Monday, August 29, 2016

फसल


हम वह काटते हैं 
जो हमने बोया था
और वह भी 
जो बेशर्मी से 
अपने आप उग आया हो
बिन बुलाए मेहमान सा
जिसे हम देख न पाएँ हों
गुड़ाई के समय
या निकालने में अलसा गए हों
या फिर सहिष्णुता दिखाते हुए
छोड़ दिया हो उसके हाल 
और वह भी जिसके बीज
किसी षणयंत्र के अन्तर्गत
छिड़क दिए गए हों 
हमारे खेत में
कोयल के अंडों की तरह
जो पैदा हुए और पलते रहे
हमारी फसल के बीच।
अब पक चुकी है फसल
और हम काट रहे हैं,
जो बोया सो काट रहे हैं
सोचते हुए,
हैरान और परेशान से
कभी अपने बीजों के नमूने
और कभी फसल का 
मिलान करते हुए,
किंकर्तव्यविमूढ़ कुछ पल
फिर लग जाते हैं
अनाज की बिनाई के
असाध्य से काम में।
 
घुघूती बासूती

19 comments:

  1. सामान्य शब्दों में, एक दैनन्दिन घटना के माध्यम से गूढ़ अर्थों को जिस प्रकार आपने उजागर किया है, वह कमाल का है! बहुत ही उम्दा रचना!

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    1. धन्यवाद. भयंकर अवसाद में लिखी रचना.

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  2. सारे जीवन का सार ...बोवाई...जुताई...और बिनाई ....सतत चलने वाला क्रम

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  3. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति मेजर ध्यानचन्द और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

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    1. धन्यवाद हर्षवर्धन.

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  4. बहुत ही सुन्दर और प्रभावी

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  5. बहुत सुन्दर .....

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  6. आज कश्मीर में भी तो यही हो रहा है। बीज भी और खरपतवार भी हमने ही तो बोये। नेहरू दर्शन, असल में खरपतवार उगा गया।

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  7. भयंकर अवसाद में सच ही निकलता है ।

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  8. सुंदर रचना |

    - ख्यालरखे.com

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  9. सही और सच्ची बात है.

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  10. अब पक चुकी है फसल
    और हम काट रहे हैं,
    जो बोया सो काट रहे हैं
    ,... भुगतना तो पड़ता ही है .

    बहुत सुन्दर

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  11. काटना तो पड़ता है सभी कुछ नहीं तो जो बोया है वो भी खोने लगता है ... फिर चाहे न चाहे भविष्य कर्म भी तो देखना होता है ...

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  12. अपने आप उगने वाला कष्टकारी होता है।

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  13. ये खर-पतवार होती है बड़ी बेशर्म ,जहाँ मौका लगे जमने लगती है .

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  14. खर-पतवार कितनी भी हटाते रहो ,फसल पर अपना असर डाल ही देती है.

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