Tuesday, February 04, 2014

वासंती वसंत


समय समय की बात है
अब वसंत स्वयं नहीं
कान में गुनगुना जाता
अपने आने का संगीत,
न ही पिताजी बैठ
अपनी पूजा में, रंगते
हमारे रुमाल वासंती,
न ही कोई कैलेंडर देता
इसके आने की सूचना।
अब तो यह सूचना भी
नेट ही दे देता है
वसंत आभासी हो गया।
आओ आभासी वसंत,
आओ.
कुछ पल बैठो
कुछ बतियाओ
अपना हाल बताओ
मेरा सुन जाओ
अपने होने का
आभास कराओ
आभासी मन ही
वासंती कर जाओ।
घुघूती बासूती

11 comments:

  1. सुन्दर वसन्त.

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  2. बहुत दिनों के कोहरे के बाद आज चटक धूप दिखी। घर में दाल की पूरी के साथ खीर बनी। लगा वसंत आया।
    और यह आभास भर नहीं था!

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  3. True,really a make believe only!

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  4. कल तक तो कोहरा था, कड़ाकी ठंड थी। जैसा आपने लिखा वैसा ही था मन मेरा। लेकिन आज सुबह सूरज की पहली किरण के साथ जो चटक धूप खिली कि आनंद आ गया। लगा कि वसंत है।

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  5. हाँ..आपकी कविता अच्छी लगी।

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  6. अच्छा संदेश आभासी जगत के लिये।

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  7. यह भाव है आनन्द का

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  8. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन किस रूप मे याद रखा जाएगा जंतर मंतर को मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  9. दीदी! अभी किसी पोस्ट पर लिखा है मैंने कि वे सारी बातें पीढ़ी दर पीढ़ी बिल्कुल एक जैसी चलती आ रही थीं. पता नहीं कहाँ जाकर लुप्त हो गईं! और मैं जहाँ हूँ वहाँ तो साल में एक त्यौहार मनाया जाता है, बाकी त्यौहारों का पता रिश्तेदारों के फ़ोन से ही लगता है!!
    सही कहा आपने "आभासी त्यौहार!"

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  10. फेसबूक और हम सबकी आभासी दुनिया मे सच में बसंत आ गया :)
    बेशक पर्यावरण का चक्र उसको अभी आने नहीं दे रहा !!
    आप शानदार ;लिखती हैं

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  11. प्रकृति का एक नवीनतम परिधान !
    बहुत सही कहा आपने !!

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