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Friday, March 30, 2012

तितली का पंख


तितली का पंख हूँ,
पकड़ने का यत्न न करना
टूट तो जाऊँगी ही मैं
किन्तु हाथ तुम्हारे भी
न आऊँगी मैं।
चूरा चूरा हो जाऊँगी
खत्म हो जाऊँगी
किन्तु हाथ तुम्हारे या
अन्य किसी के
कभी न आऊँगी मैं।
मैं हाथी दाँत नहीं
जो अकूत शक्ति वाले
को मारकर तुम पा जाओगे
मैं पंख हूँ नाजुक तितली का
जो तुम छीन ना पाओगे।
तितली का पंख हूँ मैं
चाहूँगी तो अधरों, चिबुक या
पलकों को छू उड़ जाऊँगी मैं
पकड़ना चाहोगे तो हाथ में
शव ही मेरा पाओगे तुम।
घुघूती बासूती

Monday, June 28, 2010

ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना.............................घुघूती बासूती

बहुत दिन से ब्लॉगवाणी चुप है। अपना कोई प्रिय चुप हो जाए तो कुछ समय तक तो हम यह सोचे रहते हैं कि व्यस्त होगा, कोई समस्या होगी, कुछ समय बाद स्वयं बोलने लगेगा। फिर पूछते हैं कि क्या बात हुई। तब भी न बोले तो चिन्ता शुरू होती है। फिर मनाने का सिलसिला चालू होता है। ऐसा ही कुछ अब ब्लॉगवाणी के साथ हो रहा है। अभी तो चिन्ता और पूछने वाली स्थिति है।

ब्लॉगवाणी मेरे और मेरे जैसे बहुत से लोगों के लिए ब्लॉगजगत की खिड़की बन गई थी। इस खिड़की से सबके ब्लॉग्स में झाँककर कहाँ क्या हो रहा है देखा जा सकता था। किसी भी औजार की सफलता उसके उपयोग की सुगमता पर निर्भर करती है। औजार तो बहुत लोग बना लेते हैं और बाजार में उनकी भरमार भी होती है किन्तु कुछ औजार ऐसे लगते हैं कि जैसे आपकी सुविधा को ही देखकर बनाए गए हों। लगता है जैसे यदि आप स्वयं औजार बनाने की योग्यता रखते और अपने उपयोग के लिए बनाते तो ठीक ऐसा ही औजार बनाते। बस यही बात ब्लॉगवाणी के साथ भी है। मैं 'थी' नहीं कहूँगी क्योंकि मैं यही मानना चाहूँगी कि सिरिल समय मिलने पर हमारे लिए और भी बेहतर ब्लॉगवाणी लेकर आएँगे।

तबतक जो बहुत से नए एग्रीगेटर्स आ रहे हैं उन्हें भी फलने फूलने, पल्लवित होने का अवसर मिलेगा। कभी ब्लॉगवाणी भी यूँ ही नई नई हमारे बीच आई थी और हमने उसका दिल खोलकर स्वागत किया और उसे अपने नेट जीवन का एक अभिन्न अंग बना लिया था। हिन्दी ब्लॉगिंग से जितने लोग जुड़ेंगे उतना ही बेहतर होगा। सो नए एग्रीगेटर्स व नए ब्लॉगर्स का सदा स्वागत ही होगा। (बस ढेर सारे नए पाठक भी आ जाएँ तो बात बन जाएगी।)

हमने ब्लॉगवाणी से कभी शिकायतें कीं तो कभी उसे सराहा,कभी मनुहार की तो कभी कुछ नया जोड़ने का अनुरोध किया। सिरिल व ब्लॉगवाणी ने हमें कभी निराश नहीं किया। इसलिए इस बार भी आशा है कि वे दोनों हमें निराश नहीं करेंगे और कुछ दिन का आराम कर लौटकर आएँगे पहले से भी स्वस्थ व तरोताजा!

सो आशा ही नहीं, विश्वास है कि शीघ्र ही फिर मिलते हैं, तब तक के लिए आभार मैथिली जी, सिरिल और ब्लॉगवाणी!
घुघूती बासूती