Wednesday, November 25, 2009

और वह फिर जी उठा

हम कभी भी यह मानकर नहीं चल सकते कि हम अन्तिम सच जानते हैं। यहाँ तक कि विज्ञान भी यह दावा नहीं कर सकता। जिसे हम आज सच मानते हैं वह कल झूठ साबित हो सकता है। फिर पूर्वाग्रहों की तो बिसात ही क्या!

कल के टाइम्स औफ इन्डिया में जो समाचार पढ़ा उससे मेरा सदा यह कहना कि हम कोई भी बात शत प्रतिशत दावे के साथ कम ही कह सकते हैं, काफी हद तक सही सिद्ध हुआ।

समाचार दिल दहला देने वाला है। २३ वर्ष पहले एक बेल्जियम निवासी कार दुर्घटना का शिकार हुआ। उसे २३ वर्ष तक कोमाग्रस्त माना जाता रहा। डॉक्टर लगातार अन्तर्राष्ट्रीय मान्य मापदण्डों से २० वर्ष तक उसका परीक्षण करते रहे और उसे कोमा की वेजीटेटिव स्थिति में ही समझते रहे। उसकी आँखों की, मौखिक या मोटर प्रतिक्रियाओं की अनुपस्थिति के कारण उसे चेतनाशून्य समझते रहे। परन्तु जब ३ वर्ष पहले नए उपकरणों से उसका परीक्षण किया तो पाया कि उसका मस्तिष्क लगभग सामान्य काम कर रहा था। मरीज का केवल शरीर ही पूर्ण रूपेण लकवाग्रस्त था। उसके आसपास क्या हो रहा है इसकी चेतना उसे थी। वह सबकुछ सुन भी सकता था।

वह अब कम्प्यूटर की सहायता से संदेश लिख सकता है। वह एक विशेष उपकरण की सहायता से पुस्तकें पढ़ सकता है। उसने कहा कि इतने वर्ष तक वह अपने को स्वप्न ही दिखाकर समय बिताता रहा। वह चिल्लाता था किन्तु कोई आवाज नहीं होती थी। जिस दिन चिकित्सकों को उसकी स्थिति का पता चला उस दिन उसका पुनर्जन्म हुआ। अब जब सब जानते हैं कि वह मृत नहीं है तो वह चाहता है कि वह पढ़े, बात करे और जीवन का आनन्द ले। वह कहता है कि जिस स्थिति को उसने जिया उसके लिए कुण्ठा शब्द बहुत ही छोटा है।

अब उसके चिकित्सक सोच रहे हैं कि हो सकता है कि उसके जैसे ही अन्य रोगी भी हों जिन्हें चेतनाशून्य माना जा रहा हो।
उस व्यक्ति की स्थिति की कल्पना ही कितनी भयावह है। उसके सामने ही सब उसकी स्थिति का विष्लेषण करते होंगे। हो सकता हो कि कोई यह भी कहता हो कि कुछ भी नहीं किया जा सकता, कि उसे यन्त्रों से जीवित रखना गलत है। अभी दो एक वर्ष पहले ही एक वेजीटेटिव स्थिति वाली स्त्री का आहार बन्द कर उसे मुक्ति दी गई थी। तब यह नीति शास्त्र का मुद्दा बना था। स्त्री के माता पिता ने विरोध किया था और पति ने उसकी स्थिति देखते हुए आहार बन्द करने की न्यायिक अनुमति प्राप्त कर ली थी।

कोई भी परिवार उतनी लम्बी अवधि तक ऐसे रोगी की सेवा करने में अक्षम ही होगा। यह दायित्व समाज व सरकार ही उठा सकते हैं।

और एक अन्य बात जो इससे सिद्ध हो जाती है वह यह कि संसार में सबकुछ संभव है सिवाय हमारे ज्ञान के कभी भी परिपूर्ण होने के।

घुघूती बासूती

Tuesday, November 24, 2009

श्लील और अश्लील

श्लील और अश्लील
श्लील और अश्लील का रोना रोते ये लोग
जिनके देश में तन ढकने को बहुतों के पास कपड़ा नहीं है
जहाँ बहुतों का पेट कहाँ खत्म होता है और पीठ कहाँ शुरू
यह देखने के लिए कोई विशेष पासबीन (?)सा यन्त्र चाहिए,
जहाँ आज भी नंगी की जातीं हैं गर्भवती युवतियाँ
जहाँ कहीं भी, कभी भी, किसी बुढ़िया को डायन कहकर
नग्न कर दिया जाता है,मुँह काला कर दिया जाता है
या फिर मारमार कर कचूमर कर दिया जाता है,
जहाँ जीवित जला दी जाती हैं, बहुत सी ढकी
और अनढकी भी बहू, बेटी और पत्नियाँ।
जहाँ के पुरुष आज भी खोज रहे हैं,
सिर पर आँचल, पाँव में पायल
वे श्लील व अश्लील का भेद खूब समझते हैं
शायद अपनी कल्पनाओं, भ्रम, तृष्णा,
अपनी असलियत को, वे ही बेहतर जानते हैं
इसीलिए हर जगह,हर वस्त्र में
अश्लील खोज ही लेते हैं।
घुघूती बासूती

Wednesday, November 18, 2009

आओ खेलें खेल

चलिए खेल खेलते हैं। नेट है और खेल हैं। और खेल भी कैसे? चलिए पहले किसी नारी को विभिन्न वस्त्र पहनाते हैं। अरे, इसमें किसी को क्या आपत्ति? वस्त्र पहनाएँगे तो निर्वस्त्र तो करना ही होगा! पहले वस्त्र पहनाएँ, निर्वस्त्र करें, फिर वस्त्र पहनाएँ, अपनी इच्छा के पहनाएँ फिर चलिए आगे चलें।

आगे खेल यह है कि हमें किसी स्त्री का बलात्कार करना है। चलिए यही खेल खेल लेते हैं। सच के जीवन में तो यह करना थोड़ा कठिन है फिर इस आभासी जगत में क्यों ना हाथ आजमाया जाए? चलिए उसका तो बलात्कार कर लिया अब उसकी बेटियों का भी क्यों न किया जाए?

भाई लोगो, अब आपके मनोरंजन के लिए और हाँ, लगे हाथ अभ्यास के लिए भी ऐसे खेल उपलब्ध हैं। सोच क्या रहे हैं, यह अभ्यास ही तो जीवन में काम आएगा। और हाँ, बेटियों को जन्म गलती से भी न दीजिएगा, क्योंकि यही खेल अन्य पुरुष भी खेल रहे हैं, तैयारी कर रहे हैं आपकी बेटी के बलात्कार के लिए।

हाल ही में खबर पढ़ी थी कि नेट पर ऐसे खेल उपलब्ध हैं। एक माँ अपने १५ वर्षीय बेटे में अजीब सा बदलाव देख रही थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि उसे क्या हो रहा है। बदलाव तो वह देख रही थी किन्तु क्या व क्यों पर उँगली नहीं रख पा रही थी। फिर एक दिन उसने उसे नेट पर यह खेल खेलते देखा। पूछने पर उसने बताया कि एक दिन वह नेट पर घूम रहा था जब एक पॉप अप आया कि उसे एक स्त्री को वस्त्र पहनाने हैं। वह आकर्षित हुआ और खेल खेलने लगा और एक के बाद एक सीढ़ी चढ़ते हुए खेल में आगे बढ़ने लगा। स्वाभाविक है कि उसमें बदलाव आए। माँ उसे मनोष्चिकित्सक के पास ले गई।

आज के युग में जब हमारा बच्चा अपने घर में भी सुरक्षित नहीं है अभिभावकों के लिए कम्प्यूटर में अधिक से अधिक सुरक्षा का उपाय करना आवश्यक हो गया है। अब हम उसकी मासूमियत के कारण उसे सुरक्षित नहीं मानकर चल सकते। बाहर का खतरा और खतरनाक लोग अब नेट के जरिए हमारे घरों में प्रवेश कर चुके हैं।

घुघूती बासूती

Tuesday, November 17, 2009

आपातकालीन गर्भनिरोधक क्या कोई आपदा तो नहीं लाएगा?

गर्भनिरोधक की हर खोज ने स्त्री को कुछ और मुक्ति दी है, कुछ और विकल्प दिए हैं। जीवन जीने की शैली का चुनाव, बच्चे हों या न हों, हों तो कितने व कब, यह सब चुनाव तभी संभव हुआ जबसे गर्भनिरोधक का विकल्प उसे मिला। उससे पहले उसके पास यदि विकल्प नाम की कोई वस्तु थी तो केवल विवाह करना या न करना ही था। वह विकल्प भी विरली स्त्रियों को ही उपलब्ध था। यदि हम नारी मुक्ति का छोटा सा इतिहास देखें तो उनकी मुक्ति का लगभग सबसे बड़ा श्रेय अपनी प्रजनन शक्ति पर खुद के नियंत्रण को ही जाएगा। जो स्त्रियाँ आज भी मातृत्व के बारे में स्वयं निर्णय नहीं ले पातीं वे आज भी मुक्त नहीं हैं।

पुरुष को भी इससे काफी लाभ हुए हैं। आज के कठिन जीवन में छोटा परिवार उसे भी काफी सीमा तक राहत दे रहा है, साथ ही साथ निश्चिन्त वैवाहिक जीवन जीने का अवसर भी।

विवाह करने की उम्र बढ़ती ही जा रही है। स्वाभाविक है कि प्रत्येक व्यक्ति ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए इतनी प्रतीक्षा नहीं करता। ये सब उपाय उनके लिए भी मुक्ति का साधन हुए हैं। कन्डोम ने यौन रोगों के भय से भी काफी सीमा तक मुक्ति दी है। इसके सिवाय हर उपाय का कुछ न कुछ मूल्य स्त्री के शरीर ने ही चुकाया है। किन्तु फिर भी यदि हानि लाभ को तोला जाए तो लाभ ही अधिक हुए हैं।

अब यह नई एमर्जेन्सी गोली आ गई है। इसके विज्ञापन में ही कहा जाता है कि यह गर्भपात से बेहतर है। जोकि गलत नहीं हो सकता। किन्तु क्या साथ में यह नहीं बताया जाना चाहिए कि यह केवल और केवल आपातकाल के लिए है इसका गर्भनिरोधक की तरह उपयोग नहीं होनी चाहिए? कोई जीवन में दो चार बार ले तो समझा जा सकता है किन्तु यदि इसे बार बार लिया जाए तो यह अपने शरीर के हॉर्मोन्स के साथ खिलवाड़ है। कहीं नहीं बताया जाता कि कौन इसे न ले। यदि इसके विषय में पढ़ें तो पता चलेगा कि levonorgestrel से जिसे एलर्जी हो वे नहीं ले सकते, या फिर जो दमे, रक्तचाप, मधुमेह या टी बी आदि की दवा ले रहे हों उन्हें डॉक्टर से सलाह लेकर ही यह गोली खानी चाहिए।

सिरदर्द की गोली की तरह यदि स्त्रियाँ इसका उपयोग करने लगेंगी तो इसका दीर्घकालीन परिणाम क्या होगा हमें पता नहीं है। हो सकता है कि गोली लेने के बाद केवल छोटे मोटे दुष्प्रभाव ही होते हों जैसे मितली, चक्कर, सिरदर्द। फिर भी एक दो दुष्परिणाम होने का भय तो है ही। ठीक वैसे ही जैसे हर अच्छी वस्तु के साथ होता है। ये दो परिणाम हो सकते हैं यौन रोग और पुरुष का अपने उत्तरदायित्व से मुँह मोड़ना।

यदि इस गोली का प्रयोग विवाहेतर या विवाहपूर्व सम्बन्धों में किया गया तो यौन रोगों के बढ़ने की सम्भावना अधिक हो जाएगी।

पुरुष आज तक खुद की नसबंदी से बचने की कोशिश में लगा रहता था। किन्तु कुछ पुरुष अनचाही संतान के भय से नसबंदी करा लेते थे, क्योंकि अन्य कारणों के अलावा उन्हें कॉन्डोम में शतप्रतिशत सुरक्षा नहीं महसूस होती थी। अब वे सोच सकते हैं कि यदि कभी दुर्घटना घटी तो यह गोली तो है ही ना।

हाल में सुना कि एक युवती का विवाह हुआ। पति विवाह के कुछ दिन बाद विदेश लौटने वाला था सो गर्भनिरोधक गोली या अन्य उपाय करने की बजाए युवती ने रोज आइ पिल खाई। यह हाल तो पढ़ी लिखी कामकाजी युवती का था तो फिर अनपढ़ या कम पढ़ी लिखी युवतियाँ कितनी सतर्क हो्गी यह सोचने की बात है। शायद तम्बाकू की तरह ही इस गोली के विज्ञापन के साथ भी चेतावनी दिखाई जानी चाहिए। यह गोली बलात्कार या किसी अन्य आपदा में तो वरदान साबित हो सकती है किन्तु नियमित उपयोग के लिए नहीं हैं यह ध्यान रहना चाहिए। जैसे हम हर स्थिति से निपटने के लिए प्लैन ए और साथ में प्लैन बी भी बनाते हैं वैसे ही यह केवल प्लैन बी हो सकती है प्लैन ए नहीं। स्त्रियाँ वैसे ही अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह होती हैं। कहीं यह आपातकालीन गर्भनिरोधक गोली ही कोई आपदा न ले आए।

घुघूती बासूती

Wednesday, November 04, 2009

क्या इन्हें पितृत्व या मातृत्व का अधिकार होना चाहिए?

कोई भी समाचारपत्र उठाओ तो बच्चों के साथ होते अत्याचार भी पढ़ने को मिल जाते हैं। क्या बच्चों के साथ अत्याचार संसार का सबसे जघन्य अपराध नहीं है? क्या ऐसा अत्याचारी संसार का सबसे निकृष्ट व्यक्ति नहीं है? क्या ऐसे अपराधियों को समाज में रहने का अधिकार होना चाहिए?

आज ही पढ़ा कि एक नौ साल की बच्ची ने अपने दादा दादी की सहायता से अपने पिता के विरुद्ध पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है कि उसका पिता व उसके दो मित्र दो साल से उसका बलात्कार करते रहे हैं। यह बच्ची एक कम्बोदियाई माँ व भारतीय पिता की संतान है। पिता कम्बोदिया में काम करता था। वहीं उसने एक कम्बोदियाई स्त्री से विवाह किया और तीन साल बाद उन्हें छोड़ भारत आ गया। एक साल बाद बच्ची की माँ ने बच्ची को भारत भेज दिया। यहाँ पिता बच्ची से भीख मंगवाता था। सात साल की बच्ची का स्वयं भी बलात्कार करता था और दो मित्रों से भी धन के लालच में यही करवाता था।

पिता को चाहे जो सजा हो जाए, प्रश्न यह उठता है कि क्या ऐसे पुरुष को पिता बनने का भी अधिकार होना चाहिए? कभी न कभी वह जेल से छूटेगा, शायद दोबारा विवाह करे और फिर से किसी बच्चे का पिता बन जाए।
पिता तो मनुष्य के नाम पर कलंक है ही किन्तु उस माँ ने कैसे अपनी अबोध बच्ची को ऐसे व्यक्ति के पास भेज दिया जो उसे पहले ही छोड़ चुका था? माँ की कई मजबूरियाँ हो सकती हैं किन्तु क्या ऐसे में बच्ची को किसी को गोद दे देना बेहतर विकल्प नहीं सिद्ध होता? कम से कम तब यह आशा तो की जा सकती थी कि बच्ची को उचित देखभाल व प्यार मिलेगा। जो पिता उसे पहले ही छोड़ आया था उससे ऐसी आशा करना मूर्खता है।
माता पिता बनना जितना सहज है उतना ही कठिन है इस दायित्व को निभाना। किसी बच्चे को इस संसार में लाने से बड़ी उत्तरदायित्व की बात कोई हो ही नहीं सकती। काश कि लोग ऐसा करने से पहले लाख बार विचार करते कि वे इस दायित्व को निभाने के योग्य भी हैं या नहीं। काश कि केवल मानसिक व भावनात्मक रूप से योग्य लोग ही माता पिता बनने के अधिकारी होते।

कुछ ही दिन पहले बच्चों का यौन शोषण करने वाले ६० से भी अधिक उम्र के एक फ्रांसीसी अपराधी ने स्वयं कहा कि सर्जरी द्वारा उसे बंध्या बना दिया जाए।(टेस्टोस्टेरोन की मात्रा कम करने वाला इंजेक्शन देने की प्रथा भी वहाँ है।) वह स्वयं स्वीकारता है कि वह अपने पर नियंत्रण नहीं रख पाता। यह व्यक्ति पहले भी इस अपराध के लिए कई बार जेल जा चुका है। इस बार भी जेल से छूटने के कुछ दिन बाद ही उसने एक चार पाँच साल के बच्चे को बंदी बनाकर यह अपराध किया। फ्रांस में यह सुझाव रखा गया था कि ऐसे अपराधियों को उनकी सजा की अवधि खत्म होने पर भी तभी रिहा किया जाए जब मनोचिकित्सक यह कहें कि अब वे समाज के लिए खतरा नहीं हैं। किन्तु मानवाधिकारों की दुहाई देकर ऐसा हो नहीं सका।

मानवाधिकार बहुत महत्वपूर्ण हैं। यह भी सच है कि संसार की कोई भी अदालत यह नहीं कह सकती कि उसने कभी निरपराध को सजा नहीं दी है। किन्तु क्या बच्चों के अधिकारों से बड़ा भी कोई अधिकार हो सकता है? क्या ऐसे लोगों को बच्चों को यातना देने के लिए खुला छोड़ा जा सकता है?

घुघूती बासूती