शनिवार, जून 30, 2007

मन.............एक कविता

मन

उड़ा रे, मेरा मन उड़ चला
तितली से ये पंख लगाकर,
अभी पास ही तो था ये मेरे
अब साथ चल पड़ा है तेरे ।

मन है कोमल मन है चंचल
मन है स्निग्ध मन है शाश्वत,
यह है कभी बालक सा सरल
तो कभी है विप्लवी किशोर ।

बन हिरण कभी कुलाँचे भरता
कभी बन मयूर नाचा करता,
ये ना जाने कोई भी बन्धन
बस सुनता मन का क्रन्दन ।

अभी यहाँ है तो अभी वहाँ है
ढूँढो इसे न जाने ये कहाँ है,
तुझसे मिलने ये चला था
तेरी राहों में खो गया है ।

मन ना जाने कब किस
मन को सहला आता है ,
न जाने किस पल को वह
किस मन को बहलाता है ।

अपने अन्तः की तेरे मन से
कितनी बातें कर आता है ,
जा पास तेरे, तेरे मन की
कितनी बातें सुन आता है ।

अपनी आँखों से तेरे सारे सपने
चुपके चुपके से देख आता है ,
तेरे मन की आँखों को अपने
सपने जाने कब दिखा आता है ।

घुघूती बासूती

शुक्रवार, जून 29, 2007

चक्करों का चक्कर

चक्कर की दिशा कौन सी ? क्लॉकवाइज या एन्टीक्लॉकवाइज ?

बहुत दिन से हमें चक्कर आ रहे हैं । हम जानते हैं कि २६ जनवरी २००१ के भूकम्प के जमाने से हमें चक्कर आना शुरू हुआ था । मुझे तो लगता है कि भूकम्प के दिन जब चक्कर सबके सर में आया था तभी से उसे हमारा सर पसन्द आ गया । सो अब तक बीच बीच में जब चक्करों को हमारी याद आती है तो मेहमान बन आ जाता है हमारे घर, नहीं नहीं सर ! अब सर आए मेहमान का अनादर तो कर नहीं सकते । तो हम भी चक्करों को सर आँखों पर लेते हैं ।
शुरू शुरू में तो जब यह आता था तो मैं सोचती थी कि भूकम्प के ही विदाई झटके, आफ्टर शॉक्स, हैं । पर जब हमारे सिवाय किसी को ये महसूस नहीं होते थे तो हमें शक हुआ । फिर डॉक्टर महोदय ने भी हमारी यह खुशफहमी कि हम कुछ अधिक ही संवेदनशील हैं व जो झटके किसी को नहीं लगते हम ही महसूस कर पाते हैं, दूर कर दी । उन्होंने बताया कि हमें जो धरती अपने नीचे से खिसकती लगती है वह वास्तव में खिसकती धरती न होकर हमारे कान के मध्यम भाग में हमारे संतुलन के केन्द्र का खिसकना होता है । सो हम कुछ गोलियाँ , कुछ निराशा व कुछ खिसकते संतुलन के साथ अपना सा मुँह लिए व एक नई बीमारी ‘ वर्टिगो ’ का नाम लिए घर वापिस आ गए ।
कुछ दिनों से चक्करों ने फिर से बहुत परेशान कर दिया है । सो आज फिर अपनी नई जगह के नए डॉक्टर के पास गए । यहाँ भी वही वर्टिगो ही बताया गया पर वे चाहते थे कि ई. एन.टी . याने नाक ,कान व गले के डॉक्टर भी हमें, हमारे कानों व चक्करों को देखकर हमारे चक्करों पर वर्टिगो की मुहर लगा दें । सो चकराते हुए हम दुमंजिले या शायद तिमंजिले, भाई , हम इतने चकराए हुए थे व अपना संतुलन बनाए रखने में इतने व्यस्त थे कि कितनी सीढ़ियाँ चढ़ीं और उतरीं याद नहीं । वैसे हमारे घुटनों को जो याद है उससे लगता है कि सौ,दो सौ तो रही ही होंगी, पर हमारे घुटनों को कुछ बढ़ा चढ़ा कर बोलने की आदत है । खैर, जैसे तैसे लड़खड़ाते चकराते हम डॉक्टर के पास पहुँचे । उन्होंने हमारे कान के अन्दर कोई यंत्र डाला जिससे हम और वह हमारे कान के अन्दर का नजारा मॉनिटर पर देख सकते थे । वे उस दृष्य से प्रसन्न हुए व हमारे कानों को सफाई के मामले में पास कर दिया । ऐसे ही हमारा दूसरा कान व नाक भी पास हो गए । पर सुनाई देने के मामले व कुछ अन्य मामलों में वे प्रसन्न नहीं थे । फिर उन्होंने हमसे हमारे चक्करों के बारे में पूछना आरम्भ किया । कब से आते हैं, कितनी बार आते हैं, क्या करते समय आते हैं , किससे पूछ कर आते हैं, आदि आदि ।
यहाँ तक तो सब ठीक था फिर उन्होंने पूछा कि किस दिशा में आते हैं । हम थोड़े चौंके । हमने पूछा दिशा, वे बोले हाँ, क्लॉकवाइज यानी घड़ी की सूई कि दिशा में या एन्टीक्लॉकवाइज यानी घड़ी की सूई के चलने की विपरीत दिशा में । हमारा सर तो इस प्रश्न से और भी चकरा गया पर फिर भी हम चक्करों की दिशा न बता पाए । हम तो यही कह पाए कि हमें तो केवल यह लगता है कि हम झूले में बैठे हैं या खड़े हैं या लेटे हैं । कुछ कुछ सिम्पल हार्मोनिक मोशन की तरह याने पैन्ड्युलम की तरह झूला झूलता लगता है । हम तो अपने ३० या ३२ वर्ष पहले पढ़े फिजिक्स के कारण उन्हें उत्तर दे पाए और वे हमारे उत्तर से थोड़े खुश भी हुए पर हम अभी तक तय नहीं कर पाए हैं कि चक्करों की दिशा कौन सी है । यदि वे सिम्पल हार्मोनिक मोशन की तरह हैं तो क्या उन्हें चक्कर कहा जा सकता है या क्या सिम्पल हार्मोनिक मोशन को केवल कोई घनचक्कर ही चक्कर कहेगा ? यही सब सोच सोच कर हम चकरा रहे हैं ।
घुघूती बासूती

गुरुवार, जून 28, 2007

हमारे चश्मे का फ्रेम !

क्या जमाना आ गया है, हर कोई हमारे चश्मे के फ्रेम के पीछे पड़ गया है । छोटे छोटे बच्चे (यही कोई २० से ४० वर्ष तक के ) भी हमारे फ्रेम के पीछे पड़े हैं । कोई कहता है मैडम, तो कोई दीदी, तो कोई आन्टी, तो कोई माँ, तो कोई मम्मा, "अपने चश्मे का फ्रेम बदल लो बड़े पुराने स्टाइल का है । " मतलब यह कि सम्बोधन बहुत तरह के पर सबका सुझाव एक ही । सो हम भी एक ही उत्तर दे देते हैं , " चश्मे का फ्रेम बदल लेंगे पर चेहरा तो वही पुराने स्टाइल का रहेगा । उसे तो नहीं बदल सकती ।" पर सच तो यह है कि हमने चश्मे का फ्रेम बदलने की दो बार नाकाम कोशिश की है ।
पहली बार तो चार घंटे की यात्रा केवल इसी प्रयोजन से की । हम राजकोट जाकर आँखों के डॉक्टर के पास गये यह सोच कर कि जब फ्रेम बदलना है तो आँखें भी दिखा ही लें , वैसे भी अपने स्वभाव के कारण हमें "आँखे दिखाने" के मौके कम ही मिलते हैं । जब हमने उन्हें आँखें दिखाईं तो उन्होंने तमाम तरह के टेस्ट भी कर डाले । एक टेस्ट में आँखों में ऐसी दवाई डाली कि उजाले में हम आँखें खोल ही नहीं पा रहे थे । राम राम करते सड़क पार की और चश्मे वाले की दुकान पर पहुँचे । सो ट्रायल व पसन्द के लिए हमें बिना नम्बर का चश्मा पहनाया गया । अब हमें तो चश्मे से ही दिख नहीं रहा था सो बिना नम्बर के से क्या दिखता ? बस दुकानदार की पसन्द का चश्मा लगवाकर घर आ गए । हमने आशा की थी कि उसकी पसन्द अच्छी रही होगी पर जब चश्मा लगाकर शीशे में देखा तो समझ आया कि उसकी पसन्द तो बाबा आदम के जमाने की है । इस बार दोहरी मार हम पर पड़ी क्योंकि हमने प्रोग्रेसिव लेंस लगवाए थे जिनकी कीमत ढाई हजार से ऊपर थी । चार वर्ष तक हम उस चश्मे को अपनी पसन्द बता झेलते रहे ।

जब मन सबसे "ये चश्मा बदल लो" सुन सुन कर थक गया तो हमने एक और प्रयास किया । अबकी बार हमने सोचा कि किसी बड़े व फैशनेबल शहर में चश्मा बनवाएँगे । सो जब हम पूना गए तब यह काम भी कर डाला । अबकी बार आँखों में दवाई और फ्रेम की पसन्द का कार्यक्रम अलग अलग दिन रखा । अपनी धूप में न चुँधियाती आँखों के साथ देखते हम पूरे आत्मविश्वास के साथ चश्मे की दुकान पर गए । पर जब दुकानदार ने खाली फ्रेम ट्राई करने को दिया और शीशा हमारे सामने कर दिया तो हमने पाया कि बिन लेंस के तो सबकुछ धुँधला दिख रहा था । हमने उसे उतारा और अपना पहन कर उस फ्रेम को देखा , वह हमें ठीकठाक ही दिख रहा था । कठिनाई यह थी कि यदि हमें दिखाई देता था तो हम नया फ्रेम नहीं पहन सकते थे और यदि नया फ्रेम पहनते तो दिखता नहीं था । इसबार हमने दुकान में काम करने वाली महिला की पसन्द पर चलने का निर्णय किया । अबकी बार तीन हजार रूपये खर्च कर हम फिर किसी और की पसन्द का चश्मा ले आए । पर हाय री किस्मत ! इस महिला की पसन्द तो राजकोट वाले दुकानदार से भी घटिया निकली । अब फिर हम चार साल से उसकी पसन्द अपनी कह कर झेल रहे हैं ।
अबकी बार सोचती हूँ कि पहले सस्ते से कॉन्टेक्ट लेंस लगवाऊँगी और फिर चश्मा ! पर कोई मुझे बता सकता है कि बिन चश्मे के मैं कॉन्टेक्ट लेंस कैसे लगाऊँगी । कई दिनों से इसी समस्या के समाधान पर लगी हूँ । मुझे तो एक ही रास्ता नजर आता है । वह है कि दो चश्मे ऐसे बनवाऊँ जिनमें एक में बाँई तरफ ही लेंस हो और दूसरे में केवल दाँई तरफ । फिर मैं बाँई तरफ लेंस ..वाले चश्मे से दाँई आँख में कॉन्टेक्ट लेंस लगाऊँगी और दाँई तरफ फ्रेम वाले से बाँई तरफ । जब दोनों कॉन्टेक्ट लेंस लग जाएँगे तो चश्मे की दुकान पर जाकर फ्रेम पसन्द करूँगी ।
फ्यू ! यह तो बहुत ही टेढ़ा काम लगता है अतः शायद मैं इसी फ्रेम से काम चला लूँगी । पर आप सबको याद रखना है कि यदि मैं ब्लॉगर्स मीट में आई तो कोई मेरे फ्रेम के बारे में कुछ नहीं कहेगा ।" हाँ .....................
घुघूती बासूती

सोमवार, जून 25, 2007

भय............है किसी के पास इसका उत्तर ?(एक किस्सा)

वह निर्भय थी । भय क्या होता है, उसने कभी नहीं जाना था । ना उसे अन्धेरे से भय लगता था, ना साँप या बिच्छू से । छात्रावास में जब साँप या बिच्छू निकलता तो वही उन्हें मारती या भगाती थी । ना उसे भूत प्रेत का भय था ना अकेले रहने से । बिल्कुल नए शहर में भी वह नए मकान में रात को अकेले रह जाती थी । सभी उसके साहस की दाद देते थे । उसकी बड़ी बहन तो यहाँ तक कहती थी कि काश मुझे थोड़ा कम डर लगता और इसे थोड़ा सा डर तो होता । जिस लड़की ने सदा अपने निर्णय स्वयं लिए , जिसे ना परिणामों का डर था ना कठिन रास्ते का । जिसने जो उसे सही लगा सदा वही किया, वह आज कैसे डर गई ?
हुआ यूँ कि वह मुम्बई शहर में नई नई गई थी । वहाँ गई भी अकेली थी । बिना किसी की सहायता के वह रोज लोकल ट्रेन से सफर कर रही थी । वह दिन भी और दिनों सा था । कुछ नया या अलग नहीं था । स्टेशन पर ट्रेन आई व वह उसमें चढ़ गई । उसे अजीब या कुछ गलत तब लगा जब कोई और उस डिब्बे में नहीं चढ़ा । तभी कुछ लोग चिल्लाने लगे कि उतरो उतरो, यह ट्रेन तो यार्ड में जा रही है । इतने में ट्रेन चल पड़ी । उसके पास बस एक क्षण था निर्णय लेने का । या छलांग लगाए या यार्ड पहुँच जाए । उस एक क्षण में उसे लगा यार्ड जाना याने शायद वहाँ अकेली स्त्री होना व शायद बलात्कार की संभावना और छलांग लगाना याने मरना या घायल होना । बस चलती ट्रेन से उसने छलांग लगा दी । भाग्य से जान बच गई बस कुछ चोटें ही आईं पर सबसे बड़ी चोट उसके अहम् व उसकी निर्भयता को लगी ।
रात को जब उसने घर फोन किया तो वह पिता को पूरी बात बताती रही तथा चेन खींचने का खयाल न आने के कारण स्वयं पर हँसती रही । पिता भी तसल्ली देते रहे और मजाक करते रहे कि अभी तो जेब कटने, मोबाइल चोरी होने का अनुभव बाँकी है । जब तक यह सब ना हो तो मुम्बई का अनुभव अधूरा है । फिर उसने माँ से बात की । माँ उसके दर्द को अनुभव कर रही थी । पर उसका दर्द चोट का नहीं था । वह रो रही थी और कह रही थी, "माँ आज मैंने जाना कि स्त्री होने की क्या हानि है । मैंने कभी भी स्वयं को कमजोर नहीं समझा था । मुझे कभी भी भय नहीं लगा था । इस भय को मैंने पहली बार जाना । क्या यह भय स्त्री में नैसर्गिक होता है ? माँ , उस एक पल में मैं कल्पना कर सकी कि केवल पुरुषों की उपस्थिति में उस यार्ड में मेरे साथ क्या हो सकता था । और वह कल्पना इतनी भयानक थी कि मैंने चलती गाड़ी से छलांग लगा मरना या घायल होना बेहतर समझा । माँ यह नग्न भय था । भय अपने सबसे खूँखार रूप में । इस भय में कोई मिलावट या सोचने जैसा कुछ नहीं था । माँ मैं ऐसे भय के जीवन से घृणा करती हूँ । माँ यह उचित नहीं है, यह न्याय नहीं है । मुझे भय केवल इसलिए लगा कि मैं स्त्री हूँ । यदि पुरुष होती तो न डरती । माँ मैं इस संवेदना से घृणा करती हूँ । मैं ऐसा जीवन नहीं जीना चाहती जिसमें भय हो । ओह माँ, मैं उस संवेदना के बारे में सोच कर ही सिहर जाती हूँ । माँ, मुझे स्त्री क्यों बनाया तुमने ? यदि पुरुष मुझमें ऐसी भावना जगा सकते हैं तो मुझे पुरुष पसन्द नहीं । मैं कभी किसी पुरुष को जन्म नहीं दूँगी । हम ही उन्हें जन्म दें और फिर उन्हीं से डरें । जिसे तुमने जन्म दिया उससे तुम कैसे डर सकती हो ? क्या तुमने कभी इस डर का अनुभव किया ? यदि किया था तो मुझे भी इसे झेलने को जन्म क्यों दिया तुमने ? बचपन में जब क्षत्राणियों द्वारा जौहर को उनकी वीरता, उनकी महानता के रूप में पढ़ती थी तो बहुत आश्चर्य होता था कि यह क्या तुक हुई । पर माँ आज मैं उनके जौहर को समझ सकती हूँ । बलात्कार या मृत्यु की संभावना में से मैंने भी मृत्यु की संभावना को चुना । क्यों माँ, यह गलत है । मैंने तो पढ़ा था कि जीने की चाह ही स्वाभाविक है । तो फिर स्त्री के लिए यह अलग कैसे हो गया ? क्यों जीने की स्वाभाविक चाह मृत्यु से हार गई ?"
माँ क्या उत्तर देती ? है किसी के पास इसका उत्तर ?
घुघूती बासूती

मंगलवार, जून 12, 2007

वर्षा तुम जल्दी आना

फिर से काले बादल छाए हैं
जल गगरी भर भर लाए हैं,
बादल गरजे,बिजली चमके
अम्बर दमके,धरती महके ।

प्यासी धरती, प्यासी नदिया
सूखे तरू, सूखी बगिया,
सब तेरी राह ही तकते हैं
सब जल बिन आज सिसकते हैं ।

आओ वर्षा अब तुम आओ
इस सृष्टि को तुम नहलाओ,
रंग भरो तुम फिर से जग में
उमंग जगाओ रग रग में ।

आओ जब तुम तो मैं नाचूँगी
तेरे जल में बच्ची बन मैं खेलूँगी,
छत पर इक ऐसा कोना है
वहीं पर तूने मुझे भिगोना है ।

देख नहीं कोई पाएगा
जान कोई नहीं पाएगा,
तुम और मैं फिर से खेलेंगे
तेरे संगीत पर पैर फिर थिरकेंगे ।

अबकी बार ना मैं रोऊँगी
बच्चों की याद में ना खोऊँगी,
पकड़ूँगी मैं तेरे जल के चमचम मोती
ना बोलूँगी काश जो साथ में बेटी होती ।

अकेले रास रचाऊँगी मैं
तेरे जल में खो जाऊँगी मैं,
देख तेरी और मेरी क्रीड़ा
भाग जाएगी मन की हर पीड़ा ।

अबकी ना नयनों नीर बहाऊँगी मैं
बस तेरे स्वागत में लग जाऊँगी मैं,
ना जाऊँगी यादों के गलियारों में
ना भटकूँगी फिर उन राहों में ।

बच्चों को इक पाती लिख दूँगी
तुम भी नाचो वर्षा में ये कह दूँगी,
वर्षा तुम जल्दी से आ जाना
मेरे तन मन को भिगा जाना ।

घुघूती बासूती

बुधवार, जून 06, 2007

हमारा कार पुराण

कार बेकार से सौ गुना, पैट्रोल खूब खाय,
जो चढ़ बैठे इस पर, मोटापा चढ़ जाए ।
आज तो लगता है, वह जो होता है ना अमेरिकी सकूलों में, क्या कहते हैं उसे अंग्रेजी में , हाँ शो एन्ड टेल, वह हमारे नारद जगत में चल रहा है । कोई कार ला रहा है कोई जूते तो कोई मेरे जैसा जिसे कार चलानी आती नहीं और जूते जिसके पाँव काट लेते हैं, अपनी गाथा ही लेकर आ जाता है ।
ऐसा है कि हमें बचपन से खुद को चलाने के सिवाय कुछ चलाना नहीं आता । बहुत छोटे थे तो तीन पहियों वाली , हाँ वही ट्राइसिकल चला लेते थे । उसके बाद हमने कुछ नहीं सीखा , न साइकल, ना स्कूटर, ना मोटर साइकल, ना कार, न बस । वैसे एक बार नैनीताल की झील में हमने चप्पू चलाकर नाव चलाई थी ।
वैसे मेरे पास भी बहुत कारें हैं, बहुत रंगों व साइज की, अलग अलग ब्राँड की और एक ठो कैमरा भी है । हम तो कैमरा ढूँढ ढाँढ कर, उसमें नए सैल भी डालकर फोटो लेने को तैयार थे पर सारी कारें नदारद । अब हम घँटो से ढूँढ रहे हैं पर कहीं नहीं मिल रहीं हैं । मन बड़ा उदास हो रहा है । इतनी सारी कारें जो खो गईं हैं । अब कोई रोज रोज तो कार नहीं खरीदता है । अरे पैसा कोई पेड़ पर तो लगता नहीं, ऊपर से हमने जीवन में एक धेला (यह क्या होता है किसी को पता है क्या ?) भी नहीं कभी कमाया है । अब पति से फिर से हमारे लिए कार खरीदने की माँग तो नहीं कर सकते । सो हम हैं कि ढूँढे जा रहे हैं ।
गैरेज में जाकर देख आए, एक भी नहीं है वहाँ । पुलिस में रिपोर्ट भी नहीं करा सकते क्योंकि एक तो हमें पुलिस से डर लगता है, दूसरे एक भी कार रजिस्टर नहीं करवाई थी, न ही कोई टैक्स वैक्स भरा था । तो अब लगता है यूँ ही कारों की चोरी को सहना पड़ेगा । सबसे बड़ी बात यह कि हमें केवल ये कारें ही चलाना आता था । सैकड़ों का नुकसान अलग । हाँ, भई सैकड़ों का ।
दरसल ये सब कारें हमारी बच्चियों की थीं । उनके बचपन में खरीदी थीं । उनके साथ खेलते समय हम भी खूब चलाते थे । अब मन बहुत उदास है । चलो यह पोस्ट खतम करके कुछ और बक्सों में ढूँढते हैं, शायद मिल जाएँ । मुझे याद है एक चॉकलेट के खाली डिब्बे में सब की सब रखी थीं ।
घुघूती बासूती

ब्लॉगिंग में भी आरक्षण हो

हाँ भाई जब सब जगह आरक्षण हो रहा है तो ब्लॉगिंग में क्यों नहीं ? यह भी कोई बात हुई कि एक ही ब्लॉगर एक ही दिन में तीन चार पोस्ट लिख दे और कोई बेचारा तीन चार दिन बाद भी पोस्ट लिखे तो इन दनादन लिखने वालों के चलते आधे दिन में ही पन्ने से बाहर हो जाए । यह तो बहुत अन्याय है । सबको बराबर अधिकार मिलने चाहिये । कम लिखने वालों को तो विशेष अधिकार मिलने चाहिये । उसपर भी टिप्पणी लिखने वालों को,( समीर भाई की तो बाँछे खिल गईं ) तो दो तीन दिन तक अपनी पोस्ट यहीं मुख्यपृष्ठ पर अटकाए रखने की अनुमति मिलनी चाहिये ।
अब हम जैसे लोग तो मस्तिष्क को खपा पका कर एक कविता लिखते हैं और फिर जब तक अगली नहीं लिख लेते चुप बैठ जाते हैं और अच्छे बच्चों की तरह दूसरों की रचनाओं पर टिप्पणी करते रहते हैं । पर कुछ मित्र चार चार पोस्ट एक दिन में डाल देते हैं । भाई इतनी सामग्री लाते कहाँ से हैं । हमें भी यह राज बताया जाए । हम उनकी कोचिंग क्लासेज में आने के लिए तैयार हैं । कुछ मित्र तो बस चार पंक्तियाँ लिखकर एक नयी पोस्ट रच देते हैं । चार पोस्ट सब चार पंक्ति की ! अब ये सोलह पंक्तियाँ एक ही पोस्ट में भी डाली जा सकती हैं ।
यह सब देखकर हम तो आरक्षण की माँग कर रहे हैं । १५ प्रतिशत आरक्षण महिलाओं के लिए , १५ प्रतिशत ५० साल से ऊपर वालों के लिए, १५ प्रतिशत कविता लिखने वालों के लिए, १५ प्रतिशत पक्षियों के नाम वालों के लिए , १५ प्रतिशत विवाहितों के लिए , १५ प्रतिशत दो बच्चों वालों के लिए , अरे अभी तो और भी माँगे बाँकी थीं पर अब तो केवल १० प्रतिशत बचा है सो ये बाँकी लोगों के लिए ! वे भी क्या याद रखेंगे किस दरियादिल से पाला पड़ा था । तो भइया अपन तो छः श्रेणियों में आरक्षित हैं सो हम एक दिन में छः पोस्ट डाल सकते हैं । अब हम छः पोस्ट तो लिख नहीं पाएँगे तो छः टिप्पणियों के बदले किसी भी ब्लॉगर को अपनी बारी देने को तैयार हैं । आप भी जल्दी से कतार में खड़े हो जाइये । केवल पाँच पोस्ट का कोटा बचा है ।
मेरी वॉइस मेल तो बंद ही नहीं हो रही । तीन पोस्ट तो गईं । अब केवल आखिरी दो बची हैं, तो भाई लोगो , लगाओ बोली !
घुघूती बासूती

शुक्रवार, जून 01, 2007

दीये अब नहीं चाहिए

कितनी बार हो चुका यह
जलते दीये में मैंने उजाला ढूँढा था
पर हर बार जब मेरी आँखें
उजाले की आदी हो गईं
जब मैं अँधेरे को भूल गई
तुम अपना दीया लेकर चले गए ।

तुम आखिरी वह दीया थे
जिससे मैंने उजाला चाहा था
अब सोच लिया है ए दोस्त
उजालों से न अपना रिश्ता है
अब कितने ही दीयें आएँ राहों में
मैं अपने अँधियारों में ही घूमूँगीं ।

रखो तुम अपने उजालों को अपने पास
अब ना लाना उजालों की सौगात
मुझे न अब इनकी कोई चाहत है
जीते हैं बहुत से लोग बिन रौशनी के
मैं भी उनकी जमात में अब शामिल हूँ
इन अँधेरों में ही पाना मुझे साहिल है ।

ना चाहिए मुझे तुम्हारा साथ
ना चाहिए मुझे तुम्हारा प्रकाश
अब न तुम कभी मेरी राहों में आना
आ भी जाओ तो न मुझे बुलाना
मैं अपने अँधेरों में ही जी लूँगी
दीयों बिन ही गंतव्य पा लूँगी ।

घुघूती बासूती