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Tuesday, July 15, 2014

त्याग या स्त्री के कैरियर की महत्वहीनता?


कुछ दिन पहले पति के कॉलेज के समय के साथियों ने एक पार्टी की जिसमें हम पत्नियों को भी बुलाया गया। एक दम्पत्ति से मैं लगभग तीस साल पहले मिल चुकी थी, शेष सबसे पहली बार मिल रही थी। लगभग सब पुरुष व कामकाजी स्त्रियाँ रिटायर हो चुके थे। तीन स्त्रियाँ थीं जो नौकरी नहीं करती थीं।

कुछ मेज जोड़ दिए गए थे और जैसी कि परम्परा है, एक तरफ आमने सामने पुरुष बैठे थे और दूसरी तरफ स्त्रियाँ। सो कॉलेज व हॉस्टेल के जमाने के पति के मित्र कैसे व कौन थे यह जानने व उनके उस समय के किस्से सुनने की मेरी हल्की सी जिज्ञासा जो थी वह ज्यों की त्यों धरी रह गई। एक बार फिर मैं पति के मित्र/ सहयोगी/ बिरादरी या किसी भी अन्य प्रकार से सम्बन्धित पुरुषों के समूह की बिल्कुल ही आपस में असम्बन्धित, अनजानी पत्नियों के बीच थी और मुझे उनके साथ समय बिताना था, जानपहचान करनी थी और उनके साथ पार्टी व अपना मनोरंजन करना था। मैं समाज की इस आशा से सदा ही स्तब्ध रह जाती हूँ कि वह स्त्री से सदा यह अपेक्षा करता है और उसके जरा से विरोध से स्तब्ध व आहत हो जाता है।

खैर, पिछले ३७ वर्ष से सदा स्वयं को ऐसे ही समूहों में पाती रही हूँ सो अनजानी स्त्रियों से बतियाने का गुर सीख चुकी हूँ। जिस स्त्री से ३० साल पहले मिली थी और जिसे मिलने की मुझे जरा भी याद न थी वह मेरे बगल में बैठी थीं। कुछ देर अतिथी धर्म निभाने को उसके पति भी मेरी दूसरी बगल में बैठे और मेरी बेटियों के बारे में पूछने लगे। मेरे बड़ी बिटिया के पोस्ट डॉक्टरल रिसर्च करने पर उन्होंने उसका विषय पूछा। उसका विषय बताते ही सामने बैठी स्त्री के कान खड़े हो गए। पति के मित्र तो पाँच मिनट खबर लेने को साथ बैठने के बाद उठकर पुरुषों के बीच जा बैठे। ये स्त्री जिन्हें मैं डॉ क कहूँगी मुझसे बोलीं,"एक्सक्यूज़ मी। मैंने आपकी थोड़ी बात सुनी। आपकी बेटी कहाँ रिसर्च कर रही है? कहाँ से एम एस सी की? कहाँ से पी एच डी की? यह मेरे क्षेत्र का विषय है।"

ऐसा कम ही होता है कि कोई मुझे बिटिया के विषय या उसके विषय से सम्बन्धित क्षेत्र का मिले। मेरी तो उसके विषय में स्वयं की जानकारी बहुत कम है। मुझे यह सोच बहुत खुशी हुई कि मेरी पीढ़ी की कोई स्त्री उस विषय से सम्बन्धित है। मैंने उनसे पूछा, "अरे वाह, आप तो क्षेत्र में बहुत सीनियर होंगी। आप कहाँ काम करती हैं?"

डॉ क ने बताया कि शादी के कुछ समय बाद ही उनपर परिवार का इतना उत्तरदायित्व आ गया कि उन्हें रिसर्च छोड़ घर पर ही रहना पड़ा। उनके गाइड या रिसर्च इन्चार्ज ने दो साल तक उनके लिए जगह बनाए रखी किन्तु दो साल बाद डॉ क ने कह दिया कि वे इतनी व्यस्त हो गई हैं कि कभी लौट नहीं पाएँगी अतः उनकी प्रतीक्षा न की जाए।

मेरे यह कहने पर कि बच्चे बड़े हो जाने पर वे फिर से काम शुरू कर सकती थीं वे बोलीं कि काम बच्चों के उत्तरदायित्व के कारण नहीं इन लॉ उत्तरदायित्व के कारण छोड़ा था। उनकी उम्र का ध्यान कर मैंने कहा कि क्या अभी सास ससुर हैं तो वे बोलीं नहीं। मैंने कहा कि अब तो आपको खालीपन सताता होगा। किन्तु इतनी देर से रिसर्च में तो नहीं लौट सकतीं ना। तो वे बोलीं कि नहीं मेरा उत्तरदायित्व तो अब भी चालू है।

मैं कुछ चकित हुई तो उन्होंने बताया कि उनकी दो ननदें हैं जिनका उन्हें ध्यान रखना होता है। वे अपना ध्यान नहीं रख पातीं। एक मानसिक रूप से काफी चैलेंज्ड हैं और दूसरी भी कुछ कम किन्तु वैसी ही हैं।

वे शाम भर कभी अपने अमेरिका में रिसर्च के समय के किस्से सुनाती रहीं तो कभी भारत के। कभी अपनी पी एच डी के जमाने के तो कभी अपने गाइड के।

आकर्षक व्यक्तित्व वाली उस सौम्य सी दिखने वाली स्त्री में मैं कुछ ऐसी उलझी कि अन्य किसी से कम ही बात हुई।
जब से उनसे मिली तब से यही सोच रही हूँ कि यदि विवाह बाद किसी दुर्घटना के कारण यह सब हुआ होता तो बात अलग थी। किन्तु यह कोई दुर्घटना नहीं थी। यह परिस्थिति तो पहले से ही थी। फिर बात वहीं आती है कि

१. उनका प्रेम विवाह तो था नहीं। तो उन्होंने इस विवाह के लिए सहमति क्यों दी? क्या उन्हें यथास्थिति का पता नहीं था?

२. उनके पति तो अपने विवाह से पहले से ही अपनी बहनों की स्थिति जानते थे। सो यह भी जानते थे कि उनकी पत्नी से क्या अपेक्षाएँ होंगी। सो उन्होंने किसी ऐसी स्त्री का चयन क्यों नहीं किया जो कामकाजी न थी। जो इतना अधिक पढ़ी लिखी न थी।

३. कैसे उनके सबसे अच्छे कॉलेज से ही पढ़े, चाहे खूब कमाते इन्जीनियर किन्तु ग्रेजुएट पति ने अपने लिए पी एच डी, विदेश में भी पोस्ट डॉक करी स्त्री का चुनाव किया, यह जानते हुए कि उसे काम छोड़ घर रहना होगा?

४. क्या ऐसा करने में उनकी अन्तर्आत्मा ने उन्हें कचोटा या नहीं? या उन्हें स्त्री का कैरियर महत्वहीन लगता था?

५. डॉ क के माता पिता ने उसके लिए ऐसा घर क्यों चुना?

६. क्या माता पिता को उनकी बहनों के बारे में पता नहीं था? पता था तो क्या उन्हें लगता था कि सास के बाद या सास के वृद्ध या बीमार होने के बाद उनका कुछ और प्रबन्ध हो जाएगा?

७.क्या उन्होंने इस बारे में जानने के बाद अपनी बेटी के काम करते रहने के बारे में कुछ भी सुनिश्चित नहीं किया था?

८. क्या बेटी के काम छोड़ने के बाद उन्हें अपने चयन पर अपराध बोध हुआ होगा?

क्या आप सबको यह पढ़कर सामान्य सा लग रहा है या एक प्रतिभा की समाप्ति पर दुख, क्षोभ या क्रोध आ रहा है?

या आपको यह त्याग महान और अनुकरणीय लग रहा है?

क्या वह स्त्री अपने त्याग और तपस्या के आलोक से ही प्रसन्न व सन्तुष्ट होंगी?

यदि हाँ तो उन्होंने लगातार मुझसे अपनी रिसर्च की बातें क्यों कीं?

मैं ऐसे पुरुषों को भी जानती हूँ जिन्होंने परिवार के लिए ऐसे त्याग किए किन्तु वे परिवार उनके जन्म के परिवार थे न कि विवाह के बाद के जहाँ मनुष्य के पास चुनाव का विकल्प होता है। मैंने ऐसा एक भी पुरुष नहीं देखा जो चुनाव करके ऐसी स्थिति को अपनाए जहाँ उसे अपनी पत्नी के लिए ही नहीं उसके परिवार के सदस्यों के लिए अपने प्रिय विषय व जाने पहचाने जीवन को छोड़ त्याग व सेवा का जीवन जीना पड़े।

कुछ उलझन में,

घुघूती बासूती

Thursday, December 12, 2013

समलैंगिकता को कानूनी मान्यता



एक पढ़ी लिखी नौकरी करती बेहद निपुण स्त्री ने जो पारम्परिक अरैन्ज्ड विवाह में विश्वास करती थी, जिसने एक से एक अच्छे अन्तर्जातीय रिश्ते ठुकराकर अपने माता पिता के द्वारा चुने सुन्दर, सुशील, अच्छे घर के सजातीय पुरुष से विवाह किया।

वह पहले ही दिन पति के मित्र ( प्रेमी) का अपने ससुराल में पूरा दखल, घर में महत्व, पति पर उसका इतना प्रभाव कि वह जो कहे वह पति मान ले देख दंग रह गई। पति उसके साथ मायके जाने को मना कर दे, किसी रस्म को निभाने से मना कर दे, उसके साथ कमरे में रहने को ही मना कर दे तो हर मर्ज का एक इलाज वह मित्र था। सास ससुर उस मित्र को गुहार लगाते और वह कहे तो पति सर के बल खड़े होने को भी तैयार हो जाता।

खैर बाद में पता चला कि जिसकी वह पत्नी है उसका भी पति है, और पति का पति वह मित्र है। उसका पति तो खैर नाम का ही था। इस असम्भव से रिश्ते को भी पति में बदलाव का अवसर दे निभाने की कोशिश जब पूरी तरह से असफल हो गई तो स्त्री ने तलाक दे दिया। किन्तु वह स्त्री उस पूर्व पति को कभी कोसती नहीं थी। उसका कहना था कि वह भी समाज का शिकार एक पीड़ित था। उसे क्या दोष देना। उससे तो सहानुभूति होनी चाहिए।

यदि वह स्त्री उस समलैंगिक के साथ सहानुभूति रख सकती थी तो हम क्यों नहीं? यदि हम स्वयं को उनके स्थान पर रखकर देखें तो शायद हम इतने कठोर नहीं होंगे। शेष समाज से अलग होना, अचानक अपने बारे में यह जानना कि अन्य मित्रों की तरह वह विपरीत लिंगियों की बजाए अपने ही लिंग वालों की तरफ आकर्षित है। बार बार कोशिश करना कि अन्य मित्रों या सहेलियों की तरह व्यवहार करें, विपरीत लिंगियों से दोस्ती व लगाव रखने की असफल कोशिश करना, किन्तु उनमें कोई आकर्षण न पाना। जिनसे आकर्षित हो उनसे कह नहीं सकना, अपराध भाव, हीन भावना से किशोरावस्था से ही ग्रसित होना। यह सब कितना कठिन होता होगा। अपने आकर्षण, अपने सत्य को परिवार से छिपाकर रखना, झूठ ही विपरीत लिंगियों में नकली रुचि दिखाना यह सब क्या कम सजा है उनके लिए जो समाज और हम उन्हें और सजा देना चाहें?

 हममें कुछ तो मानवीय संवेदनाएँ होनी ही चाहिएँ।


घिनौने बलात्कार के लिए कम सजा और सहमति से बने समलैंगिक सम्बन्धों के लिए उम्र कैद क्या कहीं से भी उचित है?

यदि उस पति का परिवार अपने बेटे का सत्य सामने होने पर भी उसको देखने से इनकार न करता, उसे विवाह के लिए बाध्य न करता तो उस स्त्री के जीवन में इतनी उथल पुथुल, इतना दुख, एक नकली विवाह को करने में और फिर तोड़ने में शक्ति, धन, समय की बरबादी न होती, विवाह के लिए जो मन में रोमान्टिक कल्पनाएँ होती हैं वे चूर चूर न होतीं।

मुझे तो माता पिता, व समाज उस स्त्री के कष्ट के लिए उस कमजोर पुरुष से अधिक उत्तरदायी लगते हैं।
यदि आपको समलैंगिकों से सहानुभूति नहीं है तो भी उनसे धोखे, अज्ञान में विवाह करने वाले अभागों को इस दुर्भाग्य से बचाने के लिए ही सही हमें, आपको, समाज को समलैंगिकों को अपनी तरह, अपने जैसों के साथ जीने का अधिकार देना होगा।

घुघूती बासूती

Wednesday, August 08, 2012

कचरा


हम सब चाहते हैं कि हमारी सड़कें, हमारे शहर साफ सुथरें हों, कि हमें हर समय यह परेशानी न हो कि सामने देखें या नीचे जहाँ कचरा, विष्ठा, खुले मैनहोल, नालियाँ, गड्ढे आदि हों। हर मोड़ पर, हर कुछ दूरी पर कचरापेटियों के बाहर कचरा न बिखरा पड़ा हो और हमें नाक पर रुमाल रखकर न चलना पड़े। अपने शहर, गाँवों व देश का हाल देखकर हमें अपनी ही नजरों में न गिरना पड़े।

सरकारें, नगरपालिकाएँ बड़े बड़े पुल, सड़के बनवा सकती हैं, समुद्र के ऊपर पुल बना हमारा रास्ता छोटा कर सकती हैं, संसार को बता सकती हैं कि देखो हम भी विकास की दौड़ में आगे आ रहे हैं। किन्तु यदि हम इन सबपर कचरा बिखेरते रहेंगे तो संसार की कोई भी सरकार या नगरपालिका उसे साफ नहीं रख सकतीं। गंदगी के बीच हमारा सिर झुका ही रहेगा।

हम देखते हैं कि कचरा बीनने वाले स्त्री पुरुष व बच्चे, कचरे के डब्बों से रीसायकलेबल कचरा बीनकर ले जाते हैं। किन्तु ऐसा करने के लिए यदि डब्बा ठीक ठाक आकार का हुआ तो उसके भीतर हाथ डालकर या उसे पलटकर काम का कचरा निकालते हैं। यदि बहुत बड़ा हुआ तो स्वयं उसके भीतर घुस जाते हैं। फिर यदि आपके पास समय है तो देखिए क्या होता है। वे हमारा फेंका हुआ कचरा पॉलीथीन के थैलों से बाहर निकालते हैं, थैले को अपनी बड़ी सी बोरी में डालते हैं। थैली से बाहर निकाल फैलाए हुए कचरे में से अपने काम का कचरा चुनते हैं। एक और बड़ी सी काली थैली जो हम अपने घर के डस्टबिन में लगाते हैं ताकि हमारा डस्टबिन गन्दा न हो जाए बाहर निकालते हैं, उसमें से मेरे या आपके घर का कचरा बाहर निकालते हैं, हमारे द्वारा फेंके हुए चिप्स, नमकीन, या दाल चावल या फिर सब्जी, मटर, पनीर, मक्खन, दूध के पैकेट वे अपने हाथों से, जो सात आठ वर्ष के पतले, मैले, नन्हे हाथ भी हो सकते हैं, बीनकर अपनी बोरी में डाल लेते हैं। वे हमारे घरों से बहुत अच्छे से पॉलीथीन में पैक किए गए मासिक श्राव के पैड की थैली भी संभाल लेते हैं और हमारे बच्चों के मलमूत्र से भरे डिस्पोजेबल डायपर्स की थैलियाँ भी।

आजकल एक विज्ञापन आता है 'डर्टी हैबिट' वाला। रुमाल से नाक मुँह पोछना 'डर्टी हैबिट' है जिसके चलते वर ठुकराया जाता है, सड़क चलता अंकल छोटे बच्चों द्वारा रोक कर टोका जाता है। किन्तु इस 'डर्टी हैबिट' को छोड़कर जिन अलग अलग सुदृढ़ टिशू से नाक अलग से, आँख अलग से व मुँह अलग से पोछा जाएगा वे जाएँगे कहाँ? इन्हीं कचरा उठाने वालों द्वारा समेटकर उनकी बोरी में? क्या कोई इन मानवों को भी बताएगा कि यह गन्दगी को खन्गालने, उसमें बहुमूल्य निधि ढूँढने, सम्भालने, उसके लिए अपने डस्टबिन पर अतिक्रमण करने वाले से झगड़ा करना आदि 'डर्टी हैबिट्स' हैं? और इन  'डर्टी हैबिट्स' से हमारे संसार को साफ रखना, हमारा कचरा आधे से भी अधिक रीसायकल करना, उससे अपनी आजीविका कमाना और रीसायकल करने में लगे गोदाम मालिकों, कारखाना मालिकों, मजदूरों को आजीविका प्रदान करना व उनसे फिर फिर बने सस्ते सामान व उनके उपयोग करने वालों को सस्ते दामों में सामान उपलब्ध कराना भी क्या 'डर्टी हैबिट्स' हैं?

क्या हम पल भर को भी सोचते हैं कि वे सब वस्तुएँ जो हमारे जीवन को और व और अधिक आरामदेह बनाती हैं वे कहाँ से आती हैं और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कि कहाँ जाती हैं?

किसी जमाने में हम अलग अलग थैले या कनस्टर या डब्बे लेकर अपने घर का सामान लाते थे। गेहूँ लाते थे, उसे चुनते थे और फिर डब्बे में डाल पिसवाने ले जाते थे। यदि हमें ले जाने में शर्म आती थी तो किसी सहायक या सहायिका के हाथ चुनवाते व पिसवाने भेजते थे। बदले में उन्हें पैसे देते थे। तेल लेने जाते तो या तो तेल का डब्बा, पीपा साथ ले जाते या फिर डब्बे, कनस्टर में पैक्ड खरीदते। सब सामान या तो कागज की पुड़िया में आता या फिर कागज के थैलों में। घर आते ही हमें उन्हें अपने डब्बों में सहेजना पड़ता।

आज आटा, चावल, साबुन, तेल, दाल, नमकीनें सबकुछ बढ़िया पॉलीथीन की थैलियों में, कई बार तो ज़िप लॉक वाली थैलियों में आती हैं। दही प्लास्टिक के डब्बों में, दूध थैलियों में या फिर कार्टन्स में ताकि हम बिना उबाले बस कप में उड़ेलें और पी लें। हर वस्तु 'उपयोग करो और फेंको' के सरल मन्त्र के साथ परोसी जाती है। बस पैसा फेंको तमाशा देखो। और पैसा न हो तो?

तो.....
तो हमारे फेंके में से अपने काम का चुनो, सहेजो, बेचो, कमाओ, खाओ।

मैं न समतावादी हूँ, न समाजवादी। यदि हम शुद्ध स्वार्थ के दर्शन पर भी काम करें तो भी हम गलत हैं। हमारा स्वार्थ है कि हमारी गलियाँ, सड़कें, नगर साफ रहें। गन्दगी फैलती है कूड़े से। कूड़ा वह है जो हम अपने घर से उठाकर बाहर चाहे पैकेट में अच्छे से छिपा, लपेटकर ही बाहर की कचरापेटी में डालते हैं। यदि कचरा बीनने वाले न होते तो नगरपालिका को और अधिक कचरा उठाना पड़ता, और अधिक ट्रक लगते, और अधिक सफाई कर्मचारी, डीज़ल चाहिए होते, अधिक खर्चा होता। हमारे शहरों के कचरा डम्पिंग ग्राउन्ड्स और भी जल्दी भर जाते, वे और भी ऊँचे पहाड़ बन जाते। नई जमीन ली जाती, और खर्चा होता और सड़ान्ध होती।

यदि कचरा बीनने वाले होंगे तो कचरा कम हो जाएगा। किन्तु उनसे अमानवीय काम करते हुए यह क्यों अपेक्षा की जाए कि वे ध्यान से हमारे कचरे में हाथ डालें किन्तु उसे उड़ाए, बिखारें, फैलाएँ नहीं। अपने काम का ले लें और शेष कचरे को अच्छे से वापिस कचरापेटियों में पैक कर दें। क्या यह अपेक्षा करना सही है? एक कुत्ता भी अपने काम से निपट अपनी ही गन्दगी से दूर भागता है तो ये मानव उसे फिर से पैक क्यों करेंगे? गन्दगी से कमाने वाले, गन्दगी में जीने वाले सफाई की तरफ इतने जागरुक क्यों होंगे? जबकि साफ सफाई में जीने वाले हम अपने घर के सिवाय हर जगह कचरा फैलाते हैं।

क्या यह बहुत कठिन है कि वह सब कचरा जो कचरा बीनने वाले बीनते हैं यानि कि जो रीसायकलेबल है और जो हमारे घरों से ही निकलता है उसे हम अलग इकट्ठा करें? ऐसे कि वे यह पूरा का पूरा रीसायकलेबल कचरा अपने बोरे में डालें और ले जाएँ। ऐसे कि उनके हाथ हमारी गन्दगी को छुएँ ही नहीं। सूखे रीसायकलेबल कचरे जैसे कि काँच, पेपर, गत्ता, कपड़ा, प्लास्टिक, पॉलीथीन, धातु, यह सब हमारे घर की सब्जियों के छिलकों, डायपर्स, बाल, बचे खाने आदि के सम्पर्क में आए बिना, साफ सुथरे अलग से ही सूखे कचरे के डब्बे में इकट्ठा हो साफ, सूखे ही उनके बोरों में चले जाएँ। ताकि कचरा इकट्ठा करने वाले का भी थोड़ा सा मान सम्मान बना रहे, हमारी सड़कें, कचरापेटी के आसपास की जगह भी साफ रहे और सबसे बड़ी बात यदि हममें जरा सी भी मानवता हो, अच्छाई हो, भावनाएँ हों तो नित कचरे के साथ वे भी पॉलीथीन की काली थैलियों में लपेट चुपके से बाहर न फेंकनी पड़ें।

जानती हूँ कि कई शहरों में सूखे व गीले कचरे को अलग फेंकने के नियम कानून हैं। मैं कोई नई बात नहीं बता रही। किन्तु नियम कानून तो बच्चों को न मारने, बच्चों स्त्रियों के साथ बलात्कार न करने, हत्या न करने के भी हैं। किन्तु कुछ लोग तो इन नियमों कानूनों को तोड़ते ही हैं। किन्तु क्या मैं और आप भी? नहीं न? तो फिर कचरे के मामले में और कचरा बीनने वालों के मामले में हृदयहीन क्यों बनें? न न, बात उनके भले की ही नहीं है हमारी भी है। हमारी सड़कों की सफाई की और.....

ये कचरा बीनने वाले व अन्य ऐसे ही काम में लगे लोग जैक इन द बॉक्स भी हो सकते हैं। दबते दबते किसी दिन उछलकर तुम्हारे हमारे ही माथे से टकराएँगे और वे तो क्या और टूटेगें, तुम्हारे हमारे माथे ही घायल होंगे। सो आत्महित में ही सही, कुछ करना चाहिए।

घुघूती बासूती

Friday, October 21, 2011

अंकल की दुकान कहाँ है?

अभी अपनी खिड़की से बाहर का दृष्य देखते हुए मेरा मन उस पर लिखने को हुआ। लिखने के लिए की बोर्ड पर हाथ लगाते ही पिछले मकान याने नवीं मुम्बई की एक ऐसी ही शाम याद आ गई और याद आ गई एक बच्ची से की गई बातचीत।

नवीं मुम्बई की उस हाउसिंग सोसायटी में चारों तरफ कार पार्क करने की जगह थी जहाँ जब तक लोग काम से लौटकर नहीं आते थे सैर करने को व बच्चों के खेलने के लिए काफी जगह रहती थी। साथ में ही सोसायटी का बगीचा भी था जहाँ चारों तरफ चलने के लिए रास्ता भी दिया था। लॉन, काफी सारे पेड़, फूलों की झाड़ियाँ, क्यारियाँ, बेलें, बैठने को एक सुन्दर चबूतरे के नीचे बेंच। सुबह सुबह जाने पर तो कई गौरेय्या भी यहाँ वहाँ घास पर फुदकती मिल जाती थीं। कुल मिलाकर शहर के लिहाज से वहाँ सैर करना अच्छा लगता था।

मैं लगभग हर शाम वहाँ घूमती थी। पति को मुम्बई से दफ्तर से आने में बहुत समय लग जाता था। मैं घूमते हुए समय भी काटती व वजन भी। वहाँ कुछ बच्चे खेलते, कुछ सायकल चलाते और कुछ किशोरियाँ खेलने कूदने की बजाय मेरी तरह सैर करतीं। इन सबके अलावा लगभग दस वर्ष की एक छोटी लड़की भी थी जो खेलने की बजाए जिस किसी के साथ सैर करती। उसके पिता व चाचा की दुकानें थीं, जिनमें से एक का उद्घाटन कुछ समय पहले ही हुआ था। सोसायटी के सभी परिवारों को पूजा, दोपहर के भोजन आदि के लिए बुलाया गया था। यह बात और थी कि वहाँ पहुँचने पर उस संयुक्त परिवार की एक भी महिला मुझे व मेरी पड़ोसिन को ढूँढे से नहीं मिली। मैं तो नई थी, मेरी पड़ोसिन ही मुझे बुलाकर साथ ले आई थी सो वह काफी लज्जित हुई और हम उनके भगवान जी व घर के दो तीन पुरुषों को नमस्ते कर घर लौट आए थे।

एक शाम वह लड़की भी मेरे साथ चलने लगी। चार चक्कर लगाने के बाद वह मुझसे बतियाने लगी।
'आँटी आप कौन से फ्लोर पर रहती हैं?'
'१२'
'आँटी आप अकेले क्यों सैर करती हैं?'
मैंने उसकी तरफ देखा, कोई उत्तर नहीं दिया। देने से पहले ही उसने अगला प्रश्न पूछ लिया।
'आप अकेली रहती हैं?'
'नहीं। मेरे पति साथ में रहते हैं।'
'आपके बच्चे नहीं हैं।'
'हैं।'
'तो वे आपके साथ क्यों नहीं रहते?'
'वे दूसरे शहर में रहते हैं।'
'क्यों?'
'उनका काम वहाँ है।'
'हमारी दादी कहती हैं कि सबको साथ रहना चाहिए।'
'सही कहती हैं।'
'फिर आपके बेटे क्यों साथ नहीं रहते।'
'मेरी बेटियाँ हैं।'
'तो वे अपने ससुराल में रहती हैं।'
'नहीं, अपने घर में।'
'सास से अलग।'
'सास अलग शहर में रहती हैं।'
वह थोड़ी देर सोचती रही।
'सब लोग एक दुकान में काम नहीं करते?'
'नहीं।'

मैं थोड़ी सी चौंकी क्योंकि दुकान में काम करना जरा विचित्र सा लगा। मैंने विज्ञान में वर्षों से डूबी व रिसर्च करती अपनी बिटिया व दफ्तर में काम करती दूसरी बिटिया की जब किसी दुकान, विशेषकर उस बच्ची के परिवार की तरह टाइल्स की दुकान में कल्पना करी तो मैं असहज हो गई। मैं बुदबुदाई........

'बेटियाँ दुकान में काम नहीं करतीं।'
वह हँसकर कहती है..
'हाँ, आँटी दीदियाँ दुकान में काम थोड़े ही करती हैं। वे तो घर में रहती होंगी। नहीं? दुकान में तो आपके कुँवर सा,(मुझे देखती है कि शायद मैं समझी नहीं और समझाते हुए कहती है ) मतलब जीजाजी लोग काम करते होंगे।'
'नहीं, वे भी नहीं।'
वह कुछ देर चुप रही। दो चक्कर हम चुपचाप चले। उसे शायद चुप रहना पसन्द नहीं या फिर मेरा साक्षात्कार अधूरा था।
'अंकल कब आते हैं?'
'वे देर से आते हैं।'
'क्यों?'
'उनका दफ्तर बहुत दूर है।'
वह ऐसे देखती है जैसे समझती नहीं। कुछ सोचती है।
'आँटी अंकल की दुकान कहाँ है?'
'उनकी दुकान नहीं है।'
'अरे! फिर?'
'फिर कुछ नहीं, उनकी दुकान नहीं है।'
'ओहो, तो वे हमारे नौकर लाखा और जयमल की तरह औरों की दुकान में काम करते हैं?'

मैं निःशब्द। उससे यह भी नहीं पूछती कि वह किस कक्षा में पढ़ती है। पूछने का कोई अर्थ भी नहीं बचता क्योंकि उसने कौन सा दुकान में काम करना है और हिसाब रखना है।

बात वह सही कह रही थी, मेरे पति, पुत्रियाँ व जवाईं सच में लाखा व जयमल की तरह औरों की दुकानों में ही तो काम करते हैं, चाहे वे दुकानें बड़े कारखानों के दफ्तर हों या मल्टीनेशनल्स के बड़े बड़े दफ्तर हों, या भारत के शीर्ष के अनुसन्धान केन्द्र! हैं तो वे किसी और की दुकानें ही।

वह शरीर से रहती चाहे मुम्बई, नवीं ही सही, में थी, किन्तु .....

इतने में एक कार रुकी और ढेरों सामान के साथ सर पर पल्लू डाले तीन महिलाएँ कार से उतरीं। वह मम्मी मम्मी, दादी दादी कहती हुई कूदती फाँदती उनके पास, संयुक्त परिवार की स्त्रियों के पास, शायद कुछ और उपयोगी जीवन मूल्य सीखने चली गई। हवा में बस कुछ प्रश्न बहते हुए रह गए.....

'आँटी अंकल की दुकान कहाँ है?'
'ओहो, तो वे हमारे नौकर लाखा और जयमल की तरह औरों की दुकान में काम करते हैं?'
'हाँ, आँटी दीदियाँ दुकान में काम थोड़े ही करती हैं। वे तो घर में रहती होंगी। नहीं?'

घुघूती बासूती

Tuesday, October 11, 2011

ओह!

कल एक युवक से मिलना हुआ। बातचीत हुई तो क्या करते हो पूछा। अच्छा खासा काम करता है, लगता है अच्छा खासा कमाता भी है। उसने बताया कि उसने बी एस सी की है और अब एम बी ए करना चाहता है। पहले पत्राचार से एम बी ए करने की सोच रहा था किन्तु अब एम बी ए विवाह तक स्थगित कर दिया है। विवाह के बाद कॉलेज में दाखिला लेकर पढ़ेगा। मैं थोड़ी चकराई क्योंकि अब तक मैंने लोगों को पढ़ाई खत्म होने तक विवाह स्थगित करते देखा था। यहाँ गंगा उल्टी बह रही थी। उसने मेरा चकराना भाँपा और बोला कि वह नौकरी करने वाली लड़की से विवाह करेगा ताकि उसकी पढ़ाई तक वह घर का खर्च चला सके। घर का खर्च का अर्थ उसके घर खर्च, घर का किराया के अतिरिक्त माता पिता के घर के खर्च व घर का किराया भी है। वह माता पिता से अलग मुम्बई में रहता है। माता पिता दिल्ली में रहते हैं। मैंने कहा अच्छा ऐसी लड़की से विवाह करने वाले हो, मुम्बई की ही है क्या? वह बोला कि अभी तो लड़की खोज रहे हैं। मैंने पूछा कौन तुम खोज रहे हो तो बोला कि नहीं माता पिता। सो उन्हें बता दिया है कि नौकरी करने वाली ही ढूँढे।

मैंने कहा कि हाँ आपके समाज में तो लड़की वाले वर की पढ़ाई भी पूरी करवा देते हैं। वह थोड़ा दुखी हो बोला कि हाँ दहेज तो मिलता ही है किन्तु जितना डॉक्टर, इन्जीनियर व आ ए एस को मिलता है उतना अन्य योग्यता वालों को नहीं मिलता, वे चाहे जितना मर्जी कमा लें। मेरा मन हो रहा था कि कहूँ, बहुत नाइन्साफी है यह तो! खैर, उसने मेरी आँखों में अपने लिए सहानुभूति पढ़ ही ली। वह और खुल गया। बोला कि उनके समाज में दहेज में पैसा माँगते अवश्य हैं किन्तु बहुओं को सताते जरा भी नहीं। शेष भारत में जैसे बहुओं को मारने जलाने की घटनाएँ होती हैं वैसी उसने अपने समाज में नहीं देखीं। उनके समाज में स्त्री का बहुत आदर है। जो माँगना होता है वह विवाह से पहले खुलकर माँग लेते हैं, बाद में कोई लफड़ा नहीं करते।

मेरे पति बोले कि क्या आजकल भी युवा दहेज लेने व देने को मना नहीं करते। वह बोला नहीं, यह तो खुला विद्रोह हो जाएगा। और जब मिल रहा है तो अपनी हानि के लिए कोई क्यों विद्रोह करेगा। लड़की भी नहीं करेगी। क्योंकि दहेज के पैसे से ही ससुराल वाले उसके लिए गहने कपड़े खरीदते हैं। फिर दहेज भी तो ससुराल में ही आता है और उसे भी ससुराल में ही रहना होता है सो उस ही को आराम रहेगा।

बात मुम्बई व उसके सबर्ब्स की चली। अभी वह काफी दूर रह रहा है। सोचता है कि विवाह हो जाएगा तो बान्द्रा में आ जाएगा। बान्द्रा में तो किराया बहुत अधिक है ना? हाँ, अभी तो मुझे लगता है कि क्यों इतना खर्चा किया जाए। विवाह के बाद तो बान्द्रा में ही रहना है। बात हमारे शाकाहारी होने की भी चली। उसने बताया कि वे तो विशुद्ध माँसाहारी होते हैं। रोज भी मछली, माँस, मुर्गा मिले तो खुश रहते हैं।

मैं सोच रही थी कि वह विवाह लड़की से करेगा या जादुई चिराग से। रगड़ों तो बान्द्रा व दिल्ली के मकान का किराया आ जाएगा, दो घरों का खर्च निकल आएगा, उसकी एम बी ए की फीस निकल आएगी। दहेज में कई लाख रुपए भी आ जाएँगे, नौकरी भी कर लेगी, स्वादिष्ट खाना भी बना लेगी, मछली भी छील साफ कर तल पका लेगी। शायद जब कहा जाएगा तो दो पुत्रों या एक पुत्र व एक पुत्री को जन्म भी दे देगी।

मेरे विचारों कि तन्द्रा तब टूटी जब वह पति से हमारे बच्चों के बारे में पूछ रहा था। पति मजे से बेटियों व जवाँइयों के काम व नौकरी के बारे में बता रहे थे। पूछा, बस बेटियाँ ही हैं। पति बोले, हाँ, दो हैं। वह लम्बी साँस ले बोला, ओह!

घुघूती बासूती

नोटः इस पोस्ट को श्री अनुराग शर्मा ने बहुत सुन्दर तरीके से पॉडकास्ट भी किया है। उनकी आभारी हूँ।

घुघूती बासूती