Saturday, August 02, 2014

कब तुम आओगे?


कुछ पल फिर से जी लूँगी
हाल तुम्हारा सुन लूँगी
अपने मन की सब कह दूँगी
पलकें नहीं,
हृदय बिछाए बैठी हूँ
कब तुम आओगे?

खो रहा है चेहरा मेरा
तेरी आँखों में फिर देखूँगी
खो गया है नाम ही मेरा
तेरे मुख से सुन लूँगी
जब तुम आओगे।

शून्य होती भावनाओं को
नया वेग देने को
शिथिल हुए शरीर में
नई संवेदना फूँकने को
मुझे मुझसे मिलवाने को
कब तुम आओगे?

आस लगाए बैठी हूँ
संवेदनी जड़ी ले आओगे
जड़ फिर से चेतन होगा
पंखहीन पक्षी को पंख मिलेंगे
अंधियारे होंगे फिर आलोकित
जब तुम आओगे।

मंद पड़ रही है जीवन ज्योति
साँसें लगतीं चढ़ान पहाड़ की
नयन ढूँढते हैं उस तारे को
जो दिखाता दिशा जीवन की
बाँह पकड़ राह दिखाने
कब तुम आओगे?

घुघूती बासूती

13 comments:

  1. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 04/08/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

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  2. मेरी कविता की लिंक देने के लिए आभार kuldeep thakur जी.
    घुघूतीबासूती

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  3. विरह में भी श्रृंगार रस । सुन्दर रचना ।

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  4. दीर्घ प्रतीक्षित !!!!

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  5. बहुत सुन्दर

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  6. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना...

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  7. बेहतरीन ...

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  8. आस का पंछी जब उड़ान भरने लगता है तो ऊंचाई को भूल जाता है , औए न जाने नभ में कहाँ कहाँ छलांग लगा लेता है ,सुन्दर ,

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  9. सुंदर

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  10. हृदयस्पर्शी ...

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