नोट: यह लेख रियाजुल हक़ जी के लेख हम असहिष्णु समाज का हिस्सा नहीं हो सकते पर टिप्पणी के रूप में लिखा गया है ।
सही कह रहे हैं आप। मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ। बस एक कमी रह गई है, उस पर भी ध्यान दें तो लेख पूरा हो जाएगा व धर्म, जाति, प्रान्त निरपेक्ष भी हो जाएगा । इस विषय में हजरत जी के कार्टून बनाने वालों का विरोध करने वालों, सलमान रुशदी की सैटानिक वर्सेज पर पाबंदी लगाने वाली सरकार (वह हिन्दुत्व वाली न थी), डेरा सच्चा सौदा का विरोध करने वालों, डा विंसी कोड फिल्म का विरोध करने वालों के भी नाम आते तो हमें लगता आप सभी असहिष्णुओं के कान समान रूप से उमेठते हैं। तब शायद हमारे कान यह दर्द आसानी से सह लेते। हम तो अपने कान स्वयं ही उमेठ लेते हैं और दूसरों के छोड़ देते हैं, सो अब आप बाँकी सबके कान भी उमेठिये तब हमारे कानों को कुछ राहत मिलेगी। आजकल वे कुछ अधिक ही खींचे जा रहे हैं कुछ अपने हाथों व कुछ बाँकी संसार के हाथों।
जहाँ तक गुजरात का प्रश्न है तो वह कक्षा के उस शरारती बच्चे जैसा हो गया है जो इतना बदनाम हो गया है कि शरारत कोई भी करे, दो धौल उसे जमाकर शिक्षक अपने अनुशासन की इति समझ लेता है। ऐसा सब करते समय लोग दिल्ली व आधे उत्तर भारत को भूल जाते हैं जहाँ एक नेता की हत्या के लिए हजारों सिक्खों को मार दिया गया था। क्यों बार-बार उस बर्बरता को याद नहीं किया जाता? अब जब गुजरात पर ऊँगली उठाइये तो यह न भूलियेगा कि राजधानी की तरफ तीन ऊँगलियाँ उठ रही हैं। याद रखिये इसी गुजरात ने एक पूरे के पूरे धर्म को तब अपने यहाँ शरण दी जब किसी और धर्म वाले उन धर्मावलम्बियों को उन्हीं के अपने देश में अपना धर्म का पालन करते हुए जीने नहीं दे रहे थे। हाँ, मैं पारसियों की बात कर रही हूँ। यदि गुजराती सहिष्णु न होते तो आज पारसियों का नामों निशां संसार से मिट गया होता। यदि यह बात पुरानी है तो फिर मनु की बात, खजुराहो की बात भी पुरानी है। अवगुणों के साथ गुण भी याद रखिये।
बुरा बुरा ही होता है, चाहे इसका नाम न.मो. हो या रा.गाँ, चाहे वे हिन्दुत्व वाले हों या काँग्रेसी या किसी और दल के या किसी और धर्म के। गाँव व मोहल्लों में टी.वी. देखने पर पाबंदी लगाने वालों का भी नाम आना चाहिये, स्त्रियों को जबरन सिर या मुँह ढकने पर मजबूर करने वालों की भी भर्त्सना होनी चाहिये। तभी सिद्ध होगा कि आप सब असहिष्णुओं का विरोध करते हैं।
-घुघूती बासूती
पुनःश्च: टी वी पर समाचार दिखाया जा रहा था कि किसी नए नाम वाली हिन्दुओं की रक्षा करने वाली संस्था, गुट या जो भी हो, ने नामों की एक लिस्ट जारी की है, (लगता है खुमैनी से सीखे हैं, नहीं-नहीं कार्टून वाले किस्से से सीखे हैं), लिस्ट में दिये लोगों को मारने पर २५ लाख रूपये मिलेंगे। लेने किसके पास जाना है यह पता नहीं दिया। अब तो हमारे कानों की क्या, नाक की भी खैर नहीं। चलिये लग जाइये मरोड़ने!
- घुघूती बासूती
Wednesday, May 23, 2007
Monday, May 21, 2007
मैं जी लूँगी
मैं जी लूँगी
मैं जी लूँगी ऐसे ही
ना होने दूँगी तुमको आभास,
तुम ना चाहो तो
ना निकलेगा इक निःश्वास ।
यूँ ही अकेली जी लूँगी
ना लूँगी तुम्हारा आभार,
मैं पी लूँगी आँसू अपने
ना माँगूगी तुमसे प्यार ।
घोर अंधेरे में रह लूँगी
ना माँगूगी तुमसे थोड़ा सा प्रकाश,
यूँ ही तकती नभ को रहूँगी
चाहे खाली रह जाए मेरा आकाश ।
खाली घर में जीऊँगी पर
ना माँगूगी कभी तेरा साथ,
रीते मन को बहला लूँगी
पर ना फैलाऊँगी अपना हाथ ।
चाहे ये दीवारें मुझे चिढ़ाएँ
जीना हो जाए दुःश्वार,
सूना सा यह घर मुझे सताए
फीका सा लगे संसार ।
घुटे हुए इस जीवन को जीऊँगी
ना मानूँगी जीवन से हार,
हँस हँस कर ऐसे जीऊँगी
ना जानोगे तुम दिल का भार ।
जा अतीत में बस जाऊँगी
यादों को लगा गले से,
आँसू के मोती पिरोऊँगी
ना माँगूगी कुछ भी तुमसे ।
साँय साँय करते सन्नाटों में
मैं बीते पल की गूँज सुनूँगी,
नाग सी डसती इस विरहा में
अपने दिल की हूक सुनूँगी ।
जीवन चाहे कितना एकाकी हो
उसे वसन्त सा मैं जीऊँगी,
तुझ तक रस्ते चाहे कठिन हों
मैं तुझ तक राह बनाऊँगी ।
चाहे कितने झंझावत आएँ
मैं करूँगी तुझसे प्यार,
चाहे जो भी हो जाए
ना जाऊँगी कभी उस पार ।
घुघूती बासूती
मैं जी लूँगी ऐसे ही
ना होने दूँगी तुमको आभास,
तुम ना चाहो तो
ना निकलेगा इक निःश्वास ।
यूँ ही अकेली जी लूँगी
ना लूँगी तुम्हारा आभार,
मैं पी लूँगी आँसू अपने
ना माँगूगी तुमसे प्यार ।
घोर अंधेरे में रह लूँगी
ना माँगूगी तुमसे थोड़ा सा प्रकाश,
यूँ ही तकती नभ को रहूँगी
चाहे खाली रह जाए मेरा आकाश ।
खाली घर में जीऊँगी पर
ना माँगूगी कभी तेरा साथ,
रीते मन को बहला लूँगी
पर ना फैलाऊँगी अपना हाथ ।
चाहे ये दीवारें मुझे चिढ़ाएँ
जीना हो जाए दुःश्वार,
सूना सा यह घर मुझे सताए
फीका सा लगे संसार ।
घुटे हुए इस जीवन को जीऊँगी
ना मानूँगी जीवन से हार,
हँस हँस कर ऐसे जीऊँगी
ना जानोगे तुम दिल का भार ।
जा अतीत में बस जाऊँगी
यादों को लगा गले से,
आँसू के मोती पिरोऊँगी
ना माँगूगी कुछ भी तुमसे ।
साँय साँय करते सन्नाटों में
मैं बीते पल की गूँज सुनूँगी,
नाग सी डसती इस विरहा में
अपने दिल की हूक सुनूँगी ।
जीवन चाहे कितना एकाकी हो
उसे वसन्त सा मैं जीऊँगी,
तुझ तक रस्ते चाहे कठिन हों
मैं तुझ तक राह बनाऊँगी ।
चाहे कितने झंझावत आएँ
मैं करूँगी तुझसे प्यार,
चाहे जो भी हो जाए
ना जाऊँगी कभी उस पार ।
घुघूती बासूती
Saturday, May 19, 2007
एक और कायर ?
कायर....२
इस कविता में भी मैं एक आत्महत्या के विषय में लिख रही हूँ । मैं आत्महत्या को बिल्कुल भी सही नहीं मानती । यह गलत है । हर हाल में गलत है । एक जीवन को समाप्त करना, चाहे वह अपना ही क्यों न हो, विशेषकर, तब जब यह जीवन सम्भावनाओं से भरा हुआ हो, सर्वथा गलत है । किन्तु मैं उन परिस्थितियों के बारे में लिखना चाहती हूँ जो किसी को ऐसा कदम उठाने की तरफ बढ़ने में सहायता करते हैँ । थोड़ा सा सहारा, थोड़ा सा सकारात्मक रवैया शायद उन्हें ऐसा करने से रोक दे । तब भी कुछ लोग बिना किसी को अपना दुख बताए शायद जीवन समाप्त कर लें, तब शायद कोई भी उनकी सहायता न कर सके । किन्तु अधिकतर मामलों में लोग मरना नहीं चाहते । वे मृत्यु को तभी चुनते हैं जब उन्हें सारे रास्ते बंद नजर आते हैं । जब वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपनों से सहायता माँग चुके होते हैं और जब उन्हें विश्वास हो जाता है कि कोई उनकी सहायता नहीं करेगा विशेषकर उनके अपने ।
यहाँ पर मैं एक विवाहिता नवयौवना की पीड़ा के विषय में लिख रही हूँ । उसे अपने पति या ससुराल से क्या शिकायत थी लिखना कोई आवश्यक नहीं है । आप स्वयं ही कयास लगा सकते हैं । जो अधिक महत्वपूर्ण है वह है उसके अपनों का उसके प्रति संवेदना रहित व्यवहार !वह केवल थोड़ा सा सहारा चाहती थी ..........
मैंने चाहा था हँसकर जीना
जीवन मेरा हो गया दुश्वार
बहती जलधारा सी मैं थी
मैं बन गई बांध बंधी धार
जितना मैंने उड़ना चाहा
पंख मेरे थे उसने कतरे
माँ से भी मैं बोली थी
अब ऐसे ना जी पाऊँगी
आ माँ, मुझे ले जा ले आकर
जीवन मेरा बना अंगार
कहती थी वह बिटिया मेरी
कैसे भी निभा तू लेना
अब ना वापिस तुझे ला पाऊँगी
मेरी भी तू सोच कुछ
कैसे समाज में मुख दिखलाऊँगी ।
सारे रास्ते जब बंद हो गए
जीवन से थी मैंने पाई हार
सुलगा कर इक माचिस को मैंने
करना चाहा जीवन उद्धार
मरने पर तो सब जलते हैं
पर मैं बन गई जीती मशाल ।
आज मुझे कायर तुम कहते हो
कहाँ गई थीं कल ये सब बात
मैंने भी था जीवन जीना चाहा
पर ना जीने देते थे हालात
ओ बड़ी बातें करने वालो
क्या तुम दे पाते मेरा साथ
तुम जलती माचिस को छू लो
फिर देना मुझे उपदेश
ओ मुझे कायर कहने वालो
क्या जानो तुम दर्द मेरा
कैसे होता है मन इतना पीड़ित
कि जीवन ज्योति बुझा हम पाते
तुमने तो दुनिया देखी है
क्यों न मुझे तुम लौटा थे लाते ।
इतना ही तो मैंने चाहा था
कुछ ऐसा हो जाए कि मैं
कर पाऊँ नवजीवन की शुरुआत
कुछ दिन मुझे सबल बनाते
अपने घर में मुझे ठहराते
मेरे घावों पर मरहम लगाते
फिर मैं नई राह निकलती
अपनी मंजिल खुद पा लेती ।
सुलग रही जब आत्मा चिता सी मेरी
क्यों तुम ना थे तब आग बुझाते
देखो मैं हवन कुंड बन गई
जवित हूँ पर भूत बन गई
पोर पोर में होती पीड़ा
बाल मेरे हैं झुलसाए
अब तो मेरे अपने भी
मुझसे हैं आँख चुराएँ ।
कुछ घंटों या दिन की ये पीड़ा
जीवन पर्यन्त सुलगने से बेहतर
मन आत्मा की पीड़ा के बदले
जलने की पीड़ा को गले लगाया
नारकीय जीवन से मुक्ति दिलाए
वह मृत्यु ही अब मुझे है भाए ।
जीने की हुईं खतम लालसा
मरने की थी बेला आई
जीने के इस अद्भुत खेल में
हार सदा से मैं पाती आई
अब तुम जाओ रपट लिखाओ
मेरे मरने का केस बनाओ
जीते जी ना साथ दे सके
अब मरने पर रस्म निभाओ ।
घुघूती बासूती
इस कविता में भी मैं एक आत्महत्या के विषय में लिख रही हूँ । मैं आत्महत्या को बिल्कुल भी सही नहीं मानती । यह गलत है । हर हाल में गलत है । एक जीवन को समाप्त करना, चाहे वह अपना ही क्यों न हो, विशेषकर, तब जब यह जीवन सम्भावनाओं से भरा हुआ हो, सर्वथा गलत है । किन्तु मैं उन परिस्थितियों के बारे में लिखना चाहती हूँ जो किसी को ऐसा कदम उठाने की तरफ बढ़ने में सहायता करते हैँ । थोड़ा सा सहारा, थोड़ा सा सकारात्मक रवैया शायद उन्हें ऐसा करने से रोक दे । तब भी कुछ लोग बिना किसी को अपना दुख बताए शायद जीवन समाप्त कर लें, तब शायद कोई भी उनकी सहायता न कर सके । किन्तु अधिकतर मामलों में लोग मरना नहीं चाहते । वे मृत्यु को तभी चुनते हैं जब उन्हें सारे रास्ते बंद नजर आते हैं । जब वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपनों से सहायता माँग चुके होते हैं और जब उन्हें विश्वास हो जाता है कि कोई उनकी सहायता नहीं करेगा विशेषकर उनके अपने ।
यहाँ पर मैं एक विवाहिता नवयौवना की पीड़ा के विषय में लिख रही हूँ । उसे अपने पति या ससुराल से क्या शिकायत थी लिखना कोई आवश्यक नहीं है । आप स्वयं ही कयास लगा सकते हैं । जो अधिक महत्वपूर्ण है वह है उसके अपनों का उसके प्रति संवेदना रहित व्यवहार !वह केवल थोड़ा सा सहारा चाहती थी ..........
मैंने चाहा था हँसकर जीना
जीवन मेरा हो गया दुश्वार
बहती जलधारा सी मैं थी
मैं बन गई बांध बंधी धार
जितना मैंने उड़ना चाहा
पंख मेरे थे उसने कतरे
माँ से भी मैं बोली थी
अब ऐसे ना जी पाऊँगी
आ माँ, मुझे ले जा ले आकर
जीवन मेरा बना अंगार
कहती थी वह बिटिया मेरी
कैसे भी निभा तू लेना
अब ना वापिस तुझे ला पाऊँगी
मेरी भी तू सोच कुछ
कैसे समाज में मुख दिखलाऊँगी ।
सारे रास्ते जब बंद हो गए
जीवन से थी मैंने पाई हार
सुलगा कर इक माचिस को मैंने
करना चाहा जीवन उद्धार
मरने पर तो सब जलते हैं
पर मैं बन गई जीती मशाल ।
आज मुझे कायर तुम कहते हो
कहाँ गई थीं कल ये सब बात
मैंने भी था जीवन जीना चाहा
पर ना जीने देते थे हालात
ओ बड़ी बातें करने वालो
क्या तुम दे पाते मेरा साथ
तुम जलती माचिस को छू लो
फिर देना मुझे उपदेश
ओ मुझे कायर कहने वालो
क्या जानो तुम दर्द मेरा
कैसे होता है मन इतना पीड़ित
कि जीवन ज्योति बुझा हम पाते
तुमने तो दुनिया देखी है
क्यों न मुझे तुम लौटा थे लाते ।
इतना ही तो मैंने चाहा था
कुछ ऐसा हो जाए कि मैं
कर पाऊँ नवजीवन की शुरुआत
कुछ दिन मुझे सबल बनाते
अपने घर में मुझे ठहराते
मेरे घावों पर मरहम लगाते
फिर मैं नई राह निकलती
अपनी मंजिल खुद पा लेती ।
सुलग रही जब आत्मा चिता सी मेरी
क्यों तुम ना थे तब आग बुझाते
देखो मैं हवन कुंड बन गई
जवित हूँ पर भूत बन गई
पोर पोर में होती पीड़ा
बाल मेरे हैं झुलसाए
अब तो मेरे अपने भी
मुझसे हैं आँख चुराएँ ।
कुछ घंटों या दिन की ये पीड़ा
जीवन पर्यन्त सुलगने से बेहतर
मन आत्मा की पीड़ा के बदले
जलने की पीड़ा को गले लगाया
नारकीय जीवन से मुक्ति दिलाए
वह मृत्यु ही अब मुझे है भाए ।
जीने की हुईं खतम लालसा
मरने की थी बेला आई
जीने के इस अद्भुत खेल में
हार सदा से मैं पाती आई
अब तुम जाओ रपट लिखाओ
मेरे मरने का केस बनाओ
जीते जी ना साथ दे सके
अब मरने पर रस्म निभाओ ।
घुघूती बासूती
Tuesday, May 15, 2007
कायर
कितना सरल है किसी को बुजदिल कह देना ! कभी मृत्यु को करीब से देखा है ? कभी हाथ में विष उठाया है ? कभी गले में फंदा डाल अपने आप से बहस की है ? कभी मरना चाहकर भी अपने परिवार के बारे में सोचकर मरने का कार्यक्रम स्थगित या रद्द किया है ? जिस जान से ९० साल के अधमरे बीमार वृद्ध तक चिपके रहते हैं उसी जान को जब कोई किशोर एक झटके में दे डालता है तो उसकी मनःदशा क्या रही होगी ? बस वह पल यदि निकल जाता तो कल वह फिर युद्ध में जूझने को निकल पड़ता । सोचो कहाँ हम माता पिता में कमी रह गई ? कहाँ हमारी शिक्षा प्रणाली में कमी रह गई ? क्यों हम अपने बच्चों को आश्वस्त नहीं कर सके कि जो भी हो ,सफल रहें या असफल, हर हाल में वे हमारे पास वापिस आ सकते हैं और नए सिरे से जीवन आरम्भ कर सकते हैं , कि हम उन पर अपनी जजमेंट नहीं पास करेंगे, कि जीवन बहुत बड़ा और लम्बा है, कि एक जगह असफल भी रहो या आइ आइ टी जैसी जगह को भी छोड़कर यदि तुम कुछ और करना चाहोगे तो भी हम तुम्हारे साथ हैं ?
इन प्रश्नों के उत्तर ढूँढो । बच्चों पर जजमेंट न पास करो ।
बस इन्हीं भावों को लिए कविताएँ रच डालीं । आज एक प्रस्तुत है शेष फिर पोस्ट करूँगी ।
घुघूती बासूती
कायर
१
मुझे कायर कहने वालो
मेरा जीवन जीकर देखो
बस इक झलक देख ही
मेरे जीवन की शायद
तुम इतना घबरा जाओगे
मेरे जीवन में न तुम
कभी वापिस आ पाओगे,
आओ तुमको भी अपने
मरने की झलक दिखाऊँ
आओ देखो तुम भी आकर
मुझे ए कायर कहने वालो ।
देखो कैसे हो जाता है जीवन बेमानी
कैसे फिर जाता है आशाओं पर पानी
कैसे इक बालक की दी जाती कुर्बानी
कैसे माता पिता ने न मेरी इच्छा जानी ।
मैंने बनना चाहा था इक चित्रकार
पर मुझे पकड़ाए चीर फाड़ के औजार
कितना मैंने उनको समझाना चाहा
सुन्दर चित्र अपने दिखाए बारम्बार
पर वे ना माने मेरे दिल की बात
पढ़ने को कहते थे मुझे वे दिनरात
पहुँच गया मैं पूरे करने उनके सपने
वे सपने जो ना थे मेरे कभी अपने ।
हाथ में चाकू था मुँह में उबकाई
कितना कहा था पापा से मैंने,
बात पर उन्हें नहीं समझ में आई,
उस दिन हद हो गई जब मृत स्त्री
एक काटने को मुझे पकड़ाई
मेरे सपनों में भी वह आती थी
कैसे काटूँ उसको मैं
चीर फाड़ ना कभी मुझे भाई
रात रात ना सो पाता था
उसका चेहरा नजर आता था
लिखा पत्र पापा को मैंने
ना होगी मुझसे ये पढ़ाई
वे बोले बेटा कैसे भी हो
तुम कर लो अपनी पढ़ाई
मेरा बेटा डॉक्टर होगा तो
देखो कितनी होगी बड़ाई
ना पूरी करो जो तुम शिक्षा
कितनी होगी जग हँसाई ।
उस दिन हाथ मेरे काँप रहे थे
कितनी सबने थी हँसी उड़ाई
फिर से मैं था बोला पापा
मैं न बन सकूँगा कभी कसाई
पर पापा बोले बन जा तू डॉक्टर
इसमें ही तेरी और हमारी भलाई
भाग गया था मैं अपने घर
पर फुसलाकर भेजा मुझको वापिस
ना झेल सका यह सब मैं जब
तब अपने गले में डाली रस्सी
उसमें मैंने मजबूत गाँठ लगाई
खिसका दी कुरसी पैरों से
जीभ मेरी थी बाहर आई
डाल कर देखो इक पल फंदा
या फिर इक उँगली को ही
तुम कस लो रबर बैंड से
और देखो कितना कष्ट
है इसमें ओ मेरे भाई
जीना मैंने भी चाहा था
पर ना इन शर्तों पर
मैंने जीना चाहा
बन चित्रकार जी तो लेता
पर यह काटम काट न
कभी मुझे भाई ।
सो अन्त हुआ मेरे जीवन का
बिना चाहत अपनी पूरी कर
मुक्ति है आशाओं से मैंने पाई
ओ मुझपर व्यंग्य करने वालो
आओ मेरा जीवन जी लो
छोड़ गया हूँ स्वप्न अधूरे
आओ कुछ तो तुम भी जी लो ।
घुघूती बासूती
इन प्रश्नों के उत्तर ढूँढो । बच्चों पर जजमेंट न पास करो ।
बस इन्हीं भावों को लिए कविताएँ रच डालीं । आज एक प्रस्तुत है शेष फिर पोस्ट करूँगी ।
घुघूती बासूती
कायर
१
मुझे कायर कहने वालो
मेरा जीवन जीकर देखो
बस इक झलक देख ही
मेरे जीवन की शायद
तुम इतना घबरा जाओगे
मेरे जीवन में न तुम
कभी वापिस आ पाओगे,
आओ तुमको भी अपने
मरने की झलक दिखाऊँ
आओ देखो तुम भी आकर
मुझे ए कायर कहने वालो ।
देखो कैसे हो जाता है जीवन बेमानी
कैसे फिर जाता है आशाओं पर पानी
कैसे इक बालक की दी जाती कुर्बानी
कैसे माता पिता ने न मेरी इच्छा जानी ।
मैंने बनना चाहा था इक चित्रकार
पर मुझे पकड़ाए चीर फाड़ के औजार
कितना मैंने उनको समझाना चाहा
सुन्दर चित्र अपने दिखाए बारम्बार
पर वे ना माने मेरे दिल की बात
पढ़ने को कहते थे मुझे वे दिनरात
पहुँच गया मैं पूरे करने उनके सपने
वे सपने जो ना थे मेरे कभी अपने ।
हाथ में चाकू था मुँह में उबकाई
कितना कहा था पापा से मैंने,
बात पर उन्हें नहीं समझ में आई,
उस दिन हद हो गई जब मृत स्त्री
एक काटने को मुझे पकड़ाई
मेरे सपनों में भी वह आती थी
कैसे काटूँ उसको मैं
चीर फाड़ ना कभी मुझे भाई
रात रात ना सो पाता था
उसका चेहरा नजर आता था
लिखा पत्र पापा को मैंने
ना होगी मुझसे ये पढ़ाई
वे बोले बेटा कैसे भी हो
तुम कर लो अपनी पढ़ाई
मेरा बेटा डॉक्टर होगा तो
देखो कितनी होगी बड़ाई
ना पूरी करो जो तुम शिक्षा
कितनी होगी जग हँसाई ।
उस दिन हाथ मेरे काँप रहे थे
कितनी सबने थी हँसी उड़ाई
फिर से मैं था बोला पापा
मैं न बन सकूँगा कभी कसाई
पर पापा बोले बन जा तू डॉक्टर
इसमें ही तेरी और हमारी भलाई
भाग गया था मैं अपने घर
पर फुसलाकर भेजा मुझको वापिस
ना झेल सका यह सब मैं जब
तब अपने गले में डाली रस्सी
उसमें मैंने मजबूत गाँठ लगाई
खिसका दी कुरसी पैरों से
जीभ मेरी थी बाहर आई
डाल कर देखो इक पल फंदा
या फिर इक उँगली को ही
तुम कस लो रबर बैंड से
और देखो कितना कष्ट
है इसमें ओ मेरे भाई
जीना मैंने भी चाहा था
पर ना इन शर्तों पर
मैंने जीना चाहा
बन चित्रकार जी तो लेता
पर यह काटम काट न
कभी मुझे भाई ।
सो अन्त हुआ मेरे जीवन का
बिना चाहत अपनी पूरी कर
मुक्ति है आशाओं से मैंने पाई
ओ मुझपर व्यंग्य करने वालो
आओ मेरा जीवन जी लो
छोड़ गया हूँ स्वप्न अधूरे
आओ कुछ तो तुम भी जी लो ।
घुघूती बासूती
Sunday, May 13, 2007
समझ ना पाती मैं .................कविता
This is a tribute to motherhood on Mothers'Day । How can we ever celebrate Mothers' Day if there were no children? We mothers are thankful to our children for giving us the opportunity to be mothers. Thank you children !
मेरी पिछली कविता क्षमा करना माँ मेरी बेटियों को अर्पित थी । आज की यह कविता उस बेटे को अर्पित है जिसे मैंने कभी देखा नहीं । जिसने मुझे मम्मा कह कर मेरे मातृत्व को सम्मान दिया । जिसे मैं केवल इस नेट पर मिली हूँ किन्तु जिसने मुझे अपने हृदय में स्थान दिया व जिसने मेरे हृदय में भी अपना स्थान बना लिया ।
समझ ना पाती मैं .................कविता
समझ ना पाती मैं बेटा
अपने आँचल में छिपने की यह चाह
तुम्हारी कैसे मैं पूरी कर दूँ
इतनी दूर हो तुम बेटा
माँ तक आने की कैसे
कुछ कम मैं दूरी कर दूँ ।
समझ ना पाती मैं बेटा
ममत्व पाने की यह चाह
तुम्हारी कैसे मैं पूरी कर दूँ
इतनी दूर हो तुम बेटा
मन से मन के बीच की कैसे
कुछ कम मैं दूरी कर दूँ ।
समझ ना पाती मैं बेटा
माँ से आँख मिचौली की यह चाह
तुम्हारी कैसे मैं पूरी कर दूँ।
इतनी दूर हो तुम बेटा
अपने आँचल के साये में आने की कैसे
कुछ कम मैं दूरी कर दूँ ।
समझ ना पाती मैं बेटा
लाड़ पाने की यह चाह
तुम्हारी कैसे मैं पूरी कर दूँ
इतने दूर हो तुम बेटा
माँ बेटे के बीच की कैसे
कुछ कम मैं दूरी कर दूँ ।
समझ ना पाती मैं बेटा
लोरी सुन सोने की यह चाह
तुम्हारी कैसे मैं पूरी कर दूँ
इतने दूर हो तुम बेटा
स्वर लहरी की कैसे
कुछ कम मैं दूरी कर दूँ ।
समझ ना पाती मैं बेटा
अपने हाथ से बाल सहलाने की यह चाह
तुम्हारी कैसे मैं पूरी कर दूँ
इतने दूर हो तुम बेटा
अपने स्पर्श की कैसे
कुछ कम मैं दूरी कर दूँ ।
समझ ना पाती मैं बेटा
अपने हाथ से ग्रास खिलाने की यह चाह
तुम्हारी कैसे मैं पूरी कर दूँ
इतने दूर हो तुम बेटा
दो देशों के बीच की कैसे
कुछ कम मैं दूरी कर दूँ ।
घुघूती बासूती
मेरी पिछली कविता क्षमा करना माँ मेरी बेटियों को अर्पित थी । आज की यह कविता उस बेटे को अर्पित है जिसे मैंने कभी देखा नहीं । जिसने मुझे मम्मा कह कर मेरे मातृत्व को सम्मान दिया । जिसे मैं केवल इस नेट पर मिली हूँ किन्तु जिसने मुझे अपने हृदय में स्थान दिया व जिसने मेरे हृदय में भी अपना स्थान बना लिया ।
समझ ना पाती मैं .................कविता
समझ ना पाती मैं बेटा
अपने आँचल में छिपने की यह चाह
तुम्हारी कैसे मैं पूरी कर दूँ
इतनी दूर हो तुम बेटा
माँ तक आने की कैसे
कुछ कम मैं दूरी कर दूँ ।
समझ ना पाती मैं बेटा
ममत्व पाने की यह चाह
तुम्हारी कैसे मैं पूरी कर दूँ
इतनी दूर हो तुम बेटा
मन से मन के बीच की कैसे
कुछ कम मैं दूरी कर दूँ ।
समझ ना पाती मैं बेटा
माँ से आँख मिचौली की यह चाह
तुम्हारी कैसे मैं पूरी कर दूँ।
इतनी दूर हो तुम बेटा
अपने आँचल के साये में आने की कैसे
कुछ कम मैं दूरी कर दूँ ।
समझ ना पाती मैं बेटा
लाड़ पाने की यह चाह
तुम्हारी कैसे मैं पूरी कर दूँ
इतने दूर हो तुम बेटा
माँ बेटे के बीच की कैसे
कुछ कम मैं दूरी कर दूँ ।
समझ ना पाती मैं बेटा
लोरी सुन सोने की यह चाह
तुम्हारी कैसे मैं पूरी कर दूँ
इतने दूर हो तुम बेटा
स्वर लहरी की कैसे
कुछ कम मैं दूरी कर दूँ ।
समझ ना पाती मैं बेटा
अपने हाथ से बाल सहलाने की यह चाह
तुम्हारी कैसे मैं पूरी कर दूँ
इतने दूर हो तुम बेटा
अपने स्पर्श की कैसे
कुछ कम मैं दूरी कर दूँ ।
समझ ना पाती मैं बेटा
अपने हाथ से ग्रास खिलाने की यह चाह
तुम्हारी कैसे मैं पूरी कर दूँ
इतने दूर हो तुम बेटा
दो देशों के बीच की कैसे
कुछ कम मैं दूरी कर दूँ ।
घुघूती बासूती
Friday, May 11, 2007
क्षमा करना माँ
क्षमा करना माँ
मैंने भी तुम्हारी इच्छाओं,
अपेक्षाओं को नज़र अन्दाज कर दिया माँ
क्षमा करना माँ ,
मैं तुम जैसी न बन सकी,
मैं प्रश्न करती रही
औरों से नहीं तो स्वयं से तो करती रही माँ,
मैं त्याग तो करती रही
किन्तु इन प्रश्नों ने मुझे
त्यागमयी न बनने दिया,
मैं ममता तो लुटाती रही
किन्तु ममतामयी न हो सकी।
मैंने तो सुहाग चिन्हों को भी नकार दिया,
साखा, पोला, लोहा, सिन्दूर, बिछिये,
चरयो कहीं पेटी में रख दिये,
सौभाग्यवती,पुत्रवती भव: न कहने दिया कभी,
समझौते के तौर पर
पिताजी बुद्धिमती ही बनाते गये मुझे
और इस बुद्धि ने ही सिखाये मुझे इतने प्रश्न
प्रश्न पर प्रश्न !
कोई मुझे उत्तर न दे सका माँ।
क्यों मेरी बेटियों के जन्म से लोग दुखी थे
क्यों मेरे जन्म पर पेड़े न बँटे थे
क्यों मेरा नाम मुझसे छिन गया
क्यों मेरा गाँव मुझसे छिन गया
क्यों मेरा मैं मुझसे छिन गया ?
मेरे प्रश्नों के मेरे पास सही उत्तर तो न थे
किन्तु एक प्रतिक्रियावाद में
मैंने मन ही मन अपना इक नाम रख लिया
मैंने खूब चाहा पुत्रवती न बनना
मैंने और अधिक चाहा पुत्रीवती बनना
शायद इच्छा शक्ति से ही
मैंने पुत्रियों को जन्म भी दे दिया।
कितनी खुश थी मैं एक पुत्री होने पर
फ़िर एक और पुत्री होने पर मैं और खुश हुई
मैंने राहत की साँस ली
अब तो मैं पुत्रवती होने से बच गई।
मुझे पुरुषों से,पुत्रों से कोई शिकायत न थी माँ
मैं तो बस उन अवाँछित आशीर्वादों से तंग थी माँ।
मैं तंग थी उस संस्कृति से माँ
जिसमें मेरा अवमूल्यन होता था माँ
जिसमें मेरी ही नस्ल के शत्रु बसते थे
जिसमें मेरी ही नस्ल उत्साहित थी
न ई न ई तकनीक आई थी
मेरी नस्ल का नामों निशां मिटाने को
हमने तो पढ़ा विज्ञान हमें आगे बढ़ाएगा
किन्तु यहाँ तो विज्ञान
हमें संसार से ही विदा कर रहा था
और मेरी संस्कृति ने, समाज ने
विज्ञान का क्या सदुपयोग निकाला
फ़िर भी सब मुझे इन्हीं दोनों का वास्ता देते थे
तो मैं, माँ, बस प्रश्न पूछती थी ,
तुमसे नहीं तो स्वयं से ।
याद है माँ,
जब मैं तुम्हारे घर आती थी
जब तुम खाना बनाती थीं
तब यही होता था प्रश्न
जवाँई को क्या है खाना पसन्द
जब मैं सास के घर जाती थी
कोई नहीं पूछता था कि क्या है मुझे पसन्द
मैं कहाँ घूमना चाहती थी
मैं क्या खाना चाहती थीं
तब भी जब मैं खाना बनाऊँ
तब भी जब कोई और बनाए
क्यों माँ ?
क्या मेरी जीभ में स्वाद ग्रन्थि न थीं
मेरा पेट न था
क्या मेरी इच्छाएँ न थीं ?
बड़ी बड़ी बातों को छोड़ो माँ
छोटी छोटी बातें भी सालती हैं।
फ़िर वे ही प्रश्न
कितने सारे प्रश्न
जो मुझे ममता, गरिमा व त्याग
सबके प्रचुर मात्रा में होने पर भी
ममतामयी नहीं बनने देते
गरिमामयी नहीं बनने देते
त्यागमयी नहीं बनने देते
कुल मिलाकर मेरे स्त्रीत्व को
(मेरी नजर में नहीं समाज,
संस्कृति वालों की नजर में )
मुझसे चुरा लेते हैं।
काश, ये प्रश्न न होते
पर माँ ,इन्हीं प्रश्नों पर तो
मेरा बचा खुचा मैं टिका है।
जानती हो माँ,
आखिर समय बदल गया
अब जब मैं पुत्रियों के घर जाती हूँ
वे व जवाँई पूछते हैं
क्या खाओगी माँ
कहाँ चलोगी माँ
कौन सी फ़िल्म देखोगी माँ
कौन सी पुस्तक खरीदोगी माँ
अचानक इस पुत्रीवती माँ की भी
पसन्द नापसन्द हो गई
उसकी जीभ में फ़िर से सुप्त स्वाद ग्रन्थियाँ उग गईं
उसकी आँखों,उसका मन,
उसका मस्तिष्क, सबका पुनर्जन्म हो गया
और मैं पुत्रीवती, माँ व्यक्ति बन गई ।
देखो माँ, अव्यक्ति मानी जाने वाली
इन स्त्रियों, मेरी पुत्रियों ने
मुझे व्यक्ति बना दिया।
घुघूती बासूती
मैंने भी तुम्हारी इच्छाओं,
अपेक्षाओं को नज़र अन्दाज कर दिया माँ
क्षमा करना माँ ,
मैं तुम जैसी न बन सकी,
मैं प्रश्न करती रही
औरों से नहीं तो स्वयं से तो करती रही माँ,
मैं त्याग तो करती रही
किन्तु इन प्रश्नों ने मुझे
त्यागमयी न बनने दिया,
मैं ममता तो लुटाती रही
किन्तु ममतामयी न हो सकी।
मैंने तो सुहाग चिन्हों को भी नकार दिया,
साखा, पोला, लोहा, सिन्दूर, बिछिये,
चरयो कहीं पेटी में रख दिये,
सौभाग्यवती,पुत्रवती भव: न कहने दिया कभी,
समझौते के तौर पर
पिताजी बुद्धिमती ही बनाते गये मुझे
और इस बुद्धि ने ही सिखाये मुझे इतने प्रश्न
प्रश्न पर प्रश्न !
कोई मुझे उत्तर न दे सका माँ।
क्यों मेरी बेटियों के जन्म से लोग दुखी थे
क्यों मेरे जन्म पर पेड़े न बँटे थे
क्यों मेरा नाम मुझसे छिन गया
क्यों मेरा गाँव मुझसे छिन गया
क्यों मेरा मैं मुझसे छिन गया ?
मेरे प्रश्नों के मेरे पास सही उत्तर तो न थे
किन्तु एक प्रतिक्रियावाद में
मैंने मन ही मन अपना इक नाम रख लिया
मैंने खूब चाहा पुत्रवती न बनना
मैंने और अधिक चाहा पुत्रीवती बनना
शायद इच्छा शक्ति से ही
मैंने पुत्रियों को जन्म भी दे दिया।
कितनी खुश थी मैं एक पुत्री होने पर
फ़िर एक और पुत्री होने पर मैं और खुश हुई
मैंने राहत की साँस ली
अब तो मैं पुत्रवती होने से बच गई।
मुझे पुरुषों से,पुत्रों से कोई शिकायत न थी माँ
मैं तो बस उन अवाँछित आशीर्वादों से तंग थी माँ।
मैं तंग थी उस संस्कृति से माँ
जिसमें मेरा अवमूल्यन होता था माँ
जिसमें मेरी ही नस्ल के शत्रु बसते थे
जिसमें मेरी ही नस्ल उत्साहित थी
न ई न ई तकनीक आई थी
मेरी नस्ल का नामों निशां मिटाने को
हमने तो पढ़ा विज्ञान हमें आगे बढ़ाएगा
किन्तु यहाँ तो विज्ञान
हमें संसार से ही विदा कर रहा था
और मेरी संस्कृति ने, समाज ने
विज्ञान का क्या सदुपयोग निकाला
फ़िर भी सब मुझे इन्हीं दोनों का वास्ता देते थे
तो मैं, माँ, बस प्रश्न पूछती थी ,
तुमसे नहीं तो स्वयं से ।
याद है माँ,
जब मैं तुम्हारे घर आती थी
जब तुम खाना बनाती थीं
तब यही होता था प्रश्न
जवाँई को क्या है खाना पसन्द
जब मैं सास के घर जाती थी
कोई नहीं पूछता था कि क्या है मुझे पसन्द
मैं कहाँ घूमना चाहती थी
मैं क्या खाना चाहती थीं
तब भी जब मैं खाना बनाऊँ
तब भी जब कोई और बनाए
क्यों माँ ?
क्या मेरी जीभ में स्वाद ग्रन्थि न थीं
मेरा पेट न था
क्या मेरी इच्छाएँ न थीं ?
बड़ी बड़ी बातों को छोड़ो माँ
छोटी छोटी बातें भी सालती हैं।
फ़िर वे ही प्रश्न
कितने सारे प्रश्न
जो मुझे ममता, गरिमा व त्याग
सबके प्रचुर मात्रा में होने पर भी
ममतामयी नहीं बनने देते
गरिमामयी नहीं बनने देते
त्यागमयी नहीं बनने देते
कुल मिलाकर मेरे स्त्रीत्व को
(मेरी नजर में नहीं समाज,
संस्कृति वालों की नजर में )
मुझसे चुरा लेते हैं।
काश, ये प्रश्न न होते
पर माँ ,इन्हीं प्रश्नों पर तो
मेरा बचा खुचा मैं टिका है।
जानती हो माँ,
आखिर समय बदल गया
अब जब मैं पुत्रियों के घर जाती हूँ
वे व जवाँई पूछते हैं
क्या खाओगी माँ
कहाँ चलोगी माँ
कौन सी फ़िल्म देखोगी माँ
कौन सी पुस्तक खरीदोगी माँ
अचानक इस पुत्रीवती माँ की भी
पसन्द नापसन्द हो गई
उसकी जीभ में फ़िर से सुप्त स्वाद ग्रन्थियाँ उग गईं
उसकी आँखों,उसका मन,
उसका मस्तिष्क, सबका पुनर्जन्म हो गया
और मैं पुत्रीवती, माँ व्यक्ति बन गई ।
देखो माँ, अव्यक्ति मानी जाने वाली
इन स्त्रियों, मेरी पुत्रियों ने
मुझे व्यक्ति बना दिया।
घुघूती बासूती
Sunday, May 06, 2007
कवि बड़ा या कविता ????????
'क्या कवि कविता से बड़ा है' लेख पढ़ा । अब मैं तो कान सुनी बात पर विश्वास नहीं करती । वैसे भी कान कुछ कमजोर हैं । ओह, यह लेख था और क्योंकि पढ़ा था इसलिए कान से कोई सम्बन्ध नहीं । कोई बात नहीं, आँखें भी कमजोर हैं । खैर विज्ञान की छात्रा रही हूँ । तो भाई, 'सिद्ध करो' के सिद्धान्त पर चलती हूँ । सो इंची टेप की खोज में लग गई । जब यह कविता लिखना शुरू नहीं किया था तब कुछ सिलाई, कढ़ाई ,कपड़े सीने जैसे काम कर लिया करती थी । अब तो कढ़ाई बहुत दूर की बात है, कड़ाही का भी कम से कम उपयोग करती हूँ । हाँ, जब वह कविता में हो तब अलग बात है । अब तो बस कुछ शब्दों को पिरो कर पंक्तियाँ बनाती हूँ फिर उन सबको सिल कर एक कविता बनाती हूँ । कभी कभी कुछ थेगली लगी सी भी बन जाती हैं, पर उन्हें भी अपने चिट्ठे पर चिपका लेती हूँ । फिर कोई यह न कहने पाए कि मैं पक्षपाती हूँ । अगड़े-पिछड़े, होशियार-कमजोर, काले-सफेद, अच्छी-बुरी, ऐसी सभी भावनाओं से सदा ऊँचे उठे रहना चाहती हूँ । सो समदर्शी बन सभी कविताओं को चिपका देती हूँ । आगे पढ़ने वाले का भाग्य !
इंचीटेप तो कुछ घंटो की खोज से मिल गया । यह बात और है कि उसके साथ-साथ बहुत सारे अधूरे बने ब्लाउज, आधी फॉल लगी साड़ियाँ, तीन चौथाई कढ़ी साड़ी आदि भी मिल गई । इन्हें कुछ और पीछे छिपा, मैं इंचीटेप से लैस हो कवि को ढूँढने निकल पड़ी । रास्ते में कई मोर मिले, नाग साँप भी मिल गए, भाँति-भाँति के प्राणी मिले । पर यह कवि नाम का जीव नहीं मिलना था सो नहीं मिला । फिर ध्यान आया कि कई दिन पहले 'स्त्री भी व्यक्ति बन गई है' यह यहीं कहीं पढ़ा था । मैंने भी तो अपनी माँ को एक कविता लिख बताया था कि 'देख माँ मैं व्यक्ति बन गई'। अभी आप सब को बताना बाँकी है । प्रतीक्षा कीजिए, आपकी बारी भी देर सवेर आ ही जाएगी । सो इंचीटेप उठाया और स्वयं को नाप डाला ।
अब कविता तो पड़ोस में ही रहती है सो उसे नापने चल पड़ी । उसकी माँ को इस तरह अपनी बिटिया को नापना पसन्द नहीं आ रहा था । उन्हें बताना पड़ा कि यह सब साहित्य की सेवा के लिए है । गुजरात में आपको एक से एक नए नाम मिलते हैं, सो साहित्य नामक व्यक्ति भी कुछ घर छोड़ कर ही रहता है । कविता को तो वह बुरा नहीं लगता पर उसकी माँ को वह पसन्द नहीं । सो वे अड़ गईं कि 'साहित्य' की सेवा के लिए तो उनकी बेटी को बिल्कुल भी नापने न देंगी । अब मुझे उन्हें साहित्य क्या होता है बताना पड़ा । यह भी बताना पड़ा कि कभी कभी वह इन्जीनियर न होकर पुस्तकों में पाया जाता है ।
उन्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं हो रहा था । बल्कि अब तो वह पुस्तकों की अलमारी को भी शक की नजर से देख रहीं थीं कि साहित्य कहीं वहीं न छिपा बैठा हो । वैसी ही निगाहों से वे बिटिया को भी देख रहीं थीं । सो मैंने कहा कि कविता, शब्द कोष तो होगा ही, लाओ, तुम्हारी माँ को साहित्य का अर्थ दिखा दें । यह शब्दकोष क्या होता है आँटी ? उसके पूछने पर वह भी बताया । फिर अपने घर से शब्दकोष ले जाकर उन्हें उसमें साहित्य का अर्थ दिखाया । तब जाकर वे मुझे कविता की लम्बाई नापने देने के लिए तैयार हो गईं ।
अब तो परिणाम सामने था । फैसले की घड़ी आ गई थी । विज्ञान पर पूरा विश्वास है अतः जो भी निर्णय यह प्रयोग मुझे देगा मैं उसे नतमस्तक हो स्वीकार कर लूँगी । किन्तु यह क्या ? मेरी और कविता की लम्बाई बिल्कुल बराबर थी । सो सोचा प्रयोग दोहराया जाए । अतः उसके घर के हर प्राणी से स्वयं और कविता को नपवाया । सबने ध्यान से नापा, देखा । कविता की माँ तो कहीं अन्दर से अपना चश्मा भी निकाल लाईं । परिणाम बार बार वही निकल रहा था । सो मुझे लगता है कविता कवि से बड़ी नहीं और कवि कविता से बड़ा या बड़ी नहीं । दोनों एकदम बराबर हैं । आपको विश्वास न हो तो आप भी ये प्रयोग दोहरा लें । यदि कविता न मिले तो हमारे पड़ोस वाली को नाप लें, यदि उसकी माँ अनुमति दें तो । कवि तो, मैंने कहा न अब स्त्री जब व्यक्ति बन गई है तो कवि भी । सो कविता के पड़ोस में मैं भी रहती हूँ । आप अपना प्रयोग कर मेरी बात एक बार फिर सिद्ध कर सकते हैं ।
घुघूती बासूती
अस्वीकरण (Disclaimer):
इस लेख की कविता, इंचीटेप, कड़ाही ,मोर, नाग ,साँप, कवि आदि बिल्कुल काल्पनिक हैं । यही नहीं, यह लेख भी काल्पनिक है ।
घुघूती बासूती
इंचीटेप तो कुछ घंटो की खोज से मिल गया । यह बात और है कि उसके साथ-साथ बहुत सारे अधूरे बने ब्लाउज, आधी फॉल लगी साड़ियाँ, तीन चौथाई कढ़ी साड़ी आदि भी मिल गई । इन्हें कुछ और पीछे छिपा, मैं इंचीटेप से लैस हो कवि को ढूँढने निकल पड़ी । रास्ते में कई मोर मिले, नाग साँप भी मिल गए, भाँति-भाँति के प्राणी मिले । पर यह कवि नाम का जीव नहीं मिलना था सो नहीं मिला । फिर ध्यान आया कि कई दिन पहले 'स्त्री भी व्यक्ति बन गई है' यह यहीं कहीं पढ़ा था । मैंने भी तो अपनी माँ को एक कविता लिख बताया था कि 'देख माँ मैं व्यक्ति बन गई'। अभी आप सब को बताना बाँकी है । प्रतीक्षा कीजिए, आपकी बारी भी देर सवेर आ ही जाएगी । सो इंचीटेप उठाया और स्वयं को नाप डाला ।
अब कविता तो पड़ोस में ही रहती है सो उसे नापने चल पड़ी । उसकी माँ को इस तरह अपनी बिटिया को नापना पसन्द नहीं आ रहा था । उन्हें बताना पड़ा कि यह सब साहित्य की सेवा के लिए है । गुजरात में आपको एक से एक नए नाम मिलते हैं, सो साहित्य नामक व्यक्ति भी कुछ घर छोड़ कर ही रहता है । कविता को तो वह बुरा नहीं लगता पर उसकी माँ को वह पसन्द नहीं । सो वे अड़ गईं कि 'साहित्य' की सेवा के लिए तो उनकी बेटी को बिल्कुल भी नापने न देंगी । अब मुझे उन्हें साहित्य क्या होता है बताना पड़ा । यह भी बताना पड़ा कि कभी कभी वह इन्जीनियर न होकर पुस्तकों में पाया जाता है ।
उन्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं हो रहा था । बल्कि अब तो वह पुस्तकों की अलमारी को भी शक की नजर से देख रहीं थीं कि साहित्य कहीं वहीं न छिपा बैठा हो । वैसी ही निगाहों से वे बिटिया को भी देख रहीं थीं । सो मैंने कहा कि कविता, शब्द कोष तो होगा ही, लाओ, तुम्हारी माँ को साहित्य का अर्थ दिखा दें । यह शब्दकोष क्या होता है आँटी ? उसके पूछने पर वह भी बताया । फिर अपने घर से शब्दकोष ले जाकर उन्हें उसमें साहित्य का अर्थ दिखाया । तब जाकर वे मुझे कविता की लम्बाई नापने देने के लिए तैयार हो गईं ।
अब तो परिणाम सामने था । फैसले की घड़ी आ गई थी । विज्ञान पर पूरा विश्वास है अतः जो भी निर्णय यह प्रयोग मुझे देगा मैं उसे नतमस्तक हो स्वीकार कर लूँगी । किन्तु यह क्या ? मेरी और कविता की लम्बाई बिल्कुल बराबर थी । सो सोचा प्रयोग दोहराया जाए । अतः उसके घर के हर प्राणी से स्वयं और कविता को नपवाया । सबने ध्यान से नापा, देखा । कविता की माँ तो कहीं अन्दर से अपना चश्मा भी निकाल लाईं । परिणाम बार बार वही निकल रहा था । सो मुझे लगता है कविता कवि से बड़ी नहीं और कवि कविता से बड़ा या बड़ी नहीं । दोनों एकदम बराबर हैं । आपको विश्वास न हो तो आप भी ये प्रयोग दोहरा लें । यदि कविता न मिले तो हमारे पड़ोस वाली को नाप लें, यदि उसकी माँ अनुमति दें तो । कवि तो, मैंने कहा न अब स्त्री जब व्यक्ति बन गई है तो कवि भी । सो कविता के पड़ोस में मैं भी रहती हूँ । आप अपना प्रयोग कर मेरी बात एक बार फिर सिद्ध कर सकते हैं ।
घुघूती बासूती
अस्वीकरण (Disclaimer):
इस लेख की कविता, इंचीटेप, कड़ाही ,मोर, नाग ,साँप, कवि आदि बिल्कुल काल्पनिक हैं । यही नहीं, यह लेख भी काल्पनिक है ।
घुघूती बासूती
Saturday, May 05, 2007
हमारे लाड़ले पर हमला एक वाइरस का
एक वाइरस मनुष्य को और उसके कम्प्यूटर को कितना दयनीय बना सकता है इसका जीता जागता उदाहरण हमने परसों देखा । और दुर्भाग्य से वह मनुष्य हम थे और वह कम्प्यूटर हमारा ल।ड़ला ।
हुआ कुछ यों कि हम बड़े प्रेम से अपने मित्रों से, हाँ यहीं के साइबर मित्रों से, वार्तालाप कर रहे थे । आने वाले संकट का कोई भी अंदेशा नहीं था । हम, हमारा संसार, हमारे मित्र सब मजे में थे । जैसे आने वाले भूकम्प की कोई सूचना नहीं होती वैसे ही हम भी अपने प्रिय कम्प्यूटर पर होने वाले हमले से अनजान थे । गूगल चैट व याहू मेसेन्जर दोनों ही खुले थे । याहू मेसेन्जर तो अभी अभी लम्बी बीमारी से उठ सक्रिय हुआ था । अचानक एक मित्र का संदेश आया कि वे अमुक टी वी चैनल पर आने वाले हैं । जल्दी जल्दी टी वी पर उस चैनल को खोजना आरम्भ किया । अब टी वी के मामले में हम बिल्कुल अनाड़ी हैं ।
अनाड़ी तो कम्प्यूटर के मामले में भी हैं । कुछ दिन पहले तक अपने बारह चौदह चैनल पर ही इतराते थे । हाल में ही टाटा स्काई लगवा कर हमारा टी वी भी नए नए चैनल दिखाने लगा है । सो हमें पूर्ण विश्वास था कि अमुक चैनल भी हमारे टी वी में मिलेगा । वह नहीं मिला तो दनादन मित्रों से पूछना आरम्भ किया कि क्या यह चैनल नेट पर उपलब्ध है । सब हमारी सहायता में जुट गए और धड़ाधड़ लिंक भेजने लगे । हम एक के बाद एक लिंक आजमा रहे थे, इतने में ही किसी वाइरस दानी ने हमारी ओर वाइरस वाला लिंक भी भेज दिया । हम इतने जोश से लिंक खोल रहे थे कि भेजने वाले का नाम देखे बिना लिंक खोल डाला । और फिर क्या था हमारा याहू मेसेन्जर तो जैसे पगला गया । धड़ाधड़ हमारी स्टेटस बार बदलती जा रही थी । दनादन हमारी मित्रों की लिस्ट में सबको किसी महान साइट,नाम न ही लूँ तो बेहतर, देखने के लिए बुलावा जाने लगा । हम तो सकपका गए और दूसरी तरफ से एक दो मित्रों के संदेश आने लगे कि यह सब क्या देखना शुरू कर दिया है । किसी ने सलाह दी फौरन कम्प्यूटर बन्द करो और किसी कम्प्यूटर डॉक्टर को बुलाओ । इससे पहले कि हमें होश आता कि यह क्या हो रहा है बिटिया का संदेश आया । हा हा माँ, मेरे पति को यह सब क्या देखने को बोल रही हो ? पति ने फोन पर कहा है कि माँ से बोलो नेट बंद करें । मेसेन्जर को हटा दें । नया बाद में लगा लें पर सबसे पहले यह ही करें ।
वाह ! सासू माँ की स्थिति तो आप सोच ही सकते हैं हँसे या रोएँ । खैर हमने इस विषय में निर्णय स्थगित किया और फटाफट नेट बंद किया और कम्प्यूटर भी । पति जब घर आए तो अपनी दुख गाथा उनको सुनाई । उनका हँसना जले पर नमक सा तो था किन्तु जब वे भी हमारे कम्प्यूटर को वाइरस मुक्त करने के अभियान में लग गए तो कुछ सांत्वना मिली । आज डॉक्टर को बुला कर भी दिखाया था तब जाकर कुछ चलने की स्थिति में हुआ है । अब वह कल फिर आकर पूरा निदान करेगा । शायद कुछ एन्टी टिटेनस या एन्टी रेबीज टाइप दवा भी देगा । दुआ माँगिए कि हमारा यह लाड़ला पूरी तरह से स्वस्थ हो जाए । अब तो याहू मेसेन्जर फिर से लगाना है । वह तो हो जाएगा किन्तु हम सोच रहे हैं अपनी सूची के मित्रों को कैसे यह दुख भरी कहानी सुनाएँगे और कैसे क्षमा माँगेगे । हाँ और जँवाई बाबू क्या अब हमारा भेजा कोई संदेश पढ़ने की हिम्मत जुटा पाएँगे ?
वैसे अब हम यह गीत गुनगुना रहे हैं.........
कम्प्यूटर बनाने वाले
क्या तेरे दिल में समाया
काहे को कम्प्यूटर बनाया
तूने काहे को कम्प्यूटर बनाया
कम्प्यूटर बनाया तूने तो काहे को वाइरस बनाया
तूने काहे को वाइरस बनाया
वाइरस बनाया तूने तो काहे को वाइरस फैलाया
तूने काहे को वाइरस फैलाया.........
काहे को कम्प्यूटर बनाया ????????????
वैसे हमें पता है कम्प्यूटर बनाने वाले और वाइरस फैलाने वाले अलग अलग लोग हैं पर कविता या गीत में कुछ पोएटिक फ्रीडम तो होती ही है ।
घुघूती बासूती
हुआ कुछ यों कि हम बड़े प्रेम से अपने मित्रों से, हाँ यहीं के साइबर मित्रों से, वार्तालाप कर रहे थे । आने वाले संकट का कोई भी अंदेशा नहीं था । हम, हमारा संसार, हमारे मित्र सब मजे में थे । जैसे आने वाले भूकम्प की कोई सूचना नहीं होती वैसे ही हम भी अपने प्रिय कम्प्यूटर पर होने वाले हमले से अनजान थे । गूगल चैट व याहू मेसेन्जर दोनों ही खुले थे । याहू मेसेन्जर तो अभी अभी लम्बी बीमारी से उठ सक्रिय हुआ था । अचानक एक मित्र का संदेश आया कि वे अमुक टी वी चैनल पर आने वाले हैं । जल्दी जल्दी टी वी पर उस चैनल को खोजना आरम्भ किया । अब टी वी के मामले में हम बिल्कुल अनाड़ी हैं ।
अनाड़ी तो कम्प्यूटर के मामले में भी हैं । कुछ दिन पहले तक अपने बारह चौदह चैनल पर ही इतराते थे । हाल में ही टाटा स्काई लगवा कर हमारा टी वी भी नए नए चैनल दिखाने लगा है । सो हमें पूर्ण विश्वास था कि अमुक चैनल भी हमारे टी वी में मिलेगा । वह नहीं मिला तो दनादन मित्रों से पूछना आरम्भ किया कि क्या यह चैनल नेट पर उपलब्ध है । सब हमारी सहायता में जुट गए और धड़ाधड़ लिंक भेजने लगे । हम एक के बाद एक लिंक आजमा रहे थे, इतने में ही किसी वाइरस दानी ने हमारी ओर वाइरस वाला लिंक भी भेज दिया । हम इतने जोश से लिंक खोल रहे थे कि भेजने वाले का नाम देखे बिना लिंक खोल डाला । और फिर क्या था हमारा याहू मेसेन्जर तो जैसे पगला गया । धड़ाधड़ हमारी स्टेटस बार बदलती जा रही थी । दनादन हमारी मित्रों की लिस्ट में सबको किसी महान साइट,नाम न ही लूँ तो बेहतर, देखने के लिए बुलावा जाने लगा । हम तो सकपका गए और दूसरी तरफ से एक दो मित्रों के संदेश आने लगे कि यह सब क्या देखना शुरू कर दिया है । किसी ने सलाह दी फौरन कम्प्यूटर बन्द करो और किसी कम्प्यूटर डॉक्टर को बुलाओ । इससे पहले कि हमें होश आता कि यह क्या हो रहा है बिटिया का संदेश आया । हा हा माँ, मेरे पति को यह सब क्या देखने को बोल रही हो ? पति ने फोन पर कहा है कि माँ से बोलो नेट बंद करें । मेसेन्जर को हटा दें । नया बाद में लगा लें पर सबसे पहले यह ही करें ।
वाह ! सासू माँ की स्थिति तो आप सोच ही सकते हैं हँसे या रोएँ । खैर हमने इस विषय में निर्णय स्थगित किया और फटाफट नेट बंद किया और कम्प्यूटर भी । पति जब घर आए तो अपनी दुख गाथा उनको सुनाई । उनका हँसना जले पर नमक सा तो था किन्तु जब वे भी हमारे कम्प्यूटर को वाइरस मुक्त करने के अभियान में लग गए तो कुछ सांत्वना मिली । आज डॉक्टर को बुला कर भी दिखाया था तब जाकर कुछ चलने की स्थिति में हुआ है । अब वह कल फिर आकर पूरा निदान करेगा । शायद कुछ एन्टी टिटेनस या एन्टी रेबीज टाइप दवा भी देगा । दुआ माँगिए कि हमारा यह लाड़ला पूरी तरह से स्वस्थ हो जाए । अब तो याहू मेसेन्जर फिर से लगाना है । वह तो हो जाएगा किन्तु हम सोच रहे हैं अपनी सूची के मित्रों को कैसे यह दुख भरी कहानी सुनाएँगे और कैसे क्षमा माँगेगे । हाँ और जँवाई बाबू क्या अब हमारा भेजा कोई संदेश पढ़ने की हिम्मत जुटा पाएँगे ?
वैसे अब हम यह गीत गुनगुना रहे हैं.........
कम्प्यूटर बनाने वाले
क्या तेरे दिल में समाया
काहे को कम्प्यूटर बनाया
तूने काहे को कम्प्यूटर बनाया
कम्प्यूटर बनाया तूने तो काहे को वाइरस बनाया
तूने काहे को वाइरस बनाया
वाइरस बनाया तूने तो काहे को वाइरस फैलाया
तूने काहे को वाइरस फैलाया.........
काहे को कम्प्यूटर बनाया ????????????
वैसे हमें पता है कम्प्यूटर बनाने वाले और वाइरस फैलाने वाले अलग अलग लोग हैं पर कविता या गीत में कुछ पोएटिक फ्रीडम तो होती ही है ।
घुघूती बासूती
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