Friday, June 13, 2014

सागर किनारे



कल लहरों से पास से मिलना नहीं हुआ तो आज सुबह साढ़े दस बजे से एक बजे तक की चिलचिलाती धूप में ही मिल आई।
घर में पेस्ट कन्ट्रोल वाला आकर छिड़काव करके गया था। घर के ठीक सामने सड़क पार एक बहुत सुन्दर पार्क है किन्तु उस समय वह बन्द रहता है। सो सड़क पार करके पाँच मिनट चलकर वर्ली सी फेस के सामने ख़ान अब्दुल गफ़ार ख़ान रोड पर पहुँच गई। सी फेस पर धूप थी, सो सड़क के इस पार ही एक और पार्क है उसके सामने प्याऊ है, टाइल्स लगीं हैं, ऊँचा प्लैटफॉर्म है, उस पर अपना झोला बिछा, बैठकर, लहरों का कभी धरती से मिलने तो कभी आकाश से मिलने का उतावलापन देखती रही। समुद्र का कुछ हिस्सा तो सारे बन्धन तोड़ उड़ उड़ कर सड़क पर ही आ रहा था। बान्द्रा वर्ली सी लिंक को छूने को मचलता और छूकर लौट जाता और फिर आकर उसे छू जाता।
कल पूर्णिमा थी। सो आज भी सागर का पागलपन अपने उफान पर था। वर्ली, दादर और मरीन ड्राइव पर वह जगह जगह अपनी सीमा तोड़ शहर की सड़कों पर घुस आया था। दो घंटा सड़क के इस पार बैठ जब यहाँ भी धूप आ गई तो समुद्र के पास ही चली गई। उसे देख समझ आया कि वह धरती से मिलने को उतावला नहीं हो रहा। वह तो हमारा फेंका कचरा हमें लौटाने आ रहा था। शहर के भीतर सड़कों पर घुस उन दुस्साहसियों को ढूँढ रहा था जिसने उसके जल को कचरे भरे दुर्गन्धित सूप में परिवर्तित कर दिया था।
मुझे सागर के लिए बहुत बुरा लगा। यदि नदी माँ हो सकती है तो सागर पिता क्यों नहीं? आखिर वह ही तो हमें और हमारी नदियों को जल, पहाड़ों को हिम देता है। वह तो शायद माँ और पिता दोनों ही है। किनारे आते पानी में हजारों रंग बिरंगे पॉलीथीन व कचरे के टुकड़े वैसे ही तैर रहे थे जैसे किसी बढ़िया सूप में रंग बिरंगी सब्जियों, चीज़ व क्रुटोन्स के टुकड़े। बस सुगन्ध की जगह वह दुर्गन्ध बिखेर रहा था। सही था, हम सूप में लहसुन डालेंगे तो वह उस सा महकेगा, माँस, मछली या मुर्गा तो उन सा। यदि उसमें सुगन्धित दालचीनी, लवंग और इलायची डालेंगे तो उन जैसा महकेगा।
काफी देर मैं अपने मोबाइल से ही फोटो खींचती रही। तेज धूप के चलते स्क्रीन केवल काला नजर आ रहा था। क्या खींचा पता नहीं। मैं बचने की कोशिश करती रही पर बीच बीच में वह मुझपर भी जलकण बरसाता रहा। खुशी की जगह बस यही खयाल आता रहा घर जाकर दोबारा स्नान करना होगा। किन्तु बेचारा समुद्र! वह कैसे हमसे व हमारी गंदगी से बच सकता है! इतना जल होने पर भी दोबारा स्नान कर स्वच्छ नहीं हो सकता। अपने व अपने समाज, मनुष्यों पर गुस्सा भी आता रहा। तीन नाले तो हम सबका मलमूत्र लेकर सीफेस पर ही खुलते हैं। यह तो समृद्ध, एम एल ए, एम पी, पूर्व मुख्यमंत्री के निवास वाले क्षेत्र का हाल है। साफ सुथरा चमचमाता सीफेस! किन्तु सारा कचरा समुद्र के हिस्से आता है।

कई बार जब ताजा हवा में घूमते हुए भी मुझे इन नालों के मिलन वाली जगहों पर नाक पर रुमाल रखना पड़ता है तो अपने आप व अपनी मनुष्य जाति पर खीझ उठती है। सोचती हूँ प्रकृति इतनी सहिष्णु न होकर यदि पहली गलती पर ही दो थप्पड़ जमा देती तो हम इतना ना बिगड़ते। चाहने से दस राह निकल आती हैं। हम भी समुद्र को कचरा समर्पित करने की बजाए कोई और राह ढूँढ ही लेते। अभी भी बहुत देर नहीं हुई है आओ सागर दो चार थप्पड़ हमारे गाल पर जमा जाओ। फिर भी न मानें तो दो लात जमा जाओ। इसके बिन तुम्हारा और हमारा उद्धार नहीं।
घुघूती बासूती

आज की तो नहीं लगभग तीन साल पहले की कुछ वर्ली सीफेस की फोटो यहाँ लगाईं हैं।
घुघूती बासूती

16 comments:

  1. पर्यावरण के लिए आपकी संवेदनाएं अनुकरणीय हैं. दालचीनी, लवंग और इलायची भी सड़ने के बाद बदबू ही करेगी.

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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    आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (14-06-2014) को "इंतज़ार का ज़ायका" (चर्चा मंच-1643) पर भी होगी!
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  3. आपकी इस पोस्ट को ब्लॉग बुलेटिन की आज कि ब्लॉग बुलेटिन - मेहदी हसन जी की दूसरी पुण्यतिथि में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  4. बहुत सुन्दर चित्र ...आपकी कही बात भी एकदम सटीक है

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  5. गंदगी बिखेरना लोगों की आदत में शुमार है .थूकना ,कूड़ा फेंकना ,नदियों में गंदगी बहाना जैसे उनका मूल अधिकार हो . फ़ोटो सुन्दर हैं .

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  6. सुंदर चित्र. आपने सही समस्या की ओर ध्यान खींचा है

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  7. जब जब मनुष्य को कुछ छूट दी जाती है तो वह उसका दुरूपयोग करता है, उसे अपना अधिकार समझने लगता है। यही प्रकृति के साथ भी हो रहा है।

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  8. सुन्दर चित्र, सच्ची बात!

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  9. कूडा फेंकने वलों को बाहरी देशों में जुर्माना होता है। हमारे यहां पैसे का जुर्माना नही वही कूडा उठा कर सही जगह फेंकने की सजा होनी चाहिये।

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  10. पर्यावरण के प्रति ये संवेदना काबिल-ए -तारीफ है...

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  11. चि‍त्र ही सबकुछ कह देते हैं

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  12. अाजकला "माम" ल कम नहतन। "दूध भाती" "दूध भाती" कबेर कचरा खवूड़ी।

    Heh. Forgive me...for my "Pahari', which is rusty at best, and also for the levity. Hope it wasn't misplaced. I saw your blog mentioned in one of the today's newspapers and was inspired to look it up. Excellent work! Excellent post! :) Best!

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  13. बधाई!
    आज ‘हिन्दुस्तान’ में आपका यह लेख प्रकाशित हुआ है।

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  14. प्रकृति तो सूद समेत ही सब कुछ लौटाएगी.. हो सकता है कि परिणाम भयावह हो.. पर यह सत्य है कि हम उन परिणामों के लिए तैयार कतई नहीं हैं..

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    1. शायद सागर भी कभी अच्छे दिन देखे !

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  15. शायद कभी सागर भी अच्छे दिन देखे !

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