Monday, October 26, 2009

मैंने भी अनगिनित गलतियाँ की हैं।

कई काम ऐसे होते हैं जिन्हें करने से पहले ही हमें पता होता है कि कुछ न कुछ गलती तो होगी ही। किन्तु फिर भी वह काम कर ही डालते हैं,क्योंकि यदि गलती के भय से काम करना छोड़ दें तो कभी कुछ भी नहीं कर पाएँगे। ऐसी गलतियों की पकड़े जाने की संभावना तब अधिक होती है जब काम सार्वजनिक या अंशतः सार्वजनिक हो, जैसे बच्चे के नामकरण, जन्मदिन या विवाह में काफी संख्या में लोगों को न्यौता देकर समारोह या पार्टी करना, कोई बैठक जैसा कुछ करना।

कितनी भी कोशिश कर लो गलती की संभावना तो बनी ही रहती है। शायद इसीलिए आजकल लोग विवाह जैसे कार्यक्रम भी पेशेवरों की सहायता से करते हैं। इसका एक लाभ यह होता है कि कुछ भूलचूक हो जाए तो पेशेवर के नाम मढ़ी जा सकती है, दूसरा आप भी निश्चिन्त रह मेहमान की तरह समारोह का मजा ले सकते हैं।

खैर, यह थी भूमिका, मुख्य मुद्दा तो मेरी वह गलती है जिसे मैं सदा याद रखूँगी। बात तबकी है जब मेरी बड़ी बिटिया का पहला जन्मदिन हमने धूमधाम से मनाया। हमारे लिए किसे बुलाएँ या किसे नहीं कोई धर्मसंकट का मुद्दा नहीं था। कारखाने की बस्ती थी। पति के साथ काम करने वाले सभी वहीं रहते थे। उन्हें ही सपरिवार बुलाना था। उनके अतिरिक्त मेरे कॉलेज की दो छात्राएँ भी पास के कारखाने में कार्यरत अधिकारियों से विवाह कर पास में ही रहती थीं सो उन्हें बुलाना था। सो सूची तैयार करना कुछ कठिन नहीं था। दफ्तर से ही सबके नामों की सूची लेकर पति ने निमन्त्रण दे दिए। मैं भी इस मामले में तो कोई गड़बड़ नहीं होगी सोच निश्चिन्त हो अपनी रसोई सम्भालने में लग गई। मेहमानों की आवभगत, खाने पीने व मनोरंजन में कोई कसर न रहे, हम दोनों इसी कोशिश में लगे रहे। केक पर केक बनते गए। आइसिंग होती रही। यह 'केक बनाओ' कार्यक्रम भी कम मनोरंजक नहीं था। हम सब सहेलियाँ मिलकर काम भी करती रहीं व मिलकर करने के कारण आनन्द भी लेती रहीं। उस जमाने में खाने का और्डर प्लेस करने का चलन नहीं हुआ था। सो हफ्तों से घर पर ही तैयारियाँ चल रही थीं।

मैंने घर में एँपण दिए। बुलु ने बंगाली विधि से अल्पना बनाई। आज भी उस अल्पना के सामने थककर पस्त हुए हम तीनों की फोटो देखकर वे स्नेहिल से दिन याद आ जाते हैं, जब थोक के भाव मित्र व सहेलियाँ थीं, जब सब काम मिलकर हुआ करते थे।

जब हमने मेहमानों को विदा कर दिया तो मीना व संजू ने पूछा, "भाभी, 'मामी' नहीं आईं?"

मैं आश्चर्य में बोली" अरे! वे तो आईं ही नहीं। क्या बात है तबीयत तो ठीक है उनकी? "

मैं तुरन्त घुघूत के पास गई और कहा कि 'मामी' नहीं आईं।

वे बोले," ओह, उन्हें तो बुलाया ही नहीं।"

मैं तो सन्न रह गई। जो मामी मुझे या बिटिया को छींक भी आ जाए तो हाल पूछने भागी आतीं थीं उन्हें ही निमन्त्रण नहीं दिया गया!

'मामी'(पूरी बस्ती की वे मामी ही थीं!) के पति इसी कम्पनी से रिटायर हो चुके थे। अब वे अपने बेटे के साथ रहते थे। बेटा दो साल के लिए कम्पनी द्वारा विदेश भेजा गया था। सो जो सूची पति ने ली थी उसमें उसका नाम नहीं था। हमसे ऐसी भूल हो गई थी कि कुछ समझ नहीं आ रहा था।

मैंने मीना व संजू को जाकर बताया," मामी को तो निमन्त्रण ही नहीं भेजा हमने!"

"क्या? भाभी ऐसा कैसे कर सकती हो आप ? उन्होंने तो हमारे साथ जाकर जन्मदिन का उपहार भी खरीद रखा था।"

मैंने कहा."कल सुबह ही उनके पास चलते हैं। मुझे उनसे माफी माँगनी है।"

अगले दिन मैं मीना के साथ मामी के घर केक आदि लेकर गई। हाथ जोड़कर माफी माँगी। उन्हें अपनी भूल का कारण बताया और उनके वक्ष से लगकर बोली कि "अब मैं क्या करूँ मामी?"

मामी ने क्षमा कर दिया। अन्दर जाकर उपहार लाकर बिटिया को दिया।

यह भूल जीवन की कुछ भूलों में से ऐसी है जो आजीवन कचोटती रहेगी। जब भी इस भूल की याद आती है तो लज्जित हो जाती हूँ, किन्तु साथ में मामी के स्नेह से सराबोर भी हो जाती हूँ। मामी ने हमारी भूल को अपने बड़प्पन से ढक दिया। अब तो न मामी रहीं न उनका पुत्र, केवल कुछ मधुर यादें शेष हैं और शेष है अपनी गलती और उनके स्नेह का अहसास।

जानती हूँ कि ऐसी भूलें भविष्य में भी करूँगी। तब क्षमा करने को शायद कोई मामी सी सरल व उदारहृदया मिले या न मिले, कह नहीं सकती। गलती करना लगभग निश्चित है, मामी जैसी का मिलना अनिश्चित।

घुघूती बासूती

Saturday, October 24, 2009

जीवित रहना चाहते हो तो एक अदद सगे सम्बन्धी का जुगाड़ तो कर ही लो!

यह बात मेरी समझ में २३.१०.०९ के टाइम्स औफ़ इन्डिया के मुम्बई संस्करण को पढ़कर आई। आपको आश्चर्य हो रहा है? नहीं होना चाहिए। प्रगतिपथ पर ६.५% की आर्थिक दर से आगे ही आगे बढ़ते देशों में कभी कभी मानवता को पीछे छोड़ देना ही श्रेयस्कर माना जाता है। चैन्नई जैसे महानगर में मनुष्य ठीक हस्पताल के सामने भी तेज धूप में तिलतिलकर दम तोड़ दे तो गाँववासियों या वनवासियों को शहरियों से कम से कम ईर्ष्या तो नहीं रह जाएगी। मरना ही है तो क्यों न धूप में भूखे प्यासे बीमार पड़े रहने की अपेक्षा किसी घने वृक्ष की छाया तले या नदी, पोखर के किनारे मरा जाए?

समाचार के अनुसार चैन्नई शहर में प्रान्त के सबसे बड़े सरकारी हस्पताल के गेट के बाहर एक ४५ वर्षीय पुरुष बाँई टाँग में प्लास्टर लगा २० दिन तक पड़ा रहा। उसकी टाँग से खून बह रहा था। लोगों के अनुसार २० दिन पहले उसे हस्पताल के बाहर छोड़ दिया गया था। अन्त में वह हस्पताल में वापिस ले जाया गया किन्तु वहाँ के मुर्दाघर में!

इन बीस दिनों वह भिखारियों द्वारा दिए गए भोजन, पानी पर जीवित रहा। सेल्वराज नामक रिपोर्टर ने जब गुरूवार को उससे बात करने की चेष्टा की तो वह हिन्दीभाषी केवल इतना ही कह पाया, नामः सुधीर। जब उसे हस्पताल में भर्ती करने के प्रयत्न असफल रहे तो एक स्वयं सेवी संस्था को बुलाया गया। उसे एम्ब्युलैन्स में ले जाया गया किन्तु वह मर गया। उसका शरीर मुर्दाघर को शव परीक्षण के लिए सौंप दिया गया।

हस्पताल के अधिकारियों के अनुसार बिना सगे सम्बन्धियों वाले मरीजों को दाखिल न करना या जब उनकी सहायता के लिए कोई न हो तो उन्हें हस्पताल के बिस्तरे से उठाकर बाहर छोड़ आना सामान्य बात है। एक उच्च अधिकारी के अनुसार "इस मरीज का ध्यान रखने वाला कोई नहीं था। उसे साधारण फ्रैक्चर था जिसे साफ रखना था। हमारे हस्पताल में यह काम नर्सें नहीं करती। उस काम में सम्बन्धी ही मरीज की सहायता करते हैं। हमारे यहाँ कर्मचारियों की कमी है, छोटी मोटी पट्टी मरीज (या शायद सम्बन्धी?) ही करते हैं। इसके सिवाय हम कोई palliative care centre(वह जगह जहाँ दर्द कम करने की दवा दी जाती हो,आवश्यक नहीं कि रोग दूर किया जा सके) तो हैं नहीं!"

सुधीर, तुम भाग्यवान हो, मरकर बड़े हस्पताल में शव परीक्षण तो करवा सकोगे। जीवित बाहर धकेले गए तो क्या है मरकर तो बिन सगे सम्बन्धियों की सहायता के ही चीरफाड़ तो हो ही जाएगी तुम्हारी! वैसे भी केवल टाँग तुड़वाकर ही अकेले क्यों आए, अधिक गम्भीर स्थिति में नहीं, तो कमसे कम कम्पाउन्ड फ्रैक्चर तो करवाकर ही बड़े हस्पताल में आना था!

घुघूती बासूती

Wednesday, October 21, 2009

स्‍वैटर बुनने वाले प्रोफेसर/ कढ़ाई करने की सलाह देने पर भौंचक पुलिसकर्मी

बेटियों के पास छुट्टियाँ बिताकर लगभग १७ दिन बाद घर लौटी। पहले पति की बदली के कारण, मकान की खोज, समान समेटना फिर नए घर में जमाना, बीमार पड़ना, बिटिया का मेरी सहायता के लिए यहाँ आना, नेट का न होना आदि कारणों से महीनों से न तो कुछ अधिक लिख पाई न ही ब्लॉग पढ़ पाई। आज पहले के भी कई ब्लॉग पढ़े। एक मजेदार किस्सा कई बार लिखने का सोच रही थी किन्तु आलस्य में टल जाता था। आज जब मनीषा पांडे का 'स्‍वेटर बुनने वाले प्रोफेसर' पढ़ा तो उस किस्से ने एक कैटेलिस्ट का सा काम किया। मन हुआ कि ट्रेन के उस किस्से को भी आज कह ही दिया जाए। पहले तो मैं मनीषा के ब्लॉग पर दी हुई अपनी टिप्पणी यहाँ दोहराती हूँ। बहुत से परम्परावादियों को न यह किस्सा पसन्द आएगा न ही मेरी टिप्पणी सो उनसे पहले ही क्षमा याचना करती हूँ।

मेरी टिप्पणीः

मनीषा, प्रोफ़ैसर साहब से मिलवाने के लिए आभार। शायद वे मनोविज्ञान को सही समझ गए। जो आंतरिक शांति हाथ का काम करने से मिलती है वह किसी अन्य काम से नहीं। गाँधी जी का चरखा चलाना हो, स्त्रियों द्वारा कढ़ाई, बुनाई, सिलाई, ये सब काम मन को बहुत शान्त कर देते हैं। शान्ति की आवश्यकता पुरुषों को स्त्रियों से कम नहीं है।

घुघूती बासूती

अब पढ़िए किस्सा

तब मेरी बिटिया काशी हिन्दु विश्वविद्यालय में पढ़ती थी। परीक्षा व पढ़ाई खत्म होने पर उसे सामान सहित वापिस आना था। उसे लेने व बनारस घूमने के 'एक पंथ दो काज' के उद्देश्य से मैं अहमदाबाद से बनारस जा रही थी। मेरी आदत थी (कुछ सीमा तक अब भी है) कि यात्रा हो या घर,खाली हाथ बैठना कठिन लगता है। या तो कोई पुस्तक या समाचार पत्र पढ़ती रहती हूँ या फिर कुछ सिलाई, कढ़ाई आदि हाथ में ले लेती हूँ। अब तो खैर,नेट पर चिपक जाती हूँ। मुझसे खाली हाथ तो टी वी भी नहीं देखा जाता। शायद ही कोई कार्यक्रम हो जो लगातार मेरा ध्यान खींच सकता है, फिर विज्ञापन तो कार्यक्रम से भी अधिक ही आते हैं।


सो पुस्तक व काढ़ने के लिए साड़ी से लैस मैं यात्रा कर रही थी। गाड़ी उत्तर प्रदेश पहुँच गई थी। एक पुलिसकर्मी मेरी सीट के सामने आकर बैठे। वे लगातार मेरी कढ़ाई वाली साड़ी को देख रहे थे। जब उनसे रहा नहीं गया तो वे बोल ही पड़े, "कितनी अच्छी बात है आप अपने समय का सदुपयोग कर रही हैं। देखिए आपने बैठे बैठे कितनी सारी कढ़ाई कर डाली।"

मैं मुस्करा दी व कहा "हाँ, काफी हो गई है।"

वे फिर बोले,"आजकल की लड़कियाँ तो ऐसे काम करती ही नहीं। खाली समय बर्बाद करती रहती हैं। उन्हें भी आपकी तरह समय का उपयोग करना चाहिए।"

बेचारे जानते नहीं थे कि किस मधुमक्खी के छत्ते को वे छेड़े जा रहे थे। वे तो सराहना कर रहे थे किन्तु मैं उनके खाली हाथों को ताक रही थी।

मैंने पूछा, "आप ड्यूटी पर हैं?"

वे बोले, "नहीं।"

मैंने पूछा, "आप समय का सदुपयोग क्यों नहीं करते?"

वे बोले, "मैं?"

मैंने कहा, "जी,आप!"

वे आश्चर्यचकित होकर बोले, "मैं कैसे कर सकता हूँ?"

मैंने कहा, "अपने हाथों से, हाथ का काम करके।"

वे परेशान हो गए, "मैं, मैं कैसे?"

मैंने कहा, "यही कुछ कढ़ाई बुनाई करके।"

वे भौंचक्के रह गए। उनका मुँह मैं, मैं कहते हुए खुला का खुला रह गया। उनके चेहरे पर जो भाव आए गए वे मैं कभी भूल नहीं सकती। चेहरा तो मैं देखते से ही अपनी आदत अनुसार भूल गई थी।
बहुत इच्छा हुई कि कहूँ, "औरों को तो अक्ल बताएँ, आप अंधेरे जाएँ !" किन्तु शायद जीवन में उन्हें ऐसी सलाह देने का दुस्साहस किसी ने नहीं किया था। वे स्तब्ध थे, शायद आहत भी थे, सो उन्हें और कुछ कहना शायद हिंसा की श्रेणी में गिना जाता।

कुछ समय बाद वे उठे और दो चार लोगों से किसी बात पर भिड़कर अपने समय का सदुपयोग करने लगे।

घुघूती बासूती

Thursday, October 08, 2009

दान दो किन्तु ग्रहीता को साथ में सम्मान भी दो!

बाढ ने एक बार फिर हजारों लोगों को अपनी सम्पत्ति, कपड़ों, सामान, यहाँ तक कि भोजन तक से वंचित कर दिया है, अब हम उन्हें उनके आत्मसम्मान से भी वंचित कर रहे हैं। दान के नाम पर कहीं हम अपने घरों का कचरा तो इन पीड़ितों को नहीं पकड़ा रहे?

जब जब कोई प्राकृतिक या मानवी आपदा समाज के एक बड़े वर्ग को प्रभावित करती है तब तब अप्रभावित व्यक्ति को अपने मानवीय मूल्यों को निभाने का एक सुअवसर मिल जाता है। दान देना भी एक ऐश्वर्यपूर्ण काम है जिसकी सुविधा हमें तभी मिलती है जब इसे लेने के लिए कोई दुर्भाग्यवान पात्र उपलब्ध हो। आदर्श रूप से यह दान दानी व आदानी के बीच एक मानवीय संवेदना व स्नेह की डोर होनी चाहिए। एक ऐसी डोर जो दोनों को मनुष्य की सामाजिकता, संवेदनशीलता व मानवीय स्नेह के मधुर रस में गोता लगवा दे और दोनों को नितदिन के जीवन से थोड़ा ऊपर खींच ले। जिससे दोनों का मन अभिभूत हो जाए। हमारे दैनिक जीवन की पकड़ से जो मानवता छूटती जा रही है उसपर हमारी पकड़ फिर से थोड़ी मजबूत हो जाए।
हर आपदा के बाद फटे पुराने कपड़ों के अम्बार का समाचार पढकर मन द्रवित हो जाता है। हर आपदा के बाद लगता है कि मैं भी पीड़ित हो सकती थी। इन फटे कपड़ों को मेरे मुख पर भी मारा जा सकता था और मेरा ऐसा भी दुर्भाग्य हो सकता था कि मैं इनमें से अपने व अपने परिवार के योग्य कपड़े ढूँढ रही होती।
हाँ, दाता से आदाता बनने में कोई देर नहीं लगती। पिछले वर्ष जब घुघूत का औपरशन हुआ था तब बेटी की इन्स्टिट्यूट के पुराने सहपाठियों ने रक्तदान कर आजीवन हमें उनका ऋणी बना दिया। सो जीवन में दाता से आदाता और पुन: दाता बनना एक स्वाभविक प्रक्रिया है। बस आवश्यकता है तो इस यात्रा को कम से कम कष्टकर व लज्जारहित बनाने की।
मुझे याद है कि जब गुजरात में भूकँप आया था तो हम भी वहाँ थे। सौभाग्य से बिना अधिक हानि के हम बच गये। परन्तु बहुत से लोग रातों रात महलों, मकानों से सड़क पर आ गये। राजा से रंक बनने का ऐसा उदाहरण कम ही देखने को मिलता है। तब क्योंकि हम पास में थे तो पीड़ितों की आवश्यकता अनुसार हम सहायता भेजते रहे। एक बस व ट्रक राहत समग्री लेकर गया। साथ में रसोइए व सेवादार गये। वहाँ की स्थिति देख वे हमें क्या भेजना है बताते रहे।
ऐसे ही जब सुनामी आई तब भी हमारा महिला मंडल चंदा इकट्ठा कर व अपने पास से भी पैसे डाल कपड़े आदि जुटाने में लग गया। नये पेटीकोट, ब्लाउज, साड़ी, बनियान, लुँगी, तौलिये, साबुन, टूथपेस्ट, टूथ-ब्रश,रेजर, सेफ़्टी पिन, सूई धागा आदि खरीदे गये। सबसे अनुरोध किया गया कि वे अपने घर से दिये गये कपड़े धोकर व इस्तरी करके लायें। कुछ महिलाओं से सिलाई मशीन भी लाने का अनुरोध किया गया। फिर सबने मिलकर पुराने कपड़ों में टूटे बटन टाँके, उधड़े को सिला, पुराने इलास्टिक निकालकर नये डाले। अलग अलग उम्र के लिये पारदर्शी पैकेट बनाए व उनपर उम्र व समान के लेबेल लगाए। सबमें दैनिक आवश्यकता का समान भी रखा। पैकेट बनाते समय मैंने कहा था कि ऐसे पैक करो कि यदि हम लेने वाले होते तो हीन न महसूस करते।
हमारे महिला मंडल में एक और परंपरा भी शुरू की गयी थी कि हर बार जब हम हाउजी, तम्बोला खेलते तो इकट्ठी की राशि का दस प्रतिशत हम भविष्य में ऐसे राहत कामों के लिये रख लेते। आज मैं वहाँ से निकल चुकी हूँ परन्तु मुझे विश्वास है कि वहाँ की महिलाएँ पिछली बार की तरह ही इस बार भी सुन्दर पैकेट ससम्मान बना रही होंगी।
दानी में इतनी शिष्टता तो होनी ही चाहिए कि ग्रहीता का सम्मान भी बना रहे। और जब भी मुझे ग्रहीता बनना पड़े तो दानी मुझसे मेरा आत्मसम्मान न छीने अपितु मुझे व स्वयं को दोनों को सम्मानित व अनुग्रहित करे।
घुघूती बासूती

Tuesday, October 06, 2009

क्या अन्तर पड़ेगा यदि हम किसी ब्लौगर मित्र का चेहरा, नाम, पता, उम्र जानें या न जानें ?

श्री वीरेन्दर जैन अपने चिट्ठे http://nepathyaleela.blogspot.com/2009/10/blog-post_05.html में घूँघट वाली महिलाओं का जिक्र करते हुए कहते हैं

'पिछले दिनों कुछ महिला ब्लागरों की पोस्टें देखने को मिलीं जिनमें कही गयी बातों के कारण उनका प्रोफाइल देखने की इच्छा हुयी। उन्होंने अपनी पोस्टों में बातें तो बड़ी क्रान्तिकारी की थीं या दूसरे के कथन पर अपनी बोल्ड टिप्पणियां दी थीं किंतु अपने प्रोफाइल में वही पुराना परंम्परागत रवैया अपनाया हुआ था। अपनी जन्म तिथि को तो शायद ही किसी ने घोषित किया हो, अनकों ने अपना फोटो नहीं डाला हुआ था और अधिकतर ने अपना निवास स्थान और अपने कार्यालय का अता पता नहीं दिया हुआ था। ये सारी ही बातें एक आम महिला में देखी जाती हैं किंतु वे महिलाएं अपने ब्लागों पर बड़ी बड़ी बोल्ड बातें नहीं करतीं।
यह समय जैन्डर मुक्ति का समय है तथा ब्लाग पर आने वाली महिलाएं तो सारी दुनिया के सामने अपने मन को खोल देने वाले मंच पर आ रही हैं, ऐसे में यह संकोच उनके दावों के साथ मेल नहीं बैठा पाता। देह उघाड़ने की तुलना में मन का खोलना कम कठिन नहीं होता पर यहाँ तो उम्र व रंग रूप व परिचय तक छुपा कर क्रान्तिकारी बना जा रहा है। यहीं विश्वसनीयता का प्रश्न खड़ा होता है व सारा किया धरा बेकार लगने लगता है।'


मैं जानना चाहूँगी कि क्या हम चिट्ठे लेखक के रूप, रंग, उम्र या लिंग के कारण पढ़ते हैं? मुझे लगता है कि हम चिट्ठे अपने विचारों को अन्य लोगों तक पहुँचाने के लिए लिखते हैं। यदि कुछ लोग टिप्पणी करते हैं या उस विचार विशेष पर बहस करते हैं तो सोने में सुहागा जैसा हो जाता है। अन्यथा तो अपने विचार लिखने भर से भी हमारी सोच कुछ अधिक साफ़ हो जाती है। व्यक्ति की उम्र,लिंग या शक्ल का इन विचारों के आदान प्रदान से क्या लेना देना? यदि कोई अपने नाम पते,चेहरे से सबको परिचित करवाता है तो यह उसका निजि निर्णय है। इससे पाठकों को कोई अन्तर नहीं पड़ता। यदि पड़ता भी है तो केवल एक जिज्ञासा शान्त हो पाने या न हो पाने जितना ही। सबसे बड़ी बात है कि पाठक के लिए लेखन अधिक महत्वपूर्ण है या लेखक?


मैं अपनी बात करूँ तो लेखन ही महत्वपूर्ण है। उम्र तो छिपाने जैसी वस्तु है ही नहीं न बताने जैसी। मैं 54 वर्ष की हूँ कहने से न तो आप मेरा लिखना पढ़ना शुरू कर देंगे न उसे पढ़ना छोड़ देंगे। नेट पर तो लोग अपनी आइ डी देकर ही परेशान हो जाते हैं तो मोबाइल, फोन नम्बर व पता तो कयों देंगे? देने वाले देते हैं, अपनी ही नहीं अपने पड़ोसी की फोटो भी दे देते हैं। यदि उन्हें व उनके पड़ोसी को आपत्ति नहीं तो मुझे क्या हो सकती है? परन्तु लिखने के लिए, विशेषकर कुछ क्रान्तिकारी सा लिखने के लिए अपना चेहरा, लम्बाई या वजन भी नेट पर हो यह शर्त कुछ ज्यादती ही है। यदि इसे घूँघट कहा जाए तो ऐसा घूँघट तो बहुत से पुरुष बलौगर भी ओढ़ते हुए मिलेंगे। उस पर भी आपत्ति है क्या? या केवल स्त्री बलौगर को अपना रूप रंग दिखाना होगा? यदि हम ऐसा करें भी तो क्या सुनिश्चित है कि मैं अपना 30 या 32 वर्ष पुराना फोटो तो नहीं दिखा रही? या आज का खींचा फोटो ही डालना होगा?


प्राय: होता यह है कि आप किसी का लिखा पढ़ते हैं,पसन्द करते हैं, टिप्पणी व प्रति टिप्पणी का आदान प्रदान करते हैं। फिर कभी मेल लिख देते हैं, कुछ विचार मिलते से हैं तो नेट पर बातचीत शुरू हो जाती है। फिर नौबत फोन नम्बर व पते की आती है। मिलना मिलाना होता है तो अपने आप छद्म नाम के साथ साथ माता पिता द्वारा दिया नाम भी पता चल जाता है या बताया जाता है। 'छद्म नाम क्यों' पर तो मैं पहले भी लिख चुकी हूँ। यहाँ केवल इतना ही कहूँगी कि यदि इस नाम से कोई लगातार लिखता व टिपियाता है तो उसे नेट नाम भी कहा जा सकता है। वह धोखा देने की भावना से नहीं रखा गया है। सबसे बड़ी बात यह है कि ब्लौग लेखन व्यक्तिगत स्वतंत्रता का चरम है। यहाँ कोई बंधन नहीं है। यदि कोई बंधन है वही मूल्यों का कि आप किसी को व्यक्तिगत रूप से चोट न पहुँचाएँ, अपशब्दों का उपयोग न करें आदि।


इसे ऐसे ही स्वतंत्र रखा जाए इसी में इस साधन की सार्थकता है। अन्यथा मुझे घूंघट वाली कहलाकर उसकी आड़ से भी लिखने में कोई आपत्ति नहीं है।


घुघूती बासूती