श्री वीरेन्दर जैन अपने चिट्ठे http://nepathyaleela.blogspot.com/2009/10/blog-post_05.html में घूँघट वाली महिलाओं का जिक्र करते हुए कहते हैं
'पिछले दिनों कुछ महिला ब्लागरों की पोस्टें देखने को मिलीं जिनमें कही गयी बातों के कारण उनका प्रोफाइल देखने की इच्छा हुयी। उन्होंने अपनी पोस्टों में बातें तो बड़ी क्रान्तिकारी की थीं या दूसरे के कथन पर अपनी बोल्ड टिप्पणियां दी थीं किंतु अपने प्रोफाइल में वही पुराना परंम्परागत रवैया अपनाया हुआ था। अपनी जन्म तिथि को तो शायद ही किसी ने घोषित किया हो, अनकों ने अपना फोटो नहीं डाला हुआ था और अधिकतर ने अपना निवास स्थान और अपने कार्यालय का अता पता नहीं दिया हुआ था। ये सारी ही बातें एक आम महिला में देखी जाती हैं किंतु वे महिलाएं अपने ब्लागों पर बड़ी बड़ी बोल्ड बातें नहीं करतीं।
यह समय जैन्डर मुक्ति का समय है तथा ब्लाग पर आने वाली महिलाएं तो सारी दुनिया के सामने अपने मन को खोल देने वाले मंच पर आ रही हैं, ऐसे में यह संकोच उनके दावों के साथ मेल नहीं बैठा पाता। देह उघाड़ने की तुलना में मन का खोलना कम कठिन नहीं होता पर यहाँ तो उम्र व रंग रूप व परिचय तक छुपा कर क्रान्तिकारी बना जा रहा है। यहीं विश्वसनीयता का प्रश्न खड़ा होता है व सारा किया धरा बेकार लगने लगता है।'
मैं जानना चाहूँगी कि क्या हम चिट्ठे लेखक के रूप, रंग, उम्र या लिंग के कारण पढ़ते हैं? मुझे लगता है कि हम चिट्ठे अपने विचारों को अन्य लोगों तक पहुँचाने के लिए लिखते हैं। यदि कुछ लोग टिप्पणी करते हैं या उस विचार विशेष पर बहस करते हैं तो सोने में सुहागा जैसा हो जाता है। अन्यथा तो अपने विचार लिखने भर से भी हमारी सोच कुछ अधिक साफ़ हो जाती है। व्यक्ति की उम्र,लिंग या शक्ल का इन विचारों के आदान प्रदान से क्या लेना देना? यदि कोई अपने नाम पते,चेहरे से सबको परिचित करवाता है तो यह उसका निजि निर्णय है। इससे पाठकों को कोई अन्तर नहीं पड़ता। यदि पड़ता भी है तो केवल एक जिज्ञासा शान्त हो पाने या न हो पाने जितना ही। सबसे बड़ी बात है कि पाठक के लिए लेखन अधिक महत्वपूर्ण है या लेखक?
मैं अपनी बात करूँ तो लेखन ही महत्वपूर्ण है। उम्र तो छिपाने जैसी वस्तु है ही नहीं न बताने जैसी। मैं 54 वर्ष की हूँ कहने से न तो आप मेरा लिखना पढ़ना शुरू कर देंगे न उसे पढ़ना छोड़ देंगे। नेट पर तो लोग अपनी आइ डी देकर ही परेशान हो जाते हैं तो मोबाइल, फोन नम्बर व पता तो कयों देंगे? देने वाले देते हैं, अपनी ही नहीं अपने पड़ोसी की फोटो भी दे देते हैं। यदि उन्हें व उनके पड़ोसी को आपत्ति नहीं तो मुझे क्या हो सकती है? परन्तु लिखने के लिए, विशेषकर कुछ क्रान्तिकारी सा लिखने के लिए अपना चेहरा, लम्बाई या वजन भी नेट पर हो यह शर्त कुछ ज्यादती ही है। यदि इसे घूँघट कहा जाए तो ऐसा घूँघट तो बहुत से पुरुष बलौगर भी ओढ़ते हुए मिलेंगे। उस पर भी आपत्ति है क्या? या केवल स्त्री बलौगर को अपना रूप रंग दिखाना होगा? यदि हम ऐसा करें भी तो क्या सुनिश्चित है कि मैं अपना 30 या 32 वर्ष पुराना फोटो तो नहीं दिखा रही? या आज का खींचा फोटो ही डालना होगा?
प्राय: होता यह है कि आप किसी का लिखा पढ़ते हैं,पसन्द करते हैं, टिप्पणी व प्रति टिप्पणी का आदान प्रदान करते हैं। फिर कभी मेल लिख देते हैं, कुछ विचार मिलते से हैं तो नेट पर बातचीत शुरू हो जाती है। फिर नौबत फोन नम्बर व पते की आती है। मिलना मिलाना होता है तो अपने आप छद्म नाम के साथ साथ माता पिता द्वारा दिया नाम भी पता चल जाता है या बताया जाता है। 'छद्म नाम क्यों' पर तो मैं पहले भी लिख चुकी हूँ। यहाँ केवल इतना ही कहूँगी कि यदि इस नाम से कोई लगातार लिखता व टिपियाता है तो उसे नेट नाम भी कहा जा सकता है। वह धोखा देने की भावना से नहीं रखा गया है। सबसे बड़ी बात यह है कि ब्लौग लेखन व्यक्तिगत स्वतंत्रता का चरम है। यहाँ कोई बंधन नहीं है। यदि कोई बंधन है वही मूल्यों का कि आप किसी को व्यक्तिगत रूप से चोट न पहुँचाएँ, अपशब्दों का उपयोग न करें आदि।
इसे ऐसे ही स्वतंत्र रखा जाए इसी में इस साधन की सार्थकता है। अन्यथा मुझे घूंघट वाली कहलाकर उसकी आड़ से भी लिखने में कोई आपत्ति नहीं है।
घुघूती बासूती
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Tuesday, October 06, 2009
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