Thursday, July 12, 2007

छोटी जगह की और भी बहुत ही छोटी चिट्ठाकार !

छोटी जगह की और भी बहुत ही छोटी चिट्ठाकार !
काकेश जी का रविवार 8 जुलाई को अंग्रेजी के प्रमुख समाचार पत्र टाइम्स ऑफ इंडिया में छपे एक लेख पर लिखा चिट्ठा पढ़ा। लेख पढ़कर बहुत प्रसन्नता हुई। किन्तु मेरे हिसाब से तो ये सब चिट्ठाकार महानुभाव महानगरों में रहते हैं। यदि ये छोटी जगह के हैं तो मैं, जो 500 या शायद 600 की जनसंख्या व एक दुकान वाली जगह में रहती हूँ, जिसे मैं गाँव का दर्जा देने से भी हिचकिचाती हूँ, कहाँ की हूँ ? शायद बहुत ही छोटी जगह की और भी बहुत ही छोटी चिट्ठाकार !कद भी छोटा, बुद्धि भी छोटी, जगह भी छोटी । लगता है इस छोटेपन को पेटेंट करा लूँ ।
कल जब दिल्ली की सड़क पार करना असंभव लगा और फिर अपने घुटनों को कष्ट देकर सबवे (यह शब्द भी मुझ छोटी जगह की प्राणी को अपनी भतीजी से पूछना पड़ा ! हमारे जंगल में ऐसी वस्तुएँ नहीं पाई जाती।) का उपयोग करना पड़ा । जब मैं बेटियों से मिलने शहर आती हूँ तो वे उँगली पकड़ कर मुझे साथ ले जाती हैं व सड़क भी पार करवाती हैं। जैसे छोटे बच्चों को सड़क पर अन्दर की तरफ़ रखा जाता है वैसे ! सो मैं चिटठकाकारों की गिनती में आऊँ ना आऊँ छोटी जगह की तो हूँ ही । इस श्रेय को कोई मुझसे छीने मुझे कदापि सह्य नहीं है।
घुघूती बासूती

Saturday, July 07, 2007

बिटिया
जबसे दूर गई हो बिटिया
खाली खाली सी है दुनिया
ना हँसी कहकहे कहीं गूँजते
ना पहले से कोई झगड़े होते
ना बहस ना तकरार कहीं है
सारे खेल बंद पड़े बक्से में
सारी भावनाएँ भी बंद पड़ी हैं
किससे खेलूँ किसे गले लगाऊँ ।

घर आँगन सब वीरान पड़ा है
तुम्हारे कमरे में सामान पड़ा है
तुम्हारे जूते कपड़े सब बाँट चुकी हूँ
फिर भी यादों को पूरे घर में पाती हूँ
कभी किसी पुस्तक के अन्दर
कभी किसी अलमारी के अन्दर
कोई तुम्हारे हाथ का बना कार्ड मिला है
कभी रिबन तो कभी हेयर बैंड मिले हैं ।

कल मैंने तुम्हारे खिलौनों का बक्सा खोला
हर खिलौना बुला दो मेरी दीदी ये बोला
देख तुम्हारी ये गुड़ियाँ सयानी
भर आया मेरी आँखों में पानी
भींच कलेजे से उन्हें लगाया
तुम्हारी याद ने बहुत सताया
कितने सारे खेल पड़े हैं
लैगो व बोर्ड गेम पड़े हैं ।

इक इक खेल के साथ यादें जुड़ी हैं
तुम संग झगड़े व ढेरों वातें जुड़ी हैं
वह रूठना, रोना और मनाना
वह लाड़ से फिर गले लगाना
वह घंटों ढेरों बाते करना
सारी रात तुम संग जगना
वह हँसना और हँसाना
पल में रोना पल में गाना ।

कटहल, आम, का अचार बनाया
लेकिन कोई भी ना खाने आया
अब कोई आइसक्रीम न बनती
ना त्यौहारों में मिल एँपण बनती
ना घर में है अब ये चीनी ही खपती
ना तुम्हारे मित्रों की महफिल सजती
ना दीवाली ना होली ढंग से मनती
तुम बिन छुट्टी छुट्टी सी न लगती ।

हर उत्सव है फीका लगता
मन मेरा कहीं न लगता
गर्मी बीती, आमों का है मौसम बीता
तुम बिन न कोई मैंगो शेक है पीता
तुम बिन जीवन है नहीं सुहाता
स्कूल के किस्से न कोई सुनाता
अब घर आ जाओ बेटी प्यारी
तुमसे मिलने की हो तैयारी ।

अब तुम बिन बिटिया
खाली रहता है हर दिन मेरा
देखो तुम बिन कितना
सूना लगता है यह घर मेरा
तुम व्यस्त हो जाने ये है माँ तुम्हारी
बस तुम खुश रहो ये है इच्छा हमारी
इतनी खुशियाँ हों कि ना आए याद हमारी
जहाँ रहो पूरी हों जाएँ तुम्हारी इच्छाएँ सारी ।

घुघूती बासूती

Friday, July 06, 2007

टूटे फूटे लोग...............................कविता

टूटे फूटे लोग

लोग भी क्या काँच की तरह टूट जाते हैं
या फिर वे चीनी मिट्टी के बतर्नों जैसे
कप की तरह कुछ यहाँ से चटखे
कुछ वहाँ से दरके व टूटे किनारे
कुछ जगह जगह चोटों के घाव लिए
कुछ बेचारे नदारद हैंडल वाले
कुछ फैविकॉल से जुडे हैंडल वाले
हाँ, कुछ लोग ऐसे भी जीते हैं ।

या फिर कुछ घिस घिसकर
जीवन में अच्छे से रगडा लगने पर
तली में अपनी छेद ही कर लेते हैं
कुछ बिना कुछ किए ही पडे पडे
घटिया स्टील की तरह यूँ ही
मुफ्त में दरार का घाव पा लेते हैं
कुछ औरों के हुए हमलों में ही
बुरी तरह से पिचक जाते हैं ।

कुछ लोग काँच के बने होते हैं
बिल्कुल ही पारदर्शी होते हैं
इनके भीतर क्या क्या रखा है
नहीं किसी से छिपा रहता है
पर इक चोट यदि ये खाते हैं
नहीं किसी काम के रह जाते हैं
इनके ऊपर सावधानी से बरतो
का चिन्ह हरदम लगा रहता है

जब ये टूटते हैं तो औरों को भी
रक्त से यूँ ये ऐसा रंग देते हैं
कि स्वयं तो गए पर जाते जाते
चोट ये दूजों को लगा जाते हैं
किन्तु कुछ ऐसे भी सहनशील
काँच के बने लोग पाए जाते हैं
जो टूटते हैं तो स्वयं चूरा चूरा हो
किन्तु चोट दूजों को न दे जाते हैं ।
घुघूती बासूती
१७ .४. २००७

Wednesday, July 04, 2007

आह की चादर

इक आह चादर की तरह
मेरे पूरे अस्तित्व पर छाई हुई है
मेरे हर क्षण ,मेरी हर साँस पर
यह चादर पसरी हुई है ।
मेरे शब्दों में बसी है यह
मेरी गंध तक में
रची बसी है यह
मेरी आवाज और
मेरे कानों तक में
घुली है यह
चित्कार बनकर ।

मेरी दृष्टि में भी
इक कोहरे सी
घिरी है यह,
हर स्पर्श में
इक झुरझुरी बन
रहती है यह,
मेरे रोमों में भी
इक सिहरन बन
समायी है यह ।

हर आहट,हर पदचाप में
सुनाई देती है यह
मेरी राहों में खड़ी यह
मील का पत्थर बन कर,
मेरे गीतों में है
बसेरा इसका,
मेरे सपनों में
रहता है साया इसका ।

हर मोड़ पर
मिल जाती है
यह साथी बनकर,
मेरे हर बोल में
रिस जाती है
यह हाला बनकर,
मेरे रक्त में
बहती है यह
एक ज्वाला बनकर ।

मेरे हर पल पर अपना
अधिकार जमाए बैठी है
रहती है यह संग मेरे
मेरी परछाई बनकर
मेरे आज और मेरे कल में
रुसवाई बनकर ।

यह आह की चादर
लिपटी है मेरे जीवन से,
उलझी हुई है यह आह
मेरे आँचल में
काँटों की तरह,
मेरे आकाश,मेरे सूरज
मेरे चाँद तारों को
छिपा लेती है
यह इक बादल की तरह ।

मेरे वीरानों को
घेरा है इसने
एक गूँज बनकर
मेरे हृदय को
भेदा है इसने
एक शूल बनकर,
नज़र जहाँ तक जाती है
फैली हुई है यह
धूआँ बनकर ।

इस आह को सीने में
छिपा रखा है
सीपी में मोती की तरह
इसे दिल से
लगा रखा है
दीये में ज्योति की तरह,
इसे मन में
सजा रखा है
आँखों में अश्रु की तरह ।

घुघूती बासूती

Sunday, July 01, 2007

ये आभासी नाते

ये आभासी नाते कुछ ऐसे होते हैं
अब दीये नहीं चाहिये कहने पर
अपने दीये से दूजे की ज्योत जलाते हैं
अब दीयों का क्या काम जब स्वयं मैं
अपनी राह जगमग कर सकती हूँ
तेरे दीये की ज्योत लिये
अब मैं जीवन पथ पर चल सकती हूँ
जब फिर से धीमी पड़े ज्योत
तो तुझ तक राह जो जाती है
उस पर चलने पर ही से मुझे
आधे रास्ते में तुम मिल जाते हो
और धीमी पड़ी ज्योत जलाते हो ।
घुगूती बासूती