मंगलवार, मार्च 09, 2010

मीठा मीठा गप्प, कड़वा कड़वा थू।................घुघूती बासूती

वाह, आरक्षण के पक्षधर अचानक उसके विरोधी हो गए! जब आरक्षण खुद को नौकरी में मिलना था तब तक उसके लिए युद्ध में डटे हुए थे। तब उसके विरोधी सामाजिक न्याय के विरोधी दिख रहे थे, अकेले मलाई खाना चाहने वाले लगते थे। तब आरक्षण समर्थक चाहते थे कि अगड़ी जाति वाले सामाजिक न्याय के लिए त्याग करें। मेरिट जैसी ओछी बातें न करें। मेरिट से क्या होता है? मेरिट क्यों आवश्यक है? कोई भी सामान्य या मन्द बुद्धि व्यक्ति भी सामाजिक न्याय के लिए न्यायाधीश, सर्जन या कुछ भी बना दिया जाना चाहिए। यदि अधिक प्रतिभावान होगा तो वैसे भी अनारक्षित श्रेणी में चुन लिया जाएगा। यदि नहीं तो उसके लिए आरक्षण चाहिए था। अब जब मलाई की कटोरी अपने हाथ में है और वह छिनती नजर आती है तब अचानक उन्हें यह आरक्षण गलत लग रहा है। नहीं होना चाहिए। क्योंकि यदि हुआ तो ५४३ सीटों में से केवल २८२ ही इन सुविधापरस्तों के हाथ आएँगी। अचानक १८१ सीट इनके हाथ से निकल जाएँगी। पहले भी ये सब इनके हाथ में तो नहीं थीं किन्तु पाने की आशा, स्वप्न तो पाल ही सकते थे। अब तो मुँगेरी लाल के हसीन सपने ही टूट जाएँगे।

देखा कैसा दुख होता है जब सपने टूटते हैं! ये लोग भी राजनीति में चुनाव जीतना ही क्यों लक्ष्य मानते हैं? लक्ष्य बदल कर सेवा क्यों नहीं कर लेते? यदि सेवा में मेवा नहीं है तो फिर कोई और राह पकड़ें।

आज जब युगों से दलितों की तरह ही सताई, कम से कम माह में चार दिन तो अछूत मानी जाती रही स्त्री को आरक्षण मिल रहा है तो कैसा तो कष्ट हो रहा है! स्त्री जो धन व साधनों का उपभोग तो करती रही है किन्तु तभी तक जब तक स्वामी की खुशी हो। ठीक वैसे ही जैसे दास या दासी को यदि स्वामी खुश हो तो बढ़िया खाने, पीने, पहनने ओढ़ने को मिलता रहता है। यह उसका अधिकार नहीं होता। अधिकार तो केवल अपनी सम्पत्ति पर होता है किन्तु स्त्री के पास कैसी सम्पत्ति थी सिवाय दान में मिले आभूषणों के? पिछड़ी जाति के पुरुषों से कहीं अधिक ही पीड़ित थी स्त्री। यदि उससे अधिक कोई पीड़ित था तो वह था दलित पुरुष और सबसे अधिक पीड़ित थी दलित स्त्री।

मैं जानना चाहूँगी कि जब पिछड़ी जाति को आरक्षण मिल रहा था तब ये पुरुष उस आरक्षण में आरक्षण की माँग क्यों नहीं कर रहे थे? क्या उन्हें यह नहीं दिखता था कि उनकी जाति में भी अधिक पिछड़ी उनकी स्त्रियाँ हैं? तब तो अपना हिस्सा ले विजय रथ पर बैठ ढोल नगाड़े पीट रहे थे । तब सामाजिक न्याय की याद भी न आई। तब यह न नजर आया कि परकटी नहीं, परवाली इन्हीं जाति की स्त्रियाँ, गिनी चुनी आरक्षित सीटों पर अपनी जाति के पुरुषों के साथ कैसे स्पर्धा कर पाएँगी। तब आरक्षण के भीतर आरक्षण का विचार क्यों न इनके मस्तिष्क में आया? क्यों ऐसे सारे विचार तभी कुलबुलाने लगते हैं जब अपने कटोरे की मलाई किसी से बाँटनी पड़ती है?

क्या संसद में जो हो रहा है उससे यह साबित नहीं हो जाता कि जब पुरुष वर्चस्व पर चोट पड़ रही है तो वे अपने जातीय आधार को बचाने के लिए विरोध का नाटक कर रहे हैं। अब स्त्रियों के लिए आरक्षित की जाने वाली सीटों में न केवल पिछड़ी जाति अपितु अल्प संख्यकों का हिस्सा भी दिलाना आवश्यक होता जा रहा है। यह ध्यान अपने हिस्से को लेते समय क्यों नहीं आया था?

मैं तो कहूँगी कि स्त्रियो, न अगड़ों न पिछड़ों किसी के भी बहकावे में मत आओ। याद रखो तुम दलित थीं, दलित हो और यदि दलित नहीं रहना है तो अपने अधिकारों के लिए लड़ो। उनकी भीख मत माँगो। आरक्षण मत माँगो। हम ३३ प्रतिशत न हैं न होना चाहेंगी। हम आधा संसार हैं, आधा संसार हमारा है। हर क्षेत्र से एक स्त्री व एक पुरुष उम्मीदवार चुने जाने चाहिए़। यदि संसद में सांसदों की संख्या दुगनी नहीं करनी तो ५४३ से ३०० स्त्रियाँ ३०० पुरुष कर दो। दलितों का आरक्षण तो इनमें रहेगा ही।

सच तो यह है कि यहाँ जो भी चल रहा है उसमें बात सिद्धान्तों की बिल्कुल नहीं है, केवल अवसरवाद की है।

आरक्षण में विश्वास न रखने वाली,
घुघूती बासूती

30 comments:

रचना ने कहा…

आरक्षण में विश्वास न रखने वाली,Rachna

rashmi ravija ने कहा…

"पिछड़ी जाति के पुरुषों से कहीं अधिक ही पीड़ित थी स्त्री।"
घुघूती जी,थी नहीं है....समग्र रूप से देखें....तो कितने प्रतिशत स्त्रियों को स्वतंत्रता है??...अब भी वे आर्थिक रूप से पुरुषों पर ही निर्भर है....और पुरुष इस निर्भरता को बनाए रखना चाहते हैं.बड़ी बड़ी बातें करना अलग बात है...कि जिसमे प्रतिभा और लगन होती है..वे आगे बढ़ जाती हैं,कुछ कर गुजरती हैं...पर ये सब बातें हैं.... इन्हें आगे बढ़ने के लिए..प्रोत्साहन चाहिए ना कि बंदिशें...

Mired Mirage ने कहा…

रश्मि जी, हाँ, थीं व हैं और भविष्य में न रहें इसके लिए कुछ करना होगा।
इसीलिए मैंने यह भी कहा,
'तुम दलित थीं, दलित हो और यदि दलित नहीं रहना है तो अपने अधिकारों के लिए लड़ो।'
घुघूती बासूती

mukti ने कहा…

ये बात बड़े पते की कही आपने,"मैं जानना चाहूँगी कि जब पिछड़ी जाति को आरक्षण मिल रहा था तब ये पुरुष उस आरक्षण में आरक्षण की माँग क्यों नहीं कर रहे थे? क्या उन्हें यह नहीं दिखता था कि उनकी जाति में भी अधिक पिछड़ी उनकी स्त्रियाँ हैं? "
आरक्षण में मैं भी विश्वास नहीं रखती ५० प्रतिशत औरतों को ३३ प्रतिशत आरक्षण ... ऐसा लगता है भीख दे रहे हों... पर इसी बहाने कैसे इन लोगों की मंशा जाहिर हो रही है...ये देखने लायक बात है.

rashmi ravija ने कहा…

हाँ...लोग कहते हैं... इंदिरा गांधी,किरण बेदी और कल्पना चावला..आदि कैसे आगे बढ़ पायीं?. उनमें प्रतिभा,लगन,जीवट साहस सब कुछ था... जिस से वे उस मकाम तक पहुँच पायीं...पर उतनी ही प्रतिभा,लगन.साहस...देश की सैकड़ों लड़कियों में हैं...क्यूँ उनकी प्रतिभा दबी,छुपी हुई है.?इन महिलाओं को एक जरिया मिला...अच्छी शिक्षा..पिता का प्रोत्साहन मिला...जिस से वे निखर कर सामने आयीं....अब अपने बल पर ही स्त्रियों को आगे बढ़ना है. स्त्रियाँ आगे बढेंगी.....बढ़ भी रही हैं..पर उनकी रफ़्तार बहुत धीमी है....आरक्षण से गति में थोड़ी...तीव्रता आ जाती,बस ..

VICHAAR SHOONYA ने कहा…

i am against reservation whether it is in jobs or elsewhere. the idea of reservation was introdused to provide support to the weaker sections of the society as we do with the poor people by giving them alms so that they can consolidate their position, but as we know very well that alms do not make a poor rich but they make our country rich with beggers. in the case of women reservation word should not be used. in fact this is their right.

Sonal Rastogi ने कहा…

आरक्षण ...मैं कभी इसको समझ ही नहीं पाई "आरक्षण किससे और किसको ", भारत को आज़ाद हुए इतना अरसा बीत चुका है पर वर्गीकरण ना जाने कब ख़त्म होगा, कभी धर्म कभी जाति और कभी लिंग के नाम पर

indian citizen ने कहा…

अच्छा है कि बिल पास हो जाये.

Dr. Smt. ajit gupta ने कहा…

हम सभी आरक्षित पुरुषों का नाटक देख रहे हैं। या उनका बिलबिलाना देख रहे हैं। हमें तो इसी में आनन्‍द आ रहा है कि जब अपने अधिकारों में कटौती की सम्‍भावना बनती है तब कैसे बिलबिलाया जाता है।

ali ने कहा…

आपकी सोच दूसरों से भिन्न है पर आज कोई टिप्पणी नहीं !



( संभव है कुछ दिन आपको दिखाई ना दूं ...कोई टिप्पणी भी ना कर सकूं ! मुझे जहां काम हैं शायद वहां नेटवर्क नहीं होगा ! कोशिश करूंगा कि इस दौरान किसी छुट्टी के दिन आपसे सलाम दुआ कर पाऊं ! आपके नियमित पाठक बतौर मेरी गुमशुदगी को अन्यथा मत लीजियेगा )

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

कष्ट तब होता है जब गरीब, गरीब ही रह जाते हैं । शोषित, शोषित ही रह जाते हैं । सर्वेक्षण कराया जा सकता है कि किसको कितना लाभ हुआ । अभी संसद की धमाचौकड़ी इसकी सबसे गन्दी अभिव्यक्ति है । आरक्षण होने के बाद भी राजनीति कौन करेगा, यह देखने की बात रहेगी ।

वर्षा ने कहा…

आरक्षण में मैं भी विश्वास नहीं करती लेकिन ये 33फीसदी फिलवक़्त तो बहुत जरूरी हैं।

शरद कोकास ने कहा…

आरक्षण का अर्थ किसी प्रकार का आल्म्बन नहीं है न ही यह किसी तरह की सहानुभूति अथवा उपकार है । इतिहास ने स्त्री व दलित जैसे समुदायों के साथ न्याय नहीं किया है । एक लम्बी परम्परा उनके शोषण की रही है । इसके लिये सामाजिक व राजनैतिक सोच दोनो ही ज़िम्मेदार हैं । मूलत: यह व्यवस्था संविधान में ही होनी चाहिये थी लेकिन ऐसा न होने की कई वज़हे रहीं हैं । स्त्री या दलित में किसी के महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लेने या उच्च पद प्राप्त कर लेने का यह अर्थ कदापि नहीं होता के वे उस समुदाय का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं अथवा स्थितियाँ बदल गई हैं । शिक्षा, नौकरी अदि में आरक्षण इस प्रक्रिया की प्रथम सीढ़ी है लेकिन वह भी पर्याप्त नहीं है इसलिये कि आरक्षण क्यों ज़रूरी है यह अब तक समझाया ही नही गया है ।

कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra) ने कहा…

कुछ कहने के लिये बचता ही कहाँ है,...

शब्दशः सहमति..

स्वप्नदर्शी ने कहा…

Behtar lekh. Thanks for this

बेचैन आत्मा ने कहा…

मैं तो कहूँगी कि स्त्रियो, न अगड़ों न पिछड़ों किसी के भी बहकावे में मत आओ। याद रखो तुम दलित थीं, दलित हो और यदि दलित नहीं रहना है तो अपने अधिकारों के लिए लड़ो। उनकी भीख मत माँगो। आरक्षण मत माँगो।
...दमदार पंक्तियाँ...यही सही है.
एक शेर याद आ गया...
खुदी को कर बुलंद इतना हर तकदीर से पहले
खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है!

लवली कुमारी ने कहा…

मैं शरद जी से सहमत हूँ.

मनोज कुमार ने कहा…

आपसे सहमत हूं।

अर्कजेश ने कहा…

आरक्षण जरूरी है । दलितों के सामाजिक स्‍तर को ऊपर उठाने के लिए और उन्‍हें सत्‍ता में भागीदारी के लिए ।

नारीवादियों की सवर्णवादी मानसिकता यहां पर साफ जाहिर हो रही है ।

आरक्षण न होता या अभी आरक्षण न होगा तो आप क्‍या समझते हैं कि कितने दलित और आदिवासी सत्‍ता या प्रशासन के किसी पद पर पहुँच पायेंगे । हजारों वर्षों से दमित लोगों को उभरने में समय तो लगेगा न ।

यही स्थिति महिला आरक्षण के मामले में भी सत्‍य है ।

दीपक 'मशाल' ने कहा…

Aunty.. main aarakshan ke virodh me nahin lekin dukh hua dekh kar ki vote banane ke chakkar me ek bar fir desh ko baant diya gaya.. aur ab mahila-purush ke naam par.
shayad aapne hawa me ki jane wali baten dekhi hain.. kabhi ye nahin dekha ki ek mahila jab neta banti hai to wo sirf kathputli hi hoti hai, aur wo bhi 1-2 nahin 90% cases me.. arakshan dena hai to un mahila netriyon ko azadi se bina apne patiyon ya beton ka sahara liye kaam karne me arakshan do..
ummeed hai aap baat ka marm samjhengeen..
Jai Hind...

दीपक 'मशाल' ने कहा…

Mahila aarakshan ke samarthakon ke likye Kajal kumar ka ye cartoon sahi hai-http://kajalkumarcartoons.blogspot.com/2010/03/blog-post_09.html
aapke vichar achchhe lage..

Archana ने कहा…

BILKUL SAHI KAH AAPNE
365 DINO MEIN EK DIN WOMENS DAY MANAYA JATA HAI.......KYUN ..BAKI KE 364 DIN???
14 SAAL KE BAAD JO MILA HAI USKI KHUSI TO MANA LENE DO..FIR DEKHA JAYEGA AARKHSHAN KE ANDER AARAKSHAN.
FILHAAL TO SABKO BADHAI.......

Suresh Chiplunkar ने कहा…

"...तब आरक्षण समर्थक चाहते थे कि अगड़ी जाति वाले सामाजिक न्याय के लिए त्याग करें। मेरिट जैसी ओछी बातें न करें। मेरिट से क्या होता है? मेरिट क्यों आवश्यक है? कोई भी सामान्य या मन्द बुद्धि व्यक्ति भी सामाजिक न्याय के लिए न्यायाधीश, सर्जन या कुछ भी बना दिया जाना चाहिए। यदि अधिक प्रतिभावान होगा तो वैसे भी अनारक्षित श्रेणी में चुन लिया जाएगा। यदि नहीं तो उसके लिए आरक्षण चाहिए था। अब जब मलाई की कटोरी अपने हाथ में है और वह छिनती नजर आती है तब अचानक उन्हें यह आरक्षण गलत लग रहा है..."

100% agreed, excellent article...

Fauziya Reyaz ने कहा…

sahi kaha bilkul sahi...ye sab sirf raajniti hai...kisi ko bhi mahilaon ke aarakshan ki nahi padi bas chaalakiyan hain...
rajya sabha ka rasta to saaf ho gaya but abhi jang baaqi hai

अफ़लातून ने कहा…

अर्कजेशजी की पकड़ से सहमत हूँ ।

Anil Pusadkar ने कहा…

isse pahle jab mahila aarakshan nahi tha tab raabdi devi c m bani chuki hai,to kya ve sachmuch c m thi.kya mahila hona khaaskar svatantra mahilaa hona saabit kar payi thi ve.saval aarakshan ya kisi prakar ke samarthan ka nahi hai,saval hai yogyata ka.indira gandhi ko kisi aarakshan ki zarurat nahi padi.aur bhi udaharan hai,fir bhi ye achchi pahal hai basharte iskaa fayada aarakshan ka labh milne ki paatra mahila kaa purush rishtedaar n utha le.

निर्मला कपिला ने कहा…

रे आप सब मेरे सपने को तोदने मे क्यों लगे हो। मै तो कल से सपने ले रही हूँ अपने पति की सीट हथिआने के। क्या सपना सपना ही रह जायेगा? मै अजित गुप्ता जी से सहमत हूँ। सब का ड्रामा देख कर आनन्द आ रहा है। आरक्षण तो केवल नाम के लिये है जैसे आगे पंचायतों मे औरत के तो दस्तखत ही चलते हैं काम तो पुरुश ही करते हैं। असली आरक्षण तो तब होगा जब हम लोग अपने बल बूते पर संसद मे भागीदारी करेंगी। फिर भी लगता है अभी पैर तो फंसे बाकी सब भी हो जायेगा। धन्यवाद। कम से कम ये तो साबित हो गया कि हमारा आधा हक देने के लिये भी पुरुश समाज राजी नही है।

अनिल कान्त : ने कहा…

शरद कोकस जी से सहमत हूँ.

Manish ने कहा…

idhar kuchh na kahna hi behtar hoga... :) :)

ePandit ने कहा…

नेताओं का दोगलापन इस लेख से उजागर होता है। लालू जैसों को डर है कि स्त्री सांसद बहुमत में आ गईं तो वे अपनी हर सही गलत नहीं मनवा सकेंगे।

स्त्रियों की आपकी बताई दशा में सुधार शिक्षा से ही सम्भव है। हालांकि इसमें समय लगेगा, लेकिन धीरे-धीरे शिक्षा के प्रसार के साथ यह होता जायेगा। जरा सोचिये नारी के शिक्षित होने से पिछली पीढ़ी की तुलना में स्त्री की दशा में कितना सुधार हो गया है। यह प्रक्रिया क्रम से बढ़ती रहेगी।