बात तब की है जब हम साऊदी अरब में थे। हम खरीददारी के लिए पास के शहर जाते थे। वहाँ काफी भारतीय, पाकिस्तानी, बंगलादेशी व श्रीलंकाई लोग दुकानों पर काम करते थे, सो भाषा या संस्कृति की समस्या अधिक नहीं होती थी। वे सभी जानते थे कि रसोई का सामान तो कम से कम स्त्री के मन का ही आएगा।
एक बार जब हम खरीददारी के लिए गए तो घुघूत एक अरब को केले बेचता देख रुक गए और केले खरीदने लगे। मैं बच्चियों के साथ व्यस्त थी जब तक केले वाले के पास पहुँची घुघूत उससे दो दर्जन केले निकालने को कह रहे थे। मैंने बीच में ही रोक दिया। कहा कि केले अच्छे नहीं हैं, अधिक पके हैं और दो दर्जन तो हम कितने भी अच्छे होने पर नहीं खरीदते हैं। सो कम ही लो।
केले वाला जल भुन गया। बोला उर्दी जानते हो? हमें वहाँ रहते लगभग तीन वर्ष हो गए थे सो जानते थे कि उर्दी याने उर्दु! सो कह दिया कि हाँ जानते हैं। ( पाकिस्तानियों व भारतीयों की संगत में रहकर कुछ अरब भी टूटी फूटी उर्दु सीख गए थे।)
वह घुघूत से बोला," मर्द होकर मदाम की बात मानता है। अब तो हर हाल में दो दर्जन केले ही लो। चाहे तो खरीदकर फेंक दो। ऐसे तो मदाम की हिम्मत बढ़ जाएगी। आज केले खरीदने से रोकती है, कल हर बात पर रोकेगी।"
घुघूत ने उससे कहा कि वह पैसे लेना चाहे तो वे दे देंगे किन्तु केले तो बिल्कुल भी नहीं खरीदेंगे।
उस दिन जाना कि मर्द होने का एक अर्थ स्त्री की अवहेलना करना भी था। मर्दानगी साबित करनी है तो पत्नी की बात कभी न मानो चाहे वह कितनी भी सही क्यों न हो।
ये वे ही घुघूत थे जो इस बात से लगभग तीन वर्ष पहले भी मुम्बई में जब हम एक केले वाले से केले खरीद रहे थे और मैंने मोल भाव करके दाम कम करवाए थे और जब हम केले खरीदकर आगे बढ़ रहे थे तो लौटकर जाकर उसे जितने पैसे मैंने कम करवाए थे देकर आए थे। तब प्रश्न पुरुषत्व का नहीं था अपितु किसी गरीब को(घुघूत के अनुसार! संभव है कि वह बहुत पैसे वाला रहा हो।) कम पैसे देने का था।
घुघूती बासूती
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34 comments:
पहला दृश्य "मर्द होने का एक अर्थ स्त्री की अवहेलना करना भी था। मर्दानगी साबित करनी है तो पत्नी की बात कभी न मानो चाहे वह कितनी भी सही क्यों न हो। दूसरा दृश्य : प्रश्न पुरुषत्व का नही था अपितु किसी गरीब को कम पैसे देने का था ।
तीसरा दृश्य मुझे राजकपूर की फिल्म का याद आ रहा है जिसमे ललिता पवार उनसे कहती है " केले दो आने के तीन दिये "और राजकपूर कह्ते हैं " क्यों तीन आने के दो क्यों नहीं ?"
मर्दों की ये मानसिकता तो है .. पर अफसोस इस बात का है कि ये सीख लडके को पिता के द्वारा ही नहीं माता के द्वारा भी मिलती है .. इस तरह एक नारी आनेवाली पीढी तक गलत संदेश फैलाती है !!
हर तरह की गुलामी बनाए रखने का फारमूला यही है।
मर्दों का अहम बहुत कमजोर होता है केले से भी टकरा कर चूर चूर हो जाता है। जब तक घुघूत जी की मानसिकता ऐसी नहीं है तब तक क्या परवाह करना
पर सभी पुरुष (मर्द) तो एक जैसे नहीं होते है ।
हाँ, यह गुलाम मानसिकता है और गुलामी बनाये रखने का फ़ार्मूला भी (जैसा कि द्विवेदी जी ने कहा). बात छोटी सी है, पर यदि किसी बच्चे के सामने ऐसी बातें होती रहती हैं, तो यही आने वाले जीवन में उसकी मानसिकता तय करती हैं.
संगीता जी की टिप्पणी के बाद क्या कहूँ .....उनसे ही सहमत .....!!
nice
पुरुष की इसी मानसिकता से नारी जाति पिड़ित है। बहुत अच्छा और सच्चा लेख।
...
arab kahin kaa....
संगीता जी की बात यूँ गलत नही है और बदलाव तभी होगा जब हर स्त्री आत्मनिर्भर होगी- आर्थिक और बौद्धिक दोनो तरह् । पराअश्रित स्त्री सदैव ही पति पुत्र को ऐसी सीख देती रहेगी। घुघुती जी का लेख अच्छा लगा !
बहुत ही सरल ढंग से अरब में घटी एक घटना के संस्मरण लिख कर पुरुषों की मानसिकता को समझाने का प्रयास किया है.
मनु जी,
अरब कहीं का..! कमेन्ट लिखते-लिखते इस एक वाक्य पर ठिठक गया. यह सोंच सिर्फ अरब में दिखती हो ऐसा नहीं हैं. मुझे तो अपने पूर्वी उत्तर प्रदेश में..पढ़े लिखे समाज में भी..ऐसी सोंच के लोग प्रायः मिल ही जाते हैं.
आप यह भी तो देखिये कि किस देश में थीं और किस धर्म के अनुयायियों के बीच.
यह मानसिकता विश्व स्तर पर बनी हुई है। यह पुरुष की कमजोर मन:स्थिति की परिचायक है। किसी महिला से यह बात नहीं कही जाती क्योंकि सभी को मालूम है कि महिला को कितनी किसकी बात माननी है। लेकिन पुरुष बहुत जल्दी महिला के बहकावे में आ जाते हैं इसलिए सभी को इन कमजोर मानसिकता वालों से डर लगता है कि यदि ऐसा होता रहा तब झूठे पुरुषत्व का क्या होगा?
अनुभव पढ़कर दुःख हुआ वैसे उम्मीद नहीं कि हालात हमेशा ऐसे ही रहने वाले हैं ! पता नहीं क्यों आपका संस्मरण पढ़ते हुए लगा कि हम अपनी बेगम के साथ खरीदारी को जायें और दुकानदार भी कोई खातून हो फिर हमारी बेगम से कहे मादाम हो तो मर्द की बात सुनो मत !...काश !
बेचारा अरब, सारी बदनामी अरब की,
मुझे तो नही लगता कि हलात दुनिया के किसी भे कौने मे भिन्न है. मै तो इस मामले से दूर ही रहता हू खरीदारी के सब काम पत्नि ही करे कमसेकम उसमे नुक्ताचीनी तो कर सकू बाद मे.
और नही तो क्या...... एक दुकानदार के सामने केले को लेकर अपनी तौहीन कराउन्गा क्या?
हा हा हा
we all need to work towards making woman "independent" not just economically but mentally . there is thing called as "slave mentality" and woman need to break that mold and be on their own .
good post
पढ़ लिया..बीपी बढ़ा है तो डॉक्टर ने ज्यादा बात करने को मना किया है इसलिए चुप्प!!
मानसिकता बदलने की जरुरत है । बाकी तो रचना और सुजाता ने कह ही दिया है ।
यह प्रवृत्ति अरब क्या, हमारे देश में भी तो व्याप्त है.. और क्या कहें, बस यही कह सकते हैं..
हैप्पी वीमेन्स डे..
क्या सभी मर्द ऐसे ही होते हैं -भारत में एक और कटेगरी नहीं होती क्या ?
"हेन पेक हस्बैंड्स " की -ये जनाब विविध रूपों में पाए जाते हैं -कवी रूप में और यहाँ ब्लागजगत में भी इस पर कोई प्रकाश डालेगें क्या ?
-एक घोषित नारी विरोधी का प्रलाप !
क्या कहा जाए....घुघूत जी जैसा सोचने वाले लोग बहुत कम ही होते हैं...कि बीवी का मान भी रह जाए और गरीब की मदद भी हो जाए....ज्यादा पुरुष उस अरब केले वाले की मानसिकता के ही होते हैं,चाहे अरब में ना होकर,भारत में ही रहें...पर अब तस्वीर बदल रही है....बहुत धीरे धीरे ही सही..
(मुंबई की स्त्रियों पर एक पोस्ट लिखी है...आपको अच्छी लगेगी
www.rashmiravija.blogspot.com)
:)
समय बदल रहा है..
सोच भी..
आशा की लौ जलती रहे..
अजी बीबी क्या हम तो अपने बच्चो से भी सलाह कर के ही सब काम करते है, कई बार तो बीबी गुस्सा करती है कि हर बात मुझ से क्यो पुछते हो? यानि ना हम आजाद है, ना ही हमारी बीबी ही आजाद है, बस यही कहुंगा कि हम एक दुसरे के बिना अधुरे है
ghugut ji baat mante hei na...bas fir apke maje hein...
अजी अब ऐसे मर्द बचे ही कितने हैं जो मदाम की बात की अवहेलना कर सकें।
कल से परेशान हूँ क्या कमेन्ट करूँ ...
मैं सिर्फ़ इतना जानती हूँ ...
जो कापुरुष होते हैं सिर्फ़ वही औरत पर धौंस जमाते हैं...
यही सच है ...!!
अब क्या कहें,सोचने पर विवश करती हुई आपकी पोस्ट.
कभी कभी मैं बाजार से सब्जी वगैरह जिस दाम में लाता हूँ उससे कम ही श्रीमती जी को बताता हूँ।
मोल भाव के मामले में हम पुरूष वैसे भी अनपढ हैं...
और एक राज की बात ये है कि घर में मेरी श्रीमती जी भी यह जानती हैं कि मैने चीजें ज्यादा दामों पर खरीदी होंगी और मन रखने के लिये कम बता रहा हूँ....ये मेरे ख्याल से एक तरह की आपसी अंडरस्टैंडिंग है जो कि मेरे यहां चलते रहा है। शायद और भी लोगों के यहां यह अंडरस्टैंडिग जरूर चलती होगी। अब इसमें यदि अरब कंट्री में होता तो जरूर अब तक कोई न कोई ठप्पा उस माहौल के हिसाब से लग जाता :)
एकदम सही कहा आपने...अधिकांशतः यह धारणा देखने को मिलती है कि मर्द/पति होने का मतलब स्त्री/पत्नी का तिरस्कार करना, अवहेलना करना माना जाता है...चाहे वह लाख सही क्यों न हो...
mardon ki ego jise wo mardangi kehte hain apni biwi ya behno par hi kyun dikhti hai???
ye mardangi tab kahan jaati hai jab koi usse shaktishali vyakti kuch ghalat kehta hai
किसी की अच्छी सलाह पर आचरण करना तो अच्छी बात है । स्वयं के होने का अहंकार तो त्यागना पड़ेगा ।
अरब में स्त्रियों की जो दशा है उसमें इससे ज्यादा क्या उम्मीद की जा सकती है। भारतीय समाज में भी गाँव-देहात में अनपढ़ स्त्रियों पर पुरुषों को धौंस जमाते देखते हैं। पर खुशी की बात है कि शहरी समाज में अब ऐसा बहुत कम है और उत्तरोत्तर सुधार होता जा रहा है।
बाकी एक बात से जरुर हैरानी होती है कि कुछ प्रगतिशील महिला ब्लॉगर हर पुरुष को विलेन बनाने पर तुली रहती हैं। महिलाओं का सम्मान करने वाले भी पुरुष इस दुनिया में मौजूद हैं, घुघूत का उदाहरण सबके सामने है ही।
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