Thursday, September 13, 2012

निजी कुछ भी नहीं?................. घुघूती बासूती

मेरी पिछली पोस्ट आखिरी पड़ाव में मैंने एक वृद्धा का जिक्र किया था जो बेहोशी व बदहाली की हालत में अपने घर में पाई गईं थीं। समाचार पत्र में इस खबर में उनका नाम, उनके घर का पता और उनके घर में कितना रुपया व कितना सोना, बैंक में उनके पास कितना पैसा है विस्तार में बताया गया था। देखिए Cops break into flat to save 73-year-old, find Rs. 7 lakh in cash में ये पंक्तियाँ.......

Around 4 pm Thursday, Inspector Sunil Kalvutkar and his team from Goregaon (W) Police Station forced their way into flat number 54 at Piramal Nagar, near Goregaon Railway Station.

An inspection of her apartment threw in more surprises. The police found Rs 7 lakh in cash, stashed in a bag that was kept under the bed. They also found saving scheme certificates worth Rs 2 lakh, and bank statements that showed Rs 72 lakh in savings.

The woman, who is recuperating at Bhagwati Hospital in Borivali, has been identified as Ishwari Jethwani, aged 73. Neighbours said she has been a recluse for the past 14 years, after her retirement from the Worli Dairy.


प्रायः जब कोई व्यक्ति किसी अपराध के शक में पकड़ा जाता है तो समाचार पत्रों में उसके जीवन की अन्तरंग बातें लिख दी जाती हैं। मैं आश्चर्य करती हूँ कि क्या व्यक्ति की कोई भी बात निजी नहीं होती? या अपराध करने की एक सजा यह भी है कि अब आपके जीवन की हर बात उघाड़कर चौराहे पर रख दी जाती है। किन्तु यदि व्यक्ति निरपराध सिद्ध हुआ तो? क्या तब हम उसके जीवन की निजी बातों को फिर से समेटकर पोटली में बाँध, संजोकर उसके घर या मस्तिष्क में रख आएँगे?

किन्तु इस वृद्धा का क्या? उन्होंने कोई रिश्वत न ली थी, चोरी नहीं की थी, बस कंजूसी की थी, क्योंकि वह बेहोश पड़ी थी, इसलिए उसके जीवन को हमने सार्वजनिक कर दिया? उसके घर की सफाई या सफाई की कमी, उसके ऊपर चलते कीड़े मकोड़े, गंदगी, सब लोगों को बता दीं।

चलिए माना भारत में कुछ निजी नहीं है। किन्तु उसे सुरक्षित रहने का तो अधिकार होगा? अब जब उसके घर में पड़े पैसों, गहनों की चर्चा हो गई, उसके पास बैंक में कितना पड़ा है, पैन्शन कितनी आती है भी सार्वजनिक हो गई( इस समाचार पत्र के दूसरे दिन के एडिशन व अन्य समाचार पत्रों में ९ चूड़ियों, लगभग १५००० रुपए की पैन्शन की बात की गई है। ) तो अब किसी लुटेरे या लालची सम्बन्धी को उसे लूटने का खुला निमन्त्रण नहीं दे दिया गया?

यदि वह वृद्धाश्रम में जाने को तैयार हो जाती है तो ठीक किन्तु यदि वह अपने ही घर में रहना चाहे? यदि उसे सहायक की आवश्यकता समझ आ गई हो और वह सहायक रखकर अपने घर में रहना चाहे तो? उसकी सम्पत्ति का पूरा ब्यौरा समाचार पत्रों में निकलने के बाद क्या वह सुरक्षित होगी?

सोचिए, यह मेरा, आपका किसी का भी भविष्य हो सकता है, विशेषकर वृद्ध स्त्रियों का।

घुघूती बासूती

पुनश्चः
पति पत्नी की आयु में प्रायः अन्तर रहता है। उसपर स्त्रियों का अनुमानित जीवन-काल अधिक लम्बा, लगभग पाँच वर्ष अधिक होता है। सो यदि पति ८० में गुजरता है और पत्नी ७५ की है तो औसतन उसे ८५ की उम्र तक याने १० वर्ष अकेले जीना होगा।

घुघूती बासूती


30 comments:

  1. ek gambheer vivechna...is par ghor aaptti darj kara kar media ke dayre tay kiye jane chahiye..jan ki jokhim ki keemat par koi khabr prakashit na ho..

    ReplyDelete
  2. यह दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन पुलिस केस होने के बाद बात मीडिया तक और मीडियो की खोजी खबरी प्रवृत्ति के कारण आम जनता तक तो फैलनी ही थी। पुलिस छुपा नहीं सकती थी और सभी मीडिया न छापे ऐसा हो नहीं सकता था। अब मीडिया और पुलिस दोनो को वृद्धा की सुरक्षा के प्रति सचेत रहने का कर्तव्य निभाना चाहिए।

    ReplyDelete
  3. Anthony kaun hai?7:56 pm

    भरी जवानी में यानि शादी करते वक्त कौन इस बारे में सोचता है? लगता है इसमें भी आपको पितृसत्ता की साजिश नज़र आती है :-)

    और वृद्धा की ही सुरक्षा की चिंता क्यों, सभी वृद्धों की क्यों नहीं? कई बूढ़े भी ऐसी पागलों जैसी मुफलिस हालत में मिले और मीडिया ने उनकी संपत्ति के बारे में सब सही छाप दिया, यानि ऐसा निजता का हनन वृद्धों के साथ होता है न की सिर्फ वृद्धाओं के साथ.

    ये फेमिनिस्ट भी न .............

    ReplyDelete
    Replies
    1. 'Anthony kaun hai?' जी, वृद्ध हों या वृद्धा, समस्या दोनों की ही हैं थोड़ी सी अलग किन्तु बहुत सी एक जैसी। कृपया मेरे पिछले लेख
      आखिरी पड़ाव को पढ़िए। उसमें मैंने एक अकेले अविवाहित वृद्ध की बात भी की है। विवाह अकेले रहने के समय को कम कर सकता है किन्तु दोनो साथियों का इकट्ठा संसार छोड़ना एक चमत्कार ही होगा। कभी न कभी सभी को इस अकेलेपन को झेलना होगा। उस लेख में अकेलेपन से बचने के एक उपाय की चर्चा भी की है।
      उस लेख में वृद्ध की बात करते हुए मैंने कहा है..
      बहुत से अकेले रहने वाले वृद्धों की यह स्थिति हो जाती है। दो तीन साल पहले भी एक वृद्ध की खबर समाचार पत्रों में पढ़ी थी। वह भी अकेला रहता था। विवाह नहीं किया था व भाई, बहनों से कभी सम्पर्क नहीं रखा था। जब उसकी तबीयत खराब रहने लगी तो अचानक एक भय ने उसे जकड़ लिया कि किसी दिन वह यूँ ही अकेला फ्लैट में मर जाएगा और उसका शव सड़ता रहेगा। बस फिर क्या था अच्छा खासा फ्लैट होने पर भी उसने घर छोड़ सड़क पर डेरा डाल दिया। किसी पड़ोसी ने उसको हस्पताल पहुँचाया और उसके भाई आदि का पता लगाया। किन्तु भाई उससे भी वृद्ध था और वह बोला कि मैं अपना ही ध्यान नहीं रख पाता तो उसका कैसे रखूँगा? कैसे अपने बच्चों से अपेक्षा करूँ कि वह मेरा, मेरी पत्नी का और उसका ध्यान रखें। घर छोड़ने के बाद से उसने परिवार से कभी कोई सम्पर्क या सम्बन्ध नहीं रखा सो अब हम उसका ध्यान क्यों रखें?
      फिर शक की आदत की बात करते हुए कहा है.....
      वृद्धावस्था में यदि अपनी सन्तान न हो, या वह दूर रहती हो या वह उत्तरदायित्व न लेना चाहे तो प्रायः वृद्धों की स्थिति खराब हो जाती है। बहुत बार हम उनके सम्बन्धियों को दोष भी नहीं दे सकते। हर परिवार में ऐसे वृद्ध सदस्य या सम्बन्धी पाए जा सकते हैं जो हर किसी पर शक करते हैं। कोई भी उनके घर आए या खोज खबर ले तो वे चिन्तित हो जाते हैं कि इसकी नजर मेरी सम्पत्ति पर है। ऐसे में स्नेही स्वजन भी दूर रहना पसन्द करने लगते हैं।
      फिर मुझ फेमिनिस्ट ने एक शक्की स्त्री की बात भी की है......
      ऐसे ही एक परिवार में वृद्ध पत्नी को पति के हर रिश्तेदार पर शक होता था कि वे उनका पैसा हड़पना चाहते हैं। एक भतीजे पर शक है यह वह दूसरे भतीजे या उसकी पत्नी से कहती दूसरे पर शक है यह पहले से कहती। जब तक उनके पति जीवित रहे भतीजे व उनके परिवार वाले आते रहे, देखभाल भी करते रहे। किन्तु जब वे गुजर गए तो सबने जाना छोड़ दिया कि वे तो हमपर शक करती हैं सो बुरा भला सुनने को क्यों जाएँ। जिनपर उन्हें विश्वास हो वे ही जाएँ।
      हो सके तो वह लेख पढ़िए। हो सके तो पुरुष केन्द्रित लेख भी लिखिए। मेरे पति, भाई, भतीजा, जवाँई व कुछ मित्र पुरुष हैं। उनकी समस्या पर चर्चा करेंगे तो मुझे खुशी होगी।
      आभार सहित,
      घुघूती बासूती

      Delete
  4. समाज इतनी वितृष्णा से भर गया है कि इतनी छोटी और नैतिक बातो को सेाचने की फुर्सत कहां रह गयी है पर हां सोचना चाहियें

    ReplyDelete
  5. i agree that media many a times blows things out of proportion and its invasion of privacy

    by the way mam
    anthony kaun hai ki baato par dhyaan dae aur feminist kaa tag hataa kar empowered woman banae

    ReplyDelete
    Replies
    1. रचना, आपकी बात सही है किन्तु यहाँ समाज की एक बड़ी समस्या, वृद्धों की सुरक्षा, उनके अकेलेपन, उनकी समस्याओं पर बात करने की कोशिश हो रही है। इसमें शायद फेमिनिज्म आया ही नहीं है। वह वृद्धा भी नौकरीपेशा थी। सम्पत्ति भी उसके पास है। बस समय रहते अपने भविष्य को उन्होंने सुरक्षित नहीं किया। यही बात वृद्ध के साथ भी हुई। वृद्ध की खबर दो साल पुरानी थी किन्तु मेरे मन में आज भी अंकित थी। ये दोनों ही हमारे अपने भी हो सकते थे। इसलिए यहाँ मैं चर्चा वृद्धावस्था केन्द्रित ही रखना चाहूँगी। चाहे 'Anthony kaun hai?' जी को सही न भी लगे।
      घुघूती बासूती

      Delete
  6. हमारे समाज की गंभीर समस्या है ये....
    बुजुर्गों को एकाकी जीवन बिताना पड़ता है और अनेकों समस्याएं आती हैं....धन हो तब भी....न हो तब भी...आर्थिक संबल के साथ मानसिक सहारा भी तो चाहिए उन्हें...
    और पति/पत्नि में से कोई एक ही रहा तो और भी मुश्किल...
    आपकी सार्थक पोस्ट के लिए साधूवाद.
    सादर
    अनु

    ReplyDelete
  7. हर परिस्थिति में निजता का मान बना रहे .... हमारे यहाँ ऐसा कम ही हो पाता है | आपकी बातें विचारणीय हैं हम सबके लिए

    ReplyDelete
  8. डॉ॰ मोनिका शर्मा जी, निजता पर हमारे समाज में बहुत कम जोर दिया जाता है. किन्तु यहाँ बात एक वरिष्ठ असहाय नागरिक की सुरक्षा का है. काश, कोई ध्यान देता.
    घुघूतीबासूती

    ReplyDelete
  9. .
    .
    .
    दुखद है यह,

    मीडिया की जिम्मेदारी बनती है कि निजता का सम्मान करे व किसी के भी अस्तित्व को खतरे में न डाले... पर अपने मीडिया से हम यह उम्मीद नहीं कर सकते...

    अभी टीवी देख रहा हूँ, डीजल-गैस के दाम बढ़ने पर सारे चैनल विलाप व भौंकने के मिलेजुले रूप सा कुछ कर रहे हैं... पर कोई यह नहीं बता रहा कि कच्चे तेल के दाम बढ़ने से किस तरह सबसिडी का बोझ इतना बढ़ता जा रहा था कि नियोजित विकास के लिये कोई संसाधन तक नहीं बचते...



    ...

    ReplyDelete
  10. निसंदेह विचारणीय

    ReplyDelete
  11. पता नहीं पर ऐसे आचरण समझना सामान्य बुद्धि के लिये कठिन हो जाता है।

    ReplyDelete
  12. समाचार साधनों की अपनी प्राथमिकताएं खतरनाक हो सकती हैं.

    ReplyDelete
  13. दुर्भाग्यपूर्ण है ... :(

    ReplyDelete
  14. हिन्दीदिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!
    आपका इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (15-09-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    ReplyDelete
  15. भारत में ऐसी दुखद घटनाओं पर भी समाचार माध्यम संयम से काम नहीं करते।

    ( मेरी नई पोस्ट कीट्स आफ गढ़वाल - चन्द्रकुंवर वर्त्वाल देखिए)

    ReplyDelete
  16. Thanks for follow up -no further comments!

    ReplyDelete
  17. घुघूती जी, वरिष्ठ जनों के अकेले होने पर ही नहीं बल्कि दो लोगों के होने पर भी जीवन सुरक्षित नहीं है. पता नहीं मानव संवेदनाओं को क्या हो चुका है? अकेले क्यों कहें? अब तो न इस समाज में और न रिश्तों में विश्वास बचा है. बस दौलत के लिए बाप को बेटा मार रहा है, माँ को मार रहा है. एक ही कोख से जन्म लिए भाई भाई और बहन को मार रहा है. मीडिया तो एक बहाना है. ऐसे लोगों के विषय में लोगों को पता रहता है. मीडिया एक या दो बार ऐसे मामले उजागर करती है लेकिन घर में काम करने वाले, मजदूर या फिर सफाई कर्मी सभी की नजर रहती है. वरिष्ठ नागरिकों के ऊपर. सब ऐसे नहीं होते लेकिन असहाय पकर दोनों के होने पर भी ऐसी वारदाते होना आम बात हो चुकी है.

    ReplyDelete
  18. चौबीस घंटे चलने वाले अनगिनत चैनल, जिनके अस्तित्व को ये चुनौती दे रहे हैं उन समाचार पत्रों के पास अपने सरवाईवल का संघर्ष, पैसा और ग्लैमर का काकटेल, सबसे आगे और सबसे तेज दिखने होने की मानसिकता जो न करवाए वो थोड़ा है| कितने ही उदाहरण याद आ रहे हैं, जब कोई घटना होती है तो कुछ हटकर दिखाने बताने के चक्कर में किसी की व्यक्तिगत निजता से लेकर देश की सुरक्षा और जांच-पड़ताल संबंधी ख़बरों को ऐसे सनसनीखेज तरीके से परोसा जाता है फिर नतीजा चाहे जो भी हो, उससे इन्हें कोई मतलब नहीं|

    ReplyDelete
  19. औलादें अपने बुज़ुर्ग को पहले असहाय करती हैं , फिर उनकी सुरक्षा कौन करेगा ? बुढ़ापा जीवन की सबसे दुखद अवस्था है ! असंवेदनशील होते समाज में लम्बी आयु एक श्राप के सामान ही है !

    ReplyDelete
  20. आप ने एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है । मीडिया को ज्यादा जिम्मेवार होना पडेगा और इसके लिये किसी के निजी जानकारी को इस तरह सार्वजनिक कर के उनका जीवन संकट में डालने का उन्हें कतई अधिकार नही है ।

    ReplyDelete
  21. दूसरों के जीवन मिएँ झाँकने की हमारी प्रवृति हमेशा रहती है ... और यही प्रवृति पत्रकारों में भी रहती है ... चेनल वाले तो मसाला चाहते ही हैं ...
    बाहर दर्दनाक है ये सब ...

    ReplyDelete
  22. वर्तमान (घोर कलियुग?) में सनसनीखेज समाचारों की खोज में घूमते पत्रकारों आदि से यह आशा करना, कि वे इतनी दूरदर्शिता दिखाएँगे, ही सही नहीं है...

    ReplyDelete
  23. durbhagya purn... kab nijat milegi??:(

    ReplyDelete
  24. विचारणीय आलेख है। सामाजिक वैचारिक परिपक्वता की दृष्टि से हम भारतीय अभी भी अक्सर एक अनगढ समूह जैसे व्यवहार करते हैं। अनेक ग़ैरज़िम्मेदार व्यवहारों में एक यह भी है कि जिस हरकत से हमारा अपना नुकसान न हो, उसकी गहराई में जाने में कतई समय बर्बाद नहीं करते। समाज के अन्य भागीदारों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी समझी जाय, खासकर पत्रकार, पुलिस, प्रशासन आदि के द्वारा और दूसरों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, विशेषकर बच्चों, विकलांगों और वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और हितों का विशेष ध्यान रहे। आभार!

    ReplyDelete
  25. क्या कहा जाये!

    ReplyDelete
  26. किसी भी व्यक्ति अथवा अपराधी के जीवन के सिर्फ आर्थिक ही नहीं अपितु सामाजिक, पारिवारिक एवं किसी भी प्रकार के ऐसे पहलुओं को सार्वजनिक कर देना जिनका की व्यक्ति अथवा अपराधी द्वारा किया गया अपराध से कोई सम्बन्ध ही नहीं हो को सार्वजनिक कर देना न्याय सांगत नहीं होना चाहिए, खासकर तब जबकि फलां व्यक्ति अथवा अपराधी अपनी सफाई तक देने में असमर्थ हो या फिर जीवित ही न हो.....उपरोक्त विचारणीय पोस्ट हेतु आभार व्यक्त करता हूँ........

    ReplyDelete
  27. आपसे सहमत. निश्चित ही मीडिया द्वारा वैयक्तिक स्वंत्रता का हनन ही है. आज चेन्नई में एक दूर के रिश्तेदार से मिलने गया था. वे अस्पताल में भर्ती है. हृदयाघात हुआ था और दोनों पैर सुन्न हो चले हैं. उनके कमरे के बाहर अस्पताल द्वारा एक पोस्टर लगायी गयी थी जो मुझे बहुत अच्छी लगी. मजमून कुछ यों था "We respect patient rights and confidentiality So we request you not to discuss patient status/patient related information in public places. (In patient's interest)

    ReplyDelete
  28. आपसे सहमत. निश्चित ही मीडिया द्वारा वैयक्तिक स्वंत्रता का हनन ही है. आज चेन्नई में एक दूर के रिश्तेदार से मिलने गया था. वे अस्पताल में भर्ती है. हृदयाघात हुआ था और दोनों पैर सुन्न हो चले हैं. उनके कमरे के बाहर अस्पताल द्वारा एक पोस्टर लगायी गयी थी जो मुझे बहुत अच्छी लगी. मजमून कुछ यों था "We respect patient rights and confidentiality So we request you not to discuss patient status/patient related information in public places"

    ReplyDelete