता है बस अन्तर इतना है कि यहाँ खिलाड़ी सचिन बनने का सपना भी संजोए रहते हैं जबकि गुल्ली डंडे, कंचों, खो और कबड्डी वाले शायद सपने भी नहीं देखते।
यदि दूसरे खेलों को बढ़ावा देना हमारी नीति के विरुद्ध है तो फिर जिस भी शहर में यह मैच हो रहा हो उसी शहर के हस्पताल में किसी बेबस मरीज को इलाज/ औपरेशन के लिए पैसा दे दिया जाए। यह कल्याण कार्य भी आइ पी एल के विज्ञापनों में दिखाया जाए। या फिर यह पैसा किसी नामी खिलाड़ी द्वारा ही मरीजों को दिला दिया जाए। शायद कुछ और लोग भी सहायता करने को उत्साहित हो जाएँ। आइ पी एल क्रिकेट के अलावा केवल नाच, गाने, मस्ती, और देश के सुन्दर लोगों के जमघट का ही नाम न होकर अपने हिस्से का टैक्स भी देश के हित में दे रहा है यह संदेश सबको मिलना चाहिए। हो सके तो टैक्स से भी अधिक सहायता समाज की कर रहा है दिखे तो क्या बात!

समझ नहीं आ रहा है कि समाजवाद की पक्षधर न होने पर भी आइ पी एल मुझे क्यों परेशान कर रहा है। क्यों मेरा मन मैच देखने का नहीं हो रहा? क्यों मुझे लग रहा है कि टिकट के २५०० रुपए में से कम से कम ५०० रुपए तो मनोरंजन कर में जाने ही चाहिए थे? क्यों मैं घुघूत के यह पूछने पर कि फाइनल मैच देखने भी चलना है कोई उत्तर नहीं दे पा रही? मैं जानती हूँ कि सारे जीवन २० या ३० बार से अधिक सिनेमा हॉल (अब तो सिनेमा हॉल भी शायद नहीं बचे)में फिल्म तक न देख सकने वाली मैं, जीवन की संध्या में शहर में रह रही हूँ तो बिना किसी ग्लानि के मैच देखने जा सकती हूँ। मुझे स्टेडियम का वातावरण रास भी आया था। अपने अन्दर छिपी पुराने जमाने की खिलाड़ी की स्पर्धा वाली भावना भी वापिस बाहर आई थी। फिर भी मैं मैच देखते समय असहज सी हो रही हूँ। क्या बिना कर चुकाए ऐश्वर्य गले में हड्डी की तरह फँसता है? क्या हेराफेरी कर धन कमाने वाले का भगवान को चढ़ावा और हमारा कर समतुल्य व पाप नाशक व धोवक हैं? क्या कर देने के बाद हम भूखे नंगे लोगों की तरफ से आँखें मूँद बिन ग्लानि के मॉल विचरण कर सकते हैं? शायद हाँ।

खैर कोई बात नहीं, कुछ दिनों में यह भी सामान्य लगने लगेगा। देर सबेर हर गलत बात के हम आदी हो जाते हैं। जय आइ पी एल की, जय पैसे की! कोई बोली लगाए तो शायद हम अपने लेख, कविताएँ, ब्लॉग और यदि सही मूल्य मिले तो अपना यह छद्म नाम भी बेच देंगे।

प्रश्नः क्या यह सफल लोगों से ईर्ष्या का मामला है? या बाज़ारीकरण से पहले वाले दिनों की बच्ची, किशोरी, युवती अभी भी कहीं मेरे भीतर छिपी बैठी है और मुझे पता ही नहीं लगा? क्या अभी भी बचपन में पढ़ा नेहरू का समाजवाद वाला पाठ उसके सुप्त मस्तिष्क में छिपा तो नहीं बैठा? और यह उसी की आत्मा की अपराध भावना है? या फिर कानू सान्याल वाले जीन्स सबमें होते हैं? पता नहीं।

घुघूती बासूती