मंगलवार, अक्‍तूबर 11, 2011

ओह!

कल एक युवक से मिलना हुआ। बातचीत हुई तो क्या करते हो पूछा। अच्छा खासा काम करता है, लगता है अच्छा खासा कमाता भी है। उसने बताया कि उसने बी एस सी की है और अब एम बी ए करना चाहता है। पहले पत्राचार से एम बी ए करने की सोच रहा था किन्तु अब एम बी ए विवाह तक स्थगित कर दिया है। विवाह के बाद कॉलेज में दाखिला लेकर पढ़ेगा। मैं थोड़ी चकराई क्योंकि अब तक मैंने लोगों को पढ़ाई खत्म होने तक विवाह स्थगित करते देखा था। यहाँ गंगा उल्टी बह रही थी। उसने मेरा चकराना भाँपा और बोला कि वह नौकरी करने वाली लड़की से विवाह करेगा ताकि उसकी पढ़ाई तक वह घर का खर्च चला सके। घर का खर्च का अर्थ उसके घर खर्च, घर का किराया के अतिरिक्त माता पिता के घर के खर्च व घर का किराया भी है। वह माता पिता से अलग मुम्बई में रहता है। माता पिता दिल्ली में रहते हैं। मैंने कहा अच्छा ऐसी लड़की से विवाह करने वाले हो, मुम्बई की ही है क्या? वह बोला कि अभी तो लड़की खोज रहे हैं। मैंने पूछा कौन तुम खोज रहे हो तो बोला कि नहीं माता पिता। सो उन्हें बता दिया है कि नौकरी करने वाली ही ढूँढे।

मैंने कहा कि हाँ आपके समाज में तो लड़की वाले वर की पढ़ाई भी पूरी करवा देते हैं। वह थोड़ा दुखी हो बोला कि हाँ दहेज तो मिलता ही है किन्तु जितना डॉक्टर, इन्जीनियर व आ ए एस को मिलता है उतना अन्य योग्यता वालों को नहीं मिलता, वे चाहे जितना मर्जी कमा लें। मेरा मन हो रहा था कि कहूँ, बहुत नाइन्साफी है यह तो! खैर, उसने मेरी आँखों में अपने लिए सहानुभूति पढ़ ही ली। वह और खुल गया। बोला कि उनके समाज में दहेज में पैसा माँगते अवश्य हैं किन्तु बहुओं को सताते जरा भी नहीं। शेष भारत में जैसे बहुओं को मारने जलाने की घटनाएँ होती हैं वैसी उसने अपने समाज में नहीं देखीं। उनके समाज में स्त्री का बहुत आदर है। जो माँगना होता है वह विवाह से पहले खुलकर माँग लेते हैं, बाद में कोई लफड़ा नहीं करते।

मेरे पति बोले कि क्या आजकल भी युवा दहेज लेने व देने को मना नहीं करते। वह बोला नहीं, यह तो खुला विद्रोह हो जाएगा। और जब मिल रहा है तो अपनी हानि के लिए कोई क्यों विद्रोह करेगा। लड़की भी नहीं करेगी। क्योंकि दहेज के पैसे से ही ससुराल वाले उसके लिए गहने कपड़े खरीदते हैं। फिर दहेज भी तो ससुराल में ही आता है और उसे भी ससुराल में ही रहना होता है सो उस ही को आराम रहेगा।

बात मुम्बई व उसके सबर्ब्स की चली। अभी वह काफी दूर रह रहा है। सोचता है कि विवाह हो जाएगा तो बान्द्रा में आ जाएगा। बान्द्रा में तो किराया बहुत अधिक है ना? हाँ, अभी तो मुझे लगता है कि क्यों इतना खर्चा किया जाए। विवाह के बाद तो बान्द्रा में ही रहना है। बात हमारे शाकाहारी होने की भी चली। उसने बताया कि वे तो विशुद्ध माँसाहारी होते हैं। रोज भी मछली, माँस, मुर्गा मिले तो खुश रहते हैं।

मैं सोच रही थी कि वह विवाह लड़की से करेगा या जादुई चिराग से। रगड़ों तो बान्द्रा व दिल्ली के मकान का किराया आ जाएगा, दो घरों का खर्च निकल आएगा, उसकी एम बी ए की फीस निकल आएगी। दहेज में कई लाख रुपए भी आ जाएँगे, नौकरी भी कर लेगी, स्वादिष्ट खाना भी बना लेगी, मछली भी छील साफ कर तल पका लेगी। शायद जब कहा जाएगा तो दो पुत्रों या एक पुत्र व एक पुत्री को जन्म भी दे देगी।

मेरे विचारों कि तन्द्रा तब टूटी जब वह पति से हमारे बच्चों के बारे में पूछ रहा था। पति मजे से बेटियों व जवाँइयों के काम व नौकरी के बारे में बता रहे थे। पूछा, बस बेटियाँ ही हैं। पति बोले, हाँ, दो हैं। वह लम्बी साँस ले बोला, ओह!

घुघूती बासूती

नोटः इस पोस्ट को श्री अनुराग शर्मा ने बहुत सुन्दर तरीके से पॉडकास्ट भी किया है। उनकी आभारी हूँ।

घुघूती बासूती

48 comments:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

बेचारा! आपने उसे ज़्यादा डराया तो नहीं?

आशीष श्रीवास्तव ने कहा…

हम भी लंबी सांस लेकर कह रहे है

"ओह!"

वाणी गीत ने कहा…

सच कहूं तो आसान जिंदगी के लालच में आजकल लड़कियां भी माता पिता से दहेज़ लेना चाहती है , एक दो दृश्य तो मेरी आँखों के सामने थे जहाँ बेटी ने दामाद पर जोर डाला कि वह पिता से फलाने चीज की मांग कर ले...दो बेटियों की ही मां हूँ , अफ़सोस जताने वाले कई मिल जाते हैं कि बेटी को जितना ज्यादा पढ़ाओगे , शादी में उतना ज्यादा ही खर्च होगा , फिर भी अपनी जिद तो बेटियों को आत्मनिर्भर करने की ही है ....
कैसे बदलेगा यह सब , सोचती हूँ कई बार!

Arvind Mishra ने कहा…

बड़े उच्च विचार हैं :) ओह नहीं वाह !!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सच है दुनियावालों कि हम हैं अनाड़ी..

डॉ टी एस दराल ने कहा…

लोगों की सोच व्यवसायिक होती जा रही है ।

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

सत्यम..न शिवम् न सुंदरम।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

ओह!
समय की नदी में
धार के साथ बहता
एक इंसान
एक लड़का
जो चाहता है
पत्नी कमाए
माता, पिता और उसे खिलाए
उस के लिए पंख साथ लाए
और वह
पंख लगा
आसमान में उड़ता जाए,
उड़ता जाए ... उड़ता जाए ...

Sonal Rastogi ने कहा…

ज़िन्दगी जीने के दो रास्ते है आसान और एक मुश्किल ... मुश्किल राते पर नीव से आखरी मंजिल तक सब आने आप जोड़ना होता है जो easy going लोगों को समझ नहीं आता . वैसे उसे लड़की नहीं वाकई जादुई चिराग चाहिए :-)

anshumala ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Mired Mirage ने कहा…

मन तो कर रहा था कि बालक की सुंदर सी फोटो भी लेकर यहाँ लगाती.उसके उच्च विचार जितने विस्तार में मैंने लिखे हैं उतने तो वह स्वयं भी शायद किसी विज्ञापन या नेट पर वैवाहिक साईट पर ना लिखे. विश्वास है कि उसके कथित समाज में बहुत सी लड़कियां व उनके माता पिता बस उस जैसे वर पाने को ही छटपटा रहे होंगे. आखिर वह एम बी ए करके उस लड़की व उसके बच्चों का भविष्य ही तो सुधारना चाहता है. ऐसा नेक बालक इतनी सरलता से तो नहीं खरीदा जा सकता.
घुघूतीबासूती

Mired Mirage ने कहा…

द्विवेदी जी, आपकी कविता बहुत अच्छी लगी.इसे अलग से भी अपने ब्लॉग पर डालिए.
घुघूतीबासूती

Amrita Tanmay ने कहा…

चाँद पर पहुँच कर भी जड मानसिकता नहीं बदलने वाली है.

वन्दना ने कहा…

यही है हकीकत …………आज भी मानसिकता नही बदली है चाहे कितना ही पढ लिख लें और यही सबसे बडी विडम्बना है ………………मेरे तो मन मे आ रहा है कि यदि वो मेरे सामने होता तो उसे कहती तू एक ट्कसाल क्यों नही खरीद लेता बेकार मे एक लडकी की ज़िन्दगी खराब करने से………………पता नही आज के यूवा को क्या हो गया है? कब समझ आयेगी?

गिरधारी खंकरियाल ने कहा…

ऍम बी ए से पहले ही उत्पादन और विपणन में दक्षता हाशिल कर ली.

anshumala ने कहा…

"एक और बेटा कर लो तो परिवार पूरा हो जायेगा" सुन सुन कर तंग आ चुकी हूँ और अब तो जवाब देने में नम्रता भी ख़त्म होती जा रही है बेटी होना संतान होना होता ही नहीं है और दूसरा करो भी तो बेटा यदि बेटी हो गई तो मै फिर भी अधूरी ही हूँ और ऐसे युवको से मै भी मिल चुकी हूँ विवाह के बाद कहते है " साला ससुरा बड़ा पैसा वाला है बस नाम का है मेरे तो किसी काम का नहीं है एक बार शादी में जो दिया तो दिया दुबारा देने में उसकी नानी मरती है " लीजिये यहाँ तो एक बार से भी लोगो का पेट नहीं भरता है सारी जिंदगी लेना चाहते है |

सागर नाहर ने कहा…

कुछ सालों पहले मेरे एक परिचित की हमारे गाँव में सगाई हुई, पर बाद में किसी कारणवश उसके पिता ने वह रिश्ता ठुकरा दिया। जब मेरी उस युवक से इस बारे में बात हुई तो उसने मुझे बातों बातों में कह दिया.. वहाँ से माल (दहेज) अच्छा मिलता।
यानि उसको सबसे ज्यादा दुख: था इस बात का नहीं कि सगाई टूट गई; इस बात का कि "माल" हाथ से चला गया।

सृजन शिल्पी ने कहा…

क्या जमाना है! पहले इतना वर के मां-बाप सोचते थे, अब लड़के खुद ही सोच कर रखे रहते हैं।

अभी पिछले हफ्ते की ही बात है। अपनी साली के लिए रिश्ता देखने गया लखनऊ। लड़के वालों ने बार-बार आने का आग्रह किया था। लड़का सात बेटियों के बाद एकलौता बेटा है। दो चचेरी बहनें भी हैं। सो लड़के के पिता ने कहा अब तक नौ लड़कियों की शादी की है। 25-25 लाख हर शादी में खर्च किया। सो उस दर से दहेज बनता है 25 गुना 9 + 25 गुना 1 यानी 2.50 करोड़ रुपये। यदि आप इतना दहेज देना तय कर दो तो फिर कुण्डली मिलान करते हैं !

सोचा न था कि जीवन में ऐसे लोगों से भी पाला पड़ेगा !

P.N. Subramanian ने कहा…

बहुत सुन्दर. ऐसी ही कोई बहू मिल जाए तो मेरे कम अक्ल बेटे का भी उद्धार हो जावे.

Mired Mirage ने कहा…

सुब्रमणियन जी,बेटे का ही क्या, पूरे खानदान का उद्धार इस ही क्या सात जन्म तक हो जाए ऐसी बहू मिलनी चाहिए. कामधेनु शायद कुछ ऐसी ही होती होगी!
घुघूतीबासूती

Mired Mirage ने कहा…

सृजन, यह ढाई करोड़ के लडके का बाप अपने इस खजाने का कुछ टैक्स भी भरता है क्या? लड़का घर पर ही रहता है या बैंक लॉकर में?
घुघूतीबासूती

रचना ने कहा…

The boy is extremely honest . I think we all should praise him .

Most of the bloggers who have commented must be married

Did any one refuse taking dowry when they got married { refuse means refuse every penny and share the expense }

So its a norm to take and to give dowry , why blame this poor soul alone

At least he is not double faced

and as regards only having daughters , its not in the hands of many else all those who have daughters would opt for having a son .

And OH was what i felt when i read this post

Mired Mirage ने कहा…

रचना, स्पष्टवादिता की तो आपसे सदा अपेक्षा रहती है। उसकी स्पष्टवादिता से भी मैं प्रभावित थी। मेरे विवाह में दहेज नहीं दिया गया। दूल्हा आइ आइ टी का पढ़ा दहेज लेने वाले समाज का था। दहेज का अर्थ पैसा ही नहीं, किन्तु फ्रिज, सामान, कार, स्कूटर आदि भी मान रही हूँ। भाई के विवाह में भी नहीं लिया गया। बेटियों के विवाह में भी नहीं दिया गया।
यह कह कर कि यदि हमारे हाथ में होता तो हम बेटे चाहते, हमें या कम से कम मुझे व मेरी बेटियों को अपमानित मत करिए। इस बात से मुझे घोर आपत्ति है। हो सकता है कि आप ऐसा सोचती होंगी या आपके व हमारे माता पिता ने हमें ऐसा महसूस करवाया होगा किन्तु मैंने अपनी बेटियों को कभी नहीं करवाया है।
लगता है कि यह बालक व आप काफी समान विचारों वाले हैं। काश, आप भी वहाँ होतीं , दोनों एक दूजे को समझ पाते व प्रशंसा कर पाते। बिना सपनों के यथार्थ के कठोर धरातल पर विवाह की बात वैसे ही करते हुए जैसे कोई कोयला खरीदकर बेचता है, मैंने किसी अन्य को नहीं देखा। किसान भी जब अपनी फसल बेचता है तो उसे उस फसल से कुछ लगाव होता है। कोई अपने कुत्ते बिल्ली के बच्चे के लिए भी जब कोई घर देखता है तो सुख सुविधा से अधिक उस परिवार के मानवों की मानवता देखता है। खैर, सौभाग्य से संसार में घुघूत भी होते हैं न केवल पत्नी के रूप में दुधारू भैंस, रोटी बनाने की मशीन, दासी, बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट की रसीद, बँधुआ मजदूर आदि आदि की चाहत रखने वाले लोग, या फिर दिनेश जी के शब्दों में ...
ओह!
समय की नदी में
धार के साथ बहता
एक इंसान
एक लड़का
जो चाहता है
पत्नी कमाए
माता, पिता और उसे खिलाए
उस के लिए पंख साथ लाए
और वह
पंख लगा
आसमान में उड़ता जाए,
उड़ता जाए ... उड़ता जाए ...
घुघूती बासूती

रचना ने कहा…

How many are there as lucky and as tough as you are ??

घनश्याम मौर्य ने कहा…

अभी तक तो लड़कियों के विवाह के लिए दहेज की ही समस्‍या थी, लेकिन अब तो यह भी अपेक्षा जुड़ गयी है कि लड़की नौकरीशुदा होनी चाहिए। कई मामलों में तो मैनें देखा है कि लड़की के अच्‍छी नौकरी पर होने के बावजूद लड़के वाले दहेज में मोटी रकम मांगते हैं। यानी समस्‍या घूम फिराकर वहीं की वहीं है।

मीनाक्षी ने कहा…

इस किस्से से पुराना किस्सा एक याद आया...जब छोटी बहन के लिए वर की तलाश होती थी...'हवाई चप्पल सटकाता हुआ केले का लगभग आखिर तक छिलका उतार कर खाता हुआ घर में दाख़िल हुआ जिससे हमने गली के किनारे पर उसी के घर का पता पूछा था..उन महाशय को लड़की चाहिए थी सरकारी 'पक्की' नौकरी वाली..खुद का काम चाहे कैसा भी था....
बेटी होती तो उसे भी अपने जैसे ही दहेज विरोधी ही बनाती..खैर....पति दहेज विरोधी हैं...इसलिए बेटे भी आत्मनिर्भर बनने की कोशिश में हैं..

shikha varshney ने कहा…

हम सोचा करते थे कि वक्त के साथ ये बातें कम हो रही हैं..परन्तु नहीं शायद बढ़ ही रही हैं.पहले घरवाले हि दहेज की मांग करते थे.अब लड़के लड़कियां भी कराती हैं.जय हो...व्यावहारिकता का जबाब नहीं.

दीपक बाबा ने कहा…

खूब सर मार लेती हैं.. :)

हर्षवर्धन ने कहा…

उस लड़के के बारे में तो मैं कुछ नहीं कह सकता। क्योंकि, उसके जैसा आशावादी ही ये सब सोच सकता है। लेकिन, जहां तक शादी में दहेज की बात है तो, यहां टिप्पणी करने वाले सचमुच कितने लोग मना कर पाते होंगे ये शोध का विषय है। हां, ये बात सही है कि पढ़ाई-लिखाई ने काफी हद तक इसे ठीक किया है। व्यवहारिकता की जहां तक बात है तो, करीब तीन साल पहले मुंबई में हमारे चैनल में आई एक लड़की ने एक दिन बात-बात में ही कहाकि मैंने तो, मम्मी-पापा से साफ कह दिया है कि जो, भी पैसा खर्च करना हो सीधे मुझे दे देना। घर खरीदना है और गाड़ी। सामान भी हम खुद ही खरीद लेंगे पैसे दे देना। ये है व्यवहारिकता। खुद लड़की भी ज्यादा आधुनिक समाज में पिता के घर से जितना ला सके लेके निकलना चाह रही है।

ali ने कहा…

@ घुघूती बासूती ,
मेरी खुद की शादी में दहेज का कोई रोल नहीं रहा ! मेरे पिता भी कभी इसके पक्ष में नहीं रहे !


वैसे वो ईमानदार लड़का कितने में बिकने वाला है :)

rashmi ravija ने कहा…

आजकल के नवयुवक भी दहेज़ के लिए बिलकुल मना नहीं करते...और तर्क ये होता है कि..."इस मामले में मैं क्या कहूँ..सब माता-पिता जानें."
ऐसे पता नहीं कितनी बार अपने माता-पिता की आज्ञा की अवहेलना की हो...जाने कितनी बार उनकी बात नहीं मानी हो...पर इस वक़्त बिलकुल श्रवण कुमार बन जाते हैं.
अब गोरी लड़की होनी चाहिए इसके साथ-साथ नौकरी की शर्त भी जुड़ गयी है....

सही कहा..

दहेज में कई लाख रुपए भी आ जाएँगे, नौकरी भी कर लेगी, स्वादिष्ट खाना भी बना लेगी, मछली भी छील साफ कर तल पका लेगी। शायद जब कहा जाएगा तो दो पुत्रों या एक पुत्र व एक पुत्री को जन्म भी दे देगी।

Vivek Rastogi ने कहा…

ऐसे ही कुछ और नौजवानों को मैंने भी सुनहले स्वप्नों में डूबे हुए देखा है। और इनमें से कुछ की किस्मत होती भी है कि उन्हें ऐसी लड़की मिल भी जाती है और जिंदगी गुजर भी जाती है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

रोहित बिष्ट ने कहा…

सरल शब्दों में सामाजिक विडम्बनाओं की व्याख्या।मैं तो नितांत बनावटी माहौल में 'लड़की देखने' के उपक्रम को भी बेहद अमानवीय मानता हूँ।क्या बीतती होगी उन लड़कियों पर जो समय-समय पर लड़के और उनके रिश्तेदारों की कई जोड़ी आँखों के समक्ष स्वयं के वजूद की परीक्षा देती हैं?उस पर कई कारणों के चलते 'रिजेक्शन' उनके आत्म-विश्वास के लिए कितना घातक होता होगा?त्रासदी यह है कि नाकाबिल लड़के विवाह हेतु 'चोइस' का अधिकार रखते हैं,जब कि काबिल लड़कियां कई बार अनुचित और इतर कारणों से'रिजेक्ट' कर दी जाती हैं।वाह री लेंगिक विषमताओं...........

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

कुछ साल पहले टी.वी. पर एक कार्यक्रम देखा था जिसमें दिल्ली यूनिवर्सिटी की अनेक लड़कियों से दहेज के बारे में राय पूछी गई थी, और मुझे भी हैरत हुई जब उनमें से अधिकतर ने दहेज के पक्ष में अपनी बात कही। कुछेक तो ऐसी थी जो दबंगई से दहेज को जायज ठहरा रही थीं।
वैसे अरसे से सुन रहे हैं कि विषम लिंगानुपात के चलते आने वाले समय में लड़की वाले दहेज लिया करेंगे।
बिना दहेज के विवाह हों तो बेहद अच्छा, म्युचूअल अंडरस्टैंडिंग और समजह्दार तरीके से उपहार रूप में दिया\लिया जाये वो ऐक्सैप्टेबल और
दहेज लोलुपता के लिये a big 'NO'
- अपनी राय तो यह है।

kase kahun?by kavita verma ने कहा…

ye ohh to bahut hi apekshit tha..agar ham padha likha kar bhi ladakon ki soch nahi badal pa rahe hai to aage kuchh kahna bekar hi hai..lekin jis tarah se linganupat badal raha hai paristhitiyan jald hi vipreet hongi.

JC ने कहा…

'भारत' सचमुच 'महान' है!
एक ऐसा देश जहां असत्य पर सत्य की विजय अंत में ही होती है!
असत्य मानस पटल पर छाया रहता है तथाकथित 'योगमाया' के कारण - भौतिक को सत्य मान और आध्यात्मिक को असत्य :)

जब पवित्र माता गंगा भी विषैली हो जाती है, और विचारों के ताल समान मानसरोवर भी संकेत देने लगता है कि गंगा-यमुना-ब्रह्मपुत्र तीनों नदियों का पानी शेष होने की स्थिति में आ गया है...
और संभवतः शीघ्र सागरजल मैं सब तैर/ डूब रहे होंगे एक दिन, क्यूंकि 'बिन पानी सब सून / पानी बिन न ऊबरे मानस, मोती, चून' - रहीम जी भी याद करते कब्र के भीतर अपने शब्दों को दोहराते!

तीनों साकार भगवान् भारत की तीन मुख्य नदियों समान ब्रह्मा-विष्णु-महेश भी परम ब्रह्मा, निराकार ब्रह्म की चमचागिरी सी करते, उनके मनोरंजन हेतु 'कृष्ण लीला' से उन्हें रिझाते, जब तक उनका एक दिन, हमारे साढ़े चार अरब वर्ष समाप्त नहीं हो जाते, और वो चैन से सो नहीं जाते :)

प्रतीक माहेश्वरी ने कहा…

ये हैं आज के नौजवान!
नाक तो पकडनी ही है... फिर चाहे सीधा पकड़ो या फिर घूमा के :)

Global Agrawal ने कहा…

अगर मैं आज तक दहेज़ के पक्ष में बोलते लोगों की बात करूँ तो उनमें से अधिकतर महिलायें ही हैं :):)
ऐसा एक लेख लिखने की बड़ी इच्छा है मेरी भी .. सच्ची घटनाओं पर आधारित :)
युवा पीढी में मैंने दहेज़ का पक्ष लेने वालों के अनुपात पर गौर नहीं किया , ये लेख पढने के बाद अब से गौर करूँगा :)

Global Agrawal ने कहा…

यहाँ मौजूद बातों में से वन्दना जी का जवाब पसंद आया

"मेरे सामने होता तो उसे कहती तू एक ट्कसाल क्यों नही खरीद लेता बेकार मे एक लडकी की ज़िन्दगी खराब करने से"

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

ओह!
यह मान लेना कि दहेज विरोधी बातें करने वाले खुद दहेज लिये होंगे, कितना दुखद है!!
इन्हीं ब्लॉगरों में ऐसे भी होंगे जिन्होने घर वालों को दहेज लेने या देने का अवसर ही नहीं दिया होगा।

अनूप शुक्ल ने कहा…

गरीब बालक क्या करे आखिर! उसे आगे पढ़ना भी तो है। :)

Global Agrawal ने कहा…

मेरी टिप्पणी ?

Sunil Deepak ने कहा…

दहेज के विषय पर जैसा संजय जी ने पहले लिखा है, लड़के इस तरह सोचते हैं यह बुरा लग सकता है पर उनके स्वार्थी होने का और आदर्शहीन होने का सोच कर समझा जा सकता है, पर जब लड़कियाँ भी इसी तरह सोचेंगी तो क्या समझा जाये?

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने कहा…

हमारे समाज ने दहेज को जिसप्रकार अंगीकृत कर लिया है उसमें कभी-कभी दहेज न मांगने वालों को अविश्वास की नजर से भी देखा जाता है।

मेरे साथ तो ऐसा ही हुआ। राजपत्रित अधिकारी के रूप में चयनित होने के बाद दूर-दूर से एक से बढ़कर एक थैलीशाह रिश्ते लेकर आने लगे। अपनी लड़की के बारे में बताने के बजाय वे अपनी पहुँच, आर्थिक मजबूती और दहेज की रकम की बात करने में ज्यादा रुचि दिखाते। मुझे उन सबको मना करने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। मैं ऐसा रिश्ता खोज रहा था जहाँ दहेज के बजाय लड़की का व्यक्तित्व मेरे मन लायक हो। इस प्रकार दहेज आधारित प्रस्तावों से बाहर निकलने में मुझे दो वर्ष लग गये।

मेरे गाँव से थोड़ी दूर ही रहने वाले मेरे ससुर जी दो साल बीत जाने के बाद तब प्रस्ताव लेकर आये जब उन्हें किसी ने यह बताया कि यहाँ दहेज आड़े नहीं आने वाला है। लड़की (मेरी पत्नी)का फोटो और शैक्षिक परिचय पसन्द आते ही हाँ कर दी गयी। उसके बाद ससुर जी बहुत दिनों तक उहापोह में रहे कि दहेज की बात तय किये बिना ही रिश्ता पक्का कैसे माना जाय। अंततः मुझे पहल करनी पड़ी और बताना पड़ा कि हमने अपनी कोई कीमत नहीं तय की है और न ही करने वले हैं। आप रिश्ता पक्का समझें और विवाह की तैयारी करें। हमारी कॊई शर्त नहीं है। हाँ, आप अपनी खुशी से जो खर्च करना चाहें वह हमें स्वीकार है।

यहाँ मेरा मत है कि लड़की यदि आपको पसंद है तो दहेज के लिए उसे मत छोड़िए। लेकिन यदि उसके माता-पिता स्वेच्छा से प्रसन्नता पूर्वक कन्याधन के रूप में कुछ व्यय करना चाहते हैं तो उसके लिए मना करने की आवश्यकता नहीं है।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

:)

मलकीत सिंह जीत ने कहा…

आदरनीय घुघूती बासूती- जी ,आपकी सभी रचनाये बेहद अच्छी व् किसी न किसी विषय को उठाती है सौभाग्य से पढने को मिल गयी ,आपने निवेदन है की एक मार्ग दर्शक के रूप में (एक प्रायस "बेटियां बचाने का ")ब्लॉग में जुड़ने का कष्ट करें
http://ekprayasbetiyanbachaneka.blogspot.com/

आशा जोगळेकर ने कहा…

आपके ब्लॉग पर काफी दिनों में () आई हूँ । पर यहां हमेशा सादारण सी दिखने वाली बोतों में कुछ विशेष नज़र आता है ।
जैसे इस पोस्ट में

मैं सोच रही थी कि वह विवाह लड़की से करेगा या जादुई चिराग से। रगड़ों तो बान्द्रा व दिल्ली के मकान का किराया आ जाएगा, दो घरों का खर्च निकल आएगा, उसकी एम बी ए की फीस निकल आएगी। दहेज में कई लाख रुपए भी आ जाएँगे, नौकरी भी कर लेगी, स्वादिष्ट खाना भी बना लेगी, मछली भी छील साफ कर तल पका लेगी। शायद जब कहा जाएगा तो दो पुत्रों या एक पुत्र व एक पुत्री को जन्म भी दे देगी।
हं............................।

दिवाली की अनेक शुभ कामनाएँ ।