Tuesday, August 09, 2011

और नहीं बस और नहीं ( भाग २ )

यह भी हो सकता है कि एक या दोनों गलत रहे हों, एक बात में नहीं बहुत सी बातों में, शायद एक या दोनों कुछ दुष्ट भी हों। या वे केवल बेमेल हों। तब भी एक उम्र में यह लगेगा कि अब इस उम्र में मैं क्यों सहूँ। अब नहीं जीऊँगी /जीऊँगा तो कब जीऊँगी /जीऊँगा? यह अन्तिम अवसर है जीने का। मरने से पहले थोड़ा सा जी तो लूँ।

बस चल पड़ते हैं, दोनो या एक, तलाक की राह में। जीवन को कुछ आशा मिल जाती है जीने को, कुछ उद्देश्य मिल जाता है। मुक्ति मार्ग की खोज ही उद्देश्य बन जाता है। वकील के साथ बिताया समय दफ्तर में काम करते समय सा लगता है। कभी वकील के पास जाना होता होगा तो कभी कचहरी। फॉर्मल कपड़ों को भी हवा लगने लगती है, स्वयं को भी।

परन्तु समाज सोचता है कि इस बुढ़ापे में इन्हें क्या सूझी। जज सोचता है कि ये इस उम्र में अकेले कैसे रहेंगे। इनका साथ रहना ही इनके लिए बेहतर है। वह उन्हें समझाता या समझवाता है। फिर से सोच लो, हड़बड़ी मत करो कहता है। किन्तु अब क्या उनकी उम्र धैर्य की होती है? जब इतने साल से तलाक की लड़ाई लड़ रहे हैं तो अब अन्त में भी क्या यही चलता रहेगा? क्या जितने साल तलाक के लिए लड़ाई लड़ी उतने महीने भी मुक्त हो जीने को नहीं मिलेगा? मुक्ति नहीं मिलेगी क्या?

जब भी सत्तर अस्सी साल के दम्पत्ति को तलाक के युद्ध में लिप्त देखती हूँ / पढ़ती हूँ तो एक बहुत पुरानी सहेली के सास ससुर की याद आ जाती है। दोनों प्रौफेशनल थे। सास ने अपने गहने बेच पति को विदेश पढ़ने भेजा था व उसकी अनुपस्थिति में उसके माता पिता, भाई बहन का भी ध्यान रखा था। ससुर सास के कारण ही बड़े आदमी बन पाए। ससुर ही नहीं मेरी सहेली भी सास के कारण ही इतने बड़े कारोबार की मालकिन बन पाई।

सास ने गहने बेचकर अपने पति को ही नहीं पढ़वाया था, अपने कटु वचनों व केवल दसवीं पास होने का उपहास कर षोडषी बहू का जीना इतना हराम करा था कि बहू ने आगे पढ़ने का दृढ़ संकल्प कर लिया था। बच्चे के जन्म से निपटते ही सहेली ने रोज सुबह बच्ची अपनी माँ के घर जा माँ को थमाई व आगे पढ़ाई की व वही सब पढ़ा जो दस वर्ष बड़े पति ने पढ़ा था। शीघ्र ही वह पति के साथ काम कर रही थी व दोनों मिलकर आगे ही आगे बढ़ रहे थे।

जब सहेली के सास ससुर रिटायर हुए तो ससुर ने महसूस किया कि वह पत्नी के कटु वचन और नहीं सह सकता और सास ने महसूस किया कि वह कहना न मानने वाले उद्दंड पति के साथ बिल्कुल नहीं रह सकती। इतने वर्षों तक दिन रात व्यस्त इस दम्पत्ति को कभी अपने बीच में बढ़ती खाई को महसूस करने का भी समय नहीं मिला था। एक दूजे के स्वभाव को वे पसन्द नहीं करते इस बात को भी महसूस नहीं किया था। म्युचुअल कन्सेंट से तलाक का कानून तब आया ही आया था और दोनों ने इस सुविधा का लाभ उठाने का निर्णय लिया।

एक अन्य दम्पत्ति थे। पत्नी उम्र में मुझसे कुछ बड़ी। विवाह हमारे बाद हुआ था सो बच्चे छोटे थे। विवाह के समय से ही सास ससुर ही नहीं ददिया सास ससुर भी साथ ही रह रहे थे। जब भी मिलते लगता सबकुछ मजे में चल रहा है। बस यही लगता कि पत्नी पति की अपेक्षा काफी शान्त है। हम सब की हीही हाहा में वह अपेक्षाकृत चुप रहती। पति काफी हँसमुख था। देखने में किसी को कोई समस्या है ऐसा नहीं लगा। एक दूसरे की बड़ाई करने वाला सम्पन्न संयुक्त परिवार, जिसमें बाद के वर्षों में पति पत्नी बच्चे और लोगों के सामने एक दयालु व खुशमिजाज ससुर थे। सबके, रिश्तेदारों के मुँह से भी, पत्नी की केवल बड़ाई ही सुनी थी। लगता जैसे सबका प्रेम उसपर छलका पड़ता हो। जैसे वह आदर्श बहू हो और उसे पा पूरा परिवार धन्य हो गया हो। एक दिन जब सब लोग मुर्गा खा रहे थे और उसका उपवास था तो हम दो मुर्गा न खाने वाले बाहर घूमने चल पड़े। कुछ देर चुप रहने के बाद वह अचानक बोली कि उसे मुक्ति चाहिए। वह अब और उस परिवार में नहीं रह सकती। वह अलग होना चाहती है।

मैंने कहा कि अरे, तुम्हें तो सब कितना पसन्द करते हैं। वह बोली कि यह वह जानती है। प्रश्न यह नहीं कि वे उसे कितना पसन्द करते हैं, प्रश्न यह है कि वह उनके साथ रहते हुए अपने आप को कितना पसन्द करती है। जो वह बन गई है वह वह स्त्री नहीं है जो वह थी या रहना चाहती थी। उसके चेहरे पर चिपकी मुस्कान उसका जीना हराम किए हुए है। वह उसे उतार फेंककर चीखना चाहती है। वह अपने लिए अपनी तरह से जीना चाहती है। अपने समय पर सोना और जागना चाहती है। अपने मन का खाना व बनाना या न बनाना चाहती है। चाभी से चलने वाली खिलौना बनकर वह नहीं रह सकती। पचास की उम्र में भी कब क्या करे या न करे, कैसे करे, कितना करे, हर कुछ मिनट में नहीं सुनना, समझना चाहती थी। चीखकर कहना चाहती थी कि मुझे मालूम है कि क्या कैसे करना है।

वह बोली कि न वे बुरे हैं, न वह। बस सबका साथ रहना बुरा है। वह नए सिरे से जीवन जीना चाहती थी। इससे पहले कि वह बदलाव झेल न पाए और समझौते का जीवन जीने पर मजबूर हो जाए, स्वयं बूढ़ी हो जाए, वह अपनी तरह से जीना चाहती थी, जीवन रहते जीना चाहती थी।

कुछ दिन बाद जब सबको उनके अलग होने की खबर मिली तो सब दंग रह गए। सब उस आदर्श बहू के निर्णय से स्तब्ध थे। वह शान्ति से उनसे अलग हो गई। शान्ति से बैठकर जो उसके हिस्से का बनता था वह ले लिया। बच्चों के किसीसे मिलने से उसे कोई समस्या नहीं थी।

समस्या तब आती है जब वृद्ध दम्पत्ति इतने वर्ष साथ रहकर भी वे इतने बँटे हुए होते हैं कि अलग होने का निर्णय भी मिलकर सद्भाव के साथ नहीं ले पाते। अपने सामान, मकान, सम्पत्ति का बँटवारा इस प्रकार नहीं कर पाते कि दोनों का जीवन कुछ सरल हो जाए। प्रायः वे मकान को लेकर झगड़ते हैं। कुछ दिन पहले ही मैं जिस वृद्ध दम्पत्ति के बारे में पढ़ रही थी उसमें पति को दिन में तीन या चार बार एक एक घंटे को रसोई का उपयोग मिलता था। शेष समय वह अपने कमरे व बाथरूम तक ही सीमित रहने को बाध्य था। एक उम्र के बाद तो पूरे जीवन खाना पकाने की आदी वृद्धा को भी एक घंटा कम पड़ेगा तो वृद्ध कैसे व कितना खाना पका पाता होगा?

क्या बेहतर न होता कि वकीलों पर पैसा खर्च करने की बजाए वे म्युचुअल कन्सेंट से तलाक लेते व बड़ा मकान बेच दो छोटे मकान खरीद लेते। या फिर घर में ही थोड़ी तोड़ फोड़ करवाकर एक नई रसोई आदि न बनवा लेते। किन्तु यदि वे मिल बैठकर ऐसे समझदारी के निर्णय ही ले रहे होते तो बहुत सम्भव है कि वे या तो बहुत पहले ही अलग हो गए होते या फिर शायद ऐसी स्थिति आने ही न देते। अपनी समस्याओं को यूँ धीमी आँच पर सालों पकने न देते। बीच बीच में अपनी नाराजगी बताकर प्रैशर कुकर के अन्दर जमा भाप निकाल देते तो प्रैशर कुकर के फटने की नौबत न आती।

या शायद समझदारी दिखाते हुए एक दूसरे से मित्र की तरह कभी कभार मिल भी लेते। शायद साथ जिए पुराने जीवन के नाम पर एक दूजे की समय पड़ने पर सहायता भी कर देते।

एक अन्य मित्र थे। बहुत कम उम्र में, इक्कीस बाईस में विवाह हुआ। एक पुत्र भी हुआ। किन्तु पत्नी को पति या पति के साथ रहने में कोई रुचि नहीं थी। एक वर्ष भी साथ न रहकर लगभग पच्चीस वर्ष अलग रहकर भी पत्नी तलाक के लिए तैयार नहीं थी। उसे पति से कोई शिकायत नहीं थी। पति को भी नहीं थी सिवाय इसके कि उसे अपना पत्नी के पास गिरवी पड़ा जीवन वापिस चाहिए था। अन्त में न जाने कैसे वह तलाक के लिए मानी और न जाने कैसे चर्च उनके तलाक के लिए माना। लगभग पचास की उम्र में जब उसने दोबारा विवाह किया और बाद में एक प्यारी बच्ची का पिता बना तो उसकी खुशी देखते ही बनती थी। लगता था जैसे उसका पुनर्जन्म हुआ हो। तब हम युवा थे और हमारी और उनकी बेटियाँ लगभग साथ ही जन्मी थीं। मित्र की मुक्ति व नए बन्धन में खुशी देख मैं उस कम उम्र से ही विश्वास करने लगी कि विवाह कारावास का नाम नहीं है अपितु दो लोगों के मुक्त भाव से साथ का नाम है।

घुघूती बासूती

26 comments:

  1. इस तरह की घटनायें अक्सर देखने में आ रही हैं कि लोग बड़ी उम्र में तलाक लेने लगे हैं। वजह भी अमूमन वही होते हैं जिन्हें आपने बताया है।

    अभी कुछ साल पहले एक दम्पत्ति को सत्तर की उमर में तलाक फाईल करते देखा। वजह यह थी कि वृद्धा पत्नी अपनी बिटिया के विवाह हो जाने के बावजूद उसकी ससुराल में कुछ न कुछ भेजती रहती थी । कभी घी, कभी अनाज तो कभी कुछ रकम। इससे वृद्ध पति को चिढ़ होती थी कि यहां भी तो उसके भाई हैं उनके लिये भी तो कुछ रहने दे कि सब उठाकर बिटिया को ही दे दोगी। मेरे बेटों का भी हक बनता है कि वह भी घी का आनंद लें, अनाज की पैदावार का सुख भोगें लेकिन ये बुढ़िया सब उठाकर अपनी बेटी को ही दिये जा रही है।

    अदालत में उन दोनो सत्तर की उमर् वाले वद्ध दम्पत्ति को समझाया भी गया कि इतनी सी बात पर तलाक न लें लेकिन दोनो कायम थे कि नहीं अब नहीं रहना साथ।

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  2. यह दूसरा भाग काफी दिनों बाद आया -हम तो मायूस हो चले थे ..श्याद भूल भी गए थे,,
    पोस्ट प्रेरणास्पद और मार्गदर्शक है बहुत से से दम्पतियों के लिए!मगर उनके लिए जो लिविंग इन में रह रहे हैं सब कुछ कितना आसान है न ?

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  3. मैं तो इतना ही समझा कि जो भी करें, समझदारी से करें।

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  4. ये तो समझदारी का अभाव है...

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  5. पसन्द न करने से अधिक पसन्द करने के बहाने खोजें।

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  6. पूर्ण स्‍वतंत्रता तो व्‍यक्ति को कभी नहीं मिल पाती। किसी ने किसी बंधन में तो इंसान को रहना ही पड़ता है। आखिर कहाँ-कहाँ से भागेंगे? तलाक की नौबत तभी आनी चाहिए जब बात सहनशक्ति के बाहर हो जाए और बाहर की दुनिया अधिक सुरक्षित हो।

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  7. ऐसे वाकये सच में होते देखे हैं..... कभी कभी निभाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो जाता है.....

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  8. बिल्कुल सहमत हूं की कई बार वाकई साथ रहना मुश्किल हो जाता है उस समय व्यक्ति ये नहीं देखता है की बाकि उम्र कितनी बची है जीने के लिए | तो कई बार ये भी होता है की लोग बच्चो के कारण मज़बूरी में एक दूसरे के साथ रह रहे होते है और बच्चो की शादी होते ही उनकी अपनी दुनिया बसते ही चाहते है की अब कोई मजबूरी नहीं रही तो अब एक दूसरे को क्यों सहा जाये | तलाक कभी भी हो वो यदि आपसी समझ से हो जाये तो ज्यादा अच्छा है किन्तु दोनों के बीच इतना अच्छा तालमेल ही होता तो तलाक की नौबत आती ही क्यों इसलिए तलाक के समय भी एक दूसरे से कोई सहमती ना बनना भी आम बात ही है |

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  9. Very nice topic. We have been seeing or hearing about it so often now a days. Specially liked the one of Adarsh Bahu ! so right sometimes one feels so trapped despite everything being perfect in its place.

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  10. संगठन में शक्ति होती है विघटन दुष्परिणाम कारी होता है

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  11. वृद्धावस्था में तलाक़ - बड़ा अटपटा लगता है। सारी उम्र निभा लिए ... कुछ दिन और .. साथ नहीं रह पाए!

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  12. चलिये आलेख सही पूरा हुआ
    एक दंपत्ति को मै भी जानती हूँ , दोनों ने साथ साथ हिंदी मै ऍम ऐ किया था . लड़की विभागाध्यक्ष की बेटी थी . लडके से एक साल बड़ी . प्रेम विवाह हुआ था . लड़की का परिवार ने विवाह का विरोध ही किया था . बाद में सब ठीक हुआ . समय बीता , लड़की के पिता के हिंदी से सम्बंधित कार्यो में रसूख था , दामाद ने धीरे धीरे उनके रसूख से दिल्ली के एक अच्छे कॉलेज में नौकरी पायी , जगह जगह हिंदी सम्मेलन में जाने लगे , किताबे छपवाने लगे , लड़की भी कॉलेज में प्राध्यापिका लगी थी पर उसको केवल घर इत्यादि संभलने में , अपनी ३ बेटियों को बड़ा करने में समय लगाना पडा , वो लड़की जो ऍम ऐ में अपने सहपाठी से ना केवल सीनियर थी , अपितु ज्यादा बेहतर नंबर ले कर पास हुई थी ज्यादा अच्छी लेखिका थी उसका सब अपना ख़तम होगया और पति की उन्नत्ति में सुख दिखने लगा पर बहुत दिन नहीं . कुछ वर्षो के अन्दर ही उसने खुद कहना शुरू कर दिया की उसका विवाह गलती थी क्युकी उसको लगने लगा की उसके पति ने केवल उसका जरिये अपना करियर बनाया और धीरे धीरे समय उसके हाथ से फिसल गया . आज उसका साहित्यकार बनने का सपना अधुरा हैं और वो अपनी तीसरी बेटी के विवाह के इंतज़ार में हैं फिर तलाक लेगी . जाने कितनी जिंदगियां सामाजिक भय से नष्ट हो जाती हैं .

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  13. विवाह कारावास का नाम नहीं है अपितु दो लोगों के मुक्त भाव से साथ का नाम है

    काश ये बात सब समझ पाते तो सभी का जीवन सरस हो पाता……………एक विचारणीय आलेख्।

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  14. आजकल बढती उम्र में तलाक बढ़ते जा रहे हैं...अक्सर पति और पत्नी दोनों ही.. ,बच्चों के लिए...उनका कैरियर उनके विवाह के लिए आपस में ताल-मेल ना होते हुए भी समझौता कर एक दूसरे को झेलते रहते हैं...लेकिन जब एक बार सारी जिम्मेवारियाँ निबट जाती हैं तो अब वे समझौते को तैयार नहीं होते.

    शायद भविष्य के जीवन की समुचित रूप-रेखा भी उनके सामने ना हो..पर वे इस स्थिति से हर कीमत पर छुटकारा चाहते हैं...

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  15. सच है विवाह कारावास नहीं लगना चाहिए...
    दिल के साथ दिमाग से भी काम लेना चाहिए...

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  16. ऐसी घटनाएँ चिंता पैदा करती है-खास तौर पर इस समाज में.

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  17. हम तो हिल से गये हैं, बहुत सारी चीजें बिखर जाती हैं, पर उन्हें कभी सँभालने की कोशिश नहीं करते हैं, सब चीज समय पर हों तो बेहतर हैं।

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  18. आज इंतज़ार खत्म हुआ...यकीनन विवाह कारावास का नाम नहीं है..जहाँ ऐसा अनुभव होने लगे वहाँ मुक्त हो जाना और कर देना सही फैंसला है...दूर के रिश्तेदार के सास ससुर सालों से अलग हो चुके थे लेकिन रहते एक ही घर में थे बच्चों के कारण..सब बच्चों की शादी के बाद उनके बारे मे पता चला था...

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  19. अगर हम इस परिस्थितियों की तुलना पहले से करे तो पहले संयुक्त परिवार की वजह से दोनों अलग अलग जगह व्यस्त हो जाते थे जैसे महिला घर में तो पुरुष बाहर अपने हमउम्र लोगो में. परिणाम-- अगर दोनों में कटुता भी है तो ज्यादा किसी को पता नहीं चलता था. परन्तु अब परिस्थितिया अलग होने के कारण तलाक की नौबत आ जाती है.

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  20. घुघूती बासूती जी, मेरे भांजे की बहू मेरी स्व. पत्नी के समान मध्य प्रदेश से ही है और, इस कारण कह लीजिये, मेरे मित्र समान ही व्यवहार करती है,,, जबकि मेरा भांजा, उम्र का लिहाज करके कहलो, कम ही बोलता है मुझसे...साथ साथ हम रहे भी नहीं हैं, हम दिल्ली, आसाम आदि और वो मद्रास, मुंबई आदि...

    मुझे उसने कई वर्ष पहले कहा 'मामाजी, मेरे साथ की छह लड़कियों की शादी हुई और सभी का तालक हो गया है!
    और ऐसे ही मुझे निजी जानकारी है कि मेरी छोटी बेटी के साथ पढने वाले कई जोड़ों ने विवाह तो किया, किन्तु कुछ ही वर्षों पश्चात उन्होंने, दोनों काम-काजी पति-पत्नी ने, फिर से अन्य से विवाह कर लिया है, और दाम्पत्य जीवन व्यतीत कर रहे हैं, एक एक बच्चा भी हो गया हैं उन नए जोड़ों के...

    'हमारे समय' में कोई सोच भी नहीं सकता था कि भारतीय समाज की ऐसी स्थिति हो जायेगी कुछ दशकों के भीतर ही - संयुक्त परिवार तो शहरों में तो लगभग टूट ही चुके हैं...इस कारण ऐसा प्रतीत होता है की काल के साथ परिवार का टूटना - भले ही 'सही' लगे अथवा 'गलत' - भी 'प्राकृतिक' ही है! कहावत है, "बूँद बूँद से घट भरे / रीता खाली होए"!...

    क्या यह संभव है कि, जैसी हिन्दू मान्यता है, साकार प्रकृति की सृष्टि निराकार नादबिन्दू (विष्णु/ अर्धनारीश्वर शिव) से आरम्भ कर अनंत साकार रूप की उत्पत्ति हुई (सती की मृत्योपरांत, उनका कालांतर में, एक अन्य स्वरुप पार्वती से शिव का विवाह... फिर कार्तिकेय का जन्म, और उसके पश्चात गणेश का और उनकी शादी ऋद्धि-सिद्धि से... यूं अनंत तक विस्तार,,, किन्तु काल-चक्र सतयुग से कलियुग की ओर चलता है, अर्थात सृष्टि के आरंभिक काल तक जब 'सागर-मंथन' से विष उत्पन्न हुआ था (जैसे आज खाद्य पदार्थ, जल, वायु, और मानवी मस्तिष्क भी अधिकतर विषैले दिख रहे हैं)... इसलिए कहीं हम फिर से नादबिन्दू में लगभग समाने तो नहीं जा रहे हैं (अथवा उसके पहले ही फ्रीज़ हो जायें, अहल्या समान)???

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  21. सुन्दर प्रस्तुति. समस्याओं को धीमी आँच पर सालों पकने देना ही तो समस्या है.

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  22. आप भी चले आयें ब्लॉगर मीट में नई पुरानी हलचल

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  23. यूँ तो हर दंपत्ति के बीच कुछ न कुछ समस्या चलती रहती है ..यदि सब ही मुक्ति की आकांक्षा करने लगें तो समाज तो रसातल में चला जायेगा .. और वैसे भी स्वच्छंद रह कर भी जीना सरल नहीं है ... बंधन में ही सामंजस्य बैठना चाहिए ..हाँ बात तब है जब सारे रास्ते बंद होते दिखें तब शालीनता से ही सोच समझ कर निर्णय लें ..

    मैंने यह अनुभव किया है कि स्त्रियां स्वयं ही औरों के अनुसार ज्यादा ढलने का प्रयास करती हैं .. और मन ही मन कुढती रहती हैं कि मेरा तो कोई वजूद ही नहीं है .. यदि प्रारम्भ से ही वो अपनी बात को बेबाकी से सबके सामने रखें और अपने मन कि बात कहें तो उनकी भावनाओं पर भी घर वाले ज़रूर ध्यान देंगे ..और फिर घर गृहस्थी कारागार नहीं लगेगी ... झुकना तो दोनों पक्षों को ही होता है ..

    पर आपकी बात से सहमत हूँ कि जब पानी सिर के ऊपर से गुज़रने लगे तो रिश्तों के बोझ को ढोते न रहा कर समझदारी से अलग रहा जा सकता है ..

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  24. धीरे-धीरे आंच में पकने नहीं देना चाहिए.. यह पंक्तियाँ इस पूरी पोस्ट का निचोड़ है..
    बेहद गहराई से लिखा है इस रिश्ते के बारे में..

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  25. कही पढा था कि "लोग बुरे नहीं होते,धारणाएं बुरी होती हैं"पर पकी उम्र में तलाक,क्या कहेंगे,
    "लोग अच्छे नहीं होते,धारणाएं अच्छी होती हैं"?

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  26. आज का आकर्षण बना है आपका ब्लोग है ज़ख्म पर और गर्भनाल पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
    अवगत कराइयेगा । http://redrose-vandana.blogspot.com

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