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Thursday, March 31, 2016

बच्चों के साथ क्वालिटी समय या अनमना समय

अपनी नतिनी तन्वी को हर शाम सोसायटी के पार्क खेलने ले जाती हूँ। बहुत अच्छा और बड़ा पार्क है। छोटे बच्चों के साथ प्रायः माता पिता, दादा दादी, नाना नानी या आया आती हैं। अभी तक मेरे सामने कोई गम्भीर दुर्घटना तो नहीं घटी किन्तु कई बार बच्चों को झूले से चोट लगते देखती हूँ। प्रायः ये दुर्घटनाएँ रोकी जा सकती हैं। दो बातें अभिभावकों का ध्यान अपने बच्चे की सुरक्षा से भटका देती हैं, एक तो है मोबाइल दूसरा अन्य अभिभावकों से बातें करने में खो जाना।
कल ही एक छः सात साल की बच्ची झूले पर बैठकर लगातार अपनी माँ को पुकारे जा रही थी। प्रायः बच्चों को झूला तो मिल जाता है किन्तु झुलाने वाले गायब हो जाते हैं। बच्चे झूला छोड़ना भी नहीं चाहते सो जाकर बुला भी नहीं पाते। उन्हें भय रहता है कि एक बार अपनी बारी निकल जाने दी तो न जाने कब बारी मिलेगी। खैर, बच्ची लगातार बुलाती रही किन्तु माँ नहीं आई। अचानक बच्ची नीचे गिरी और उठने लगी। उठने पर लकड़ी के झूले की पट्टी निश्चित उसके सर पर लगती। मैं पास में ही तन्वी को झुला रही थी। स्टे डाउन, डोन्ट गेट अप चिल्लाती उसके झूले को पकड़ने दौड़ी। भाग्य से इसके पहले कि झूला उसके सर से टकराता मेरे हाथ में था।
इस बार माँ पल भर में ही पहुँच गई थी और मुझे आभार कह बच्ची को डाँटती हुई यह कहते हुए घसीटते हुए ले गई, हुण तेन्नू कदे एथ्थे नहीं लावाँगी। तेन्नू झूटे लेणा वी नहीं आन्दा।
उसका इतना जल्दी पहुँच जाना सिद्ध करता है कि वह आस पास ही थी किन्तु बच्ची की पुकार को जानबूझ कर अनसुना कर रही थी।
परसों एक और माँ बच्ची को पींग लेना सिखा रही थी और न सीख पाने पर फटकार रही थी कि मुझे विश्वास नहीं होता कि तुम मेरी बेटी हो। माँ में सिखाने धैर्य नहीं था और बच्ची को रुआँसा कर वह चलती बनी।
कुछ दिन पहले एक वृद्ध एक पाँच सात महीने के बच्चे को गोद में लकर आए। उन्होंने दस बारह साल की अपनी पोती के हाथ में बच्चा दे उसे झूले पर बैठा दिया। बच्ची झूले को पकड़े या बच्चे को? सो उसकी एक बाँह झूले की चेन के दूसरी तरफ से निकाल बच्चा गोद में बैठा दिया। फिर एक तरफ से चेन पकड़ उन्होंने जो झुलाना शुरु किया लगा कि वे भूल गए हैं कि नन्हा सा बच्चा एक ही हाथ के सहारे बच्ची ने पकड़ रखा है। और एक ही तरफ से चेन को लगातार हिलाते रहने से न केवल झूला तेज जा रहा था बल्कि बहुत टेढ़ा जा रहा था। मुझे लग रहा था कि बच्चा अब गोद से छिटकेगा ही। भाग्य से बच्चे का पिता डैडी, डैडी, रोको, रोको, इतना तेज मत झुलाओ कहता हुआ आया और बच्चे को अपने साथ ले गया।

एक दिन लगभग दो वर्ष की बच्ची अकेली घिसलपट्टी की सीढ़ियाँ चढ़ रही थी। उसका पिता मोबाइल पर व्यस्त था। लड़खड़ाती हुई बच्ची के पिता से जब मैंने पूछा क्या यह अकेली सीढ़ी चढ़ सकती है तो उसने कहा, हाँ थोड़ा चढ़ जाती है किन्तु गिर सकती है। फिर उसका ध्यान बच्ची पर गया जो काफी ऊपर चढ़ डगमग हो रही थी। लपक कर उसने बच्ची को सम्भाला, किन्तु उसे नीचे उतार वापिस मोबाइल पर व्यस्त हो गया।
ऐसा भी नहीं है कि अधिक ध्यान रखने से बच्चों को चोट नहीं लगेगी किन्तु इतनी लापरवाही आश्चर्यचकित अवश्य करती है। यह बात भी समझ नहीं आती कि क्या हम अपने बच्चों को कुछ मिनट का अबाधित, बिना किसी अन्य से मोबाइल पर बतिआए समय नहीं दे सकते। बच्चों के साथ ऐसे अनमने और जबरन बिताए समय का क्या लाभ? शायद इसीलिए क्वालिटी समय की इतनी बात होती है। आखिर हमारे बच्चे से अधिक महत्वपूर्ण और वह भी उसके साथ खेलने के समय में, संसार में क्या हो सकता है?
घुघूती बासूती

Monday, May 18, 2009

माँ क्या तुम रोई नहीं?

बिटिया को फोन पर बताया कि आज 'तारे जमीं पर' देखी। उसका पहला प्रश्न था कि माँ क्या तुम रोई नहीं? मैंने कहा कि नहीं, क्रोध, क्षोभ के अतिरेक के चलते रो नहीं सकी। कहा कि मुझे तुम लोगों की याद आई और तुम्हें हॉस्टेल छोड़ने का दृष्य याद आया। तुम दोनों को ईशान की जगह रखकर देखा। जब उसे हॉस्टेल छोड़ा था तो वह अपेक्षाकृत बड़ी भी थी और अपनी इच्छा से गई थी। फिर भी मन का क्या हाल हुआ था। कितने अनजाने भयों ने मुझे घेरा हुआ था। जब तक उससे दोबारा मिल नहीं ली शान्ति नहीं हुई थी। एक माँ के लिए बच्चे को पहले दिन स्कूल में छोड़ना और पहली बार हॉस्टेल में छोड़ना बहुत कठिन होता है।


खैर बात 'तारे जमीं पर' की हो रही थी। देखते समय मन अवसाद से भर गया। अन्त सुखद था किन्तु यदि ईशान को वह कला का अध्यापक नहीं मिलता तो ! सोचकर ही काँप जाती हूँ। यदि संसार के माता पिता देखें और उनके माता पिता कहलाने की योग्यता को देखें तो भगवान नाम की वस्तु पर कभी विश्वास नहीं हो सकता। यदि वह होता तो क्या इतने अयोग्य व अपरिपक्व लोगों को माता पिता बनने का भगवान सा दायित्व कभी सौंपता। वह तो या है ही नहीं या स्वयं इतना अपूर्ण है कि उसने मानव को भी कितना अयोग्य व अपरिपूर्ण बनाकर उसे एक क्या अनेक नन्हे बच्चों का दायित्व बिना कुछ सोचे समझे पकड़ा दिया। न जाने कितने ईशान अपने पिता के झूठे दम्भ व अपनी माँ की असहायता भरे पिता के सामने झुकते स्वभाव का शिकार होते हैं।


पिता के बारे में अधिक नहीं कहूँगी (इस बारे में पुरुष ही बेहतर कह सकते हैं।) किन्तु माँ के असहाय होने पर बहुत क्रोध आया। ऐसी असहाय माँओं को जो अपनी संतान के लिए भी अपने पति का विरोध नहीं कर सकतीं माँ बनने का अधिकार ही नहीं होना चाहिए। जितनी भी आज्ञाकारी सुशील पत्नी बनने का शौक हो अवश्य पूरा करो परन्तु अपने बच्चों की बलि चढ़ाकर नहीं। अरे, किसी पशु या पक्षी माँ को ही देखकर उससे सीखो। उनके पास तो माँ बनने या न बनने का चुनाव भी नहीं होता परन्तु एक बार जब माँ बनती हैं तो अपने बच्चों की रक्षा के लिए जान की बाजी लगा देती हैं। यहाँ एक जगह बताया जाता है कि बच्चों के लिए उसने अपनी आजीविका को छोड़ा। त्याग का कोई महत्व नहीं है, जब तक जिसके लिए त्याग किया हो उसको लाभ न मिले। किसी बच्चे को इसलिए छात्रावास में डालना क्योंकि वह हमसे संभलता नहीं है अपने दायित्व से मुँह फेरना है। बच्चे संसार के सबसे असहाय प्राणी होते हैं। उनपर अन्याय करना सबसे निकृष्ट काम है। ईशान की असहाय अवस्था देखकर मन तड़प उठता है।


हमारा समाज सही अर्थों में समाज नहीं है जंगल राज्य है। जो इस व्यवस्था में फिट बैठ जाए वह सामान्य जीवन जी सकता है, जो उसपर विजय पा ले वह विजयी हो जाता है। जो जरा सा भी सामान्य से इधर उधर हुआ समाज उसे लील जाता है। ईशान भी हमारी इस व्यवस्था की वेदी पर बलि चढ़ ही जाने वाला था। इससे तो पहले का जमाना या गाँव ही बेहतर हैं जहाँ बच्चा यदि विद्यालय में असफल रहता है तो कोई अन्य काम कर अपनी आजीविका चला लेता है। किन्तु शहरों में तो हम हर बच्चे से विद्यालय में सफल होने की अपेक्षा रखते हैं और उसके सिवाय भी जीवन में कुछ है न तो सोच पाते हैं न ही बच्चे को कोई विकल्प ही दे पाते हैं।


हम स्कूलों में भेड़ बकरियों की तरह बच्चे भर देते हैं और उनसे आशा करते हैं कि वे चाहे जिस भी नाप या आकार के हों हमारे बनाए खानों में फिट बैठ जाएँ। यदि आपने कभी आलू भी उगाएँ हों तो जानेंगे कि सब आलू एक ही नाप व आकार के नहीं होते। फिर क्या आप बच्चे को काट छाँट कर अपने बनाए खानों में फिट करेंगे? कुछ बड़े स्कूलों ने इस बात को ध्यान में रखकर बच्चों की ग्राह्य क्षमता के अनुसार उन्हें विभिन्न वर्गों में रखने का प्रयास किया। यह सफल भी हो सकता है। यदि इसमें भी स्कूल व माता पिता का दम्भ आड़े न आए। यदि धीरे सीखने वाले बच्चों को हेय दृष्टि से न देखा जाए, यदि धीमे बच्चों का पाठ्यक्रम कम कर दिया जाए और उन्हें पढ़ने को अधिक समय दिया जाए तो वे भी काफी कुछ सीख सकते हैं। सभी बच्चों से समान समय में समान पाठ्यक्रम घोटने की अपेक्षा न केवल धीमे बच्चों के साथ अन्याय है अपितु तेज बच्चों की पढ़ाई के प्रति अरुचि पैदा करने की भी उत्तरदायी है। कितने ही कुशाग्र बुद्धि बच्चे इस धीमी गति की पढ़ाई से उकता जाते हैं व नई नई शैतानियाँ कर अपना मन बहलाते हैं।


सभी बच्चों को एक ही स्कूल में पढ़ने का समान अवसर देना नैतिक तो हो सकता है परन्तु व्यवहारिक नहीं। जब कक्षा में पचास से अधिक छात्र हों और एक अध्यापक के पास उन्हें देने को कुल ४५ मिनट हों तो क्या अलग अलग योग्यता या कमी वाले हर छात्र को देने को अध्यापक के पास समय हो सकता है ? वह भी तब जब अध्यापक सबसे अधिक योग्यता के आधार पर बनाए या चुने नहीं जाते अपितु मजबूरी या बहुत से अन्य कारणों के कारण बनते व चुने जाते हैं।


सोचिए कैसा होता यदि आपका बच्चा बस में लदकर स्कूल जाने की बजाए अपने ही क्षेत्र के एक स्कूल में पैदल या साइकिल चलाकर जाता। जहाँ दो चार अध्यापक केवल कमजोर या विशेष छात्रों की सहायता के लिए ही होते। जहाँ उसे दाखिले के लिए कोई साक्षात्कार न देना होता। बच्चा है तो स्कूल में उसके लिए जगह भी होती। यदि माता पिता दोनों कामकाजी हैं तो एक विशेष शुल्क देने पर जहाँ वह उनके आने तक आराम से खेलता, आराम करता, खाना खाता, पढ़ाई करता या पुस्तकालय में पुस्तकें पढ़ता या टी वी देखता।


क्या यह असंभव लगता है ? यदि सोचा जाए तो इतना असंभव भी नहीं है। ये सरकारी स्कूल किसलिए बनाए गए हैं ? अन्य देशों में कैसे बच्चे इन्हीं में पढ़कर सफल हो रहे हैं ? इन्हें सुधारकर ऐसा क्यों नहीं बनाया जाता ? क्यों नहीं इनकी नए सिरे से रचना की जा सकती ? एक नई अध्यापन सेवा की घोषणा क्यों नहीं की जाती ? प्रशासनिक सेवा की सी तर्ज पर। जहाँ अच्छा वेतन व सम्मान मिलेगा किन्तु आठ घंटे के कड़े श्रम व दायित्व के बाद। शायद इस सेवा को निजी कम्पनियों के हाथ में भी थमाया जा सकता है। यदि स्कूल ढंग से न चलें तो किसी अन्य को दिया जा सकता है। इस तरह इनमें स्पर्धा भी होगी। संसार में अपनी सफल निजी कम्पनियाँ स्थापित कर नाम कमा चुके लोग अवकाशप्राप्ति के बाद जीवन को अर्थ व दिशा देने के रास्ते खोज रहे हैं। ऐसे व बहुत से अन्य सफल व अवकाशप्राप्त लोग शायद यह चुनौती स्वीकार कर सकते हैं। ये व कुछ जाने माने शिक्षाविद यह प्रयोग कर सकते हैं व सफल होने पर इसी मॉडेल पर स्कूल चलाए जा सकते हैं।


जो भी हो हमारे अज्ञान व आलस के कारण हमारे बच्चों को कष्ट हो और वे अन्याय सहें यह गलत है। सारा संसार रुक सकता है, सही नीतियाँ बनने की प्रतीक्षा कर सकता है किन्तु बच्चे प्रतीक्षा नहीं कर सकते। उनके लिए जो करना है आज ही होना चाहिए। कल बहुत देर हो चुकी होगी।


घुघूती बासूती