Thursday, September 08, 2011

विनाश एक, प्रतिक्रियाएँ अनेक

दिल्ली में उच्च न्यायालय के बाहर हुए विस्फोट ने न जाने कितने विस्फोटों व मृत्युओं की याद ताजा कर दी। अभी सोमवार को ही हिन्दुस्तान टाइम्स में देखी सबसे बड़े आतंकी हमले से सम्बन्धित एक फोटो व उसके साथ के लेख की भी याद दिला दी।

जब मैंने उस लेख को पढ़ा था व फोटो को देखा था तब भी मेरे मन में यही विचार उठा था कि हम कितनी सरलता से सबको अपने अनुसार नाप तोल लेते हैं व उनके विषय में एक धारणा बना लेते हैं। हम यह सोचकर चलते हैं कि ऐसी स्थिति में मेरी क्या प्रतिक्रिया होती और सोचते हें कि सबकी वही प्रतिक्रिया होनी चाहिए और यदि अलग है तो गलत है।

आप भी यह फोटो देखिए। लिंक में पहली फोटो देखकर लगता है जैसे ये पाँच युवा अपने पीछे हो रहे मृत्यु व विनाश के ताण्डव से बेखबर बतिया रहे हैं। पहली नजर में हम चौंक जाते हैं और शायद आज के जमाने व निष्ठुरता को कोस लेते हैं। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। मैंने जानबूझकर लेख पढ़ा नहीं और सोचने लगी। याद करने लगी जीवन के वे सारे दुखद क्षण जब किसी न किसी प्रिय को खोया था।

क्या मैं रोई थी? नहीं। क्या किया था? मैं काम में लग गई थी। कभी खाना बनाने में तो कभी खाना खिलाने में, तो कभी पचासों प्लेट आदि को धोने में। सबका ध्यान रखने में। हर रोने वाले के आँसू पोछने में।

न जाने ये युवा कैसे अपनी नजरें पीछे से उठते धुँए से हटा पाए होंगे। क्या तब उन्हें विनाश के परिमाण का अनुमान रहा होगा? क्या उनका मन मस्तिष्क उस दृष्य को सह पा रहा होगा? क्या वे किसी हल्की बात, ओछे मजाक, या किसी किस्से के पीछे छिपने का यत्न तो नहीं कर रहे थे?

पता नहीं। उनमें से एक ने तो अपनी सफाई दी भी। उसने कहा कि वह व उसकी मित्र सदमे व अविश्वास की स्थिति में थे। उसे तो लगता है कि फोटोग्राफर थॉमस हॉपकर ने उनकी अनुमति के बिना यह फोटो लेकर गलत किया। उनकी उस समय की अनुभूतियों व व्यवहार को गलत तरीके से प्रस्तुत किया।

कहा जा सकता है कि फोटो झूठ नहीं बोलती। याद कीजिए जब किसी प्रिय की मृत्यु हुई थी तो क्या हम कभी किसी बात पर मुस्कराए नहीं थे? क्या हम कुछ पल को सबकुछ भूल जाना नहीं चाहते थे?

मुझे याद आ रही है हमारे एक मित्र की अचानक हुई, सच में खड़े खड़े हुई, मृत्यु की। लगभग चालीस साल के बेटे को खोने वाले उसके बाबू जी के पैर लड़खड़ा रहे थे। मुझे उनसे सहानुभूति हो रही थी। उसके बाबू जी को सहारा दे रही थी। किसी ने बताया कि बाबूजी के पैर तरल पदार्थ के सेवन के कारण लड़खड़ा रहे थे। हो सकता है। शायद उसके बाबूजी स्थिति से निपटने को यही सहारा ढूँढ पाए। कोई भगवान का सहारा लेता है, उन्होंने शायद बोतल का सहारा लिया। अपनी अपनी आवश्यकता, अपनी अपनी श्रद्धा है।

ऐसे ही मेरे एक जान पहचान के परिवार में जब युवा पुत्र की विदेश में मृत्यु हुई तो उसकी माँ सीढ़ी लगाकर अपने घर की दीवारें धोने में लग गईं। लोग अफसोस करने आ रहे थे और वे सफाई, धुलाई में व्यस्त थीं। उन्हें लोगों का आना अपने काम में खलल लग रहा था व वे मेरे बार बार उन्हें सीढ़ी से उतर लोगों से मिलने आने को कहने पर खीझ रही थीं।

पहले दिए लिंक में ही चौथा चित्र एक हाथ का है। सोचिए, उस हाथ के मालिक ने शायद कल परसों या उस सुबह ही मैनिक्योर करवाया हो! उसे क्या जरा भी अनुमान हुआ होगा कि उसका व उसके हाथ का बस इतना ही साथ है। जिसे देख, हम व्याकुल हो जाते हैं, मन विचलित हो जाता है, उसे ही देख उस दृष्य के रचयिता, 'श्री बॉम्बर' कहते होंगे, 'काम सही हो गया', 'ए जॉब वेल डन' कहकर अपने को शाबासी देते होंगे। उसके आका शायद उसकी पदोन्नति कर देते होंगे। यहाँ किसी की चिता की आँच उसके घर के चूल्हे की आँच थोड़ी और तेज कर देती होगी।

घुघूती बासूती

24 comments:

  1. mansik aaghaat ... kai baar pidhit ki sochne ki kshmtaa khatm kar deta hai ...wo aisaa vyavhaar karta hai jaise kuchh huaa hee naa ho... samaj ko vichitra lagtaa hoga ..

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  2. सही कह रही है आप्।

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  3. सभी के परिप्रेक्ष्य अलग अलग हैं -मैं ऐसी खबरे /स्थितिं में क्षण भर को स्तब्ध रह फिर निर्भाव हो जाता हूँ -अब जो होना था सो हो गया -उसे बदला नहीं जा सकता ....

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  4. अपने ऊपर बीती आपदाओ में जो आंसू हम रोक लेते है वो जब दूसरो पर आप दाए आती हैं तो बहते हैं क्युकी तब हमारे पास वक्त होता हैं चिंतन और मनन का . डॉ अमर के निधन पर मुझे अपनी माँ के मानस पुत्र याद आये जो ५५ वर्ष की उम्र में अपनी माँ , अपनी सास और मेरी माँ को छोड़ कर चले गये . उन तीनो माँ की तकलीफ और डॉ अमर की माँ की तकलीफ में मुझे साम्य लगा और मुझे लगा इस से बड़ा दुःख नहीं होगा

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  5. भावनात्मक रूप से जो जिससे जितना जुड़ा रहता है उसके खोने से उतना ही मर्माहत होता है। आतंकी घटनाओं या फिर हादसों के बाद हर सामान्य व्यक्ति सहम जाता है कि ये जो उसके साथ घटी वही हमारे साथ भी घट सकती थी। अखबार के पन्नों पर बिखरे शवों को देखकर सबसे पहले वह उनमें अपनों की तलाश करता है। संवेदना की दरों का निर्धारण भी उसी अनुरूप होता है। सत्य यही है। कोई बिरला ही होता है बुद्ध के करीब जो जन सामान्य के दुःख से द्रवित हो उठता है।
    शायद यही कारण है कि विनाश एक प्रतिक्रियाएँ अनेक होती हैं।

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  6. सही बात.अब हादसे लोंगो को केवल कुछ देर के लिए ही व्यथित करते हैं.

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  7. फोटो निष्ठुर सच उगल देती हैं।

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  8. हमारे चैनल्स विदेशी चैनल्स के प्रोग्राम के तो धढ़ाधड नक़ल करते हैं पर इतनी सी बात क्यूँ नहीं सीखते कि वहाँ जब इस तरह की त्रासदी होती है तो प्रिंट मिडिया और टेलिविज़न ब्रॉडकास्टर्स के बीच एक अग्रीमेंट हो जाता है कि वे लोग इस तरह की तस्वीरें नहीं दिखाएँगे....पर हमारे यहाँ लोग कहते तो हैं..."ये तस्वीरें आपको विचलित कर सकती हैं...इसलिए नहीं दिखा रहे" ..फिर भी काफी कुछ दिखा जाते हैं और खासकर उन रोते-बिलखते परिजनों की तस्वीरें बार-बार दिखायी जाती हैं.,..जिसे कहीं से भी सही नहीं कहा जा सकता.

    सबके दुख का सामना करने के अपने तरीके होते हैं....पर महसूस सब एक सा ही करते हैं...जब कुछ कर नहीं पाते तो निरुपाय से रोजमर्रा के कामो में उलझ भूलने की कोशिश करते हैं.

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  9. कई बार दुःख इतना सघन होता है कि समझ नहीं आता इसे किस प्रकार प्रकट किया जाये और सामान्य से हटकर प्रतिक्रियाएं व्यक्त करने लगता है!

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  10. सत्य वचन...अति दुखद!!

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  11. हमारे यहां तो इस तरह की खबरें लाइव दिखाई जाती हैं चटखारे ले लेकर। मुझे याद है एक बार मुम्‍बई रेलवे स्‍टेशन पर एक व्‍यक्‍ित विद्यु चालित रेलगाडी की छत पर चढ़ गया। ओवरहेड वायरिंग की चपेट में आकर उसका शरीर धू धूकर जलने लगा। यह द़श्‍य एक कुछ निजी टीवी चैनलों पर लाइव दिखाया गया। बजाय उस व्‍यक्ति को बचाने के, मीडिया की दिलचस्‍पी उसकी मौत का नजारा प्रसारित करने में भी।

    आपकी पोस्‍ट हृदय द्रवित करने वाली है। यह एक शोचनीय विषय है।

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  12. ये तो मनुष्य की संवेदनशीलता का मुद्दा है. कौन कितना संवेदनशील है और क्यों है? रही बात उस फोटो की, तो हो सकता है उन लोगों का ध्यान भी उस तरफ गया ही न हो.

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  13. very nicely written! a different perspective to look at things!

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  14. हादसों से उबरने के लिए कोई न कोई माध्यम ढूँढ ही लेता है मन. और सुना है अब तो सरकारें भी मानने लगी हैं कि हमें कोई फर्क नहीं पड़ने वाला.

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  15. क्या हम संवेदनाहीन होते जा रहे हैं यह मानते हुए की सब कुछ माया है.

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  16. http://hindi-kavitayein.blogspot.com/

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  17. प्रत्येक व्यक्ति स्वार्थी होता है... मेरा दामाद दिल्ली हाई कोर्ट में वकील है... जब मई में बम फटा था तो मैंने उसे तुरंत फ़ोन कर समाचार प्राप्त किया कि वो उस वक़्त चेंबर में था, बाहर नहीं...
    इस बार समाचार दूसरों से सुन फ़ोन नहीं किया, किन्तु छोटे भाई ने किया और उसने मुझे भी खबर दी कि वो उस स्थान के निकट ही था, विस्फोट होते हुए भी उसने देखा, किन्तु उसे कोई निजी हानि नहीं पहुंची... बेटी मुंबई में थी किसी मीटिंग के सिलसिले में, उस से भी एस एम् एस आगया कि वो सुरक्षित था और वो घर पह्नुच गया था... मेरी उस से बात नहीं हो पाई क्यूंकि उस का फोन बंद था...मैंने उस के बाद ही टीवी खोला और कई घंटे देखा...

    जिन्होंने गीता पढ़ी है, उसमें भही पढ़ा होगा कृष्ण को कहते कि यह शरीर तो आत्मा का वस्त्र है! और जैसे आप जीर्ण शीर्ण वस्त्र फेंक नए वस्त्र धारण कर लेते हैं , वैसे ही आत्मा भी नए नए वस्त्र धारण कर चलती जाती है! परन्तु काल वश अर्थात काल-चक्र वश आदमी को दुःख तो होता है, और फिर जीवन धीरे धीरे अपनी रफ्तार, वही बेढंगी चाल, पकड़ लेता है... शायद यही कृष्ण लीला है!

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  18. different perceptions,
    different reactions,
    different humans,
    same pains and sorrows :(

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  19. आदमी कितना भी अलग हो पर दर्द सभी को एक सा होता है ..परन्तु शायद निष्ठुर होते जा रहे हैं हम सब ...जो अब दुर्घटनाएं भी सामान्य लगने लगती हैं ....चिंतनपरक लेख .....

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  20. प्रतिक्रियाएं कभी एक सी नहीं होती, सब कुछ परिस्थिति पर निर्भर करता है।

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  21. कभी-कभी लगता है कि कोई आतंकवादी कैसे बन सकता है?
    पर फिर यही लगता है कि इतिहास गवाह है.. इंसान-इंसान का खून पिए बगैर अपनी प्यास नहीं बुझा पाया है..
    और इसी प्यास में एक दिन हम सब बुझ जाएंगे.. जल कर राख हो जाएँगे.. अकाट सत्य है...
    तब तक अपने आस-पास के वहशीपन को झेलते हुए या फिर उसके खिलाफ बोलते हुए जिंदा रहना होगा..

    आभार
    तेरे-मेरे बीच पर आपके विचारों का इंतज़ार है...

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  22. प्रतिक्रियाओं की गहनता भावनाओं की तीव्रता,तथा मन की संवेदनशीलता से जुडी है।इसलिए हर इन्सान का भावनात्मक स्वास्थ्य अलग होता है।परिपक्व विश्लेषण।

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  23. बहुत संवेदन शील लिखा है...

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