Saturday, July 13, 2013

कैसे भुलाऊं

तुम्हें भुला ही देती

दो जोड़ी पैरों के

निशान छोड़े होते

जो हमने रेत पर .



पानी पर चले होते

जो हाथ पकड़ कर
मिल गुजरे होते

फूलों की घाटी से .


नापी होती परछाइयाँ

व परछाइयों की नाक

खिलखिलाते हुए किसी

सुबह या ढलती शाम.


मिल खड़े हुए होते

किसी ठोस धरातल

स्वप्न बुने होते दो सर
की चांदी के तारों से.


कैसे भुलाऊं सागर की लहरों

को गिनना अभी शेष है ,

नदिया में सूरज की लाली
को तकना अभी शेष है.


खिलखिलाना शेष है

गुदगुदाना, गुनगुनाना,

चहकना, महकना व
फुसफुसाना अभी शेष है.



शेष है कुछ निकम्मे

पलों की मिल आवारगी

शेष है तेरे मेरे प्रेम
की कोई नई बानगी.



मिलना, बिछड़ना,

रूठना, मनाना शेष है

कैसे भुलाऊं रिश्तों का
आरम्भ अंत अभी शेष है.



घुघूती बासूती

18 comments:

  1. आद्यन्त सभी कुछ तो शेष सा रह गया है! चलो नयी ताजगी से शुरू करते हैं फिर से…।

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  2. बहुत सुन्दर. अंत अभी शेष है ...

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  3. कितना कुछ छिपा रखा है इन पलों में..

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  4. बहुत सुन्दर....
    बहुत कुछ शेष है......

    सादर
    अनु

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  5. बहुत ही भावमय और सशक्त रचना, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  6. शेष है कुछ निकम्मे

    पलों की मिल आवारगी

    क्या बात...बहुत खूब

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  7. सुंदर रचना.....वाह

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  8. बहुत सुंदर.....वाह।

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  9. शेष से पूर्ण और पूर्ण का शेष होना ही गति प्रदान करता है।

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  10. रिश्तों के आरम्भ तो हों... पर अंत न हो कभी,
    शेष रह जाए हमेशा कुछ!

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  11. ♥ खिलखिलाना शेष है
    ♥ गुदगुदाना, गुनगुनाना, चहकना, महकना व फुसफुसाना अभी शेष है.

    ♥ शेष है कुछ निकम्मे पलों की मिल आवारगी
    ♥ शेष है तेरे मेरे प्रेम की कोई नई बानगी.

    ♥ मिलना, बिछड़ना,रूठना, मनाना शेष है
    ♥ कैसे भुलाऊं रिश्तों का आरम्भ अंत अभी शेष है.

    वाह वाऽह वाऽहऽऽ…!

    आदरणीया घुघूती बासूती जी
    सुंदर प्रेम कविता के लिए साधुवाद !

    हार्दिक मंगलकामनाओं सहित...
    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  12. बहुत ही सुन्दर कविता । गहरे भावार्थ ।

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  13. मिलना, बिछड़ना,

    रूठना, मनाना शेष है

    कैसे भुलाऊं रिश्तों का
    आरम्भ अंत अभी शेष है.

    वाह गहरे भाव ।

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